रविवार, 5 फ़रवरी 2023

कविता में कविता कहाँ है? 🎊 [ व्यंग्य ]

 58/2023 


 ■●■●■●■●■●■●■●■●■●

 ✍️व्यंग्यकार © 

 🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 ■●■●■●■●■●■●■●■●■● 

           धड़ल्ले से कवियों के सम्मेलन हो रहे हैं और बराबर होते भी रहेंगे।कवि हैं,तो उनके सम्मेलन तो होंगे ही।ये अखिल भारतीयता के स्तर से नीचे तो हो नहीं सकते। कोई विराट कवि- सम्मेलन हो सकता है ,किंतु आज तक एक भी बैनर ऐसा नहीं देखा या सुना गया ; जिस पर 'लघु कवि सम्मेलन' अथवा 'मध्यम कवि सम्मेलन' अथवा 'मोहल्ला कवि सम्मेलन' लिखा हुआ हो। भानुमती के पिटारे की तरह हैदराबाद, गाज़ियाबाद, फ़िरोज़ाबाद, इलाहाबाद, फ़तेहाबाद, मुरादाबाद,नजीबाबाद आदि शहरों से कुछ 'निःशुल्क' और कुछ सपारिश्रमिक (बेचारे इतनी दूर से परिश्रम करके आते हैं; इसलिए सशुल्क नहीं कह सकते ; 'सपारिश्रमिक' ही कहेंगे) ।

           आप जानते ही हैं ,नि:शुल्क तो निःशुल्क ही है। उसे तो कुछ मिलना नहीं है।इसलिए वह स्थानीय भी हो सकता है। घर की मुर्गी दाल बराबर जो होने लगी है।इसलिए उसे ही हलाल करना अधिक आवश्यक माना जाता है।कभी- कभी उसे बैनर झंडे लगवाने ,टेंट के गड्ढे खोदने या खुदवाने, टेंट का विशाल पांडाल बनवाने, दरियाँ बिछवाने , मंच- सज्जा कराने जैसे अति महत्वपूर्ण कार्यों के लिए भी बाइज्जत नियुक्त कर लिया जाता है। तब कोई एक 'अखिल भारतीय कवि सम्मेलन' सफलता पूर्वक सम्पन्न होने की स्थिति की प्राथमिक दशा को प्राप्त होता है।

          'सपारिश्रमिक कवि' को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं। उसे तो बारात में पधारे हुए वरयात्रियों की तरह सब कुछ पका - पकाया चहिए।आए और जीमने बैठ गए। अब बात आती है कवि सम्मेलन की।भले ही मोहल्ले भर के दर्शक और श्रोता इकट्ठे न हों ,किंतु अखिल भारतीय के स्तर से कम तो कहलाया ही नहीं जा सकता। यह कवि सम्मेलन का न्यूनतम सोपान है। विश्व स्तर के कवि सम्मेलन में किसी पड़ौसी देश का प्रवासी भारतीय यदि पधार जाए तो उसकी विश्व स्तरीयता का मानक पूरा हो जाता है।इस देश में 'अखिल ब्रह्मांड स्तर' के कवि सम्मेलन होना भी सामान्य - सी बात है, बस बैनर ही तो बनवाना है।शेष सब वही का वही। 

                इन महा कवि सम्मेलनों की एक विशेषता यह देखी जाती है कि इन्हें कवि सम्मेलन कहने से पहले सोचना पड़ता है कि ये कवि सम्मेलन हैं या कुछ और।मेरे मंतव्य के अनुसार इनका नाम 'महा हा ! हा !!ठी! ठी!! सम्मेलन', 'महा चुटुकला सम्मेलन', 'महा हास्य सम्मेलन' अथवा ऐसा ही कोई अन्य नाम होना उचित जँचता है; परन्तु नामकारण से पूर्व भला मुझ अकिंचन को कौन पूँछने जा रहा है? जब इन कवि सम्मेलनों का नामकरण बदला जाएगा तो कवियों को भी कवि नहीं कहा जायेगा।उन्हें भी चुटकुलेबाज,लतीफ़ेबाज, या हास्यकार आदि किसी भी नाम से सम्मानित किया जाएगा। 

           अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि इन तथाकथित सम्मेलनों में अस्सी प्रतिशत समय में केवल चुटकुले सुना - सुना कर श्रोताओं को मूर्ख बनाया जाता है। उधर हमारे श्रोतागण भी वैसे ही हैं ,जिन्हें कविता और चुटकुले में अंतर ही पता नहीं है। वे चुटकुले को ही कविता -   पाठ समझ लेते हैं।कोई कवि किसी कवि के निजी जीवन की हस्यपरक धज्जियाँ उधेड़ने लगता है ,कोई किसी की सुंदर पत्नी के सौंदर्य सागर में गोते लगाने लगता है। और यदि मंच पर कोई सुंदरी कवयित्री दिख गई तो कहना ही क्या?सोने में सुहागा वाली कहावत ही चरितार्थ हो गई।फिर तो श्लीलता को ताक पर रख कर जो कुछ कहा औऱ सुनाया जाता है ;उससे तो बड़े बूढ़ों में भी वसंत का संचार हो- हो जाये। उधर कवयित्री भी कब पीछे रहने वाली हैं, वे भी नहले पर दहला मारते हुए तीर पर सुपर तीर बौछार करने में कब पीछे हटने वाली हैं? इस प्रकार वाद- संवाद की स्थिति के दौर से गुजरता हुआ तथाकथित सम्मेलन अपनी चरम गति को प्राप्त हो जाता है। अंत में चलते -चलते रही- बची ऊर्जा के साथ दो चार मिनट की कविता भी अपनी अंतिम गति को प्राप्त हो लेती है ।एक छोटी - सी कविता की भूमिका लघु महाभारत ही हो लेती है। वह भी विषयेतर ,अप्रसांगिक औऱ असंवैधानिक।इन हँसोड़- सम्मेलनों को कवि सम्मेलन का नाम देते हुए भी कविता की मट्टी पलीद करते हुए देखकर हँसना नहीं ,रोना ही आता है।

        अगले दिन अखबारों में औऱ ताज़ा का ताजा सोशल मीडिया पर तथाकथित कवि सम्मेलनों के स्तरोन्नयन पर आत्म स्तुतियाँ देखकर तो हँसी रोके नहीं रुकती।सुर्खियां बटोरने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते , यदि एक सच्चे साहित्यकार को भी नौटंकी के जोकर की भूमिका में जाना पड़े ,तो साहित्य की क्या गति होगी, यह सोचनीय ही होगा। हास्य के इन प्रपाती प्रतापी फब्बारों के बीच कविता के नन्हे गुब्बारे ढूँढ़े भी नहीं मिलते।ऊँचे स्तर की कविता सुनने के लिए कुछ तो खोना पड़ता है ,इसलिए आज का श्रोता अपना बहुमूल्य समय और समझदारी का बलिदान कर ही देता है। वैसे भी जीवन में हँसने- हँस पाने का सुअवसर नहीं मिलता ,तो इन सम्मेलनों में आने के बाद वह सब कमी पूरी हो लेती है।अंत में बस यही कसक शेष रह जाती है कि इस पूरे कार्यक्रम में कविता कहाँ थी?दाल में नमक का आस्वादन कराती हुई कविता जाए तो किधर जाए ,जब कवि जन ही चुटुकुलेबाज हो जाएँ। 

 🪴शुभमस्तु ! 

 05.02.2023◆ 6.45 पतनम मार्तण्डस्य।

 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

चलें प्रकृति की ओर 🌳 [ दोहा ]

 57/2023

 

[फसल,सोना,कृषक,कुसुम, बसंत]

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

       🌻 सब में एक 🌻

श्रमजल से ही सींचता,अपनी फसल किसान

अन्न, शाक,फल  दे रहा, दाता सदा  महान।।

मौसम के आघात से,फसल  हुई  बरबाद।

आसमान में  देखता, करे कृषक प्रभु-याद।।


उत्पादित  सोना  करे,धरती माँ  का  रूप।

पालन हो जन-सृष्टि का,कृषक धरा का भूप।

संतति सोना है  वही, करती  जो उपकार।

मात-पिता गुरु धन्य वे,मिलता नेह अपार।।


कर्षित कर अवनी-मृदा,कृषक  उगाए अन्न।

मानव   की   रक्षा   करे,  देश बने    संपन्न।।

सैनिक  सीमा  पर डटा,रक्षा का  प्रतिमान।

कृषक स्वेद अपना बहा,करता अन्न प्रदान।


कुसुम स्वेदजल से खिलें,उनकी अलग सुगंध

अलग तृप्ति फल दें वही,जो फलते निर्बंध।।

कुसुम सुगंधित देखकर, होता  हर्ष  अपार।

पत्थर का अंतर जहाँ,दिखता उसे न सार।।


फागुन में होली जली, हुआ वर्ष  का  अंत।

चैत्र और  वैशाख  में, आया नवल  बसंत।।

आते  मास बसंत के,प्रकृति  बदलती  रूप।

खिलतीं कलियाँ बाग में, स्वागत में ऋतु-भूप


    🌻 एक में सब 🌻

कृषक -फसल सोना बनी,

                      खिलते कुसुम अपार।

आया   नवल   बसंत   है,

                       छाया   मद  -  संभार।।


🪴शुभमस्तु !


