रविवार, 28 फ़रवरी 2021

ग़ज़ल 🍃


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✍️शब्दकार ©

🍀 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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चोर  ख़ुद   को   नहीं    चोर कहता है।

जमाना  भले  उसे   चोर कहता   है।।


मन   मोह     लिया   है   वंशी वाले  ने,

ब्रज  का  हर  गाँव  चितचोर कहता है।


चुराता  रहता  है  सुख चैन जमाने का,

उसे  भी   भला  कौन   चोर कहता है।


बिना    पूछे    जो     छीनता  धन   को,

बच्चा -  बच्चा    उसे     चोर कहता है।


शाहों  की   शक्ल  में सरदार दस्यु देखो,

'शुभम' कौन उसे दीवाना चोर कहता है।


🪴 शुभमस्तु !


२८.०२.२०२१◆५.००पतनम मार्तण्डस्य।


ग़ज़ल 🍉🍉


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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तरबूजे   पर     तरबूजा     है।

खरबूजे   पर  खरबूजा    है।।


चरता   घास   यहीं   घूरे  पर,

श्वान  नहीं  कोई  दूजा     है।


अमुआ  की  डाली  पर बैठा,

नर  कोयल पाखी  कूजा  है।


मंदिर में की जाती  प्रतिदिन,

कहते  उसको  सब पूजा  है।


रंग -  बिरंगी   आई     होली,

बना  रही    मैया   गूजा   है।


राम जिन्हें  लाए   कह  दारा,

नैपाली    सीता      भूजा है।


मुर्गी  के   बच्चे   को   कहते ,

'शुभम' लोग   सारे  चूजा  है।


🪴 शुभमस्तु !


२८.०२.२०२१◆ ३.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

प्रिया -अधर 🌹 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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प्रिया-अधर से मधुरतर,नहीं जगत में द्रव्य।

सुधा,सुधा ही है यहाँ, अधर पान है भव्य।।


बिंबा-फल से श्रेष्ठ है, प्रिया-अधर मधु कांत।

आवृत करता दसन को,शोभित आनन प्रांत।


द्विज की संगति का नहीं,कोई पड़ा प्रभाव।

अधर रहे प्रिय लाल ही,देते हैं नव   हाव।।


खोट रत्न में   जब लगे,घट जाता  है   मोल।

दंत-घात जब से लगा,बढ़ी अधर की तोल।।


काम - रूप तंत्री रहा,बना अधर  पर  यंत्र।

प्रियतम-रद से लिखरहा,गोपनीय शुभ मंत्र।


प्रिया-अधर के सोम का, कर लेता जो पान।

वंचित जो इस सोम से,कर न सके अनुमान।


प्रिया-अधर को देखकर,रखा गया यह नाम।

बिंबा फ़ल कहते जिसे,लाल अधर का काम।


आभा नवल प्रवाल-सी,बढ़ा रही  है  प्यास।

देख प्रिया के अधर को,मन मरु हुआ उदास।


एक अधर है देह में,अतिशय जिसका मान।

प्रिय-तन में विद्युत बहा, करता अनुसंधान।।


अधर-परस  से  चंचला,तन में कौंधे   मीत।

चिंगारी  यह  नेह की,जगा रही उर    प्रीत।।


अधर-सुरस जिसने चखा,वही सुभागी धन्य।

मधु-अमृत होता'शुभम',शेष न उपमा अन्य।


🪴 शुभमस्तु!


२७.०२.२०२१◆१०.००आरोहणम मार्तण्डस्य।



शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2021

इक्कीसवीं सदी के 21वर्ष 🌡️ [ व्यंग्य ]



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✍️ लेखक © 


✒️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 


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            21 वीं सदी अपने भरपूर यौवन पर है।वह अपने यौवन के इक्कीसवें वर्ष में दो माह पहले से ही अपनी पायल की झनकार सुना चुकी है।बीसवीं सदी बूढ़ी हुई विदा हो गई। बड़े बुजुर्गों के अनुभवों का अर्क निचोड़ कर देखिए तो पता लगता है कि विगत ही बेहतर था।वर्तमान उन्हें नहीं सुहाता। हर अनुभवी का अनुभव बताता है कि सदैव अतीत ही वर्तमान से श्रेष्ठतर होता है।


               मशीनों के साथ -साथ मानव भी मशीन हो गया है।क्या आपने कभी किसी मशीन का दिल भी देखा या सुना है? नहीं न! जब इंसान के तन ,मन और मष्तिष्क का मशीनीकरण हो जाएगा ,तब क्या होगा। संवेदनाएं शून्य हो जाएँगीं। देख रहे हैं कि आज केवल दिखावटी प्रेम , बनावटी सहानुभूति ,खनखनाती संवेदनाएं , सनसनाता स्नेह चमचमाते व्हाट्सएपिया संदेश धूम मचा रहे हैं। आदमी अपना चेहरा तालाब के स्थिर पानी या आईने में नहीं , फेशबुक(मुखपोथी) में निहार रहा है।जहाँ झूठ के धूम की ही धूम है।वाह क्या खूब है।अँधेरी रात में बड़ी धूप है। धूम ने हमेशा ही दृष्टि को धोखा दिया है।आज भी दे रहा है। देता भी रहेगा। सचाई कहीं धूम की धुंध में खो-सी गई है।मानवता सर्वत्र रो-सी रही है।


           कोई किसी की नहीं सुनना चाहता है। केवल अपने ही गीत सुना रहा है। सब उसकी सुनो । वह किसी की नहीं सुनेगा। क्या राजा ,क्या प्रजा ,क्या अधिकारी ,क्या  कर्मचारी,  सब का  एक ही हाल  है ।कुँवर  कलेऊ  का रसगुल्लों से भरा थाल है। सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।माथे पर तिलक  कर्म में सब  झूठे  हें।  सब जगह बाईस पंसेरी धान है। किसी का कहीं नहीं कोई ईमान है न मान है।केवल और केवल स्वार्थ का ही गुणगान है। स्वार्थ से ही इन्सान की पहचान है।सम्बंध तेल बेच रहे हैं।शासक रेल बेच रहे हैं। कोई किसी का न बाप है ,न कोई किसी का भैया है। यहाँ तो सबसे बड़ा रुपैया है।कहने भर को गैया मैया है।पंच सितारा होटलों में वही गो मांस के खवैया हैं।जहाँ लाखों की टिकट में ताता थैया है। जैसे भी हो मेरा उल्लू सीधा हो जाए, भले सारा देश भाड़ में जाए! इसी मानसिकता का जोर है। 21 वीं सदी का ये कैसा दौर है!


            20 ,21 वीं सदी या उससे 20 वर्ष पहले पैदा हुई पीढ़ी क्या जाने कि देश किस चिड़िया का नाम है ! देशप्रेम क्या बला है! नगर पालिका का नल सड़क और गलियों में बराबर बह रहा है, उधर देश का होनहार कर्णधार बाइक धड़धड़ाता बढ़ रहा है, उसके न कान हैं न दो आँखें! वह इधर उधर क्यों झाँके ? क्योंकि  उसे  पोस्टर  पर   कमर मटकाती  हीरोइन  दिख रही है।  कोचिंग को  जाने के लिए देर  जो हो रही है। बह रहा  है  व्यर्थ  पानी, कौन करे निगरानी! नेता जी बेचारे बड़ी सी गाड़ी में सवार हैं ,उन्हें नल बंद करने की क्या दरकार है? कार्यालय, घर ,सड़कों पर दिन में बत्ती जल रही है। बन्द कालेज में रात भर पंखे कुर्सी - मेजों को मच्छरों से बचाते रहे हैं। चौकीदार तानकर सो रहा है। 21 वीं सदी में मेरे देश में ये क्या हो रहा है। 


           आज का नागरिक केवल वोट बनकर रह गया है। जातियों का छिछलापन अपने चरम पर है। मौसम वोट का आ रहा है। हिंदुत्व का बिगुल बजाने का त्यौहार जो मनाया जाना है। इसीलिए हर अछूत को हिन्दू का टीका लगाना है।वैसे अगड़ा, पिछड़ा का झगड़ा।किसने किसको कितना रगड़ा। इसी बात चलता रहता है बारहों मास भंगड़ा। देश को बांटने, तोड़ने की साजिश , उसे भस्म कर देने की आतिश, अब कुछ भी असम्भव नहीं है। आप समझ गए होंगे ,ये इक्कीसवीं सदी है। 


           अभी क्या है!आगे आगे देखिए होता है क्या! 21वीं सदी को बुढ़ाने में अभी 98 वर्ष 10 माह शेष हैं। इस सदी का आदमी भले इंसान के चोले में अपने को आदमी कहे, पर सही मायने में वह मेष है। इसी मेष से ही होनी देश और मानव की रेड़ है। विवेक की आंखों पर बाँध रखी है गांधारीय पट्टी।यही बनावटी अंधा देश की दुर्दशा का जिम्मेदार है।नेताओं का तो नेतागिरी एक किरदार है। जिसे वे पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं। बिच्छू से कहो कि डंसना छोड़ दे ,और उसे रसगुल्ले खिलाओ तो भी क्या वह अपना कर्म छोड़ देगा? निरंतर अधोपतन का का दूसरा नाम इक्कीसवीं सदी है। जी हाँ, ये इक्कीसवीं सदी है। 


 🪴 शुभमस्तु ! 


