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सोमवार, 27 अप्रैल 2026

स्वाद आम का अतिशय खट्टा [ गीतिका ]

 146/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



स्वाद  आम   का   अतिशय  खट्टा।

कीर       ढूँढ़ता          छट्टा-छट्टा।।


अमराई     में        आई        गोरी,

भर     आमों   से   लिया   दुपट्टा।


चला   प्रभंजन     रूख     उखाड़े,

लगा     आम का    ऊँचा     चट्टा।


पत्थर   मार     तोड़ते      अमियाँ,

बालक    गँवई       फेंकें      गट्टा।


करो  न  ओछे     काम    बालको,

लगे  शान    को     किंचित  बट्टा।


सोच समझ   कर   खेल  खेलना,

नहीं समझना     जीवन     ठट्टा।


'शुभम्'   दाँव   पर  लगे न जीवन,

नहीं  मानना     इसको        सट्टा।


शुभमस्तु,


27.04.2026◆9.00आ०मा०

                     ◆◆◆

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

मनस कभी तेरा उचटे [ गीतिका ]

 649/2025


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 मनस      कभी        तेरा     उचटे।

रहे       केंद्र     पर     नित्य    डटे।।


बढ़े    परस्पर      प्रिय       संवाद,

मेल      एकता    से    न        हटे।


रीति        सनातन   भंग     न   हो,

उचित  नहीं      मनुजात        बटे।


कर्म      प्रधान       रहे       जीवन,

रहें      मनुज  से     मनुज     सटे।


मन      में  हो      संकल्प     प्रबल,

रहें       जगत      में      छटे - छटे।


एक        रहें        कथनी -  करनी,

पल    भर    को  मन    नहीं  घटे।


'शुभम्'  अहं     से    जो     है   दूर,

मानवता        से       नहीं      कटे।


शुभमस्तु !


27.10.2025●7.15 आ०मा०

                 ●●●

गुरुवार, 11 सितंबर 2025

सभी एक दिन बूढ़े होंगे [ गीतिका ]

 549/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सभी     एक   दिन     बूढ़े     होंगे।

गात     सचिक्कण    रूढ़े     होंगे।।


जिसे      देख      शरमाए     बाला,

मुखड़े  वे    सब       कूड़े       होंगे।


चार   दिनों     की     मात्र  चाँदनी,

चाँद       खुरखुरे       चूड़े      होंगे।


मत  इठला    सोफे    की     कुर्सी,

सजे      गुदगुदे         मूढ़े      होंगे।


तितली     एक       नहीं    आएगी,

उजड़े    चमन         बगूड़े     होंगे।


दिन    बीतेंगे        रस     लेने    के,

जादू      सभी      जमूड़े         होंगे।


'शुभम्'   केश    जो  चिकुर  कहाएँ,

धवल     बर्फ-से       जूड़े      होंगे।।


शुभमस्तु !


10.09.2025●2.00प०मा०

                  ●●●

सोमवार, 18 अगस्त 2025

ज्योति संग ज्यों जले दिया [ गीतिका ]

 437/2025


      



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


फल   मिलता  जो   कर्म   किया  है।

ज्योति   संग   ज्यों  जले दिया  है।।


यों   तो   सब   ही   जीते   जीवन,

पर उपकारी      सदा    जिया   है।


अपना   रंग      सोच    दिखलाए,

जिसका  निर्मल  सबल   हिया है।


आजीवन  जो     साथ    निभाए।,

सत्य  अर्थ    में    वही   तिया  है।


पति-पत्नी    का   युगल   रूप  है,

पत्नी  पति की   सबल   चिया है।


राम  कहीं   हों    महल-वनों     में,

उर  में    उनके   सदा    सिया  है।


लव कुश  'शुभम्'   श्रेष्ठ  संतति हैं,

श्रेष्ठ   कर्म    के   संग    क्रिया   है।


शुभमस्तु !


