सोमवार, 16 मई 2022

हे शिव शंभु कृपा करिहौ 🪦 [ मत्तगयंद सवैया ]

 

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छंद विधान:

1.23  वर्णों का वर्णिक छंद।

2.सात  भगण (211) +2 गुरु.

3. चार पद तुकांत।

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✍️ शब्दकार ©

🪦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

जेठ चले पछुआ तरुणी सिर,   

                  ढाँकि  चली  मग में  घबराई।

जेठ कि  लाज  करै हर नारि,

                 बिना घुँघटा  कत बाहिर आई।।

जाइ  बरात   वु    काँपि  रही,

             अधनंग नची तजि कें     शरमाई।

माघहु    सोचि   रहौ   मन में,

          तजि  लाज दई इतराति   लुगाई।।


                        -2-

'आजु चलौ जमुना तट पै सखि,

                 कान्ह वहाँ निज धेनु    चरावें।

ग्वालनु के संग डाल कदंब कि,

               डारत    झूलहु  मोद     करावें।।'

'मो मन में डरु छाय रहौ घर,

                जाय कहा बतियाँ कहि   पावें।'

'का बस में अपने सजनी जब,

               राह में कान्ह खड़े मिलि जावें।।'


                        -3-

सावन में नित मेह  झरै बदरा,

                   झुकि  छाइ  रहे अति   भारी।

प्यास   बुझी   तपती  धरती,       

              हरषाइ  रही विरही ब्रज    नारी।।

दादुर टेर मची सर में मम,

                    दादुरि  बेगि न आवति प्यारी।

राति   गई   टर्रात  रहौ  मुख,

             फाड़ि  भई  सिगरी मम ख्वारी।।


                        -4-

हे  शिव  शंभु !कृपा  करि कें,

           सबकौ कल्याण करौ जगती में।

दारिद   दुःखहु  दूरि  करौ,

              उर-भीति निवारहु नाव नदी में।।

होय  न   रार  न  वार कहूँ ,

          सुख- शांति बयार बहै धरती में।।

सावन  में  बरसें  सरसें  नव,

              मेघ   सदा  वन में परती  में।।


                        -5-

जो जनती नर को जननी तहँ,

              छूत - अछूत कौ भेद न जानों।

राम नें मान दियौ शबरी  वन,

                ढूँढ़ि लई तृण खेद न मानों।।

मात गुरू कहलाति सदा भरि,

                 अंकहु मोद दियौ रति पानों।

नारिन   कौ   नित  मान करौ,

         परुषा निज गूढ़ अहं तजि आनों।।


🪴 शुभमस्तु  !


१६.०५.२०२२◆११.०० आरोहणम् मार्तण्डस्य।


जेठागमन 🏝️ [ दोहा गीतिका]

  

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हुआ आगमन जेठ का,बहुओं ने की लाज।

सिर ढँककर पथ में बढ़ीं,मर्यादा के काज।।


फागुन   आए   चैत भी,चले गए     वैशाख,

गई  जेठ  के  संग में,अरहर करती    नाज।


जाती थीं बाजार को,खोल शीश निज केश,

अवगुंठित जूड़ा किया, देख जेठ  का  ताज।


सीमाओं को भंग कर,क्यों जाती   है  नारि,

जेठ  आ  रहे  सामने,बदल देह  का  साज।


नहीं किया सम्मान जो,पत हो पतित अनारि,

मन  ही  मन तव जेठ जी,हो जाएँ  नाराज।


सीमा सबकी है बँधी, सरिता, सिंधु, तड़ाग,

युग-युग  से आया चला, मर्यादा  का राज।


'शुभं' जेठ तो जेठ हैं,जनक जननि गुरुश्रेष्ठ

रविशशि मर्यादित सभी,राम कृष्ण ब्रजराज।


🪴शुभमस्तु !


१५.०५.२०२२◆६.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


आँगन 💮 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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घुटरुन खेले थे कभी,हम आँगन के  बीच।

