रविवार, 4 जून 2023

वाङ्गमुख



शिक्षाप्रद कहानियों,पंचतंत्र, कथा सरित्सागर,विभिन्न उपदेशकों,गाथाओं,महाकाव्यों आदि के माध्यम से ज्ञान की अनेक जन हितकारी बातें  मनुष्य समाज के समक्ष आईं और इतिहास की सामग्री बन कर रह गईं।अंततः जो कुछ भी वर्तमान में होता है अथवा हो रहा है तथा भविष्य में जो भी होगा; उसे भी एक न एक दिन इतिहास में ही बदल जाना है।अनेक सरल सुबोध विधाओं और वक्रोक्तियों ने उसे समझाने की युक्तियाँ उसके समक्ष परोसीं ; किंतु क्या सीधे - सीधे उसने उन्हें अपनी स्वीकृति प्रदान की? जहाँ तक मैं समझता हूँ, गंगा नदी में हजारों लाखों वर्षों से न जाने कितना जल बहकर सागर में मिल गया, किंतु मानव मन की थाह आज तक  बड़े - बड़े ऋषि मुनि, उपदेशक,साधु - संत भी नहीं ले सके।

व्यंग्य विधा की अपनी तीसरी और अन्य विधाओं में अद्यतन प्रकाशित समस्त कृतियों में  'शुभम्'व्यंग्य वाग्मिता उन्नीसवीं कृति है। अपनी अन्य व्यंग्य रचनाओं की तरह इस कृति में भी मानव मन, मानव समाज, मानवीय संस्कृति और सभ्यता गत विडम्बनाओं का संक्षिप्त निरूपण अपनी एक विशेष  भाषा शैली के माध्यम से करने का प्रयास किया गया है।जो बात सीधे-सीधे वाङ्गमुख शिक्षाप्रद कहानियों,पंचतंत्र, कथा सरित्सागर,विभिन्न उपदेशकों,गाथाओं,महाकाव्यों आदि के माध्यम से ज्ञान की अनेक जन हितकारी बातें मनुष्य समाज के समक्ष आईं और इतिहास की सामग्री बन कर रह गईं।अंततः जो कुछ भी वर्तमान में होता है अथवा हो रहा है तथा भविष्य में जो भी होगा; उसे भी एक न एक दिन इतिहास में ही बदल जाना है।अनेक सरल सुबोध विधाओं और वक्रोक्तियों ने उसे समझाने की युक्तियाँ उसके समक्ष परोसीं ; किंतु क्या सीधे - सीधे उसने उन्हें अपनी स्वीकृति प्रदान की? जहाँ तक मैं समझता हूँ, गंगा नदी में हजारों लाखों वर्षों से न जाने कितना जल बहकर सागर में मिल गया, किंतु मानव मन की थाह आज तक बड़े - बड़े ऋषि मुनि, उपदेशक,साधु - संत भी नहीं ले सके। व्यंग्य विधा की अपनी तीसरी और अन्य विधाओं में अद्यतन प्रकाशित समस्त कृतियों में 'शुभम्'व्यंग्य वाग्मिता उन्नीसवीं कृति है। अपनी अन्य व्यंग्य रचनाओं की तरह इस कृति में भी मानव मन, मानव समाज, मानवीय संस्कृति और सभ्यता गत विडम्बनाओं का संक्षिप्त निरूपण अपनी एक विशेष भाषा शैली के माध्यम से करने का प्रयास किया गया है।जो बात सीधे-सीधे कहने में व्यक्ति के मन और चेतना पर उतनी प्रभावी नहीं होती,जितनी एक व्यंग्य के माध्यम से हो सकती है। यह मेरा मानना है। व्यंग्य के माध्यम से व्यंग्यकार अपने गुदगुदाने वाले आक्रोश के द्वारा भ्रष्ट व्यक्ति, समाज, व्यवस्था,अनाचार,अनीति, विसंगतियों आदि की विविध विडम्बनाओं पर करारा प्रहार करने का प्रयास करता है।उसके द्वारा विद्रूपित समाज का ऐसा बिम्ब प्रस्तुत किया जाता है कि जिससे वह अपने सर्वांग से झकझोर दिया जाता है।

 व्यंग्य वस्तुतः वर्तमान और विगत शताब्दी की एक ऐसी जीवंत विधा है , जो सबके चेहरे उघाड़ डालने में सक्षम है।लोकोत्तर चमत्कार उत्पन्न करने के लिए व्यंग्य एक वक्रोत्यात्मक रोचक विधा है।जो अपनी काव्यात्मक कला से समाज को झकझोरती है,वहीं दूसरी ओर उसका मनोरंजन करती हुई सत्य कक स्वीकार करने के लिए बाध्य भी कर देती है।व्यंग्यकार के द्वारा एक ऐसी चेतना शक्ति का प्रादुर्भाव किया जाता है जिसमें उसके मानवीय मूल्य निहित होते हैं।सहित्य में जो रसात्मकता व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से उत्पन्न की जाती है,वह अन्य विधाओं के माध्यम से नहीं की जाती।

 व्यंग्य रचना में हास्य और व्यंग्य का मिला जुला पुट उसे जीवंतता तो प्रदान करता ही है, साथ ही वह आलोचनात्मक ,प्रतिक्रियात्मक और रसात्मक भी होता है। व्यंग्य में हास्य का उपयोग उपहास और कटाक्ष के लिए किया जाता है। इसके विपरीत हास्य में उसका विशुद्ध प्रयोग मात्र हँसने-हँसाने के लिए ही किया जाता है। हास्य प्रतिक्रियात्मक और आलोचनात्मक नहीं होता।व्यंग्य अपनी व्यंजना शक्ति से पाठक और श्रोता को उसकी यथार्थता से अवगत कराने में सक्षम होता है।उसको सचाई से सजग करता है।वह मानव जीवन की समस्याओं के मूलभूत कारण को समझाता है।इतना ही नहीं व्यंग्य के माध्यम से समस्याओं का निदान भी किया जाता है।इससे मानव-जीवन की त्रुटियों औऱ जीवन और समाज विरोधी अवधारणाओं का निराकरण भी किया जाता है। 

  इस कृतिकार के द्वारा इस 'शुभम् व्यंग्य वाग्मिता शीर्षकस्थ कृति में जिन व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से व्यक्ति, समाज, व्यवस्थाओं और सार्वदेशिक विसंगतियों को निरूपित किया गया है,उनमें व्यंजनात्मकता के साथ -साथ विनोदात्मकता का सम्पुट भी है। व्यंग्य अपनी दोहरी शक्ति से दोधारी तलवार की तरह प्रहार करते हुए शनैः - शनैः गुदगुदा भी रहा है। इस व्यंग्य कृति का कृतिकार जहाँ एक गद्यकार है ; वहीं वह एक कवि भी है। कवि। की काव्य - चेतना से उसकी समस्त रचनाओं में एक नवीन चेतना औऱ जीवंतता का संचार हुआ है। जहाँ अन्य व्यंग्यकार अपनी व्यंग्य रचनाओं में मात्र गद्य का ही आश्रय लेते हैं ,वहीं इस कृतिकार ने काव्य के रस रसांगों से भी समाविष्ट किया है।इस प्रकार इन समस्त रचनाओं में काव्यात्मक विनोद उन्हें प्राणवंत बना रहा है।इन व्यंग्य रचनाओं में कोरे हास्य की सृष्टि के लिए काव्यात्मक रसमयता का संचार नहीं किया गया है।

  सहित्य की विविध गद्य और पद्य विधाओं में व्यंग्य विधा का महत्त्वपूर्ण स्थान है।व्यंग्य व्यंग्यकार की वैचारिक स्वाधीनता का प्रतीक है। वैचारिक स्वाधीनता के दुरुपयोग से सर्वत्र बचा गया है। सहित्य समाज का दर्पण है,इसलिए उसमें ऐसी किसी बात के लिए लेशमात्र भी स्थान नहीं है ,जो व्यक्ति, देश और समाज के लिए घातक हो।विनोद औऱ काव्यत्व से व्यंग्य की कटुता को न्यूनतम करने का प्रयास किया गया है।व्यंग्य रचना में विनोद का पुट उसके कटु प्रभाव को न्यूनतम करता है। बिना व्यंग्य का हास्य -विनोद तो हो सकता है ,किन्तु विनोद शून्य व्यंग्य लवणरहित शिकंजी की तरह अलोना ही है ।

 मेरे द्वारा प्रणीत 'शुभम व्यंग्य वाग्मिता कृति में कुछ वैचारिक लेखों, कहानियों और संस्मरणों को भी उचित स्थान दिया गया है। इस कृति के अंतर्गत जो कुछ निवेदन किया गया है,इसकी सत्यता की कसौटी हमारे गुणग्राहक सहित्य मर्मज्ञ मनीषी हैं। मुझे विश्वास है कि वे इस शब्दकार की लेखनी को अपने शुभाशीष से अनुग्रहीत करेंगे। 

 मैं अपने कवि शिष्य श्री कौशल महंत 'कौशल' (छत्तीसगढ) का हृदय से आभारी हूँ कि उन्होंने स्वयं और अपने सुपुत्र श्री योगेश महंत जी के कठिन परिश्रम के परिणाम स्वरूप उसे संसार के समक्ष प्रकाशवान बनाने में अपनी अहं भूमिका का निर्वाह किया है।पुस्तक के मुखावरण निर्माण में अपने सुपुत्र श्री भारत स्वरूप राजपूत औऱ सुपुत्री सुश्री जयप्रभा की भूमिका को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। माँ सरस्वती को पुनः -पुनः नमन करते हुए अपनी यह उन्नीसवीं कृति आप सभी सुधी पाठकों के कर कमलों में सौंपते हुए हृदय में अत्यधिक हर्षानुभूति होना स्वाभाविक है।


