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शुक्रवार, 24 जनवरी 2025

ज्ञात से अज्ञात मैं [संस्मरण ]

 038/2025

 

 ©लेखक

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 मेरी मात्र तिहत्तर वर्ष की वर्तमान आयु और कुल बासठ वर्षों की अनवरत साहित्य साधना में गंगा में बहुत सारा गंगाजल बह गया;किन्तु उस सबका परिणाम मेरे समक्ष होने के बावजूद मैं उसका सही- सही आकलन आज तक नहीं कर पाया। अतीत के इन बासठ वर्षों में शोध साहित्य,कहानियाँ, गद्यात्मक व्यंग्य सहित्य,काव्यात्मक व्यंग्य साहित्य, महाकाव्य, खंडकाव्य,अतुकांत साहित्य,ग़ज़ल गीतिका काव्य,गीत,नवगीत साहित्य,बाल काव्य,उपन्यास, कुंडलिया साहित्य,दोहा साहित्य,भक्ति साहित्य,एकांकी,लघुकथाएं आदि विविधतापूर्ण का सृजन हुआ है;किंतु 31 कृतियों के प्रकाशन के बावजूद अभी तक यह ज्ञात ही नहीं कर पाया कि इनकी कितनी संख्या है।जैसे गंगोत्री धाम को नहीं पता कि उसने कितना गंगाजल इस धराधाम और सागर अबाध को बहा दिया।

  यों तो 1968 में हाई स्कूल में आते -आते मेरे लेखों,कविताओं,व्यंग्यों और कतिपय शोध पत्रों का प्रकाशन कॉलेज पत्रिकाओं, राष्ट्रीय मासिक पत्रों और दैनिक समाचार पत्रों में प्रारम्भ हो गया था; किंतु मेरी साहित्यिक यात्रा की जिस प्रथम काव्य कृति का प्रकाशन वर्ष 1992 में हुआ वह थी दोहा चौपाई शैली में निबद्ध हास्य व्यंग्य कृति 'श्रीलोकचरितमानस'। 1992 में मेरी पूजनीया माँ का बिना किसी बीमारी के आकस्मिक निधन होने पर मुझे बहुत सदमा लगा और राजकीय सेवा में घर से 350 किलोमीटर दूर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बीसलपुर (पीलीभीत) में होने के कारण मैं उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सका। तब उसी शोक अवधि में जो खंडकाव्य कृति प्रकाश में आई ,वह 'बोलते आँसू' के रूप में 1993 में प्रकाशित हुई ;जिसे शृंगार छंद में पूर्ण किया गया। यह एक खंडकाव्य था। यह कृति मात्र तीन दिन में पूर्णता को प्राप्त हुई।इसके बाद कृतियों के प्रकाशन की शृंखला ही प्रारंभ हुई जो निरन्तर प्रवहमान है। 

 अपने अद्यतन प्रकाशित साहित्य को मैंने चौदह भागों में विभाजित किया है।इसमें पहला है 'व्यंग्य साहित्य' ;जो अपने दो रूपों में विभाजित किया जाता है।पहले भाग में व्यंग्यात्मक काव्य सृजन है :जिसके अंतर्गत 1. श्रीलोकचरितमानस (1992) 2.सारी तो सारी गई (2009) 3.'शुभम्' कहें जोगीरा(2024) हैं। द्वितीय भाग में व्यंग्यात्मक गद्य सृजन है।जिसके अंतर्गत क्रमशः चार कृतियाँ 1.'शुभम्' व्यंग्य वातायन(2020) 2.विधाता की चिंता (2022) 3.'शुभम्' व्यंग्य वाग्मिता (2023) 4.'शुभम्' व्यंग्योत्सव (2024) प्रमुख व्यंग्य कृतियाँ हैं।

    मेरे प्रकाशित साहित्य का द्वितीय रूप है 'महाकाव्य' ;जो वर्ष 2018 में तपस्वी बुद्ध के रूप में वैविध्य पूर्ण छंदानुबद्ध हुआ।इसकी रचना उसी समय हो गई थी जब 1971 में मैं ग्यारहवीं कक्षा का विद्यार्थी था। सहित्य के तृतीय रूप के अंतर्गत 'खंडकाव्य' की तीन कृतियाँ प्रकाश में आईं: 1.बोलते आँसू (1993) 2.ताजमहल (2008) 3.फिर बहे आँसू (2018) ये तीनों कृतियाँ क्रमशः तीन, सात और तीन दिन में लिखी गई रचनाएँ हैं। 

  'ग़ज़ल और गीतिका संग्रह' प्रकाशित कृतित्व का चतुर्थ रूप है।जिसके अंतर्गत 1.स्वाभायनी (2000) 2.रसराज (2011) 3.'शुभम्' ग़ज़ल गीतिकायन (2023). हैं। प्रकाशित कृतियों के पंचम रूप के अंतर्गत मेरे 'गीत संग्रह' 1.'शुभम्' गीत गंगा और 2.'शुभम्' राम ही साँचा आगणित किए जाते हैं। सहित्य के षष्ठ रूप 'बाल साहित्य',जिसके अंतर्गत बालगीत एवं बाल कविताएँ हैं ,तीन पुस्तकें प्रकाश में आई हैं: 1.आओ आलू आलू खेलें(2020) 2. 'शुभम्' बालसुमन स्तवक(2023) 3. 'शुभम्' बालगीत वाटिका(2024) . 'शोध साहित्य' प्रकाशित साहित्य का सप्तम रूप है। जिसमें मेरा शोध प्रबंध 1.नागार्जुन के उपन्यासों में आंचलिक तत्त्व(2008)। और 2.'शुभम्' शोध साहित्य (शोध पत्र संग्रह) (2024) सम्मिलित किए जाते हैं।

  साहित्य के अष्टम रूप के अंतर्गत 'उपन्यास' ग़ज़ल (2008) को समाहित किया गया है। मेरे साहित्य का नवम रूप 'कुंडलिया साहित्य' है जिसके अंतर्गत 'शुभम्' कुण्डलियावली (2022)प्रकाशित हुई। दशम रूप 'दोहा सृजन' का जो 1.अक्षर अक्षर ब्रह्म है (2023) 2.'शुभम्' दोहा दीप्ति (2023) के रूप में सामने आया है। 'भक्ति साहित्य' मेरे प्रकाशित कृतित्व का एकादश रूप है। जिसके अंतर्गत 1.'शुभम्' स्तवन मंजरी(2022) 2.'शुभम्'भक्ति रसांजन (2023) प्रमुख हैं। यों तो महाकाव्य 'तपस्वी बुद्ध 'और 'शुभम्' राम ही साँचा कृतियों को भी इसके अन्तर्गत समाहित किया जा सकता है। द्वादश रूपान्तर्गत 'चौपाई संग्रह' की पुस्तक 'शुभम्' सृजन वल्लरी (2024) है। सहित्य के त्रयोदश रूप में नाटक, कहानियां और कतिपय प्रारम्भिक व्यंग्य रचनाएँ आती हैं। जो 'अहल्या पत्थर की नहीं थी' (2024) के रूप में प्रकाशित हुई है।इस कृति में दो एकांकी ,कुछ कहानियाँ और व्यंग्य आलेख प्रत्यक्ष हुए हैं।ये वे रचनाएँ हैं जो 1980 से पूर्व अधिकांशतः देश की स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। 'अतुकांत काव्य सृजन' का चतुर्दश रूप 1.गणतंत्र की तस्वीर का दूसरा रुख(2024) और 2.'शुभम्' शब्दरस रंजनिका (2025) के रूप में सामने आया है।

  इस प्रकार 1992 से 2025 के प्रारंभिक मास तक 31 साहित्यिक सृजन की शुभम् शृंखला आपके समक्ष प्रस्तुत है। जिनमें गद्य और पद्य के अंतर्गत विविध छंदों और अछंदों की साहित्य लहरियाँ प्रवहमान हुई हैं। फिर वही बात दुहराता हुआ यही कहूँगा कि अब तक कितनी रचनाएँ प्रकाशित और अप्रकाशित हैं; उनका कोई संख्यांक उपलब्ध नहीं है। बस गंगा बह रही है और अपने गंतव्य की ओर निरंतर गतिमान है। 

 सर्वे    भवंतु    सुखिनः    सर्वे    संतु   निरामयाः। 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःखभाक् भवेत।।

 शुभमस्तु ! 

24.01.2024● 10.30 आ०मा०

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रविवार, 6 मार्च 2022

नव-सभ्यता के रखवाले ! [ यात्रा- संस्मरण ]

 

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 ✍️ संस्मरण ©

 💃🏻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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     कल 03 मार्च गुरुवार था। मैं लखनऊ से नई दिल्ली जाने वाली गोमती एक्सप्रेस में सपत्नीक यात्रा कर रहा था। हमें नई दिल्ली में अपने बेटे के कमरे पर जाना था।शिकोहाबाद के बाद किसी बड़े स्टेशन से स्वतंत्र केशांगिनी, टाइट जींस, ढीली कमीज और हाई हील में सुसज्जित दो सुंदरी गोरी-चिट्टी सुस्फूर्त बालाएँ (संभवतः बहनें) ट्रेन की उसी बोगी में सवार हुईं और मेरे सामने की दो बर्थ पर आसीन हो गईं।


      इस ट्रेन में सभी सीटें केवल बैठने के लिए आरक्षित की जाती हैं।सोने या टाँगें पसार कर तीन की सीट को एक के द्वारा हथियाने की कोई 'सु -व्यवस्था ' यहाँ नहीं है। लेकिन ये भारत देश है। स्वतंत्र भारत। कुछ भी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र भारत और हम लोग। किंतु इसके बावजूद यहाँ व्यवस्था बनाने वालों की कोई कमी नहीं है।जहाँ चाह हो वहाँ राह निकाल ही लेते हैं लोग। 

       

 मैं खिड़की वाली सीट पर बैठा हुआ था।अचानक क्या देखता हूँ कि आई हुईं दोनों बालाएँ जिनकी आयु लगभग अट्ठाईस तीस वर्ष के आसपास होगी, प्रत्येक सीट के सामने मजबूत चादर की लगे हुए मेजनुमा स्टैंड पर अपनी टाँगें फैलाये हुए बैठी हैं। एक बार उन्होंने यह भी प्रयास करके देखा कि अपनी बर्थ को और पीछे की ओर फैला लिया जाए ,ताकि वे आराम से अपनी टाँगें फैलाकर पसर सकें, किंतु एक बार यह देखकर कि पीछे भी लोग बैठे हुए हैं ;कोई आपत्ति कर सकता है; एक बार ग्रीवा मोड़कर देखने के बाद झेंप कर अपना निर्णय बदल लिया। अब वे निश्चिंत होकर उसी मुद्रा में पसर कर ऊँघने लगीं। 

     

 देखते ही मुझे बहुत खटका।लेकिन चाहते हुए भी मैंने उन्हें रोका - टोका नहीं। क्योंकि यदि ऐसे उच्च शिक्षित सुंदर गोरे-चिट्टे देह धारी मानवों को यह स्वतः संज्ञान नहीं हैं कि ये सुविधा रेलवे विभाग ने इसलिए नहीं दी ,कि आप उन पर पसर कर जाएँ ! बल्कि इसलिए दी है कि आप उस रखकर प्रात राश कर सकें अथवा भोजन कर लें। ऐसे पढ़े-लिखे 'अति सभ्यों ' को समझाया भी कैसे जा सकता है। कहीं ऐसा न हो कि आ बैल मुझे मार। उन्हें इसलिए लगाया गया है कि आवश्यकता न होने पर उसे मोड़कर सीधे कर दें ,जिससे किसी को लघुशंका निवारणार्थ ,स्टेशन पर उतरने , नई सवारी के आने पर बैठने आदि के लिए कोई असुविधा न हो। जिस काम का अंजाम उनके द्वारा दिया जा रहा है ;उस काम के लिए तो कदापि नहीं बनाई गईं। 

  

         हम अपनी सभ्यता का कितना ही गुणगान करें किंतु अभी भी हमें ये सहूर नहीं आया कि शौचालय में कैसे बैठा जाता है।यह हमारे देश के चरित्र की ही पहचान है कि शौचालय में मग्गे को भी जंजीर से जकड़ कर रखना पड़ता है। दर्पण,बल्ब ,ट्यूब लाइट्स औऱ पंखों को कटघरे में बाँधकर रखना पड़ता है । ऐसे चरित्र प्रधान देश में यदि लोग भोजन की मेज पर पसर कर जाएँ, तो आश्चर्य क्या ? संस्कार ही ऐसा है! कभी -कभी तो ये सोचना पड़ता है कि यहाँ जिन्हें गाँव का गँवार कहते हैं औऱ अति से उच्च शिक्षितों में कोई अंतर नहीं है।यहाँ सारे धान बाईस पंसेरी ही तोले जाने को बाध्य हैं।

          सुलभ सुविधाओं के दुरुपयोग की इस सभ्यता में सहज सुधार आने की संभावना निकट भविष्य में नहीं हैं, जहाँ दूसरों को सीख देने वाला मानव स्वेच्छाचारिता का गुलाम है। ऐसी सभ्यता के वाहक जन का कानून भी कुछ बना -बिगाड़ नहीं पाती।क्या हम इसी सभ्यता के गौरव के गीत गाते हुए अघाते नहीं। कहावत है कि कुत्ता भी बैठता है तो अपनी पूँछ से झाड़कर बैठता है।पर ये आज का अति प्रबुद्ध वर्ग! इसे कोई सही रास्ते पर नहीं ला सकता।क्या ऐसे 'अति- सभ्यों' के लिए पुलिस व्यवस्था करना आवश्यक है? यह एक विचारणीय प्रश्न है! नियम,क़ानून की धज्जियाँ उड़ाना ही इनके गौरव और मान -सम्मान का द्योतक है।क्या हम नैतिकता विहीन भारत की ओर नहीं जा रहे हैं! हमारी नई पीढ़ी के लिए चुल्लू भर पानी में डूब मरने की बात है। देश की सभ्यता पर जोरदार आघात है।

 🪴शुभमस्तु !