देखा धूप न छाँव को,या बरसाती   कीच।।

आँगन  अब बनते नहीं,खींच दिवारें  चार।

कमरे  बनते जा रहे,नहीं धूप का   प्यार।।


माँ  आँगन  की धूप में, बैठ बिलोती  छाछ।

टपक रहीं निम्बौलियाँ,द्वार नीम  का  गाछ।।

मणियों  से आँगन बना,कान्ह निहारे  रूप।

मात यशोदा हर्षमय, लीन नंद ब्रज   भूप।।


आँगन की रज लोटकर, बड़े हुए  हम आज।

जननी  ने ले अंक में ,दिया नेह  का  ताज।।

आँगन  में चौपाल  के,मची होलिका    धूम।

रँग  बरसातीं भाभियाँ,देवर के  मुख   चूम।।


जब से आँगन में खिंची, बँटवारे  की भीत।

प्रेम विदा घर से हुआ,दिवस हुए  विपरीत ।।

संस्कार मिटने लगे, घर - आँगन  के   संग।

बँटा कक्ष  में  आदमी, हृदय हो   गए  तंग।।


आग नहीं  आँगन वही,अब है बढ़ती  आग।

खेलें  बैठें  नेह  से,घर  भर   में     अनुराग।।

बिखरे -बिखरे घर बने,आँगन का क्या काम!

नई   बहू  एकांत  में , माँग रही    आराम।।


अँगना से आँगन सजे,

                       रहीं न अँगना  शेष।

अँगना जब वामा बनीं,

                    बदले    'शुभम्' सुवेष।।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०५.२०२२◆ १२.१५

 पतनम मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 13 मई 2022

वरयात्रा' बनाम 'रवयात्रा' 🎺 [ व्यंग्य ]

 

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 ✍️ व्यंग्यकार ©

 🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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  आधुनिक युग में यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि 'स्वार्थ' किसे कहते हैं। किस चिड़िया का नाम है -'स्वार्थ'। भले कोई इसकी परिभाषा नहीं जानता हो ;किंतु उसका व्यवहारिक रूप उसके दैनिक जीवन का प्रमुख अंग है।वह अच्छी तरह इसे अपने दैनिक जीवन का व्यवहारिक रूप बनाए हुए है।

            किसी भी 'स्वार्थ' के दो रूप देखे जा सकते हैं। पहला 'एकल' या 'व्यक्तिगत' रूप है तो दूसरा 'समवेत' ,'सामाजिक' अथवा 'सामूहिक' रूप है। 'एकल स्वार्थ' से भरा हुआ आधुनिक संसार का एक - एक व्यक्ति इसका अति अद्भुत नमूना है। ''मैं न दूँ काऊ ,अकेला बैठ खाऊं।'' इसी लोकोक्ति सूत्र का अनुसरण संसार का मानव करता हुआ अपनी देश सेवा,समाज सेवा,जगत सेवा और जीव सेवा की डुगडुगी पीटता हुआ दिखाई दे रहा है। जिसके प्रमाण पत्र बनाने के लिए वीडियो बनाना, अखबार में खबरें छपवाना, सोशल मीडिया पर प्रेषित करना वह कभी नहीं भूलता।

        जब बात 'समवेत स्वार्थ' की होती है ,तो इसका सबसे सशक्त उदाहरण आधुनिक वरयात्राओं में देखा जा सकता है। वर के साथ उसका विवाह करवाने के लिए जाने वाले लोगों की यात्रा 'वरयात्रा' अथवा बारात कहलाती है। किंतु इस वरयात्रा के नब्बे प्रतिशत से भी अधिक यात्रियों का वर के विवाह से कोई लेना - देना नहीं होता।उनका लक्ष्य केवल औऱ केवल अपनी उदर - पूर्ति करके उल्टी दौड़ लगाना होता है। तरह - तरह के सुस्वादु व्यंजनों से भरी हुई लड़ामनियों पर सुस्वादु भोजन का आनन्द लेने के बाद अपने अथवा दूल्हे के पिता द्वारा प्रायोजित वाहन से सीधे घर आकर सोना ही उनका उद्देश्य है। वे चाहे इष्ट मित्र हों, मोहल्ले वाले हों, दूर के रिश्तेदार हों अथवा ब्यौहारी लोग , सब 'खाये औऱ भागे ' की दौड़ के प्रतियोगी प्रतीत होते हैं। रव करते हुए जाना और रव करते हुए भागे चले आना : बस इतनी सी बात है।वर का संग देना या उसे जीवन के नए अध्याय को पढ़ने का पाठ पढ़ाना किसी का भी काम नहीं होता। फिर ये कैसी 'वरयात्रा'? इसे यदि 'रवयात्रा' कहा जाए तो बेहतर है।भावी हसबैंड के साथ बैंड का रव ,बारातियों का खाऊं- खाऊं रव, डी जे का धमाधम रव ,शराबियों औऱ कुछ नचनियों का नृत्य रव, सर्वत्र रव ही रव। 