 स्वाधीनता दिवस                                                                  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 15 अगस्त 2023                                                                    सिरसागंज(फ़िरोज़ाबाद) 

 संवत2080 विक्रमी                                                                       पिन :283 151

     

शनिवार, 3 जून 2023

खरबूजा खाँस रहा है!● [ व्यंग्य ]

 237/2023


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 ●व्यंग्यकार © 

 ● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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      स्वजातीय को देखकर रंग बदलने की परम्परा अत्यंत प्राचीन है।इस मामले में खरबूजा और आदमी परस्पर प्रतियोगी की भूमिका में दिखाई देते हैं।यह बता पाना इतना सहज और सरल नहीं है कि पहले कौन? खरबूजा या आदमी? बहरहाल इतना तो सुनिश्चित है कि इन दोनों में कोई भी किसी से पीछे नहीं है। 

        रंग बदलने का सीधा- सा अर्थ है कि अपना रंग बदलने वाला अपने सहज स्वरूप और प्रकृति से भिन्न अपना आकार प्रकार और रंग -रूप बदल लेता है। यों तो रंग बदलने के मामले में गिरगिट का कोई सानी नहीं है। वह भी समय - समय पर अपना रंग बदल लेने के लिए प्रसिद्ध है।लेकिन इस आदमी ने तो बेचारे गिरगिट को भी पीछे छोड़ दिया है।यों तो प्रकृति में मेढक, सर्प तथा कुछ अन्य कीट -पतंगे भी इस रंग -बदल कला के विशेषज्ञ हैं।उन्हें आत्म-रक्षार्थ या किसी परिस्थिति विशेष में रंग बदलना ही पड़ जाता है।इसके विपरीत ये आदमी नामधारी जंतु तो अकारण सकारण भी रंग बदलते हुए देखा जाता है। 

 यों तो रंग बदलना एक कला है।जो हर एक व्यक्ति के लिए संभव भी नहीं है।किसी को धोखा देना हो ,तो अपनी वास्तविक पहचान छिपाने के लिए रंग बदलना भी अनिवार्य हो जाता है।रावण ने सीता का अपहरण करने के लिए रंग बदला था इस बात से कौन भिज्ञ नहीं है!मारीच मामा ने सीता को मृग मरीचिका दिखाने के लिए स्वर्ण मृग का सुंदर रूप धारण किया।चन्द्रमा ने गौतम ऋषि की पत्नी को छलने के लिए स्वयं गौतम शरीर में परिवर्तन कर लिया और वह गौतम वेषधारी छलिया चंद्रमा को नहीं पहचान सकी।इसी प्रकार मछुआरे की बेटी मत्स्यगंधा सत्यवती को ठगने के लिए ऋषि पराशर ने अपना रंग जाल फैलाया ,जो महर्षि वेदव्यास के रूप में रंग लाया,यह भी जगत प्रसिद्ध है।

    रंग बदलने के इन प्राचीन उदाहरणों से इतना तो स्प्ष्ट हो ही जाता है कि ठगाई, छल, धोखा और छद्म के लिए रंग बदलना एक अनिवार्य कर्म है। सुना है कि प्राचीन काल में राजाओं के अनेक जासूस रंग बदलकर जासूसी किया करते थे ।देवकीनंदन खत्री का छः खंडों में विभाजित प्रथम हिंदी उपन्यास 'चंद्रकांता संतति ' रंग - बदल जासूसी और तिलस्म के कारनामों से भरा पड़ा हुआ है। पहले के कुछ श्रेष्ठ राजा गण वेश बदलकर अपनी प्रजा का हाल- चाल लिया करते थे औऱ असहायों और दीन - दुखियों की सहायता भी किया करते थे। आज भी इसका प्रभाव वर्तमानकाल के नेताओं पर देखा जा सकता है ,जो जनता का दुःख-सुख जानने के लिए नहीं, वरन उसका शोषण करने के लिए बगबगे(बगले जैसे)वेश धारण करने लगे।

  यदि गहराई के साथ अध्ययन किया जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि रंग बदलने की कला मुख्य रूप से किसी अन्य को छलने,ठगने, शोषण करने और अपना उल्लू सीधा करने के काम आने वाली प्रमुख कला है।आज के युग में क्या शिक्षा,क्या व्यवसाय क्या धर्म और क्या राजनीति ; देश और समाज का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है ,जहाँ इसका विस्तार न हुआ हो।शिक्षा जैसा पवित्र कार्य भी इसी रंग-बदल कला के कारण धंधा बनकर रह गया है।कमाई का कोरों का खजाना बन गया है ,जहाँ मात्र शिक्षा को छोड़कर किताबें, कॉपी, पेंसिल, पैन, पूरी स्टेशनरी, यहाँ तक कि जूते ,कपड़े ,ड्रेस आदि सब कुछ एक ही छत के नीचे मिल जाता है।यदि नहीं है तो वहाँ मात्र शिक्षा नहीं है। 

  यदि व्यवसाय की बात की जाए तो वहाँ भी रंग-बदल का रंग-बिरंगा बाजार सुनामी में डूबा हुआ है और उपभोक्ता की जेब काटने के हजारों कारनामे करता हुआ आकंठ निमग्न है ।मात्र व्यवसाय ही रंग- बदल का इतना बड़ा क्षेत्र है कि इस विषय पर पृथक रूप से शोध ग्रंथ लिखे जाने की आवश्यकता है।राजनीति का तो रंग - बदल का खुला खेल है। कहीं कोई पर्दा नहीं। राजनीति के तंबू के नीचे धर्म, शिक्षा, समाज सेवा, व्यवसाय आदि सभी की फसलें भरपूर उपज दे रही हैं।धर्म की रंग - बदल कला की ओट में आशाराम बापुओं, राम रहीमों और न जाने कितने रंगे हुए सियारों के आश्रम फल -फूल रहे हैं।

 देश का धार्मिक नहीं धर्मांध मनुष्य स्वयं आ बैल मुझे मार की कहावत को सार्थक करता हुआ दिखाई दे रहा है। इतना सब देखने - सुनने के बाद बेचारा खरबूजा क्या मुकाबला करेगा इस बहु रंगिया आदमी से ;जो दसों दिशाओं में अपने रंग-रंग के परचम लहरा रहा है। वह तो बेचारा व्यर्थ ही रंग बदलने के लिए बदनाम हो गया। बद अच्छा बदनाम बुरा।इस आदमी ने तो रंग बदलने में गिरगिट, मेढक, साँप के साथ -साथ बेचारे खरबूजे को भी खेत में ही छोड़ दिया।बद अच्छा हो गया, औऱ बदनाम होने के लिए खरबूजा खेत में खाम खाँ खाँसता रह गया। 


 ●शुभमस्तु!


 03.06.2023◆4.30आ०मा०

सहयात्री ● [अतुकान्तिका ]

 236/2023

     

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पथ के सहयात्री

सभी एक -से 

नहीं होते,

कुछ अच्छे,

कुछ नहीं,

कुछ मरुस्थल जैसे

तप्त करते हुए,

कुछ तटस्थ

जैसे हों ही नहीं,

कुछ अमराई जैसे

छायादार,

करते हुए उपकार।


आदमी के प्रकार

जैसे खरबूजे की बहार,

क्या पता कौन

क्या निकल जाए!

कोई सहचार से

आजीवन विस्मृत 

नहीं हो पाए!

और कोई 

बबूल के शल्यवत

चुभ -चुभ जाए।


आवश्यक नहीं

नर देह में,

मानव ही हो,

कसे से सोना

और बसे से इंसान

पहचाना जाता है,

ज्यों आदमी 

आदमी के

 निकट आता है,

अपनी सुगंध

किंवा दुर्गंध से

प्रभावित कर जाता है।


आदमी की

 खाल के नीचे,

समझ मत लेना

यह आँखें मींचे,

कि वह 

आदमी ही होगा,

पता तभी लगना है

जब उसका उतरेगा

अपना  बाहरी चोगा,

अन्यथा छद्म ही होगा।


आओ 'शुभम्'

हम आदमी को जानें,

उसके स्वार्थ से

उसे पहचानें,

अपने को परहितार्थ

मानव - देह में

मानव तो बना लें,

स्वार्थों को परे रख 

प्रेम और सद्भाव से

सबको रिझा लें।


● शुभमस्तु !


02.06.2023◆6.00आ०मा०

गुरुवार, 1 जून 2023

दीवारों के कान! ● [ बाल कविता ]

 235/2023

 

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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दीवारों   के   कान  कहाँ  हैं।

बतलाएँ वे   लगे  जहाँ   हैं??


बहुत सुनी   है   हमने   चर्चा।

भले  किसी को लगती मिर्चा।


कहते  सब    दीवारें   सुनतीं।

गल्प -कथाएँ भी वे   बुनतीं।।


मन में जागी    है   जिज्ञासा।

लेतीं  क्या    दीवारें   श्वासा।।


कान न   दीवारों   के    देखे।

क्यों कपोल सजते अभिलेखे


गुपचुप घुसर-पुसर की बातें।

करतीं कान-कान मुख घातें।।


दीवारों   के   नाम    लगाते।

इधर-उधर  चर्चा   टरकाते।।


अपना  दोष  और पर डालें।

दीवारों पर चाड़  निकालें।।


झूठी  बात कान की करते।

कानों  में  घुस बातें भरते।।


लिए  कहावत   झूठ कहानी।

पड़ी 'शुभम्' को सत्य बतानी।।


●शुभमस्तु !