 ०४.०३.२०२२◆११.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।


रविवार, 25 अप्रैल 2021

मेरी शीतलाखेत यात्रा 🏔️ (भाग - 3) [ संस्मरण ]

 

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 ✍️ लेखक ©

 🏔️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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             हम 51 प्रोफ़ेसर्स के 'रोबर स्काउट लीडर' के प्राधिक्षण की समयावधि आधी से अधिक हो चुकी थी। तभी कुछ साथियों के द्वारा एक नई जानकारी मिली कि प्रशिक्षण -स्थल से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्याही देवी (काली माई) का एक प्रसिद्ध मंदिर है।यह मंदिर बहुत ऊँचाई पर चढ़ने के बाद है।यदि समय रहते वहाँ स्याही देवी के दर्शन कर लिए जाएँ तो उचित रहेगा। इसके लिए यदि प्रशिक्षकों से अनुमति माँगी जायेगी ,तो वह मिलने वाली नहीं है।इसलिए हम पाँच -छः साथियों ने वहाँ बिना अनुमति लिए ही अगले दिन जाने की योजना को गोपनीय रूप से तैयार किया।

              अगले ही दिन सुबह से ही बिना किसी को सूचित किए हुए ही स्याही देवी दर्शन की पैदल यात्रा के लिए निकल पड़े। पहाड़ी मार्गों पर सहायक के रूप में अपने -अपने हाथ में एक -एक लाठी ले ली औऱ चल पड़े।सभी साथियों में एक साथी पर्वतीय क्षेत्र के थे ,जिन्हें रास्ते आदि की पूरी जानकारी भी थी। सम्भव है कि वह पहले कभी स्याही देवी के दर्शन कर चुके भी हों। 

            प्रक्षिक्षण -स्थल से एकाध किलोमीटर चलने के बाद मंदिर की ओर चढ़ाई का मार्ग शुरू होता था।लाठियों को हाथ में थामे हुए हम सभी तेज -तेज कदमों से सीढ़ी नुमा रास्तों पर चढ़ने लगे। जल्दी जाने की यह वजह भी थी कि कक्षा शुरू होने तक वापस आ जाएँ ।चढ़ने में पहले तो बहुत जोश रहा ,किन्तु शीघ्र ही हमारा जोश ठंडा पड़ने लगा। हममें से एक साथी ,जो पर्वतीय क्षेत्र के थे , वह तो बिना लाठी की मदद के बिना थके आगे- आगे दौड़ते से चले जा रहे थे। हम अन्य सभी लोगों की साँस फूलने लगी। कभी कोई थोड़ा रुक जाता , फिर हाँफते हुए चढ़ने लगता। 

             अंततः लगभग एक -डेढ़ घण्टे की कड़ी मसक्कत के बाद हम सभी अपने गंतव्य स्थल स्याही -देवी मंदिर पर पहुँच चुके थे। वहाँ का मनोरम प्राकृतिक दृश्य देखते ही हमारी सारी थकावट दूर हो चुकी थी। उस बड़ी -सी पहाड़ी पर समतल स्थान पर एक मध्यम आकार का मंदिर सुशोभित हो रहा था। मंदिर के बाहर स्थित एक विशाल पीपल के वृक्ष पर हजारों पीतल के छोटे -बड़े घण्टे लटके हुए थे औऱ हजारों की संख्या में झंडे-झंडियाँ वहाँ के वातावरण को धार्मिक बना रही थीं।

             मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर ही एक विशेष प्रकार का पक्का कुंड बना हुआ था।जिस पर कुछ रक्त भी पड़ा हुआ था, जो उस समय सूखा हुआ था औऱ लगभग काला -सा हो चुका था।पता करने पर बताया गया कि यहाँ पर कभी -कभी बकरे की बलि दी जाती है। मंदिर के बाहर का वातावरण सुरम्य हरियाली से भरा हुआ था। मंदिर के नीचे की ओर सेव के बगीचे थे ,जिन पर सेव लगे हुए थे,जो कच्चे होने के कारण हरे दिखाई दे रहे थे। वहाँ के पुजारी ने यह भी बताया कि यहाँ पर रात में कभी- कभी देवी माँ के वाहन शेर महाराज भी दर्शन देते हैं।

            इसी प्रकार की बहुत सारी जानकारी करने के बाद अब स्याही देवी माँ के दर्शन करने का सुअवसर आ गया था। मंदिर के लगभग ढाई फीट चौड़े औऱ साढ़े तीन फीट ऊँचे गेट के अंदर एक पतली- सी गुफानुमा गैलरी में लगभग 20 -25 फीट आगे बढ़ने के बाद माँ की पवित्र प्रतिमा के दर्शन किए। चरण -स्पर्श के बाद साथ में लाए हुए कैमरे से माँ के कुछ फोटो भी खींचे गए।लगभग आधा घण्टे मंदिर परिसर में रहने के बाद अपने केंद्र पर लौटने की तैयारी कर दी गई। 

           पर्वतीय चौड़ी सीढ़ीनुमा पगडंडियों पर आने में जितना श्रम करना पड़ा ,उतना श्रम लौटते समय नहीं हुआ और हम सटासट सीढियां उतरते हुए केंद्र पर डरते -डरते जा पहुँचे। मन में यही भय था कि जाते ही डाँट पड़ेगी। देखा पूर्ववत कक्षा पूर्ववत चल रही थी । अंदर प्रवेश करने की अनुमति प्राप्त की और चुपचाप जाकर यथास्थान बैठ गए। कोई डाँट नहीं पड़ी। जब हम वहाँ से चले गए होंगे ,तो अन्य साथियों ने बता दिया होगा। 


             इस प्रकार प्राशिक्षण अवधि में नियमोल्लंघन करते हुए माँ स्याही देवी के दर्शन किए। 10 जून को प्रशिक्षण पूर्ण करके अपने प्रमाण पत्र प्राप्त कर सभी साथी अपने -अपने घर के लिए यथासमय प्रस्थान कर गए।निश्चय ही हम सबके लिए यह प्रशिक्षण एक रोमांचक औसाहसिक यात्रा से कम महत्त्व का नहीं था। आज भी उस प्रशिक्षण की सुनहरी स्मृतियाँ मन के किसी कोने में सुरक्षित हैं। 


माँ स्याही देवी सबका कल्याण करें।


 🪴 शुभमस्तु ! 


 २५.०४.२०२१ ◆६.४५ पतनम मार्तण्डस्य।


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मेरी शीतलाखेत यात्रा 🏔️ (भाग-2) [ संस्मरण ]

 


            'रोबर स्काउट लीडर' (RSL)का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए मैं यथा समय केंद्र पर उपस्थित हो गया था। यह प्रशिक्षण केंद्र एक घने जंगल के मध्य सड़क किनारे पर ही सड़क के तल से लगभग 50 फीट की ऊँचाई पर स्थित एक सुरम्य स्थान पर बना हुआ था। जहाँ एक बहुत बड़े से हॉल में हम 51प्रशिक्षणार्थीयों को ठहराया गया था।जो सभी उत्तर प्रदेश के विभिन्न राजकीय और अनुदानित महाविद्यालयों से आए हुए प्रोफ़ेसर थे। इस हॉल में फर्श पर चीड़ के वृक्षों के बड़े -बड़े लगभग 30 -40 फीट लंबे आयताकार शहतीर बिछाए गए थे। चीड़ के शहतीर बिछाने का उद्देश्य कड़ी ठंड से बचाना ही था। वे सब परस्पर सटाकर चिकना बनाकर बिछाए गए थे। उसी फर्श पर हम सभी लोगों के बिस्तर लगाए गए। दो अनुभवी प्रशिक्षकों द्वारा प्रशिक्षण दिया जाना था। 


               रात्रि विश्राम के पश्चात सुबह 5 बजे से पहले ही दिनचर्या प्रारम्भ हो गई। रेफ्रिजरेटर से भी अधिक ठंडे पानी से सुबह स्नान किया गया,जो वहाँ पर बने हुए एक सीमेंटेड टैंक में भरा हुआ था।पानी का स्पर्श ही देह को शून्य कर देने वाला था। टंकी के पास ही पूरे परिसर में चाय की पंक्तिबद्ध झाड़ियां खड़ी हुई थीं। चुस्की के कुछ वृक्ष भी खड़े हुए परिसर के सौंदर्य की अभिवृद्धि कर रहे थे।अवसर मिलने पर चुस्की के बहुत मीठे फलों का रसास्वादन मैंने किया।सुबह सात बजे तक तैयार होकर मैदान में झंडारोहण, परेड,खेल तथा प्रशिक्षण संबंधी विविध क्रिया कलापों के लिए हमें पहुँचना था। इलाहाबाद के श्री लाल साहब और रानीखेत के श्री उनियाल साहब द्वारा प्रशिक्षण दिया जाने लगा था। उनका व्यवहार बहुत सौम्य औऱ सम्मानजनक था।


          मैंने देखा कि विश्व का सर्वोच्च हिमालय पर्वत 100 किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर होने के बावजूद ऐसा दिखाई दे रहा था कि सामने कुछ ही दूरी पर हो। प्रातः और सायंकाल हिमालय की शोभा बहुत मनोहारी होती थी। प्रातःकालीन सूर्य की किरणों के प्रभाव से वह सोने जैसा दिखाई दिया। शाम को रुपहला लगा। अपने साथियों की सहायता से अपने साथ ले जाए कैमरे से हिमालय के साथ अपने छायाचित्र भी कैमरे में सुरक्षित किए गए। केंद्र के सामने विस्तृत वन फैला हुआ था। जिसमें अनेक ऊँची पहाड़ियां औऱ खाइयाँ दिखती प्रतीत हो रही थीं। कुछ बादल हमसे भी नीचे यों दिख रहे थे जैसे कोई सफ़ेद खरगोश झाड़ी में बैठा हुआ हो। ये मेघ- खण्ड कुछ ऊपर थे तो कुछ नीचे ।दिन में जंगल में कोई रौनक महसूस नहीं होती थी , लेकिन रात को पहाड़ियों पर दूर -दूर बने हुए घरों में जब रौशनी होती ,तो लगता कि यहाँ भी इंसान रहते हैं।चीड़,सेव ,चुस्की, पुलम आदि के घने पेड़ उस पर्वतीय वातावरण को मोहक बना रहे थे।प्रशिक्षण स्थल के उस प्रांगण में वज्रदंती बूटी के जमीन से चिपके हुए पौधे चारों ओर फैले हुए थे। कुछ घण्टे के प्रशिक्षण के बाद नाश्ता हुआ।नाश्ते के बाद उसी बड़े हॉल में सैद्धांतिक लैक्चर की कक्षाएँ ली गईं। जिनमें प्रश्नोत्तर के द्वारा बहुत कुछ बताया गया। डायरी पर बनाये गए नित्य प्रति के नोट्स को उनसे जंचवाना भी अनिवार्य था । सब कुछ ठीक वैसे ही चल रहा था ,जैसे कालेजों में शिक्षकों द्वारा छात्रों के साथ किया जाता है।