18.08.2025● 6.45 आ०मा०

                    ●●●

सोमवार, 4 अगस्त 2025

सावन की शुभताई [ गीतिका ]

 395/2025

    

       



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

  

शुचि सावन की सद  शुभताई।

ऋतु-रानी    वर्षा    ऋतु आई।।


झर-झर झर-झर झड़ी झरी है,

बदली बादल   के  सँग   धाई।


कहाँ गईं   वे   मृदुल   मल्हारें,

गूँजा   करती   थी    अमराई।


वीरबहूटी    विदा    हो    गई,

दिखती एक न कहीं  गिजाई।


करते    टर्र-टर्र     नर   मेढक,

प्रिया  मेढकी   पास    बुलाई।


जुगनू  लालटेन     ले    धाए,

कहें चाँद  की   कमी  मिटाई।


'शुभम्' रात में चमके बिजली,

सही न   जाए   विरह  जुदाई।


शुभमस्तु !


04.08.2025● 12.45आ०मा०

                 ●●●

मंगलवार, 22 जुलाई 2025

सावन आया [ गीतिका ]

 358/2025


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सावन    आया      सघन   घटा   है।

सजल  मेघ   की    रम्य   छटा  है।।


इतना  जल   बरसा झर- झर- झर,

जल- थल  का   संबंध    कटा  है।


इंद्रधनुष        ने       रंग      बिखेरे,

किंचित   घन   का   गात फटा  है।


पर्वत  पर    शिव    शंभु    खड़े  हैं,

बिखरी  भू   तक   श्याम   जटा है।


खेत   बाग   वन     हरे -भरे   सब,

परिश्रम  को  जा   कृषक खटा है।


सरिताओं ने  कल- कल - कल का,

निशा- दिवस निज  पाठ   रटा  है।


वन  में   गए   भ्रमण   करने    हम,

खोद - खोद   कर   प्राप्त   गटा है।


'शुभम् '  देख    लो   अस्ताचल  में,

अंबर    से   कुछ   मेघ   हटा    है।


शुभमस्तु !


20.07.2025●10.45 प०मा० (रात्रि)

                   ●●●

सोमवार, 14 जुलाई 2025

क्यारी- क्यारी मुकुलित कलियाँ [ गीतिका ]

 341/2025

     

©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


क्यारी - क्यारी   मुकुलित  कलियाँ।

धन्य   हुईं   आच्छादित    छवियाँ।।


सावन  बरस  रहा  नित   रिमझिम,

काष्ठ  उपकरण में  अति   नमियाँ।


लिए बैल-  हल   चले   कृषक दल,

ध्यानमग्न   आश्रम    में    यतियाँ।


उगे    कुकुरमुत्ते      चौखट     पर,

ऐंठी  फूल -  फूल   कर   खटियाँ।


ताल  लबालब    छल - छल करते,

दूध    मिलाते    जल   में   बनियाँ।


झिलमिल- झिलमिल  जुगनू करते,

करें     सहेली     दो    कनबतियाँ।


वर्षाऋतु       ऋतुओं    की   रानी,

'शुभम् ' खोद  खाते  जन   घुइयाँ।


शुभमस्तु!


14.07.2025●2.30आ०मा०

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बुधवार, 9 जुलाई 2025

जिधर देखता हूँ [गीतिका ]

 332/2025

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप ' शुभम्'


जिधर  देखता  हूँ  घटा  ही घटा  है।

फैली  हुई श्याम शिव  की जटा है।।


गरजते  बरसते  सघन   मेघ  छाए,

धरा पर अनौखी हरी हर  छटा  है।


कोकिल  नहीं  कूकती आम्र डाली,

वियोगी   विरहणी   से  जा सटा है।


भरे हैं  नदी ताल  सड़कें  लबालब,

नगर चार भागों   में   जा  बटा  है।


जठर अग्नि  मंदी  हुई है  उदर  की,

आहार  से ज्यादा  मन ये  हटा  है।


निजी स्वार्थ में लिप्त मानव हुआ ये,

इंसां से   इंसान     इतना   कटा   है।


'शुभम्' जिंदगी चार दिन की कहानी,

सुलझा  नहीं   है   इसी  में   खटा है।


शुभमस्तु !


