गुरुवार, 4 जुलाई 2024

चमत्कारों की वादियाँ बनाम चमत्कारवाद [व्यंग्य ]

 299/2024 


 

 ©व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 चमत्कार की वादियों में चमत्कारवादियों की चाँदी है।देश के बाबाओं ने बहुत पहले से कर रखी ये मुनादी है।बड़े -बड़े लोग यहाँ चमत्कार - भक्त हैं।चमत्कारों की माया [मा= नहीं, या=जो ;अर्थात जो नहीं है वही 'माया' है।] पर वे बड़े अनुरक्त हैं।इसीलिए तो बाबाओं की मधुमयी कृपा पर आसक्त हैं।बाबाओं के चरण युगल नोटों से सिक्त हैं।

  'बाबागीरी' एक खास वृहत उद्योग धंधा है।अन्धविश्वासों के पालने में झूल रहे अंधों के लिए रेशमी फंदा है। सबसे बढ़िया बात ये कभी नहीं मंदा है।चमत्कारों का दीवाना हर तीसरा बंदा है।भले वहाँ पर गर्दन पर रंदा है।प्रबुद्ध वर्ग के लिए भले ही काम गंदा है।किसी के नल का पानी अमृत उगलता है,किसी के गाड़ी का टायर में पवित्र धूल की सबलता है।आदमी के चरित्र की ये कैसी चपलता है। 

   भगवान कृष्ण ने अपनी शैशवावस्था से ही मायावी मयासुरों को ठिकाने लगा दिया।आज वे मायावी साक्षात हरि रूप में साकार हो गए।भेड़ों के पीछे ही भेड़ चला करती है।भले ही वे भेड़ रूपी भेड़िए ही क्यों न हों? यदि पहले से ही पहचान लिए गए होते तो भेड़ें बिदक न जातीं? ठगने के लिए रूप बदलना पड़ता है।अब चाहे वह इंद्र हो या रावण,चंद्रमा हो या शकटासुर ; सबने अपने रूप परिवर्तन के रंग दिखलाए और ईश्वर अवतार राम भी मृगरूपी मारीच असुर की ठगाई में भरमाए!

  रँगे हुए बाबाओं की अंतिम गति कृष्ण जन्म भूमि में होने का चलन है।बात केवल घड़े के भरने भर की है।जब तक घड़ा भर नहीं जाता, बाबा अपने वाक-चमत्कार से जन मानस को रिझाता।अच्छे - अच्छों को आदमी की देह से उल्लू बनाता। जब तक वह कृष्ण जन्मभूमि नही पहुँच जाता ,तब तक तिनका भर नहीं पछताता।ऐश-ओ-आराम की जिंदगी बिताता।महलों को सजाता ,विलासिता में रम जाता।माया में लिपटा माया ही बनाता। 

  अब तो यह बात भी सच लगने लगी है कि ये देश साँप -सपेरों वाला है। कोई कुछ भी करे,किसी की करनी पर कोई नहीं ताला है।भेड़िए भेड़ बने भरमा रहे हैं।परदे के पीछे गुल खिला रहे हैं।नर -संहार के जंगल उगा रहे हैं। चाँद की यात्रा करने वाले देश में ये क्या हो रहा है।देश सो रहा है।अपने लिए आप ही काँटे बो रहा है।अपने आँसुओं से अपने कपोल धो रहा है।

  आम जन मानस को लकवा मार गया है।बुद्धि का दिवाला निकल गया है।कोई समझाये तो समझता नहीं।ईश्वर को छोड़कर बहुरूपिये मानुस में ही बुद्धि की शुद्धि हो रही। कोई ठग, कोई डिग्रीधारी भगवान हो गया। उसी के नाम का जयकारा, वही सर्वस्व दे गया।आदमी की कृतघ्नता की पराकाष्ठा है।भेड़ों वाला कुँआ ही उसका रास्ता है।किसी भी बुद्धिमान से उसका कोई नहीं वास्ता है।स्वयं मौत के कुएँ में कूद रहा है,तो दोष भी किसका है ?

 शुभमस्तु !

 04.07.2024●4.45 प०मा० 


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रूढ़िवादिता की खाज [अतुकांतिका]

 298/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


विवेक ने आँखों पर

पट्टी बाँध रखी है,

बिना किए कर्म

बाबाओं की कृपा से

सब कुछ मिल जाए,

यही अंतिम उपाय।


न पढ़ना जरूरी

न श्रम ही जरूरी

बाबाजी करें

उनकी माँगें सब पूरी,

सेवादारों की चाँदी

वे काट ही रहे हैं।


कहाँ जा रहा है

ये समाज,

रूढ़िवादिता की खाज

खुजाए जा रहे हैं,

 भेड़ ही तो हैं

कुएँ में

चले जा रहे हैं।


क्या करे प्रशासन

चप्पे-चप्पे पर

क्या पहरा बैठा दे!