01.06.2023◆2.00प०मा०

कवि कहलाओगे ● [अगीत ]

 234/2023

    

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कुछ  भी लिख,

कैसा भी लिख,

तुकांत या अतुकांत,

भाव उद्भ्रांत,

कवि कहलाओगे।


वर्तनी न छंद,

धी-पात्र  बंद,

भले    निर्बंध,

कैसी भी गंध,

कवि कहलाओगे।


अपनी   ही   ठान,

किसी की न मान,

बंद  आँख   कान,

छेड़  भिन्न   तान,

कवि कहलाओगे।


कोई  कहे पद्य,

कोई  कहे गद्य,

सामिष हो मद्य,

रहेगा   अबध्य,

कवि कहलाओगे।


कवियों की बारात,

समझे   नहीं  बात,

शब्दों के   आघात,

समीक्षक    थर्रात,

कवि कहलाओगे।


भूल जा कबीर,

खुली   तकदीर,

तुलसी न   सूर,

अपने   में   चूर,

कवि कहलाओगे।


मात्रा    न   वर्ण,

तीरंदाज    कर्ण,

कोयलों में स्वर्ण,

बढ़ा   तो   चरण,

कवि कहलाओगे।


उलटी   है  चाल,

शारदा    बेहाल,

केशव   निढाल,

तेरी बस   ताल,

कवि कहलाओगे।


कुछ भी लिख डाल,

करेगा         कमाल,

तू     ही    बेमिसाल,

हो एक  शब्द- जाल,

कवि    कहलाओगे।


बने  स्वयँ  कविराय,

 ये  कुंडलिया भाय,

अहं    के    स्वभाव,

देते मुच्छ निज ताव,

कवि    कहलाओगे।


'शुभम्' हँसे   या रोए,

देख      दृश्य    खोए,

कैसे बीज आज बोए,

रसहीन  ऊख   छोए,

कवि कहलाओगे।


●शुभमस्तु !


01.06.2023◆ 1.00प०मा०


सोमवार, 29 मई 2023

बरस रही जलधार ● [ गीतिका ]

 233/2023

 

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बरसे    काले  मेघ , मास सावन   आया।

छिपा  जलद  में वेघ,धरा खोले   काया।।


चले पवन पुरजोर,सनन-सन- सन करता,

खोल  धरणि  पर  बाँह,गगन मानो छाया।


सभी   चाहते  नीर,  प्यास से जो     मरते,

देखे   काले   मेघ,  दृश्य  सबको    भाया।


अमराई    में  कूक,  गा रहे पिक    प्यारे,

मोर  नहीं  हैं   मूक,  नृत्य करता   गाया।


बरस  रही    जलधार ,नीड़ में कीर   छिपे,

गाते  भेक  मल्हार,   कृषक दल   हर्षाया।


बालक  नंग-धड़ंग,कर रहे जल -  क्रीड़ा,

यहीं   अर्कजा   गंग,  नहा हर्षण    पाया।


काले   घन के बीच,चमकती है  बिजली,

बहती   काली   कीच,पावसी है    माया।


हरे -  भरे    तरु  कुंज, लताएँ झूम   रहीं,

दृश्य  हरित  है  मंजु, नई छवि सरमाया।


रहें   न   काले    मेघ,  देश के अंबर    में,

बढ़े  प्रगति  का  वेग, सुखी हों नर-जाया।


'शुभम्'  करें   कर्तव्य,  सभी अपने- अपने,

जीवन   हो तब  भव्य,सुखी हों   हमसाया।


●शुभमस्तु !


29.05.2023◆10.30 आ०मा०


देखा नहीं मुहूर्त ● [ गीतिका ]

 232/2023

 

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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देखा नहीं  मुहूर्त, ब्याह यों ही कर   डाला।

कैसा   ज्ञानी  धूर्त, डालते  टूटी    माला।।


करता  नहीं  विमर्श, थोपता अपना  निर्णय,

कैसे  हो   उत्कर्ष, घोलता विष  का प्याला। 


नहीं लिंग का ज्ञान,पुरुष को नारी   कहता,

गंगाजल  में  डाल, रहा  है घातक   हाला।


द्वार  बुद्धि  के  बंद,बजाता अपनी  ढपली,

दबा  धरा में  कंद, गली का बहता   नाला।


अहंकार साक्षात, रूप धारण जब   करता,

सुने न  कोई  बात,  लगा है धी पर   ताला।


अधजल गगरी छलक,छलक जाती है बाहर,

भरी न होती किलक,न दिखता नीर निवाला


सबका मालिक एक, मात्र मुझको  पहचानें,

मुझमें मात्र विवेक,शेष सब गरम  मसाला।


सबका  है  इतिहास,  बुरा अच्छा या  जैसा,

मनुज समय का ग्रास,समय ने जैसा   ढाला।


'शुभम्' एक ही ईश, हाथ मानव के  खाली,

मानव तो बस कीश,छतों से गिरा   पनाला।


●शुभमस्तु !


29.05.2023◆8.30आ०मा०

स्वार्थ भरा संसार● [ गीतिका ]

 231/2023

  

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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चलता है   जो सत्यपथ,होती उसकी  जीत।

दुनिया गाती नित्य ही,सदा विजय के गीत।।


ऋतुओं का आवागमन, पावस शरद वसंत,

तपता सूरज  ग्रीष्म का,कभी सताए  शीत।


क्षण-क्षण को खोएँ नहीं,सदा करें  उपयोग,

उत्सव-सा जीवन जिएँ,समय न जाए बीत।


स्वार्थ  भरा    संसार  है, करें प्रदर्शन  लोग,

उर  में  काला  खोट  है,एक न अपना  मीत।


राह    बताएँ   पूर्व  की, जाता पश्चिम  ओर,

ऐसा  मनुज  स्वभाव है,चले चाल  विपरीत।


इतना  भय  पशु से  नहीं, हिंसक  भालू  शेर,

मानव  का  आहार  नर, रहता सदा  सभीत।


'शुभम्'नहीं विश्वास अब, रहा मनुज का शेष,

धोखा  दे  नर  जी  रहा,  माटी  हुई  पलीत।


●शुभमस्तु !


29.05.2023◆6.30 आ.मा.

चलता है जो सत्य पथ● [सजल ]

 230/2023

 

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●समांत : ईत।

●पदांत : अपदान्त।

●मात्राभार :24.

●मात्रा पतन :शून्य।

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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चलता है   जो सत्यपथ,होती उसकी  जीत।

दुनिया गाती नित्य ही,सदा विजय के गीत।।


ऋतुओं का आवागमन, पावस शरद वसंत,

तपता सूरज  ग्रीष्म का,कभी सताए  शीत।


क्षण-क्षण को खोएँ नहीं,सदा करें  उपयोग,

उत्सव-सा जीवन जिएँ,समय न जाए बीत।


स्वार्थ  भरा    संसार  है, करें प्रदर्शन  लोग,

उर  में  काला  खोट  है,एक न अपना  मीत।


राह    बताएँ   पूर्व  की, जाता पश्चिम  ओर,

ऐसा  मनुज  स्वभाव है,चले चाल  विपरीत।


इतना  भय  पशु से  नहीं, हिंसक  भालू  शेर,

मानव  का  आहार  नर, रहता सदा  सभीत।


'शुभम्'नहीं विश्वास अब, रहा मनुज का शेष,

धोखा  दे  नर  जी  रहा,  माटी  हुई  पलीत।


●शुभमस्तु !


29.05.2023◆6.30 आ.मा.


रविवार, 28 मई 2023

अमराई ● [ कुंडलिया ]

 229/2023

         

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●शब्दकार ©

● डॉ भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

अमराई  में   कूकते  ,नर पिक सस्वर गीत।

सुन विरहिन-उर जागती,एक टीस हित मीत

एक  टीस  हित मीत, तप रही जैसे  धरती।

मिली न जल की बूँद,प्यास से नारी  मरती।।

'शुभम्' प्रतीक्षा लीन,गई तिय देह   लुनाई।

टपकें पके रसाल,सज रही झुक  अमराई।।


                        -2-

अमराई  के  बीच में,  बसा हुआ  है   गाँव।

घुस पातीं लूएँ नहीं,सघनित शीतल   छाँव।।

सघनित शीतल छाँव,ज्येष्ठ का तप्त महीना।

जलें न नंगे  पाँव, शरद से शीतक   छीना।।

'शुभम्'  रसीले  आम,बाँटते मधुर  खटाई।

बनी  गाँव  की आन,चतुर्दिक छा  अमराई।।


                         -3-

अमराई  में  छा  रहे, तरह-तरह  के  आम।

हिमसागर, केशर सभी,लँगड़ा वृक्ष तमाम।।

लँगड़ा  वृक्ष  तमाम, सिंधुरा, नीलम  सारे।

फजली ,चौसा  खूब,दशहरी रस  से  भारे।।

'शुभम्' आम वनराज,मल्लिका भी है भाई।

रत्ना,अर्का अरुण, मधुर  सुंदर  अमराई।।


                        -4-

अमराई   में  मिल गए, नैनों से   दो  नैन।

शब्द एक निकला नहीं,मौन बोलतीं सैन।।

मौन   बोलती  सैन, चैन काफूर   हुआ  है।

इधर भाड़ की आग,उधर गंभीर  कुँआ  है।।

'शुभम्' हर्ष  का लोप,हिमंचल बनती  राई।

मिले विटप की ओट,साक्ष्य देती  अमराई।।


                        -5-

अमराई  में  डाल कर, एक खुरहरी  खाट।

माली -मालिन देखते, आमों की नित बाट।।

आमों  की नित बाट, खेलते छोरा  -  छोरी।

ढूँढ़   टिकोरे   स्वाद,  ले  रही बेटी    गोरी।।

'शुभम्'  सोलवीं  साल, सुहाए उसे  खटाई।

चटनी   चाटें  खूब  ,प्रेम  से जा   अमराई।।


●शुभमस्तु!