         लैक्चर क्लास के बाद भोजन व्यवस्था होती । हम कोई भी पाँच लोग भोजन परोसने का काम करते ।सभी लोग अपनी थाली, कटोरियाँ , गिलास चम्मच लेकर टाट पट्टी पर आ विराजते ।भोजनोपरांत सब अपने -अपने बर्तन धो माँज कर अपने बिस्तर में रख लेते । स्वयं सहायता का यह कार्यक्रम बहुत ही अच्छा लगा। बारी- बारी से पाँच लोग भोजन परोसने का सेवा कार्य करके स्वयं भोजन करते ,तब अन्य भोजन कर चुके कोई भी व्यक्ति उन्हें भोजन परोस देते।दोपहर औऱ शाम को नित्य प्रति की यही भोजनचर्या थी। 


          हमारे प्रशिक्षक द्वय कभी - कभी दोपहर को भौगोलिक सर्वेक्षण कराने के लिए 6-7 शिक्षकों की टोलियां बना कर जंगल में ले जाते।तब हमें वहाँ के पेड़ ,पौधों और वनस्पतियों को औऱ करीब से देखने औऱ समझने का अवसर मिला।ऊँचे सेव वृक्षों पर जंगली सेव देखने का अवसर प्राप्त किया। अनदेखे, अनपहचाने इन पौधों की जानकारी कुछ जानकारों से ली गई। झाड़ियों में बिच्छू घास खड़ी थी ,जिसे भूल से भी छू लिया जाए तो बिच्छू के दंश जैसा कष्ट होता। यह भी ज्ञात हुआ कि उस ज़हरीली घास के पास पालक जैसी पत्ती की एक और घास भी मिलती है,जिसकी पत्ती को रगड़ देने से जहरीली घास का असर खत्म हो जाता है। सुनहरे खाद्य फंगस पौधे ,जो मशरूम की तरह होते हैं, कहीं कहीं झाड़ियों में नम स्थानों पर मिले। चीड़ के सैकड़ों फीट ऊँचे दरख्तों के बीच जाने पर पाया कि हवन सामग्री में प्रयोग किया जाने वाला छाड़ -छबीला उनके तनों पर उगकर चिपका हुआ है। यहीं नहीं समीपस्थ चट्टानों पर भी उसे देखा गया। यह छाड़ - छबीला ही वह तत्व है , जिसकी सुगंध सारे पर्वतीय वातावरण को महकाती रहती है। हल्द्वानी से बस द्वारा आगे बढ़ने पर यही महक सारे वातावरण को सुगंधातायित किये हुए थी, जिसका रहस्य अब आकर समझ में आया ।


           प्रशिक्षण अवधि के बीच एक दिन अल्मोड़ा के प्रसिद्ध देवालयों में देव -देवी दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहाँ की प्रसिद्ध बाल -मिठाई का भी आनंद लिया । जाते -आते समय मार्ग में देखा कि सन्नाटे भरी सड़कों पर आदमी नाम की चीज नहीं है। हाँ ,जब कभी चलने वाली बसों के उन स्थानों पर जहां से वे सवारियां लेती हैं ,वहाँ कुछ लोग बस की प्रतीक्षा करते हुए अवश्य देखे गए। जंगल के बीच ये कुछ तिराहे -चौराहे थे ,जहां खड़ी होकर सवारियां बस में बैठती थीं। 


          रात्रि - भोजन के पश्चात 10 बजे तक कैम्प -फायर का आयोजन नित्य के कार्यक्रम का मुख्य अंग था। उस समय सभी लोग गीत, हास्य व्यंग्य, काव्य पाठ आदि से सबका मनोरंजन करते । औऱ पता नहीं चलता कि कब दस बज गए। लेकिन दस बजने पर भी सभी कब सोने वाले थे। उनके हँसी -मजाक , चुट्कुले का कार्यक्रम बिस्तर में रजाई के अंदर से ही चलता रहता औऱ तब तक चलता जब तक सब सो नहीं जाते। सुबह पाँच बजे से पुनः कार्यक्रम अपने नए रँग -रूप में सामने होता। सभी संतुष्ट, आनंदित औऱ प्रमुदित। इस प्रकार एक -एक कर प्रशिक्षण के दिन पूरे हो रहे थे। 


 🪴 शुभमस्तु !


 २५.०४.२०२१◆११.१५ 


आरोहणम मार्तण्डस्य ।


शनिवार, 24 अप्रैल 2021

 मेरी शीतलाखेत यात्रा 

 (भाग-1)

 [ संस्मरण ]

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 ✍️ लेखक © 

 🏔️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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           बात सन 1991 की है।उस समय मैं राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बीसलपुर पीलीभीत में हिंदी विभाग में रीडर के पद पर सेवारत था।महाविद्यालय की रोबर स्काउट टीम का अधिकारी होने के कारण मुझे शीतलाखेत (अल्मोड़ा) में 'रोबर स्काउट लीडर' के प्रशिक्षण के लिए वहाँ जाना था। 1991 में लोकसभा/विधान सभा के चुनाव के कारण आचार- संहिता लगी हुई थी। अतः मुझे जिलाधिकारी पीलीभीत से अनुमति प्राप्त करने के बाद ही अपनी यात्रा प्रारंभ करनी थी।पीलीभीत जिलाधिकारी के कार्यालय में जाकर यथासमय अनुमति भी ले ली गई। अब मैं उक्त पर्वतीय यात्रा के लिए तैयार था।

           'रोबर स्काउट लीडर' (RSL)के उक्त प्रशिक्षण की अवधि दस दिन की थी। जो 1 जून से 10 जून 1991 तक होनी थी।पर्वतीय यात्रा का मेरा प्रथम अनुभव होने के कारण मैंने स्थानीय अन्य मित्रों से यह जानकारी भी कर ली थी कि वहाँ पर जून के महीने में कैसा मौसम रहता है।तदनुसार मैंने अपनी यूनिफ़ॉर्म के साथ - साथ गर्म कपड़े कम्बल आदि सामग्री सहेज कर साथ में ले ली औऱ यात्रा के लिए चल पड़ा। 

          पहले बीसलपुर से पीलीभीत आगे पीलीभीत से हल्द्वानी तक की यात्रा बस द्वारा पूरी की गई। आगे की यात्रा भी बस द्वारा ही पूरी की जानी थी। हल्द्वानी पर बस स्टैंड पर उतरने के बाद सीधे शीतलाखेत जाने वाली बस में बैठना था। बस में प्रवेश किया तो बस पूरी तरह भरी हुई थी। अंततः यात्रा तो करनी ही थी, इसीलिए उस बस से नहीं उतरा और इस प्रतीक्षा में कि कहीं कोई सीट मिल जाए, खड़ा हो गया। सामान को किसी तरह एक बर्थ के ऊपर की जाली पर ठूँस दिया ।मैंने अनुभव किया कि कोई भी पर्वतीय यात्री किसी मैदानी सवारी को अपने साथ एडजस्ट करने को तैयार नहीं था। बस आगे बढ़ी ,तो यह भी देखा कि रास्ते में यदि कोई स्थानीय सवारी आती तो उसे तुरंत स्वयं खिसककर अपने साथ बिठा लेते ,लेकिन मैं चूँकि मैदानी क्षेत्र से आया था इसलिए किसी के हृदय में मेरे प्रति कोई सद्भाव नहीं था। सब ऐसे घूर कर देख रहे थे, जैसे बाबरों के गाँव में ऊँट घुस आया हो। मेरी इस प्रथम पर्वतीय यात्रा में यह अनुभव हुआ कि वहाँ पर पर्वत मैदान का भेदभाव उनकी संकीर्णता को स्वतः उभार कर बाहर करते हुए मानो कह रहा हो कि हम पर्वत के लोग तुम मैदानियों से घृणा करते हैं।इसके विपरीत उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्र में देश का ही नहीं ,विदेश का व्यक्ति भी आ जाए तो उसका सहर्ष स्वागत किया जाता है। बस कुछ औऱ आगे बढ़ी , कुछ नई सवारियां चढ़ीं ,कुछ उतर भी गईं । तो मैंने बिना किसी की कृपा को प्राप्त किए हुए एक सीट पर अपनी जमीदारी कायम कर ही ली औऱ अधिकार पूर्वक सीटासीन हो गया। 

          जैसे -जैसे बस ऊँचाई की ओर बढ़ी,मैंने पाया कि सड़क के दोनों ओर चीड़ के ऊँचे -ऊँचे दरख़्त खड़े हुए हैं। सारा वातावरण जंगल की हरियाली से सुरम्य हो रहा है औऱ एक अलौकिक सुगंध व्याप्त हो रही है।संभवतः इसीलिए इसे देवभूमि कहा जाता है। पर देवभूमि का वासी इतना संकीर्ण ! अफ़सोस!! यह भाव मेरे मन के कोने - कोने में निरंतर खटकता रहा।क्या इसी तरह हम राष्ट्रीय एकता स्थापित करना चाहते हैं? हमारे देश की अखण्डता का सपना क्या ऐसे ही नागरिकों से पूरा होने वाला है? 

           आगे बढ़ने पर मेरे नाक और कानों में ऐसा लगा कि वे बन्द होने लगे हैं ,मानो उनमें रुई भर दी गई हो।यह ऊँचाई पर वायु का दबाव कम होने का प्रभाव था। मेरे सिर के ऊपर बने स्थान में किसी व्यक्ति की दूध की टंकी रखी हुई थी ,जो बराबर छलकती हुई मुझे दुग्ध स्नान करा रही थी। आगे चलने पर बर्फ- सी शीतल बारिश ने मुझे औऱ अधिक ठंडा कर दिया। खिड़की से बारिश की तेज ठंडी बूँदें औऱ ऊपर से दुग्ध की वर्षा मेरा स्वागत कर रही थीं।यह सिलसिला शीतलाखेत पहुँचने तक नहीं रुका, नहीं थमा। 

           पर्वतीय मार्गों पर कभी बहुत गहरी ढलान आती तो कभी ऊँची चढ़ाई। सड़क के एक ओर गगनचुंबी ऊँची पर्वत श्रृंखलाएं तो दूसरी ओर सैकड़ों फीट नीची गहरी खाइयाँ।अनेक मोड़ों पर उतरती- चढ़ती बस लगभग 15 किमी. प्रति घण्टे की गति से आगे बढ़ती रही। यदि किसी मोड़ पर कोई बस आती हुई दिखाई देती तो ऊपर वाली बस को वहीं रोककर उसे आगे चले जाने का मार्ग देना प्रत्येक बस चालक की प्राथमिकता थी। सुनसान मार्गों पर चढ़ती-उतरती अपनी मंजिल तय करती बस पहाड़ी वादियों में चलती रही। हरे -भरे जंगलों से आबाद यह पर्वतीय क्षेत्र बहुत ही रमणीय औऱ शांत अनुभव हुआ। नीचे की ओर झाँकने पर हृदय में भय की कँपकँपी देती हुई लहर-सी दौड़ जाती।

            रास्ते में 'गरम पानी' नामक स्थान पर बस रुकी ,तो फ़ालसेव जैसे बैंजनी रंग के फलों का रसास्वादन भी किया। इन्हें वहाँ की भाषा में 'काफ़ल' कहा जाता है। ये फ़ल फेरी वालों द्वारा हरे - हरे पत्तों के दोनों में रखकर बेचे जा रहे थे।भुवाली,रानीखेत ,अल्मोड़ा होती हुई बस शाम लगभग 5 बजे शीतलाखेत हिल स्टेशन के प्रशिक्षण केंद्र पर पहुँच गई थी। जब बस से नीचे उतर कर आया तो निरंतर दूध औऱ बारिश के पानी से भीगने के कारण मेरे दाँत बंद हो गए थे।आवाज नहीं निकल पा रही थी। जिस किसी तरह वहाँ पहले से ही आए हुए मित्रों की मदद से सामान केंद्र में रखवाया गया औऱ लगभग पंद्रह मिनट बाद मैं बोल पाने की स्थिति में आ सका।इस प्रकार प्रशिक्षण का पहला दिन इस पर्वतीय यात्रा को समर्पित हुआ। इस समय मैं समुद्र तल से 1900 मीटर की ऊँचाई पर शीतलाखेत हिल - स्टेशन पर खड़ा था। 

 🪴 शुभमस्तु !