भरा हो जहाँ

निकम्मापन

उसको घर बैठे

राशन दिला दे!

नंगे बदन को

कपड़े सिला दे!


ये इक्कीसवीं सदी है,

आदमी - आदमी की अक्ल

जुदी -जुदी है,

सब कुछ  बाबाओं की

 कृपा से मिले,

तो कोई भी हाथ- पैर

क्यों यों हिले?

गिरें स्वयं ही गड्ढे में

प्रशासन से शिकवे -गिले,

विरोधी नेता गण

कितने खिले?

फ़टे में अँगुली

डालने के मौके तो मिले!

शुभमस्तु !


04.07.2024●3.00प०मा०

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बुधवार, 3 जुलाई 2024

कर्मों का संज्ञान ले [दोहा ]

 297/2024

             

[ ओजस्वी,संज्ञान,विधान,सकारात्मक,अध्यवसाय]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक

ओजस्वी मुख कांति की, आभा  एक विशेष।

उर  पर  छोड़े नेक  छवि,तज अंतर के   द्वेष।।

कपट हृदय  के त्यागिए,हो ओजस्वी   रूप।

सत्कर्मों  से  ही   बचे,  नर  का  गिरना  कूप।।


कर्मों   का   संज्ञान  ले,  ए  मानव   तू   मूढ़।

सदा   चले  सन्मार्ग  में,  समय-अश्व आरूढ़।।

जब     आए   संज्ञान  में,मानवता  का   मर्म।

तब    जो   सुधरे   राह  में,  करे  सर्व  सद्धर्म।।


विधि का अटल विधान है,होता हेर   न  फेर।

निश्चित  सबका  काल है,लगे न पल की   देर।।

हो  विधान सम्मत   वही, उचित हमारा  काम।

सतपथ   पर  चलना  सदा,मिल जाएँगे   राम।।


सोच सकारात्मक रहे,अविचल मन  की टेक।

मानव  तन  में  देव  का,  जागे   नेक विवेक।।

लोग सकारात्मक नहीं,प्रायः जग में    आज।

स्वार्थलिप्ति हितकर नहीं,बिगड़ा हुआ समाज।।


अध्यवसाय  में   रत  रहे,  पाता वह   गंतव्य।

सार्थकता - संचार  हो, हो  नर जीवन   दिव्य।।

अपने   अध्यवसाय   से, चुरा रहे जो   जान।

परजीवी   समझें   उन्हें, नर  वे जोंक   समान।।


                एक में सब

सोच सकारात्मक सदा, अध्यवसाय-विधान।

ओजस्वी नर   मन  वही,लेता शुभ     संज्ञान।।


शुभमस्तु !

03.07.2024●7.15आ०मा०

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उपवन [कुंडलिया]

 296/2024

                     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

   

