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बुधवार, 14 अगस्त 2019

हलो व्हाट्सएपिआओ! बनाम भैंस के आगे बीन बजाई [ दोहा ]

गूँगे    ही    बहुसंख्य   जन,
पढ़कर     रहते        मौन।
इनके  मुँह    लड्डू    रखा ,
हम     इनके   हैं  कौन??2।

लिखना   भी    आता  नहीं ,
हैं      एम.ए.          उत्तीर्ण।
उर  में  तुच्छ     विचार   हैं,
भाव     भरे     संकीर्ण।।2।

क्यों   उँगली   को   कष्ट  दें,
चढ़ें         प्रशंसा      फूल ?
व्हाट्सएप   संन्देश      पढ़,
जाओ    उसको     भूल ।।3।

सब    कोरी     बकवास  है ,
दृढ़  कर      लो     विश्वास।
व्हाट्सएप    तो    है  मगर,
पर    आती   है  बास।।4।।

गूँगे     ने   गुड़  खा   लिया ,
मुँह   में      नहीं     ज़बान।
फिर   बोलो    कैसे     कहें,
है     संन्देश      महान!!5।

अहंकार     इतना     बढ़ा,
हुए   फूलकर         बॉल।
मज़ा    लूटने   को मिला,
मोबाइल    का  हॉल।।6।

मुँह  पर  चिपका   टेप है,
पट्टी       पूरे          हाथ।
घायल अँगुली   हैं   सभी,
कलम न  देती  साथ।।7।

नाच -  कूद   सब  देखते,
फिल्में     सब      रंगीन।
लिखने    में   नानी  मरे,
व्हाट्सएपिया    दीन।।8।

मोबाइल     का   शौक है,
नाकों       चढ़ा    नकार।
मालिक  अपने   एप   के,
लड़ने     को   तैयार।।9।

उचित   यही  है  लो विदा,
मुँह    रखना    यदि    बंद।
गूँगे   लूले    व्यर्थ      सब ,
भावे   जिन्हें  न छन्द।।10।

निष्कासन     करना    पड़े,
जिन्हें     न    आवे     चेत।
कलम  गहो  मुँह खोल लो,
सदा 'शुभम ' निज हेत।।11।

💐शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🚦  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

त्याग [ दोहे ]

संग्रह  में    हर  नर   लगा,
करे    त्याग    की    बात।
जैसे   भी    मुझको   मिले,
सदा    लीन   अपघात।।1।

त्याग   तपस्या  है  'शुभम,
सदा     ग़बन     में   लीन।
रिश्वत  से   नर   घर   भरे,
लगी    टकटकी  मीन।।2।

दस    पैसे  का   त्यागकर,
कहता       दिया    हज़ार।
गली -  गली   गाता  फिरे,
ख़बर  छपी  अख़बार।।3।।

करते    हैं    जो त्याग जन,
कहते    एक    न       बार।
टी. वी.  पर   आते    नहीं,
छपें    नहीं   अख़बार।।4।।

कविता लिखकर  त्याग पर,
त्याग     नहीं     है      मित्र।
बहुत  बड़ा   दिल    चाहिए,
छपें  न    जिनके   चित्र।।5।

त्याग - त्याग   सब  ही कहें,
त्याग   न       जानें     एक।
नगर       ढिंढोरा      पीटते,
जिनमें    नहीं    विवेक।।6।

गाल    बजाते    त्याग   के ,
नहीं    त्याग  का      ज्ञान।
शब्दों   में    क्या  त्याग  है ,
कर  लो मन में   ध्यान।।7।।

रक्षा     करने    वचन   की,
त्याग     किया    प्रभु राम।
प्रिय  राधा  का  त्याग कर,
गए     मधुपुरी   श्याम।।8।

मर्यादा  -    रक्षक        बने ,
किया     सिया   का त्याग।
रघुकुल     वंशी    राम  का ,
यह   कैसा   अनुराग ??9।

गोकुल   तज  मथुरा  तजी,
गए         द्वारका      धाम।
पीछे   मुड़      देखा   नहीं,
त्यागवीर   घनश्याम।।10।

गांधी    और   सुभाष  का ,
त्याग         रहेगा     याद।
अमर    शहीदों    ने किया,
सदियों  तक  आबाद।।11।

सीमा      पर    जो   जूझते,
उनका      त्याग      महान।
पत्नी     बच्चे      त्यागकर ,
होम   रहे     हैं    प्रान।।12।

मुनिजन  त्यागी   जैन सब,
असन    वसन  का  त्याग।
कठिन  तपस्या    है   यही,
त्यागा सुख  - संभाग।।13।

त्याग    सुखों  की  वासना,
कृषि  में  लगा     किसान।
अन्नदान    जग   को   करे,
ये  भी सत  बलिदान।।14।

त्यागी   जीवन    जो   तपे,
गाता      कभी    न   गीत।
त्याग    तपस्या    एक  ही,
जन-जन का वह मीत।।15।

💐 शुभमस्तु! 
✍रचयिता ©
 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

रविवार, 11 अगस्त 2019

सावन मास वसंत [ दोहे ]

एक     तीर      ऐसे  चला ,
दो -   दो    लगे    निशान।
पूरी    आज़ादी       मिली,
आन  मान औ'   शान।।1।

एक    तीर    में  पाक का ,
छूट    गया    सब     धीर।
नापाकी     करतूत     की,
मिटी जलन उर  पीर।।2।

एक    देश   में   एक    ही,
चलता     नियम   विधान।
ध्वज  प्रधान  सब एक ही,
जन-जन  एक समान।।3।