  २४.०४.२०२१◆१.३० पतनम मार्तण्डस्य ।

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

 आग 🔥🔥 


 [ संस्मरण ] 


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 ✍️लेखक © 


 🔥 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 


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             उसका जन्म एक मध्यम वर्गीय कृषक परिवार में हुआ था। उसके पिताश्री बहुत अधिक पढ़े -लिखे नहीं थे , पर जितना भी वह पढ़े लिखे थे ,उतना आज के इंटरमीडिएट उत्तीर्ण विद्यार्थी से उनका ज्ञान बहुत अधिक था। माँ एक सामान्य गृहणी ही थीं,लेकिन उस समय की स्थिति और युग के अनुसार उन्होंने विद्यालय का मुख्य द्वार भी नहीं देखा था।बावुजूद इसके वह अपने हस्ताक्षर अवश्य कर लिया करती थीं। उसके पितामह अवश्य दूसरी कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद देश के स्वतंत्रता आंदोलन में एक सक्रिय सैनानी थे। जिन्हें दो - तीन बार अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन के कारण जेल यात्रा भी करनी पड़ी थी। 


         प्रारम्भ में उसे पढ़ने - लिखने के प्रति कोई रुचि नहीं थी।इसलिए सात वर्ष की अवस्था होने पर भी वह विद्यालय नहीं गया और अपने छोटे से गाँव में गिल्ली - डंडा, हरियल- डंडा, गेंद - बल्ला, कंचे आदि खेलने में मस्त रहता था। हमउम्र बच्चों के प्रेरित किए जाने पर वह विद्यालय जाने लगा , पर यह क्या ? उसके बाद उसने रुकने का नाम ही नहीं लिया। वह फिर चला नहीं , बहुत ही संतुलन और धैर्य के साथ दौड़ने लगा। मानो अध्ययन के प्रति उसमें पर लग गए हों। 


             उसे नया सीखने के प्रति एक ऐसी आग लगी जो आज जीवन के सात दशकों के बाद भी ठंडी नहीं पड़ी है।ईश्वर ने चाहा तो आजन्म यह आग बुझने वाली नहीं है। पता नहीं निरंतर आगे बढ़ते हुए कच्ची - पक्की एक पास करने के बाद विज्ञान से स्नातक औऱ उसके बाद अपनी ही मातृभाषा के प्रति विशेष प्रेम होने के कारण उसी में परास्नातक और पी एच.डी. की उपाधि भी प्राप्त कर ली।अंततः राजकीय सेवा में प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी के पद पर भी रहा। 


              जब वह कक्षा चार का छात्र था , तो माँ सरस्वती की महती कृपा स्वरूप उसे कविताएं लिखने का शौक भी पैदा हो गया। औऱ वह शौक इस तरह उसके जीवन में आच्छादित हो गया कि फिर कभी रुका नहीं तो नहीं ही रुका। माँ शारदा की कृपा ने ही एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित करने का सुअवसर प्रदान किया। देश की अनेक पत्र -पत्रिकाओं में उसके लेख , समीक्षाएं, कविताएं ,कहानियां, एकांकी आदि प्रकाशित होने प्रारम्भ हो गए। जो क्रम कभी भी नहीं टूट सका।


             इस संस्मरण के नायक ने अपने को कभी भी विशेष नहीं माना। सदैव एक सामान्य मानव के रूप में अपने कार्यों का निष्पादन किया। अपने अध्ययन- काल में अपने नैत्यिक अध्ययन के साथ -साथ उसकी अभिरुचि ज्योतिष , तंत्र ,मंत्र, वास्तुशास्त्र , विज्ञान , सामुद्रिक शास्त्र ,सम्मोहन विज्ञान ,अध्यात्म, जैसे विषयों के प्रति रही । खेलों में उसकी फिर कोई रुचि नहीं रही , जो बचपन में इतनी अधिक थी कि उसे खेलने के अतिरिक्त कुछ  भी नहीं सुहाता था ।मानो  जीवन भर के सारे खेलों का कोटा बचपन में ही पूरा कर लिया हो । उसके अध्ययन के प्रति यह आग से शायद पैतृक संस्कार है ,जो उसे अपने पिताश्री से प्राप्त हुआ है। उसके पिताश्री भी अध्ययन के प्रति इतने जिज्ञासु थे ,कि कोई कागज, पुस्तक , समाचार पत्र आदि मिल जाता ,उसे बिना पूरा पढ़े हुए उसे छोड़ते नहीं थे।


           इसलिए अपने विषयगत अध्ययन के अतिरिक्त उसने लाखों रुपये की दुर्लभ पुस्तकें औऱ ग्रंथ खरीद डाले। उसे किसी से माँगकर पढ़ने में आनंद नहीं आता था ,जितना स्वयं की पुस्तक से आता था। इसलिए यदि कहीं कोई पसंद की पुस्तक मिल जाती तो कितनी भी मँहगी होने पर भी जब तक उसे खरीद नहीं लेता था , शांति नहीं मिलती थी। परिणाम यह हुआ कि हजारों की संख्या में उसका निजी पुस्तकालय बन गया।आश्चर्य से भी आगे की बात यह भी है कि आग आज भी बराबर प्रज्ज्वलित है। जल रही है ,जल रही है औऱ अनवरत जल रही है। 


         मेरे सुधी विद्वान/विदुषी पाठक और यह जानने को उत्सुक हो सकते हैं कि वह कौन है ,जिसके विषय में यह पहेली कही जा रही है। तो इस जिज्ञासा का समाधान करना भी मुझे आवश्यक हो गया है। तो बता ही दिया जाए , अब ज़्यादा प्रतीक्षा भी किस काम की ? तो रहस्य से पर्दा उठा ही दिया जाए। वह कोई औऱ नहीं इसी संस्मरण की लेखनी का लेखक ही है ,जिसके विषय में बेनामी का आवरण पड़ा हुआ था। 


 💐 शुभमस्तु !


 20.11.2020◆7.45अपराह्न।


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शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

वह दीवाली थी दियों की

 [ संस्मरण ]

 ✍️लेखक© 

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

 

                   आधी से अधिक सदी विदा हो चुकी है।आधी सदी से पहले के समय की गाँव की दीवाली कुछ औऱ ही हुआ करती थी।वह दिवाली दियों की दीवाली थी।परंतु आज लड़ी और झालरों की कृत्रिम रौशनी की दीवाली है।जो सहजता ,स्वाभाविकता और सरलता उस समय थी ,अब बीते युगों की बात हो चुकी है।

            महीने भर पहले से घर, मकानों की लिपाई -पुताई की जाती थी। दीवाली से एक दिन पहले पीली मिट्टी और गोबर से घर के सभी कक्षों और आँगन को लीपा जाता था। दीवाली के दिन पूड़ी ,पुए,खीर ,कचौड़ी बनाने के साथ -साथ घर की भैंस के ताजा औऱ शुध्द दूध का खोया बनाकर उसके लड्डू, बर्फी आदि मिष्ठान्न तैयार किए जाते थे। लौकी की खोए वाली बर्फी तो बहुत आनन्द दायक होती थी। देशी घी की पूड़ियों की महक से पूरा मोहल्ला गमक उठता था। हम बच्चे लोग नए -नए कपड़े पहनकर आतिश बाजी का आनन्द भी लूटते थे। सूर्यास्त होने के बाद शुद्ध सरसों के तेल से मिट्टी के लाल- लाल दिए जलाए जाते थे।घर ,आँगन, छत ,मुंडेरों , कुओं की मुँडेरों,मंदिरों आदि पर दिए जलाए जाते थे।कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अमावस्या की रात प्रकाश से नहा -नहा उठती थी।

            आतिशबाजी, फुलझड़ी, रॉकेट, अनार की चिंगारियों से होने वाले कपड़ों में छेद माँ की डांट का कारण बनते थे। रात को लक्ष्मी -गणेश सरस्वती की पूजा ,अर्चना के बाद नए धान की सफेद दूधिया खीलों औऱ खांड के बने खिलौनों का प्रसाद वितरण किया जाता था। रात को कुछ लोग लड्डू -बताशे भी बाँटा करते थे।मेरी माँ सूप में दिए जलाकर गांव ,मोहल्ले के घरों में जलाने जाया करती थी।माटी की बड़ी सी दीवट में एक रुपये का सिक्का डालकर उसके ऊपर एक बिना भीगा हुआ दिया औंधा कर काजल पारा (बनाया) जाता था ,जिसे माँ हम बच्चों की आँखों में लगा दिया करती थी। सुबह लगभग 4 बजे माँ सूप लेकर घर के बाहर यह कहते हुए जाती थी :'निकल छुछूँन्दर निकल'अर्थात घर की दरिद्रता दूर हो , दूर हो।

                  इसके बाद गांव के एक विशेष स्थान पर गाँव की महिलाओं द्वारा की जाने वाली स्याहू माता   की सामूहिक पूजा में सम्मिलित होती थी। वहाँ वह एक सूप में दिये जलाकर औऱ सिक्का वाली दीवट लेकर पूजन में सम्मिलित होती थी। जहाँ गाँव की बहुत सारी महिलाएं, वृद्धाएँ आतीं औऱ पूजा करके गीत गाकर अपने घर लौट जातीं।जब मैं छोटा ही बालक था ,तो एक दो बार माँ के साथ स्याहू पूजन के लिए गया था। तब मैंने सुना कि वे महिलाएं, विषेशकर वृद्धाएँ कुछ अश्लील गालियाँ भी गाती हुई देखीं गईं। 


             सुबह होने पर हम बच्चे देखते कि कुछ दिये बिना जले ही रह गए। शेष का तेल समाप्त हो गया था। वे जल चुके थे। हम उन दियों को इकट्ठे कर लेते , जिनका उपयोग दाल में छोंक देने के लिए माँ के द्वारा साल भर किया जाता था। सुबह कपड़ों में छेद देखकर डर लगता था कि यदि माँ ने देख लिया, तो बहुत डांट पड़ेगी।इसलिए छिपते रहना पड़ता था, पर आखिर कब तक? आखिर पता लग ही जाता, और डांट भी खानी पड़ती। । मोमबत्तियों के अवशेष को एकत्र करके पपीते या  रैंडी के पत्ते के खोखले डंठल से उसमें पिघला हुआ मोम डालकर पुनः मोमबत्ती बनाना हमारा प्रिय शौक था।

                पर आज न वह दीवाली रही , न वे शौक-रहे ! सब कुछ रेडीमेड !वह असली दीवाली थी, वास्तव में एक सामाजिक त्यौहार ! न प्रदर्शन न बनावटीपन।न रिफाइंड न चर्बी की मिठाईयां।न विषैले चीनी भरे दूषित खाद्य पदार्थ। न बिजली की बनावटी रौशनी, न मनुष्य की स्वार्थ वृत्ति का दम्भीय प्रदर्शन।धन की चकाचोंध का ढोंग तब नहीं था ,जब कि आज के युग में उसी का बोलबाला है। जुए की चर्चा क्यों न की जाए! वह तो सत्यवादी धर्मावतार युधिष्ठिर से लेकर अब तक पवित्र परम्परा के रूप में जीवित है। जहाँ अमृत-कलश है ,वहीं आसपास विष्कुम्भ भी है। 

 💐 शुभमस्तु!

