गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

क्षमता [ सोरठा ]

 189/2025

                 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करता  है  जो   काम,अपनी क्षमता जानकर।

मिलता शुभ  परिणाम,  विजयश्री उसको वरे।।

करें  असंभव  काज, जो  नर क्षमतावान हैं।

सफल नहीं कल आज,क्षमता जो भूले सभी।।


भूल गए  हनुमंत, अति क्षमता की बात को।

ऋक्षराज - से   संत ,याद  दिलाई शक्ति की।।

तन-मन  से  बलवान,क्षमता नित्य बढ़ाइए।

बनें न  मूस  समान,अरि आए जो सामने।।


करना  तभी प्रहार,अरि की क्षमता जान  लें।

तब ही हो उपचार,शक्ति प्रथम अर्जित करें।।

लड़ें  न   उससे  मित्र,क्षमता में जो शेर  हो।

दुर्बल देह  चरित्र, वह क्षमता  में  क्षीण  है।।


सक्रिय  हो  हनुमंत, क्षमता अपनी जानकर।

किया   दशानन  अंत, गए  सिंधु के पार   वे।।

फिर भी  लड़ता  पाक,  जान रहा क्षमता नहीं।

नित्य    कटाए  नाक,  भारत   से संघर्ष   में।।


गुप्त रखें पहचान,मन  की  क्षमता की  सदा।

बड़ा रखें निज मान,अवसर को मत चूकिए।।

रहें    सदा   ही दूर, बालि सदृश बलवान  हो।

बनें    वहाँ   मत शूर, क्षमता  है  दूनी   जहाँ।।


मित्र   उठाएँ   भार,  क्षमता  जितनी  देह  में।

निश्चित हो तव हार,वरना विजय न मिल सके।।


शुभमस्तु !


02.04.2025●9.30प०मा०

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बुधवार, 2 अप्रैल 2025

शिवा करें कल्याण [ दोहा ]

 188/2025

         

[शिवा,शिवानी,शैलजा,ब्रह्मचारिणी,कुष्मांडा]

 

                     सब में एक

शिव की शक्ति प्रतीक हैं, शिवा करें  कल्याण।

अघ ओघों से मुक्त कर,जन-जन को दें त्राण।।

गिरिजा  दुर्गा  या  शिवा,शिव ऊर्जा  के नाम।

करें  जगत  कल्याण  वे,शुभ कैलास सु धाम।।


शंभु   शृंग    कैलास   पर, बसें शिवानी   संग।

षड्मुख  गणपति  साथ  में, सोह  रहे  वामांग।।

हुआ  शिवानी  भक्त  जो,बानक बना  अघोर।

अर्पित  है  शिव  भक्ति  में, धरता मौन  अथोर।।


माता       दुर्गा    शैलजा, ब्रह्मचारिणी   रूप।

सिद्धिदान   माता   करें,  सरस्वती शुभ    यूप।।

हिमगिरि  के  शुभ धाम  में,लिया मातु अवतार।

जगत   जपे   माँ  शैलजा, करें सदा   उद्धार।।


ज्ञान  त्याग  तप  भक्ति  का, पावन दुर्गा  रूप।

ब्रह्मचारिणी   नाम   है,पड़े न नर   भव  कूप।।

सौम्य  रूप   की  स्वामिनी,  त्याग तपस्यवान।

ब्रह्मचारिणी  शैलजा,  करें कृपा का   दान।।


दुर्गा    माँ   का  रूप है, कुष्मांडा  शुभ  नाम।

सिंहवाहिनी   लाल   पट,  धरे   हुए अभिराम।।

हलकी निज  मुस्कान  से, रचा सकल  ब्रह्मांड।

कुष्मांडा तन  भानु-सा,महिमा सदा अखंड।।


                  एक में सब

शिवा  शिवानी  शैलजा, ब्रह्मचारिणी   नाम।

कुष्मांडा नव  रूपिणी,  गिरि  कैलास   सुधाम।।


01.04.2025● 11.30 प०मा०

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रामनवमी [दोहा]

 187/2025

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चैत्र  मास  शुभ वर्ष का, नौमी तिथि शुभ वार।

राम  जन्म   उत्सव  मना,शुक्ल पक्ष शुभकार।।

माँ   दुर्गा   को  पूजिए ,  नौ दिन पहला  मास।

नौवें  दिन श्री राम का,शुभ अवतरण  उजास।।


लिया   विष्णु   ने   चैत्र में, राम रूप  अवतार। 

चैत्र  सुदी  नवमी  बड़ी, पावन तिथि शुभकार।।

अवतारों    में   सातवाँ,   राम  रूप  है  एक।

कौशल्या  सुत विष्णु  हैं, ज्यों साक्षात विवेक।।


जो रमता कण- कण सभी,सकल सजी है सृष्टि।

उसी  राम  की  हो  रही, निशिदिन भारी वृष्टि।।

राम   रसायन   के  बिना,  नर जीवन   निस्सार।

हृदय  अयोध्या -   धाम   है, करें राम    उद्धार।।


आजीवन   रट  राम  को,  राम   नाम   है   नाव।

भव सागर   से   पार  हो, जपें सदा सत   भाव।।

रटते - रटते    राम    को, हो   जा  प्राणी   राम।

तिनका   हिले न एक भी,सफल न कोई  काम।।


सत्य    राम    का    नाम   हैं,  कहते  बारंबार ।

जब  जाता  तन  छोड़कर, पंछी पंख   पसार।।

उलटा   जपता  राम  जो,  उसका भी     उद्धार।

करते  हैं  प्रभु   राम  जी,  करके बिना   विचार।।


सत्य     सनातन  धर्म   में, त्रेता  युग  में    राम।

अवतारे    प्रभु   सत्य  की, रक्षा के कर   काम।।


शुभमस्तु !