 २६.०२.२०२१◆३.३०पतनम मार्तण्डस्य।


धिकराष्ट्रता बनाम धूर्तराष्ट्रता [ ●अतुकान्तिका● ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जन्मांध होते हैं धृतराष्ट्र

उनके लिए क्या परिवार

क्या स्वराष्ट्र!

ताने रहते हैं 

हाथों में अस्त्र -शस्त्र 

बस विनाश ही है

उनका लक्ष्य मात्र।


अंधे का साथ  निभाना,

बस आँखों पर पट्टी चढ़ाना!

अंधे को सशक्त बनाना,

नहीं सोचना ,न समझना, समझाना,

गंधारियों की भूमिका में

चले जाना,

क्या यही है

देशभक्ति का तानाबाना?


जन्मांध नहीं होती गांधारी,

विवेकहीन भी नहीं होती नारी!

कभी -कभी होती है उसकी

लाचारी,

जो पड़ जाती  है घर- परिजन और पूरे देश पर  भारी,

अंधभक्ति कभी सुफल नहीं देती,

जब देती है कुफल ही देती है!

विनाश ! विनाश !!और विनाश!!!

बस सोचने को शेष रह जाता है शब्द 'काश!'

जब टूटने लगती है

देश की मर्यादा की साँस,

शेष नहीं बचती कोई आश!


अंतर महाभारत 

छिड़ा हुआ है !

किसे है सत्य की रक्षा की परवाह!

दिलों के बीच में खड़ी

कर दी गई हैं दीवारें!

धर्म की ,मज़हब की,

जाति की ,प्रजाति की,

कैसे होगा देश का उद्धार!

पर यहाँ किसको है दरकार?

चलता रहना चाहिए 

बस अपना दरबार!


गांधारियों की 'धिकराष्ट्रता' ?

क्या कहिए !

'धूर्तराष्ट्रता'  के फल चखते सहिए!

भविष्य दिखाई दे रहा है,

दशों दिशाओं में अँधेरा है 'शुभम',

आदमी ही देव है आदमी ही

एटम बम ।


🪴 शुभमस्तु !


२५.०२.२०२१◆८.४५पत नम  मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

देती माँ आशीष भारती [ गीत ]


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✍️ शब्दकार©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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करें    सभी     मिल   सुजन आरती।

देती        माँ        आशीष   भारती।।


जन्मभूमि      यह       पूज्य  हमारी।

खिली    विविध    रंगों  की क्यारी।।

सबको      ही    माँ   सदा  तारती।

देती      माँ      आशीष    भारती।।


संतानें        कृतघ्न        क्यों   होवें?

चादर     तान    न    यों  हम सोवें।।

ढूँढ़   -    ढूँढ़    माँ    शत्रु   मारती।

देती       माँ       आशीष   भारती।।


हम      अपना      कर्तव्य  निभाएँ।

देश -   धर्म    पर  बलि- बलि जाएँ।।

कष्टों       से     माँ    नित  उबारती।

देती        माँ       आशीष   भारती।।


मानव  -  तन   में      हम जन्माए।

माँ     से     अन्न - नीर   हम पाए।

हम       भारत   -  संतान  ज्यारती।

देती         माँ     आशीष   भारती।।


माँ     से   उऋण    न  होता कोई।

'शुभम'   लाज   क्यों जन ने खोई।

माटी  का   कर    तिलक  हों व्रती।

देती      माँ       आशीष    भारती।।


🪴 शुभमस्तु !


२४.०२.२०२१◆९.००पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

ग़ज़ल


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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मेढकी    को   टाँग  में एक नाल   चाहिए।

देखकर    घोड़े   को   बेमिसाल    चाहिए।।


तारीफ़  में  अपनी बनाए पुल बहुत    सारे,

कूदकर  सौ  वर्ष   का   झट उछाल  चाहिए।


देखा  नहीं   भूगोल   अपना जल,हवा कैसी,

कागा   को  हंस  वाली  वही चाल   चाहिए।


निकले   हैं   ये   शिवा  बनने को   केहरी,

उनको  तो  बस शेर की इक खाल  चाहिए।


करना नहीं उनको  पड़े मन देह से श्रम भी,

हीरों  भरा  सोने  का  मोटा थाल   चाहिए।


देख पर-सौभाग्य  उनका जल उठा तन मन,

पर  हिमालय -सा  तना ऊँचा भाल चाहिए।


जानता  जो महक अपने स्वेद की  'शुभम',

और की मेहनत का न उनको बाल चाहिए।


🪴शभमस्तु !


२३.०२.२०२१◆६.००पतनम मार्तण्डस्य

ग़ज़ल

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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धीरे  - धीरे   दीमक  जड़ को काट रही  है।

हुआ    जा रहा पेड़ खोखला बात सही हे ।। 


मार   रहा  है   जबरा  रोना  सख्त  मना  है,

खुला   बड़ा  बाजार न छोटी   हाट रही   है।


जिम्मेदारी    छोड़   देश को बेच  रहे    हैं,

जो वे  कहें   विधान  वही हर बात  सही  है।


चले   गए    अंग्रेज  गुलामी अपनों  की  है,

दिन  को  कहते  रात कहें सब रात  यही  है।


खंड - खंड  है देश जाति, वर्णों  में   बाँटा,

मतदाता  मति  मूढ़ वोट- सौगात  गही  है।


खोले  जो  भी जुबाँ  उसे प्राणों के  लाले,

अपनी  ठोंके  पीठ सत्य ये बात कही  है।


'शुभम'सँभल कर बोल सुन रही हैं दीवारें,

पग -पग पर संत्रास विषैली वात  बही है।


🪴 शुभमस्तु !


२३.०२.२०२१◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

किसने ये संसार बनाया [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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किसने   ये   संसार  बनाया!

उजली धूप कहीं घन छाया।।


तरह-तरह  के  जीव  बनाए।

पौधे ,  बेलें   खूब    सजाए।।

अद्भुत  है     कर्ता   की माया।

किसने   ये  संसार    बनाया!!


मछली  पानी    में   रहती   है।

जल-विलगाव कभी सहती है?

गाय , भैंस    भू    के  चौपाया।

किसने     ये   संसार   बनाया !!


खेत ,   नदी    ऊँची   गिरिमाला।

अंबर,   सागर,    झीलें ,  नाला।।

हिम  का गिरि साम्राज्य जमाया।

किसने  ये    संसार    बनाया!!


दो     पैरों    पर  चलता  मानव।

कूद - फाँद है  वानर का   ढव।।

नभ  में   चिड़ियों  को उड़वाया।

किसने     ये      संसार   बनाया!!


चमकें  दिन    में   सूरज  दादा।

चंदा   का   रजनी    का वादा।।

तारों    ने     अंबर    चमकाया।

किसने     ये     संसार   बनाया!!


जाड़ा ,  गर्मी    ऋतुएँ   आतीं।

वर्षा   ऋतु    पानी  बरसाती।।

शुभ वसंत  ने जग   महकाया।

किसने  ये   संसार    बनाया!!


🪴 शुभमस्तु !


२१.०२.२०२१◆४.३०पतनम मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

लो फिर बौराए आम [ अतुकान्तिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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लो फिर बौराए हैं आम!

खेत ,बागों में हर गाँव

पल्लवों से छतनार,

झुके पड़ते हैं भर मद भार,

प्रकृति का अनुपम है श्रृंगार,

सुनें कानों से गुंजार,

भ्रमर दल की मस्त गुहार।


बाग खेतों में है मधु मास,

खिले हैं पुष्प सानुप्रास,

चाँदनी का भव्य उजास,

कर रही ज्यों  पिय सँग अभिसार।

लुटाती प्यार ।


  ठूँठ पीपल के हरियाये,

 लाल अधरों में मुस्काए,

 नहीं है अब भू पर पतझार,

पीत पुष्पों का संसार,

उधर देखो कचनार,

दिखाती नव वासंती बहार,

मदिर मस्ती भरा खुमार।


चना ,गेहूँ और पकते धान,

देख प्रमुदित हैं सभी किसान,

नाचती सरसों चदरिया ओढ़,

झूमती अरहर रह- रह प्रौढ़,

हर ओर हरीतिमा का साज,

धरा पर आया है ऋतुराज,

न किसी की जीत 

न कोई हार,

प्रकृति का है अद्भुत उपहार।


तितलियाँ आती जातीं 

रंग -बिरंग,

नहीं करतीं वे किसी को तंग,

पी ली है मानो कोई भंग,

 न हो सुनकर यह दंग,

प्रकृति के सभी विलक्षण रंग,

शरद,हेमंत ,वसंत,

छहों ऋतुओं का सुंदर तंत्र,

गूँजता कोकिल का मंत्र,

खुल गए हैं विकास के द्वार,

मत होना 'शुभम' निराश,

नहीं कहना तुम शब्द काश!