28.05.2023◆12.45प०मा०

गाँव, गाँव, गाँव, गाँव● [ बाल कविता ]

 228/2023


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●शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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गाँव, गाँव , गाँव, गाँव,

धूल   भरी    आँधियाँ।

झर्र - झाँय,झर्र - झाँय ,

गूँज     रहीं    वादियाँ।।


बाग, बाग,  बाग,  बाग,

रेत  का    झकोर     है।

डाल, डाल, डाल, डाल,

गिरा    ढेर    बौर    है।।


बेर ,   बेर,    बेर  ,  बेर,

बेर -  से    टिकोरे    हैं।

लूट,   लूट,   लूट,   लूट,

भाग     रहे    छोरे    हैं।।


कान, कान, कान, कान,

बात    यह    आई     है।

सत्रह   की    दीदी   को,

रुचती     खटाई      है ।।


लिए, लिए,  लिए,  लिए,

जेब के   टिकोर    छीन।

काट -छील, काट -छील,

दाँत   से   नन्हे    नवीन।।


●शुभमस्तु !


27.05.2023◆12.30प०मा०

गुरुवार, 25 मई 2023

गहनों का ग्रहण ● [अतुकान्तिका ]

 227/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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ये गहने!

गहन करने के लिए

नर को,

बनाए स्वयं नर ने,

फँसाने के लिए 

स्वयं निज को,

कि पहने

देह पर कामिनि।


स्वयं मछली

बुने निज जाल,

बुलाती काल,

सब शृंगार का बाजार,

हो रहा

पुरुष अब बेहाल,

जिंदा मशाल,

धरा की दामिनी।


पुरुष - दौर्बल्य,

पथ का शल्य,

पहचानती वह

रात -दिन

'इमोशनल ब्लेक मेल'

आजीवन खेल,

 झेल ही झेल।


अधूरापन इधर

अधूरापन उधर,

उधर नारी इधर नर,

परस्पर डर,

भरी कंकड़

 काँटों की डगर,

करे मत 

कुछ अगर -मगर।


गहने का ग्रहण

कर संवरण,

वृथा तव प्रण,

चराचर में संचरण,

क्षण प्रति क्षण,

 झेलता  जनगण।


●शुभमस्तु !


25.05.2023◆4.00प०मा०

बया के घोंसले लटके ● [ नवगीत ]

 226/2023

 

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● शब्दकार©

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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शल्य -द्रुम की

मचानों पर

बया के घोंसले लटके।


बया मादा

संग नर भी

सजाते घास के तिनके।

उजाले के

लिए जुगनू

घोसलों में छिपे चमके।।


निराली है

अजब दुनिया

रहा करते बिना खटके।


युगल -श्रम

चमक उठता

नई दुनिया बसा लेता।

चीलों गीध 

से बेहतर 

सजीला नीड़ रँग देता।।


वृथा क्यों खग

बया बुनकर

गगन में भृंग- सा भटके!


सभी मानव

सु -तन धारी

अलग जीवन बिताते हैं।

 बना करते

कोई जौंक

विरल सोना कमाते हैं।।


अलग जीना

अलग मरना

चले कुछ राह में अटके।


बनाए हैं

विधाता ने 

बड़े -छोटे सभी घट ही।

खरे - खोटे

सुघर टूटे

न रहने की न आहट ही।।


नहीं रुकता

भरा पानी

रहे कुछ जन्म से चटके।


●शुभमस्तु !


25.05.2023◆2.45प०मा०

पानी ● [ दोहा ]

 225/2023

             

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पानी से हर  जीव का,है अपना  अस्तित्त्व।

दिया आपकी देह में,जल का सघन घनत्त्व।।

जीव,जंतु,पादप,लता,धरा,गगन,सरि,ताल।

पानी से आबाद हैं,सिंधु, अचल,नद ,नाल।।

 


तपता  सूरज  ग्रीष्म  में,बरसे पानी   धार।

पावस में   जलवृष्टि हो,धरती करे  पुकार।।

ज्यों-ज्यों धन बढ़ने लगा,हृदय गया है रीत।

पानी आँखों का मरा, दिवस गए  वे  बीत।।


पानी का दोहन करे,अतिशय मानव आज।

कल की सोचे ही नहीं, गिरे शीश पर गाज।।

सब  -  मर्सीबल  पंप से,भैंस नहाएँ नित्य।

बहता  पानी  राह  में,जाने कब  औचित्य!!


गौरैया  प्यासी   मरे, प्यासे कीर  , मयूर।

पानी वृथा उलीचता, मानव अब का कूर।।

पौधारोपण  कर  गए,अपनी आँखें  मींच।

नेता उतरे   कार  से,दिया न पानी  सींच।।


पत्ती -  पत्ती   माँगती  ,पानी से ही   त्राण।

मानव , बादल  नीर दे,बचने हैं तब  प्राण।।

सत्तर प्रतिशत अंश है,पानी का भुवलोक।

फिर भी प्यासे जीव हैं,मना रहे जल-शोक।।


● शुभमस्तु!


24.05.2023◆11.45आ.मा

बुधवार, 24 मई 2023

जीवन मिथ्या -जाल ● [ दोहा ]

 224/2023


[मिथ्या,छलना,सर्प,मछुआरा,जाल]

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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            ● सब में एक ●

मिथ्या यह   संसार है,मात्र एक   अध्यास।

लगती  रज्जू   जीव  को, होता  सर्पाभास।।

अपना-अपना तू कहे,धन, संतति, परिवार।

मिथ्या हैं सब जान ले,करके  गहन विचार।।


छलना  देने   के   लिए, जन्मे   तेरे   द्वार।

जो  कपूत  संतति बने,मिले न  सेवा प्यार।।

छलना से छल -छद्म के,छिद्र बढ़ रहे नित्य।

जितनी जल्दी जान लो,जन-जीवन औचित्य


सर्प दोगले  शांति के, बनकर  भोले   दूत।

नित्य  डस  रहे  देश को,हिंसा कर  आहूत।।

रस्सी में भ्रम सर्प का,जब मिट जाए मीत।

ज्ञान - चक्षु तेरे खुलें,होती जन की   जीत।।


मानव,मानव के लिए,बन मछुआरा  एक।

काँटे  में  लासा  लगा,  करता पूरी   टेक।।

दृश्य-जगत के जाल में,फँसा जीव -संसार।

मछुआरा तट मौन है,देख रहा   जलधार।।


जीव निकलने के लिए,करता अथक प्रयास।

फँसता जाता जाल में,सच का कर आभास

जीवन स्वप्नाभास-सा,लगता नित्य सजीव।

नहीं निकलता जाल से,बँधता सुदृढ़ जरीब।


    ●  एक में सब ●

जीवन छलना सर्प-सा,

                     मिथ्या का भ्रम - जाल।

मछुआरा नित  काल का,

                        करता वृहत धमाल।।


●शुभमस्तु!


24.05.2023◆ 7.00 आ.मा.


माल तुम्हारा:स्वामित्व हमारा ● [ व्यंग्य ]

 223/2023 

 

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व्यंग्यकार© 

● डॉ. भगवत स्वरूप शुभम् 

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 मैं ये नहीं कहता कि आप साझा -संग्रह के साझीदार नहीं बनें।यदि आपको अपना नाम चमकाने की बहुत जल्दी है औऱ शार्ट कट चलते हुए अल्पावधि में ही एक बड़ा कवि या लेखक बनने की चाहत है;तो चूकिए मत। अपने से भी महान महत्वाकांक्षी को अपना बनाइए औऱ उनके नाम से प्रकाशित संग्रह के एक साझीदार बन जाइये।माल आपका और स्वामित्व उनका।

      क्या आपने अपने सच्चे मन में इस बात को विचार किया है कि जिस साझा -संग्रह का स्वामी संपादक या संकलक आप जैसे पचास - सौ रचनाकारों की रचनाओं परिचयों औऱ सुंदर -सी फोटोज लगाकर अपने नाम से जिस कृति को प्रकाशित करा रहा है ,उसमें आपके अमूल्य योगदान का क्या महत्त्व है?आपने अपना एक नन्हा-सा चना डाल कर खेती में साझा तो कर लिया ,किसान- मजदूर बन गए, पर न तो खेत आपका है औऱ न उसके किसान भी आप हैं।आप जैसे ही अन्य चना दान करने वाले कुछ अन्य महत्वाकांक्षी कवि औऱ लेखक भी हैं। जिनकी अपार भीड़ है, जो रातों -रात महाकवि के सर्वोच्च सिंहासन पर आसीन होने के लिए लार टपका रहे हैं।कुछ अनुभवी घाघ ठेकेदार तो इसका बहुत बड़ा धंधा भी संचालित कर रहे हैं।प्रति व्यक्ति 800, 900 या 1000 रुपये से यदि एक सौ लोगों का जोड़ लिया जाए ,तो एक लाख की एकत्रित धनराशि में से यदि दो सौ रुपये प्रति पुस्तक औऱ डाक व्यय की दर से भी अस्सी हज़ार की नकद बचत है। अपना हर्रा लगा न फिटकरी रंग चोखा ही आ गया ,तो घाटा भी क्या है? 