       आज के आदमी की यह सामूहिक स्वार्थवृत्ति की ऐसी जीवंत कहानी है ,जिसके लिए सारा समाज मौन है। समाज को सुधरना ही नहीं है ,तो कोई समाज सुधारक क्यों आगे आए! बेचारों के पास खाने के लिए समय तो है ,पर जिसकी 'वरयात्रा' के यात्री हैं ,उससे कोई मतलब नहीं ! 'समवेत स्वार्थ' की पराकाष्ठा है ये। इससे तो अच्छा है कि जितने लोग वर के साथ जनवासे में शेष रह जाते हैं,उन्हें छोड़कर किसी को भी नहीं बुलाया जाए।वर का पिता ,भाई, जीजाजी ,फूफाजी औऱ एक दो इने -गिने इष्ट मित्र ;और बस। क्यों व्यर्थ में लड़की वाले के धन ,भोजन औऱ अन्य सामान का अपव्यय किया जाए।ये कैसा 'ब्यौहार' कि खाये और भाग लिए! स्वार्थ की पराकाष्ठा का अद्भुत नमूना।

           मनुष्य की सामाजिकता की विलुप्ति यदि कहीं देखनी हो ,तो इन 'वरयात्राओं' में नहीं, इन 'रवयात्राओं' में देखिए। इनसे तो पशु -पक्षी ही बेहतर हैं। ऐसी विचित्र ढोंगी आधुनिकता औऱ स्वार्थवृत्ति के भविष्य का रब ही मालिक है। प्रदर्शन का ढोंग इन 'रवयात्राओं' के लिए पूर्णतः उत्तरदायी है।धन, धनाढ्यता और धनान्धता के दिखावे का 'व्यवहार' इस खोखले यात्राचार का कारण है। आदमी इतना गिरेगा ,सोचा भी न था। लेकिन अभी पूरी तरह गिरा कहाँ है ! बस देखते रहिए कि कितना नीचे जाता है। रसातल में तल नहीं होता।


 🪴 शुभमस्तु ! 


 १२.०५.२०२२ ◆ १०.०० पतनम मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 12 मई 2022

रव यात्रा' 🎺🎷 [अतुकान्तिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🎺 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बैंड भी था

साथ में होने वाला

हसबैंड भी था,

आए थे हँसी - खुशी

'वर यात्रा' में

मात्र उड़ाने के लिए

भरपेट दावत?


बैंड भी बज गया

भावी हसबैंड भी

जनवासे में 

रम गया,

स्वाद ले ले

उड़ा ली दावत,

अब क्यों यों

हो गई 

वर  से अदावत?

कि अपना मुँह मोड़

वापस चले आए!

घर वालों, फूफा,

जीजा के संग

उसे अकेला छोड़

चले आए!


ये भी कोई

वर यात्रा है?

तुम्हारे लौटने में

क्या किसी भी

प्रमाण की मात्रा है?

कि तुम वरयात्री हो

या  कोई  लुटेरे?

पेट के भुक्खड़

या भोजनभट्ट पिटारे?

साथ में आए थे

तो साथ भी निभाना था,

इस तरह 

वरयात्रा को

'रव यात्रा' बना

भोग उदरस्थ कर

चले नहीं आना था!


वाह री

स्वार्थ भरी

आधुनिकता?

रव के लिए

क्या बैंड बाजा

कम था !

उनकी पिपनियों 

धामाधम में नहीं

इतना दम था!

जो खाने भर का

'व्यौहार' निभाने

आना था,

उसके बाद

 रव करते हुए

'रव यात्रा' को ले

बिना वर ही

 चले आना था!


🪴 शुभमस्तु !


१२.०५.२०२२◆ ४.३०

पतनम मार्तण्डस्य।


रिश्ते 🫧 [ मुक्तक ]


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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

रिश्ते     होते    हवा    समान,

तने   परस्पर   नहीं     कमान,

नहीं  नयन    से    दिखते   वे,

आपस  का विश्वास    प्रमान।


                        -2-

कोमल  धागे    के   दो  मोती,

माला में  उर  -  प्रीति पिरोती,

उभय पक्ष   रिश्ते  की गरिमा,

नहीं स्वार्थ  की  बदबू   होती।


                        -3-

रिश्ते   संज्ञा  जुड़   जाने   से,

नहीं  स्वार्थ  में  मुड़   पाने से,

महक त्याग  की आती भीनी,

क्या कपूर - सा  उड़ जाने से?