दो    हज़ार    उन्नीस   का,
सावन     मास      महान।
नागपंचमी     को    मिला ,
सबको   एक  वितान।।4।

नेत्र    तीसरा    खुल  गया ,
काली       धारा      अन्त।
केशर    क्यारी   में  खिला ,
सावन    मास    वसंत।।5।

जिन्हें    न  भावे   देशहित,
आस्तीन      के       साँप।
जूता     मारें    जनक   में,
कहें  और   को   बाप।।6।

घुट -  घुटकर    जीता रहा ,
धरा  -     स्वर्ग     कश्मीर।
तीन सौ सत्तर  जब  मिटी,
सरकी   स्वच्छ  समीर।।7।

रक्षक -  सैनिक   पर  करें ,
पत्थर      फेंक      प्रहार।
एक  वार    में    हो  गया ,
सबका       उपसंहार।।8।

पानी     का    पानी  हुआ ,
हुआ     दूध    का     दूध।
पाक    टापता   रह   गया,
मिला   मूल   मय  सूद।।9।

गलित   सियासत    के हुए ,
सारे         परदे       फाश।
जाहिर      नंगापन    हुआ ,
'शुभम' विकट उपहास।10।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

शनिवार, 3 अगस्त 2019

हिन्द और हिंदी [ दोहे ]

 हिन्द    जहाँ   हिंदी   वहीं,
आन    मान    औ'   शान।
हिंदी     से   ही   हम  यहाँ,
अपनी    यह    पहचान।।1।

जन्मभूमि    जननी   सदृश,
हिंदी       अपनी       मात।
वत्सलता   का     दुग्ध  पी,
उदय 'शुभम' की  प्रात।2।।

जन्म  लिया   है   हिन्द  में,
धरती              हिंदुस्तान।
माँ   ने   दी     हिंदी    हमें,
सर्व   ज्ञान  की खान।।3।

एक  सूत्र    में      बाँधती,
हिंदी         सारा       देश।
बोली   जाती     देश  भर,
चाहे     कितने    वेश।।4।

माथे     की    बिंदी  सदृश,
शोभित     करती     मान।
हिंदी     गौरव.     देश का,
कहता  हिन्द    जहांन।।5।

हिंदी     में   संस्कृति   रहे,
हिंदी        में      संस्कार।
हिन्ददेश     की    नाक है,
बहुत - बहुत   आभार ।।6।

अपनी   माँ  को   छोड़कर,
कहे      अन्य   को    मात।
आन - मान    उसको  नहीं,
कहता   उसे     कुजात। ।7।

आशा  जनगण    की  यहाँ,
हिंदी           का      संदेश।
नेह   प्रेम    नित     बाँटती,
'शुभम '  हिन्द  के  देश।।8।

जन से  जन   को जोड़कर,
एक       सूत्र    में     बाँध।
हिंदी   से    सौहार्द्र    नित,
'शुभम'  साधना  साध।।9।

गौरव      हमको    चाहिए,
करें        सदा      सम्मान।
अपनी     हिंदी   हिन्द  से,
अधरों  पर  मुस्कान।।10।

💐 शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

प्रेम [दोहा, चौपाई ]

प्रेम   सहित   वंदन  करूँ,
प्रेम -  देव    का     आज।
जीव -जगत  में   प्रेम  ही,
जीवन    का     सरताज।।

हम   तुम    बनते  प्रेम  से,
होता       सृष्टि  -  विधान।
ज्यों  पय में घृत  बस रहा,
उर    में   प्रभु  -  संधान।।

वेद ऋचा  सम पावनताई।
प्रेमगीत  बन ऋषिवर गाई।।

परस पुष्पवत महक सुहाई।
चुभन शूल की प्रेम समाई।।

आग  जले विरहिन के उर में।
 स्वांत बूँद सा उर-अम्बर में।।

आपस   का   विश्वास प्रेम है।
जिसका अपना सहज नेम है।

गंगा   की  पावन  जलधारा।
प्रेम सरित का युगल किनारा।

प्रेम विरहगत   रिमझिम सावन।
विरहिन के आँसू -सा पावन।

धूप रूप की खिल  पाती है।
बूँद प्रेम जब मिल जाती है।।

यहाँ   वहाँ  हर  ओर  प्रेम है।
जहाँ  प्रेम सब कुशलक्षेम है।।

गीतों    के    हर    बंध    में,
पावन        प्रेम      प्रकाश।
जहाँ     अँधेरा    जगत   में ,
वांछित      प्रेम  -  उजास।।

बिना    प्रेम    रूठे    तिया,
उसे  पिया     की      आश।
बिना  प्रेम       कुल   टूटते,
दिखे     नाश   ही   नाश।।

ईश्वर   से     सदभक्ति का,
नाम     प्रेम      सद्भभाव।
नाम  जपें      वंदन    करें,
सिमटें    सकल   अभाव।।

फूल  प्रेम  के   जब  खिलें,
नए    सृजन   का      हेत।
जब  पराग  के   राग  कण,
मिलें  फले    हर     खेत।।

दादुर करते निशिभर टर- टर।
प्रेमाधीन  बुलाते       दादुर।।

प्रेमऋतु     पावस    पुरवाई।
विरहिन के उर  आस जगाई।

खग पशु   प्रेम  बँधे नरनारी।
बिना    प्रेमजल  सूखे बारी।।

सरिता कलकल निशिदिन बहती।
सिंधु पिया से मिलकर रहती।

यद्यपि   है  सागर जल खारी।
प्रेम -विवश  सरिता  बेचारी।।

दीप ज्वाल पर बलि परवाना।
प्रेम तत्त्व बस  उसने  जाना।।

अम्बर को धरती अतिप्यारी।
बादल बरसा   गई  खुमारी।।

फ़ूल फ़ूल  को  चूम रहा है।
प्रेम विवश ही झूम रहा है।

वे  सब    सन्यासी      हुए,
त्याग  लोक   के       प्रेम।
ईश्वर से   जब   लौ   लगी,
बदले      केवल      नेम।।