07.07.2025●6.00आ०मा०

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सोमवार, 30 जून 2025

बहता रहे नेह का दरिया [गीतिका ]

 323/2025


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बहता    रहे     नेह   का    दरिया।

जिसने    दिया   वही   है  नदिया।।


युद्धभूमि       यह   विश्व   बना   है,

सभी   उधेड़ें    सबका     बखिया।


कुछ  तो    नींद   चैन    की    लेते,

लगा   शीश   के    नीचे    तकिया।


कोयल  नहीं    कूकती    तरु  पर,

झूले  नहीं   शून्य     है     बगिया।


माताएँ     निर्मम     अब     देखो,

संतति को  अब मिले  न कनिया।


होरी        इंतजार      में     बैठा,

कब आएगी   उसकी    धनिया।


'शुभम्'  दे  रहा    बदबू    गोबर,

सोनम हैं   कलियुग की झुनिया।


शुभमस्तु !


30.06.2025●12.45 पा०मा०

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मंगलवार, 10 जून 2025

सभी न होते मनुज भले [ गीतिका ]

 254/2025

     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सभी   न   होते     मनुज   भले।

भले -  भले    ही    गए    छले।।


फसलें      उगतीं     खेतों     में,

नहीं     उगाते      हैं      गमले।


पत्नी    बैठी       चिंता     लीन,

पति  लौटे    नहिं    साँझ   ढले।


बुरे   कर्म     का       दुष्परिणाम,

कहे      हवन     में     हाथ जले।


भारत    ऐसा      देश      विमूढ़,

आस्तीन      में      साँप     पले।


देशद्रोह        जो        यहाँ    करे,

नहीं      छोड़ना     शेष       गले।


'शुभम्  खून    का    बदला  खून,

कुचलें  अरि    को    पाँव    तले।


शुभमस्तु !


08.06.2025●10.45प0मा0

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बुधवार, 4 जून 2025

झोंक दिया है भारत रण में [ गीतिका ]

 246/2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


झोंक   दिया   है   भारत    रण   में।

मारेंगे  उस    अरि   को    क्षण  में।।


धर्म     पूछकर    हनता   जन   को,

धर्म   बता हम    मारें      प्रण   में।


क्यों   भूलेंगे      पहलगाम      हम,

चर्चा     यही     रहे   जनगण    में।


अणुबम     की    धमकी   देता   है,

पाक     मिला   देंगे  रज  कण  में।


आँख दिखा   मत   धमकी   मत दे,

दाँव   लगा   दें    तुझको  पण  में।


नहीं   बाप    को   बाप   समझता,

नहीं     बचेगा      बम - वर्षण  में।


'शुभम्'      कटोरा    खाली    तेरा,

झाँक    चेहरा  निज   दर्पण    में।


शुभमस्तु !


02.06.2025●9.00 आ०मा०

                  ●●●

रविवार, 1 जून 2025

नेता खड़े तानकर छाते [ गीतिका ]

 240/2025

   


©शब्दकार

©डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिल   जाते    हैं      आते - जाते।

मनुज सभी   हमको  न   सुहाते।।


नाग - नेवला   सब   ही   मिलते,

अत्याचार   मनुज    पर    ढाते।


पहलगाम  भी    देख   लिया   है,

दनुज    वहाँ     गोली   बरसाते।


बड़े  भाग्यशाली    हैं    वे   जन,

बीते       जीवन     गाते - गाते।


पता   नहीं  है    दशा    देश  की,

धूनी   में    निज   ध्यान   रमाते।


मद  में  चूर  पड़े   हैं   कुछ   तो,

जिन्हें  न   भारतवासी     भाते।


'शुभम्'  रसातल    में   है भारत,

नेता     खड़े    तानकर     छाते।


शुभमस्तु!


