रविवार, 31 जुलाई 2022

देश का ऊँचा तिरंगा🇮🇳 [ गीतिका ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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देश   का   ऊँचा   तिरंगा  शान  मेरी।

राष्ट्र  का  गुणगान  ही पहचान  मेरी।।


देश  की  बोली  सु -हिंदी बोलता   मैं,

नीड़   मेरा  धाम   पावन  छान   मेरी।


नित्य   गंगा,  गोमती, यमुना सदा  से,

दे   रहीं  जीवन   निरंतर  आन    मेरी।


अन्न  माँ का  खा  रहे पी विमल  पानी,

धान्य   का  भंडार  धन की खान  मेरी।


लोट  कर जिस धूल में जीवन जिया है,

गीत , कविता  की  विलोलित तान मेरी।


देशवासी   आइए   हम   एक हों   सब,

है    यही    अस्तित्व    सारा त्रान   मेरी।


किस तरह आभार मैं इसका करूँ नित,

देश   भारत  है 'शुभम्'   की जान मेरी।


✍️ शुभमस्तु!


३१.०७.२०२२◆४.००पतन म मार्तण्डस्य।

सावन की घनघोर घटाएँ 🌈 [ गीतिका ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सावन        की      घनघोर   घटाएँ।

रह - रह   कर  बहु      रोर  मचाएँ।।


तड़ -तड़,  तड़- तड़  तड़के बिजली,

धरती    के      हर      छोर   कँपाएँ।


यौवन     छाया     है     नदियों  पर,

हर - हर     धर - धर    शोर  उठाएँ।


पंख      भीगते     हैं     चिड़ियों   के,

स्वयं        भिगोने      मोर   न  जाएँ।


भीग    गया    तन- मन    भीतर   तक,

अंग   -  पीर        हर      पोर  जगाएँ।


साजन       नहीं     तिया   के  सँग   में,

विरहन         को       कमजोर   बनाएँ।


रात      अँधेरी      में     शापित      हैं,

चकवा   -    चकवी      भोर  मिलाएँ।


🪴 शुभमस्तु !


३१.०७.२०२२◆३.३० पतन म मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल


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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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फूल -  सी  तुम  महकती  हो नाज़नीं।

चाँदनी - सी     चहकती   हो नाज़नीं।।


पाँव  में     जावक    गुलाबी  है     सजा,

बर्र    कटि  - सी  लहकती   हो नाज़नीं।


रान    केले   का  तना  चिकना   सुघर,

इस  जमीं   पर   उछलती   हो नाज़नीं।


पार    मैदां      के     बुलंदी   तुंग    की,

छलछलाती      बहकती     हो  नाज़नीं।


रस   लबों  का   छलकता   है जाम - सा,

मोम - सी   तुम   हो  पिघलती  नाज़नीं।


डिम्पले  - रुखसार       में  डूबा   हुआ,

दिल से  तुम कब हो निकलती  नाज़नीं।


आँख     हैं  या     झील    की गहराइयाँ,

एक   पल   में    ही  फिसलती  नाज़नीं।


ये     लटें    हैं     या     भ्रमर  गुंजारते,

मौन    कुंजों   में     किलकती   नाज़नीं।


बादलों   के   बीच   में   चमके 'शुभम्',

दंत  की  छवि  - सी  दमकती नाज़नीं।


🪴शुभमस्तु !


३१.०७.२०२२◆१.३० पतनम मार्तण्डस्य।

सुप्रभात पावनी 🌅 [ दोहा ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🌅 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हर  हरियाली तीज को,कजरी आती याद।

कैसे  झूमें   पींग  में,  विस्मृत झूला  नाद।।

रिमझिम  बूँदें  नाचतीं,  भीगे गोल कपोल।

चोली चिपकी अंग  से,चूनर करे  किलोल।।


सावन में  तन  ही  नहीं,भीगा मन   पुरजोर।

उठी मींजती  आँख तिय,देह भिगोती भोर।।

भीगे   अपने  नीड़   में , गौरैया   के  पंख।

नदी   बहाकर  ले   गई, घोंघे, सीपी , शंख।।


गरज बरस घन-घन करें,पावस के जलवाह।

प्यासी धरती को करें,सहज समर्पित  चाह।।

वेला आई भोर की,प्रमुदित प्रकृति  अपार।

हवा बही सुखदायिनी,खुले नयन के द्वार।।


कलरव  करते खग सभी,नाच रहे  वन  मोर।

रवि किरणें हँसने लगीं,हुई सुनहरी    भोर।।

बैल जुआ,हल ले चले,हर्षित सभी किसान।

अन्न  उगाने   के  लिए,  मेरा देश    महान।।


दुहने  को ले  दोहनी,दूध गाय का    नित्य।

माता  आई  सामने,  करने दैनिक  कृत्य।।

दधि ले मंथन कर रही,बना रही   नवनीत।

माताएँ  घर -घर सभी,वर्षा, गर्मी,    शीत।।


पर्व  श्रावणी  के   लिए, बहिनें  हैं    तैयार।

राखी  घेवर  सज  रहे, पावन भगिनी प्यार।।

ताम्रचूड़  की  बाँग   से, जाग उठा  है  गाँव।

शरद  सुहानी   आ गई ,हमें न भावे   छाँव।।


कजरी अब इतिहास है,शेष न रही मल्हार।

सूखा  घेवर दे रहा, राखी  का शुभ  वार।।

अहं  क्रोध  के ज्ञान का,होता सदा  विनाश।

कवि,पंडित या सूरमा,ढह जाता गढ़ ताश।।


ऋतु रानी पावस करे, सहज सुखद आंनद।

मेघ  मल्हारें   गा  रहे,सरिता पढ़ती   छंद।।


🪴 शुभमस्तु !


३०.०७.२०२२◆४.००पतनम मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

प्रबोध -मंजरी 🦚 [छंद-पञ्चचामर ]

 302/2022


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छंद विधान:

1.वर्णिक छंद।

2.चार चरण।

3.क्रमशः 08 लघु गुरु =16 वर्ण।

IS IS IS IS  IS IS IS IS =16 वर्ण।

                 अथवा 

जगण  रगण  जगणं  रगण

ISI.    SIS.   ISI.    SIS


जगण   रगण  

ISI.     SIS.  =16 वर्ण।

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✍️शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

न देश का विचार है,विचार जाति-पाँति का।

गुबार ही गुबार है,नहीं सुनीति - रीति   का।।

विनाश  काल सामने,न देखता सु - नैन  से।

नशा  नसा   रहा  तुझे,रहा न मूढ़   चैन  से।।


                         -2;

मरा न  कौन काल से,न तू सदा - सदा  रहे।

सदा सु-काज ही जिया, सु-देहआग में दहे।

न राह रोक और की, न आह ले कभी यहाँ।

सु-पंथ पे सदा चले,सु -योनि मानुसी कहाँ??


                         -3-

न  गैर  नारि  कामना,सुधार मीत   भावना।

हिरण्य सेंध-साधना, समाज-नीति  लाँघना।।

अनीति है जघन्यता,कुकर्म साज  साजता।

सु-धी मलीन पात्र को,सुसंग से न माँजता??


                         -4-

ध्वजा तिरंग सोहती,विमोहती स्वदेश   को।

हमें  गुरूर है बड़ा, सु-वन्दगी महेश   को।।

अराति बाट जोहता, असावधान  हों  नहीं।

सुमेरु- से गिरें  वहाँ,अमीत हों जहाँ  कहीं।।


                         -5-

चले  सुपंथ  में सदा, कुपंथ की  न  राह ले।

मिली सुबुद्धि भी तुझे,न जी अमीत चाह ले।

भरें न पेट  ढोर भी, सुतथ्य  तू  न जानता?