प्रेम  बिना  सब  शून्य है,
प्रेम   रहित   सब   पाप।
'शुभम'प्रेमरत   जो   रहे,
मिलते    उसको  आप।।

💐 शुभमस्तु! 
✍रचयिता ©
📕 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

गुरुवार, 25 जुलाई 2019

यौवन [दोहा]

यौवन  पुष्प  -  पराग  है,
रूप    रंग     रस    राग।
फ़ूल   खिलाता   नेह  के,
अपना - अपना  भाग।।1।

उफ़न - उफ़न सरिता बहे,
यौवन   की   दिन -  रात।
ज्यों  पावस की सरि चढ़े,
जब  आए    बरसात।।2।

तोड़    कगारें   बह  चली,
यौवन   -  सरि     बेहाल।
खेत   बाग़   वन    डूबते,
हरी फ़सल का काल।।3।

यौवन  खिलता  फ़ूल है,
झड़ना   भी   अनिवार्य।
रूप   रंग   मरते   सभी,
फ़ल ही  अच्छा  कार्य।।4।

मत    गुमान  में   भूलना,
यौवन     पीला       पात।
इक दिन झर गिर जायगा,
दिखे   अँधेरी     रात।।5।

शक्ति मिली तब बुद्धि कम,
जीवन       का    सिद्धांत।
यौवन     चुकता     वृद्धता,
करती   जीवन  -  अंत।।6।

अनुभव   पाया  ज्ञान का,
नहीं     इन्द्रियाँ      साथ।
गत   यौवन  वार्धक्य  में,
 निर्बल   दोनों  हाथ।।7।

बालापन    में      खेलता,
यौवन      में     रस - रंग।
चार   दिनों   की   चाँदनी,
देख   रह  गया   दंग।।8।

कलियाँ  फूटीं अंग - अँग,
महके       फ़ूल    हज़ार।
बौराया    यौवन     मधुर,
छाने     लगी   बहार।।9।

यौवन  में  साजन  बिना ,
नहीं    महकते      फ़ूल।
बाढ़  नदी   की  तोड़ती,
सुदृढ़  कगारें  कूल।।10।

अंगों      में    अँगड़ाइयाँ,
मन    में    उठे     हिलोर।
सावन  में   कामिनि कहे,
मत  तड़पाओ   और।।11।

आनन  से   आहें  निकल ,
करें    पिया     की  चाह।
यौवन -  घाटी  में   उतर,
नाप नेह - रस  थाह।।12।

क्षण - क्षण यौवन बीतता,
रीता     तन - घट    मोर।
चातक  चाहे  स्वांत-जल,
पिय  की उठे हिलोर।।13।

यौवन  पर    पहरा  नहीं ,
बिना नयन  बिन   कान।
उसे   प्रेमरस      चाहिए,
नहीं  वेद का ज्ञान।।14।

प्यासी    धरती    माँगती,
झमझम     बरसे     मेह।
यौवन अँखुआये 'शुभम',
मिले  देह  को  नेह।।15।

💐 शुभमस्तु !
✍ रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप' शुभम'

नकचढ़ी नथुनिया [दोहे]

तिय   ललाट  बिंदी लसे,
 नथनी    सजती   नाक।
आभा  बढ़ती   सौ  गुनी,
कहत 'शुभम'सकुचात।।1।

 नथनी   तेरी   नाक  पर,
फैलाती      नव    जोत।
दृष्टि पड़े जब सजन की,
खुलें प्रणय -रस स्रोत।।2।

वाम   नासिका   छिद्र पर,
नथनी     करे      धमाल।
मेरे   हिय      लहरें    उठें,
पल   में   देती    साल।।3।

साजन    तेरे    नेह    की,
नासा -   नथ      पहचान।
तू     मेरा      सौभाग्य   है,
आन  मान औ'  शान।।4।

नासा - नथ  बड़भागिनी,
चूमे      अधर     कपोल।
चुप - चुप  रस  लेती रहे,
अरुण  लाज में घोल।।5।

अधरामृत    के  पान  को,
बढ़े   युगल     नम   होठ।
राह   रोक    आगे   खड़ी,
ढीठ  नथुनिया    ओट।।6।।

नासा - नथ  की   लाज है,
नाथ   पिया    के     हाथ।
आजीवन तिय   संग   रह,
'शुभम' निभाए  साथ।।7।।

नथ  नारी -   सौभाग्य   है,
सुंदर     'शुभम'    प्रतीक।
अंतर्मुखता     वृद्धि    कर,
घटे अहम  तिय  लीक।।8।

नस  गर्भाशय - नाक  की,
आपस     में        संयुक्त।
नथ  दोनों  को    जोड़ती,
प्रसव   वेदना -  मुक्त।।9।

नारी      पावनता     बढ़े,
प्रबल  तेज    में     वृद्धि ।
नथ  से निर्मित हो वलय,
चेतनता  की सिद्धि।।10।

चंद्रा    नाड़ी       कार्यरत-
हो  जब    लो नथ   धारि।
नासा  परित:    वायु   को,
करती शुद्ध सुधारि।।11।