                       -4-

रिश्ते  में   दरार   तब   आती,

स्वार्थवृत्ति   उर में जब  छाती,

किरच -किरच शीशे की होतीं,

अपने -  अपने बिंब  दिखाती।


                        -5-

चला  न पाओ  तो मत जोड़ो,

ऐसे   रिश्ते   पल   में    तोड़ो,

चालाकी   का   काम नहीं  है,

'शुभम्'त्वरित अपना रुख मोड़ो।


🪴  शुभमस्तु !


१२.०५.२०२२◆८.४५ आरोहणम मार्तण्डस्य।

पंचरंगी कुंडलिया 🪬 [ कुंडलिया ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

करके चोरी 'विज्ञ'जन , बाँट रहे  नित ज्ञान।

स्वयं  नहीं  करते कभी,ऐसे विज्ञ    महान।।

ऐसे  विज्ञ  महान,  ज्ञान की बहती      गंगा।

बनी  हुई   नद - नाल, बाँटने वाला    नंगा।।

'शुभम् सुनामी तेज,पहाड़ों से जल गिरके।

करते स्वर आक्रांत ,ज्ञान की चोरी  करके।।


                        -2-

पढ़ते  थे  पहले कभी,गुटखा ध्यान  लगाय।

अब गुटखा खाने लगे, दाँतों तले   चबाय।।

दाँतों  तले   चबाय ,थूकते खैनी      चुनही।

ज्यों घुन खाता काठ,जुटे वे अपनी धुन ही।

'शुभम्' न डरते लोग , राह कर्कट की चढ़ते।

बूढ़े,बालक ,युवा , नहीं अब गुटखा   पढ़ते।।


                        -3-

पीना  नहीं  पसंद  है, नवजातों  को   दूध।

चुसनी में अब चाय है,भावे तनिक न ऊध।।

भावे तनिक न ऊध,विकृत मति माती माता।

रुकती  नहीं  शराब,पुत्र झोला भर  लाता ।।

'शुभम्' सुरा का दौर,इसी से मरना - जीना।

बोतलवासिनि अंक लगाए, ढंग  से  पीना।।


                        -4-

होती है शुभ भोर की,नई किरण जब लाल।

चार  बाँस सूरज चढ़े,उठता पूत  निहाल।।

उठता पूत निहाल,करे मदिरा से   कुल्ला।

करता है बहु शोर, जगाता सभी  मुहल्ला।।

'शुभम्' देख शुभ रंग, बैठकर  मैया  रोती।

छिद्र हुआ जलयान,भाग्यलिपि उलटी होती।


                        -5-

दारू  पीकर  नाचना ,बहुत जरूरी  आज।

ठुमका  लगे   बरात में,बने हुए  सरताज।।

बने  हुए सरताज,न टुकड़ा मुँह में  जाए।

पहले  पीना  खूब,बाद  भोजन  सरकाए।।

'शुभम्' आज की रीति, खजाना पाया कारू।

हुआ  नशे  में  चूर, मिली अंगूरी      दारू।।


🪴शुभमस्तु !


११.०५.२०२२◆३.००

पतनम मार्तण्डस्य।

प्यासी गौरैया 🐥 [बाल कविता]

 

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✍️ शब्दकार©

🐥 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सूख  रहे  सब  ताल -तलैया ।

प्यासी  भटक  रही   गौरैया।।


आसमान   से    बरसें   शोले।

मरते  प्यासे    पंछी    भोले।।


गरम  तवे - सी  तपती धरती।

निकली चिड़िया डर -डरती।।


दाना - दुरका  चुगने  निकली।

चिड़िया ने जब देखी तितली।


नहीं   दिखाई     देता   पानी।

कौन मिलेगा जल का दानी।।


मिली एक  तब   टूटी   छानी।

बैठ   छाँव   में  गई  सयानी।।


प्राण   बचें   कैसे    अब  मेरे।

सुप्त  पड़े    हैं   पेड़   घनेरे।।


टपक  रहा था नल पर पानी।

प्यास यहीं अब मुझे बुझानी।


कोशिश तनिक काम तो आई

टोंटी   ठोंकी   चोंच   बजाई।।


कर्ता ने  शुभ   उक्ति   सुझाई।

गौरैया  ने    प्यास    बुझाई।।


🪴 शुभमस्तु !


