मुक्तक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मुक्तक लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 28 जून 2022

समय ⏰ [ मुक्तक ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                         -1-

सदा     समय     है      ईश    हमारा,

सुरसरि    की     ज्यों    शीतल  धारा,

भरती      है       आनंद     देह     उर,

ज्यों    रजनी     में      हो   ध्रुव  तारा।


                         -2-

समय -   समय    की   अलग  बात   है,

कभी     दिवस    तो     कभी रात    है,

समय   किसी    का    नहीं एक  -  सा,

होती    शह      तो      कभी  मात    है।


                         -3-

भूलो      कल     मत    कभी आज    भी,

कभी    चने     भर       कभी   ताज  भी,

चलती   लहर    समय   की  हर    पल ,

समय       सजाता    'शुभम्'  साज    भी।


                            -4-

समय     कभी      बरबाद    न    करना,

रुकता      नहीं    समय    का     झरना,

बूँद    -     बूँद      से      सागर   भरता,

समय  -    सिंधु       के     पार  उतरना ।


                         -5-

जो      न     समय    की चिंता   करता,

नहीं      समय     उससे     फिर  डरता,

क्या      होगा    भविष्य      नर     तेरा,

शीघ्र     पाप      से    तव   घट    भरता।


🪴 शुभमस्तु !


२८ जून २०२२◆११.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


बुधवार, 22 जून 2022

संतुलन 🏋🏻‍♀️ [ मुक्तक ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🏋🏻‍♀️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                         -1-

रात दिन के संतुलन से है प्रकृति शुभदा सदा

उदित होते सोम सूरज हैं न विचलित एकदा

बह रही सरिता सजीली सिंधु से मिलना उसे

गूँजती  वीणा  सुरीली,विमल वाणी  शारदा।


                         -2-

शुभ्रतम जीना अगर तो संतुलन अनिवार्य है

अग्रसर  हो  कर्मपथ पर धर्म तेरा  कार्य  है

दूसरों के छिद्र में क्यों डालता है   अँगुलियाँ

राह मेंअपनी चला चल शिष्य या आचार्य है।


                         -3-

पित्त कफ या वात तीनों संतुलन होना सही

विषम भोजन रोगकारी दूध के सँग ज्यों दही

मास दो - दो के लिए आ जा रहीं ऋतुएँ यहाँ

याद रखना बात सच ये जो शुभम् ने है कही


                         -4-

भू गगन जल वायु पावक से जगत साकार है

संतुलन विकृत हुआ तो विश्व ये  बीमार   है

सृष्टिकर्ता की महारत देखिए अद्भुत  अटल

आँधियाँ, भूकंप , बाढ़ें  ले  रहीं आकार   है।


                         -5-

संतुलन परिवार में हो संतुलन हो   देश   में

संतुलन  संसार में  हो  विश्व में  परदेश  में

होड़  भी हथियार  की ये हो नहीं  संसार  में

शांति का साम्राज्य होगा भूमि के हर देश में।


🪴शुभमस्तु !


२२.०६.२०२२ ◆१०.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


बुधवार, 15 जून 2022

कटि तट पर घट रखे 🪷 [ मुक्तक ]

  

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                          -1-

कटि  तट   पर  घट  रखे एक वामा     चली,

देख   नवल     सौंदर्य   चुभा काँटा    छली,

थाम  लिया  सद  जल  घट  झुकी पीड़ा से,

पनघट  से   इठलाती   ब्रज गाँव   -   गली।


                        -2-

घट को कटि से तिय अलग रखे भी तो कैसे,

जल  छलक  न  जाए एक बूँद  घट  से  ऐसे,

झुक  स्वयं  वाम  हो  काँटा हेर   रही   वामा,

यों   खड़ी विनत  हो काँटा खींच  रही   ऐसे।


                         -3-

नव  गौर  गात  घट धरे सजल कटि    भारी,

पहनी       शाटिका      सुरंग  पद्मिनी  नारी,

नटखट    काँटा    पगतल  में छेड़ा      ऐसे,

झुक  लगी   हटाने  शूल काम की     क्यारी।


                           -4-

'क्यों   आया    मेरी   राह   चुभा पग काँटे!'