01.04.2025● 10.00प०मा०

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कृपा तुम्हारी रहे अपार [गीत]

 186/2025

         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दुर्गा दुर्गतिनाशिनी 

कृपा तुम्हारी रहे अपार।


शुम्भ निशुम्भ क्रूर महिषासुर

करते अत्याचार यहाँ

रक्षा करें मातु जग जननी

अघ ओघों से मुक्त जहाँ

अष्टभुजा वाहिनी उबारो

करें जगत उद्धार।


पर्वत पुत्री ब्रह्मचारिणी

 तुम ही गौरी सिद्धिप्रदा

शंभु प्रिया तुम ही रक्षक हो

चंद्रघंटिका तुम शुभदा

रमा सरस्वती कल्याणी

करती नित उपकार।


वासंतिक नवराते आए

होती परित: जय जयकार

तुम ही काली मातु भवानी

सभी दिशाएँ करें पुकार

जय माँ दुर्गे शेरा वाली

मिटें दानवी अत्याचार।


शुभमस्तु !


01.04.2025●4.30आ०मा० 

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सोमवार, 31 मार्च 2025

सोए साँप जगाने का ही [नवगीत]

 185/2025

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सोए साँप जगाने का ही

राजनीति है नाम।


सत्तासन से दूर खड़े हो

कौन तुम्हें पहचाने

सत्तासन पर अड़े हुए जो

उनको ही सब माने

आग लगाते रहो देश में

बचा देह का चाम।


राजनीति को जिंदा रखना

तुमको बहुत जरूरी

जो मन आए वही कहो तुम

जनता से रख दूरी

नहीं कभी था सेतुबंध वह

नहीं हुए प्रभु राम।


रक्त नहीं है आर्य पिता का

पता न जननी कौन

देश विरोधी वाणी बोलो

घावों पर   दो नौंन

राजनीति के चूल्हे सुलगा

तुम्हें कमाने दाम।


शुभमस्तु !


30.03.2025● 11.45आ०मा०

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आज के युग का मैं भगवान [नवगीत]

 184/2025

  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समझ ले बात  सही  इंसान

आज के युग का मैं भगवान।


गर्वोन्नत हो मस्तक तेरा

खिंचवा फोटो संग

शान दिखाए औरों को तू

चढ़ा रखी ज्यों भंग

मैंने तुझे न अपना समझा

तू करता गुणगान।


भले पिघल जाए मंदिर का

पत्थर का भगवान

मुझको समझ न लेना सस्ता

इतना भी आसान

मेरे यहाँ सभी तुलते हैं

बीस पंसेरी धान।


तेरे जैसे कितने आते

लेकर छायाकार

संग खड़े खिंचवाते फोटो

दे कर  में उपहार

मुझे आम का ही रस लेना

करता मैं अभिमान।


30.03.2025●10.45 आ०मा०

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सत्कर्मों की साधना [दोहा]

 183/2025

              

[साधना,उपासना,आराधना,प्रार्थना,याचना ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक

सत्कर्मों     की   साधना,  सदा साधती    श्रेय।

मिले  शुभद  परिणाम  ही, पूर्ण करे हर   ध्येय।।

करे  कठिन  जो साधना, गहे उच्च  वह लक्ष्य।

सत्त्व  साध  पथ  में बढ़े, भखे न भक्ष्य-अभक्ष्य।।


प्रभु   की   करें  उपासना, ध्यान रहे   एकाग्र।

मन में शांति निवास हो,क्षणिक न हो मन व्यग्र।।

सभी   उपासक  एक से, कभी न होते   मित्र।

उपासना   के   रंग   भी,पृथक छिड़कते  इत्र।।


करता फल की  कामना,फल पर उसका ध्यान।

कैसे   हो    आराधना ,उड़े  लक्ष्य  पर   ज्ञान।।

श्रेष्ठ     वही   आराधना,  जहाँ  समर्पण   भाव।

प्रभु   चरणों  में   सौंपिए, सहज हृदय  का चाव।।


मन - मंदिर    की  प्रार्थना, करें हृदय   से  मौन।

और  न  कोई    जानता, जतलाए भी    कौन।।

द्रवित   काष्ठ   होता नहीं, करे प्रार्थना   भक्त।

पाहन भी   पिघले  वहाँ, जहाँ  हृदय    अनुरक्त।।


दाता     केवल   ईश    है , याचक  सब   संसार।

लक्ष्य    याचना   का  वही, देता  हर उपहार।।

द्वार - द्वार   जाकर कभी, बनें न याचक    आप।

करें   नहीं  वह  याचना,  बन जाए  अभिशाप।।

      

                 एक में सब

आराधना     उपासना,  करें साधना    नित्य।

सफल प्रार्थना   याचना, का  हो  तब औचित्य।।

शुभमस्तु !


29.03.2025●6.00प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...