     साझा संग्रह का स्वामी संपादक यदि इतना ही बड़ा लेखक या कवि होता ,तो क्या वह स्वयं लिखकर पूरी पुस्तक का प्रकाशन न करा लेता। आप स्वयं सोच सकते हैं कि कहीं न कहीं तो गड़बड़ है। आप ठगे जाकर धोखा खा रहे हैं। यह धोखा ही ऐसी खाद्य सामग्री है, जो आपके द्वारा खाने के बाद ही आपको पता लगता है कि आपने खा लिया है :धोखा। यदि आपको पहले से ही पता हो तो क्या आप इसे खाना पसंद करेंगे? नहीं न? परन्तु अब तो खा ही गए हैं। तो पचाना भी पड़ेगा और पछताना भी पड़ेगा।मुरब्बा किसी और का आप तो बस गरम मसाला बनकर उसे स्वादिष्ट बनाने में लगे हुए हैं।

      सहित्य का सृजन ;जो एक समाज और साहित्य की सेवा का पवित्र कार्य था ,अब तथाकथित शातिर और मनी माइंडेड व्यक्तियों द्वारा धंधा बन चुका है। हमारे जैसे अज्ञानियों की धरती पर फल फूल रहे धंधे के जिम्मेदार हमारी चरम महत्ववाकांक्षा ही तो है। जिसका भरपूर लाभ आज के 'चतुरों' द्वारा उठाया जा रहा है। यह एक ऐसी खेती है,जिसका कोई एक निश्चित मौसम है न शरद,शिशिर ,हेमंत, वसंत, ग्रीष्म या पावस की षड ऋतुएँ ही। यह बारहों मास , बावन सप्ताह, सातों दिन, चौबीसों घंटे और तीन सौ पैंसठ दिन उगने, फूलने,फलने औऱ लहराने ,पकने वाली फसल है। 

 मुझे पता है कि अब आप मुझसे यही प्रश्न करने की सोच रहे होंगे कि क्या आपने भी इसका 'रसास्वादन' किया है? अर्थात क्या आपने भी यह 'खोवा' खाया है? अवश्य खाया है । पर जब उसके कण - कण में रस - हीनता ,रचनाकार की दीनता औऱ ठेकेदार संपादक की तल्लीनता का संज्ञान हुआ तो आँखें खुल गईं। दिन में ही उल्लू बनाने का अच्छा तरीका ढूँढ निकाला गया है।कौन नहीं जानता कि दिन में लक्ष्मी वाहन की आँखें बंद ही रहती हैं!लक्ष्मी पुत्रों ने सरस्वती पुत्रों को अपना वाहन बना ही लिया! क्योंकि उनकी तो चारों (दो हिए की +दो चर्म चक्षु) खुलीं ही हुई हैं। मित्रो! मैं तो सँभल चुका हूँ, आप भी सँभल जाइए। अब ये आपकी इच्छा, मानें या न मानें। ●शुभमस्तु !

 23.05.2023◆11.30आ.मा. 

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प्रीति की रीति ● [ सजल ]

 222/2023


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●समांत : आन

●पदांत :  नहीं

●मात्राभार  :22.

●मात्रा पतन :शून्य।

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सीख  प्रीति  की रीति,पंथ आसान   नहीं।

अति दुरूह वह नीति,तुझे पहचान  नहीं।।


भ्रमित वासना -भृंग,झूमते कली - कली,

माली  होता  दंग,  ज्ञान का भान    नहीं।


धर  मीरा  का  रूप, रँगे चीवर   तन   के,

गिरा  पतन के  कूप, त्याग का  ज्ञान नहीं।


बहे   प्रीति  की धार,नहीं गंतव्य    मिला, 

हुए  वही  बस  पार, देह का ध्यान  नहीं।


'लिव इन' का  व्यापार,वासना अंधी   है,

टूटे  शीघ्र   खुमार,  प्रीति  में जान  नहीं।


सच्चा   लौकिक प्रेम,कराता सृजन नया,

सद गृहस्थ का हेम,कृत्रिम चमकान नहीं।


प्रेम - पंथ   -  तलवार,   दुधारी भयवाहक,

चलना   अति  दुश्वार, गिरे तो मान   नहीं।


हो  शीरीं -  फरहाद,  भले  लैला- मजनू,

नेह  राधिका-श्याम, सदृश उपमान   नहीं।


'शुभम् ' गोपियाँ  ग्वाल,कृष्ण के  रँगराते,

सहजाकर्षण  ताल,बजे व्यवधान   नहीं।


●शुभमस्तु!


21.05.2023◆12.30 प०मा०

रविवार, 21 मई 2023

मृग - मरीचिका ● [नवगीत ]

 221/2023

    

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मृग- मरीचिका

प्यासा प्राणी

देख -देख ललचाए।


सोने का मृग

देख जानकी

बोली:  'लक्ष्मण  देवर।

देखो वह मृग

बना स्वर्ण से

आ जाओ तुम  लेकर।।'


'धनुष उठाओ

जाकर अपना

मन में तपन जगाए।'


मत्त वासना

रत यौवन है

आँखों  से  ये  अंधा।

बना   'रिलेशन

लिव इन' के ये

लगा  रहा   है  धंधा।।


फूटी दोनों

इनके ही की

कौन इन्हें समझाए।


मुरझाए हैं

फूल भूलकर

भौंरा  एक न जाता।

जब तक पाया

शहद मधुप ने

आसपास मँडराता।।


झरने लगते

सूख - सूख दल

झाँके  बिन कतराए।


मिले मुफ्त का

भोजन- चावल

दिखे   रेत    का  पानी।

मृग-मरीचिका

कहते इसको

मज़हब -मलिन कहानी।।


बिना बहाए

स्वेद देह से

शूकर -शावक छाए।


नेता -पालित

नव गुर्गों का

झुंड चाभता   मेवा।

चुपड़ रहे हैं

सारे चमचे

तेल,  दे  रहे  सेवा।।


'शुभम्' आमजन

चुसा जा रहा 

कैसे  ऊपर  जाए!


21.05.2023◆1.45प०मा०


प्रीति की धार● [ गीतिका ]

 220/2023

        

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सीख  प्रीति  की रीति,पंथ आसान   नहीं।

अति दुरूह वह नीति,तुझे पहचान  नहीं।।


भ्रमित वासना -भृंग,झूमते कली - कली,

माली  होता  दंग,  ज्ञान का भान    नहीं।


धर  मीरा  का  रूप, रँगे चीवर   तन   के,

गिरा  पतन के  कूप, त्याग का  ज्ञान नहीं।


बहे   प्रीति  की धार,नहीं गंतव्य    मिला, 

हुए  वही  बस  पार, देह का ध्यान  नहीं।


'लिव इन' का  व्यापार,वासना अंधी   है,

टूटे  शीघ्र   खुमार,  प्रीति  में जान  नहीं।


सच्चा   लौकिक प्रेम,कराता सृजन नया,

सद गृहस्थ का हेम,कृत्रिम चमकान नहीं।


प्रेम - पंथ   -  तलवार,   दुधारी भयवाहक,

चलना   अति  दुश्वार, गिरे तो मान   नहीं।


हो  शीरीं -  फरहाद,  भले  लैला- मजनू,

नेह  राधिका-श्याम, सदृश उपमान   नहीं।


'शुभम् ' गोपियाँ  ग्वाल,कृष्ण के  रँगराते,

सहजाकर्षण  ताल,बजे व्यवधान   नहीं।


●शुभमस्तु!


21.05.2023◆12.30 प०मा०

चलाती सृष्टि वह नारी● [ नवगीत ]

 219/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अकेलापन

नहीं भाता 

नियंता जो हमारा है।


अकेलापन 

विचारा तो

 बहुत ही कामना जागी।

एको$हं 

बहुस्यामक

बना वह ब्रह्म अनुरागी।।

बिना साथी

पुरुष को भी

कहाँ मिलता सहारा है?


बनाया नर

अकेला ही

उदासी से भरा खाली!

वामांग स्थित 

 पार्श्वस्थि से

सुघर वामा बना डाली।।


मिला फिर उस

नराकृति को

भला ये साथ प्यारा है।


बनी नारी

सगी साथी

चलाती सृष्टि वह प्यारी।

बने पूरक 

पुरुष -वामा

पुरुष पर नारियाँ भारी।।


सकारों के 

नकारों के

सृजन का रूप न्यारा है।


● शुभमस्तु !


21.05.2023◆9.15 आ०मा०

शनिवार, 20 मई 2023

जंगल 'टेढ़े पेड़ों'का ● [ व्यंग्य ]

 218/2023 


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व्यंग्यकार © 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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           आज सुबह का अखबार देखा तो एक प्रमुख समाचार पर दृष्टिपात होते ही अकबर इलाहाबादी का यह शेर भीतर ही भीतर ऊधम मचाने और मन की कहन को बाहर लाने के लिए कुलबुलाने लगा।शेर कुछ यों है: 'हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम, वो कत्ल भी करते हैं तो शिकवा नहीं होता।' एक कहावत कुछ इस प्रकार भी कही और पढ़ी जाती है कि जंगल में कभी टेढ़े पेड़ नहीं सीधे पेड़ ही काटे जाते हैं।आज के सामाजिक ,राजनैतिक, नैतिक और धार्मिक परिवेश में यह सोलहों आने,चालीस शेरों औऱ पक्के एक सौ किलोग्रामों यह बात सही है। 

          देश औऱ समाज का कोई तथाकथित बड़ा नेता,अधिकारी, कर्मचारी,सर्वेसर्वा यदि कितनी भी बड़ी भूल या अपराध करता है, तो उसके लिए इस प्रजातंत्र में किसी दंड या सजा का प्राविधान नहीं है। न कोई पाप है। न देवता का शाप है। और न देश और समाज के लिए वह अभिशाप है! यह एक भयंकर विशुद्ध और परिपक्व विडम्बना ही है कि वह दूध का धुला बना रहकर साफ -साफ बच निकलता है।वही तो इस जंगल का टेढ़ा पेड़ है। उसके ऊपर कोई धारा,कोई दुधारा कारगर सिद्ध नहीं होता। 'समरथ को नहिं दोष गुसाईं।'ये पंक्ति गोसाईं तुलसीदास बहुत पहले ही लिख कर सुरक्षित ढाल बनाकर रख गए हैं। है किसी के माई के लाल में ताकत कि इन तथाकथित 'टेढ़े पेड़ों' को काटना तो बहुत दूर ,उन्हें छू भी नहीं सकता।