यही है जगत जीव व्यवहार,

कभी प्रताड़ना कभी दुलार!


 देख लो फिर बौराए आम,

महकते निशि दिन वे अविराम ,

चलो त्यागें प्रमाद 

कर लें हो सक्रिय कुछ काम,

नहीं केवल आराम,

न केवल चमकाएं चाम,

मधुऋतु की तरह 

खिलाएं सुमन ,

महाकाएं घर ,खेत ,वन ,उपवन,

परोपकार से ही

चलता  है  संसार ,

यही है  'शुभम' 

मधुऋतु का पावन  सार।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०२.२०२१◆८.१५पतनम मार्त्तण्डस्य।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

वसंत के रंग(2) [ दोहा ]

  

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✍️ शब्दकार©

🦋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हरियाये  हैं ठूँठ भी,पीपल,वट ,कचनार।

कोंपल मिस मुस्का रहे,भरते हर्ष अपार।।


पतझड़  में जो नीम थे, पूरे नंग- धड़ंग।

हरित वसन धर झूमते,उनके सुंदर अंग।।


वन में झाड़ करील के,पहने चादर लाल।

टेंटी  से  भरने लगे,हुआ वसंत कृपाल।।


अद्भुत अलग बहार है,कहते जिनको गाँव।

चल वसंत की मेंड़ पर,थकित न होते पाँव।।


नर -नारी की देह में,जागा नवल  वसंत।

विरहिन बाट निहारती,कहाँ बसे हो कंत।।


नागिन-सी शैया डसे,कटे न विरहा  रात।

जिनके पति परदेश में,कैसी संध्या प्रात।।


ढप- ढोलक की थाप पर,उठे हिए में हूक।

बैरिन आग लगा रही,काली कोयल कूक।।


प्रकृति रँगी दिखला रही,नए -नए बहुरूप।

 नर - नारी के उर रँगे,भंग पड़ी हर कूप।।


मादकता भरने लगी,मधुमासी नव  धूप।

नर,नारी,तरु देह में,दिखलाती बहु रूप।।


आओ मिल स्वागत करें,आया है मधुमास।

जन को जीवन दे रहा,'शुभम' बाँधता आस।


होली की रंगीनियाँ ,करता 'शुभम' प्रदान।

यह वसंत ऋतुराज है,गाएँ मंगल  गान।।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०२.२०२१◆३.००पतनम मार्त्तण्डस्य।


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वसंत के रंग(1) [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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तितली झूमी फूल पर,करती है  मधुपान।

ऋतु वसंत की भा गई,भृंग करें गुण गान।।


कुहू-कुहू कोयल करे,आम्र कुंज तरु डाल।

बौराए हैं  सघनतम, चादर ओढ़   रसाल।।


सरसों  नाची  खेत में, झूम- झूम  दे   ताल।

पीली चादर ओढ़ ली,मधु ऋतु का संजाल।।


अरहर  रह-रह  झूमती, पीले -पीले    फूल।

अलसी कलशी धारती,सिर पर करे न भूल।।


कल कल कर सरिता बहे,गाती  जैसे गीत।

सागर से मिलने चली,निज प्रीतम मनमीत।।


देखो  होली  आ रही, कहता पुष्प   पलाश।

वन  में  रंग  बिखेरता,मन में भरता  आश।।


गेहूँ   गह - गह  झूमता, बाली नई    अनेक।

चना, मटर फूले -फले,माधव का अभिषेक।।


ले पराग  मधुमक्खियां, जातीं उड़कर  दूर।

रस  फूलों  से  ले रहीं, करें निषेचन   पूर।।


धरती दुल्हन-सी सजी,किया प्रकृति श्रृंगार।

फूल खिले कलियाँ नई,अद्भुत है    उपहार।।


नभ में उज्ज्वल चाँदनी, चली  चाँद के पास।

पूनम की निशि आ गई,देती कल की आस।।


पीले   पल्लव झर गिरे,धरती स्वच्छ  प्रसन्न।

आते हैं ऋतुराज जी,अवधि निकट आसन्न।।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०२.२०२१◆२.००पतनम मार्त्तण्डस्य।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

वासंती बहार [ मनहरण घनाक्षरी ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                      -1-

आयौ ऋतुराज आज,शीश धरे पुष्पताज,

सजायौ है मही साज,फूली फुलवारी   है।

ओढ़ पीत चूनरिया, हरी - हरी घाँघरिया,

भई धरा बाबरिया,आभा  अति न्यारी है।।

सरसों  सिहाइ   रही,गेंदी महाकाय   मही,

     भृंग  कूँ लुभाय रही,नाचि रही क्यारी  है।

कूकि रही कोयलिया,चहकि जगी गौरैया, 

बाजी शुभ पायलिया, वासंती सु नारी है।।


                      -2-

शीत गयौ बीत मीत, आयौ मधुमास प्रीत,

गाइ   रही  पिक  गीत, ठूँठ हरियाने   हैं।

आम हू बौराइ गयौ,पीपरा ललाइ भयौ,

नीम मिठिआइ  गयौ,  वृक्ष बतियाने हैं।।

बेलें लिपटाय रहीं,मौन -मौन बातें कहीं,

वात  में सुगंध  बही, वस्त्र तँगियाने   हैं।

आगि-सी लगी'शुभम',पल कूँ न होय कम,

नाँहिं   मन  तुच्छ  भ्रम,  हम पतियाने हैं।।


                      -3-

छायौ ऋतुराज कंत, नाम है शुभ  वसंत,

माधुरी फ़बी  अंनत, वात में सुगन्ध   है।

नीर  भरी  नदी बहे, कलरवी बात    कहे,

मदमाती  मौन रहे,   प्रकृति -  प्रबंध  है।।

लाल  हरी  कलियाँ  हैं,राती रँगरलियाँ  हैं,

फूल क्यारी  गलियाँ हैं,काम मतिअन्ध  है।

'शुभम' वसंत जितै, लीक तजि  मन  मथै,

देखिअहु  जितै - तितै, हस्ती कौ  कंध   है।।


                     -4-

राधा कहि रही श्याम,आ जा बरसाने गाम,

कहूँ  कुंज में ललाम ,सँग   रंग      खेलेंगे।

आइ गयौ मधु मास, उठी फूलनु सुवास,

करें  गोपी  सँग  रास, घाम हम    झेलेंगे।।

होरी आई मनभाई,याद आयौ तू कन्हाई,

देह  छाई है  लुनाई, कहौ  कैसे    मेलेंगे।

दे तू  चूनरी भिगाइ,कान्हा गाम मेरे आय,

रही कोकिला बुलाय, पापड़ ना   बेलेंगे।।


                      -5-

श्याम लाय पिचकारी, रंग भरि मारि  धारी,

साड़ी, कंचुकी बिगारी,राधा कहे'मानि जा।

'नाँहिं  मानूँ  तेरी बात, ऋतु वासंती  सुहात,

देखौ चाँदनी है रात,मन मेरौ जानि जा।।

घोंटि राखी  मैंने भंग,  पीवै आवेगी  तरंग,

चढ़ि जावै तब रंग,आजु  होरी  ठानि जा।'

'मेरे कुल की हु कानि,'शुभं'इतनी तौ जानि,

कान्ह मानि मानि मानि, कहें वृषभानुजा।'


🪴 शुभमस्तु!


१७.०२.२०२१◆१.००पत्नम मार्त्तण्डस्य।

गाँव में वसंत [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गाँवों   में  मधुमास   सुहाया।

फूलों  भरी   वादियाँ  लाया।।


गेंदा   महके    सरसों   फूली।

सूरजमुखी    रंग   में  भूली।।

अरहर  ने पनघट   महकाया।

गाँवों  में   मधुमास  सुहाया।।


ओढ़  चूनरी   अपनी  धानी।

धरती मन ही मन मुस्कानी।।

पीपल  लाल कोंपलें  लाया।

गाँवों  में मधुमास  सुहाया।।


आमों पर   कोयलिया  बोले।

कानों में   मीठा   रस  घोले।।

पिड़कुलिया ने भजन सुनाया।

गाँवों  में   मधुमास  सुहाया।।


पेड़  आम   के    बौराए   हैं।

भौंरे  भी  उन पर   छाए  हैं।।

नीम वृक्ष की  बढ़ती  छाया।

गाँवों  में मधुमास  सुहाया।।


होली  भी  है   आने   वाली।

होगी रँग- वर्षा   मतवाली ।।

गीत 'शुभम'  ने सुंदर  गाया।

गाँवों  में मधुमास  सुहाया।।


🪴

 शुभमस्तु !