शक्ति -  तरंगें    ईश   की,
ग्रहण   करे    तिय - देह।
सहज  चेतना -शक्ति को,
नासा - नथ  का नेह।।12।

नारि -   सुरक्षा  नित  करे,
नासा  -  नथ     दिनरात।
काली - शक्ति प्रभाव का,
करे  न्यून हर  घात।।13।

गोल  नथनिया   नकचढ़ी,
क्यों     इतनी      इतराय।
निशि पायल रुनझुन बजे,
अधरनु  ही  शरमाय।।14।

माँ  गौरी    के मान   हित,
पहने     नथनी       नारि।
गृहपति   की   रक्षा   करे,
पहनें 'शुभम' सँभारि।।15।

💐 शुभमस्तु!
✍  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

शनिवार, 20 जुलाई 2019

तुलसी इक्कीसी [दोहा]

तुलसी    बिरवा   रोपिये,
जो   चाहो  सुख - शांति।
औषधीय  गुण खान यह,
तनिक   नहीं  है भ्रांति।।1।

सर्दी     और   ज़ुकाम  में,
खाँसी     में       उपयोग।
श्वास  - रोग  तुलसी   हरे,
करे      देह      नीरोग।।2।

पूजनीय     तुलसी   सदा,
बिरवा       रोपो       गेह।
वायु  शुद्ध   घर   की करे,
बढ़े      परस्पर     नेह।।3।

तुलसी  माला  कर   गहो,
फेरो         सुबहो - शाम।
ग्रीवा   में    धारण  करो,
शांति मिले उर  धाम।।4।

श्वसन-क्रिया को खोलता,
वाणी      का     अवरोध।
अंत  समय  रस    डालते-
तुलसी  नहीं   विरोध।।5।।

वात   रोग   मूर्छा   वमन ,
कफ   की   औषधि मित्र।
वन तुलसी  हरती  जलन,
औषधि एक  विचित्र।।6।

पथरी में अति  लाभकर,
मूत्र    निस्सारक   होय।
सुख से प्रसव करा सके-
तुलसी सुख से सोय।।7।

यूगेनल   थयमोल   सम,
उड़नशील    बहु    तेल।
वन तुलसी   के घटक हैं,
देते     शांति   सुमेल।।8।


श्यामा  तुलसी  ज्वर हरे,
करे   दूर    पित     रोग।
रक्तदोष  कफ़  कोढ़ भी,
नहीं  करें  तन -भोग।।9।

मलेरिया   क्षयरोग    के,
मरते    सब      कीटाणु।
तुलसी की  सद्गन्ध  ही,
हरती  हर रोगाणु।।10।

हिचकी पसली -दाह में,
तुलसी    का   उपयोग।
नेत्रज्योति   में  वृद्धि  दे,
हरे  पित्त के रोग।।11।

  काया    में   थिरता  भरे,
'कायस्था'  है      नाम।
  तुलसी   तीव्र  प्रभावमय,
' तीव्रा' नाम सुनाम।12।

देवगुणों      का    वास  है,
'देव दुंदुभी'         नाम।
दैत्य   -    रोग     संहारती,
'दैत्यघि' 'शुभम' सुनाम।13।

मन     वाणी  औ'  कर्म से,
करती      सदा       पवित्र।
नाम  'पावनी' है शुभम,
'सरला ' भी यह मित्र।।14

 नारी     के    यौनांग   को ,
करती         निर्मल     पुष्ट।
'सुभगा' तुलसी  नाम है,
   है घर - घर  की इष्ट।।15।

निज    लालारस   से   करे,
सारी      ग्रंथि         सचेत।
'सुरसा' कहलाती शुभम,
तुलसी   मानव  हेत।।16।

देह     गेह    पल्लव    करें ,
पावन      जहाँ      निवास।
'पूतपत्री' भी    नाम   है,
तुलसी 'शुभम ' सुवास।।17।

तुलसी  सेवन   जब   करें,
दूध  न       लेना      पान।
चर्म  - रोग    गर्मी     बढ़े,
बात 'शुभम ' की मान।।18।

तुलसी-दल शिवलिंग पर,
नहीं       चढ़ाना     मीत।
ग्रंथों    में   ऐसा    लिखा ,
यही   पुरानी   रीत।।19।

तुलसी  शोभा    गेह  की,
पावन      करती      देह।
सद सुगंध   व्यापित करे,
बढ़े  शांति  उर  गेह।।20।

तुलसी      पौधा    रोपिये,
पावन     दिन      गुरुवार।
विष्णु  -प्रिया   कहते  इसे,
कार्तिक'शुभम'विचार।।21।

💐शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🌱 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

आया सावन झूम के [दोहे]

झर - झर  झरते  मेघ दल,
झूमे        नीम      रसाल।
बरगद  से    पाकड़   कहे,
अब  तो   है खुशहाल।।1।

पवन चले सर -सर  सुखद,
मिटा     देह     का    ताप।
झर - झर बुँदियाँ झर रहीं,
रहा  न  दुःख - संताप।।2।

आया   सावन    झूम  के,
घटा      उठी      घनघोर।
बाग़ - बाग़  मन  हो गया,
मोर    मचाए    शोर।।3।

कोयल   कूके    बाग़  में,
पपीहा     पीता   स्वांत।
मोर    नाचता    झूमकर,
करे    मोरनी    बात।।4।

पी  की  याद  सता  रही,
सुन   कोयल   के  बोल।
डाली  पर   कू - कू  करे,
उर  में   दे विष  घोल।।5।