             कौन नहीं जानता कि प्रत्येक टॉल टैक्स वसूली प्लाज़ा पर ऐसे 'बेचारों' की हरित पृष्ठभूमि पर दुग्ध धवल दीर्घ अक्षरों में एक नहीं कई स्थानों पर सूच्यांकित रहतीं हैं कि उनसे भूल से भी टॉल टैक्स वसूल न हो जाए।शेष सामान्य जन के कार, मोटर,ट्रक ,बस आदि हेतु रेट लिस्ट लगाना भी नहीं भूला जाता कि इनसे इतना- इतना वसूला जाना है। जब सड़क पर जाना है ,तो टेक्स भी देते ही जाना है। अनिवार्यतः चुकाना ही चुकाना है। जो देने के लिए सक्षम हैं उनसे एक पैसा भी नहीं पाना है।हो सकता है ऐसे ही 'बेचारे' 'महापुरुषों और महानारियों' के पूज्य पिताजी ने ही देश की सभी सड़कों का निर्माण कार्य कराया हो।उनके लिए न कोई कानून है न आचार संहिता।न नियम न उनका आचरण। सब कुछ मनमाना। 


          बराबर सीधे पेड़ ही काटे जा रहे हैं।टेढ़े अरराते हुए दौड़े चले जा रहे हैं। 'सीधे'अपनी सिधाई के कारण काटे जा रहे हैं। 'टेढ़े पेड़' कभी अपराध कर ही नहीं सकते। जो इन टेढ़ों को भी सीधा कर दें, उनसे कोई चूं - चपड़ नहीं चलती। वे 'महाटेढ़े 'उनके पालित - पोषित भी हो सकते हैं।जिनके संरक्षण में फलते -फूलते और ऊलते हैं। टेढ़ों द्वारा यदि किसी नियम आदि के संचालन, संपादन, क्रियान्वयन आदि में भूल हो जाती है तो नियम बदलकर सुधार कर लिया जाता है। वे अपनी गलती ,अपराध या भूल भी स्वीकार भी नहीं करते। यही तो उनकी महानता है। तभी तो मेरा देश महान है। और इन 'महापुरुषों' औऱ 'महानारियों' के कारण है। 'सीधे पेड़'क्या हैं?केवल घास- फूस ही। पैरों तले रौंदे जाने की चीज। जहाँ विधायक ही भंजक हो,वहाँ पलित तो पालक की घास-पात है।शह में भी मात है।'टेढ़े' और 'टेढ़ों' का पदाघात है।'जिसकी लाठी उसकी भैंस' की बात है। जंतु वर्ग में आदमी का आदमी के संग पक्षपात है। 'टेढ़ों' के समक्ष 'सीधों' की यही तो औकात है। कमजोरों के ऊपर तुषारापात है। पर क्या कीजिए ,'जबरा मारे और रोने भी न दे!' इसी कहावत की बिछी बिसात है। 

 ●शुभमस्तु !

 20.05.2023◆7.45प०मा०

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खटास ● [ अतुकांतिका ]

 217/2023

       

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●शब्दकार ©

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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चखे नहीं जाते दिल

मात्र देखे  औऱ महसूस

किए जाते हैं,

वे आम हैं न टिकोरे

फिर भी रखते हैं

अपनी खटास या मिठास।


दूध में

 डाली गई खटास से ,

फटकर विकृत भी

होता है,

और जमकर दही भी

बन जाता है,

यह सब खटास के 

अनुपात पर

और दुग्ध के ताप पर

निर्भर हो जाता है।


नापें सभी 

अपने - अपने 

दिलों की खटास 

या मिठास,

बनना है वही

जिसमें हो आशा और

विश्वास,

काश हर आदमी 

ऐसा होता,

फिर इस धरणी पर

स्वर्ग क्यों न होता?


उड़ तो सभी लेते हैं

अपने डैनों पर,

पर अन्तर होता है

उड़ान -उड़ान का,

तितली और चील की

पहचान का,

अम्बर और उद्यान का।


दिनकर से ही

होता है 

दिवस का उजास,

जुगनुओं से नहीं,

फिर भी जुगनू

करता है  प्रयास,

तम - नाश।


आओ 'शुभम्'

अपना उजाला फ़ैलाएं,

दिलों की खटास में

मिठास भर लाएँ,

अपने -अपने प्रयास में

कोई कमी क्यों लाएँ!

धरती को

मानव के

 रहने योग्य बनाएँ।


●शुभमस्तु!

19.05.2023◆6.30आ०मा०


गुरुवार, 18 मई 2023

घुमावदार हवेली! ● [ व्यंग्य ]

 216/2023


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● व्यंग्यकार©

 ● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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         हाँ, मैं नारी हूँ।करनी से लाचारी हूँ। सबके साथ अलग - थलग रोल! किसी के साथ फूटी आँख भी नहीं किसी को घी से तोल! पति, पुत्र, बेटी, सास ,ससुर !कोई लगे देवी - देव तो कोई असुर! सबके साथ छंद अलग ,अलग ही सुर। मैं केवल एक, पर मेरी भूमिकाएं अनेक ! जहाँ जैसा विवेक ,कहीं बहुत नेक; कहीं पकड़ी हुए टेक।

    'ना' से मेरा आदि है,नकार ही मेरा आस्वाद है।जानते तो होंगे कि मेरी ' ना ' भी 'हाँ 'है। और यदि कहीं हो गई 'हाँ' ; तो कर ही देगी तुम्हें बहुत परीशां!इसलिए सहज ही जुबां से 'हाँ' तो निकलती ही नहीं। इशारों को अगर समझो ,तो क्या से क्या न हो जाए!कहती है जो जुबाँ, वह ये दीदे नहीं कहते। इन दो दीदों की भाषा ही गूढ़ है। जो न समझ पाए ,समझो वह मूढ़ है।पर ये नारी तो अपने ही मत पर आरूढ़ है। अब चाहे पहेली कहें या उसकी घुमावदार हवेली में उलझे रहें।कोई कहता इसे हमारी अदा है, जमाना हमारी इन्हीं अदाओं पर फिदा है।लेकिन जीवन जीने के वास्ते वह नहीं हो सका नारी से जुदा है।

         ये न समझें कि कैसी ये हमारी सोच है। ये भी न समझें कि ये कोमलांगी इतनी पोच है! हमारी हर एक करनी में एक अलग ही लोच है।जहाँ पर मर्द की सोच का पूर्ण विराम है, वहीं से हमारा शुरू होता मुकाम है। न समझिए नारी को मात्र कोमल निरीह चाम, इसी से तो होते हैं कड़े - कठोर काम।इसीलिए तो नारी को एक नाम दिया गया वाम या वामा। 

                मानव समाज की ऐसी कितनी जिंदा सास हैं , जो अपनी बहुओं के लिए मात्र एक लाश हैं! यही कोई अंगुलियों के पोरुओं पर गिनने भर की। समझिए उन्हें दाल बरोबर मुर्गी घर की। अन्यथा कोई बहू ईमानदारी से अपने गरेबाँ में झाँक कर बता दे कि उसके पति की अम्मा दुनिया की सबसे अच्छी सास है। यदि कोई कहे भी तो माना जाएगा कि ये दुनिया का सबसे बड़ा उपहास है।किसी अविवाहित बेटे औऱ बेटी के लिए माँ दुनिया की सबसे अच्छी माँ है।किंतु विवाहोपरांत उसी बेटे के लिए औऱ उसकी 'आदेशांगिनी' भार्या के लिए वह सबसे बुरी औऱ कर्कशा नारी है। नारी तो वस्तुतः हजारों हजार विरोधाभासों की 'गर्मकल्ला' क्यारी है।अपने बूढ़े सास -ससुर उसे फ़ूटी आँख भी नहीं सुहाते ,तो नहीं ही सुहाते।कोई कर भी क्या सकता है! उसे वे मिस्री की बोरी में फँसी फांस ही दिखाई देते हैं।तभी बेटे बहू के कहने पर उन्हें टूटे मूढ़े की तरह वृद्धाश्रम भेज देते हैं।इन सभी वृद्धाश्रमों की जनक और जननी नारी ही है ।बेचारे पति की तो उसकी हाँ में हाँ बोलना मात्र लाचारी है। 

         नारी, नारी के लिए आरी।पुरुष पर तो मात्रा और देह से भारी।किसी के लिए फूलों की क्यारी तो प्यार से भी प्यारी। मुझे मैंने नहीं बनाया। सारा दोषारोपण मुझी पर आया।पूछो उस परमात्मा से कि मुझे ऐसा चित्र - विचित्र ,कभी बदबू तो कभी इत्र,ऐसी कलत्र क्यों बनाया? इतने सारे रंग जब एक ही जगह भर दिए तो आखिर हम कैसे जिएं। बेटा खुश तो बहू फुस, उसे तो रहना है अपने स्वार्थ में घुस।इसीलिए तो चाहती करना सबको घर से पुश। अपनी प्रकृति से बंधना विवशता है।कभी जो महान है ,कभी वहीं कृशता है। कोमलांगी औऱ क्रूरा का ये कैसा दुःसह मेल है।विधाता के विधान का ये कैसा खेल है?नारी,प्यारी, आरी, कटारी,उपहारी,दुलारी, कितनी - कितनी उपमाएँ सारी। वाह री!मैं नारी।घुमावदार हवेली तुम्हारी!तुम सबके घर और घर वालों पर भारी।इतना भी समझ लें कि मेरे बिना खिलती नहीं घर की क्यारी;जब तक नहीं गूँजती नर्सिंग होम से घर की चौबारी तक नवजातों की मधुर किलकारी।

 ●शुभमस्तु ! 

 18.05.2023◆12.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

माँ बनाम सास ● [चौपाई ]

 215/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सबकी  माँ  जब  इतनी प्यारी। 

बनी सास  क्यों तेज कटारी??

सास    कहाँ   बनती हैं सारी?