उगा न भानु रात में,सु - सत्य यों न मानता।।

                 

🪴 शुभमस्तु !


२९.०७.२०२२◆०२.००पतनम मार्तण्डस्य।

प्रबोध -पराग 🌹 [छंद-पञ्चचामर ]

 301/2022

   

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छंद विधान:

1.वर्णिक छंद।

2.चार चरण।

3.क्रमशः 08 लघु गुरु =16 वर्ण।

IS IS IS IS  IS IS IS IS =16 वर्ण।

                 अथवा 

जगण  रगण  जगणं  रगण

ISI.    SIS.   ISI.    SIS


जगण   रगण  

ISI.     SIS.  =16 वर्ण।

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✍️शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

सु-देश  में पला रहा,वही न हो सका   सगा।

सदा सदोष सोचता, न भाव देश  का जगा।।

 विरोध क्रोध की क्रिया,तुझे न चैन  दे सकी।

असंख्य भीड़ सोच ये,सु-नारि वासना तकी।


                         -2-

विलोम काम -काज में,नितांत है  सलीनता।

अनेक जान-माल भी,अबाध मूढ़  छीनता।।

नहीं भरा घड़ा अभी,न पाप ही अभी  फले।

कुराह ही चला सदा, न चाँद भी मही  ढले।।


                         -3-

विरंचि  ने  बना दिए,प्रसून शूल  भी  सभी।

अधीर धीर संत भी,असंत भी कभी-कभी।।

तुला  रहे समान ही,अहं विनाश  क्यों  करे।

न मानवीय काज में,अधीन मीन - सा  मरे।।


                         -4-

विचार, भाव शोध ले,न ढोर श्वान  तू  रहे।

सुबोध ज्ञान धार ले,न काम ध्यान में  बहे।।

तुझे सु - देह मानवी, प्रदान की विधान ने।

नहीं मिटा वृथा उसे,रहे न काठ - सा तने।।


                         -5-

जगा, जगा, जगा, जगा,जगा सुजान मूढ़ता।

भगा, भगा, भगा, भगा,भगा विमूढ़ कूढ़ता।।

रहे,  रहे,  रहे, रहे, रहे   न  तू   यहाँ   सदा।

करें,  करें,  करें, करें, करें कृपा  सु- शारदा।।


🪴 शुभमस्तु !


२९.०७.२०२२◆११.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

रंग - तरंग चंचला ! 🌈 [ छंद :चंचला ]

  

छंद विधान:

1.रगण जगण रगण जगण

212    121   212  121

रगण  +लघु 

212     1  = 16 वर्ण

2.चार चरण समतुकांत।

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                       -1-   

मेघ  सावनी   घिरे  गिरा सुहावना   सु-नीर।     

खेत - खेत  बाग धाम तेज था उड़ा समीर।।

नालियाँ  भरी  चलीं  सवेग शैलजा   अधीर।

झूमते   किसान  देख  नाचता रहा   कबीर।।


                         -2-

सेज त्याग जाग के चलीं सु- नारियाँ अनेक।

आज  सोमवार है शिवार्चना बनी सु- टेक।।

धार   देह   पे    सुरंग  साड़ियाँ नई    हरेक।

गीत  गा   रहीं  सभी  सुमाधुरी उमंग  नेक।।


                         -3-

बात  रात  की  गई  सुभोर सूर   है  समीप।

अंधकार  को नकार प्यार का जला सु दीप।।

फूल की कली  खिली सुगंध बाँटती अभीत।

झूमते  समूह   बाँध   चंचरीक साध   प्रीत।।


                         -4-

साधना  सुपंथ  है  सुकाव्य कातना  महीन।

भानु  का  प्रकाश  है प्रसार फैलता  नवीन।।

हीन  भाव से भरा न हो सका सुधी  प्रवीन।

मातु  शारदा  करें  कृपा  बने सकाम  दीन।।


                         -5-

सार - सार  चाहता न द्वार में किया  प्रवेश।

देह  ढोंग  साधता  सु  धारता सुरंग  वेश।।

देश का विचार सोच में न आ सका विशेष।

खाल ओढ़ शेर की बना रहा सदा कु-मेष।।


🪴शुभमस्तु !


२८.०७.२०२२◆ ३.०० पतनम मार्तण्डस्य।

बुधवार, 27 जुलाई 2022

विधि का ये कैसा विधान ! 🪦 [ अतुकांतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🪦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जो विधि को ही

नहीं मानता,

हर ओर अपनी ही

तानता,

जो गुड़ की चासनी में

गोबर को सानता,

क्या नहीं कहोगे

इसे उसकी अज्ञानता ?

अथवा कह दोगे विद्वत्ता!


भेजा था उसे

मानव बनाकर

एक ही द्वार से,

बाहर निकल कर

भर गया गर्म गुबार से,

भूल गया कर्ता अपना,

देखने लगा 

सत्ता का सपना,

माला को जपना

पराया घर माल

सभी कुछ अपना!


अधिकांश करनी में विलोम

खान - पान 

देहाचार में अनुलोम, 

मुँह को छोड़ 

किसी और द्वार से

खाया नहीं,

न देखा कान से

न सुना ही आँख से,

साँस नहीं ली

निम्नांग से,

नहीं आई नाक काम

शुण्ड बनी हाथ ,

न पैर ने चलना छोड़ा,

औऱ न 

हाथों ने काम से

पहुँचा मोड़ा,

जो करता रहा एक घोड़ा

उसी तरह नर ने भी

नारी से नाता जोड़ा।


पर क्या करें

विधाता अपना

विधान नहीं छोड़ेंगे,

देख कर करनी नर की

क्या वे उसकी मनमानी

की ओर मुख मोड़ेंगे ?


सोचना होगा ही

हे मानव! तुझे,

हर सीमा का 

अतिक्रमण संघातक है,

तू जो कर रहा है

वह  पातक है,

तेरा ही अपने हाथों,

हाथों से क्यों?

हाथों से हाथ का काम

तेरी तौहीन है,

तुझे किसी 

औऱ ही अंग से

तेरे स्वभाव की 

तरकीब नवीन है,

उसे चला लेना,

बचा सके तो 

कुदरत के कहर से

खुद के अस्तित्व को

बचा लेना, 

अपने चेहरे को

शुतुरमुर्ग बन

टाँगों में छिपा लेना !


🪴शुभमस्तु !


२७.०७.२०२२◆ ७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

दिए ब्रह्म नौ द्वार 🪦 [कुंडलिया]

 

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✍️ शब्दकार©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

जीता   कोई  पेट को,कोई निज   परिवार।

रँगा जाति के रंग में,जुड़े जाति    से  तार।।

जुड़े  जाति  से तार,भेजता बिजली  पानी।

बना  कूप   मंडूक, बनाता   नई   कहानी।।

'शुभम्' यहीं तक देश, उसी में जीवन  बीता।

भेदभाव  में  लीन, नहीं मानव बन   जीता।।


                         -2-

मन की छोटी सोच की,क्षमता ज्यों खुर छाग

रहता बिल में और के,काला विषधर  नाग।।

काला  विषधर  नाग,देश  की भक्ति न जाने।

करे अन्न-आहार,  उचित विष -दंशन  माने।।

जीता  जैसे ढोर,मात्र चिंता निज  तन   की।

'शुभम्'करें पहचान,सोच जानें लघु मन की।


                         -3-

पाहन  को  हम पूजते,मान उसे   भगवान।

ईश्वर  भी साकार है,दे मानव यदि   ध्यान।।

दे मानव  यदि ध्यान,पिता- माता  भी मेरे।

गुरु भी  ब्रह्म स्वरूप,ज्ञान के कोष  घनेरे।।

'शुभम्'न सबसे मूढ़,मिलेगी उसे सु-राह न।

हो मन में  सद्भाव, तुझे  फल देंगे   पाहन।।


                         - 4 -

तेरे   तन  में   दे  दिए,  कर्ता ने  नौ   द्वार।

आनन अपना छोड़कर,क्यों न करेआहार?