१७.०२.२०२१◆३.००पतनम मार्त्तण्डस्य।

पनघट प्यासे [ दोहा- ग़ज़ल ]


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✍️ शब्दकार©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पनघट प्यासे गाँव के,प्यासे हैं नर- नार।

कंकरीट पर दौड़ते,वाहन की भरमार।।


पेड़  रोज  ही कट रहे, ऊजड़ लगते   गाँव,

सड़कें काले नाग-सी, मार रहीं फुफकार।


देश, देश  चिल्ला  रहे,  सारे नेता   लोग,

वेश,तिजोरी,वंश की,बस उनको दरकार।


थोप दिये कानून सब, कृषक हुआ मजबूर,

आत्मघात की भूमिका,है प्रत्यक्ष  साकार।


कूके कोयल अब कहाँ, कब बौराएँ आम,

पता नहीं लगता यहाँ,पादप कटे अपार।


अरहर सरसों की महक,मिले नहीं मधुमास,

लोग  ढूँढ़ते  शहर  में, महक भरा  संसार।


मर्ज  दबाई  देह  की,  खाकर दवा   अनेक,

बोतल  में   नीरोगता, बसती देखो    यार।


जहर   पचाने के  लिए,खाता विष   इंसान,

शुद्ध अन्न ,सब्जी, नहीं,जन जन है बीमार।


'शुभम' देश  कैसे बचे,मानव ही  है  भृष्ट,

लगा मुखौटा  घूमते,दानव  घर - घर द्वार।


🪴 शुभमस्तु !


१७.०२.२०२१◆४.०० पतनम मार्त्तण्डस्य।

वेला नवल वसंत की [ कुण्डलिया ]


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✍️ शब्दकार©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                   -1-

सरसों  फूली  खेत  में, आया है   ऋतुराज।

भौंरे  गुनगुन कर रहे,पीत सुमन का साज।।

पीत  सुमन  का साज,आम्र पादप   बौराए।

मादकता -  संचार,प्रकृति ने पुष्प खिलाए।।

'शुभम' न माने  काम,हार, बीते  दिन बरसों।

झूम  नाचती  खूब, खेत  में फूली   सरसों।।


                     -2-

 बगिया में पिक छेड़ती, कुहू-कुहू का गान।

तन में  भरे उछाह की, रंग - बिरंगी  तान।।

रंग - बिरंगी  तान, महकते फूल    हजारों।

निर्मल नीलाकाश, गमकती दिशियाँ चारों।।

'शुभं'न दिखे अनंग,लगाता तन-मनअगिया।

वन में खिले पलाश, गूँजती मधुरव बगिया।।


                      -3-

वेला नवल वसंत की,किसलय  फूटे  लाल।

पीपल,बरगद,नीम की,छाया सुखद जमाल।

छाया  सुखद जमाल,फूलते सरसों, गेंदा।

टेसू   करे  कमाल,  दीखता  सरि  का पेंदा।।

'शुभम'देख लें नाच,नहीं होगा व्यय धेला।

कलरव करती धार,नदी की निर्मल वेला ।।


                    -4-

धरती दुल्हन- सी सजी,ओढ़ चदरिया पीत।

हरा घाघरा  धारती, गाती- सी मधु    गीत।।

गाती - सी  मधु गीत, पधारे हैं ऋतु  -राजा।

कोयल भरती हूक, कूकती,बजता  बाजा।।

'शुभम'चहकते कीर,प्रकृति में यौवन भरती।

नवल प्राण- संचार,कर रही अपनी  धरती।।


                        -5-

धीरे-धीरे जा  रहा ,शीत देख ऋतु - कांत।

अगवानी करने लगे, पादप, कीर, सुशांत।

पादप कीर सुशांत, बिछे भूतल  पर  पत्ते।

उड़ा ले  गई  वायु, सजे मधुमक्खी -  छत्ते।। 

'शुभम'सुमन-श्रृंगार,खेत,वन,बाग,सु-तीरे।

जगी  काम  की  आग, देह  में धीरे - धीरे।।


🪴 शभमस्तु !


१६.०२.२०२१◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

जमी न अब तक दूब [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🍃 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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रोज़ -रोज़ मैं सोचता,करना आत्म सुधार।

पर वह दिन आया नहीं,बनी जिंदगी भार।।


सुने  बहुत  उपदेश  भी, लगते मोहक  खूब।

उर की धरती पर नहीं,जमी आज तक दूब।।


गीता, रामायण पढ़ी,पढ़ता ग्रंथ अनेक।

वैसा का वैसा रहा, बना न इंसाँ  नेक।।


माला फेरी जप किया,मंदिर जाता रोज़।

पूजा की गा आरती,पर न हुई प्रभु खोज।।


तिलक,छाप व्रत भी किया,रँगे गेरुआ  वस्त्र।

पर वाणी से छोड़ता, रहा सदा मैं अस्त्र।।


कर्म  स्वयं करता नहीं,देता पर -उपदेश।

जो कपटी गुरु मंच का,रँगकर  बैठा वेश।।


व्यास पीठ पर बैठकर,गाता भजन हज़ार।

पर - नारी को हेरता,उस नर को धिक्कार।।


चरित घास चरता रहा,करनी मैली कुंद।

चढ़ा पीठ चिंघाड़ता, गंग सुरा की   बुंद।।


वाणी  से  अमृत   रिसे, उर  में  काँटे  झाड़।

अवसर मिले न चूकता,मिल जाए जोआड़।


पर धन पर नारी मिले, मन में मैली  चाह।

कथा भागवत पढ़ रहे,सावन भादों माह।।


पोल न उनकी खोलना,करें नित्य जो पाप।

उपदेशक गुरु पीठ के,लगता उन्हें न ताप।।


🪴 शभमस्तु !


१४.०२.२०२१◆९.०० पतनम मार्त्तण्डस्य।

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

हम बालक [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार©

🧑‍✈️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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माता -  पिता   हमारे   पौधे।

जन्माए हम  बालक  औंधे।।


अभी कली कल फूल बनेंगे।

कभी नहीं  बन शूल  तनेंगे।।


महकेंगे  भारत   की  बगिया।

जननी जन्मभूमि हो सुखिया।


भूलेंगे   उपकार  न   इनका।

जोड़ बनाएँगे   घर तिनका।।


करनी है   हमको  ही रचना।

हमसे ही ये  धरती सिंचना ।।


इसका अन्न, दूध,  फल खाएँ।

अपना हर  कर्तव्य   निभाएँ।।


'शुभम'  कृतज्ञ सदा ही रहना।

नित दरिया-सा हमको बहना।।


🪴 शुभमस्तु!


१४.०२.२०२१◆५.००पतनम मार्त्तण्डस्य।


पूँछ [बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार©

🦜 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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तनिक  नहीं  मेरी  कुछ पूछ।

फिर भी कहते मुझको  पूँछ।।


लटकी  हिलती - डुलती   हूँ।

फिर  भी   नहीं   बदलती हूँ।।


दुमधारी    पशु      कहलाता।

कद   मेरा   तब   घट जाता।।


कभी  बैठ   मुझ   पर जाता।

कभी   हवा   में   लटकाता।।


भाव   दिखाती    मैं   अपना।

टाँगों  में जब    हो    घुसना।।


मुझको   कभी   हिलाता   है।

चाटुकार    बन     जाता  है।।


पशु   की    मैं   परिभाषा  हूँ।

हरदम   उसकी    आशा  हूँ।।


फिर  भी   मेरी    पूछ    नहीं।

'शुभम' न करती कूच  कहीं।।


🪴 शुभमस्तु !


१४.०२.२०२१◆४.३०पतनम मार्त्तण्डस्य।


प्रकृति का वरदान :ओट [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार © 

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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प्रेम प्रणय में ओट का,अपना गूढ़ महत्त्व ।

लज्जा  घूँघट खोलती,होता गाढ़ घनत्त्व।।


जीवन में आती कभी, जब सुहाग की रात।

ओट बना मज़बूत- सी,करते दंपति बात।।


बिना ओट संस्कार का,होता सदा विनाश।

नर-नारी पशु तो नहीं,बनें हास का पाश।।


कर्म  बुरे  अच्छे सभी, होते लेकर   ओट।

भय,लज्जा या भेद की,लगे न कोई  चोट।।


बीजारोपण,    अंकुरण,   नारी  गर्भाधान ।

ओट सभी को चाहिए, प्रकृति का वरदान।।


ब्रह्म-जीव के मध्य में,माया की  घन ओट।

आभासित होती सदा,बनकर धन की पोट।।


जादूगर है   ब्रह्म सत, माया सदा   अदृष्ट।

ओट बनी ठगती रहे,करती नित आकृष्ट।।


शैशव भी है ओट ही,जिसकी आड़ किशोर।

यौवन पक्व जरा वहीं,भरती गुप्त   हिलोर।।


बूथों पर जो हो रहा,आज गुप्त मतदान।

ओट बनी  है  वोट की,बोरी ही  वरदान।।


चोरी,ठगी, डकैतियाँ,  लेते तम  की ओट।

परनारी  से जा  मिलें, देते बद नर    चोट।।


तम  की  ओटों  में  बड़े,होते हैं  बहु  काम।

ओट काम को चाहिए,न हो 'शुभम'बदनाम।


१२.०२.२०२१◆६.३० पतनम मार्तण्डस्य।

ओट: अदृश्य कोट [ अतुकान्तिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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भला   या   बुरा   हर  काज,