सब  बहुओं  की   वे बीमारी।।


बहू  सास जब  बनकर आती।

अपना  असली  रंग दिखाती।।

उसे सास   ने   बहुत   सताया।

शुभ दिन सास बना दिखलाया।।


उसे   सास   ने   रंग   दिखाए।

बहुओं पर चुन-चुन आजमाए।।

सास आज है  विगत वधूटी।

लगता   था तब किस्मत फ़ूटी।।


अब   वह  वही सूत्र अपनाए।

प्रिय सुत को गुलाम बतलाए।

सास -झुंड पनघट पर आया।

किस्सा चुगली का रँग लाया।


पुत्रवधू   की    चुगली  भाए।

सुनने में रस   कितना आए!!

देवी - सी   है   अपनी    बेटी।

बहू लगे   किस्मत  की हेटी।।


माँ बहना सब  साँसें बनती ।

तब पूछो   कैसे   वे  तनती!!

सास -  बहू  दो  बिच्छू पाले।

छेड़ न   छत्ते   बर्रों    वाले।।


सासों का आयात   कहाँ से?

करते हैं किस लोक जहाँ से?

माँ तो माँ है   सबकी  प्यारी।

क्यों हर सास बहू की ख्वारी?


●शुभमस्तु !


17.05.2023◆9.15प०मा०

बुधवार, 17 मई 2023

यमुना तट ● [ दोहा ]

 214/2023

          

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●शब्दकार ©

● डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कान्हा  यमुना तट  खड़े,  देख रहे  हैं  बाट।

कब तक आएँ राधिका,मन है बहुत उचाट।।

यमुना तट तरुवर खड़े,छाया सघन  कदंब।

झूला झूलें  राधिका, शोभित शाख   प्रलंब।।


झूले  पर हैं राधिका,यमुना तट  पर  बाग।

झोंटा कान्हा  दे रहे,  अपने - अपने   भाग।।

यमुना  तट पर  भीड़ है,  आए बाबा  नंद।

संग  यशोदा   हैं  दुखी,मंद श्वास  के   छंद।।


कंदुक  अपनी  खोजने, कूदे सरिता - धार।

कान्हा  निर्भय हर्ष  में,यमुना तट  कर पार।।

यमुना  तट  पर हर्ष  की,बहने लगी   बयार।

नाग कालिया नाथ कर,करते कान्हा  प्यार।।


गौचारण कर साँझ को,आए नंद  कुमार।

यमुना तट पानी पिएँ,निर्मल बिना विचार।।

यमुना तट मथुरा बसी, नगरी पावन मीत।

हुआ कृष्ण अवतार शुभ,गाता है ब्रज गीत।।


यमुना  तट   वसुदेव  जी, पहुँचे भादों  मास।

अर्द्धरात्रि ले कान्ह को,रुकती भय से श्वास।।

रखे   पाँव  जो  नीर में,यमुना तट  वसुदेव।

बाढ़  घटी सरिधार की,कर कान्हा की सेव।।


'शुभं'कृष्ण पावन किया,यमुना तट सरिधार।

भ्रातृ भगिनि अभिषेक से,करते निज उद्धार।


●शुभमस्तु !


17.05.2023●7.30आ०मा०

ग्रीष्म -दोहोपहार ● [ दोहा ]

 213/2023

 

[लू,लपट,ग्रीष्म,प्रचण्ड,अग्नि]

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● शब्दकार ©

● डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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            ● सब में एक ●

ज्येष्ठ मास में लू चलें,सर-सर तप्त बयार।

आम  पके  पीले पड़े,मुख में आए   लार।।

धरती,अंबर,जीव,जड़,लू से तप्त  अधीर।

भोर हुआ  सूरज तपे,चले भानु  के  तीर।।


लपट ज्येष्ठ की धूप की,असहनीय  है मीत।

शेष नहीं तृण भर कहीं,अम्बु कणों की तीत।

ठंड लपट तव कान से,घुसती  है ज्यों तीर।

वसन कान से बाँधिये, सके न उनको  चीर।।


दिनकर उपकारी बड़ा,तपता ग्रीष्म अपार।

लक्षण हैं शुभ वृष्टि के,षडऋतु का आधार।।

षड ऋतुओं में ग्रीष्म का,यह पावन संदेश।

सबका  प्राणाधार  है,सूरज का   परिवेश।।


तपता सूर्य प्रचण्ड जब,फैला किरणें तेज।

सागर   से  बादल   बनें,  देते वर्षा   भेज।।

प्रकृति कभी प्रचण्ड है,कभी सौम्य साकार।

षडऋतु  शोभा देश की,जीवन का आधार।।


पंचतत्त्व में अग्नि का, है महत्त्व  सविशेष।

नहीं किसी से नेह है, नहीं किसी  से  द्वेष।।

अग्नि,धरा,जल,वायु नित,पंचम है आकाश।

हैं प्रत्यक्ष सब देवता,हर जीवन  के  श्वास।।


            ● एक में सब ●

ग्रीष्म   मास   में   लू लपट,

                        करतीं    रूप   प्रचंड।

बरसाती    हैं  अग्नि  को,

                          बनतीं नित बरिबंड।।


●शुभमस्तु !


17.05.2023◆6.30 आ०मा०

मैली गीली कथरी ● [नवगीत ]

 212/2023

   

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●शब्दकार©

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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धोए जननी

सुत की सुथरी

मैली गीली कथरी।


सही वेदना

नित नौ मासा

मन में फूली आशा।

एक एक पल 

जीना दूभर

ऊपर- ऊपर श्वासा।।

उपालंभ क्यों

छाँव बनी माँ छतरी।


आई घर में

नई ब्याहुली

चूल्हा अलग जलाए।

लड़े सास से

खूसट बोले

नेंक न  वधू  लजाए।।

कहे ससुर क्या

आँगन में  जा पसरी।


छोटी चादर 

लंबी टाँगें

बाहर पाँव उघारे।

काजल बिंदिया

ला हरजाई

रोवें बारे -बारे।।

किसकी ताकत

तिया सँवारे, बिगरी।


टेढ़ी हो जो

लिपि ललाट की

आती कुलटा नारी।

सास ससुर पति

रोते तीनों

जीवन की लाचारी।

चमक चाँदनी

बनती नागिन बिजुरी।


●शुभमस्तु !


16.05.2023◆5.45प०मा०

माँ तो माँ है! ● [ गीत ]

 211/2023


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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पहले ढोया उदर- कोख में,

काँधे पर वह अब ढोती है,

माँ की ममता।


उपालंभ  देती  न किसी को,

स्वयं कष्ट वह  तन पर झेले।

अला-बला   को  दूर  हटाए, 

सिर पर सब अपने माँ ले ले।।

पीड़ा नहीं  व्यक्त  करती माँ,

किसकी समता!


झोली  में   नवजात  लिटाए,

जाती   है   निर्द्वन्द्व   अकेली।

खाली हाथ शाटिका तन पर,

नारी  माँ   कैसी   अलबेली!!

पहुँची में   कंगन  कुछ चूड़ा,

अद्भुत फबता।


काँधे  पर   लाठी   रख  मोटी, 

रज्जु ग्रथित है  लंबी   झोली।

चमकें   दाँत   श्वेत  मोती - से,

लौंग नाक  में  पहने  भोली।।

कानों में   दो   कुंडल  उसके,

दृग में नमता।


माला   गले   अँगूठी   अँगुली,

अरुण वर्ण की   माथे   बिंदी।

मंगलसूत्र    सुशोभित   ग्रीवा,

बोले   गिटपिट   टूटी  हिंदी।।

माँ तो  माँ है    क्या जतलाएँ,

उर की शुभता!


●शुभमस्तु !


16.05.2023◆11.30आ०मा०

परिवार ● [चौपाई ]

 210/2023

              

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●शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कलियुग की कैसी महिमा रे।

बिखर  रहे  परिवार   हमारे।।

एकाकीपन   की  घन छाया।

फैली जग में   काली  माया।।


नई   वधूटी   घर   जब  आई।

आँगन   में   दीवार    लगाई।।

अलग  रहें अब बुढ़िया - बूढ़े।

कौन    उठाए     टूटे    मूढ़े??


अलग जलाती दुलहिन चूल्हा।

रहे   अकेली   सँग   में दूल्हा।।

अलग बसा परिवार अनोखा।

देता जननी -पितु को धोखा।।


पढ़े-लिखे अति लोग- लुगाई।

वृद्धाश्रम   में   करें   विदाई।।

पा  एकांत  देह - सुख  पाएँ।

मात -पिता को उधर पठाएँ।।


नैतिकता का साथ नहीं  है।

प्रेम सहज सौहार्द्र कहीं है??

निकले पंख उड़े  खग दोनों।

पड़े पिता जननी  को रोनों।।


अब   वसुधा  परिवार नहीं है।

स्वार्थ भोग की भित्ति यहीं है।।

नारी    ने    परिवार   उजाड़े।

जनक-जननि के गात उघाड़े।।


●शुभमस्तु !

15.05.2023◆4.00प.मा.

वसुधा नहीं कुटुंब ये ● [ दोहा ]

 209/2023


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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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'विश्व एक परिवार है', झूठी लगती   बात।

नहीं सुरक्षित आदमी,हो जाए यदि  रात।।

पति -पत्नी संतान में,सिकुड़े अब परिवार।

नेह नहीं जन और से,करके देख  विचार।।


आई  दुलहिन  गेह में,छोड़ दिए  पितु-मात।

मानव  बदतर   ढोर  से,हुए बिराने   तात।।

स्वार्थ लीन नर-नारि हैं,रुचता भोग विलास।

त्याग दिए माता-पिता,यद्यपि हो  उपहास।।


प्रौढ़ाश्रम बतला रहे, कहाँ विश्व   परिवार।

संतति के उपहास  से,घर के बंद    दुआर।।

वसुधा नहीं कुटुंब ये,मनुज भेड़िया   एक।

नर-नर का आहार है,खोया सत्य   विवेक।।


झूठे  वे   आदर्श   हैं,  नहीं  राम    आदर्श।

लखन विभीषण हो गया,करता नहीं विमर्श।

पैर  वधूटी   के   पड़े,  आँगन  में    दीवार।

आते  ही  सीधी   खड़ी, पुत्र मूढ़    लाचार।।


जब तक पुत्र कुमार था,पिता-जननि से नेह।

टूट  गया  जब   आ  गई,नई ब्याहुली   गेह।।

नारी  की  ही  देन  है,  प्रौढ़ाश्रम   इस   देश।

'शुभं'सत्य कटु है यही,बदला गृह  - परिवेश।


●शुभमस्तु !