क्यों न करे आहार,आँख या जाकर नीचे।

चल  हाथों   से  मूढ़, पैर से नीर    उलीचे।।

'शुभम्' कान से देख,नाक से श्वास न ले रे।

मुख से खुशबू सूँघ, उलट सब कराज तेरे।।


                          -5-

धाता  ने नर को दिए,विधिवत देह - विधान।

पालन  सबका  एक ही,सोहन या सलमान।।

सोहन  या  सलमान, उदर  में मुख से लेना।

चलें  राह  में  पैर, हाथ  से ही कुछ   देना।।

'शुभं'न विधि विपरीत,धरा में नर अपनाता।

फिर क्यों भेद-कुभेद, पालकर छोड़े धाता।।


🪴 शुभमस्तु !


२७.०७. २०२२◆६.३०पतनम मार्तण्डस्य।

गाछ :प्रकृति उपहार 🌳 [ दोहा ]

  

[कलगी,अंकुर,पत्ती, शाखा ,फल ]

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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       🌲 सब में एक 🌲

कलगी लगती नाचने, बहता  सजल समीर।

तन-मन कवि का झूमता,होता शुभं सुधीर।

कुशल कलापी-शीश पर,कलगी करे किलोल

नर्तन में  इत -उत फिरे, नहीं उमड़ते  बोल।।


पावस  में   बूँदें  झड़ीं, रही  न धरा   उदास।

अंकुर फूटे घास के,महकी सजल  सुवास।।

देख हरित अंकुर नए,प्रमुदित हुए किसान।

उर में उगती आस का,होता 'शुभम्' विहान।


पत्ती पीपल -पेड़ की,थिर न रहे पल  एक।

प्राणवायु  देती सदा,हितकारी शुचि  टेक।।

पत्ती- पत्ती   में  पके, पादप   का  आहार।

हरी   रसोई   सोहती,  धरती महा    प्रभार।।


मूल,तना,शाखा सभी, पाँच अंग दल फूल।

सबका अपना धर्म है,'शुभम्' न जाना भूल।।

शाखा से शाखा उगे,बहु शाखी   हो  गाछ।

सदा फूल ,फल  दे वही,मीत न  देना  पाछ।।


जीवन   का फल कर्म से,भरे हजारों  बीज।

जैसा  पेड़  उगाइये, वैसा  ही फल    चीज।।

क्यों फल की इच्छा करे,पाता स्वयं सहेज।

सत्कर्मों  में रत  रहे,बँधे न यम  की  लेज।।


       🌳 एक में सब 🌳

शाखा, फल, पत्ती सभी,

                         अंकुर , कलगी मीत।

'शुभम्'    गाछ    के  अंग हैं,

                           झेलें    आतप   शीत।।


*पाछ=घाव।

*लेज= रज्जू।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆११.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

बागों ने गाया! 🌳 [ बालगीत ]

 296/2022

     

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✍️शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सावन    में     बागों   ने   गाया।

गीतों    का   सरगम   मनभाया।।


प त-  पत     पीपल - पत्ते करते।

स र-सर  कर  फरास रस भरते।।

रिमझिम   कर   र साल हरषाया।

सावन     में     बागों    ने   गाया।।


गिलहरियाँ  गि ल- गिल कर  गातीं।

मधुमाखी   म र   -  मर सुनवातीं।।

ध व     तरु   पतला  पात लुभाया।

सावन     में     बागों     ने   गाया।।


नी बू ,  नीम     मौन   क्यों  रहते।

गिरा     निबौली         नाचा  करते।।

स हजन   की    है   शीतल छाया।

सावन      में     बागों      ने गाया।।


सेमल,   जामुन ,     लता ,  चमेली।

लंबे    बाँस     सुमन    की  बेली।।

विटप     आँवला    भी  सरसाया।

सावन     में     बागों   ने  गाया।।


हरी    घास     मखमल - सी प्यारी।

सुख      देती       पैरों    को न्यारी।।

'शुभम्'    कीर   ने    फल टपकाया।

सावन    में     बागों     ने   गाया।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆०१.१५ पतनम् मार्तण्डस्य।


दादुर -गान 🐸 [ बालगीत ]

 295/2022


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✍️शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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दादुर    रजनी    भर    टर्राते।

दादुरियों  को   पास  बुलाते।।


जब  से   गिरे   दोंगरे    भारी।

शुभ अषाढ़ की शीत फुहारी।

निकल धरा   से   बाहर आते।

दादुर    रजनी   भर   टर्राते।।


वीरबहूटी    लाल     गिजाई।

उड़े   पतंगे    दीमक    आई।।

रेंग   केंचुआ    थे     शरमाते।

दादुर   रजनी   भर    टर्राते।।


झींगुर की   झनकार  सुनाई।

देती,  कानों   को   प्रियताई।।

जुगनू   अपनी   टोर्च जलाते।

दादुर    रजनी  भर   टर्राते।।


टर्र -  टर्र   स्वर लगता प्यारा।

गूँज  उठा  सारा   गलियारा।।

तालाबों     में    मंत्र   सुनाते।

दादुर   रजनी    भर   टर्राते।।


भोर हुआ सर- तल पर अंडे।

शांत   भेक    सोए   मुस्टंडे।।

तापस   धूनी     मौन   रमाते।

दादुर  रजनी    भर    टर्राते।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆१२.१५ पतनम् मार्तण्डस्य।

साड़ी हरी घास की ☘️ [ बालगीत ]

 294/2022

   

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✍️शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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साड़ी  हरी  घास  की  प्यारी।

पहन  धरा लगती   मनहारी।।


वर्षा  की ऋतु  जब  से  आई।

चली  हवा  पछुआ  पुरवाई।।

बरसे  बादल   गिरी   फुहारी।

साड़ी  हरी घास  की  प्यारी।।


कोमल घास मखमली लगती।

आँखों  में शीतलता  सजती।।

जेठ  मास  की  तपन उजारी।

साड़ी  हरी  घास  की प्यारी।।


वन में हिरन,शशक पशु खाते।

मन ही मन  में   खूब  सिहाते।।

गाय, भैंस  को  भी  प्रिय भारी।

साड़ी  हरी   घास  की  प्यारी।।


छील   मेंड़   घड़ियारे   लाते।

हरे -हरे तृण गृह -पशु  खाते।।

पड़िया  की  प्रसन्न   महतारी।

साड़ी   हरी  घास की प्यारी।।


उगतीं बूटी -  जड़ी   घास में।

वन -औषधियाँ बढ़ें साथ में।।

करतीं जो निरोग  तन  सारी।

साड़ी हरी   घास की प्यारी।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆११.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

हमको इंद्रधनुष है भाता 🌈 [ बालगीत ]