01.02.2023●5.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 31 जनवरी 2023

जगत वही, गतिशील जो 🌎 [ दोहा ]

 56/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

सदा रहे गतिशील जो, वही जगत   है  मीत।

रुका न रुकना है कभी,चली आ  रही  रीत।।

समझ   नहीं  तेरे  बिना, रुक जाए    संसार।

यथापूर्व जग की चले,गति सुचारु  सरकार।।


कितने  आकर जा  चुके, आएंगे  बहु  और।

बूँद -बूँद घट रिक्त हो,फिर भरने  का  दौर।।

कभी किसी अस्तित्व से,रिक्त न  हो  संसार।

यह   तेरी  अज्ञानता, तेरे   सिर सब  भार।।


क्रम यह आवागमन का,रीति सनातन एक।

तेरा बस अधिकार ये,करनी कर  ले  नेक।।

आज भरा कल रिक्त हो,घड़ा नीर से  मीत।

फिर से भर जाता वही, जीवन का यह गीत।


कल क्या हो यह जानना,सदा असंभव तथ्य

भावी के सत गर्भ में,छिपा हुआ ये  सत्य।।

अगले पल के ज्ञान से,जो मानव अनभिज्ञ।

मूढ़  अहंता  में  पड़ा,कहता मैं  ही  विज्ञ।।


देह मात्र साधन मिला,करने को  बहु  काज।

नहीं मात्र ये साध्य है,रहे न कल जो आज।।

साधन बिना न साध्य का,चले न पग भी एक

साधक साधन को करे,सात्विक सुदृढ़ नेक।।


'शुभं'अतिथि संसार का,नहीं सुनिश्चित काल

आया  है तो  जायगा,जब तक रोटी - दाल।।


🪴शुभमस्तु !


31.01.2023◆4.00

पतनम मार्तण्डस्य।

सबको भाया एक खिलौना 📲 [ बालगीत ]

 55/2023

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

📱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

सबको  भाया  एक  खिलौना।

चाचा,  चाची,  मौनी , मौना।।


सुघर   खिलौना  ऐसा आया।

सबके मन को अति ही भाया

लंबा   हो   या   मोटा,  बौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


मोबाइल सब उसको कहते।

उसके बिना न पलभर रहते।।

नहीं   चाहता   कोई   खोना।

सबको भाया एक खिलौना।।


घंटों   तक   वे  चिपके  रहते।

विरह न मोबाइल का सहते।।

लगता   है   जादू   अनहोना।

सबको भाया एक खिलौना।।


खेल   पहेली    खेले    कोई।

सीखे   कोई    जनी   रसोई।।

ऑनलाइन क्रय करे बिछौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


मुखपोथी   में  कोई   खोया।

व्हाट्सएप के सँग  में सोया।।

यू -ट्यूबर  का  बड़ा  भगौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


बालक  बाला  नर  या नारी।

सबको लगी  एक   बीमारी।।

हुआ मुबाईल के सँग गौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


🪴 शुभमस्तु!


30.01.2023◆6.30

पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 30 जनवरी 2023

रचना कर परहित में🇮🇳 [गीतिका ]

44/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

बिना    कर्म   मिलता    न  तुझे     कण।

करता    है     क्यों    वृथा    मनुज  रण??


समय     नष्ट     करता     है    यों       ही, 

क्यों       न     बनाता   उपयोगी     क्षण?


आस्तीन           का     साँप    बना    नर,

फैलाता        अपना       चौड़ा       फण।


देशप्रेम         धर     जनहित   कर     ले,

कर         अमृत - वाणी     का   प्रसवण।


अपना          पेट        श्वान  भी      भरते,

पर   -    उपकारी      बन    कर    अर्पण।


रचना        कर      परहित    में   कृतियाँ,

वृथा     नहीं     धरती     पर लघु     तृण।


चुम्बक     'शुभम्'     बने यदि      मानव,

सदा         मिले           पावन आकर्षण।


🪴शुभमस्तु !


23.01.2023◆6.30आरोहणम् मार्तण्डस्य।


देशप्रेम धर जनहित कर⛳ [ सजल ]

 43/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

●समांत  : अण ।

●पदांत :अपदांत ।

●मात्राभार: 16.

●मात्रा पतन :शून्य ।

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

बिना    कर्म   मिलता    न  तुझे     कण।

करता    है     क्यों    वृथा    मनुज  रण??


समय     नष्ट     करता     है    यों       ही,

क्यों       न     बनाता   उपयोगी     क्षण?


आस्तीन           का     साँप    बना    नर,

फैलाता        अपना       चौड़ा       फण।


देशप्रेम         धर     जनहित   कर     ले,

कर         अमृत - वाणी     का   प्रसवण।


अपना          पेट        श्वान  भी      भरते,

पर   -    उपकारी      बन    कर    अर्पण।


रचना        कर      परहित    में   कृतियाँ,

वृथा     नहीं     धरती     पर लघु     तृण।


चुम्बक     'शुभम्'     बने यदि      मानव,

सदा         मिले           पावन आकर्षण।


🪴शुभमस्तु !


23.01.2023◆6.30आरोहणम् मार्तण्डस्य।

आया शुभ नववर्ष 🪷 [मनहरण घनाक्षरी]

 12/2023

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                         -1-

आया  शुभ   नया  वर्ष,छाया नवल  उत्कर्ष,

भरा  हृदय  में  हर्ष, जागी  नई   भोर    है।

जगी उषा रश्मि लाल,भरे झोली में  प्रवाल,

करे प्राची  को  निहाल , खग -वृंद  रोर   है।।

धूप  चाहें नारी - नर,  पूस शीत   करे   तर,

ओस  रही  सूक्ष्म  तर,बैठा मौन   मोर   है।

गली -  गली   तमचूर, बाँग  दे रहे     सुदूर,

भरा   खेत  वन नूर,  चारों ओर  -  छोर है।।


                         -2-

गया  और  एक  साल,गूँज रही  नव  ताल,

घड़ी  बदली  है  चाल, शीत  में उभार   है।

ओढ़ शॉल या रजाई,गाय भैंस को ओढ़ाई,

पिएँ   दूध गर्म   चाई,  बढ़ा ओस ज्वार  है।।

नृत्य   करें  वन  मोर, देख हर्षित  हैं    पोर,

जन  आनंद    विभोर,  सूर्य समुदार     है।

सुख  बाँट रही  धूप, उष्ण नीर  भरे   कूप,

नववर्ष   का   सुरूप , दान करे प्यार    है।।


                         -3-

बहू आई  ससुराल, चले हंसिनी - सी चाल,

भिन्न  रूप  रंग ढाल, लगी  नई  साल   है।

मोर   नाचते   मुँडेर,  झूम   रहे  बेर   केर,

मिटा  रात  का  अँधेर, तारा रिक्त थाल  है।।

भाभी - भाभी  की गुहार, करे ननदी   उदार,

मीठे   बोल  में   उचार,  राग बेमिसाल  है।

मुग्धा  यौवन-उजास , प्रेम हर्ष  करे   वास,

भरे  सौम्यता  सहास,  रंग  का उछाल  है।।


                         -4-

नया  ईसवी  का  साल,उषा रश्मि है प्रवाल,

भानु    फैलाए    सँजाल , प्रेम   अपनाइए।

भूलें  गत   दुख  दर्द,झाड़ वसनों  की  गर्द,

शीत  ऋतु    बड़ी   सर्द, ठंड  से   बचाइए।।

देख  कोहरे  की  धूम, बढ़ा जीवन  की  बूम,

सत   पंथ   को   न भूल, खुशियाँ    मनाइए।

सदा  करें   उपकार,   जीव मात्र  का सुधार,

यही   जीवन   का   सार, नवगीत    गाइए।।


                         -5-

करें सभी काम-काज,शादी ब्याह के सुसाज,

बीते  कल  और  आज,नया नहीं  मानें   वे।

तान अपनी ही तान,दिखा खोखली वे शान,

दिया  करें   महाज्ञान, धरे  नए    बाने   वे।।

कसें  जींस  शर्ट  धार,करें पीत का  प्रसार,

ठानें  एक  नई   रार, भले  नहीं   जानें   वे।

ऐसे  अंधभक्त  मूढ़,  पंथ  चलें सदा  रूढ़,

आकंठ गए  वे बूड़, ति छन्नों में  छानें   वे।।


🪴शुभमस्तु !


07.01.2023◆4.00 

पतनम मार्तण्डस्य।

त्याग 🌻 [ चौपाई ]

 54/2023

       

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

त्याग रहा जो सुख को अपने।

स्वर्ण बनाया  उसको तप ने।।

सभी   जानते  लेना  -  पाना।

जाए  एक   न पाई  -  दाना।।


दुर्लभ  भाव  त्याग का  होता।

शांति-संग  अपरिग्रह सोता।।

संत   दिगम्बर   को  पहचानें।

त्याग नहीं उनका लघु  मानें।।


मोह -  त्याग  बलिदानी जाते।

भारत  माँ  का  मान  बढ़ाते।।

घर परिजन तज संतति दारा।

करते गृह  से  वीर  किनारा।।


माया, मोह  त्याग  वन  जाते।

सन्यासी   निज   देह तपाते।।

बहती   वहाँ   ज्ञान  की गंगा।

धन - नद में   डूबा  मतमंगा।।


त्यागी जन  तपसी  हो  पाता।

गीत ईश - सुमिरन के गाता।।

भक्ति माँगती  त्याग  तुम्हारा।

सुख का भोग न लगता प्यारा।


चाहे   ज्ञान   विमल अध्येता।

नहीं त्याग   अपनाता   नेता।।

सुख  की अर्थी पर वह सोता।

ऊपर  - नीचे  भरता   गोता।।


'शुभम्' त्याग को जो अपनाए।

दिनकरवत  नभ में छा जाए।।

नई-नई  कृति  कविजन लाते।

साहित्यिक  नभ  में गहराते।।


🪴शुभमस्तु!