तरुणी   घट को  कटि  दबा मौन  हो   डांटे,

मैं    तो  जाती   थी पनघट से जल   भरके,

अब    जो  आया   तो  मारूँगी   दो  साँटे।


                          -5-

तरुणी   का   देखा    हाव  उठाए  घट   को,

तब    लगा   पाँव में  शूल  बिखेरे  लट  को,

झुक    गई     उठाए     भार  वाम  हो  ऐसे,

घर से निकली वर नारि निकट  पनघट को।


🪴शुभमस्तु !


१४ जून २०२२◆ १.००पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 31 मई 2022

भूख 🍛 [ मुक्तक ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🍛 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                         -1-

एक  वे हैं  फेंक   देते, रोटियाँ जो   घूर  पर,

एक  वे  हैं   ढूँढ़ते हैं,   रोटियाँ जो  घूर  पर,

अन्न को बरबाद करना,यों उचित होता नहीं,

वे 'शुभम्'भीआदमी हैं,जो भटकते घूर पर।


                          -2-

पेट की ज्वाला भयंकर,क्या नहीं करवा रही,

भूख से  संतान  तड़पे, धूप में झुलसा   रही,

फेंक  देते   ढेर पर  जो,रोटियाँ  बैठी    वहाँ,

हाथ की पढ़कर लकीरें,भाग्य को पछता रही


                          -3-

देह  पर  कपड़े  नहीं  हैं,पेट में  रोटी   नहीं,

जीवनी इच्छा कड़ी है, मात की  छोटी नहीं,

साथ में निज सुत सँभाले, ढूँढ़ती है रोटियाँ,

ढेर  पर  जो सूखती हैं,देखती मोटी   नहीं।


                         -4-

फेंक  देते  रोटियाँ   जो, गंदगी  के  ढेर  पर,

सोचते कण भी नहीं वे,निज मनों में बेर भर,

काश  दे देते किसी को,भूख से  बेहाल जो,

सोचती है भाग्य अपना,शांति पाती सेर भर।


                         -5-

अन्न की अवमानना है,है नहीं समुचित कभी,

अन्न  अपने  देव हैं नर,प्राण देते   वे    सभी,

अन्न थाली में वही ले,जो उदर में  ग्रहण   हो,

फेंकना अनुचित सदा है,भूल मत ये बात भी


🪴शुभमस्तु !


३१.०५.२०२२◆ ११.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सागर 🚢 [मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🚢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                        -1-

प्यार का सागर कभी,खारा नहीं होता प्रिये,

प्यार  जो सच्चा करे,हारा नहीं  रोता  हिये,

त्याग में ही प्यार के,खिलते सुमन हैं सर्वदा,

महकते     दोनों परस्पर, एक दूजे  के  लिए।


                        -2-

अंक में अपने खिलाता, हर नदी को नेह  से,

छोड़कर अपने पिता का,सरि चली है गेह से,

हृदय सागर-सा बनाए,गहन गर भी पी सके,

गगन के  जल को समाएँ,जो बरसता मेह से।


                           -3-

बैठ तू तट पर रहा तो, हाथ कुछ आए नहीं,

जो गया सागर तली में,पा  सके  मुक्ता वहीं,

डूबने का डर सताए,तू निकम्मा  क्यों  बने,

स्वेद जोअपना बहाए,कनक मुक्ता हर कहीं।


                        -4-

स्वीकार सागर ने किया,दूषण प्रदूषण आपका,

मृत देह कचरा देश का,सरि नीर सारा आपका,

मेघ   ने   निर्मल बना कर, आपको ही दे दिया,

भाद्र श्रावण ने भिगोया, अवनि का तल आपका।


                         -5-

गहन सागर -सा बना लें, हम हृदय अपना शुभम्,

सुतल मुक्ता से सजा लें,जगत हो अपना शिवम,

आदमी     से   आदमी का विष, मिटाएँ शंभु-सा,

सत्य का ध्वज हम उठाएँ, विश्व हो तब सुंदरम।


🪴 शुभमस्तु !