 293/2022

   

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✍️ शब्दकार©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हमको    इंद्रधनुष  अति भाता।

पावस   के  अम्बर  में  आता।।


सात रंग   का  धनुष   इंद्र  का।

बैंगन जैसा   रँग    है चहका।।

नीला   फिर  आकाशी छाता।

हमको   इंद्रधनुष  अति भाता।।


हरा,    पीत,    नारंगी  मोहन।

लाल  अंत     में    देखो सोहन।।

जो   न   देखता  वह  पछताता।

हमको     इंद्रधनुष   अति भाता।।


जलकण    पर    रविकर विक्षेपण।

आता    है    वर्षा    में    ये  क्षण।।

अपवर्तन     किरणों     को  पाता।

हमको     इंद्रधनुष     अति भाता।।


कभी      परावर्तन       भी   होता।

पीछे       पीठ       भानु  संजोता।।

इंद्रधनुष       तब    नभ चमकाता।

हमको     इंद्रधनुष   अति भाता।।


प्रकृति      के      हैं     रंग निराले।

नूतन   'शुभम्'    रूप    में  ढाले।।

किसको  दृश्य   न   सुखद सुहाता।

हमको      इंद्रधनुष    अति भाता।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆१०.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।


घेवर लाया! 🥯 [ बालगीत ]

 292/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🍩 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सावन   आया   घेवर   लाया।

मुँह  में  मेरे   पानी    आया।।


जाते   जब   बाजार पिताजी।

लेने   घर -  सामग्री   भाजी।।

मैंने   घेवर     तभी    मँगाया।

सावन  आया  घेवर   लाया।।


दादी   के   हैं    गाल  पोपले।

हुए दाँत बिन पिचक खोखले

घेवर उनको   खूब   लुभाया।

सावन आया   घेवर   लाया।।


दीदी   भैया   सब   ही खाते।

माँग -  माँग कर माँ से लाते।।

लप - लप करके   मैंने खाया।

सावन  आया   घेवर  लाया।।


यों  तो  होतीं   बहुत  मिठाई।

लड्डू,पेड़ा, सु - रस  मलाई।।

गरम जलेबी  कौन  भुलाया ?

सावन   आया  घेवर  लाया।।


कम मीठा ही   बच्चो  खाना।

यदि न चाहते  दाँत  गिराना।।

दादी   बाबा   ने    समझाया।

सावन  आया   घेवर  लाया।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆९.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

पड़ते नहीं बाग में झूले 🌳 [ बालगीत ]

 291/2022

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पड़ते    नहीं   बाग   में  झूले।

क्यों हम   खेल  पुराने भूले।।


लोग  नहीं  अब  पेड़  लगाते।

लगे  पेड़  को  काट  गिराते।।

धूल   भरे   उठ    रहे   बगूले।

पड़ते  नहीं  बाग    में  झूले।।


पेड़ न  हों वर्षा  क्यों   होगी ?

बने   रहेंगे   हम  सब  रोगी।।

खट- खट करते  यहाँ वसूले।

पड़ते  नहीं   बाग   में  झूले।।


पौध  लगा  फोटू   खिंचवाते।

नहीं  देखने भी  फिर  जाते।।

वर्षा   में   उठते    न   बबूले।

पड़ते  नहीं  बाग   में   झूले।।


भूलीं    बहनें   गीत   मल्हारें।

मोबाइल   की   सदा  बहारें।।

कहतीं  पिरा   रहे   हैं   कूल्हे।

पड़ते  नहीं   बाग  में   झूले।।


झूला   हमें   निरोग   बनाता।

कमर,हाथ,पग खूब चलाता।।

बनें   अन्यथा   लँगड़े - लूले।

पड़ते  नहीं   बाग  में   झूले।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆७.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

छप्पक छैया 🏄🏻‍♂️ [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏄🏻‍♂️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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छप्पक  छैया !  छप्पक छैया।

चलो  बाग  में   खेलें   भैया।।


देखो  बादल   बरस   रहे   हैं।

नाले -  नाली   खूब  बहे  हैं।।

नाचेंगे     हम    ताता    थैया।

छप्पक छैया! छप्पक छैया!!


रिमझिम रिमझिम चलें फुहारें

नानी  गाती  गीत     मल्हारें।।

रँभा    रही   है   भीगी  गैया।

छप्पक छैया ! छप्पक छैया!!


भैंस  कीच  में  लोर  रही  है।

लौह - शृंखला  तोड़  रही है।।

तोड़े   डाले  बँधी   पगहिया।

छप्पक छैया ! छप्पक छैया!!


पकते  टपके   टपक  रहे  हैं।

झोली में सब  लपक  रहे हैं।।

अपनी  तो  हैं    छोटी   बैयाँ।

छप्पक छैया ! छप्पक छैया!!


चल   वर्षा   में  खूब   नहाएँ।

कागज़ की दो नाव   चलाएँ।।

अम्मा  से   ले   पाँच   रुपैया।

छप्पक छैया ! छप्पक छैया!!


🪴 शुभमस्तु !


२६.०७.२०२२◆६.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 25 जुलाई 2022

कबीर एक चाहिए 🛖 [ व्यंग्य ]

 

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 ✍️ व्यंग्यकार ©

 🛖 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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 परम् सौभाग्य का विषय है कि जब हमने इस दुनिया की धरती पर पदार्पण किया और कुछ करने के योग्य हुए तो हमने पाया कि यह समाज जिसके मध्य रहकर हम निर्विघ्न रूप से साँस ही नहीं ले रहे ;वरन रह भी रहे हैं।इस अत्यधिक सुधरे हुए समाज में हमारे करने के लिए कुछ भी नहीं बचा ; अब आप ही बताइए भला कि इस समाज के लिए क्या नया करके हम अपना नाम मुस्कराते हुए फोटो सहित अखबार की सुर्खियों में छपवाएं कि सारा देश और समाज धन्य- धन्य कह उठे कि वाह ! 'देश प्रेमी' जी आप तो आप ही हैं ;जो आपने समाज को ऊपर उठाकर कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया। यदि आप नहीं होते तो इस समाज और देश का क्या होता! ये वहीं का वहीं पड़ा रह जाता।पर खेद है कि क्या करें ;करने के लिए ,अपने समाज सुधारक हाथ दिखाने के लिए कुछ भी शेष नहीं है।सब कुछ पहले से ही ठीक - ठाक मिला है। 

 साहित्य की किताबों में पढ़ते हैं कि आज से छः सात सौ वर्ष पहले समाज के विभिन्न धर्मों ,मज़हबों ,जातियों ,वर्णों के बीच गहरी खाइयाँ बनी हुई थीं, जिन्हें पाटने के लिए एक साहसी समाज सुधारक संत कवि कबीर ने अपने दोहों के फावड़े चला- चला कर देश में घूम - घूम कर दिन- रात पसीना बहाया, पर कह नहीं सकते वे अपने सपनों को साकार करने में कितने सफल हुए।हाँ ,इतना अवश्य हुआ कि उनके सुधार की बात सुनकर ऐसा लगा कि लोगों के कानों में सीसा पिघला कर डाला जा रहा हो।कबीर न हिंदुओं को अच्छे लगे और न मुसलमानों को।क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी कहा वह भले ही सत्य हो ,पर करेले जैसा कड़वा ही था।आप जानते हैं कि करेला चाहे कितना ही गुणकारी हो ,सबको प्रिय नहीं होता।यही बात कबीर के समय में कबीर वाणी के लिए भी थी।जैसे सुअर को कीचड़, गुबरैले को गोबर,मुर्गे को बांग, मुर्गापसंद को टाँग,हालाप्रिय को नाला,मिठाई को लाला,चरित्रहीन को घोटाला, नेताजी को माला -दुशाला,दोस्तों को प्याला, सपेरे को नाग काला ;पसंद है। वैसे ही खाइयों के वासियों को कबीर नापसंद थे। पर क्या करें : 'जो आया जेहि काज सों, तासे औऱ न होय।' के अनुसार तो कबीर दास जी जिस काज से आए थे ,उसमें उन्होंने कोई कमी नहीं छोड़ी:-

