059/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
अनुल्लूओं की सरकार
कुछ उल्लूओं के
कंधों पर चलती है,
उल्लूओं को सीधा
करना पड़ता है,
अन्यथा एक उल्लू ही
गले के नीचे
नहीं सरकता है।
सभी उल्लू टेढ़े ही क्यों ?
यदि उल्लू टेढ़े न हों
तो जलेबी समझकर
सब कोई निगल जाए,
अंततः उल्लू का भी
मान है,
उसका भी स्वाभिमान है।
उल्लू जब चाहे
लड़ बैठते हैं,
कारण अकारण
यों ही ऐंठते हैं,
उनसे चाहे
बाँस बल्लियाँ गड़वा लो
अथवा नारे लगवा लो
जरूरत पड़े तो
कहीं भी आग जलवा लो।
ये उल्लू बहुमुखी
प्रतिभासंपन्न हैं
ये भी इसी देश की
माँओं से उत्पन्न हैं,
इन उल्लूओं से ही
सियासत धन्य है।
कभी सोचना भी मत
कि देश उल्लू विहीन हो,
देश का उल्लू
देश की माटी में विलीन हो,
उल्लू वही सर्वश्रेष्ठ
जो जितना बड़ा कमीन हो।
शाखें हैं तो उल्लू भी हैं
और हर शाख पर
उल्लू विराजमान है,
आखिर उल्लू भी तो
इंसान है,
वही तो उनका
चुनाव चिह्न है
उल्लूओं से यह देश
बना हुआ महान है।
उल्लू जिंदाबाद के
नारे लग रहे हैं,
अनुल्लू पर्दे में
मजे कर रहे हैं,
देखते हैं उल्लू
किस करवट बैठता है,
हर उल्लू दूसरे पर
अनायास ऐंठता है।
शुभमस्तु ,
30.01.2026◆ 6.00आ०मा०
◆◆◆