30.01.2023◆10.30 आरोहणम् मार्त्तण्डस्य।


सद्गुण से सम्मान 🪴 [ गीतिका ]

 53/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

कर्म  - पुंज   पहचान  बनाते।

पत्थर को  भगवान   बनाते।।


जाती   रात    अँधेरी   काली,

दिनकर विमल विहान बनाते।


सुमधुर स्वर लय के प्रवाह में,

मन - अनुरंजक  गान बनाते।


नेह   एकता  सर्जक  घर   के,

स्वेद - बिंदु  नव छान  बनाते।


भौतिकता में क्या सुख  ढूँढ़े?

सद्गुण  ही   सम्मान  बनाते।


समय  चढ़ाता  मंजिल  ऊँची,

नर - पुंगव    सोपान   बनाते।


'शुभम्' न भूले मानव गुण को,

गुड़ - से  गुण   इंसान  बनाते।


🪴 शुभमस्तु !


30.01.2023◆7.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


पत्थर से भगवान 🌾 [ सजल ]

 52/2023

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

●समांत : आन।

●पदांत : बनाते।

●मात्राभार:16।

●मात्रा पतन:शून्य।

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

कर्म  - पुंज   पहचान  बनाते।

पत्थर को  भगवान   बनाते।।


जाती   रात    अँधेरी   काली,

दिनकर विमल विहान बनाते।


सुमधुर स्वर लय के प्रवाह में,

मन - अनुरंजक  गान बनाते।


नेह   एकता  सर्जक  घर   के,

स्वेद - बिंदु  नव छान  बनाते।


भौतिकता में क्या सुख  ढूँढ़े?

सद्गुण  ही   सम्मान  बनाते।


समय  चढ़ाता  मंजिल  ऊँची,

नर - पुंगव    सोपान   बनाते।


'शुभम्' न भूले मानव गुण को,

गुड़ - से  गुण   इंसान  बनाते।


🪴 शुभमस्तु !


30.01.2023◆7.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

स्वदेश के लिए जिया ⛳ [मनहरण घनाक्षरी ]

 51/2023

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

⛳ डॉ .भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                         -1-

स्वदेश के लिए जिया,वही जिया वही जिया,

सनेह  देश  से  किया, भ्रांति ये  न  मानिए।

परोपकार व्यक्ति  का, सदुपयोग शक्ति  का,

दुरंत दैन्य  मुक्ति का, ज्ञान- क्रांति   ठानिए।।

स्वतंत्र ही विचार हो,न दासता का भार  हो,

सकार  ही  सकार हो,आदमी को   छानिए।

बनें न आस्तीन साँप, शत्रु रहे भीत   काँप,

पाप  कर्म  को  न   ढाँप, मीत पहचानिए।।


                         -2-

मिटे न कर्म आपका,तजे न दोष पाप का,

सुपुण्य ईश - जाप   का,भारती  पुकारती।

बने न श्वान  ढोर-सा,रहे सुकान्त  भोर-सा,

सु नेह  मेघ  मोर -सा, करें मातृ  - आरती।।

स्वदेश  आप  मानिए, भ्रांति वृथा न पालिए,

प्रवीर   क्रांति   ठानिए,   मातृ भू   उबारती।

अनेकता  में  एकता,  है देशभक्त   देखता,

रहे  न   बुद्धि - मेषता,  धर्म मर्म  ज्यारती।।


🪴शुभमस्तु !


28.01.2023◆3.00

पतनम मार्तण्डस्य।

प्राण- विधान 🦢 [ दोहा गीतिका ]

 50/2023

  

■●■●■●■●■●■●■●■●■● 

✍️शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

एक  वचन होता नहीं,तन में निवसित  प्रान।

दस -दस का अस्तित्व है,वेत्ता- अनुसंधान।।


नर -नासा  से वक्ष में,जिसका सदा  निवास,

श्वास, शक्ति ,आहार को,करे संचरित  'प्रान'।


मल निष्कासन जो करे,नारि- प्रसव सम्पन्न,

रहता  मूलाधार   में, कहते विज्ञ   'अपान'।


रस वितरण संचार कर,हृदय नाभि के बीच,

ऊर्जा करे  ज्वलंत  ये,  संज्ञा प्राण  'समान'।


पश्च कंठ से शीश तक,ऊर्ध्व गमन के  काज,

करता चौथा प्राण ये,कहते सभी   'उदान'।


सकल  देह में  व्याप्त है,श्वास रक्त  संचार,

अंतर्मन  चालित  करे, पंचम प्राण  'व्यान'।


पाँच  प्राण के पाँच ही, क्रमशः हैं   उपप्राण,

'नाग'कूर्म'तीजा 'कृकल','देव',धनंजय'जान।


हिचकी क्रोध डकार का,स्वामी होता 'नाग',

गुदा -वायु, तन की  हवा,को देता   पहचान।


नेत्र क्रियाएँ 'कूर्म' से,'कृकल' छींक या भूख,

'देवदत्त'  अंगड़ाइयाँ, और जँभाई  -  तान।


रहे  'धनंजय'  देह  में, मरने  के  भी  बाद,

हर अवयव को स्वच्छता,करता सदा प्रदान।


बहु   प्राणों   से जीव का , होता  रक्षा - भार,

जाते  ही  दस प्राण  के,तन को माटी  मान।।


'प्रान '= 'प्राण' नामक प्रथम प्राण।

देव' =देवदत्त उपप्राण।




🪴शुभमस्तु !


27.01.2023◆4.30 पतनम मार्तण्डस्य।


गणतंत्र 🇮🇳 [ कुंडलिया ]

 49/2023

       

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

                         -1-

वेला  शुभ  गणतंत्र की,मिला हमें  नव  मंत्र।

विधिवत  संचालन  करें,बृहत देश  का  तंत्र।

बृहत  देश   का तंत्र,  एकता में  बँध   जाएँ।

हो  अखंड    भूभाग, दिवाली पर्व   मनाएँ।।

'शुभम्' विविध हैं रंग,विविधता का है  मेला।

हो न  परस्पर  द्वंद्व, आगमित पावन  वेला।।


                         -2-

अपने भारत  देश का, समता  मूल  विधान।

 धर्म सभी सब जातियाँ,सबका तंत्र समान।।

सबका  तंत्र समान,सुहृद गणतंत्र  कहाता।

मिलजुल  करें निवास,सुमन से बाग सुहाता।

'शुभम्' करें गुणगान, देख जो संभव  सपने।

आस्तीन के  साँप, कभी क्यों होते  अपने??

 

                           -3-

झाड़ी   दाढ़ी  की  लगे, शोभन  रूपाकार।

मठाधीश  विद्वान की,कतिपय संत मजार।

कतिपय संत मजार,दाढ़ियों में   भी  माया।

बना देश गणतंत्र, चरित की गाढ़ी   छाया।।

बड़े - बड़े हैं राज,कभी सीधी सित  आड़ी।

'शुभम्'खुजा लें खाज,घनी शूलों की झाड़ी।


                         -4-

खाते भू  का अन्न फल,पीते भी  सद  नीर।

ज्योति जलाएँ दीप की,रखना बचा  उशीर।।

रखना  बचा  उशीर, देश की भाषा  वाणी।

रहे अमर गणतंत्र, नारियाँ जग  कल्याणी।।

'शुभम्'न्याय विश्वास,व्यक्ति की गरिमा पाते।

बढ़े  बंधुता  नित्य, दिया भारत  का खाते।।


                         -5-

भारत की पहचान है,अपना सुघर  विधान।

देश  सुदृढ़  गणतंत्र  ये,हमें बचाना   मान।।

हमें  बचाना  मान,परस्पर लड़े    न   कोई।

होगा स्वर्ण-विहान, गुलामी अपनी    खोई।

करके कर्म महान,सुलभ हों सभी  महारत।

गुरु जगती का देश,'शुभम्'हो अपना भारत।


🪴शुभमस्तु!


27.01.2023◆12.30 पतनम मार्तण्डस्य।

दृश्य एक:दृष्टियाँ दो🗻 [ अतुकान्तिका ]

 48/2023

 

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

✍️ शब्दकार ©

🗻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

नीचे से 

ऊपर जाने वालों को

पहाड़ों की बर्फबारी में

स्वर्ग दिखाई देता है,

होटल के कमरे में

मेनका दिखाई देती है

अपनी वही पत्नी,

ऑफिस से लौटने पर

जिसकी शक्ल भी

सुहाती नहीं थी

तुलना में।


पूछो उन पहाड़ के

 वासिन्दों से,

जिनका जन्म ही

 हुआ वहाँ,

जीना मरना भी वहीं,

जिन्हें विसर्जन के लिए भी

सोचना पड़ता है,

कि जाएँ या 

टाल जाएँ,

पर जब 

हो लेते हैं बेवश,

तब पिघला कर

भगौने में 

जमी हुई बर्फ

हल्के हो लेते हैं,

कितनी बड़ी

विवशता है! 

प्रकृति की

यह कैसी विषमता है?