- 'अरे इन दोऊ राह न पाई। 

 हिंदुन की हिंदुआई देखी, तुरकन की तुरकाई।

 हिन्दू अपनी करें बड़ाई, गागर छुअन न देई।

 वेश्या के पामन तर सोवें, यह देखो हिंदुआई।

 मुसलमान के पीर औलिया, मुरगा मुरगी खाई।।'

 आज का समाज खाइयों में नहीं ; हिमालय की ऊंचाइयों में निवास कर रहा है।हर वर्ग ,वर्ण,जाति के अपने ऊँचे- ऊँचे पहाड़ हैं, जिन पर इधर - उधर उगाए गए सुंदर कैक्टस के झाड़ हैं,कोई किसी से छोटा नहीं है। सब बड़े हैं। अपनी -अपनी तर्क-संहिता पर अड़े हैं। ऊँच -नीच ,छुआछूत,भेदभाव,असमानता - कबीर काल से भी ऊँची है।लेकिन हॉस्पिटल की उस टेबिल पर जहां उसे रक्त लेना है, जाति ,वर्ण भेद भुलाकर देवता हो जाता है आदमी।भोजन पानी किसी निम्न वर्ण का स्वीकार नहीं ,परंतु यहाँ कोई इनकार नहीं। बस जान! जान !!औऱ जान!!! और किसी से नहीं कोई पहचान।किसी भी तरह बचे जान।चाहे किसी का भी लहू भर दो , पर मरते हुए को जिंदा कर दो।ये भेद भाव, छोट बड़ाई बस चौके से चौकी तक ही है। वास्तव में समाज बहुत ऊँचाई पर आसीन हो चुका है। अब तक तो गधे को बाप बनाने में भी परहेज नहीं था,पर अब तो गधा ही नहीं , सुअर,श्वान या बिना स्नान शूद्र भी चलेगा।जरूरत जब आन पड़ी तो अपनी पवित्र आत्मा को भी छलेगा। मर ही गया तो अपने हाथ भी नहीं मल सकेगा।इसलिए पहले जान, फिर कोई औऱ सामान।सारी हेकड़ी चूर - चूर। समय की माँग है ,होना पड़ा मजबूर। अब नहीं कहता दूर -दूर।पता नहीं कहाँ हो गया परिजन सहित पेशेंट का अहं काफ़ूर। 

  याद आता है कभी संत कबीर ने सही कहा था। जो तब तो लगता था तमाचा ,पर आज समझ में आ रहा है वह था जगाने का बाजा।पर सच की आवाज सुनना ही कौन चाहता है। अपने पैमाने से दुनिया को नापता है।जो समझता है अपने को ऊँचे पहाड़ पर , वह वास्तव में बनाए बैठा है घर आड़ पर। कुएँ का मेढक जब कुएँ से बाहर आया तो उसे बाहर बड़ा - बड़ा दृश्य भी नज़र आया। बेचारा बहुत ही शरमाया।अपने आनन्द को स्वयं ही धक्का लगाया।सड़े हुए जल को पिया और पिलाया।कुल मिलाकर बहुत ही भरमाया।समय भी गँवाया। पर आँख जब खुली तो एक नया जगत ही हुआ नुमाया।जब तक पड़ा रहा दिल दिमाग पर भ्रम का साया , नए युग में समझदार बहुत पछताया।नासमझ कभी पछताते नहीं। क्योंकि अपने को छोड़ किसी को सही बताते नहीं। 

  मुझे लगता है कि आज भी एक कबीर चाहिए।जो अहंवादियों की आँखें खोले ही नहीं ,पुतलियाँ बाहर लाकर दिखला दे कि देख दुनिया कितनी बड़ी है। तेरी अंहवादिता आज भी इतनी कड़ी है,कि तू आँखें बंदकर दिन में भी अंधा है। तू निशाचरी उलूक है या बंदा है? यहाँ किसी का खून हरा है ,किसी का लाल है । किसी का काला है किसी का दहकता लावा है। वर्ण भी तो खून के अनुसार ही है,आहार का प्रभाव है ।तमस, सत्व और राजस का जैसा स्वभाव है,वैसे ही भर देता उसमें बदलते चाव है।कबीर यहाँ आकर भी क्या करें, या तो वे आएँ ही नहीं,या आकर बेमौत मरें।कबीर जैसों का जीना मुहाल है, आदमी की आदमियत पर लग गया सवाल है। जो आदमी आदमियत की बात करे ,वहीं उठने लगता बबाल है। सब जगह सियासत का कमाल है। जहाँ भी देखिए उसी का धमाल है।

        झूठों के साथ ही है जमाना। सच्चों का नहीं है कोई कहीं अपना।एक कबीर बेचारा इस युग के कवियों के बीच कबाड़ है।ये चमचों ,चापलूसों ,चुग़लों की चौपाल है।यहाँ कबीर क्या करेगा ,कविता ही निढाल है। कबीर एक साहस का नाम है। पर आज कवियों में वही तो नहीं है। बस जो कह दिया वही सही है।उसी का सम्मान है।उसके हाथ में लेखनी नहीं, व्हाट्सअप की कमान है।जिससे आप सबकी बड़ी अच्छी जान - पहचान है।इतने सबके बाद भी मुझे लगता है कि आज भी एक अदद कबीर चाहिए। 

 🪴शुभमस्तु ! 

 २५.०८.२०२२◆११.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


झर -झर पानी ⛈️ [ सजल ]

 288/2022

  

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समांत: अर।

पदांत :पानी।

मात्राभार:16.

मात्रा पतन :शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बरस  रहा  है झर - झर पानी।

बादल  लाते भर - भर पानी।।


ताल  - तलैया  भरे   लबालब,

खुशियाँ  देता घर - घर पानी।


मेघ  गरजते  चमके   बिजली,

गिरा  पनारे  धर  - धर  पानी।


स्वाति - बिंदु  की  टेक लगाए,

चातक पीता हर -  हर  पानी।


करे    दादुरी   का   आवाहन,

दादुर  करता  टर - टर  पानी।


धर कंधे  पर  कृषक  फावड़ा,

चला, न जाए  सर-सर पानी।


'शुभम्' सरसती  पावस रानी,

करे अवनि को तर -तर पानी।


🪴 शुभमस्तु !


२४.०७.२०२२◆ १०.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।


रविवार, 24 जुलाई 2022

गुरु गुरूर गुनवन्त चाहिए 🙊 [ गीतिका ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🚣🏻‍♀️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सोना         उनको          टंच   चाहिए।

ऊँचा     ही        हर       मंच  चाहिए।।


उदर      भरा     हो   फिर   भी   अपना,

अति      से     भी       अपरंच   चाहिए।


माने        नहीं        आम     अपने    को,

होना         ही           सरपंच    चाहिए।


अपराधों          का          बोझ    उठाएँ,

नहीं       कभी     पद      रंच  चाहिए।


रिश्वत           लें          रिश्वत    दे    छूटें,

गुरु         गुरूर         गुनवन्त   चाहिए।


रँगे        वसन       की     शान   दिखाए,

राजनीति          का         संत  चाहिए।


'शुभम्'       भाव       को     मूर्त   बनाए,

पृष्ठ             धरातल        संच   चाहिए।


*संच = स्याही।


🪴 शुभमस्तु !