झींगुर    की  झनकार  है,
घनी        अँधेरी    रात।
जुगनू  से     जुगनी  करे,
ज्योति साथ ले  बात।।6।

प्यासी   धरती    तृप्त  है,
भरे     खेत  सरि - ताल।
हरे -  हरे    अँखुए    उगे,
नदी    रहित शैवाल ।।7।

कच्ची     दीवारें     सजीं,
मख़मल     हरी  अबाध।
सीले  काठ   उगे  सघन,
कठफूले      निर्बाध।।8।

कुकुरमुत्ते    धूसर   उठे,
घूरे    का    उर    फोड़।
गगनधूर  मकिया  वहाँ,
लेती    उनसे    होड़।।9।

उफनाती   सरिता चली,
यौवन     में    मद चाल।
सागर  से  होगा  मिलन,
रही न वसन सँभाल।।10।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

मुखिया कैसा चाहिए [दोहा]

नव     दरवाजे    देह  के,
खान   -  पान   को  एक।
सब   द्वारों    से  खा  रहे,
मुखिया रहित विवेक।।1।।

'मुखिया मुख सौ चाहिए,'
नौ    से   चले   न काम।
बाबा  तुलसी   कह  गए,
सौ  मुख से आराम।।2।।

ग्रहण   विसर्जन  के लिए,
अलग - अलग  नव  द्वार।
एक ग्रहण आनन  सकल,
शेष    अष्ट   आकार।।3।।

देश      हमारी    देह   है,
मुखिया     है    आज़ाद।
सौ  मुख  से   आहार ले,
गंगाजल   में  गाद।।4।।

आँख कान मुख नासिका,
तजकर     अपने    काम।
और   कर्म   में रत  सभी,
होगी    देह    तमाम।।5।।

सहस   करों  से  ले  रहा,
सूरज  निज   कर  रोज़।
धरा  नहीं   यह  जानती,
होता जल का भोज।।6।।

मुखिया    होना   चाहिए,
जैसे    नभ    में     भान।
दूर  खड़ा   कर   ले  रहा ,
नहीं  धरा  को ज्ञान।।7।।

नहिं    रोई   धरती  कभी,
रोया     नहिं     आकाश।
सूरज    से   जीते   सभी,
चमके  धवल प्रकाश।।8।।

जग  का  मुखिया  सूर्य है,
एक        सौर -  परिवार।
नवग्रह वसुधा नखत सब,
सदा  सौख्य  - संचार।।9।।

सीखें      मुखिया   सूर्य से,
शोषित     करें    न    देश।
पोषण  उनका   लक्ष्य  हो,
सरल 'शुभम' संदेश।।10।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
🍀 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

रविवार, 7 जुलाई 2019

तूलिका बहुविधा मंच [दोहा]

ग़ज़ल गीतिका मुक्तिका,
का   दिन  है  रविवार।
नई - नई       रचना    करें,
मन  में   सोच -विचार।।1।।

दोहा   मुक्तक   माहिया,
ताका    हाइकु    छन्द।
सोमवार को   ही  कहें,
 सब सज्जन स्वच्छन्द।।2।।

बालकाव्य का शुभदिवस,
होता            मंगलवार।
अन्य    विधा   पर  लेखनी -
के   कर   बंद   किवार।।3।।

कवित घनक्षरि के लिए,
निर्धारित         बुधवार।
कुण्डलिया मनमोहिनी,
सुघर सवैया  सार।।4।।

वृहस्पति गुरु का दिवस है
गाओ    सस्वर       गीत।
लोकगीत    नवगीत   में,
रम   जाओ   मनमीत।।5।।

शुक्रवार को  कर   दिया,
कवि   को   तनिक स्वतंत्र।
छंदमुक्त अतुकांत   की,
कविता    शाबर -मंत्र।।6।।

व्यंग्य लघुकथा लोक की
बहुविध      कथा     अपार।
बालकहानी     संस्मरण,  
का है  दिन शनिवार।।7।।

कवि   कवयित्री  पटल  के,
कृपया   दें    यह     ध्यान।
मंच  तूलिका  बहुविधा-
का   न   घटाएँ   मान।।8।।

सीख  रहे  कविजन  सभी,
नितप्रति         रचनाकार।
मंच   चढ़ें  तब   त्याग   दें,
उर   के  अहं  विकार।।9।।

शाला   है    यह   कार्य की,
साप्ताहिक     हित     मंच।
विज्ञ   समीक्षक   नित्य  दें,
'शुभम' समीक्षा-पंच।।10

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
🏵 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

सोमवार, 1 जुलाई 2019

शब्द-दोहाकन्द

दाँतों   में     होता   नहीं ,
शब्दों   में  विष  - खान।
धरती  पर   वह  जीव ही,
कहलाता      इंसान।।1।।

शब्दों   से    बरसे    सुधा,
शब्दों      से      विषधार।
शब्दों  के  खिलते  सुमन,
महके   उर   संसार।।2।।

वाणी से  खिलती  कली,
उर  की  दिन  औ'   रात।
वाणी  सदा   अमोल  है,
मानव को सौगात।।3।।

वाणी     की   वीणा  बजी,
झूम         उठा      संसार।
कलरव कलकल जब सुना,
नाचा  हृदय  अपार।।4।।

कोयल   कौवा   एक रङ्ग,
पर    वाणी      में    भेद।
एक घोलता अमृत - रस ,
करता   दूजा   छेद।।5।।

शब्दों   से   अपमान   के,
भरते   कभी    न    घाव।
बीच   धार   में     डूबती,
अपशब्दों  की नाव।।6।।