११.०५.२०२२◆१२.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।


वृक्षों की छाँव में 🌳 [ दोहा ]


   [वृक्ष,पत्ते,जड़ें, फल,शाख ]

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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        🪷 सब में एक 🪷

वृक्ष धरा के ओज हैं,वृक्ष अवनि -  शृंगार।

करते हैं इस सृष्टि का,सदा सृजन  साकार।।

पाँच  अंग हैं वृक्ष के,  करें मौन    उपकार।

देते  हैं  वे  फल  सदा, यद्यपि सहें    प्रहार।।


पाकड़   पादप    के  घने, पत्ते    छायादार।

पथिकों को दें शांति का, पावन शुचि उपहार

मन मानव का थिर नहीं,ज्यों पीपल का पात

पत्ते-पत्ते पर लिखा,काव्य अमल अवदात।।


सुदृढ़ हैं जिनकी जड़ें, विटप वही अनुकूल।

करते हैं  उपकार  वे, बरगद, आम,  बबूल।।

जड़ें समाई  भूमि में,तरु को  कर   मजबूत।

अहंकार   से  दूर  हैं,  जीवन से      संभूत।।


कर्मों केअनुसार ही, फल का है   परिणाम।

नतमस्तक संसार है, करता प्रमन   प्रणाम।।

वपन निबौली बीज से,फल भी  वैसे   मीत।

स्वाद कटुक मिलना सदा,यही जगत की रीत


शाख-शाख क्यों सींचता, सींच मीत तू मूल।

पुष्पित होगा तरु सदा,तन- मन के अनुकूल।

उल्लू  हो  हर शाख पर, उजड़ेगा    उद्यान।

उसे न धी से काम है,शयन मात्र   ही  शान।।


     🪷  एक में सब  🪷

शाख,फूल,फल वृक्ष के,

                 आवश्यक    शुचि  अंग।

जड़ें, तना,पत्ते सभी,

                      महकाते   शुभ  रंग।।


🪴 शुभमस्तु !


११.०५.२०२२◆७.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 6 मई 2022

निदाघी ताप 🪸 [ दोहा ]

 

[सूरज, धरती ,गगन, पारा ,पखेरू ]

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✍️शब्दकार ©

🪸 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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        🪹 सब में एक 🪹

सूरज से संसार में, ज्योतित दिव्य प्रकाश।

किरण जहाँ जाती वहाँ, करता तम का नाश

सूरज से बोली  उषा,धर गालों    पर   हाथ।

उठो चलो आगे  बढ़ो,  उठा गगन में  माथ।।


धरती माता धारिणी, धरती अपनी   गोद।

जीव,जंतु, नर , नारियाँ, करते हैं  आमोद।।

पंच  भूत  में  एक है, धरती अपनी    नेक।

अन्न,फूल, फल दे  रही,सेवा ही नित  टेक।।


नील गगन कहता यही, बढ़ा विशद विस्तार।

हे  मानव ! ऊपर बढ़ो, करते हुए   निखार।।

निर्मल हो मन  आपका,जैसे गगन    अनंत।

भावलोक में जा रमो,कर इच्छा   का  अंत।।


ज्यों  निदाघ  ऊपर बढ़े,बढ़ता जाए ताप।

पारा ऊपर जा रहा, बना नीर  का  भाप।।

अपनी सीमा पार कर,जाना उचित न मीत।

नीचे ही पारा रखें,कर निज मन को शीत।।


भोर  हुआ  बाहर  उड़े, छोड़ पखेरू  नीड़।

चहचह  के संगीत में, शोभनीय  खग भीड़।।

प्राण - पखेरू  देह में,करता  कहाँ निवास।

जान न पाया जीव ये,जल जाता ज्यों घास।।

  

        🪹 एक में सब 🪹

सूरज से धरती तपी,

                       बढ़ा गगन का     ताप।

दुखी पखेरू ताप से,

                         बढ़ता  पारा     नाप।।


🪴शुभमस्तु!

०४.०५.२०२२◆ ७.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

सजल 🪷


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समांत : आर।

पदांत : चाहिए।

मात्राभार :16.

मात्रा पतन:शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हर  मानव   को प्यार चाहिए।

जीने  का    आधार  चाहिए।।


समाधान    संग्राम    नहीं   है,

सुदृढ़  नव  सुविचार  चाहिए।


सभी चलें अपने सत पथ पर,

सबको यह अधिकार चाहिए।


जंगल का कानून उचित क्या,

नहीं जगत  को   रार चाहिए।


मत झटको आमों  की डाली,

बाग  हमें   फलदार  चाहिए।


तूफानों  में  राह  न  मिलती,

श्रम   सेवित  संसार चाहिए।


'शुभम्' खड़े हों निज पैरों पर,

जन- जन को उपहार चाहिए।


🪴शुभमस्तु !


०२.०५.२०२२◆५.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...