यही विषमता

नोटों की गर्मी में

दो चार दिन के लिए

स्वर्ग दिखाई देती है,

रहना पड़ जाए जो

उन्हें भी आजीवन

तो आटे- दाल का

भाव पता चल जाए!

फिर आज

दिखाई देते 

हुए स्वर्ग को

नरक ही बतलाएँ।


एक के जमे हुए

ठंडे आँसू 

उन्हें स्वर्ग के

दमकते मुक्ता सदृश

सुख में सुलांय,

दस-बीस वर्ष रहना हो

तो करने लगें

आँय - बाँय!

हाय! हाय!!


उनकी जगह

अपने को रख देखें!

स्वर्ग की ऊष्मा को

अनुभवें !

कुछ वर्षों के लिए

बर्फ में रहकर तपें,

यह और कुछ नहीं

दृष्टि- भेद है,

नहीं समझता आदमी

किसी और का दुःख

यही खेद है।


🪴 शुभमस्तु !


26.01.2023◆8.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सम्मेलन 👩‍👩‍👧‍👦 [ दोहा ]

 47/2023

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

👩‍👩‍👧‍👦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

सम्मेलन  मूषक  करें, म्याऊँ से   भयभीत।

मार्जारी  आए  नहीं, खोज रहे  वह   रीत।।


सम्मेलन में कवि सभी,पढ़ें काव्य सुविचार।

सुनें  न  कोई  अन्य  की,बहती  है  रसधार।।


नेता आए  मंच पर, करके बड़ा    विलम्ब।

सम्मेलन मतदान का,चली घृणा  की  बम्ब।।


रोचक  सम्मेलन  बड़ा,महिला गातीं  गीत।

शादी  का ज्योनार  है,गाली उघड़ अभीत।।


गगनांचल   में  मेघदल, उमड़े हैं  घनघोर।

सम्मेलन   करने   लगे,  लगे नाचने   मोर।।


सम्मेलन करने लगे,जुड़े आठ - दस   पंच।

जनता  की सुनते नहीं,अधर उठाए    मंच।।


सम्मेलन   के  नाम  पर, चंदा माँगा    ढेर।

जिसने  कीं जेबें गरम,तना बना  वह  शेर।।


सम्मेलन होली -मिलन,गुझिया के सँग भंग।

 भाभी  आईं   खेलने, देवर  जी   के  संग।।


सम्मेलन यह जीव का, धरती पर अवतार।

शत्रु  - मित्र  कोई  बने, बनता कोई   भार।।


आपस  में मिलते सभी, कारण  है  अज्ञात।

सम्मेलन नर-नारि का,पति- पत्नी की बात। 


पूर्व  जन्म के  शत्रु भी,मिल जाते  हैं  गैल।

सम्मेलन करके यहाँ, पिघलाते निज मैल।।


🪴शुभमस्तु !


25.01.2023◆4.45

पतनम मार्तण्डस्य।


अलसी सरसों झूमती 🌾 [ दोहा ]

 46/2023

  

[अलसी,सरसों, खेत,खलिहान,फागुन]

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

      🌻 सब में एक 🌻

अलसी कलसी शीश रख,नाच रही है खेत।

नीली  साड़ी  सोहती, गाती- सी    समवेत।।

भोजन के सँग लीजिए,जी अलसी के बीज

कब्ज अपच हरती सदा,ये औषधि की चीज


पीली  चादर  ओढ़कर,उतरा नव  मधुमास।

सरसों फूली  नाचती,भीनी भरी   सुवास।।

धरती का शृंगार कर,सरसों प्रमुदित आज।

पीत सुमन महमह करें,बँधा शीश पर ताज।।


सरसों अलसी खेत में,करतीं जीभर नृत्य।

मौन गीत वे गा रहीं,कवि कहता है सत्य।।

खड़े खेत  गोधूम  के,झूमे हरित     बहार।

भरी  बालियाँ  नाचतीं, पा झोंकों का प्यार।।


धान पका खलिहान से,लाया उठा किसान

प्रमुदित है सहधर्मिणी,अवसर कर लें दान।।

पछताया कागा पड़ा,बहा  अन्न खलिहान।

रही गिलहरी हर्षिता,श्रम का अपना  मान।।


इधर  माघ होता विदा, फागुन आया  झूम।

भौंरे  झूमे  फूल  पर,  रहे कली  को  चूम।।

फागुन है   तो  रंग  है, रंग-संग   मधुमास।

बौराए  हैं  आम  ये, उठती मधुर   सुवास।।


     🌻   एक में सब  🌻

सरसों  अलसी   खेत में,

                            नाच रहीं नित    झूम।

अन्न    भरे   खलिहान  में,

                           फागुन लेता      चूम।।


🪴 शुभमस्तु !


24.01.2023◆10.30

पतनम मार्तण्डस्य।

माँ की ममता 👩🏻‍🍼 [ कुन्दलता सवैया ]

 45/2023

 

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

छंद- विधान:

1.कुन्दलता सवैया चार चरण का एक  वर्णिक छंद है।

2.इस छंद में 08 सगण (112×8)+ 02 लघु (11)=26 वर्ण होते हैं।

3.चारों चरण समतुकांत होते हैं।

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

✍️ शब्दकार ©

👩🏻‍🍼 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■◆■●■●■●■●■●

                         -1-

निज अंक लिटाइ रिझाइ रही,

           जननी अपने सुत को मनभावन।

दृग  मूँद  अपार  करे  विनती,

          प्रभु देंइ सदा सुख दुःख नसावन।।

तन को नहिं दुःख मिले शिशु को,

           घर- द्वार रहे नित ही अति पावन।

मुख  चूमि रही अधरा धरि के,

         सुत माघ समीप झुका जनु फागन।।


                         -2-

जननी  सम  शेष नहीं ममता,

            पितु नेह सदा अगला पद धारक।

तन चूमि कहे सुत सों जननी,

          मम तू जग-जीवन  पावन  तारक ।।

गुण गाइ रिझाइ ख़िलावति है,

            नहिं देखति नेंकहु बाधक कारक।

तन दो वरु एकहि प्राण कहे,

              सहिकें विलगाव रहे नहिं  हारक।।


                         -3-

पहले - पहले सुख संतति को,

             उमगाइ रहे हिय को रस-सागर।

शत बार निहारति है मुख को,

          कबहूँ निज अंकन धारि उजागर।।

नव मास धरे निज कोख जनी,

            रचि पूरण आवत संतति बाहर।

जननी पितु पूरक आपस में,

              उढ़काइ रहे सत नेहिल  गागर।।


                          -4-

गुरुता सुत की तब जानि पड़े,

              जब मान करे सुख देय सुपावन।

तन से मन से नहिं त्रास मिले,

           तन के मन के सब दुःख नसावन।।

उर   में   नित नेह हिलोर भरें,

                तप ग्रीषम मास बनावत सावन।

चरितावलि  गान  स्वदेश करे,

          लगता जन को अति ही मनभावन।।


                         -5-

जननी- पद नाक समान सदा,

          कवि कोविद काव्य करें सुखदायक।

निज अंक सँवारि सजाइ रखे,

           समता नहिं और सुमातु  सहायक।।

प्रतिपालक जन्म प्रदायक माँ,    

            सुत कारक एक पिता वर  नायक।

विष कारक  एक  समाज रहे,

           उकसाय चलाइ रहे नित   सायक।।


🪴 शुभमस्तु !


24.01.2023◆12.15 पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 23 जनवरी 2023

प्राण - विचार 🫧 [ दोहा ]

 42/2023

   

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

✍️ शब्दकार ©

🫧 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

     🦢 पंच प्राण 🦢

पंच प्राण नर देह में,'प्राण' 'अपान' 'समान'।

संज्ञा चौथे पाँचवें, हैं 'उदान' सह   'व्यान'।।


प्रथम 'प्राण' को जानिए, खींचे  श्वासाहार।

हर मानव की देह में,करता बल  -  संचार।।

वास 'प्राण' का वक्ष में,रंग ध्यान में पीत।

चक्र अनाहत को करे,श्वास- शक्ति संगीत।।


गुदा  मूल  में  वास  है, दूजा प्राण 'अपान'।

उत्सर्जन मल का करे, ऐसा सृजन-विधान।।

ध्यान लीन साधक  कभी,रँग नारंगी   दृश्य।

करे प्रभावित मूल को,प्राण 'अपान'अवश्य।।


रस-संचालन को करे,वितरित प्राण 'समान'