२४.०७.२०२२◆४.००पतनम मार्तण्डस्य।


तेल लगाना सीख न पाए! 🚇 [ गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌟 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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तेल           लगाना     सीख     न   पाए।

हम         तो         बड़े - बड़े  पछताए।।


कला     न      सीखे        हम  मर्दन  की,

बुद्धू       लौट          गेह      को    आए।


कछुआ             बने        रेंगना     सीखा,

शशक      बने     हम      तेज   न     धाए।


पहन           बगबगे         धोती -  कुरता,

चमचे          बने        शेर      के    जाए।


चुम्बन        चरण     न      आया   हमको

हाथ      जोड़      हम       बड़े     अघाए।


भाभी    में       'जी'      लगा    एक   दिन,

भैया      जी      से      पिट    कर   आए।


'शुभम्'             नई       आचार  - संहिता,

सीख     रहे         अब       हम    शरमाए।


🪴शुभमस्तु!


२४.०७.२०२२◆१.४५

पतनम मार्तण्डस्य।


⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️⚜️

तेल लगाना बहुत जरूरी 🛰️ [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🍑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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तेल         लगाना       बहुत  जरूरी।

घटती      उससे     तन      की   दूरी।।


चिकनाई      से      गति     बढ़ती  है,

नहीं        समझना       ये   मजबूरी।


तेल           घटाता       घर्षण   भारी,

इच्छा         रहती         नहीं    अधूरी।


अवसर      मिले     तेल   मालिश  का,

करना       उर     की     चाहत    पूरी।


मर्दन        में     जो        भी  शरमाया,

चलती       उस        ग्रीवा    पर   छूरी।


मर्दक      पहनें       रेशम    तन    पर,

निंदक         धारें          फ़टी   फतूरी।


मेवा      -     मिश्री       मर्दक    चाभें,

दूर       रहें       वे         फाँकें    धूरी।


'शुभम्'       पात्र    मर्दन     का  खोजें,

मिले      ब्याज        सँग      पूरी   मूरी।


🪴 शुभमस्तु !


२४.०७.२०२२◆१.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

बोया बीज जो तुमने यहाँ 🍒 [ गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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खून  से  इतिहास  लिक्खा जा  रहा।

आदमी   ही   आदमी  को  खा  रहा।।


रंग  ने   ही  भंग    मानव    में किया,

रंग    काला   ही  न उसको भा  रहा।


आज  से  पिछला दिवस तो ठीक था,

अब भयंकर  कल  तुम्हारा आ   रहा।


धर्म , मज़हब   की   खुदी  हैं खाइयाँ,

एक  ही  सबका   सुपथ समझा  रहा।


एक   ही  नव द्वार   से   तव आगमन,

एक   माटी   में   मिला  हर जा  रहा।


एक   भी     आया   नहीं हँसता  हुआ,

रुदन  तव   माँ - बाप को हँसवा  रहा।


बंद   मुट्ठी   में   छिपी  थी भाग्य लिपि,

खोल  कर  तो  देख  ले क्या पा  रहा।


सफल जीने का  सभी को हक़  मिला,

दूसरे   को     देखकर   बिखरा  रहा।


'शुभम्'  बोया  बीज    जो तुमने   यहाँ,

फल   उसी   का  जिंदगी  में छा  रहा।


🪴शुभमस्तु !


२४.०७.२०२२◆१२.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

कबीर एक चाहिए! ⛳ [ गीतिका ]



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✍️शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम् '

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वीभत्स       जातिवाद      है।

विनाश    का    निनाद    है।।


कबीर         एक        चाहिए,

सु-चर्मभेद        गाद         है।


अछूत       शूल -  सा     चुभे,

पर रक्त     मय     स्वाद    है।


आचार          पक्षपात      के,

कहीं     न     इत्तिहाद       है।


पचे   न    सत्य    आज    भी,

सदोष         मन - मुराद    है।


पढ़े   -  लिखों  में    और  भी,

अनैक्य      का    प्रवाद     है।


गिरे    न    पंक     भूमि    से,

शिखान्त       शंखनाद      है।


आदमी   ,    आदमी        को,

लहूलुहान         दाद         है।


भेदभाव        यहाँ     'शुभम्',

मानवी          ईजाद         है।


🪴शुभमस्तु !


२४.०७.२०२२◆११.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


बदल रहा है आज आदमी 🌟 [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बदल       रहा       है    आज आदमी।

बना      हुआ       है     राज  आदमी।।


पड़ी       हुई      है      सबको  अपनी,

क्यों    परहित      में     खाज आदमी।


तिनका        नहीं      किसी  को   देता,

नोंच      रहा        बन    बाज  आदमी।


अपना       महल       सुरक्षित   करता,

तोड़      औऱ      की      छाज  आदमी।


मिले     किसी      को    भले   न  रोटी,

सिर      पर     चाहे      ताज  आदमी।


लगती        लाज       स्वेद   से   अपने,

खा          आवंटित       नाज  आदमी।


अपना           ही       अस्तित्व   बचाए,

गिरा       और     पर      गाज  आदमी।


चुभन         नहीं       शूलों    की   जाने,

भोग     रहा       सुख -  साज आदमी।


'शुभम्'         सुर्खियों      में   छपता   है,

आता     क्या       पर     काज  आदमी?


🪴शुभमस्तु !


२४.०७.२०२२◆७.३०आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

बने रहें गुबरैला ⚜️⚜️ [ अतुकांतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जो हो रहा है

वही सही है,

कोई भी विरोध

उचित नहीं है,

पकड़े रहें

भेड़ की पूँछ,

अन्यथा कट जाएगी

तुम्हारी मूँछ,

बस किए हुए

अपने नयन बंद,

करते रहें अनुगमन

स्वछंद !

सूँघते रहें

गुबरैला बन

गोबर की गंध।


  मत उड़ाना उपहास

 कभी गलत परम्पराओं का,

ठहरा दिए जाओगे

विरोधी अवांछित,

इसलिए हिलना भी नहीं

अपने मार्ग से किंचित,

कर दिए जाओगे

समाज से वंचित,

अरे मीत! 

तुम्हें सोचने की भी

आवश्यकता ही क्या है?

जो हो रहा है

उसमें तुम्हारी 

हानि भी क्या है ?

बस पूँछ को

मत छोड़ना,

भूलकर भी 

उचित की ओर

कदम मत मोड़ना।


जीने नहीं देगा तुम्हें

ये समाज ,

विचारों से

 बने रहें बाँझ,

पीछा नहीं छोड़ेगी

तुम्हारा रूढ़िवादी खाज,

जैसे कल थे

वैसे ही बने रहो आज,

मस्तिष्क पर 

बल देने की

कोई आवश्यकता

नहीं है,

जो हो रहा है

वही सही है।


समाज के नाम पर

धर्म के नाम पर

गुबरैला बनने में ही

कुशल है तुम्हारी,

नहीं तो लग जाएगी

अफलातून बनने की

आधुनिक बीमारी,

जिसका कहीं कोई

चिकित्सक नहीं है,

इसलिए भेड़ 

बने रहना ही सही है।


यहाँ भेड़, गर्दभ 

और बैलों का 

बड़ा सम्मान है,

ऐसों के ही गले में

पुष्पों का हार

औऱ विराजने को

'पुष्पक' विमान है!