३१ मई २०२२■७.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


🚢🪷🚢🪷🚢🪷🚢🪷🚢

गुरुवार, 26 मई 2022

बचपन 🙋🏻‍♂️ [ मुक्तक ]


◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆◆◆●

✍️ शब्दकार ©

🙋🏻‍♂️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●

                        -1-

बात बचपन की चली है भूलता बचपन नहीं,

मात्र  यादें ही बची हैं स्वर्ग से भी  कम  नहीं,

जिंदगी के सब थपेड़े औऱ लफड़े  शून्य  हैं,

झूठ ने यौवन सजाया बालपन-सा सच नहीं।


                        -2-

जिंदगी का फूल बचपन आज वह मुरझा गया,

बीज फल के लोभ में नित देख ले उलझा गया,

खेलना स्वच्छन्द खाना औऱ पीना याद है,

डेढ़ दशकों में हमारी जिंदगी पर छा गया।


                        -3-

प्यार जो माता पिता या मम पितामह का मिला,

आज तक बचपन न लौटा नेह का सुदृढ़ किला,

मधुर स्मृतियाँ बची हैं कागजों की नाव में,

चल रहा है जिंदगी को पालने का सिलसिला।


                        -4-

बचपने की बात कहकर हेयता मत लाइए,

शक्ति है तो मीत बचपन की डगर फिर जाइए,

जिंदगी की मंजिलों की सीढियां हैं पाहनी,

मात्र च्विंगम की तरह अब बालपन चुभलाइए।


                        -5-

जननी ने बचपन में अपना प्यार निछावर मुझे किया,

स्वयं सो रही गीले में वह सूखा बिस्तर मुझे दिया,

लाड़ पिता बाबा दादी का पाकर के मैं धन्य हुआ,

शब्दों में कृतार्थ भावों से शुभाशीष ले 'शुभम्'जिया।


🪴 शुभमस्तु !


२६ मई २०२२ ◆११.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 24 मई 2022

मुश्किलें 🎇 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार©

🎇 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                          -1-

जिंदगी में आदमी को हैं नहीं कब  मुश्किलें,

कौन कहता है कि हल होती नहीं ये मुश्किलें,

बन प्रमादी हाथ पाँवों को नहीं तुम रोकना,

जो चला अनथक पथों में दूर होतीं मुश्किलें।


                        -2-

कर्मपथ पर जो चला है मंजिलें मिलतीं उसे,

रुकता नहीं थकता नहीं शूलपथ पर जो घुसे,

मुश्किलें उस धैर्यशाली को न आड़े आ सकीं,

पाहनों से शैल पर देखा न जल  कैसे   रिसे !


                        -3-

अधर पर मुरली सजी  तो हाथ में भी चक्र था

योग योगेश्वर कन्हैया  नवनीत खाता तक्र का,

मुश्किलें इतनी पड़ीं पर लौटकर  देखा नहीं,

कृष्ण की उस भाललिपि का लेख बेढब वक्र था।


                        -4-

बैठा रहा तट पर धरे निज हाथ में तू हाथ को

सरित को  कैसे तरेगा ढूँढ़ता जो  साथ   को,

पार  करना  है  अकेले नाव खेनी  आप   ही,

मुश्किलें आड़े उसे हैं ठोकता निज माथ को।


                        -5-

कोशिशों  का ज्वार यों तेरा नहीं   ठंडा  पड़े,

मुश्किलें  सब पार होंगीं राह में  जो तू अड़े,

चींटियों को देख ले मिलतीं उन्हें गिरिचोटियाँ

'शुभं' कर अपने इरादे फौलाद-से पक्के कड़े।


🪴 शुभमस्तु !


२४ मई २०२२◆२.००

पतनम मार्तण्डस्य।


बुधवार, 18 मई 2022

जीवन 🫧 [ मुक्तक ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

जीवन      सबका     अपना  -  अपना,

उतना    ही    फल      जितना  तपना,

परिजीवी       बन      कर   जो    रहते,

देख      रहे       वे        केवल   सपना।।1।


थलचर        जलचर      नभचर    रहते,

तीन   भुवन      में     क्या- क्या    सहते,

कर्मों      का       जीवन   शुभ    कर्ता,

मृतक       सदा      धारा      में   बहते।।2।


स्वावलंब         के     चरणों    पर   चल,

बहती   है     ज्यों    सरिता  कल  - कल,

जीवन         नई        दिशाएँ     देता,

चरैवेति         है          तेरा     संबल।।3।


मानव          देह        जीव      ने     पाई,

क्यों          धरती         पर    आ   इतराई,

होता     गर्दभ          अश्व   योनि        में,

रहती    जीवन       की     न   लुनाई।।4।


कर्म         योनि        मानव   यह     तेरी,

क्यों          करता      भोगों     में      देरी,

जीवन   जी       मत  शूकर      -    जैसा,

'शुभम्'       विदा     की बजती    भेरी।।5।


🪴 शुभमस्तु !