कर ज्वलंत ऊर्जा सभी,सक्रिय नाभि स्थान।

हरा रंग  इस प्राण का,कहते जिसे  'समान'।

साधक हो जब ध्यान में,मणिपूरक पर जान।


चौथा   प्राण 'उदान' है,ध्यान  बैंगनी   रंग।

कड़क  बनाए देह को,क्रिया ऊर्ध्व  ग्रीवांग।।

कंठ पश्च  संभाग में, चक्र विशुद्ध    निवास।

श्वासअन्न जल ग्रहण कर,भरे 'उदान' उजास

ग्रहण करे शिक्षा सभी,अपना प्राण 'उदान'।

नींद मरण में भी यही,दे विश्रांति का दान।।


पूरी  मानव   देह   में,  है संव्याप्त  'व्यान'।

स्वेद,रक्त,रस-संचरण,का रखता है ध्यान।।

चलना,उठना, बैठना, अंतर्मन के   काज।

'व्यान'प्राण करता सदा,कल परसों या आज

'व्यान'खोलता चक्षु को,करता भी वह बंद।

वर्ण गुलाबी ध्यान  में, चला श्वास  स्वछंद।।

सहस बहत्तर नाड़ियाँ,'व्यान' प्राण की राह।

त्वचा,इन्द्रियाँ,पेशियाँ,तत्त्व नीर अवगाह।।

बाहर जो चलती हवा,कहलाती वह 'व्यान'।

करे समन्वय संतुलन,चक्कर स्वाधिष्ठान।।


🦢  पंच उप-प्राण 🦢

पंच  प्राण  के  पाँच ही, होते हैं उप - प्राण।

'कूर्म','कृकल',सँग'नाग' के, 'देवदत्त'से त्राण।।

पंचम शुभ उप प्राण है,नाम 'धनंजय'जान।

करें क्रियाएँ देह की, बँटे विभाग  समान।।


'नाग' एक उपप्राण है,प्रथम 'प्राण'का मान।

हिचकी वायु अपान भी,क्रोध, वायु संधान।।

क्रोधजात विष को करे,'नाग'सदा उत्पन्न।

भस्म करे तन की सुधा, करे उदर को धन्न। 

उदर वात को रोकना, एक 'नाग' का काम।

रोके  मितली आगमन,हृदय- तंत्र विश्राम।।


'कूर्म' प्राण  'अपान'से,है सम्बद्ध   विभाग।

मृत्यु  क्षणों  में प्रथम ये,छोड़े अपना  राग।।

नेत्र खोलना मूँदना, गुरुत्वाकर्षण - काज।

करे 'कूर्म' उपप्राण ही, एकाग्रता   सुसाज।।


'कृकल' एक उपप्राण है,उसका प्राण'समान'

ऊर्जा रस विटमिन्स की,करता पूर्ति प्रतान।।

सफल साधना के लिए,करें 'कृकल'दृढ़ मीत।

भूख,प्यास,छींकें सभी,वश में कर के जीत।।


चौथे प्राण 'उदान' का, 'देवदत्त'  उपप्राण।

लोकोत्तर से जोड़ता, करे ज्ञान   का त्राण।।

अष्ट सिद्धि नव निद्धियाँ,'देवदत्त'  आरूढ़।

शाप और वरदान भी,दर्श श्रवण अति गूढ़।।

जमहाई    अँगड़ाइयाँ, 'देवदत्त'    संबद्ध।

नासा से नर  कंठ  तक, निद्रालस में नद्ध।।


उदर-क्रियाओं से जुड़ा,'व्यान'  प्राण उपप्राण

नाम 'धनंजय' जानिए,स्वस्थ करे तन त्राण।

रहना  है  नीरोग  जो, सुदृढ़ रखें  उपप्राण।

करें 'धनंजय' प्रबलतम,भाव न भर म्रियमाण

मृत्यु  बाद  भी  देह में,रहे 'धनंजय' शेष।

बढ़ते नख या केश भी,बदले तन का वेष।।


पंच प्राण उपप्राण का,सकल सूक्ष्म विस्तार।

मानव का जीवन चले, करे 'शुभम्' सुविचार।

मनुज  - देह साधन सदा, प्राणों का आधार।

बिना प्राण है मृत्तिका, क्षण भर में निस्सार।।


🪴शुभमस्तु !


22.01.2023◆9.00

पतनम मार्तण्डस्य।

मैं' 🫧 [ आलेख ]

 41/2023 


 ■●■●■●■●■●■●■●■●■● 

 ✍️ लेखक© 

 🫧 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 ■●■●■●■●■●■●■●■●■● 

 अपनी साढ़े तीन हाथ की इस समग्र देह में नख से शिख तक अपने 'मैं' को ढूँढ़ता हूँ, तो मुझे कहीं कुछ भी मुझे अपने 'मैं' के अस्तित्व का पता नहीं लगता।मेरे उस 'मैं' के स्वत्व के अस्तित्व से मेरी देह का अन्तः और बाह्य दुर्ग जाज्वल्यमान है, तथापि अपने चर्म चक्षुओं से अदृश्य और अन्तः प्रज्ञा चक्षुओं से भी उस प्रकाश पुंज को ढूँढ़ नहीं पाया हूँ। देह के एक- एक अंग, उपांग,नस,तंत्रिका, रक्त प्रवाह,रक्त बिंदु ,सूक्ष्मतम कोशिकाएँ, प्रोटोप्लाज्म, केंद्रक,मायटोकॉन्ड्रिया आदि में मेरा 'मैं' कहाँ छिपा हुआ है;यह सब कुछ एक जटिलतम रहस्य ही है।

        मानव शरीर- वेत्ताओं ने बताया है कि जिस शरीर को हम देख और स्पर्श कर पाते हैं ,वह तो पंच तत्त्वों से बना हुआ 'स्थूल शरीर' है तथा हमारे द्वारा किये जाने वाले विविध कर्मों का साधन है।इसके भीतर दो शरीर और भी हमारी 'आत्मा' को ढँके हुए हैं , जिन्हें 'सूक्ष्म शरीर' और 'कारण शरीर' की संज्ञा दी जाती है।'स्थूल या भौतिक शरीर' से जब आत्मा बाहर चली जाती है तो हमारा 'सूक्ष्म शरीर 'उसके साथ रहता है औऱ उसमें केवल हवा और आकाश तत्व ही शेष रह जाते हैं।चूँकि हवा औऱ आकाश आँखों से देखे नहीं जा सकते ,इसलिए हमारे आसपास रहते हुए भी कोई 'सूक्ष्म शरीर' देखा नहीं जा सकता।उसका निर्माण भी हवा और आकाश तत्त्व से होता है।इतना सूक्ष्म होने के बावजूद इसमें हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ,पाँच कर्मेन्द्रियाँ,पाँच प्राण मन और बुद्धि ये कुल सत्रह सदैव उसके साथ रहते हैं। कितना विचित्र है हमारा यह 'सूक्ष्म शरीर'।

       उपर्युक्त परिच्छेद में जिन सत्रह (17) की चर्चा की गई है ;उनमें पाँच ज्ञानेंद्रियों (चक्षु, कान, नासिका, त्वचा और जीभ) तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ,पैर, मुँह, गुदा औऱ लिंग) ;पाँच प्राण (प्राण,अपान,समान,उदान औऱ व्यान) तथा इसी क्रम से इनके पाँच ही उपप्राण क्रमशः(नाग,कूर्म,कृकल,देवदत्त और धनंजय) ,मन तथा बुद्धि :ये सभी सत्रह हैं।इन सभी के व्यापक सूक्ष्म और विस्तृत कार्यों तंत्र में मेरे 'मैं' की खोज करना कोई सहज कार्य नहीं है। इसके लिए 'नेति- नेति ' अथवा 'अनन्त' कहकर परमात्मा (किंवा प्रकृति) का जटिल रहस्य मानकर यही कहना चाहिए कि मेरा 'मैं' इस विस्तृत तंत्र में सर्वत्र व्याप्त है।जब एक -एक कर हमारे प्राण और उपप्राण इस देह को छोड़ने लगते हैं , तब मेरा 'मैं' भी उसके 'मैं पन ' का त्याग करते हुए अनन्त में विलीन हो जाता है और पंच तत्त्वों से निर्मित इस शरीर के क्षिति, जल, पावक ,गगन औऱ वायु अपने वास्तविक स्वरूप में क्षिति क्षिति में, जल जल में, पावक पावक में,गगन गगन में और वायु वायु में जाकर मिल एकमेक हो जाते हैं।मन, बुद्धि ,चित और अहंकार वाली यह आत्मा 'स्थूल शरीर' से मुक्त होकर हमारे 'सूक्ष्म' और 'कारण शरीर 'के आवरण से मुक्त होकर शुद्ध और पवित्र हो जाती है। मेरा 'मैं' कहीं भी नहीं शेष रह जाता।समस्त त्रि आवरणों से आच्छादित आत्मा निर्मल हो जाता है। 

      मेरा ये तथाकथित 'मैं' मात्र मेरे इस पार्थिव जगत में रहने तक है ,उसके बाद अनन्त लोक की यात्रा पर कहाँ - कहाँ जाता है और विविध पड़ावों को पार करता हुआ ,रुकता चलता बढ़ता है,कोई नहीं जानता।हमारे प्रारब्ध कर्मों की नाव हमें कहाँ ले जाए, सब कुछ भविष्य के गर्भ में है। 

 🪴शुभमस्तु !

 22.01.2023◆11.00पतन्म मार्तण्डस्य।


ग़ज़ल 🇮🇳

 40/2023

     

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

आज़ाद          भारत        के  तिरंगे।

छत     टैंक       पे       नचते   तिरंगे।।


तीन    दिन    की       बात   थी  बस,

आज          तक        सजते   तिरंगे।


आजादियाँ           मनमानियाँ       हैं,

जड़           बने        फिरते     तिरंगे।


बात         क्यों          मानें     विधानी,

तीर           से           चिरते     तिरंगे।


क्या       बताएँ         आम    जन  को,

घास    -      सी         चरते      तिरंगे।


हाथ              में        आया  खिलौना,

धूल            में          गिरते      तिरंगे।


बर्दाश्त        के    बाहर    'शुभम्'  ये,

देश          के           मरते      तिरंगे।


🪴शुभमस्तु !