द्रुपद - सुता   के  शब्द से,
उठी         सुनामी     क्रूर।
भीषण   उस   संग्राम   में,
सब  कुछ चकनाचूर।।7।।

शब्दों   से    ही    मान  है,
शब्दों      से      अपमान।
शब्दों  से घर    घर    बने,
आन  मान औ' शान।।8।।

ईंट      और    सीमेंट   से,
बनते    मात्र       मकान।
पर  घर    बनते   शब्द से,
जाने  सकल  जहान।।9।।

शब्द - बाण   उर में  लगे,
बेधे       सकल     शरीर।
मरहम  शब्दों    की  हरे,
गहरी -गहरी  पीर।।10।।

सृजित  सृष्टि  सब शब्द से,
शब्द    ब्रह्म     का   रूप।
मानव     दानव      देवता,
बँधे  शब्द  के यूप।।11।।

💐 शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

रविवार, 23 जून 2019

योग -दोहानन्द

योग   नाम  है  जोड़ का,
जो   जोड़े    वह   योग।
तन - मन को जो तोड़ता,
कहते उसको  रोग।।1।।

तन - मन के उपयोग ही,
कहलाते      हैं     भोग।
बिना  भोग  जीवन नहीं,
कहते  हैं  सब लोग।।2।।

सदा    संतुलन   श्रेष्ठ   है,
मानव - जीवन        हेत।
भोग  संग   हो  योग  भी,
ज्यों श्यामल सँग सेत।।3।।

एक  दिवस   तो   योगमय,
तिन   सौ    चोंसठ   भोग।
ख़बर   छपे    अख़बार  में,
फिर सब  भूले  योग।।4।।

फ़ोटो  भी  खिंचवा   लिए,
टी वी    पर    भी    सीन।
योग  - दिवस   ऐसे  मना,
सेल्फ़ी  सजी  नवीन।।5।।

आपस  में   यदि   प्रेम  है,
उर   में   शुचि     सद्भाव।
यह भी  शुभकर   योग है,
भरें  हृदय  के  घाव।।6।

मन की   चंचल   वृत्तियाँ,
'शुभम'     रोकता    योग।
नियम  बिना सब व्यर्थ है,
बारहमासी      भोग।।7।।

क्लेश   अविद्या  अस्मिता ,
राग   द्वेष     कुल    पाँच।
अभिनिवेश   के   संग  में,
जलें  योग की आँच।।8।।

परमतत्त्व    से     जोड़ता ,
आत्मतत्व    को      योग।
देहभोग     में    लिप्तजन ,
भोगा     करते     रोग।।9।।

ढोंग    दिखावे    में   नहीं ,
होता   'शुभम'     सु-योग।
एक  दिवस   के  खेल  से,
बनते   बुद्ध  न लोग।।10।।

जो  मन   को  रुचिकर लगे,
उसका       करना    त्याग।
विकट योग  यह भी 'शुभम',
जाग  सके तो जाग।।11।।

राजनीति जिस घर घुसी,
हुआ     वही    बरबाद।
वही  हाल   है योग  का,
भोगी ढूढ़े  स्वाद।।12।।

राजनीति   के  घुन  बड़े-
घाघ    बदल  नित  रूप।
साँस  फुला  बाहर  करें,
वायु  बनी  विद्रूप।।13।।

एक  दिवस   के योग से,
तर       जाए      इंसान।
रोज़-रोज़ फ़िर क्यों करें,
योगक्रिया कर ध्यान।।14।।

गृहिणी  नट नित  ही करें,
नियमित   सभी  किसान।
पशु  पंक्षी   नित  योगरत,
घर जंगल खलिहान।।15।।

💐शुभमस्तु!
✍ रचयिता ©
🧘‍♂ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

सोमवार, 17 जून 2019

कलि कुचाल [दोहे]

 स्वार्थ  लिप्त  संसार सब,
पैसा         माई      बाप।
झूठों  का   बहुमत  यहाँ,
पुण्य  न  कोई   पाप।।1।

मर्यादा    निज   भूलकर,
करते    जन     अपमान।
धन  देकर   मिलता यहाँ,
मानव  को   सम्मान।।2।

धमकी  धक्का  धौंस का,
अनुचित  डाल     दबाव।
गुंडों   के     चढ़ने    लगे,
आसमान पर  भाव।।3।

आशा    करना   व्यर्थ है,
मिल    जाएगा     न्याय।
मौसेरे      भाई      सभी,
चोर    करें   अन्याय।।4।

नारी  का   आँसू    गिरा ,
बहे    राज    औ'   पाट।
नदियाँ   लोहू   की  बहीं,
नष्ट   हो  गए   ठाट।।5।

कौरव-दल के साथ कुछ,
कुछ पांडव-दल      संग।
नारी - कृत  अपमान  से,
हुआ   रंग   में   भंग।।6।

बिना   कर्म  के  ही मिले,
रोटी       दोनों       जून।
निकले  स्वेद  न  देह  से,
उनके   आँगन   सून।।7।

भूसा  भरा    दिमाग़   में,
तन   मन   हुए     अपंग।
जौंक  बना शोषण   करे,
माली    हालत   तंग।।8।

ग़ुब्बारे     में     पंप     से,
दूषित      भरी     बयार।
विस्फोटक नर को   बना,
मज़ा  कर   रहे   यार।।9।

न्याय   गया   न्यायी  गए,
आपाधापी            रोज़।
बिना करे   रबड़ी   मिले,
मिले मुफ़्त में मौज।।10।

पोदीने    के     पेड़   पर,
चढ़ा    दिया     मतिमंद।
रार  ठानता   जनक   से,
फैला  कुल  दुर्गंध।।11।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
☘ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