१८ मई २०२२◆ ८.०० आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 12 मई 2022

रिश्ते 🫧 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                        -1-

रिश्ते     होते    हवा    समान,

तने   परस्पर   नहीं     कमान,

नहीं  नयन    से    दिखते   वे,

आपस  का विश्वास    प्रमान।


                        -2-

कोमल  धागे    के   दो  मोती,

माला में  उर  -  प्रीति पिरोती,

उभय पक्ष   रिश्ते  की गरिमा,

नहीं स्वार्थ  की  बदबू   होती।


                        -3-

रिश्ते   संज्ञा  जुड़   जाने   से,

नहीं  स्वार्थ  में  मुड़   पाने से,

महक त्याग  की आती भीनी,

क्या कपूर - सा  उड़ जाने से?


                       -4-

रिश्ते  में   दरार   तब   आती,

स्वार्थवृत्ति   उर में जब  छाती,

किरच -किरच शीशे की होतीं,

अपने -  अपने बिंब  दिखाती।


                        -5-

चला  न पाओ  तो मत जोड़ो,

ऐसे   रिश्ते   पल   में    तोड़ो,

चालाकी   का   काम नहीं  है,

'शुभम्'त्वरित अपना रुख मोड़ो।


🪴  शुभमस्तु !


१२.०५.२०२२◆८.४५ आरोहणम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 22 मार्च 2022

कर्तव्य 🌞 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌞 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                         -1-

कर्तव्य   से     मुख   मोड़ना,

निज लक्ष्य को   ही   छोड़ना,

अधिकार  से     पहले    करें,

 निज कर्मपथ  क्यों  तोड़ना?


                       -2-

कर्तव्य   जो    अपना     करे,

साफल्य  उस   नर   को  वरे,

आलस्य क्षण भर   का न  हो,

दुख,   कष्ट   वह  अपने   हरे।


                        -3-

कर्तव्य  रविकर   ने     किया,

विश्व    का   तम   हर  लिया,

अपनी    धुरी    पर     घूमती,

भू  ने सुखद    जीवन   दिया।


                        -4-

कर्तव्य    से      संसार     है,

वरना   जगत   निस्सार     है,

आलस्य  नर    की  मीच  है,

कर्तव्य       मूलाधार        है।


                        -5-

कर्तव्य    को     पहचान   लें,

करणीय को  यह   जान   लें,

अधिकार  तो मिल    जाएँगे,

यह भाव उर   में    ठान   लें।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०३.२०२२◆७.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।


शनिवार, 12 मार्च 2022

विजय 👑 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

👑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                        -1-

सत्य - मार्ग  पर जो चलता है,

दानव -दल को वह खलता है,

सदा विजय सत की ही होती,

शल्य-सेज पर  सत पलता है।


                        -2-

संघर्षों  का  नाम  विजय   है,

कष्टों की भी  अपनी  लय  है,

पीछे    मुड़कर   नहीं  देखते,

उन्हें  न होता  कोई   भय  है।


                        -3-

चलता रहा   न  रुकना जाना,

नित चलना ही  मंज़िल माना,

विजय श्री उसको  मिलती है,

जिसने लक्ष्य विजय का ठाना।


                        -4-

चींटी  कभी  निराश  न होती,

दोष   ढूँढ़ती   कभी   न रोती,

चढ़ती है   हिमगिरि के ऊपर,

बीज विजय के नित ही बोती।


                        -5-

ठान    लिया   पीछे  क्या हटना,

क्या दिल्ली क्या लखनऊ पटना,

विजय  लक्ष्य  है 'शुभम' तुम्हारा,

सुखद  विजय  की सुंदर घटना।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०३.२०२२◆५.०० आरोहणं मार्तण्डस्य

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

शिक्षा 🖋️🖋️ [ मुक्तक ]

  

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🖋️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