21.01.2023◆8.00

पतनम मार्तण्डस्य।

अक्षुण्ण गणतंत्र 🇮🇳 [मनहरण घनाक्षरी ]

 39/2023

   

□◆□◆□◆□◆□◆□◆□◆□◆□

✍️ शब्दकार *

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

□◆□◆□◆□◆□◆□●□◆□◆□

                         -1-

 भव्य स्वर्ण-सा विहान,लागू हुआ संविधान,

बना  देश   ये  महान,  तथ्य सत्य   जानिए।

देश  स्वयं  के  अधीन, देखें नहीं  मेख-मीन,

बनें  आप  में  प्रवीण,     डोर नहीं   तानिए।।

याद  रखें  बलिदान,   देश  हित दिए   प्राण,

करें   नाम   गुणगान,   सु-वीर   सम्मानिए।

'शुभं' देश  गणतंत्र, एक  ध्वज  एक  मंत्र,

व्यक्ति -व्यक्ति  चल यंत्र,पूत  प्रण ठानिए।।


                         -2-

लेश  सोए  नहीं  नींद, खोल जागे निज दीद,

मरे  नहीं  वे   शहीद,  रक्त  याद     कीजिए।

त्याग  दारा  परिवार,  झेल दुःख   पारावार,

देश - दासता  निवार, मीत सीख   लीजिए।।

आए  देश हित  काम,नहीं जाना  है  आराम,

रात-दिन   भोर-शाम,  थोड़ा तो  पसीजिए।

क्षय हो न   गणतंत्र,  मान एकता   का   मंत्र,

नर -  नारी  बन  यंत्र,  प्रेम -सुधा   पीजिए।।


                         -3-

कोई समझे  न  ख़्वाब,  देव तुल्य भीमराव,

देश- भूमि  से  सु-भाव, दिया संविधान   है।

जाति-वर्ण  भेद भूल,मात्र दृष्टि  में   उसूल,

बोए   यहाँ-वहाँ  फूल, कंचनी विहान    है।।

प्राप्त सबको हो  न्याय,नहीं शोषण अन्याय,

चैन  मिले  प्रति  काय,  भारत की  शान  है।

नहीं एक का था काम,दिया मिलके  अंजाम,

झेल शीत  ताप  घाम,आज निज मान  है।।


                         -4-

त्याग उर के विकार,करें न्याय का   प्रसार,

माँगें   तब     अधिकार,   देश गणतंत्र   है।

करें  पहले   कर्तव्य,  यह  देश बने    भव्य,

आग जला नित हव्य,सद भाव  मंत्र    है।।

छोड़  जाति वर्ण भेद, गात बहे  तव   स्वेद,

मात्र श्रम  न्याय  वेद, नारि- नर   यंत्र  है।

करें  नहीं  मनमानी,  बनके मूढ़  अज्ञानी,

बना  कर्म को निशानी, देश ये स्वतंत्र  है।।


                          -5-

लिया  हमने  ये  भाँप,  छिपे बैठे  गुप्त साँप,    

रहा  देश   निज   काँप,  सर्प नाश  कीजिए।

एक   श्रेष्ठ   संविधान,   रहे सबको   समान,

तने  एक   ही  वितान,  देश - रंग  भीजिए।।

बनें  नहीं  भूमि -भार, लेना देश  को  उबार,

शत्रु  करें  क्षार - क्षार ,सूक्ष्म न पसीजिए ।

फूँक  एकता का  मंत्र, रखें देश  को स्वतंत्र,

है   अक्षुण्ण  गणतंत्र,  नेह- छोह  दीजिए।।


🪴शुभमस्तु!


21.01.2023◆12.30पतन्म मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

मँहगाई 💎 [ कुण्डलिया ]

 38/2023

        

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

💎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                         -1-

छाई  फैशन ओढ़कर,ज्योँ पानी  पर   मैल।

मँहगाई  बैरिन  हुई,  रुद्ध प्रगति  की गैल।।

रुद्ध प्रगति  की गैल, बनी निर्धन की डायन।

नेता  कहते  ठीक,किए  जा  ये  ही  गायन।।

'शुभम्'  भरी  दुर्गंध, फैलती सर  पर  काई।

त्यों मँहगाई नित्य,आम जन-जन पर छाई।।


                         -2-

वेतन अब आधा हुआ, मँहगाई   का  काल।

एक ओर  है आयकर,उधर बिगड़ते  हाल।।

उधर बिगड़ते हाल,गुजारा बड़ा  कड़ा   है।

निवृत्ति वेतन  नित्य,निवाले का  झगड़ा है।।

'शुभम्'सुता का ब्याह,और सुत के भी बेधन

कैसे  हो   गृहकाज, अर्द्ध ही पाता   वेतन।।


                          -3-

नेता  रोटी   छोड़कर,   करते मेवा - भोग।

जनता  रोटी - दाल  का ,झेल रही  है रोग।।

झेल रही है रोग, लीद में मिलता  धनियाँ।

कल्लू बनता  काल,बड़ी गद्दी का  बनियाँ।।

'शुभम्' देख लें आज,सामने एक  न  लेता।

मँहगाई    का  अंड,  से  रहा ऊपर   नेता।।


                         -4-

जीना जनता को यहाँ, मरना भी  इस  देश।

वे  तो  उड़कर   यान  में, चाहें मरें   विदेश।।

चाहें  मरें   विदेश, बढ़ाकर नित    मँहगाई।

तेल  लकड़ियाँ   नौंन,जुटाना दुष्कर भाई।।

'शुभम्'  प्रदूषित   नीर, दूर  से लाकर  पीना।

कनक  नोट भंडार, सजा  नेता  को  जीना।।


                         -5-

किसमिस  काजू  वे चरें,  साथ  संतरा  सेव।

अपने  को  ऊपर बिठा, कहलाते  हैं   देव।।

कहलाते  हैं  देव, पुजा  पद लोग  -  लुगाई।

जनता का  सब माल,उसी को दे  मँहगाई।।

'शुभं'धन्य वह देश,जहाँ की जनता बेहिस।

नेता ही भगवान, चाभते काजू  किसमिस।।


🪴शुभमस्तु!


20.01.2023◆3.30 पतनम मार्तण्डस्य।

कान से ली ; जुबान से दी [ व्यंग्य ]

 ३७/२०२३ 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■ 

व्यंग्यकार © 

 🐁 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 ■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■ 

      निंदक औऱ निंदा समाज के आवश्यक तत्त्व हैं।इनके बिना समाज में गति नहीं आती।इसीलिए महात्मा कबीरदास ने सैकड़ों वर्ष पहले कहा था: 'निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।बिन साबुन पानी बिना,निर्मल होत सुभाव।।' 

     'निंदा रस' एक ऐसा रस है,जो मानव मात्र में एक अनिवार्य तत्त्व की तरह विद्यमान है।भोजन के षट रसों औऱ साहित्य के दस रसों से सर्वथा भिन्न इस रस के स्वामी और ग्राहक को किसी विद्यालय ,महाविद्यालय में पढ़ने किंवा प्रक्षिक्षण लेने अथवा किसी विश्वविद्यालय की उपाधि प्राप्त करने की भी आवश्यकता नहीं है।वास्तविकता यह है कि इससे निंदक की ऊँचाई और गहराई की पड़ताल अवश्य हो जाती है ।कहने का तात्पर्य यह है कि यह निंदक की अपनी बुद्धि का बैरोमीटर है।उसके अपने स्तर की माप करता है।इसके साथ ही जो निंदा को सुनता है, उसकी माप तो स्वतः ही हो जाती है ;क्योंकि निंदक सदैव अपने स्तर के श्रोता को खोजकर ही निंदा- प्रवचन करता है।जैसे दो सासें अपनी बहुओं की निंदा तभी करती हैं ,जब श्रोता सास उतना ही रस लेकर उसका आस्वादन करे। बीच बीच में उसकी जिज्ञासा और प्रश्न तो उसको और दीर्घता प्रदान करते हुए अगणित गुणा रस वृद्धि करते हैं। जैसे :' उसके बाद?' ' फिर क्या हुआ?' 'फिर उसने भी लौटकर मारा ? ' आदि वाक्यांश उसके रस उद्भव में चार चाँद लगा देते हैं। निंदा और निंदक मानव - चरित्र की पहचान का पैमाना ही है। 

        निंदा में कभी भी सच तथ्य को नहीं कहा जाता ।झूठ और सच का अनुपात 90 - 100 या कभी -कभी 100-100 भी रह सकता है।यदि कभी कोई सच बात कह भी दे तो उसे सिद्ध करने के लिए प्रमाण देना भी अनिवार्य हो जाता है।यदि ये कहा जाए कि कल्लू के बेटे की बहू आई. ए. एस. हो गई तो कोई भी सहज रूप में विश्वास नहीं कर सकता। उसमें अनेक कैसे ?क्यों?कब?कहाँ?पैदा हो जाएंगे। इसके विपरीत यदि किसी के कान में ये फुसफुसा दिया जाए कि कल्लू के बेटे की बहू देवर के साथ फरार हो गई ,तो बिना किसी क्यों ?कब?कैसे? के बिना सहज रूप में शत- प्रतिशत बात स्वीकार ही होगी।औऱ वह समाज में ऐसे फैल जाएगी ,जैसे पानी के तल पर पड़ी हुई तेल की बूँद। 