                       -1-

उपवन में  कलियाँ  खिलीं,बगरी विमल बहार।

रिमझिम  रह-रह   दौंगरे, खोल रहे नव   द्वार।।

खोल  रहे  नव   द्वार,  भेक टर-टर-टर    बोलें।

कर    भेकी  आहूत , प्रणय   के  परदे   खोलें।।

बरसा   'शुभम्'  अषाढ़, प्रतीक्षारत है   सावन।

तन-मन  मिलन  प्रगाढ़,मनोहर उन्मद उपवन।।


                         -2-

आओ   उपवन  में चलें, कलियाँ  करें   पुकार।

अंबर से झर- झर झरे, रिमझिम विरल फुहार।।

रिमझिम    विरल  फुहार,  न कोई वीर   बहूटी।

बरसीं   नभ  से  लाल,  मखमली अवनी -बूटी।।

रेंग    रहे   जलजीव,   कहीं  हमको दिखलाओ।

'शुभम्'    टेरता    पीव,  पपीहा  देखें    आओ।।


                           -3-

मानव -  जीवन  एक  है, उपवन सघन  सजीव।

सुख - दुख    जिसके   वृक्ष  हैं,बिखरे बेतरतीव।।

बिखरे     बेतरतीव,    फूल  फल पल्लव    सारे।

आच्छादित    है    देह,  सँवरते   नहीं     सँवारे।।

'शुभम्'  विकट   संसार, नहीं   बन जाना  दानव।

करके      स्वयं  सुधार,  बने   रहना  है   मानव।।


                         -4-

अपना  स्वयं    सँवारना,  उपवन सुंदर   मीत।

छंदबद्ध   लय    ताल   हो, जीवन है नवगीत।।

जीवन    है    नवगीत,   नई  उपमाएँ   लेकर।

जगा   हृदय   में  प्रीत, तभी  जी पाए   जीभर।।

'शुभम्'  बनें   रसखान, सदा  पड़ता है   तपना।

आती    नवल   बहार, तभी हो उपवन अपना।।


                             -5-

झाड़ी   का  कर्तन   करें, जीवन उपवन  रम्य।

काट-  छाँट   करनी  पड़े, वरना  बने अदम्य।।

वरना  बने    अदम्य,   नियंत्रण  खोता    जाए।

खिलें  जहाँ   पर  फूल,  शूल  पैने उग   आएँ।।

'शुभम्'  बने  प्रतिकूल, चले जीवन की  गाड़ी।

ज्यों  दलदल   के  बीच,फँसी हो कोई    झाड़ी।।


शुभमस्तु !


02.07.2024● 6.00आ०मा०

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घन कजरारे [ गीत ]

 295/2024

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नभ में छाए 

घन कजरारे

उमड़- घुमड़ मनभावन।


आशाओं की

डोर थामकर

झूम उठा मन मेरा।

पूरब पश्चिम

उत्तर दक्षिण

बना हुआ घन घेरा।।


आषाढ़ी दौंगरे 

लरजते

आने  वाला  सावन।


देख घुमड़ते

मक्खन-लौंदे

मन करता हम खालें।

उछलें ऊपर

उचक पाँव पर

उड़ता मक्खन पालें।।


याद सताए

विरहनियाँ को

अपना पिया रिझावन।


कृषकों के

मन में घुमड़ाईं

आशाओं की बदली।

नभ की ओर

निहार रहे हैं

गीत गा रही कमली।।


बना रही हैं

बूँदें  झर-झर

'शुभम्' धरा को पावन।


शुभमस्तु !


02.07.2024●4.45आ०मा०

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सोमवार, 1 जुलाई 2024

माता मेरी शारदा [ दोहा गीतिका ]

 294/2024

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


माता   मेरी   शारदा,  विमल    विशद   विश्वास।

कण -कण में उर  के बसा,कवि वाणी का दास।।


भाग्य  मनुज  का  जन्म  है, कवि होना सौभाग्य,

कवि   की  वाणी में सदा, वीणापाणि    उजास।


क्षण - क्षण   करता वंदना,  वरदायिनी   सुपाद,

सदा  समर्पित  मातु  हित,कवि का सारा श्वास।


शब्दों  के  शुभ  कोष में, जनहित बसे    अपार,

शुष्क   न   हो  ये  दूब की, हरियाये नित  घास।


एक   भरोसा  एक   बल,  शब्द  अर्थ   आधार,

अलंकार   नव   छंद की , सबल एक ही   आस।


जन्म - जन्म    मैं   माँगता, मिले सदा   आशीष,

सफल नित्य कवि धन्य  हो,ज्यों आनन पर हास।


'शुभम्'  चरण  वंदन  करे,विनत सदा  मम शीश,

शक्ति  बने   संसार  की, काव्याकृति अनुप्रास।


शुभमस्तु !


01.07.2024●2.15आरोहणम मार्तण्डस्य।

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विमल विशद विश्वास [सजल]

 293/2024

       

समांत      : आस

पदांत       : अपदांत

मात्राभार   : 24.

मात्रा पतन : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


माता   मेरी   शारदा,  विमल    विशद   विश्वास।

कण -कण में उर  के बसा,कवि वाणी का दास।।


भाग्य  मनुज  का  जन्म  है, कवि होना सौभाग्य।

कवि   की  वाणी में सदा, वीणापाणि    उजास।।


क्षण - क्षण   करता वंदना,  वरदायिनी   सुपाद।

सदा  समर्पित  मातु  हित,कवि का सारा श्वास।।


शब्दों  के  शुभ  कोष में, जनहित बसे    अपार। 

शुष्क   न   हो  ये  दूब की, हरियाये नित  घास।।


एक   भरोसा  एक   बल,  शब्द  अर्थ   आधार।

अलंकार   नव   छंद की , सबल एक ही   आस।।


जन्म - जन्म    मैं   माँगता, मिले सदा   आशीष।

सफल नित्य कवि धन्य  हो,ज्यों आनन पर हास।।


'शुभम्'  चरण  वंदन  करे,विनत सदा  मम शीश।

शक्ति  बने   संसार  की, काव्याकृति अनुप्रास।।


शुभमस्तु !


01.07.2024●2.15आरोहणम मार्तण्डस्य।

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...