तब ही तुम्हारा

समाज पर

होना बड़ा अहसान है।


कहीं कोई नया विचार

लाना निर्रथक है,

'शुभम्' भेड़ाचार ही 

उचित है,

क्योंकि यह 

तुम्हारी विरासत है!

इसके विपरीत

साँसों में साँसत है।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०७.२०२२◆३.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

इठलाती बलखाती सरिता 🌊 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

⛵ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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इठलाती   बलखाती   सरिता,

जाती   है     नित    मदमाती।

हिमगिरि के घर से निकली है,

सिंधु -  सेज   पर रम जाती।।


अनथक चली जा रही अविरत

आती    हैं    नित     बाधाएँ।

अपगा  होकर  चली जा रही,

कितने   भी   संकट   आएँ।।

लक्ष्य एक ही पिया मिलन है,

सबकी  क्षुधा   बुझा   पाती।।

इठलाती   बलखाती  सरिता,

जाती   है    नित   मदमाती।।


पशु, पक्षी, मानव या फसलें,

अभिसिंचन      से      हर्षाते।

साधु, संत, जन को नहलाती,

तटिनी -  खेल   हमें   भाते।।

हरियाली   फैली   खेतों   में,

कांति अधर   में  भर  लाती।

इठलाती  बलखाती   सरिता,

जाती   है   नित    मदमाती।।


गंगा , यमुना ,सरयू   कितनी,

पावन   जल   की   सरिताएँ। 

भारत की जीवन  -   रेखा हैं,

जीव,  जंतु, नर   की   माएँ।।

मीन  करे   क्रीड़ाएँ   सरि में,

आँचल   में    ले    मुस्काती।

इठलाती  बलखाती   सरिता,

जाती   है   नित    मदमाती।।


करे प्रतीक्षा  खोल   हृदय को,

सागर,     आएँ       सरिताएँ।

स्वागत   करने   को आतुर है,

बाँहों     में    भर   अपनाएँ।।

लहरों के   मिस  बुला रहा है,

लगतीं   रवि -  किरणें  ताती।

इठलाती   बलखाती   सरिता,

जाती   है    नित   मदमाती।।


लगता  सागर कभी  क्रोध  में,

तट से   विचि    टकराती   है।

घोंघे , सीप   पटकती   बाहर,

लौटें      शांत   रिझाती    है।।

'शुभम्' सभी  का मान बढ़ाता, 

सरिता   अंग    समा    जाती।

इठलाती   बलखाती   सरिता,

जाती   है   नित    मदमाती।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०७.२०२२◆११.००

आरोहणम् मार्तण्डस्य।

पावस सजल बहार 🌈 [ दोहा ]

 

[पावस,पपीहा,मेघ,हरियाली,घटा]

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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         🪦 सब में एक 🪦

पावस पावन प्रेम की,प्रिय ऋतु का उपहार।

धरती, नारी  के   लिए, बहती प्रेमिल  धार।।

कुहू- कुहू  कोकिल  करे,सारन स्वाती  नीर।

पावस में  गुंजारते,तनिक नहीं   उर  धीर।।


स्वाति -बिंदु का त्याग कर, पिए न गंगा नीर।

पपीहा प्रण के हेतु ही,सहे हृदय   में  पीर।।

पुष्ट पपीहा भक्ति का, ख्यात जगत में नाम।

मानव खग से सीख ले,होगा यश अभिराम।।


मेघ- गर्जना  जब  सुनी, हर्षित  नाचे  मोर।

मेहो - मेहो   गा रहे,कानों  को प्रिय    शोर।।

विरहिनअति व्याकुल हुई, सुनी मेघ की रोर।

तड़ित चमकती शून्य में,हुई नहीं थी  भोर।।


रिमझिम बरसे वारिधर, हरियाली चहुँ ओर

साड़ी  धानी   धारती, धरती मौन   सुभोर।।

हरियाली-तीजें मना, रहीं भगिनि माँ नारि।

अमराई  में  झूलतीं,  पावस की   अनुहारि।।


घटा साँवली  देखकर, बगुले  बना  कतार।

नभ में  उड़ते  जा रहे,कर संवाद   विहार।।

घटा देख हलवाह के,मन में अति उल्लास।

युगल नयन हर्षित हुए,सुषमा का गृहवास।।


        🪦 एक में सब 🪦


मेघ -घटा नभ  में  उठी,

                        पावस  का   उपहार।

हरियाली    छाई    नई,

                         पपिहा करे   पुकार।।


🪴शुभमस्तु !


१९.०७.२०२२◆११.००

पतनम मार्तण्डस्य।

सिर पर है छत भी नहीं ☘️ [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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दो  बालक  सिकुड़े  हुए, ढँके टाट से शीश।

बैठे  भूखे अन्न से,   कृपा   करें   जगदीश।।


सिर पर है छत भी नहीं, तन पर जर्जर वेश।

उदासीन मन देखते, उलझ रहे सिर केश।।


निर्धनता अभिशाप है, दे न किसी को ईश।

मिलें उदर को रोटियाँ,झुके न नर का शीश।


मर  जाना  स्वीकार  है, पर न माँगते  भीख।

स्वाभिमान से जी सकें,यही मिली है सीख।।


बोरी या  तिरपाल  से,ढँकता निर्धन  शीश।

फैलाए  जाते  नहीं,हाथ कभी जगदीश।।


दीन- हीन बालक युगल, बैठे चिंतित मीत।

इनको भोजन चाहिए,हार न इनकी जीत।।


दे  ईश्वर   यदि  जन्म तो, दे रोटी   भरपेट।

तन ढँकने को वस्त्र भी,बनें न नर आखेट।।


नियति नहीं जिनकी सही,उन्हें न आए चैन।

रहने को  घर भी नहीं, कटे न दिन या  रैन।।


योनि मिली नर देह की,पशुवत जीवन चक्र।

राह   नहीं  सीधी कहीं,जीवन - रेखा   वक्र।।


मात- पिता  रहते दुखी,पाकर वह  संतान।

जिनके पाने से  नहीं,  मिलती शांति महान।।


कर्म - दंड  नर भोगते, निर्धन बनते  लोग।

घेरे   ही  उनको   रहें, सदा आपदा   रोग।।


 🪴शुभमस्तु!