         पूर्व में भी कहा जा चुका है कि निंदक की उपाधि कम या अधिक मात्रा में सबके ही पास होती है, क्योंकि वह जन्मजात है। स्वभावगत है।इसलिए सामान्य नर- नारी, चोर या व्यभिचारी, कर्मचारी या अधिकारी, नेता या मंत्री, मालिक या संतरी, शिक्षक या छात्र, कवि या आलोचक, सास या बहू,अड़ौसी या पड़ौसी,मौसा या मौसी ;कहाँ नहीं है। ऐसा व्यक्ति दिन में भी रोशनी- पुंज लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलने वाला ,जो निंदक या निंदा रस लोलुप न हो ! यह एक सर्वप्रिय मुफ़्त का रस है। इसके लिए किसी साक्ष्य ,किसी सौगंध, किसी गंगाजली, किसी गीता पर हाथ रखने आदि की कोई अवश्यकता नहीं है। निंदा सुनकर कोई कभी प्रश्न नहीं करता, सहज विश्वास ही करता है औऱ प्रचारक बनकर उसे जितना हो सकता है ,फैलाने में लग जाता है।

            कबीर दास के अनुसार यह एक ऐसा शुद्धक और बुद्धि सुधारक है कि इसके लिए कोई डिटर्जेंट ,ईजी या फिनायल ,हारपिक क्या पानी की भी आवश्यकता नहीं है।यह निंदक और ग्राहक दोनों को ही शुद्धि प्रदान करने का पुण्य कमाता है।यह अलग बात है कि यह किसी का भाव है तो किसी -किसी का तो स्वभाव ही बन चुका है। जिसका स्वभाव ही निंदा है, वह कदापि नहीं अपने कर्म से शर्मिन्दा है। क्योंकि वह तो एक ऐसा उड़ता हुआ परिंदा है कि कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल का वासिन्दा है। ऐसा निंदक जब तक जिंदा है, तब तक उसकी जबान पर अपना आसन जमाए हुए रानी निंदा है।अब चाहे वह मुम्बई ,कोलकाता हो या भटिंडा है।उसके माथे क्या उसकी सारी देह पर निंदा का बिन्दा है।

        निंदानंद को कभी क्रय नहीं करना पड़ता। इसको देने और लेने में कोई आर्थिक व्यय या हानि भी नहीं है। जब निंदा रस ही है ,तो कष्ट भी क्या होने वाला है? विरस होता तो लेने देने में आपत्ति भी हो सकती थी।गुणकारी जानकर तो लोग नीम और कुनैन को भी प्रेम से रसनास्थ कर जाते हैं।उदर में जाकर तो गुलाबजामुन और भिंडी की सब्ज़ी का भी एक ही हस्र होता है।इसके विपरीत निंदा सदा आनन्दप्रद ही बनी रहती है।अलग- अलग कानों में अलग - अलग मुखरविंदों से निसृत होकर अपना एक नवीन प्रभाव ही भरती है।भर पेट निंदा- रस लेने के बाद भी अपच नहीं होती।दूसरी ओर देने पर यह घटती भी नहीं।

       ठलुआ क्लब में समय व्यतीत करने का इससे अच्छा कोई साधन भी नहीं है।'हर्रा लगे न फिटकरी रँग चोखा ही आए'। यह घर, बाहर, दफ्तर, सड़क, पनघट,गली का नुक्कड़,घूर- स्थल,सभाकक्ष,जल भरण- थल, गली के नुक्कड़,दुकान, मध्याह्न -गोष्ठी स्थल, स्वेटर- बुनाई स्थल,विवाह ,शादी के उत्सव,परस्पर वस्तु-विनिमय काल आदि अनगिनत स्थान औऱ समय हैं ,जब निंदा रस- प्रसार अनवरत और अबाध रूप से होता है। 

       कबीरदास जी ने जब निंदक को नियरे अर्थात पास में रखने की पवित्र औऱ नेक सलाह दी, तो मेरा यह सोचना आवश्यक हो गया कि जब हम निंदकों की बस्ती, गली, दफ्तर, बाजार आदि सभी जगह निंदकों का बहुमत पाते हैं तो चाहे या अनचाहे उनसे बच भी तो नहीं सकते। वे तो धुएंदार हवा की तरह सभी जगह पहले से ही विद्यमान हैं।वे तो पहले से ही हमें छुछून्दर की तरह सूँघने में लगे हुए रहते हैं।उन्हें पास में क्या रखना?वे स्वयं हमें अपने पास रखे हुए होते हैं।वे कोई निराश्रित या बेघर तो हैं नहीं जो उनके लिए आँगन में कुटी छ्वानी पड़े। वे तो बहु मंजिला भवनों ,कोठियों और बिना आँगन के भवनों रहने वाले /वालियाँ हैं।अब आजकल के आवासों में आँगन बनाने का फैशन ही समाप्त हो गया तो कुटी छवाई भी कहाँ जाएगी? निंदा तो एक ऐसी 'बू' है जो सुनने और सुनाने वाले के लिए खुशबू है तो जिसकी फैलाई जाए ,उसके लिए बदबू है।एक ही वस्तु के उभय गुण ।कान से ली औऱ जुबान से दी जाती है;औऱ कभी -कभी तो फुसफुसाहट में ही मैदान पर मैदान पार करती हुई देखी जाती है। वाह री ! निंदा और वाह रे! निंदकों /निन्दकियो! 

 🪴शुभमस्तु! 

 20.01.2023◆ 11.30आरोहणम् मार्तण्डस्य। 

बतखें ' और 'हंस' 🦢 [ अतुकान्तिका ]

 36/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

बातों की

खों - खों से

खोंखियाने वाली 

इन मत्स्य -भक्षिकाओं को

हंस मत समझो,

ये तो मात्र

 'बतखें'  हैं,

इन 'बतखों' की

खों- खों 

बस उनकी 

खोंखियाहट है ।


मुक्ताग्राही 'हंसों' की

इन 'बतखों' से

क्या समानता!

तुलना भी क्या ?

इनका काम है

बस गंदगी पर

पंजे मारना,

अपने आहार को

खोजकर निकालना।


पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं

ये सभी 'बतखें'

इनकी स्तुति

निंदा पर क्या जाना,

गोरा रंग होने से

गर्दभ अश्व 

नहीं हो जाते! 


आइए इन 

'बतखों' और

'हंसों' को जानें

पहचानें,

और इनकी

मत्स्यग्राही दृष्टि को

भविष्य के लिए

खतरा मानें।


'शुभम्' नहीं हैं ये

किसी के भी लिए,

इनका तो काम ही है

चीरना - फाड़ना

हिंसा कर 

करती हैं हनन ,

करें तो इस तथ्य पर

तटस्थ होकर मनन,

यथार्थ जान लेने पर

होगी ही

मस्तिष्क में

छूम - छनन।


🪴 शुभमस्तु !


20.01.2023◆6.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 19 जनवरी 2023

लेखनी 🖊️ [ दोहा ]

 35/2023

       

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🖊️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

विद्या - माता भारती, देतीं निज उपहार।

हाथ गहातीं  लेखनी ,बनता रचनाकार।।


चलती है जब लेखनी,लिखती साँचे  बोल।

भाव  शब्द  संयोग से, देता है कवि   घोल।।


ऐ मेरी प्रिय लेखनी,मत लिख ऐसे  बोल।

चाटुकारिता हो भरी,कहे शब्द हर  तोल।।


वाणी माँ देतीं  नहीं, सबको शुभ  उपहार।

साध न  पाए  लेखनी,झूठा नर  बटमार।।


मान लेखनी का रखे,पावन कवि-कर्तव्य।

निज भावी उज्ज्वल करे,जीवन हो तव भव्य


नेता -वंदन में नहीं, लिखें न कविता लेख।

शब्दकार उत्तम वही, सफल लेखनी देख।।


सबल लेखनी शस्त्र से,करती है नित न्याय।

जज अधिवक्ता देश के,करते सत्य उपाय।।


मिले लेखनी -शक्ति जो, करना जन-उपचार।

जज वकील कवि वैद्य को,मिला ईश उपहार


धन्य -धन्य गुरु जनक माँ, हमें गहाई  हाथ।

वाणी माँ की लेखनी,सदा 'शुभम्' के साथ।।


आओ पूजें  लेखनी, श्रद्धा सह   सम्मान।

ऊपर स्थित कर दिया,करती ऊँची शान।।


अहित नहीं करना कभी,सदा लेखनी मीत।

सदा  सत्य आधार हो,जीवन में   दे  जीत।।


🪴शुभमस्तु!