 13.10.2020 ◆7.50अपराह्न।

शनिवार, 31 अक्टूबर 2020

आज भी है मुझे प्रायश्चित! [ संस्मरण ]


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 ✍️लेखक ©

 🔰 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम

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               जीवन में कभी-कभी कुछ अप्रत्याशित इस तरह से घटित हो जाता है कि मनुष्य पहले से सोचता भी नहीं है कि ऐसा भी हो सकता है, जिसका जीवन भर प्रायश्चित बना रहता है।प्रायश्चित के अतिरिक्त अन्य कोई समाधान नहीं है और इस प्रायश्चित के द्वारा वह अघटनीय का ध्यान सदैव कचोटता रहता है।सम्भवतः यही उसका एक दंडविधान भी है। यह बात यद्यपि बहुत छोटी-सी है ,किन्तु मेरे मानस पटल पर कुछ ऐसा बिम्ब बनाए हुए रहती है कि उससे मुक्त नहीं हो पाता । 

        36 वर्ष पूर्व सन 1984 में मैं राजकीय महाविद्यालय, जलेसर एटा में हिंदी विभाग में रीडर के पद पर कार्यरत था। बरसात के दिन थे ,किन्तु बरसात नहीं हो रही थी। अगस्त के महीने के किसी दिन मैं प्रातः लगभग साढ़े नौ बजे महाविद्यालय जाने के लिए ऊपरी मंजिल पर बने घर की सीढ़ियों से उतरकर सड़क पर बाहर आया और पैदल ही चलने लगा।महाविद्यालय घर से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित था ,इसलिए समय से पहुँचने के लिए आधा घण्टा पूर्व निकलना होता था। अभी मुशिकल से पचास कदम ही आगे बढ़ा था कि सामने से चले आ रहे एक रिक्शेवाले ने अपना रिक्शा मेरी दोनों टाँगों के बीच में घुसा दिया। मैं सफेद रंग की पेंट और सफ़ेद कमीज़ पहने हुए था। जैसे ही रिक्शे का अगला आधा कीचड़ से सना पहिया टाँगों से पार हुआ, मेरा पेंट उससे सन गया ।फिर क्या मेरा क्रोध सातवें आसमान की बुलंदियों का स्पर्श करने लगा। 'क्या तुझे दिखाई नहीं देता तुझे?' मैंने रिक्शेवाले को जिस तेजी से कहा ,उसी तेजी के साथ आव देखा न ताव ,दो थप्पड़ उसी कनपटी पर रसीद दिए ।

          वह कुछ बोला भी नहीं और तुरंत ही मैं उल्टे पाँव घर की ओर कपड़े बदलने के लिए लौट पड़ा। शीघ्र ही कपड़े बदले और पुनः कालेज की ओर चल पड़ा।लेकिन रास्ते भर यही सोचता रहा कि क्या मुझे इस तरह रिक्शेवाले को मारना चाहिए था ? भूल इंसान से ही होती है। उसने कोई जानबूझकर कपड़े खराब नहीं किए थे। इसलिए मुझे उसे मारना नहीं चाहिए था। मुझे लगा कि मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है। पर अब किया भी क्या जा सकता था ! तीर कमान से निकल चुका था। मुँह से निकली ज़ुबान औऱ कमान से निकला बाण पुनः लौटकर नहीं आते।यही बात रहकर रह कर मेरे मानस पटल पर छा गई थी। 

           आज भी जब उस दिन का स्मरण होता है तो मुझे वही प्रायश्चित बार -बार होने लगता है कि मुझे उस रिक्शेवाले को थप्पड़ नहीं मारने चाहिए थे।वह एक मानवीय भूल थी। उस छोटी- सी घटना की स्मृति अभी भी मुझे कचोटती है और मैं अपने को क्षमा नहीं कर पाता हूँ। पता नहीं वह अनाम रिक्शेवाला आज कहाँ होगा?होगा भी या नहीं होगा! पर मैं उसकी स्मृति से मुक्त नहीं हो पाता हूँ। 

 💐 शुभमस्तु ! 

 31.10.2020◆3.15 अपराह्न।

रविवार, 18 अक्टूबर 2020

अतीत के झरोखे से [ संस्मरण ]

 

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 ✍️लेखक © 

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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 यह सच है कि अतीत कभी लौटकर नहीं आता,लेकिन अतीत के बिना वर्तमान भी तो नहीं है। अतीत की पीठ पर कदम रखता हुआ वर्तमान अपने स्थाई पदचिह्न बनाता हुआ आगे बढ़ जाता है।उन पदचिह्नों को कोई याद रखे ,नहीं रखे ;यह व्यक्ति -व्यक्ति पर निर्भर करता है।आज जब मैं अपने अतीत के झरोखों में झाँककर देखता हूँ ,तो खट्टे -मीठे अनुभवों का स्वाद तरोताज़ा हो जाता है। 

 बात उस समय की है ,जब मैं आगरा के धूलियागंज स्थित अग्रवाल इंटरमीडिएट कालेज में इंटरमीडिएट (जीवविज्ञान) का प्रथम वर्ष छात्र था। विज्ञान ,जीवविज्ञान के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेज़ी के विषय भी चयनित करने होते थे। यह बात 1970 की है। हमें अंग्रेज़ी पढ़ाते थे : गुरुवर श्री बी.एल.सिंघल साहब। गुरु जी ने सभी छात्रों को घर पर करके लाने के लिए कुछ गृहकार्य दिया। जिसमें हमें चार लाइन की नोटबुक में अंग्रेज़ी के पढ़ाए हुए सभी पाठों के शब्द , उच्चारण और अर्थ लिखकर लाने को कहा गया था।जिन्हें कुछ ही दिन बाद जाँच कराने को भी कहा गया था। 

 उस समय हम सभी छात्र गण 'G' के निब वाले होल्डर से अंग्रेज़ी लिखा करते थे। हिंदी लेखन के लिए अलग प्रकार का निब होल्डर में लगाया जाता था।इन होल्डरों से लिखने का उद्देश्य यही होता था, कि हमारा लेख सुंदर हो जाए।लगभग चार -पाँच दिन में काम पूरा करके मैंने अपनी नोट-बुक (कॉपी) गुरु जी को दिखाई। मेरा साफ -स्वच्छ औऱ पूरी तरह से शुद्ध कार्य देखकर वे बहुत ही प्रसन्न हुए और कॉपी पर कार्य के अंत में 'GOOD'का रिमार्क देते हुए मेरी पीठ थपथपाई और शुभ अशीष देते हुए बोले: 'शाबाश बेटे ! इसी प्रकार कार्य करते रहे , तो जीवन में एक दिन बहुत बड़े आदमी बनोगे ,सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी।' 

 पूज्य गुरुवर के उस आशीष को मैं अभी तक नहीं भूला हूँ। कभी नहीं भुला पाया।आज भी उनके वे वाक्य और उनका वह सौम्य चेहरा नहीं भूलता। पूज्य गुरुवर श्री बिशन लाल सिंघल जी का आशीष मेरे जीवन का वह पाथेय बना जो कभी भी समाप्त नहीं हुआ और आज भी उनकी प्रेरणा और उस शुभ घड़ी में उनके मुखारविंद से निसृत शब्द मेरे जीवन का प्रकाश पुंज बन गए।

 मैं यह भी बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ , कि मेरी कार्यप्रणाली अन्य सभी जन से अलग प्रकार की और वैज्ञानिकता से परिपूर्ण होती है। आज भी जीवन के सातवें दशक के सोपानों पर अग्रसर होते हुए मेरी कार्यप्रणाली में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यह सब मेरे पूज्य बाबा, दादी, पिताजी , माँ और चाचाजी के आशीष का फल है। मैं आज जो कुछ भी हूँ, उसी वृक्ष का नन्हा बीज हूँ , जिसका अभिसिंचन ,पालन और पोषण मेरे पूज्य पूर्वजों और पूज्य गुरुजन ने किया। मैं आजीवन उनका ऋणी रहूँगा। 


 💐 शुभमस्तु !


 16.10.2020◆ 2.30 अपराह्न।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

'ताजमहल' की प्रेरणा [ संस्मरण ]

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 ✍️ शब्दकार © 

 🔱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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                    ताजमहल का नाम सुनकर चौंकिएगा नहीं।इस नाम को सुनकर चौंक जाना स्वाभाविक है। कहाँ विश्वप्रसिद्ध ताजमहल और कहाँ मैं ? भला ऐसा भी कहीं हो सकता है कि मैं कोई ताजमहल खड़ा कर सकूँ! यह बात है तो ताजमहल की ही ,पर उस ताजमहल की नहीं है ,जिसका नाम कानों में पड़ते ही सफ़ेद संगेमरमर से बनी भव्य और उच्च इमारत का बिम्ब मस्तिष्क पटल पर अंकित हो जाता है।इस संस्मरण में जिस ताजमहल के निर्माण की चर्चा की गई है ,वह मेरा अपना छोटा - सा ताजमहल है ,जिसमें नीचे से ऊपर तक कुल एकादश मंजिलें हैं।

                मेरा 'ताजमहल' किसी प्रेयसी की प्रेरणा स्वरूप नहीं लिखा गया। उस समय मैं बी.एस सी. उत्तीर्ण करने के बाद हिंदी में एम.ए.पूर्वार्द्ध का विद्यार्थी था।अविवाहित था। मेरी अवस्था का 23वां वर्ष चल रहा था।23 सितंबर 1974 की रात की बात है।समय रात के 2 और 3 बजे के मध्य का रहा होगा। उस समयावधि में मेरे द्वारा एक विचित्र स्वप्न देखा गया,जो मेरे खण्डकाव्य 'ताजमहल' की प्रेरणा का कारण बना। यों तो काव्य रचना करते हुए मुझे ग्यारह वर्ष व्यतीत हो चुके थे। इससे भी तीन वर्ष पूर्व महाकाव्य 'तपस्वी बुद्ध' भी पूर्ण कर चुका था। किंतु इस खंडकाव्य की प्रेरणा कुछ विचित्र प्रकार की थी। 

                 यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना भी उचित होगा कि विश्व प्रसिद्ध ताजमहल की दूरी मेरे गाँव से लगभग 15 -16 किलोमीटर होगी। बरसात के दिनों में आकाश स्वच्छ औऱ निर्मल रहने के कारण हम गाँव से ही ताजमहल देख लिया करते थे। एक दो बार ताजमहल को देख भी चुके थे। अपने स्वप्न में मैंने देखा कि मेरे ही गाँव का एक परिचित व्यक्ति उस भौतिक ताजमहल की इमारत पर चढ़ने का प्रयास कर रहा है । बहुत ही जिज्ञासा पूर्वक मैं उसे आरोहण करते हुए देख रहा हूँ।  स्वप्न में  देखा गया  ताजमहल  भौतिक ताजमहल से सर्वथा भिन्न अलौकिक और अवर्णनीय था।  प्रथम सर्ग का श्रीगणेश इस प्रकार किया गया है: 

अर्द्ध क्षणदा थी कोमल कांत, जा रही स्मित - सी चुपचाप। 

 कदम उठने पर पायल-नाद, नहीं होती तृण भर पदचाप।।

            इसी प्रकार के 34 छंदों में प्रथम सर्ग पूर्ण हुआ है।इसी प्रकार के दस सर्ग भी लिखे गए हैं। प्रातःकाल उठने पर 'प्रेम ' शीर्षक से  एक कविता लिखी ,जो मुझे बहुत ही प्रिय लगी और उसको लिखने के बाद मानो मेरी कल्पना को पंख लग गए और एक पर एक रचनाएँ लिखने का अनवरत क्रम प्रारम्भ हो गया।एक सप्ताह तब हुआ कि निरंतर लिखते हुए ग्यारह सर्गों में निबद्ध एक खण्डकाव्य तैयार हो गया।

             वर्ष 2008 में इस खण्डकाव्य का प्रकाशन सम्भव हो सका।इस काव्य को बार -बार पढ़ना और पढ़कर सुनाना मुझे बहुत ही प्रिय रहा है। 24 सितंबर 1974 को पहली रचना ,जो उसके प्रथम  सर्ग के रूप में है ,लिखी गई। ऐसा लगने लगा कि इस विषय पर बहुत कुछ लिख सकता हूँ। और वह लिखा भी गया ,पूरा भी हुआ, प्रकाशित भी हुआ।भले ही लिखने के 34 वर्ष बाद हुआ । 

              मेरा 'ताजमहल'  मेरी पसंद की सर्वप्रिय रचनाओं में से एक है।यों तो 'निज कवित्त केहि लाग न नीका। सरस् होउ अथवा अति फीका।' यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना भी समीचीन होगा कि इस खण्डकाव्य में ताहमहल को प्रेम का प्रतीक नहीं माना गया।   मेरे द्वारा उन अनाम वास्तुविदों की अमर कला साधना का प्रतीक माना गया है , जिसके कारण उनके हाथों को शाहजहां द्वारा कटवाया जाना चर्चित है। अनेक नाटकीय बिम्बो के माध्यम से  रचना को गति प्रदान की गई है । संभवतः यही रचना का मूल है। वही इसकी मूल प्रेरणा है। स्वप्न पर आधारित यह कृति अपनी मौलिकता में अपने ही प्रकार की है। रचना के समीक्षक ही इसका सही मूल्यांकन कर सकते हैं। तो यह  है  मेरा अपना 'ताजमहल' और  उसकी प्रेरणा ।


 💐 शुभमस्तु ! 