सीखने     को   रवि सितारे,

चंद्र,   सरिता ,  सिंधु ,  तारे,

रात- दिन   रहते    समर्पित,

ग्रहण कर शिक्षा न प्यारे?1।


विस्तीर्ण  हो  आकाश  जैसा,

अनवरत हो निज श्वास जैसा,

हर  ओर है शिक्षा  तुम्हारे,

बढ़ता  रहे तू  घास  जैसा।2।


सुमन    सिखलाते    हँसाना,

नवल   कलियाँ    मुस्कराना,

पवनवत   गतिशील   रह  तू,

शिक्षा यही जग  हँसाना।3।


कनक में  शिक्षा   सुहागा,

हार   में   शिक्षा    सु- धागा,

गगन में  वह   नीलिमा - सी,

जो न ले वह नर अभागा।4।


शिक्षा बिना नर  श्वान जैसा,

मनुज   वह    हैवान   जैसा,

सत्य  को    पहचान    लेता,

शोर  में  मधु  गान  जैसा।5।


🪴 शूभमस्तु !


१०.०२.२०२२◆१.३० 

पतनमं मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

आकर्षण 🌻 [ मुक्तक ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                       -1-

नदियों   का   कलरव  है  सुमधुर,

चिड़ियों  की   चहचह  है शुभकर,

महक    रही     है   पीली  सरसों,

प्रकृति   के   आकर्षण शुचिकर।


                        -2-

देख   तुम्हें     आँखें    थम जातीं,

सम्मोहित   हो    बँध - सी जातीं,

शब्द     मौन     हो    जाते   मेरे,

आकर्षण    जब   तुम बिखरातीं।


                        -3-

रूप        गुनगुनी      धूप   तुम्हारा,

मम    जीवन   का     सुलभ सहारा,

गरमाती        निज आकर्षण    से,

घूम     रहा       था    मारा - मारा।


                        -4-

बँधे   हुआ   जग  आकर्षण    से,

खिंचता    है   हर   तृण ,   तृण से,

सृष्टि    न   होती     बिन आकर्षण,

चमके    नारी     शुभ    भूषण  से।


                        -5-

नर -    नारी     में   चुम्बक   ऐसा,

सुमनों    में     भँवरों    के   जैसा,

पूरक      बन     जाता आकर्षण,

'शुभम'     न   माने    ऐसा - वैसा।


                        -6-

सूरज,       सोम,     सितारे,  अंबर,

सरिता ,   सागर ,   अवनी, गिरिवर,

आकर्षण    में     बाँध   रहे   नित,

पशु,     पक्षी ,   पौधे ,    नारी,  नर।


                            -7-

कविता    दिव्य     प्रभा   वाणी  की,

आकर्षण    मानव     प्राणी     की,

पशु - पक्षी     विहीन    कविता   से,

कृपा    बरसती     माँ     त्राणी  की।


🪴 शुभमस्तु!


०१.०२.२०२२◆११.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 27 जनवरी 2022

खूँटा ♟️ [ मुक्तक ]

  

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

 ✍️ शब्दकार©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

खूँटे       बदल      रहे      हैं,

झूठे      बदल        रहे     हैं,

सोए     थे       खाट      टूटी,

बिस्तर    बदल    रहे    हैं।1।


पगहा    तुड़ा      के     भागे,

सोए      पड़े       थे    जागे,

पीछे  न    मुड़    के    देखा,

भागे   वे       तेज     आगे।2।


बदला  जो     आज     खूँटा,

दीमक    लगा     है      टूटा,

थामा   है  आज    कस कर,

गोरा    है     या     कलूटा।3।


खूँटों  में    जड़      नहीं   है,

पत्तों     की     पतझड़ी    है,

उड़ते       गुबारों     में     वे,

थिरता  न अब   कहीं   है।4।


खूँटे    बिना     न      कुरसी,

आती     नहीं      है    तुरसी,

सेवा     न      होती      छुट्टा,  

चाहत   है    उच्च  कुरसी।5।


मौसम  में    उठा -  पटक है,

यह    जानता    घटक     है,

घूरे  के   दिन     भी    बदलें,

ऐसी  ये चटक -   मटक है।6।


खूँटों    की     खटपटी     है,

नट   हैं     कहीं     नटी    है,

निष्णात     हैं        कलाधर,

भगदड़  भी  अटपटी   है।7।


खूँटा  -   कला     के      बंदे,

फैलाते        अपने        फंदे,

सुबह    हो     कौन     खूँटा,

कब    जान    पाते    बंदे।8।


खूँटे     ही      खींच     लाते,

पंजे      में    भींच       जाते,

बदलाव      की     हवा    है,

पय - सार    सींच   भाते।9।


संस्कार       आज       खूँटा,

दरबार        ताज        खूँटा,

खूँटों     से     दूर       रहना ,

जन   का   दुलार   खूँटा।10।


🪴शुभमस्तु !