18.01.2023◆9.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


🖊️🖋️🖊️🖋️🖊️🖋️🖊️✒️🖊️

परिवर्तन ही जीवन है 🌈 [ दोहा ]

 34/2023


[वसंत, शिशिर,ऋतु,बहार, परिवर्तन ]

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■


         🍑 सब में एक 🍑


कवि -कवयित्री के लिए,बारह मास वसंत।

जर्जर मन करता सदा,कवि-जीवन का अंत।

नई   चेतना  ओज  से, भर मन में   उत्साह।

जाग्रत नवल वसंत हो,चल मानव सत राह।


शिशिर शीत अभिशप्त हैं,निर्धन खग तरु ढोर

बाट देखते रात की,कवि, व्यभिचारी, चोर।।

शिशिर-निशा में देखती,तिया पिया की राह।

सूनी-सूनी  सेज  है,उर  में मिलन - उछाह।।


वेला शुभ ऋतु काल की,मन में उठे हिलोर।

सजन-मिलन की बाट में,देखे पथ की ओर।

ऋतु आई कलियाँ खिलीं,छाई नवल बहार।

है   वसंत  मनभावनी, खुलें चेतना - द्वार।।


लाल-लाल  कोंपल नई,उगने लगीं  अपार।

वन-उपवन में छा गई, पावन सुखद बहार।।

कूक-कूक कोकिल कहे,देखो नवल बहार।

तज प्रमाद आनंद लें,तन-मन बना उदार।।


परिवर्तन का नाम ही,है जीवन  का  खेल।

धूप -छाँव चलती रहे,हों सुख-दुख के मेल।।

नहीं  तुम्हारे  हाथ  में,परिवर्तन  का  चक्र।

कभी सरल रेखा  बने, कभी हो  रहा  वक्र।।


         🍑 एक में सब 🍑

ऋतु  वसंत  या  शिशिर के,

                       परिवर्तन का    रूप।

देता   सुखद   बहार   भी,

                         कभी गिराए   कूप।।


🪴 शुभमस्तु!


18.01.2023◆6.45आरोहणम् मार्तण्डस्य।


🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑🍑

वृक्ष -रसोई ☘️ [बालगीत ]

 33/2023

     

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

हरा -  हरा   अंबर   के  नीचे।

खेत, बाग,वन, सब  बाग़ीचे।।


झाड़, पेड़, शाकें , वन, बेलें।

हरे   रंग   के  कपड़े   ले लें।।

वर्षा  ऋतु   में   बादल सींचे।

हरा -हरा  अंबर   के   नीचे।।


इसमें  कोई    भेद   छिपा है।

सबको नहीं कभी दिखता है।

प्रकृति कोख में अपनी भींचे।

हरा -  हरा   अंबर   के नीचे।।


कहते  पकती   वहाँ   रसोई।

जान सका ये   कोई -  कोई।।

पर्ण  हरित  के  खुले   दरीचे।

हरा - हरा  अंबर    के  नीचे।।


धूप  निकलती भोजन बनता।

गैस  आदि  सँग उसके जलता।

पौधा तब निज भोजन खींचे।

हरा  - हरा   अंबर   के नीचे।।


'शुभम्' रसोईघर  तरुवर का।

पल्लव हरा लता के घर का।।

लेते विटप   नयन  को  मींचे।

हरा -  हरा   अंबर   के नीचे।।


🪴शुभमस्तु !


17.01.2023◆7.45 पतनम मार्तण्डस्य।

खिलते फूल 🌹 [ बालगीत ]

 32/2023

     

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

खिलते  फूल  महक  फैलाते।

हम सबको वे  पास   बुलाते।।


गेंदा, गुडहल,  पाटल ,  बेला।

कमल,कुंद, चंपा   का  मेला।।

जूही   ,कुमुद  ,केवड़ा   भाते।

खिलते   फूल  महक  फैलाते।।


मंदिर  में    देवों    पर  चढ़ते।

रण के पथ जब सैनिक बढ़ते।

नर - नारी   की  सेज सजाते।

खिलते फूल  महक फैलाते।।


माला  पुष्पगुच्छ    में  महकें।

वाणी बिना फूल   ये  चहकें।।

कक्ष   सुगंधों    से   महकाते।

खिलते  फूल महक फैलाते।।


हँस  मुस्काकर  जीना  सीखें।

जब तक जीवें हँसमुख दीखें।

मानव   को   ये  पाठ  पढ़ाते।

खिलते  फूल महक फैलाते।।


जीवन   के   नश्वरता   वाची।

नहीं रहे   वे   नर   से याची।।

जीने    का    संदेश    जताते।

खिलते  फूल महक फैलाते।।


🪴 शुभमस्तु!


17.01.2023◆5.00

पतनम मार्तण्डस्य।

लगते फल डालें झुक जातीं 🫐 [ बालगीत ]

 31/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🫐 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

लगते   फल    डालें      झुक जातीं।

समझ  सकें    तो   सबक सिखातीं।।


तेज         धूप     में     छाया   देतीं।

सब        थकान   अपनी  हर लेतीं।।

नहीं       कभी       देकर    इतरातीं।

लगते     फल    डालें  झुक   जातीं।।


दातुन       नीम    डाल     की करते।

दंत -  रोग     हम     सब    ही हरते।।

शाखाएँ           बबूल       की  भातीं।

लगते      फल     डालें   झुक  जातीं।।


आम ,        संतरा  ,       नीबू   सारे।

चीकू,         केला         मधुर  हमारे।।

अंगूरों        की         लता    लुभातीं।

लगते     फल    डालें    झुक  जातीं।।


लगें      बेल     पर        फल तरबूजा।

महक       भरा          मीठा खरबूजा।।

गर्मी     में       ककड़ी       भी  आतीं।

लगते   फल      डालें      झुक  जातीं।।


बारह        मास      मधुर  फल   पाते।

रुचि    ले      लेकर    हम सब   खाते।।

वे          कृतज्ञता         नहीं  जतातीं।

लगते    फल       डालें    झुक   जातीं।।


🪴शुभमस्तु !


17.01.2023◆4.30

पतनम मार्तण्डस्य।

अनुशासन 🇮🇳 [ चौपाई ]

 30/2023

     

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

अनुशासन जिसको है प्यारा।

करें आपदा   वहाँ   किनारा।।

अनुशासन की   सुदृढ़  डोरी।

करती त्वचा चरित की गोरी।।


जहाँ न संतति   आज्ञा  मानें।

टाँग  अड़ाएँ   अपनी  तानें।।

वहाँ सुमति की संपति नासे।

बचें नहीं परिजन विपदा से।।


रावण ने   अनुशासन  तोड़ा।

जीवन - पथ में  आया रोड़ा।।

परनारी   को   वह हर लाया।

क्या अनुशासन तजकर पाया??


पाक नित्य अनुशासन तोड़े।

क्षमा नहीं कर उसको छोड़े।।

बमबारी   कर   छोड़े   गोले।

समझ नहीं भारत को भोले।।


औरों के  घर  आग  लगाता।

उसी आग में जल मर जाता।।

कर्मों   से   अनुशासन  पाएँ।

नव पीढ़ी  को सबल बनाएँ।।


अनुशासित हों भारतवासी।

मिटे देश की सकल उदासी।।

आलस में पड़ जो सो जाए।

देश चेतना   विमल  नसाए।।


'शुभम्' बनें अनुशासित सारे।

प्रगति -  पंथ तब होंगे न्यारे।।

हम अनुशासन के   पथचारी।

चलते   संविधान  अनुसारी।।


🪴शुभमस्तु!


16.01.2023◆7.00 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


स्वावलंब हो सम्बल 🪦 [ गीतिका ]

 29/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

देशप्रेम  जिस  उर   को भाए।

उसने  गीत प्रेम   के     गाए।।


स्वावलंब   हो   संबल सबका,

नहीं विपथ पर जन  भरमाए।


फल  के  विटप लगाने  वाला,

मृदु फल  का  आनंद  मनाए।


पर- उपकारी   सदा  सुखी हैं,

नहीं किसी को  कभी सताए।


सत चरित्र के   हों   नर- नारी,

देश   न   घर  गर्तों   में  जाए।


मात - पिता   की  आज्ञाकारी,

संतति से क्यों  जन उकताए?


'शुभम्' सुसंगति नित हितकारी,

जन - जन के उर में नर छाए।


🪴शुभमस्तु !


16.01.2023◆5.15आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सुसंगति नित हितकारी 🌻 [ सजल ]

 28/2023

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

●समांत : आए ।

●पदांत :अपदांत ।

●मात्राभर : 16.

●मात्रा पतन :शून्य ।

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

देशप्रेम  जिस  उर   को भाए।

उसने  गीत प्रेम   के     गाए।।


स्वावलंब   हो   संबल सबका,

नहीं विपथ पर जन  भरमाए।


फल  के  विटप लगाने  वाला,

मृदु फल  का  आनंद  मनाए।


पर- उपकारी   सदा  सुखी हैं,

नहीं किसी को  कभी सताए।


सत चरित्र के   हों   नर- नारी,

देश   न   घर  गर्तों   में  जाए।


मात - पिता   की  आज्ञाकारी,

संतति से क्यों  जन उकताए?


'शुभम्' सुसंगति नित हितकारी,

जन - जन के उर में नर छाए।


🪴शुभमस्तु !


16.01.2023◆5.15आरोहणम् मार्तण्डस्य।

लोकतंत्र मनमानी 🇮🇳 [ नवगीत ]

 27/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

लोकतंत्र

मनमानी

जीमें बड़हार।

अब तक हैं

फहराए

झंडे छत कार।।


संविधान

 सिर माथे

पाई है रसीद।

वक्त पड़े

काम आए

बहुत ही मुफीद।।


दे देते

मित्रों को

जैसे उपहार।


देशभक्ति 

वसनों में

बसती है मीत।

गाए जा

गाए जा

नारों - से गीत।।


बाला को

देखा तो

टपकी है लार।


देवोपम दिखलाता

टी वी पर रूप।

गुपचुप चर

काजू फल

बतलाता सूप।।


सुर्खी में

जगमग है

पूरा अखबार।


झंडा तो

फैशन है

विकृत मर्यादा।

लटकाए

कोई भी

डाकू या दादा।।


शक्ति नहीं

सोच नहीं

कभी मत उतार।


🪴शुभमस्तु !


14.01.2023◆8.30

पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...