रविवार, 16 जून 2019

पावस का भिनसार [दोहे]

मौसम   में   छाने  लगी,
शोभन   सजल   बहार।
प्यासी  धरती को मिली,
नन्हीं    बूँद   फुहार।।1।

नभ में  छाए  विरल घन,
झाँकें     जिनमें     धूप।
कभी हवा  शीतल   बहे,
कभी तपन का रूप।।2।

जेठ   मास  के   ताप से,
तपते      धरती     धाम।
शांति  मिले तरुवर तले,
व्यजन  हुए  बेकाम।।3।

डाली   पर   चूँ - चूँ करें,
गौरैया     दो      क्लांत।
दाना - पानी  जब मिले,
मन  में उपजे  शांत।।4।

तरबूजा     बरसा    रहा ,
लाल   प्रेम    रस - धार।
ग्रीष्म काल  ने  दे  दिया,
मानव  को उपहार।।5।

मस्त  महक खरबूज की,
खींच   रही    है   ध्यान।
बैठ   मेंड़   पर   खाइए,
तब करना जी स्नान।।6।

गंगा   की   धारा  विरल,
सुंदर       शांत    प्रवाह।
रजत बालुका मौन धर,
उर बिच उर्मि उछाह।।7।

यौवन    मदमाती    चढ़ी,
लता      अमृता     नीम।
औषधि   का   भंडार   है,
अगणित गुण निस्सीम।।8।

गुडूची   छिन्नरुहा   कहो,
या   गिलोय   दो    नाम।
अर्श   दाह   मधुमेह   में,
एक  लता बहु काम।।9।

छाया    छाया     चाहती,
तरु तल   छिपी  सभीत।
पादप   लू    में    काँपते,
छाया  घन मनमीत।।10।

तप  से  तप कर   मेदिनी,
निखरी    कंचन  -  रूप।
झर -झर-झर बुँदियाँ झरें,
लुप्त हो गई धूप।।11।

पावस   के  भिनसार में,
सेंध       लगाती     धूप।
डाँटें   बादल   गरजकर,
भरते  सरिता कूप।।12।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

रविवार, 9 जून 2019

कवि-सम्मेलन? [दोहे]

कवियों का संगम हुआ,
मानो   कुम्भ     प्रयाग।
बहती  धारा काव्य की,
खुले  हमारे   भाग।।1।

कहीं     प्रेम  रस धार है,
वीरोचित         रसनाद।
कोई    दर्शन     में  बहा,
भिन्न -भिन्न रस स्वाद।।2।

बजी   ख़ूब   ही तालियाँ,
फ़ूल   खिले    हर   होठ।
कोई    बातों   में   मगन ,
लगा  चार जन गोठ।।3।

ताली     सबको   चाहिए ,
अपनी      ताली      मौन।
जो निज कविता पढ़ रहा,
नहीं    जानते   कौन!!4।

वाह   वाह    भी   हो रही ,
करतल   ध्वनि  भी  ख़ूब।
पर   संबंधों   के  खेत  में,
नहीं   जम   रही  दूब।।5।

अपनी   कविता   हो चुकी,
जाना     है      घर      दूर।
बैग    उठा   चलते    बनो,
यह    कैसा     दस्तूर।।6।

ख़ूब     बटोरी    तालियाँ,
बाँधी      गठरी      मोट ।
ज्यों   नेताजी   चल दिए,
ले   जनता   के वोट।।7।

गाकर    अपने   गीत  वे,
चढ़कर   ग़ज़ल -विमान।
शेष  बचे  दस - पाँच ही,
पढ़कर  किया पयान।।8।

कवि   नेता  में  भेद क्या ,
'शुभम'   न   पाया  जान।
अपनी ढपली   को  बजा,
किया शीघ्र प्रस्थान।।9।

मुख्य -अतिथि अध्यक्ष जी,
सुनना   अब   कवि -गान।
अपनी  पढ़   हम   ये चले,
बाहर  खड़ा विमान।।10।

'इनके '  ही    घरबार    हैं,
'वे'      सब       बेघरबार।
इसीलिए कहता  'शुभम',
स्वार्थ  भरा  संसार।।11।

पीछे     मुड़कर   दृष्टि  की,
चेहरा     हुआ      मलीन।
अर्द्ध  शतक में  पाँच-दस,
कविजन थे  आसीन।।12।

कहते   हैं  'विद- वान'  हैं,
कविजन   सुधी    महान।
देख   दृश्य    ऐसा  लगा,
है  ये  असत  बयान।।13।

अपने  हित  में  सब निरत,
कवि   भी   उनमें      एक।
अपनी   कह सुनता  नहीं,
क्या यह 'शुभम'विवेक?14।

कथनी  मीठी  खांड- सी,
करनी     नीम      कुनैन।
कवि से  जाकर  पूछ लो,
ऐसा ही कुछ है न??15।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

मंगलवार, 4 जून 2019

कुपूत [दोहे]

 जो सुत अपने जनक का,
नित्य     करे     अपमान।
उस  कुपूत का क्यों भरें,
पेट    यहाँ    भगवान।।1।

पुत्र   वही  माँ -  बाप का ,
जो     करता      सम्मान।
सुखी  सदा   रहता  वही ,
जग में मिलता मान ।।2।

तन - मन  से  होता नहीं ,
जिससे  अपना    काम।
उस कुपूत की क्या कहें,
खाए   रोट   हराम।।3।

जीवन  भर  जो बाप पर,
बनता       भारी     भार।
हैं   कुपूत    ऐसे    बहुत,
जीवन  वह धिक्कार।।4।