२५.०१.२०२२◆९.४५     पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

राष्ट्र एकता 🌾🇮🇳 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

फहराया   नभ  प्रबल तिरंगा,

रहे   न   कोई   भूखा    नंगा,

बहती  रहे रात दिन  अविरल,

राष्ट्र एकता की शुचि गंगा।1


🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳


रंग -  रंग  का    देश   हमारा,

गंगा,   यमुना  ,  सरयू  धारा,

अभिसिंचन कर देतीं जीवन,

राष्ट्र एकता  का  दें  नारा।2


🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳


खंड - खंड में  जो  बँट जाते,

मिटने का   वे  पथ  अपनाते,

सुदृढ़ सशक्त  बनें  जन सारे,

राष्ट्र एकता  मंत्र   सुनाते।3


🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳


अपना  उदर श्वान  भी  भरते,

अपने ही  हित  जीते -  मरते,

मानव ,पशु-जीवन  से ऊपर,

राष्ट्र एकता परहित करते।4


🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳🌾🇮🇳


धर्म,  कर्म  सबका  है अपना,

देखें 'शुभम' एक   ही सपना,

मानवता से  विलग  न होना,

राष्ट्र एकता के हित तपना।5


🪴 शुभमस्तु !


२५.०१.२०२२◆११.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

मुखौटा 🤡 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                        -1-

लगाकर     मुखौटा  चले  हैं      रिझाने,

सभी    साधते    हैं   उरों    पर  निशाने,

गली -   गाँव    में    मतमंगे  चले     हैं,

भोली - सी  जनता  छलों    से   लुभाने।


                        -2-

चेहरे    पर       चेहरा   नकली   चढ़ाए,

कदम   आश्वासनों    के   आगे   बढ़ाए,

सभी    जानते     ये मुखौटे  हैं   सारे,

घूमते    चाम    नेता   तन   पर   मढ़ाए।


                        -3-

भाषा    भी    बदली  बदली है    बोली,

लिए    साथ   घूमें  चमचों  की   टोली,

कपट   का   मुखौटा चढ़ा हर वदन पर,

चंदन    सजाया   चमकती   है   रोली।


                        -4-

वादों , विचारों   में  सच कुछ नहीं   है,

मुखौटों   के  नीचे   कटुता बही    है,

इत्र   की  इन सुगंधों  के नीचे सड़न है,

'शुभम ' ने  सचाई की कहानी कही  है।


                        -5-

मुखौटों   के     मेले   सजने लगे    हैं ,

सलिलहीन   बादल    गरजने लगे   हैं,

झूठ  की ये  झड़ी भिगोती यों 'शुभम',

मतमंगे    अपने     न  होते सगे     हैं।


🪴 शुभमस्तु !


०४.०१.२०२२◆ ८.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

गाँव 🌾🏕️ [ मुक्तक ]

  

◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●◆●

✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆●◆◆◆●◆◆◆●◆●◆●◆●◆●

खेत,  बाग, वन   की   हरियाली,

वृक्ष, लता   की   छटा  निराली,

सुषमा   सुघर गाँव   की प्यारी,

खेलें   बालक     दे -  दे   ताली।१.


गेहूँ,     चना,      धान   लहराते,

देख   नयन  सबके    सुख पाते,

कृषक  गाँव  की   जीवन -धारा,

हिल- मिल  गीत   हर्ष   के गाते।२.


लिपे - पुते      गोबर  -  माटी से,

आँगन   सज्जित     परिपाटी से,

होली     पर्व     दिवाली    आती,

हर्षित   गाँव   दाल - बाटी से।३.


 बरसें     घन   घनघोर   गगन से,

दिखते  हैं  सब   गाँव  मगन - से,

कृषक   सभी    जुटते    खेती में,

हो  जाते  सब   व्यस्त  लगन से।४.


बेला,      जूही ,     गेंदा     फूले,

कर   गुंजार  भ्रमर -  दल  झूले,

तितली     उड़ती    रंग -  बिरंगी ,

गाँव  महकते   ज्यों   मद भूले।५.