26.05.2025●5.00आ०मा०

                  ●●●

5:16 am


न हो परस्पर कटे कटे [गीतिका ]

 234/2025

        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न   हो   परस्पर    कटे -  कटे।

बिना    संगठन     रहो    घटे।।


मेल   एकता     प्रिय    संवाद,

सिखलाते  सत  से    न   हटे।


विमुख  सनातन   से   मत  हो,

उचित  नहीं  है    मनुज    बटे।


करनी  पर     ही    देना  ध्यान,

रहो    सभी     नर   साथ  सटे।


दृढ़      संकल्प    रहे    मन   में,

चमको   जग  में     छटे -  छटे।


कथनी     करनी    एक      रहें,

पल को भी    मन   क्यों  उचटे ।


'शुभम्'   अहं   का    त्याग करें,

रहो    सत्य      पर   सदा   डटे।


शुभमस्तु !


19.05.2025● 5.15आ०मा०

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सोमवार, 28 अप्रैल 2025

मानव तन में हैं जो गाली [गीतिका ]

 219/2025

   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव   तन   में   हैं  जो   गाली।

उन्हें   सोहती     केवल   नाली।।


रंग  हिना का   हुआ  न  हलका,

मिटी   माँग   अधरों की  लाली।


पहलगाम  की     काँपी    वादी,

थर - थर  काँपी   डाली - डाली।


बुझा  दिए  जिनके  कुल दीपक,

बजे न  घर में    शैशव  -  ताली।


तम  से  भरे    हृदय    थे  काले,

दृष्टि   हुई  आँखों    की   काली।


नहीं   खिलेंगे     होली   के   रँग,

नहीं  जलाए    दीप     दिवाली।


'शुभम्'  म्लेच्छ  की रक्त पिपासा,

भरी     उठाती    व्यंजन - थाली।


शुभमस्तु !


28.04.2025●2.00 आ०मा०

शनिवार, 19 अप्रैल 2025

अगर न खिलतीं कलियाँ [गीतिका ]

 204/2025

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अगर  न खिलतीं  कलियाँ   होतीं।

सुंदर  सहज   न   छवियाँ   होतीं।।


पर्वत    सजल    न   ऊँचे     होते,

नहीं      लहरतीं     नदियाँ   होतीं।


सुमन  बाग   क्यारी   में    खिलते,

उड़तीं  नहीं   तितलियाँ     होतीं।


लोग  झाँकते      ग्रीवा     अपनी,

नहीं   एक    भी   कमियाँ   होतीं।


मीन -  मेख    करतीं   आपस   में ,

नहीं  घरों    में     जनियाँ    होतीं।


देखा      होता      कहीं     अजूबा,

मौन  धरे  यदि    सखियाँ   होतीं।


'शुभम्'   देवता    बनता    मानव,

नहीं     विषैली     दंतियाँ   होतीं।


शुभमस्तु !


14.04.2025● 11.45 आ०मा०

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मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

नौ दरवाजे सभी खुले [गीतिका]

 192/2025

         


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 मनुज-  देह    दृढ़    एक   किला।

बड़े  भाग्य     से    तुम्हें      मिला।।


 नौ      दरवाजे       सभी     खुले,

एक      फूल    जो नहीं    खिला।


आए- जाए       श्वास        युगल,

होता     प्रतिक्षण   नहीं      गिला।


 उर    की    धड़कन   है    जीवन,

धड़-धड़  पल-पल   रहा    हिला।


जाग्रत      रसना      रुके      नहीं ,

नहीं   जीभ  का    भार     झिला।


आम    पिलपिला     हुआ   कभी,

वही    शाख  से    सदा      रिला।


'शुभम्'  नहीं     खो   नर    जीवन,

मनुज-योनि      है   एक   *तिला ।


*तिला= स्वर्ण।


शुभमस्तु !