छिपा रहता है जिसका राज,

होता  है  किसी   ओट  में,

बंद रहता है युगल होठ में,

खुल जो गया समय पूर्व राज,

मार देता है झपट्टा कोई बाज।


ज़रूरी है इसलिए एक ओट,

ग़लत नहीं पड़ जाए समय की गोट,

अनेक कारण हैं किसी ओट के,

आहत न हो काज किसी चोट से,

कहीं  सभ्यता ,कहीं संस्कार ,

कहीं    झिझक ,  कहीं प्यार,

कहीं  किसी   की बुरी नज़र,

गिर न पड़े शुभता पर बज़र,

बीजारोपण,संस्कार,गर्भ का आधान,

चाहे    हो    एकलव्य    का धनुर्विद्या -प्रशिक्षण बाण- संधान,

बीज का भू  या माता के 

गर्भ    में     बीजारोपण,

सभी       काज          हैं     

पीछे        ओट    में  गोपन।


छिपा रहता है बचपन में यौवन,

यौवन में भी गुप्त है चारु

चंचल चितवन,

फूलों की कलियों में ज्यों

सुगंध की महकन,

त्रिवेणी के घाट  पर

सरस्वती  -  संगम,

अदृश्य किसी ओट में

विचरण।


लोकतंत्र  में   मतदान   हेतु

वोट ,

उन्हें आवश्यक है टाट, बोरी

तिरपाल की ओट,

ओट से ही है हमारा तुम्हारा

सबका   सृजन,

पर नहीं कहीं कोई ओट जब होता  हो  मरण,

सदाचरण ,भोजन, भजन,

दुराचरण,प्रणय,धरा पर आगमन,

सबको चाहिए एक हल्की या

भारी ओट,

नहीं ढूँढ़ सकते वहाँ कोई खोट।


ब्रह्म  और    जीव    के  बीच

खड़ी हुई   माया की ओट,

करती  ही  रहती है   निरंतर

अदृश्य विस्फ़ोट! 

ओट से भरमाया हुआ है जीव,

नर हो या मादा अथवा क्लीव,

माया जो लगती है दृश्यमान,

वस्तुतः नहीं है उसका स्थान,

चेरी ब्रह्म की चलाती चक्कर,

किसी सु-चक्र किसी को चक्कर,

यह एक  अटल ओट ही है ,

इधर -   उधर    रखते   हुए

'शुभम' ब्रह्म  की गोट ही है।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०२.२०२१◆५.३०पतनम मार्त्तण्डस्य।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

जब जीवन में हो खुशहाली! [ गीत ]


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✍️ शब्दकार©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जब जीवन में हो खुशहाली गीत सुहाता है।

कोलाहल हो रहा देश में हमें न  भाता है।।


कहीं  आपदाएँ हैं कुदरत की,

कहीं आदमी की फ़ितरत की,

कहीं किसान पड़ा सड़कों पर कष्ट उठाता है,

जब जीवन में हो ख़ुशहाली गीत सुहाता है।


लुटी खेत,  सड़कों  पर नारी,

मानवता   पर    पड़ती  भारी,

मंचों पर चढ़कर ये पौरुष माल चढ़ाता है,

जब जीवन में हो ख़ुशहाली गीत सुहाता है।


कहता   देवी   बहन  हमारी,

दुर्गा माता    की    अवतारी,

परदे  के  पीछे  ले  जाकर पाप  कमाता  है,

जब जीवन में हो ख़ुशहाली गीत सुहाता है।


नेता  कहते   दूध   धुले  हम,

हंसों से हम नहीं  कभी कम,

राजनीति में सान  देश  को नाश कराता  है,

जब जीवन में हो ख़ुशहाली गीत सुहाता है।


सौ   में   नब्बे   दूषित   नेता,

परदे  में  छिप   अंडे    सेता,

अंधा  भक्त  भेड़  है  सारा भीड़  बढ़ाता  है,

जब जीवन में हो ख़ुशहाली गीत सुहाता है।


अंधभक्त    ने    पट्टी    बाँधी,

मनमानी की  चलती   आँधी,

मध्यम  वर्ग  चुसा  है  सारा मरता  जाता  है,

जब जीवन में हो ख़ुशहाली गीत सुहाता है।


होता  ग़लत समर्थन फिर भी,

जातिवाद की   गर्दिश भर दी,

हिंदू  ही  हिंदू  का  दुश्मन  लूट मचाता  है,

जब जीवन में हो ख़ुशहाली गीत सुहाता है।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०२.२०२१◆४.००पतनम मार्तण्डस्य।

दर्जी [ बालगीत ]

 

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✍️ शब्दकार©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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दर्जी  कपड़े   सिलकर  लाया।

माँ   ने   मेरा   सूट  सिलाया।।


पेंट - कमीज़    सिलाई   मेरी।

करता  नहीं   कभी   वह देरी।।

दादी  की  फतुही सिल लाया।

दर्जी  कपड़े  सिलकर  लाया।।


छोटा- सा   रूमाल   बनाया।

इंटरलॉक    किया   मनभाया।

मैंने   मन   में   हर्ष   मनाया।

दर्जी कपड़े  सिलकर लाया।।


कपड़े   काट    मशीन  चलाता।

खट-खट का स्वर मुझको भाता।

दादा   ने   कुरता   सिलवाया।

दर्जी  कपड़े  सिलकर लाया।।


सुई   कभी   ऊपर  को  जाती।

झट  से  नीचे  को झुक जाती।।

चटपट  कपड़ा  सिलता पाया।

दर्जी  कपड़े  सिलकर  लाया।।


चश्मा 'शुभम'  लगा  आँखों पर।

दोनों    पैर  और  चलते  कर।।

आगे   सिलता   वस्त्र  बढ़ाया।

दर्जी  कपड़े   सिलकर लाया।।


💐 शुभमस्तु !

१०.०२.२०२१◆२.००पतनम मार्त्तण्डस्य।

हम नारी-सम्मान- प्रदाता! [ व्यंग्य ]


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✍️ लेखक © 

💃🏻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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   हम कितने बड़े नारी -हितैषी हैं यह कोई हमसे सीखे! युग -युग से ये कहा और सुना जा रहा है कि 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता:'।अर्थात जहाँ नारियों की पूजा होती है , वहाँ देवता रमण करते हैं। आख़िर देवताओं को इन नारियों से कुछ स्वार्थ तो होता ही होगा ,अन्यथा अपना घर -बार ,काम -काज छोड़कर नारियों के चारों ओर चक्कर क्यों लगाते? बशर्ते वे कुछ काम -काज करते भी हों, क्योंकि जहाँ देवताओं को मन में इच्छा करते ही सब कुछ उपलब्ध हो जाता हो , उन देवताओं को कोई काम करने की आवश्यकता ही क्या है? कोई खेती -बाड़ी , कार्यालय में नौकरी, व्यवसाय , मिलावट का धंधा , चोरी , डकैती, गबन, तो करने से रहे! फिर भला केवल नारियोंको सम्मान देने के लिए ही ये क्यों चक्कर चलाने लगे? यह भी एक शोध का विषय है। 

             शोध के चक्कर में क्यों पड़ें।इसलिए इस समय यही मान लेते हैं कि नारियों के ताबड़तोड़ सम्मान करने की, उनका सीमा से बाहर हित करने की,उन्हें अबला मानकर उन्हें बल देने की हमारी आदत पड़ गई है।( हम अपने को किसी देवता से कम नहीं मानते हैं, यह हमें सदा स्मरण रखना होगा।) हमारा एक संस्कार ही बन गया है।हृदय की पुकार बन गया है। इसलिए एक परंपरा के तहत हम भी उसी ढपली को बजाए जा रहे हैं।कोई ढपली भी बिना मतलब के नहीं बजाता , हमारे इस विशेष ढपली-वादन में भी हमारा कुछ अंतर्निहित उद्देश्य भी होगा।जिस समाज औऱ दुनिया में कोई भी किसी की कटी हुई अँगुली पर स्वमूत्र -विसर्जन नहीं करता,वहाँ कोई नारी को यों ही सम्मान लुटाए ,बात कुछ हज़म नहीं होती। हर नारी को माँ -बहन का सम्मान देने के 'सु -समाचारों' से आजकल के अख़बार भरे पड़े हैं।पुरुष की ' अति - मानवतावादी' 'शुभ-दृष्टि' के चमत्कार भरे कारनामे उसकी 'उज्ज्वल संस्कृति' और 'सु-संस्कारों' के द्योतक हैं।

        स्वदेश में ही नहीं पश्चिमी देशों में भी 'लेडीज फर्स्ट' इसलिए तो माना जाता है। यह भी 'रमन्ते तत्र देवता:' का बदला हुआ रूप है।उसी की देखा देखी यहाँ भी यह सिद्धांत चल नहीं,दौड़ रहा है। आदमी जब करता है तो हद ही करता है ,बल्कि हद की जद ही तोड़ देता है। सम्मान की भी हद हो गई कि वसंत ऋतु में मधुर कंठ से सारे वातावरण को एक मादक माधुरी से भर देने वाला नर कोयल होता है ,लेकिन इस आदमी की चाटुकारिता की हद तो  तब टूट ही गई कि