दूध,  शाक -  सब्जी ,  फल  पाते,

अन्न,   सुमन   सब   गाँव दिलाते,

प्राकृतिक     जीवन     की सुषमा ,

नर - नारी ,   शिशु ,   युवा बढ़ाते।६.


है     परिवेश    गाँव   का न्यारा,

कहीं   नदी   का   सजल किनारा,

पेड़ों  पर   कलरव   खगदल का,

लुभा   'शुभम'  को  लगता प्यारा।७.


🪴 शुभमस्तु !


२८.१२.२०२१◆६.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

धैर्य 🪔 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

धैर्य     परीक्षा        नित   लेता  है,

मादा     खग       अंडे     सेता   है,

त्यों   ही   रख   विपदा   में  धीरज,

क्यों   न 'शुभम'   मानव  चेता है!१।


जो        मानव     धैर्य    नहीं  खोता,

विपदा    में     नहीं     तनिक  रोता,

मिलता   साफल्य     'शुभम' उसको,

सद्गति    के      बीज    वही  बोता।२।


जग -   निधि    में   उठती   हैं लहरें,

मिलतीं   जल     में    नदियाँ , नहरें,

बहतीं      जलधारें       धैर्य     धरे,

ज्यों     होतीं     गज़लों   की  बहरें।३।


स्वर्ण    आग     में    तप कर चमके,

रविकर     नभ    में      ऊपर  दमके,

धारण    किया    धैर्य    को  जिसने,

सुमन      कलीवत     उपवन महके।४।


जो    नर    परिश्रम    कर  पाता    है,

धैर्य      भानु      ही   सिखलाता    है,

नित्य     उदित    हो    वह   प्राची   से,

दिन   में   चढ़    ऊपर    जाता    है।५।


🪴 शुभमस्तु !


२१.१२.२०२१◆७.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

सपने 🧡 [ मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                        -1-

पूरे   जब   हो   जाते   सपने,

लगते हैं  तब  सब  ही अपने,

सपनों  को  यदि  करना  पूरा,

जीवन  में  लग   जाएँ  तपने।

                         -2-

सोने    में    जो   देखे  सपने,

कभी  नहीं   वे    होते अपने,

खुली आँख से चलते -फिरते,

जो   देखें    वे   सच्चे  सपने।

                        -3-

सपने   उनके    रंग  -  बिरंगे,

देख   रहे    सपने     मतमंगे,

ऊँची कुर्सी  दिखती   उनको,

काम   किए  यद्यपि  बदरंगे।

                        -4-

सपनों   का    संसार  निराला,

सुख-दुखअमृत विष का प्याला,

हँसना, रोना,   नभ  में  उड़ना,

लाल, हरा, पीला, सित, काला।

                        -5-

जो   पूरे   हों    देखें    सपने,

'शुभम' बनाया  मानव तप ने,

साधक  बनकर   करें साधना,

लख  बाधाएँ  लगें  न कँपने?


🪴 शुभमस्तु !


१४.१२.२०२१◆५.३०आरोहणं मार्तण्डस्य।

बुधवार, 1 दिसंबर 2021

शब्द 🎻 [मुक्तक ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🎻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

शब्द- साधना कवि करता है,

भाव,शिल्प  के  रँग भरता है,

खेल नहीं है यह शिशुओं का,

डूब-डूब कर वह तरता है।1।


शब्द  अजर   है सदा अमर है,

साधक  उससे   जाता  तर है,

शब्दों में  ही बसे अमिय विष,

कवि का हृदय शब्द का घर है।2।


मधुर जहर- से  शब्द  न बोलें,

बोलें  बाद  प्रथम   वह   तोलें,

सत्य   वचन   में  रहते   ईश्वर,

सत्य मधुरता से रस  घोलें।3।


शब्दों  की    सरिता   नित बहती,

दस रस  की कविता कुछ कहती,

चिंतन, मनन,  मधुर   मंथन  से,

उर  के   मैल    मिटाती   दहती ।4।


शब्द   इत्र   है   शब्द   मंत्र है,

जीवन   संचालक   सु यंत्र है,

मारण, उच्चाट्टन ,  जीवनप्रद,

देशभक्ति का नवल तंत्र है।5।


🪴 शुभमस्तु ।


०१.१२.२०२१◆१०.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।


🪴 शुभमस्तु !

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...