15.05.2023◆9.30आ०मा०

पक्षपात में न्याय नहीं ● [ दोहा ]

 208/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पक्षपात होता जहाँ, मिलता वहाँ न न्याय।

नीति नियम हों ताक पर,बँटे उपानह चाय।।

नीर-क्षीर  जो  छाँटता,न्याय करे  सविवेक।

पक्षपात  करता  नहीं,  वही ईश-धी  नेक।।


वर्ण,जाति  के भेद  से,करते जो   अन्याय।

पक्षपात  से  वे बनें,  घृणा-पात्र  निरुपाय।।

पक्षपात  करता  नहीं, पाता नर  सम्मान।

हंस उसे कहते सभी, करता सत्य -विहान।।


जिनके  रग-रग में बहे,पक्षपात  का  खून।

नहीं अपेक्षा कीजिए,उनसे  कण भर चून।।

पक्षपात   होता  नहीं,मानव मूढ़  समाज।

धरती होती स्वर्ग-सी,गिरती कभी न गाज।।


कितने मूढ़ अयोग्य जन,पक्षपात  के हेत।

पाकर  सेवा  देश में,चरते खुलकर  खेत।।

पुल  टूटें  रोगी  मरें, शिक्षक भी  अज्ञान।

पक्षपात जिस देश में,कहता कौन महान??


नेता    में  वह   बीज  है, बोता  सारे   देश।

पक्षपात  की  फसल से, लहराए बक-वेश।।

जनक-जननि करते नहीं, पक्षपात सुत-संग।

होते   पूत    कपूत    भी,  भरे वासना-रंग।।


●शुभमस्तु !


15.05.2023◆9

आ०मा०


राष्ट्र में भरें उजास● [गीतिका]

 207/2023


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● शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सकल  राष्ट्र   में  भरें उजास।

नहीं   करें  इसका  उपहास।।


खाते-पीते  नित्य अन्न  -जल,

करते   भी  हैं   जिसमें वास।


ढोर   नहीं   बन  मानव  देह,

चरते    नहीं   घूर   पर घास।


कर विश्वास सपोलों का मत,

बने   पड़ौसी    रहते    पास।


गंगा यमुना  का  निर्मल जल,

पीकर  लेता    है    तू  श्वास।


संतति  उऋण नहीं   मातु से,

उसको भी कुछ सुत से आस।


'शुभम्'सदा कर्तव्य-पंथ चल,

मात्र नहीं   खोना   रँग- रास।


●शुभमस्तु !


15.05.2023◆6.15आ०मा०


सदा कर्तव्य-पंथ चल● [सजल]

 206/2023

 

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●समांत : आस

●पदांत : अपदान्त

●मात्राभार :15.

●मात्रा पतन: शून्य।

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● शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सकल  राष्ट्र   में  भरें उजास।

नहीं   करें  इसका  उपहास।।


खाते-पीते  नित्य अन्न  -जल,

करते   भी  हैं   जिसमें वास।


ढोर   नहीं   बन  मानव  देह,

चरते    नहीं   घूर   पर घास।


कर विश्वास सपोलों का मत,

बने   पड़ौसी    रहते    पास।


गंगा यमुना  का  निर्मल जल,

पीकर  लेता    है    तू  श्वास।


संतति  उऋण नहीं   मातु से,

उसको भी कुछ सुत से आस।


'शुभम्'सदा कर्तव्य-पंथ चल,

मात्र नहीं   खोना   रँग- रास।


●शुभमस्तु !


15.05.2023◆6.15आ०मा०

रविवार, 14 मई 2023

सावित्री का नाम शेष है● [ दोहा गीतिका ]

 205/2023


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●शब्दकार©

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सावित्री  का नाम ही,बचा शेष  बस आज।

पश्चिम को पहना दिया,नारी ने  अब ताज।।


सत्यवान  के  प्राण जो,लाई यम   से  छीन,

कहाँ वही सवित्रियाँ ,बचा सकें  पति-लाज।।


देवी  वाणी  ज्ञान  की,  दे विद्या  का   दान,

कवि की कविता में बसें, सकल सँवारें साज


कलयुग  की  सवित्रियाँ, कर घूँघट-पट ओट,

नाटक नए  चरित्र का, झपट रहा  बन बाज।


सावित्री  की  अब   नहीं, परिभाषा  प्राचीन,

रिंकी,पिंकी, मारिया, के  नामों   की   गाज।


बाला ,  बाला    से  करे, समलिंगी   सम्बंध,

दैहिक भोगविलास की,मनुज खुजाए खाज।


पंद्रह   प्रतिशत देह के,ढँके हुए   हैं   अंग,

स्वच्छ वायु सेवन करें,विदा नयन से लाज।


प्रकृति बदलती नारि  की,परिणय नारी संग,

गेह - त्याग  फेरे  पड़े,गया  भाड़ में  दाज।


सावित्री  के  दिन गए, फैशन रत  नर नारि,

होटल  में कर  कैबरे,छोड़ बाप  की   छाज।


'शुभम्'  नारि  पर्याय क्या,सावित्री  का  एक,

ढूँढ़ें  भी  मिलना नहीं,नव चरितों  का  राज।


●शुभमस्तु !


14.05.2023◆11.45 आ०मा०

शिक्षक प्रभा-मशाल● [ दोहा गीतिका ]

 204/2023


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● शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' ●

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शिक्षा  का आदर्श  है,शिक्षक प्रभा-मशाल।

तम हो तले चिराग के,शिष्यों का क्या हाल?


सीख    ज्ञान-उपदेश  की ,दे शिक्षक आदर्श, 

नैतिक  अहं  जवाल से, फूल गए  हैं  गाल।


संतति   बात  न  मानती, फैला   है    अंधेर,

पितृ जननि को ठोंकती,शिक्षक को ही ताल।


शिष्यों  को  ये सीख  दे,मत पीना  सिगरेट,

स्वयं  छिपा गुरु  पी रहा, कौवा बना मराल।


कथनी  करनी   में  बड़ा, अंतर भारी  मीत,

होगा  क्यों उद्धार यों,  शिक्षक बना  सवाल।


पर  उपदेशी   की  खड़ी, लंबी बड़ी  कतार,

गरेबान  कब   झाँकते,  भीतर काले   बाल।


डिग्री  ली  शिक्षक  बना,धरे ताक   आदर्श,

बातें  करे नकार  की,क्यों हो शिष्य निहाल?


शिक्षण  क्या व्यवसाय है,सेवा देश - समाज,

जीवन  में हो  सादगी, ओढ़ न केशी-खाल।


'शुभम्' रंग में रँग लिया,शिक्षक ने निज गात,

नहीं  बना  आदर्श वह, बदल गर्दभी  चाल।


14.05.2023◆10.45आ.मा.


माँ तो माँ ही नित्य है 🤱🏻 [ दोहा गीतिका ]

 203/2023

 

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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नाक सदा ऊँची रखें,निज जननी की आप।

जन्म दिया है आपको,उसका बढ़ा प्रताप।।


माँ  तो  माँ  ही  नित्य है,घटे न उसका  नेह,

संतति  की  वरदायिनी, मत गहराई   माप।


मात-पिता  वह बेल हैं,संतति जिनका  फूल,

जीवन  में  तेरे रहे,अमिट उन्हीं  की   छाप।


सोई  गीली सेज  पर,दे तुमको सुख - साज,

आजीवन करना तुझे,उस जननी का जाप।


जीवन में होते वही,सफल सुता-सुत  मीत,

कर   सेवा   सम्मान  से, जीतें मैया-बाप।


उऋण नहीं होती कभी,संतति जननी पितृ,

करता जो अपमान सुत,स्वयं भोगता शाप।


'शुभं'भक्तिरत मातु की,जन्म दिया जो कोख

 जनक नहीं कम जान ले,करना नहीं प्रलाप।


●शुभमस्तु !


14.05.2023◆6.15आ.मा.

नाकों का नक्काश ● [ बालगीत ]

 202/2023

 

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● शब्दकार ©

●  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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नाकों        का      नक्काश  निराला। 

दे     नाकों    को      नया    उजाला।।


नए   -   नए      साँचों      में    ढाले।

नित्य    हजारों     नाक     बना   ले।।

रंग      किसी       का   गोरा ,  काला।

नाकों        का      नक्काश  निराला।।


कोई        बगुले        तोते     जैसी।

बने         पकौड़ी        बेसन ऐसी।।

सुघर      किसी     साँचे    में  ढाला।।

नाकों      का       नक्काश  निराला।।


हथिनी     के       शावक  - सी   कोई ।

सदा         टपकती         रोई  -  रोई।।

जगह      नाक    की    लगता  छाला।

नाकों         का      नक्काश  निराला।।


कोई           लोमश        वानर   वाली।

नथनी           बेसर         लौंगें    डाली।।

नारी    -     नाक         लगाया    ताला।

नाकों          का        नक्काश  निराला।।


लंबी           सीधी        पतली  छोटी।

शिमला         मिर्ची        जैसी   मोटी।।

डाले           नारी        नथनी - माला।

नाकों         का      नक्काश  निराला।।


अपनी      -   अपनी      नाक सँभालें।

नहीं      किसी     की    पकड़ उछालें।।

माता       भगिनी          भौजी  बाला।

नाकों        का         नक्काश  निराला।।


●शुभमस्तु !


13.05.2023◆2.00प.

मा.

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...