१९.०७.२०२२◆ १.५५पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 18 जुलाई 2022

कबीर का मानवीय चिंतन 🪷 [ लेख ]


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 ✍️ लेखक © 

 🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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 भक्तिकालीन निर्गुण काव्य धारा के संत कवियों में कबीर का शीर्ष स्थान है।उनके विराट व्यक्तित्व में युग- पुरुष के दर्शन होते हैं।कबीर की काव्य - वाणी मानव, मानवता और मानव- समाज के कल्याण के लिए निर्भीकता की उद्गाता है। कबीर के काव्यमय संदेशों का मुख्य मंतव्य मानव कल्याण ही रहा है। भक्त कवियों ने ईश्वर के पश्चात गुरु को सम्मान प्रदान किया है।कबीर ने तो गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर प्रतिष्ठित किया है:

 'गुरु गोविंद दोऊ खड़े,काके लागूँ पाँय।

 बलिहारी गुरु आपने,गोविंद दियो बताय।।'

 भक्तिकाल में मुस्लिम शासकों ने अपने राज्य और मजहब का विस्तार करने के लिए हिंदू जनता पर अनेक अत्याचार किए।इसीलिए हिन्दू जन मानस की धार्मिक भावना का प्रवाह परमात्मा की भक्ति की ओर हो गया। कबीर ने जनता की आम बोलचाल की भाषा को अपनी अभिव्यक्ति का आधार बनाया ,ताकि उनके संदेश को ग्रहण करने में उसे कोई असुविधा न हो।यही कारण है कि कबीर की वाणी सहज रूप में जन -जन को प्रभावित करने वाली सिद्ध हुई।

 कबीर ने बिना अक्षर ज्ञान प्राप्त किए हुए ही साधु - संतों की संगति करके ज्ञान को अपने व्यापक रूप में प्राप्त किया। जिसके माध्यम से वह जनता तक अपनी सुधारात्मक बात पहुंचाने में सफल रहे।उनकी भाषा को इसीलिए सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी कहा जाता है। कबीर का चिंतन सदैव मानव हितैषी रहा है।उनका सुधारात्मक प्रयास समाज में व्याप्त विविध विसंगतियों को मिटाने का ही रहा है।हिंदू मुसलमानों दोनों को उनके द्वारा डाँटा फटकारा गया है:--

 हिंदू अपनी करें बड़ाई गागर छुअन न देई। 

 वेश्या के पामन तर सोवें ये देखो हिंदुआई।। 

 मुसलमान के पीर औलिया मुर्गा मुर्गी खाई।

 एक अन्य स्थान पर उन्होंने मुसलमानों को उनकी जोर- जोर से अजान लगाने पर आपत्ति प्रकट करते हुए प्रताड़ित किया है :

 'कांकर पाथर जोरि के, मसजिद लई चुनाय। 

 ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय।।' 

 कबीर ने साकार ईश्वर की पूजा को महत्त्व नहीं दिया। वरन कण कण में रमे हुए परमात्मा के ध्यान को ही सच्ची आराधना स्वीकार किया है:---

 'पाथर पूजें हरि मिलें,तो मैं लूँ पूजि पहार।

 या ते तो चाकी भली, पिसा खाय संसार।।'

 संसार के प्रति मानवीय आसक्ति के विरोध में कबीर वाणी का उदघोष दृष्टव्य है: 

 'हाड़ जले ज्यूँ लाकड़ी, केस जले ज्यूँ घास। 

 सब तन जलता देख करि,भया कबीर उदास।।' 

 संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि कबीर अपने युग के सच्चे मानवीय चिंतक थे। उनका एक -एक शब्द मानव कल्याण के लिए समर्पित है। 

 🪴 शुभमस्तु !

 १८.०७.२०२२◆१०.०० आरोहणम् मार्तण्डस्य। 

 

सावनी घन जब गरजते 🌈 [ सजल ]

 

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समांत: इयाँ।

पदांत-अपदान्त।

मात्रा भार:26.

मात्रा पतन:शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बूँद  बरसें   बादलों  से भीगती  हैं  छोरियाँ।

झूलतीं  अमराइयों   में  डाल झूला गोरियाँ।।


सावनी वारिद गरजते नाचते शिखि बाग में,

मुग्ध  होकर  देखती हैं नाच प्यारी मोरियाँ।


रोकती  हैं भीगने से जननियाँ अपनी  सुता,

भेद उनका खोलती हैं भीगती वे    चोलियाँ।


हैं लबालब सरित पोखर छत पनारे जोश में,

गूँजती हैं मेढकों की रात भर प्रिय बोलियाँ।


हरहराते  वेग   से  झरने  बहे जाते   कहाँ,

सिंधु धर के मौन सोया सुन रहा हो लोरियाँ।


कृषक कंधे पर रखे हल खेत अपने जा रहे,

भीग जाएँ वे नहीं सिर ओढ़ ली हैं बोरियाँ।


निर्वसन बालक नहाते दौड़कर बरसात  में,

नाचता है मन 'शुभम्'का तज नहाएँ पौरियाँ।


🪴शुभमस्तु !


१८.०७.२०२२◆६.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


रविवार, 17 जुलाई 2022

हिंदू ही हिंदू का काँटा! 🔱 [ गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🔱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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गाने      का         ये       गीत   नहीं    है।

जब   तक    उर     में    तीत   नहीं   है।।


रटते      नित्य         सनातन   मुख   से,

जन - जन    से      जन - प्रीत नहीं   है।


ये      बनियां ,      ये    ठाकुर,   बाँभन,

उचित   भेद         की     रीत   नहीं   है।


हिंदू      ही         हिंदू        का    काँटा,

होनी           ऐसे       जीत     नहीं   है।


छोट   -     बड़ाई      छुआछूत     का,

गाना         अब         संगीत   नहीं   है।


फिर    गुलाम       होने   के  रँग -  ढँग,

हिंदू     के        उर      भीत    नहीं   है।


देश          निरंतर        घटता    जाए,

तुमको       लेश        प्रतीत    नहीं   है।


होगी         दास          पाँचवीं     पीढ़ी,

तेरी       शुभदा         नीत       नहीं  है।


'शुभम्'    न     तब     तुम  जिंदा  होंगे,

माटी       अभी          पलीत  नहीं  है।


🪴 शुभमस्तु !


१७.०७.२०२२◆७.००पतनम मार्तण्डस्य।


छोड़े बिंदी,तिलक ,जनेऊ 🔴 [ गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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भूल     गया      निज     धर्म पताका।

बनता     विधि      का    मर्म सनाका।।


छोड़े         बिंदी,        तिलक,  जनेऊ,

त्याग     दिया     सत     कर्म  अवाका।


हिंदी           हिंदुस्तान       कहाँ      है,

छिपी    हुई     है      शर्म     सु  - राका।


माँ      से         भी     ऊपर     है  मौसी,

उजला         चर्म         धारता   काका।


लघुकाटों            में        लगा   निरंतर ,

रुचता     बिंदु    न    नर्म    सुधा   का।


नारी          वसन          उतार  नाचती,

जिला    रहा       है       वर्म    हवा का।


'शुभम्'      देश        का    त्राता   ईश्वर,

शेष     नहीं    है       कर्म   दवा    का।


सनाका=ब्रह्मा के एक पुत्र का नाम।

अवाका =मौन।

सु-राका =सुंदर चंद्रमा।

वर्म= कवच।


🪴 शुभमस्तु !


१७.०७.२०२२◆६.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।


बातों के तू खा न बतासे 🍎 [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🍎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जैसे         शुभ        आचार   हमारे।

वैसे     ही          सु -  विचार  सँवारे।।


कुविचारी          बन     जाता  दुर्जन,

मिलते         सदा         प्रहार  करारे।


पर   -  निंदक       नीचा      ही   देखे,

नहीं          उसे         उपहार   उबारे।


जैसा        बोए        बीज    खेत  में,

वैसा                 अन्नाहार      उभारे।


खेत      जोत - बो       रही  गिलहरी,

कौवे     का        नद - नार    बहा  रे।


श्रम     के      बिना      चाहता  रोटी,

दिन   में      दिखें       हजार सितारे।


'शुभम्'     बात   के   खा   न बतासे,

कर     ले       नर      उपकार  प्यारे।


🪴 शुभमस्तु !


१७.०७.२०२२◆५.३० पतनम मार्तण्डस्य।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...