 09.10.2020◆6.00अपराह्न।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

जब मैं रात ढाई बजे तक पढ़ा [ संस्मरण ]


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लेखक © 


🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'


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            कहते हैं कि सात वर्ष में एक युग बदल जाता है। यहाँ तक कि हमारे शरीर की संरचना के समस्त अंग, उपांग ,रक्त, मांस ,मज्जा आदि सभी में पूर्ण परिवर्तन हो जाता है। यदि अतीत की साढ़े पाँच दशक पूर्व की खिड़की में आज झाँक कर देखते हैं ,तो इस तथ्य की सत्यता स्वतः प्रमाणित हो जाती है। उस समय मैं राजकीय इंटर मीडिएट कालेज आगरा में हाई स्कूल का विज्ञान वर्ग का विद्यार्थी था। नवीं कक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करने के बाद दसवीं में अध्ययनरत था। गाँव से शहर में आकर अपने पूज्य चाचाजी प्रोफ़ेसर डॉ. सी.एल.राजपूत जी के साथ रहकर अध्ययन कर रहा था। वहीं से नित्य प्रति पैदल ही विद्यालय आता- जाता था।


               यह बात सन 1969 की है। उस समय परीक्षाएँ यथासमय हो जाती थीं औऱ मई या जून में परिणाम भी घोषित हो जाते थे। परीक्षा का समय आ चुका था। लेकिन हमारा विज्ञान का पाठ्क्रम मात्र पच्चीस प्रतिशत ही पूर्ण हो सका था। अन्य सहपाठी छात्र अपने ही विषय अध्यापकों से ट्यूशन पढ़कर पाठ्यक्रम पूरा कर ले रहे थे। मैंने कभी भी कोई ट्यूशन नहीं पढ़ा। विज्ञान का पाठ्यक्रम की स्थिति देखकर मुझे कुछ उदासी होने लगी , लेकिन मैंने साहस नहीं छोड़ा। देखते -देखते वह दिन भी आ गया कि अगले दिन विज्ञान का प्रश्नपत्र होना था।


             मैं अपने पूरे शिक्षा अध्ययन काल में कभी भी रात में नौ बजे के बाद नहीं पढ़ा। विद्यालय से घर आकर दिन में जितना भी पढ़ना, लिखना,याद करना होता था ;पढ़ लेता था। थोड़ा बहुत रात नौ बजे तक पढ़ता था। दिन में जब मैं किताब लेकर पढ़ने बैठता , मेरी पूजनीया दादी जानकी देवी देखते ही कहतीं: " लला ज्यादा मति पढ़िवे करै, ज्यादा पढ़िवे तें आँखें कमिजोर है जाति हैं।" इस पर मैं यही कहता ;" ठीक है अम्मा।"और वहाँ से हटकर अपने बँगले में या बगीचे में छिपकर पढ़ने चला जाता। मेरी अम्मा ,(दादी को मैं अम्मा ही कहता था ।) ,पिताजी या बाबा जी ने कभी न पढ़ने के लिए नहीं कहा और न रोका ही। क्योंकि मैं तो स्वतः ही किताबी कीड़ा था।अब किताबी कीड़े से क्या कहना कि पढ़ ले ,याद कर ले , स्कूल का काम कर ले।


                सुबह विज्ञान की परीक्षा थी और तैयारी थी नहीं। उस रात मैंने यह दृढ़ निश्चय कर लिया था कि जितना भी पाठ्यक्रम पूरा हुआ है ,उसमें से जो भी आएगा ,उसे पूरा और सही तरीके से करके आना है। 'आधी छोड़ सारी को धावे।आधी रहे न सारी पावे।।' वाली कहावत को मैं बख़ूबी जानता ,समझता था। इस तरह जब पढ़ने बैठा तो रात के ढाई बज गए ।और मुझे यह संतुष्टि हुई कि अब सब याद हो गया।


              सुबह परीक्षा हुई ।  प्रश्नपत्र बहुत अच्छा  हुआ और परीक्षाफल घोषित होने पर विज्ञान में 77%अंकों के साथ विशेष योग्यता भी प्राप्त हुई। इस प्रकार मेरा उस रात ढाई बजे तक पढ़ना सार्थक सिद्ध हुआ।जितना पाठ्यक्रम तैयार था ,उसे ही दुहराया । नया कुछ भी तैयार करने का कोई प्रयास नहीं किया। वह मेरे जीवन का पहला औऱ अंतिम दिन था , जब मैं रात में ढाई बजे तक पढ़ा। आज भी जब उस दिन की याद आती है ,तो बहुत अच्छा लगता है।


 💐 शुभमस्तु ! 


 25.09.2020 ◆7.30 अपराह्न।

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

15रु.का कोट और मेरे बाबा [ संस्मरण ]


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✍️ लेखक © 


🧥 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 


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            मेरे पूज्य और प्रातः स्मरणीय बाबा स्व.श्री तोता राम जी स्वतंत्रतता संग्राम सैनानी थे। इसलिए अपने अंतिम समय तक उन्होंने गांधी आश्रम के खादी के धोती, कुर्ता ,टोपी तथा अन्य सभी देहावरण धारण किए ।यहाँ तक कि जूते भी कपड़े के बने हुए ही पहना करते थे। मैं अपने पिता जी की सबसे बड़ी संतान होने के कारण दादी - बाबा का बहुत ही लाड़ला नाती रहा। वे समय -समय पर मेरे लिए भी खादी के कुर्ता -पाजामा बनवा दिया करते थे।जिन्हें पहनने में मुझे बहुत ही अच्छा लगता था।


        उस समय मेरी अवस्था यही कोई 10-11 साल की थी। चौथी कक्षा में पास के ही गाँव की प्राइमरी पाठशाला में पढ़ रहा था। फीस लगती थी मात्र एक आना,जिसे हम इकन्नी बोलते थे,जो कच्ची 1,पक्की 1से लेकर पाँचवीं कक्षा तक इकन्नी ही देनी होती थी। 


          जब जाड़े का समय आया, तो बाबा आगरा गए और मेरे लिए एक ऊन निर्मित कोट लेकर आए। कोट खुले गले का और हलके हरे रंग का था। जब मैंने पहना तो मुझे एक दम सही आया और ऐसा लग रहा था कि टेलर से सिलवा कर लाए हों। उस समय हम सभी बच्चे प्रायः पाजामे ही पहना करते थे। मैंने भी पाजामे पर कुर्ते के ऊपर कोट पहना । बहुत अच्छा लगा और दो -तीन वर्ष तक जाड़े की ऋतु आने पर पहनता। 


          बाबा ने यह भी बताया कि यह कोट गांधी आश्रम से पंद्रह रुपए का आया है। आज पंद्रह रुपए का कोई महत्त्व हो चाहे न हो ,पर उन दिनों में 1963 -64 में उसका जो मूल्य रहा होगा , वह मेरे लिए अनमोल था । उस पंद्रह रुपये के बाबा के हरे कोट के साथ बाबा का असीम लाड़-दुलार जो जुड़ा हुआ था , उससे मैं कभी उऋण नहीं हो सकूँगा। उस कोट का ऊन का एक -एक रेशा उनके लाड़ की कहानी कहते हुए अमर हो गया है। आज मेरे वह पूजनीय बाबा रहे न वह कोट ही रहा,पर उनकी अमर स्मृति का जो बिम्ब मेरे मानस में बना हुआ है , उसे कोई नहीं मिटा सकता। कोई नहीं मिटा सकता।मैं अपने उन प्रातः स्मरणीय बाबा जी को श्रद्धा पूर्वक शतशः नमन करता हूँ।


 💐 शुभममस्तु ! 


 10.09.2020◆12.30 अपराह्न।

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

और जागे जागे ही सवेरा हो गया! [ संसमरण]


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✍ लेखक ©

 👨‍🏭 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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             अपने विद्यार्थी-जीवन में परीक्षा देने के बाद मैंने कभी भी परिणाम की प्रतीक्षा नहीं की।परीक्षा हो गई ,बस गंगा नहा लिए। परिणाम जब आएगा ,तब आता रहेगा ।पहले से ही परेशान होने की आवश्यकता ही क्या है! बस इसी भाव को लिए हुए निश्चिंत बना रहता। अपना परीक्षाफल देखने भी कभी नहीं गया।मेरे गाँव के यार -दोस्त ही घर पर आकर समाचार सुनाते कि रिजल्ट निकल गया है। उन दिनों में प्रायः परीक्षाफल मई जून में ही आ जाया करते थे। वह जमाना आज की तरह इंटरनेट या डिजिटल नहीं था। परिणाम अखबारों में ही छपा करते थे।


                मेरे जीवन में एक रात ऐसी भी आई , जब मैं सारी रात नहीं सो सका। चाहे इसे अति प्रसन्नता कहिए या भविष्य के प्रति चिंता का तीव्र भाव। पर सारी रात आँखों आँखों में ही निकल गई औऱ सवेरा हो गया। यह बात वर्ष 1967 की है, उस समय मैंने जूनियर हाई स्कूल (कक्षा 8) की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।जहाँ तक मुझे ध्यान है मई या जून 1967 का महीना था।परीक्षाफल के लिए मेरे गाँव के सभी साथी उत्सुक भाव से प्रतीक्षा कर रहे थे औऱ मैं घोड़े बेचकर चैन की नींद में सो रहा था। समय यही दोपहर 1.00 बजे के बाद का रहा होगा। तभी मेरे दो -तीन साथी मेरे घर पर आए और उन्होंने मुझे जगाया और  खुशखबरी दी कि 'भगवत स्वरूप अपना रिजल्ट निकल गया है औऱ तेरी फर्स्ट डिवीजन आई  है।' मेरे पूछने पर उन्होंने अपने -अपने रिजल्ट भी बताए।पर यह सब कुछ सुनकर मुझे कुछ भी विशेष नहीं लगा।सब कुछ सामान्य ही लगा। वे लोग मेरे पास अखबार का वह पृष्ठ भी लेकर आए ,जिससे मैं उनकी बात का विश्वास कर सकूँ। 


              उस समय जूनियर हाई स्कूल की परीक्षा जनपद स्तर की होती थी। पूरे आगरा जनपद में मात्र 121 बच्चे उत्तीर्ण हुए थे , जिनमें मेरा ग्यारहवां स्थान था।देख ,सुनकर बहुत अच्छा लगा।उस समय मैं जूनियर हाई स्कूल उजरई (आगरा) का छात्र था। गर्मियों के दिन थे। गाँव में प्रायः जल्दी ही खाना बन जाता था । जल्दी ही खाकर सोने की तैयारी शुरू हो जाती थी। मच्छरों का नामो निशान नहीं था । इसलिए हम सभी खुली छतों पर , आँगन में या कहीं भी खुली जगह पर सो जाया करते थे। मैं अपने घर की छत पर सोने के लिए चला गया। अन्य दिनों में लेटते ही नींद आ जाया करती थी। पर यह क्या , आज तो नींद आँखों से कोसों दूर चली गई थी। इधर फर्स्ट डिवीजन में उत्तीर्ण होने की खुशी ,दूसरी ओर अगली कक्षा में प्रवेश लेने की चिंता।आर्ट साइड ,साइंस साइड के नाम भर सुन रखे थे। पर ज्ञान कुछ भी नहीं था।'किस कालेज में पढ़ना है ? कौन सी साइड लेनी है? कौन -कौन विषय लेने होंगे ? साइकिल चलाना भी नहीं आता, हाई स्कूल में कालेज कैसे जाऊँगा? 'इसी प्रकार की न जाने कितनी उधेड़ बुन सारी रात चलती रहीं।पर कहीं कोई निर्णय नहीं हो सका औऱ सोचते-सोचते सवेरा हो गया। नींद पता नहीं कहाँ चली गई थी।

                 जब होश आया तो यही भाव लेकर उठ बैठा कि अरे!सवेरा भी हो गया? फ़िर जीवन में ऐसी रात कभी नहीं आई ,जब मारे खुशी और भविष्य के प्रति चैतन्य भाव के कारण रात भर नहीं सो सका होऊं। वह दिन मेरी आज तक कि प्रसन्नता का पहला दिन था, अंतिम तो नहीं कहा जा सकता।क्योंकि रात भर नहीं सोने देने वाला वह एक ही दिन था । जो जीवन की एक अमर यादगार बनकर मेरे जेहन में बार -बार दस्तक देता है। बार -बार हर्ष विभोर कर जाता है। 

 💐 शभमस्तु !


