बुधवार, 14 अगस्त 2019
हलो व्हाट्सएपिआओ! बनाम भैंस के आगे बीन बजाई [ दोहा ]
त्याग [ दोहे ]
रविवार, 11 अगस्त 2019
सावन मास वसंत [ दोहे ]
शनिवार, 3 अगस्त 2019
हिन्द और हिंदी [ दोहे ]
शुक्रवार, 26 जुलाई 2019
प्रेम [दोहा, चौपाई ]
गुरुवार, 25 जुलाई 2019
यौवन [दोहा]
नकचढ़ी नथुनिया [दोहे]
शनिवार, 20 जुलाई 2019
तुलसी इक्कीसी [दोहा]
तुलसी पौधा रोपिये,
पावन दिन गुरुवार।
विष्णु -प्रिया कहते इसे,
कार्तिक'शुभम'विचार।।21।
गुरुवार, 18 जुलाई 2019
आया सावन झूम के [दोहे]
शुक्रवार, 12 जुलाई 2019
मुखिया कैसा चाहिए [दोहा]
रविवार, 7 जुलाई 2019
तूलिका बहुविधा मंच [दोहा]
सोमवार, 1 जुलाई 2019
शब्द-दोहाकन्द
दाँतों में होता नहीं ,
शब्दों में विष - खान।
धरती पर वह जीव ही,
कहलाता इंसान।।1।।
शब्दों से बरसे सुधा,
शब्दों से विषधार।
शब्दों के खिलते सुमन,
महके उर संसार।।2।।
वाणी से खिलती कली,
उर की दिन औ' रात।
वाणी सदा अमोल है,
मानव को सौगात।।3।।
वाणी की वीणा बजी,
झूम उठा संसार।
कलरव कलकल जब सुना,
नाचा हृदय अपार।।4।।
कोयल कौवा एक रङ्ग,
पर वाणी में भेद।
एक घोलता अमृत - रस ,
करता दूजा छेद।।5।।
शब्दों से अपमान के,
भरते कभी न घाव।
बीच धार में डूबती,
अपशब्दों की नाव।।6।।
द्रुपद - सुता के शब्द से,
उठी सुनामी क्रूर।
भीषण उस संग्राम में,
सब कुछ चकनाचूर।।7।।
शब्दों से ही मान है,
शब्दों से अपमान।
शब्दों से घर घर बने,
आन मान औ' शान।।8।।
ईंट और सीमेंट से,
बनते मात्र मकान।
पर घर बनते शब्द से,
जाने सकल जहान।।9।।
शब्द - बाण उर में लगे,
बेधे सकल शरीर।
मरहम शब्दों की हरे,
गहरी -गहरी पीर।।10।।
सृजित सृष्टि सब शब्द से,
शब्द ब्रह्म का रूप।
मानव दानव देवता,
बँधे शब्द के यूप।।11।।
💐 शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
रविवार, 23 जून 2019
योग -दोहानन्द
योग नाम है जोड़ का,
जो जोड़े वह योग।
तन - मन को जो तोड़ता,
कहते उसको रोग।।1।।
तन - मन के उपयोग ही,
कहलाते हैं भोग।
बिना भोग जीवन नहीं,
कहते हैं सब लोग।।2।।
सदा संतुलन श्रेष्ठ है,
मानव - जीवन हेत।
भोग संग हो योग भी,
ज्यों श्यामल सँग सेत।।3।।
एक दिवस तो योगमय,
तिन सौ चोंसठ भोग।
ख़बर छपे अख़बार में,
फिर सब भूले योग।।4।।
फ़ोटो भी खिंचवा लिए,
टी वी पर भी सीन।
योग - दिवस ऐसे मना,
सेल्फ़ी सजी नवीन।।5।।
आपस में यदि प्रेम है,
उर में शुचि सद्भाव।
यह भी शुभकर योग है,
भरें हृदय के घाव।।6।
मन की चंचल वृत्तियाँ,
'शुभम' रोकता योग।
नियम बिना सब व्यर्थ है,
बारहमासी भोग।।7।।
क्लेश अविद्या अस्मिता ,
राग द्वेष कुल पाँच।
अभिनिवेश के संग में,
जलें योग की आँच।।8।।
परमतत्त्व से जोड़ता ,
आत्मतत्व को योग।
देहभोग में लिप्तजन ,
भोगा करते रोग।।9।।
ढोंग दिखावे में नहीं ,
होता 'शुभम' सु-योग।
एक दिवस के खेल से,
बनते बुद्ध न लोग।।10।।
जो मन को रुचिकर लगे,
उसका करना त्याग।
विकट योग यह भी 'शुभम',
जाग सके तो जाग।।11।।
राजनीति जिस घर घुसी,
हुआ वही बरबाद।
वही हाल है योग का,
भोगी ढूढ़े स्वाद।।12।।
राजनीति के घुन बड़े-
घाघ बदल नित रूप।
साँस फुला बाहर करें,
वायु बनी विद्रूप।।13।।
एक दिवस के योग से,
तर जाए इंसान।
रोज़-रोज़ फ़िर क्यों करें,
योगक्रिया कर ध्यान।।14।।
गृहिणी नट नित ही करें,
नियमित सभी किसान।
पशु पंक्षी नित योगरत,
घर जंगल खलिहान।।15।।
💐शुभमस्तु!
✍ रचयिता ©
🧘♂ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
सोमवार, 17 जून 2019
कलि कुचाल [दोहे]
रविवार, 16 जून 2019
पावस का भिनसार [दोहे]
रविवार, 9 जून 2019
कवि-सम्मेलन? [दोहे]
मंगलवार, 4 जून 2019
कुपूत [दोहे]
सोमवार, 27 मई 2019
भला करे करतार [दोहे]
चुनाव की नाव [दोहे]
किनारे पर खड़ा दरख़्त
मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...