पत्नी   साले   ससुर सब,
लेकर     अपने      साथ।
पिटवाता  जो   बाप  को,
कलि-कुपूत का हाथ।।5।

धाड़   मार   रोवे    तिया,
फोड़े     चूड़ी        आप।
आरोपित  रो -  रो    करे,
जो कुपूत का बाप।।6।

त्रियाचारित   फैला  रही,
सम्मुख    खड़ा   कुपूत।
ससुर  फँसाने  के  लिए,
करे  पुलिस  आहूत।।7।

लालच  लगी   हराम की,
रोटी     तोड़े          रोज़।
पूत   निकम्मे    बहुत  से,
कहे 'शुभम' कर खोज।।8।

प्रभु  यदि  मानव जन्म दे,
देना      नहीं         कुपूत।
देना     चाहे     एक    ही,
देना   'शुभम'   सपूत।।9।

 जनक  - जननि  को कष्ट दे,
 जीता     है        जो     पूत।
'शुभम' कीट उससे भले,
  होते     नहीं     कुपूत।।10।

💐शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप  'शुभम'

सोमवार, 27 मई 2019

भला करे करतार [दोहे]

मत  की  अंधी  दौड़  है,
क्या     चरित्र   पहचान!
आँखों   से    देखा नहीं ,
उसको कर मतदान।।1।

जनता   के  कर में नहीं ,
दूरबीन -    सा     यन्त्र।
जो  जाने नेता - चरित ,
दे मत 'शुभम'स्वतंत्र।।2।

जिसकाचरित नहीं कहीं,
दे   वह   चरित - प्रमाण।
होता    है    इस   देश  में,
कैसे   हो   कल्याण??3।

थोप दिया ज़बरन जबर,
गुंडा                दावेदार।
भयवश   देते  वोट सब,
भला  करे  करतार।।4।

मात्र तिजोरी  का उदर-
भरना      सेवा - भाव।
घड़ियाली आँसू  भरीं,
आँख दिखाती हाव।।5।

देशभक्ति  की  आड़ में,
खेलें     ख़ूब    शिकार।
ऐसे   जनसेवक   जहाँ,
बार -बार  धिक्कार।।6।

छिनरा     हत्यारे    खड़े,
किसको   दें   हम  वोट।
या  अपहर्ता  ग़बन कर,
बाँट  रहा   है   नोट??7।

खड़-खड़ हड्डी बज रहीं,
नहीं    देह     में    जान।
बटन दबाउसका 'शुभम',
तब करना जलपान।।8।

मतदाता     लाचार    है,
मज़बूरी          मतदान।
प्रजातंत्र    है  क्या यही,
मतदाता  अनजान।।9।

कुम्भकार  जनता  यहाँ,
नेता    चिकना    कुम्भ।
नाम  दिया  ब्रह्मा  तुझे,
फूली   झूठे  दम्भ।।10।

जनता   भोली   बावली,
नेता             सदाबहार।
सेवक   बन जनता ठगे,
पिए  दूध  की धार।।11।

नेता  साधु  स्वभाव का,
मत   की   माँगे   भीख।
वेष बदल   सीता  ठगी,
रावण की पदलीक।12।

भीड़   बढ़ाने   के  लिए ,
जनता     का    सत्कार।
बाहर  जनता  झींकती,
लगा हुआ दरबार।।13।

चमचों    की पहचान है,
लाखन     फरसा   राम।
जनता   तो  बस भेड़ है,
बाँधी  बिना लगाम।।14।

सोने   की   लंका  जले,
भरे  पाप    का  कुम्भ।
माँ  दुर्गा  के    हाथ  ही,
मरते शुम्भ-निशुम्भ।15।

💐 शुभमस्तु!
✍ रचयिता ©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

चुनाव की नाव [दोहे]

बैठे     नाव   चुनाव  की,
कुछ   डूबे   कुछ    पार।
जिसको माला मिल गई,
उसे न  मिलती  हार।।1।

चमचेगीरी     में    बहुत,
गुण  हैं   सुनो    सुजान।
माखन  खाने  को मिले,
नेता     कृपानिधान।।2।

सेवा -  व्रत  की  राह में,
मेवा -  घृत    की   धूम।
नेता  की    सेवा    करें ,
नित    ऊँचाई    चूम।।3।

देशभक्ति की ओढ़ ली,
झीनी    चादर      एक।
उसके   नीचे   कर  रहे,
काले करतब 'नेक'।।4।

धर्म सियासत का सजा ,
सुंदर      बड़ा     बज़ार।
अभिनय में जो पटु रहा,
उसका   बेड़ा   पार।।5।

अभिनेता ,अभिनेत्रियाँ ,
गायक , साध्वी  , सन्त।
राजनीति  में   घुस गए,
बदल-बदलकर पंत।।6।

लगा   मुखौटे   जो खड़े,
क्या  उनका   इतिहास?
देख   रहा   है   देश   ये,
इनसे  कैसी आस??7।

वेश बदलकर चोर कब,
हुआ   देश    का  भक्त?
बिन जाने समझे 'करम'
जनता जी  अनुरक्त।।8।

सेवक कह स्वामी बना,
जनता    डाले     फ़ूल।
तन  घोड़े  की पीठ पर,
बैठा  जनता   झूल।।9।

टोपी  रख  दी  पाँव में,
ये   नाटक   का  अंक।
झाँका परखा आँख में,
मिले वोट नि:शंक।।10

💐 शुभमस्तु!
✍ रचयिता ©
🌱 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...