 'कोयल मधुर स्वर में बोल रही है, 

कानों     में मधु     रस घोल रही है, 

आया      है   ऋतुराज  वसंत प्यारा,

 कोयल  डाली -डाली पर डोल रही है।।'

 जानबूझ कर नर को नारी की उपाधि से सम्मानित करना ,उसकी अनभिज्ञता नहीं है, उसकी तेल मालिश ही है। इसी प्रकार हमारे यहाँ मछली का सपना देखना, यात्रा के समय मछली दर्शन या 'आते समय मछली लेते आना' कहना बहुत शुभ माना जाता है।मछली खाना शुभ होता हो या नहीं, ये कहना मेरे लिए न शुभ है औऱ न सही ही, क्योंकि इस अनुभव से परे हूँ। कोई यह नहीं कहता 'मछला लेते आना, मैंने आज स्वप्न में मछला देखा ' आदि आदि। देखते सब मछली ही हैं, मँगाते सब मछली ही हैं। यहाँ भी नारी मछली को शुभता का प्रतीक माना गया है। एक औऱ उदाहरण से अपनी बात की पुष्टि करने की कोशिश करूँगा । जब कोई अपने गाल से कुछ ऐसे शब्द कहता है ,जिन्हें विद्वान /विदुषियां अपशब्द कहते हैं ,लेकिन समाज की भाषा में उसे 'गाली' कहा जाता है। अब आप ही सोचिए कि वह 'गाली' हुई या 'गाला'। ये कैसा सीमा का अतिक्रमण कि पुरुष को नारी बना दिया? शायद नारी. -सम्मान के लिए ही ऐसा किया जाता होगा।

              यह लिंग परिवर्तन की प्रथा कुछ नई नहीं है। आदमी लकीर का फ़कीर जो है। वह जान बूझ कर किसी निहित स्वार्थ के मुहाने ऐसा कुछ भी उलटा-पुलटा कर लेता है।आप ये न समझें कि मैं नारी विरोधी हूँ। मैं भी नारी का सम्मान यथा सम्भव करता हूँ।पर 'लिंग बदलू' परंपराओं का कोरा समर्थक भी नहीं हूँ। आदमी ऐसा मिथ्याचारण करने लगा,इसीलिए भगवान ने एक बीच का तीसरा लिंग(Third Gender,संस्कृत में नपुंसक लिंग) भी जन्मा दिया। ये लो उसे क्या कहोगे ?नर या नारी? इसलिए कहा गया किन्नर(किं नर:? अर्थात क्या ये नर है?अर्थात नहीं। तो क्या? न नर, न नारी ।)। 

         कुछ नए शब्दकोष निर्माताओं ने तो दही ,पेंट, आदि हजारों शब्दों को नर लिंग से नारी लिंग में लिख बोलकर नारी का सम्मान -वर्द्धन ही किया है। परंतु हद तब हो गई जब उल्लू तो है पर उल्ली क्यों नहीं? कौवा है पर कौवी क्यों नहीं? गिद्ध तो है पर गिद्धनी कहाँ ? यह पुरुष वर्ग का सरासर अपमान ही तो है! अब यह कैसे कहूँ कि इसके लिए नारी ही जिम्मेदार है, पुरुष भी होगा। ऐसा नहीं होना चाहिए । यदि मैं यह कहने लगूँ कि कोयल कूक रहा है। तो मुझे रोकने ,टोकने के लिए हजार हाथ खड़े हो जायेंगे औऱ हाथों की दस हजार अंगुलियाँ भी सतर्क हो खड़ी हो जाएँगीं।अरे !ये क्या कह रहे हैं ?जबकि उन्हें स्वयं नहीं मालूम कि कोयल की चमचेगीरी करते -करते उन्हें यह भी नहीं पता कि बोल रहा है कि बोल रही है!

 हम  नारी सम्मान प्रदाता। 

तिरसठिया    नारी से नाता।। 

चोंच    लड़ाना हमको आता।

 शीश    चढ़ाना   हमको भाता।।


 कोयल      बोला कहें बोलती। 

ऋतु    वसंत में  शहद घोलती।।

 नर  का  लिंग  बदल हम डाला। 

ऊपर    से      पहनाई      माला।।

 चाटुकारिता         हमसे   जानो।

 गुरु   घंटाल     हमें   सब मानो।। 


नीर अलग कर  क्षीर निकाला। 

झूठे     के     साँचे में ढाला।।

 बुरा     नहीं   है झूठ बोलना।

 सच   में  भी  कुछ धूल घोलना। 


साड़ी पहन बना दें नारी।

 जो पड़ती नर पर भी भारी।

। माखन को लगाना सदा श्रेष्ठ है।

 माखन को खाना हुआ नेष्ट है।।


 आती है हमको ये उत्तम कला। 

कर पाते सहज हम जग की बला।।

 आओ मक्खन लगाना सिखा दें सनम

। ठंडा कर दें पलों में सोए जो बम।।

 कोयले से ही हीरा बनाते हैं हम। 

कहता आप लोगों से साँची 'शुभम'।। 


 🪴 शुभमस्तु !

 ०९.०२.२०२१.१.३०पतनम मार्त्तण्डस्य। 




मेरे भारत देश में [ कुण्डलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                      [ 1 ]

मेरे  भारत  देश में, तरह - तरह  के  जीव।

मानव तन में भेड़ हैं,जौंक सर्प कुछ क्लीव।

जौंक सर्प कुछ क्लीव,गिद्ध जिंदा नर खाते।

आस्तीन  के  साँप, नहीं मानव  को   भाते।।

'शुभम'   भेड़िए  नोंच,   रहे  हैं  डाले   घेरे।

कैसे   हो   उद्धार, भक्त  भारत  के    मेरे।।


                     [ 2 ]

मेरे  भारत  देश  में,  राजनीति का     पंक।

छिटक रहा हर ओर ही,तनिक नहीं है शंक।।

तनिक  नहीं  है शंक, भक्त सब  पट्टी   बाँधे।

देते  पर   उपदेश,  उठा अर्थी निज   काँधे।।

'शुभम' न शेष विवेक,भेड़ बकरी  के    चेरे।

जातिवाद  के कीट ,काटते तन - मन   मेरे ।।


                      [ 3 ]

मेरे   भारत   देश    के, नेता मिट्ठू   राम।

अपने  ही  गुण गा  रहे,कहते करो सलाम।।

कहते करो सलाम,भूल पिछलों को जाओ।

माखन की  दरकार , हमारी  देह  लगाओ।।

'शुभम' यही शुभ काज,हमीं शुभचिंतक तेरे।

माखन  के   शौकीन, देश भारत   के   मेरे।।


                      [ 4  ]

मेरे  भारत  देश  के ,चमचे गुण  की खान।

खच्चर  को घोड़ा कहें ,बढ़ा रहे  हैं  शान।।

बढ़ा   रहे  हैं शान,  भेड़ की भीड़  बढ़ाते।

नेता  ही भगवान,मानकर फूल   चढ़ाते।।

'शुभम' न कर विश्वास, उखाड़ेंगे  तव डेरे।

करते     बंटाढार,   देश   के चमचे    मेरे।।


                      [ 5  ]

मेरे  भारत  देश  में , बाँबी बनी  अनेक। 

दीमक चाटे जा रही,पालित पोषित नेक।।

पालित  पोषित नेक, दुलारी नेताजी  की।

बना  सुरंगी  देश,पूड़ियाँ खाती  घी की।।

'शुभम' खोखला   राज,दोमुँहे करते  फेरे ।

डसते हैं दिन -रात, देश भारत को   मेरे।। 


🪴 शुभमस्तु !


०९.०२.२०२१◆५.३०पतनम मार्त्तण्डस्य।

अम्मा देखो ! [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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रात   नहीं  अब  अम्मा देखो!

तारे   ऊँघे    अम्मा     देखो!!


पूरब     में    छाई  है   लाली ,

चिड़ियाँ चहकीं  अम्मा देखो!


कलियाँ चटकीं फूल खिले हैं,

खुशबू  फैली  अम्मा  देखो!!


कुक्कड़ कूँ  भी बाँग  दे रहा,

बतखें  घूमें  अम्मा    देखो !!


चूँ - चूँ  चहक   रही   गौरैया,

कोयल  कूकी  अम्मा देखो!!


मंद -  मंद  शीतल   बयार है,

बाबा जागे    अम्मा   देखो!!


'शुभम' गुटर- गूँ  करे  कबूतर,

छत पर जाकर अम्मा  देखो!!


🪴 शभमस्तु !