 01.09.2020◆11.55पूर्वाह्न। 


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रविवार, 28 जून 2020

मेरी बुरी बाल -आदतें [ संस्मरण]

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 ✍ लेखक© 
👨‍🎓 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम
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      अभी तक मैं विद्यालय में पढ़ने नहीं जाता था। उस समय मेरी अवस्था लगभग 3-4 वर्ष की रही होगी। मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरी अम्मा चूल्हे पर भोजन बनाती थीं।उपले, लकड़ी, अरहर की लौद(फली पत्ती रहित झाड़) आदि से घर पर भोजन बनाया जाता था।होली की आग को एक जलते हुए उपले के माध्यम से प्रति वर्ष पर लाया जाता था और उसी से घर पर गुलरियों की आँगन के बीच रखी हुई होली तथा चूल्हे में आग रखने का श्रीगणेश किया जाता था। यह आग ही प्रतिदिन चूल्हे में आग सुलगाने के काम आती थी। माचिस का प्रयोग बहुत कम किया जाता था।
      सुबह का भोजन बन जाने के बाद माँ बनी हुई राख में एक उपला सुलगाकर गाढ़ देती थी। शाम को उसी को पुनः सुलगाकर खाना बना लिया जाता था।इस प्रकार वर्ष भर होली की उसी आग से भोजन बनता था।यदि कभी ऐसा नहीं हो पाता था , तो माचिस का प्रयोग भी किया जाता था।सब्जी लौकी , कद्दू आदि काटने के लिए घर में हँसिये और चाकू का उपयोग होता था। ये चाकू ,जिन्हें हम चक्कू कहते थे , बड़े उपयोगी होते थे।
      पिताजी घर पर कई चाकू ले आया करते थे। इन चाकुओं के हैंडिल लकड़ी के बने होते थे। आगे की ओर अधिक चौड़ा और पीछे की ओर चाकू का हैंडिल कम चौड़ा होता था। लोहे की धार वाला हिस्सा इसी हैंडिल को बीच में चीर कर एक खाँची में फिट हो जाता था। जरूरत पड़ने पर यहीं से उसे खोला जा सकता था।
          पता नहीं कैसे और कब से मुझे एक बुरी आदत पड़ गई। वह यह कि घर में जैसे ही मेरी नज़र चाकू पर पड़ी , मैं नज़र बचाकर उस चाकू को चूल्हे की उसी आग में गाढ़ देता था , जिसमें माँ कभी -कभी आलू ,शकरकंद , बैंगन आदि भुनने के लिए गाड़ दिया करती थी। बस ये ध्यान रखता था कि कोई देख न ले कि मैं चाकू को चूल्हे में गाड़ रहा हूँ। शाम को जब माँ भोजन बनाने के लिए आग जलाती तो चूल्हे में जले हुए हैंडल का चाकू निकलता । घर में कोई और छोटा बालक तो था नहीं , इसलिए मैं ही दादी बाबा , माता पिता, चाचा का लाड़ला था। सहज ही मेरी हरकत पकड़ में आ जाती। पर इतना अवश्य याद है कि कभी पिटाई नहीं हुई।हाँ, छोटी मोटी डाँट तो पड़ ही जाती थी। लेकिन दो तीन वर्ष तक मेरी यह कुटेब नहीं छूटी।कुछ और बड़ा होने पर मेरा यह 'चाकू जलाओ अभियान' स्वतः बन्द हो गया।क्योंकि अब मैं बड़ा हो गया था। याद नहीं कि उस समय मैंने कितने चाकू चूल्हे की आग में भून डाले। 
 💐 शुभमस्तु !

शुक्रवार, 26 जून 2020

मेरा काव्य लेखन श्रीगणेश [ संस्मरण]


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 ✍ लेखक ©
 🌱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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                  जब मैं तीसरी कक्षा का छात्र था, मेरी अवस्था दस वर्ष की रही होगी।मुझे कविताओं और गीत आदि पढ़ने का बहुत चाव था। उस समय1962 के चीन भारत युद्ध का वीर रस की ओज पूर्ण भाषा में लिखी हुई एक बीस पच्चीस पृष्ठ की आल्हा की पुस्तक मेरे हाथ लगी। जिसे पढ़कर मैं बहुत आनंदित हुआ। पुस्तक किसी को पढ़कर लौटानी थी ,इसलिए आल्हा याद करने के लिए मैंने पूरी पुस्तक एक चौंसठ पृष्ठ की कैपिटल कॉपी में लिख ली। उसे पढ़ता तो बहुत रोमांच होता। आनन्द भी आता। इसी प्रकार जो भी कविता कहीं से मिल जाती ,उसे उतार कर संरक्षित कर लेता। मेरे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पितामह पूज्य स्व.तोताराम जी के जेल के साथी प. भोजदत्त शर्मा ,आगरा की लिखी हुई आल्हा की पुस्तक भी मैंने सहेज रख ली औऱ समय -समय पर उसे पढ़ता। इस प्रकार मेरी पसंद की रचनाओं को संग्रह करने के लिए मेरी 240 पृष्ठ वाली कापियां , जो उस समय चौदह आने की आती थीं, कविताओं से सजने लगीं।
                    यह सिलसिला लगभग एक वर्ष चला होगा कि अनायास मेरे मन में स्वयं कविता का बीज अंकुरित होने लगा और मन के भाव कागज पर रूपाकार देने के लिए मचलने लगे। वर्ष 1963 चल रहा था कि अनायास मेरे द्वारा एक 8-10 पंक्तियों की रचना मेरी कॉपी के एक पृष्ठ पर साकार हो ही गई। महीना और तारीख मुझे याद नहीं हैं । बचपन से ही मुझे अपनी कॉपी , किताब या अन्य कोई वस्तु को सजाकर सँभाल कर रखने की आदत थी। जो धीरे -धीरे मेरा संस्कार बन गई। मेरी यह आदत आज भी उसी तरह से है , जैसे बचपन में थी। यही कारण है कि मेरी उस समय से आज तक लिखी गई सभी रचनाएँ , जिनकी संख्या लगभग 4000 से अधिक होगी; आज भी सुरक्षित हैं।उन्हीं में से अब तक कुछ खंड काव्य एक महाकाव्य और कुछ स्फुट विधा संग्रह सहित दस ग्रंथ प्रकाशित भी हो चुके हैं। 
                     मुझे प्रकृति को देखकर बहुत आनन्द आता था। इसलिए पावस , शरद ,ग्रीष्म ,पेड़ ,पौधों,लताओं, नदियों , सूरज , चाँद , सितारों ,चिड़ियों ,को लेकर अनायास ही लेखनी चलने लगी। किन्तु आश्चर्य की बात है कि मेरी प्रथम काव्य रचना प्रकृति सम्बन्धी नहीं थी, बल्कि वह एक नीतिपरक औऱ उपदेशात्मक रचना थी। मेरी वह प्रथम रचना, जिसका शीर्षक सब्र करो है, इस प्रकार है: 
            सब्र करो 
सब्र   करो     अरु   प्रेम से बोलो,
 दुःख   का   नाम   कभी मत लो।
सत्य   बोलकर  मृषा    मिटाओ, 
कोरी      बातें        त्याग   दो।।
राम  -  राम       का  नाम   रटो,
 अरु   सत्य  वचन पालन कर्ता।
 शंका   न    हृदय   पर रहती है,
सारा     चिंता -     सागर हरता।।
 गाली   के     बदले      में गाली ,
 कभी    किसी     को   मत देना। 
मधुर      मुख    से  मीठा बोलो,
कड़वी      बातें   मत   कहना।।
 अपना    धर्म     हमारा   ही है ,
पाप   निधि       दानव    भावें।
 मानव       का   कर्तव्य एकता ,
प्रेम - भाव    जग   में    छावें।।
 सब्र   करो   अरु प्रेम से बोलो,
 दुःख    का नाम कभी मत लो।
 सत्य   बोलकर  मृषा मिटा दो,
कोरी       बातें   त्याग         दो।।
 रचना काल:1963 ई0
            इस रचना के बाद लिखी गई कुछ प्रमुख रचनाओं के शीर्षक इस प्रकार हैं: हमारा राष्ट्र ध्वज, फिर उमड़ श्याम बादल आए, अक्षर पद्य (मात्रा विहीन रचना), प्रवीण प्रहरी, भारत माता की वंदना, दीप प्रभा, एकता और मानव, कहता वसंत प्रिय पावस से, अकवि रचित अकविता ,वर्षा विहार, वह पावस की रात, हे प्रभु प्रकृति कितनी निरुपम, नव नील अम्बर, भगवान श्रीकृष्ण का विश्वरूप दर्शन(गीता के 11वें अध्याय का काव्यानुवाद), भगवान बुद्ध ,101 विष्णु नाम स्तुति, ऋतुराज करें हम अभिनंदन, हमारा अन्नदाता, प्रगति शल्य (अतुकांत कविता), माँ भारती आदि।
              इस प्रकार माँ सरस्वती के कृपा कर की रश्मियों से सज्जित मेरी काव्य रचना यात्रा का श्रीगणेश हो गया।जो कभी रुकता ,थमता आगे बढ़ता रहा। 1969 से काव्य रचनाएँ ,कहानियां , एकांकी , शोध लेख देश की प्रमुख पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे। मेरा प्रथम शोध लेख राजकीय इंटरमीडिएट कालेज , आगरा की वार्षिक पत्रिका में 1969 में प्रकाशित हुआ।लेख का शीर्षक था: पहिया या वृत्ताकार ।उस समय मैं हाई स्कूल का विज्ञान वर्ग का विद्यार्थी था। तब से प्रकाशन का सिलसिला निरन्तर चलता रहा। ईश्वर ने मुझे जिस कार्य के लिए संसार में भेजा है , उसे निष्ठापूर्वक करना अपना नैतिक दायित्व मानता हूँ। शायद इसी के द्वारा मानवता का हित मेरे द्वारा हो सके , तो मैं अपने मानव जीवन को सार्थक समझूँगा।
 💐 शुभमस्तु! 

पिताजी की निशानेबाजी [ संस्मरण ]