07.04.2025●2.45आ०मा०

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गुरुवार, 27 मार्च 2025

मधुऋतु मनभाई [ गीतिका ]


171/2025

                

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अग-जग में मधु ऋतु मनभाई।

बौरा     गई   हरित   अमराई।।


गेंदा    महक    रहा  क्यारी  में,

पाटल   ने    बगिया  महकाई।


अलि दल  झूम  रहे  डाली पर,

तितली की छवि  परित: छाई।


कुहू-  कुहू  कर  कोकिल कूके,

प्रोषितपतिका  चैन     न  पाई।


मोर   बाग  में   नर्तित  मद   में,

पिड़कुलिया प्रभु महिमा   गाई।


गाँव -गाँव  बजते  डफ   ढोलक,

लिए     मँजीरा     टोली  आई।


होली गीत गा    रहे   मिल- जुल,

गेहूँ       चना      मटर  शुभताई।


शुभमस्तु !


24.03.2025●6.00आ०मा०

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सोमवार, 17 मार्च 2025

सुबह की सुहानी छटा [गीतिका ]

 160/2025

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सुबह  की  सुहानी   छटा  के बहाने।

जलद  जल  लिए हैं घटा के बहाने।।


यहाँ से  वहाँ  तक सघन छाँव फैली,

विटप  वट तना  है जटा  के बहाने।


लजाई  हुई   है   वदन   को  छिपाए,

 गाँव की   गोरी   घुँघटा   के  बहाने।


मिली आँख को  तृप्ति पल एक देखा,

गए  अंबु   पीने    कुअटा  के  बहाने।


'शुभम्'   आज   बाबा बने    घूमते हैं,

बजाते    हुए     चीमटा    के   बहाने।


शुभमस्तु !


17.03.2025●3.00आ०मा०

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अलग-अलग साँचे में ढाले [गीतिका]

 145/2025

   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अलग  - अलग    साँचे  में   ढाले।

जीव  जगत   में     बड़े    निराले।।


 अपने - अपने    ढँग     से   रहते,

रहन - सहन में   सब     मतवाले।


नेता   -  चरित    न     जाने   कोई,

रात  - रात  में      बदले      पाले।


जनता   आम    बनी    चुसती   है,

बने   मूढ़      जन   भोले  - भाले।


सत्य   बोलने     पर     बंधन    है,

पड़े  जुबाँ  पर     उनकी     ताले।


नेताओं      के    महल  -  दुमहले ,

उधर   अँधेरे      इधर      उजाले।


'शुभम्'   त्रस्त   है   जनगण  सारा,

भरे         अँधेरे     काले -  काले।


शुभमस्तु !


10.03.2025●7.30 आ०मा०

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मंगलवार, 4 मार्च 2025

डाल-डाल पर [गीतिका]

 133/2025

               


डाल -डाल  पर खिलतीं  कलियाँ।

लगें  मनोहर     मोहक   छवियाँ।।


मर्यादा     में      रहना       सीखें,

कहतीं    गंगा    यमुना    नदियाँ।


लोग  न    झाँकें     ग्रीवा   अपनी,

खोज  रहे  औरों   में     कमियाँ।


मीन -  मेख   करतीं   आपस  में,

जब मिलतीं  आपस  में जनियाँ।


मिला  दूध  में   सरि   का  पानी,

जिसमें निकलीं  चार   मच्छियाँ।


एक     अजूबा      हमने     देखा,

मौन  धरे  कुछ   बैठीं     सखियाँ।


भर - भर    गाड़ी   आलोचक   हैं,

'शुभम्'  उड़ाते   नित्य   धज्जियाँ।



शुभमस्तु !


03.03.2025●6.15आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...