०८.०२.२०२१◆७.१५ पतनम मार्त्तण्डस्य।

देश की माटी [ बाल कविता ]

 

★★★★★★★★★★★★★★★

✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

★★★★★★★★★★★★★★★

हमें   देश    की  माटी  प्यारी।

महिमा है इसकीअति न्यारी।।


गेहूँ, चना, धान  , जौ    देती।

आलू ,गोभी  सब्जी    जेती।।


खिलते   जूही,    बेला,  गेंदा।

नीबू ,  मीठे  आम,    फरेंदा।।


चरती  हरी  घास  सब  गायें।

खाकर भैंसें   खड़ी  रंभाएँ।।


बेलों   पर मीठे  फल  आते।

तरबूजे    खरबूज    सुहाते।।


देती    माटी    चाँदी,  सोना।

कुदरत  को पड़ता  है बोना।।


लकड़ी ,ईंधन ,पानी, मिलते।

चलती हवा पत्र सब हिलते।।


जामुन,आम, अनार ,पपीता।

कौन'शुभम' कुदरत से जीता!


 🪴शुभमस्तु !


०८.०२.२०२१◆७.००पतनम मार्त्तण्डस्य।

ग़ज़ल


★★★★★★★★★★★★★★★

✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

★★★★★★★★★ ★★★★

आज देश की  किसको चिंता।

जूझ  रहा जो  उसको  चिंता।।


लोग   देखते    जेब   तिजोरी,

सैनिक की हर  रिस को चिंता।


भरे  पेट   वालों  को  क्या है?

बाँध पोटली खिसको , चिंता।


देशप्रेम     के     कोरे     नारे,

क्या नारी  क्या नर को चिंता।


राजनीति  की कीचड़ से सन,

फैलाएँ   वे    विष को ,चिंता।


जीवन  की   राहें    सब  टेढ़ी,

कैसे  पहुँचें   घर को ,  चिंता।


'शुभम' देश   थाली का बैंगन,

ससुरालय की सबको ,चिंता।


🪴 शुभमस्तु !


०६.०२.२०२१◆६.००पतनम मार्तण्डस्य।

भारत मेरा गेह [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कूकर भी इस देश का,दुश्मन से  उत्कृष्ट।

वफ़ादार हो भोंकता,अरि है दुर्जन दुष्ट।।


अन्न  खा रहे देश का,करें न लेश  हलाल।

गाते गीत विदेश के, करते सदा बबाल।।


जीना  भी  इस देश में,मरना भी  इस  देश।

मरी वफ़ादारी सभी ,ठगें बदल कर वेश।।


सहनशीलता देश की ,जग में  एक  मिसाल।

विषधर को भी पालती, फैलाते जो जाल।।


निज सीमा को लाँघकर,करता जो व्यवधान

उठो  पार्थ  रणबांकुरो! साधो तीर  कमान।।


बुरी नज़र से देश पर ,डाली जिसने आँख।

आँख फोड़ दें तीर से,काट डाल  दें पाँख।।


आस्तीन  के  साँप का,फन कुचलो रणधीर।

पत्थर  से या   ईंट  से, कहलाओगे  वीर।।


कूकर बिल्ली देश के,विश्वसनीय  महान।

सर्प दोमुँहे डस  रहे,हैं सब विष की खान।।


माता  सबको पालती,अपनी हर    संतान।

चाहे  कूदे  शीश  पर,  मात लुटाती जान।।


जिसने माँगा गोद को,मिली उसे भी  गोद।

गोद चढ़ा लोहू पिए, मन को मिले न मोद।।


ग्रामवासिनी   भारती, माँ का पाएँ    नेह।

'शुभम' सदा सम्मान हो,भारत मेरा   गेह।।


🪴 शुभमस्तु !


०६.०२.२०२१◆१.१५ पतनम मार्त्तण्डस्य।

घर का भेदी लंका ढावे [ व्यंग्य ]


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✍️ लेखक ©

 🫐 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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            'घर में लगती है आग घर के ही चिराग से।'यह कहावत कुछ यों ही नहीं बन गई।इसी प्रकार 'घर का भेदी लंका ढावे' भी बहुत प्राचीन त्रेतायुगीन सोने की लंका में घटी घटना पर आधारित है। आज के युग में ये दोनों कहावतें सटीक सिद्ध होती हुई ये कह रही हैं कि वे आज के लिए ही तो बनी हैं। 

          देश के अंदरूनी हालात से कौन वाकिफ़ नहीं है। देश के ही लोग बाहरी दुश्मनों का सहारा लेकर उन्हें प्रश्रय दे रहे हैं औऱ निरंतर देश को खोखला कर रहे हैं। वह तो भगवान श्रीराम जी ने वानरों औऱ भालुओं आदि का सहयोग लेकर रावण की सोने की लंका पर विजय प्राप्त की। यदि मनुष्यों का सहारा लिया गया होता तो सम्भवतः राम को विजय श्री हासिल करने में लोहे के चने चबाने पड़ जाते। मनुष्य तो सोने की लंका देखकर ही बौरा उठते,औऱ लड़ाई का मैदान छोड़कर सोना बटोरने में लग जाते।फिर घर का भेदी भी फिसड्डी साबित होता। वानर, भालुओं को भला सोने से क्या काम! क्या लालच !!इसलिए निर्मोह भाव से युद्धरत रहे औऱ पूर्ण समर्पण से राम का सहयोग किया। 

            देश के दुश्मन देश में ही छिपे हुए घात कर रहे हैं।कभी किसान आंदोलन भड़काकर, कभी छात्रों को बरगला कर , कभी हिन्दू -मुस्लिम भावना की आग सुलगाकर, कभी राजनीतिक छल-छद्म का जाल तानकर देश को कमजोर करने में लगे हुए हैं। देश के ये विषैले नाग आस्तीन के साँपों से कम नहीं हैं। क्या इनसे देशभक्ति की कोई भी आशा की जा सकती है? इस देश के तथाकथित नेता अपने को दूध से धुला हुआ नहीं समझें। वे दूध के रंग के कपड़े ,सूट -बूट पहन कर अपने को हंसों की कतार में बैठने की भूल न करें।

          नेता - नेतियों की भी अनेक किस्में हैं।सियासी,किसानी,विद्यार्थी, कर्मचारी,पटवारी, वकीली, अधिकारी -हर क्षेत्र में नेता ही नेता हैं। नेता का नाता देशभक्ति से हो ,यह कदापि आवश्यक नहीं है। हाँ, इतना अवश्य है कि सभी प्रजाति के नेता अपने को ही सबसे बड़ा देशभक्त , जनहितकारी, परमार्थी, परोपकारी और घण्टा बजाने में अग्रणी अवश्य प्रदर्शित करते हैं। इनमें भी 'घर के भेदी' छिपे हुए हैं । सेना ,जो देश सेवा का सबसे बड़ा क्षेत्र माना जाता है , वह भी ऐसे दगाबाजों से खाली नहीं है। क्या पुलिस !क्या प्रशासन!! क्या आँगनबाड़ी क्या राशन! जिसके जितने पैने दाँत, उतनी लंबी उसके पेट में आँत। बस वही बेचारा ईमानदार है, जिसे अवसर की अम्मा ने दूध नहीं पिलाया। वह तो बस मन मसोसे बैठा तिलमिलाया।! उसने ही सोने की लंका पर गज़ब नहीं ढाया। आज वही तो दूध का धुला है।उसने ही फतह किया ईमानदारी का किला है। बेचारे को मौका ही नहीं मिला है। वह सबसे बड़ा देशनुरागी है। बड़भागी है। क्योंकि उसने मर्यादा की लक्षमण रेखा नहीं लांघी है । इसलिए आज वही विवेकानंद है , वही गांधी है।

             घर के भेदी का नाम कोई अपने बच्चे का भले न रखे, पर वह तो इस सिद्धांत का मानने वाला है: 'बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा? विख्यात न सही कुख्यात तो होगा।' इस देश में एक विभीषण तो नहीं ,जो सूची जारी कर दी जाए! घर -घर , गली -गली , गाँव -गाँव, नगर -नगर , दफ्तर -दफ्तर , प्रदेश-प्रदेश , सारे देश अनेक वेशों में छद्म सेना है ,जिसे देश और समाज से कुछ नहीं लेना -देना है। बस दीमक की तरह धीरे -धीरे देश को खोखला करते रहना है।इस काम को जितने गोपनीय ढंग से कर लें ,वही इनकी वफ़ादारी, ईमानदारी,कारगुजारी और हंस की सवारी है। खुलती है जब पोल , तब दुनिया को पता लगता है इनका 'पावन' रोल! फिर मारो इन्हें गोली या कड़े हाथ का धौल,वही है इनका मोल , केले के पातों जैसे उतरने लगते हैं खोल। इनके शातिर दिमाग की उड़ान , रहस्यों से भरी चाहें पहुँचा दे मसान, ये नहीं छोड़ते अपने पैरों के निशान। भले ही ले लो इनकी जान। यही तो है घर के भेदियों की असली पहचान।कहते हैं ये मान न मान मैं तेरा मेहमान। भीतर से ज़िंदाबाद पाकिस्तान! बाहर से सब कुछ मेरा हिंदुस्तान। 

 🪴 शुभमस्तु !

