190/2025
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
अपनी ही लिखी किताबों को
पढ़ने का आनंद
लिखने वाला ही जाने,
भले कुछ भी नया न लगे
फिर भी एक नवल उल्लास है,
यह बात साधारण नहीं
लगती कुछ खास है।
लगता है कि इन्हें मैंने लिखा है
पर सच यही है कि
इन्होंने मुझे लिख दिया है,
मैं इनका विचार हूँ
शब्दों का आकार हूँ
यही मेरा जीवन हैं,
इनमें बसते हैं मेरे प्राण,
जो करते रहते हैं मेरा त्राण
नहीं बनने देते पाषाण।
आज डिजिटल किताब
मेरे हाथों में है,
उसका भी अपना संतोष है,
किंतु वह बात नहीं
जो इन कागज की किताबों में है।
आइए हम इन किताबों का
अवमूल्यन न होने दें,
ये ज्ञान का लोक हैं
इन्हें अतीत में नहीं खोने दें,
यही वह पथ हैं
जिनसे चलकर
जिन्हें जीकर
हमने मंजिल पाई है।
शुभमस्तु !
03.04.2025●7.00प०मा०
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