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✍लेखक ©
 🔫 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम
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यह बात उस समय की है , जब मेरी अवस्था लगभग आठ - नौ वर्ष की  रही होगी।प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को पिताजी को क्षेत्र के अन्य बंदूकधारियों की तरह छलेसर के जंगल में स्थित 'समर हाउस' में निशानेबाजी के लिए आमंत्रित किया जाता था। जब मैं  बहुत छोटा था ,तब वह अकेले ही साइकिल से जाते थे। इस बार मुझे भी साइकिल के डंडे पर बिठाकर वह 'समर हाउस' पहुँचे।
           करवन नदी या झरना में उस समय खूब सारा स्वच्छ पानी होता था। घर से लगभग तीन किलोमीटर चलने के बाद एक झरना था, कभी कभी  जिसमें नहाने के लिए हम बच्चे लोग जाया करते थे। झरने के ऊपर एक पुल भी बना हुआ था। उसी पुल को जंगल के रास्ते से गुजरने बाद 'समर हाउस' बना हुआ था, जो प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर एक रमणीक स्थल था। जिसमें अनेक प्रकार के सुगंधित फूल वाले पौधे उगाए जाते थे। वैसा ही सुंदर हाउस बना हुआ था, जिसमें कुछ स्तम्भों पर एक गोलाकार छत पड़ी हुई थी। नीचे का फर्श पक्का और सुंदर था। समर हाउस के चारों ओर सुंदर बगीचा था। इस हाउस में वन विभाग के रेंजर आदि अधिकारी भी रहते थे। 
                 लगभग 10-15 बंदूकधारियों को उस गोल समर हाउस में पड़ी हुई गोल मेज के चारों ओर बैठा दिया गया। मैं पिताजी के पास एक कुर्सी पर बैठा यह खेल देख रहा था। सामने लगभग एक फर्लांग की दूरी पर मिट्टी की लाल मटकियाँ बाँसों पर टाँग दी गई थीं। प्रत्येक व्यक्ति को एक निर्धारित मटकी में निशाना लगाना होता था । मैंने देखा कि जब पिताजी की बारी आई तो धायं की आवाज हुई और लक्ष्य मटकी के टुकड़े -टुकड़े हो गए। तालियां बजीं। शाबाश !वाह!वाह !! की ध्वनियां हुईं।     निशाने बाजी पूरी होने के बाद फलों का नाश्ता भी कराया गया। साथ ही जिसे मैं उस समय नहींजानता था कि ये क्या है , उन्हें भी पिलाया गया।मुझे नहीं दिया गया। वह सफेद और गाढ़ा - गाढ़ा पेय पदार्थ लस्सी थी , जिसमें भाँग भी पड़ी हुई थी, दिया गया। पार्टी होने के बाद सभी लोग ससम्मान विदा कर दिए गए।
           पिताजी औऱ मैं घर की ओर लौटने लगे कि घर से पचास कदम ही पहले पहुँचे होंगे, पिताजी ने दगरे की मेंड़ पर अपना बायां पैर टेका ही था कि यह क्या ? फिर उनसे एक पैडल भी साइकिल आगे नहीं बढ़ सकी। मैं डंडे से नीचे आया और घर पर बाबा दादी और माँ को सूचना दी, तब वे उन्हें वहाँ से साइकिल से उतार कर लाए। उन्हें भाँग का नशा हो गया था। उनका वह नशा अगले दिन सुबह को उतर सका। पिताजी घर पर कभी भाँग का सेवन नहीं करते थे , संभवतः इसीलिए वे समर हाउस से घर तक सकुशल पहुँच तो गए , लेकिन जब पैर रुक गया तो एक इंच भी साइकिल को बढ़ाना असम्भव हो गया। ये भी जीवन का एक अनुभव है , जब पिताजी को भाँग का नशा हुआ। यह वाक्या 1962 के आसपास का है। 
 💐 शुभमस्तु! 
 26.06.2020 ◆12.55 अपराह्न। 

शुक्रवार, 24 मई 2019

मेरा एम. ए. में प्रवेश [संस्मरण ]

   वर्ष 1973 में बी .एस सी. उत्तीर्ण करने के बाद मेरी इच्छा थी कि अपने प्रिय विषय वनस्पति -विज्ञान में एम.एस सी. करने के बजाय हिन्दी विषय के साथ एम.ए. करूँ। प्रवेश हेतु सिफारिश के लिए मैंने अपने पूज्य चाचा जी डॉ. सी.एल. राजपूत; जो उस समय आगरा कालेज आगरा में मनोविज्ञान विषय के प्रोफ़ेसर थे, से कहा कि मैं हिंदी में एम.ए. करना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि ठीक है, कल चलते हैं।
   अगले दिन मैं चाचाजी के साथ आगरा कालेज के हिंदी विभाग में पहुँचा।हिंदी के किसी भी प्रोफ़ेसर से मेरा कोई परिचय नहीं था, क्योंकि  मैं विज्ञान स्नातक था। उस समय आगरा कॉलेज में हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ.भगवत स्वरूप मिश्र जी थे। उनसे जब चाचाजी ने इस सम्बन्ध में बताया कि यह मेरा भतीजा है औऱ इसी वर्ष इसी कॉलेज से बी.एस सी. किया है। इसका आपके यहाँ प्रवेश होना है। इस पर उन्होंने स्पष्ट शब्दों में इनकार करते हुए कहा कि बेटे अभी तक तो इस कॉलेज में विज्ञान के किसी भी छात्र का प्रवेश नहीं हुआ है ।ऐसा कोई नियम भी नहीं है कि विज्ञान से स्नातक
का हिंदी में प्रवेश किया जाए। मैं चाचाजी के साथ निराश भाव मन में लिए हुए अपने 15 किलोमीटर दूर गाँव वापस आ गया।
   अगले दिन चाचाजी डॉ. भगवत स्वरूप मिश्र जी के शिष्य और उन्हीं के निर्देशन में पी.एच. डी.कर रहे प्रो. खुशीराम शर्मा जी से  हिंदी विभाग के हॉल में बने हुए चेम्बर में मिले। मैं भी साथ में था। चाचा जी ने वही बात उन्हें बताई तो उन्होंने भी वही बात दुहराई कि बी. एस. सी. वालों का एम .ए. हिंदी में प्रवेश नहीं होता। यही नियम है और परम्परा भी। फिर भी डॉ. खुशीराम शर्मा जी ने मुझसे एक सवाल किया कि बताओ बेटे कैसे करें तुम्हारा प्रवेश। इस पर मैंने कहा -सर मेरी बहुत इच्छा है कि एम. ए. हिंदी में करूँ। यदि हो सके तो देख लीजिए। इस पर वह बोले -किस आधार पर? तो मैंने उन्हें बताया कि मैं लिखता हूँ। वह बोले -क्या लिखते हो ?और कब से लिख रहे हो ?मैंने कहा - कविता, कहानी , लेख  वगैरह लिखता हूँ और जब चौथी क्लास में  पढ़ता था ,तब से लिख रहा हूँ। वह कहने लगे -ठीक है। कल मुझे विभाग में आकर दिखाओ।
   अगले दिन बड़े ही  उत्साह में मैने 160 पेज की दो मोटी-मोटी कापियां ,जो उस समय चौदह आने की आती थी; उनके सामने सुबह 10 बजे ही ले जाकर प्रस्तुत कर दी। उन्होंने उन्हें उल्टा -पलटा कुछ पढ़ा औऱ चेहरे पर प्रसन्नता लाए हुए बोले -जाओ , हो गया तुम्हारा प्रवेश। फार्म ले जाओ और ऑफिस के काउंटर पर फ़ीस जमा कर देना। मैं बहुत खुश। मुझे मेरी  इच्छित मुराद मिल गई थी और मेरे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे।

💐 शुभमस्तु !
✍ लेखक ©
डॉ. भगवत स्वरूप  'शुभम'

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

और फिरंगी को भागते ही बना [संस्मरण ]

   देश की आज़ादी के लिए देशभक्त महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेज़ी शासन औऱ प्रशासन का विरोध उग्र रूप से कर रहे थे। उस आंदोलन में मेरे पूज्य पितामह (बाबा) स्व.तोताराम निवासी : ग्राम-पुरा लोधी, थाना :खंदौली, तहसील :एत्मादपुर, आगराभी पूर्ण रूप से सक्रिय थे। वे 1932 और 1942 में अनेक बार सत्याग्रह आंदोलन के कारण जेलयात्रा भी कर चुके थे।
   उसी समय की एक घटना मेरी पूजनीया दादी श्रीमती जानकी देवी मुझे सुनाया करती थीं। वे बताती थीं कि एक बार एक अंग्रेज़ अधिकारी  हेट शूट धारी घोड़े पर सवार, बड़ा ही तेज तर्रार, गाँव पुरा लोधी में आया और हमारी ही चौपाल पर खड़े एक नीम के पेड़ पर  अंग्रेज़ी सरकार का झंडा लगाने की कोशिश करने लगा। तभी गाँव की महिलाओं  को पता चला। मेरे बाबा तथा गांव  के ही पाँच अन्य स्वाधीनता सेनानी गांव से बाहर रहकर अंग्रेज़ी प्रशासन के विरुद्ध गतिविधियों में संलग्न थे। घर वालों को भी ये पता नहीं होता था कि कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं। कभी जेल से बाहर तो कभी अंदर। बस यही सब चल रहा था। एक बार बरहन - हाट लूट कांड  के आरोप  में पूरे गाँव पर सामूहिक जुर्माना भी लगाया गया था। फिर क्या था, महिलाएं एकत्र हो गईं और मेरी दादी के नेतृत्व में उन्होंने उसे पकड़ लिया और जबरन लहँगा- चुनरी, चूड़ियाँ पहनाकर उसके हेट को उतार लिया औऱ दूध औटाने वाली हँड़िया को उसके सिर पर औंधा लटका दिया । फिर तो उस फिरंगी ऑफिसर को उल्टे पैर भागते ही बना । इसके साथ ही दादी के साथ की महिलाओं के समूह ने गांव के ही छोटे - लड़कों के सहयोग से तिरंगा।झंडा उसी नीम के पेड़ पर फहरा दिया।

वंदे मातरम!
जय हिंद !!
जय भारत!!!

💐 शुभमस्तु !
✍लेखक ©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

बाबा नागार्जुन जी से भेंट [ संस्मरण ]

   वर्ष 1976 की बात है। उस समय मैं अपने गुरुजी परम् पूज्य डॉ. राजकिशोर सिंह जी (प्रोफेसर आगरा कालेज,  पश्चात प्राचार्य के आर कालेज , मथुरा , तदुपरांत सदस्य लोक सेवा आयोग उ.प्र.) के निर्देशन में सनुसन्धितसु था। साथ ही उच्च शिक्षा में शिक्षक बनने के लिए साक्षात्कारों में भी जा रहा था। एक साक्षात्कार में दिल्ली के एक मित्र से नया परिचय हुआ। उनकी बाबा नागार्जुन जी से अच्छी जानकारी थी। उनके आमंत्रण और उनसे मिलवाने के वादे के अनुसार मैं पहली बार ही  दिल्ली गया और उन्ही मित्र महोदय के यहाँ ठहरा।
   प्रातःकाल वे मुझे बाबा नागार्जुन जी से मिलवाने के लिए उनके आवास पर ले गए। जब बाबा को मैने पहली बार देखा तो प्रथम दृष्टि में ही उनसे प्रभावित हो गया। मैने उनके चरण स्पर्श किए और परिचय दिया।वे बहुत सौम्यता और  गौरव से मिले। उनके खिचड़ी बाल , सिर के बाल बढ़े हुए, खद्दर का कुर्ता , खद्दर का ही पाजामा, पैरों में चप्पल। बहुत ही सादगी और मिलनसारिता पूर्ण लगा उनसे मिलना। लगा ही नहीं कि मैं उनसे पहली बार मिल रहा हूँ। मेरे स्वागत में वे बूंदी के लड्डू लेकर आए। औऱ बड़े ही स्नेह से उन्होंने एक लड्डू प्लेट से उठाकर मुझे खिलाने लगे तो मैं उनके स्नेह से अभिभूत हो गया।
   फिर उन्होंने आने का उद्देश्य पूछा। मैने बताया कि बाबा आपके समस्त उपन्यास साहित्य पर शोध कर रहा हूँ। तो  उन्होंने कहा कि मैं इसमें क्या मदद कर सकता हूँ? मैंने कहा बाबा आपके दर्शन की प्रबल इच्छा से ही आपके पास आया हूँ। ये मेरे मित्र हैं , जिनकी कृपा से आपसे मिल पा रहा हूँ। आपके उन्यास साहित्य कद संबंध में कुछ जानकारी भी कर लूँगा। उन्होंने पूछा कि टॉपिक क्या है? मैंने बताया - "नागार्जुन के उपन्यासों में आँचलिक तत्त्व " मेरे शोध का विषय है बाबा। तब वेद बोले कि पूछो। उसके बाद लगभग आधा घंटे तक उनके उपन्यास लेखन पर कई प्रकार के प्रश्नों के समाधन लिया। बाबा की सादगी, विनम्रता , विद्वत्ता और आत्मीयता ने मुझे अंदर तक अभिभूत कर दिया।
   बाबा जी ने कुछ कविताएँ भी सुनाईं , जो उन्होंने उनके पास आई हुई चिट्ठियों के लिफाफों को खोलकर  लिखी  हुई थीं। वे कागज के एक टुकड़े को भी  व्यर्थ नहीं फेंकते थे। तमाम कविताओं  को छोटे -छोटे कागज़ के टुकड़ों पर लिखा देखा तो मुझे मितव्ययता का  सबक सीखने को मिला,कि किस प्रकार एक बेकार चीज़ को भी काम में लेकर उसकी उपादेयता  बढ़ाई जा सकती है। ऐसी महान  विभूति को मैं शृद्धापूर्वक बार-बार नमन करता हूँ। बाबा एक दिव्य विभूति औऱ देश के महान साहित्यकार थे। मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक बाबा नागार्जुन का व्यक्तित्व निश्चय ही प्रातः स्मरणीय है।

💐शुभमस्तु !
✍🏼 लेखक ©
 🍃 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...