 ०६.०२.२०२१◆८.००पतनम मार्त्तण्डस्य


ग़ज़ल


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✍️शब्दकार

 🪴 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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दूसरों   में    सीख   वे  भरने लगे   हैं।

देख   लें   ये   ऐपिये  कितने  सगे   हैं।।


धर्म  के  अवतार  की कथनी ये    कैसी,

सो  रहे  या  ये सभी  मन  से जगे   हैं।


कोई चिकत्सक,वैद्य,शिक्षक है  यहाँ  पर,

बीमारियों  से  खुद  वही  इतने  पगे   हैं।


चाहिए   उनको   न   कोई शुल्क  पैसा,

ज्ञान   को   ही  बाँटते   पकने लगे     हैं।


खुद   कभी  सोचा नहीं हम भी करें  कुछ,

नित  मगर  परमार्थ    के   झरने  बहे   हैं।


हर   गली   में  आज  हैं  उस्ताद   सारे,

तानपूरे  - से   मगर   बजने लगे      हैं।


'शुभम'अपने कर्म की पहचान किसको,

अख़बार में  भी नाम छपने के नशे   हैं।

ऐपिए= व्हाट्सऐपिये


🪴 शुभमस्तु !


०४.०२.२०२१◆२.००पतनम मार्त्तण्डस्य।


ये कैसी देश - रचना! [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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नेताओं    को    तेल  लगाना ,

हमको    नहीं  कभी   आता।

सुनो!सुनो!! घड़ियाली आँसू,

नहीं    बहाना भी      भाता।।


पैर     चाटते    नेताओं    के ,

शीश  झुकाते    ड्यौढ़ी  पर।

चमचे    खड़े   आरती करते ,

शरणागत   हो    पौड़ी   तर।।

स्वाभिमान की   रक्षा  करते,

उन्हें   न    भाए     ये  छाता।

नेताओं  को    तेल   लगाना ,

हमको नहीं    कभी   आता।।


पलक  पाँवड़े  बिछा स्वयं के,

कहें     'पधारें        नेताजी।'

रिरियाते   घिघियाते  कंपित,

पढ़े-लिखे    कंपित   प्राजी।।

पानी सूख  गया  आँखों का,

जीना   नहीं     उन्हें  आता।

नेताओं   को    तेल लगाना,

हमको  नहीं   कभी आता।।


वेश्या  के    पाँवों  में   जिनका,

 चरित   लोटता   फिरता   है।

वही - वही भाषण -  चिंघाड़ू,

परदे   में    नित  गिरता   है।।

रिश्वत दम्भ  दलाली   से ही,

परिवार  छद्म  से पल पाता।

नेताओं   को   तेल  लगाना,

हमको   नहीं   कभी आता।।


दीन -हीन   आ जाता  कोई,

फँस   जाता    उनका  मुर्गा।

मीठी -  मीठी   बातें   करके,

ले  जाता     उसको    गुर्गा।

कोई  मरे ,  बचे   या   जीवे,

वह हलाल   कर  जी जाता।

नेताओं   को   तेल  लगाना,

हमको  नहीं  कभी  आता।।


नेता  की    कुर्सी  से जिनकी,

चलती     है     रोजी -   रोटी।

पाँव छुएँ पहले झुक-झुककर,

पकड़ उखाड़ें   सिर - चोटी।।

बोटी -  बोटी   खाएँ    कच्ची,

मानवता    से    क्या   नाता ?

नेताओं  को   तेल     लगाना,

हमको   नहीं   कभी  आता।।


डूबा  है   आकंठ    कीच   में,

फ़िर भी कमल खिला करता।

पहन  बगबगे   वेश  देह   पर,

बगुला - भक्त   तना फिरता।।

कितना भी हो पतित कर्म से,

फिर भी गीत    मधुर  गाता।

नेताओं   को   तेल   लगाना,

हमको   नहीं   कभी  आता।।


पढ़ा -लिखा   ऊँची शिक्षा का,

 शीश,  झुका  पद   को  छूता।

नेताजी  का   हुआ   आगमन,

उठा  रहा     बढ़कर     जूता।।

'शुभम'कलुषतामय भारत की,

रचना   समझ    नहीं    पाता।

नेताओं    को    तेल  लगाना ,

हमको   नहीं   कभी  आता।।


🪴

 शुभमस्तु !


०३.०२.२०२१◆१.००पतनम मार्त्तण्डस्य।

नदी [ मुक्तक ]

 

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 ✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                     -1-

न   दिया   कहा   देती   रहीं,

मँझधार     में     खेती   रहीं,

जीवन  की  तरणी    बेटियाँ,

नदिया  सदृश   बहती   रहीं।


                      -2-

देती है    फिर  भी है न दिया,

प्यास बुझाती जल से बढ़िया,

मौन रात - दिन  बहती रहती,

कलरव करती बढ़ती नदिया।


                     -3-

चाह नदी -  सी  उर  में होती,

नियति नहीं मानव की सोती,

बिना शिकायत बहती रहती,

नदी नहीं   भर  आँसू   रोती।


                      -4-

नदियों   में  बहता  है जीवन,

देती  भारत   को    संजीवन,

लेती     नहीं    मात्र  देती हैं,

सिंचित करती धरती उपवन।


                      -5-

नदी    हमारी    प्रेरक  माता,

जो गुण   गाए  भाग्य बनाता,

सुंदर  मौन   धारकर   बहती,

बीहड़ में भी कण उग आता।


🪴 शुभमस्तु !


०२.०२.२०२१◆५.१५पतनम मार्त्तण्डस्य।

मीठी गुड़धानी [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार©

🍕 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कहाँ   गई   मीठी   गुड़धानी।

याद  किया आया मूँ  पानी।।


मूँगफली  की  चाप   निराली।

लेमन जूस गोलियाँ  खा ली।।

चूस - चूस   चुभलाती  नानी।

कहाँ  गई   मीठी   गुड़धानी।।


ठंडी  घिसी  बर्फ   भी खाई।

बूँदें मधु' रस   की  टपकाई।।

बैठ नीम तरु   छप्पर -छानी।

कहाँ  गई  मीठी   गुड़धानी।।


आम   चूसते   मीठे    टपका।

गिरा डाल से झट से लपका।।

नाम लिया भरता   मूँ   पानी।

कहाँ  गई मीठी     गुड़धानी।।


लडक़ी खेल  रहीं  गुटकंकर।

कंचे , नौगोटी   भी  डटकर।।

चली  गईं वे   बात    पुरानी।

कहाँ  गई   मीठी   गुड़धानी।।


गूलर पर   चढ़   गूलर  खाते।

गिल्ली- डंडे   में   रम जाते।।

'शुभम' खूब बढ़ गप्पें  तानी।

कहाँ  गई  मीठी   गुड़धानी।।


🪴 शुभमस्तु !


०२.०२.२०२१◆ १.००पतनम मार्त्तण्डस्य।


भारत देश महान [ कुण्डलिया ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                      -1-

भारत  देश महान है , संस्कृति इसकी  शान।

रक्षा में  नित जूझते,सैनिक सबल  महान।।

सैनिक  सबल महान,आन पर प्राण छोड़ते ।

करते जी  भर  त्राण, नहीं वे कदम मोड़ते।।

'शुभं 'न घर का मोह,यहीं है उनकी ज़्यारत।

करते हम सम्मान,देश यह अपना  भारत।।


                      -2-

भारत भाषा  बहुल है, हिंदी उसकी प्राण।

अपनाएँ  हिंदी सभी, हिंदी से ही    त्राण।।

हिंदी  से  ही त्राण, दासता छोड़   विदेशी।

दें  हिंदी  का  साथ ,बनें  सर्वत्र  स्वदेशी।।

'शुभम'मान की बात,नहीं हों हम सब गारत।

पढ़ें, लिखें हम खूब,मातृभाषा से  भारत।।


                      -3-

भारत  का  ऊँचा  रहे, सदा तिरंगा    एक।

केसरिया है शौर्य का,शांति प्रदायक सेत।।

शांति  प्रदायक  सेत,  हरा देता   हरियाली।

फसलें दे धनधान्य,रहे चहुंदिशि खुशहाली।

'शुभम' न गिरता मान, नहीं हम होते गारत।

नील चक्र है शान, उच्च ही रहना  भारत।।


                      -4-

भारत के  कवि गा रहे,महिमा का गुणगान।

वीरों  में  उत्साह  दे ,प्रेरक प्रवर  महान।।

प्रेरक  प्रवर  महान, राष्ट्र सर्वोपरि  उनको।

गीता   का   संदेश, प्रेरणा देता  मन   को।।

'शुभम' कबीरा  सूर, संत  मीरा परमारथ।

अमर  हुए  वे आज, उठाते ऊँचा   भारत।।


                      -5-

भारत  में  गंगा  बहे, पावन यमुना   धार।

पापों से जो तारतीं,करतीं भव से    पार।।

करतीं  भव  से  पार, सदा सरयू,  कावेरी।

प्रबल नर्मदा धार,नहीं करतीं क्षण    देरी।।

'शुभम' त्रिवेणी मात, नहीं होने   दे गारत।

गोदावरी महान,अमर करतीं हैं    भारत।।


🪴 शभमस्तु !


०२.०२.२०२१◆१०.१५आरोहणम मार्त्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...