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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
करता है जो काम,अपनी क्षमता जानकर।
मिलता शुभ परिणाम, विजयश्री उसको वरे।।
करें असंभव काज, जो नर क्षमतावान हैं।
सफल नहीं कल आज,क्षमता जो भूले सभी।।
भूल गए हनुमंत, अति क्षमता की बात को।
ऋक्षराज - से संत ,याद दिलाई शक्ति की।।
तन-मन से बलवान,क्षमता नित्य बढ़ाइए।
बनें न मूस समान,अरि आए जो सामने।।
करना तभी प्रहार,अरि की क्षमता जान लें।
तब ही हो उपचार,शक्ति प्रथम अर्जित करें।।
लड़ें न उससे मित्र,क्षमता में जो शेर हो।
दुर्बल देह चरित्र, वह क्षमता में क्षीण है।।
सक्रिय हो हनुमंत, क्षमता अपनी जानकर।
किया दशानन अंत, गए सिंधु के पार वे।।
फिर भी लड़ता पाक, जान रहा क्षमता नहीं।
नित्य कटाए नाक, भारत से संघर्ष में।।
गुप्त रखें पहचान,मन की क्षमता की सदा।
बड़ा रखें निज मान,अवसर को मत चूकिए।।
रहें सदा ही दूर, बालि सदृश बलवान हो।
बनें वहाँ मत शूर, क्षमता है दूनी जहाँ।।
मित्र उठाएँ भार, क्षमता जितनी देह में।
निश्चित हो तव हार,वरना विजय न मिल सके।।
शुभमस्तु !
02.04.2025●9.30प०मा०
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