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शनिवार, 10 अगस्त 2024

बूँद [बाल कविता]

 338/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 नन्हीं -   नन्हीं    बन    गिरती   हूँ।

बादल  से     बुँदियाँ    बनती   हूँ।।


नहीं   धार   बन     गिरता   पानी।

कण - कण   टूट     बने  बर्फानी।।


कहते   सभी  लोग    जल  बरसा।

देख -  भींग  मन   सबका  हरषा।।


सह   पाता   कब     धारा   कोई।

बूँद   बना     धरती     पर    बोई।।


नभ  मेघों   से     बाहर     आती।

समझ न  अपनी   गति  मैं पाती।।


खेत  वनों     ऊसर    में   गिरती।

सरिता सीपों     बीच   विचरती।।


कभी   धूल में    गिर    जाती  हूँ।

 मोती भी  बनती     स्वाती    हूँ।।


केले   में      चंदन    मैं    बनती।

कभी सर्प विष   बन कर डसती।।


वृक्ष   -  मूल   में   अमृत  भरती।

जीवन     देकर    मैं  तब तरती।।


'शुभम् ' बूँद   की अकथ कहानी।

वर्षा ऋतु     का    अमृत  पानी।।


शुभमस्तु !


08.08.2024●1.30प०मा०

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बुधवार, 8 जून 2022

गर्मी आई 🌤️ [ बाल कविता ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🌤️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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क्या -क्या लाई

गर्मी आई।


खीरा ककड़ी है

खरबूजा,

लाल  -  लाल 

मीठा तरबूजा,

लँगड़ा आम 

दशहरी  लाई,

गर्मी  आई।


मथती दधि को

छाछ बनाती,

अम्मा लौनी

हमें खिलाती,

भैया ने 

लस्सी बनवाई,

गर्मी आई।


बहता तन से

नित्य पसीना,

कठिन हो गया

अब तो जीना,

अच्छी ठंडी

लगे मलाई,

गर्मी आई।


फ़ालसेव 

जामुन भी प्यारे,

देती  अम्मा 

दूध छुहारे,

बदली नहीं

अभी तक छाई,

गर्मी आई।


ठेले पर हम

जब भी जाते,

हमें संतरे 

 बहुत लुभाते,

उनकी अब

हो रही विदाई,

गर्मी आई।


🪴 शुभमस्तु !

०८ जून २०२२ ◆ ५.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 12 मई 2022

प्यासी गौरैया 🐥 [बाल कविता]

 

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✍️ शब्दकार©

🐥 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सूख  रहे  सब  ताल -तलैया ।

प्यासी  भटक  रही   गौरैया।।


आसमान   से    बरसें   शोले।

मरते  प्यासे    पंछी    भोले।।


गरम  तवे - सी  तपती धरती।

निकली चिड़िया डर -डरती।।


दाना - दुरका  चुगने  निकली।

चिड़िया ने जब देखी तितली।


नहीं   दिखाई     देता   पानी।

कौन मिलेगा जल का दानी।।


मिली एक  तब   टूटी   छानी।

बैठ   छाँव   में  गई  सयानी।।


प्राण   बचें   कैसे    अब  मेरे।

सुप्त  पड़े    हैं   पेड़   घनेरे।।


टपक  रहा था नल पर पानी।

प्यास यहीं अब मुझे बुझानी।


कोशिश तनिक काम तो आई

टोंटी   ठोंकी   चोंच   बजाई।।


कर्ता ने  शुभ   उक्ति   सुझाई।

गौरैया  ने    प्यास    बुझाई।।


🪴 शुभमस्तु !


११.०५.२०२२◆१२.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।


सोमवार, 28 मार्च 2022

हेंचू जी उवाच 🐎 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🐎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हेंचू  जी   हय    से   सतराये।

आँख   दिखाते   वे    गुर्राए।।


'घोड़ा   जी   तुम   गर्दभवंशी।

एक सदृश हम सब के अंशी।


हमसे अलग -थलग रहते हो।

उच्च अंश का क्यों कहते हो?


हम   दोनों   हैं   भाई -  भाई।

क्यों ऊँची निज जाति बताई?


छोटा कद   हमने  यह माना।

भैया   बड़ा   तुम्हें  है जाना।।


फिर भी तुम  इतने  इठलाते!

ताँगे   में   जुड़कर   इतराते।।


दूल्हे   को   ऊपर  बिठलाते।

हमको अपनी आँखदिखाते।'


घोड़ा बोला  'अनुज    हमारे।

तुम हो गर्दभ  हृदय- दुलारे।।


काम हमारा  अलग  बँटा है।

इससे कद क्या कभी घटा है!


मन से 'शुभम'काम निबटाओ

श्रमिक जंतु की पदवी पाओ।'


🪴शुभमस्तु !

२८.०३.२०२२◆११.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

रविवार, 27 मार्च 2022

लोटाधारी 🐇 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

⚱️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गए    खेत     में    लोटाधारी।

लोटा  लिए   हाथ   में भारी।।


ढूँढ़ी  आड़  झाड़   की  कोई।

मूँज  मेंड़ पर थी   बिन बोई।।


वहीं  जुगत  करने  की ठानी।

लोटा  रखा भरा   था  पानी।।


झाड़ी  में  खरगोश  एक  था।

हर आहट पर वह सचेत था।।


आहट सुनकर  बाहर  भागा।

सोते   से  मानो  वह जागा।।


लुढ़क गया पानी  का  लोटा।

भागा निकल शशक जो मोटा।


भौंचक     भारी    लोटाधारी।

व्यर्थ शौच   की सब तैयारी।।


लोटा   उठा    शीघ्र  वे  धाए।

कल से झट लोटा  भर लाए।।


🪴 शुभमस्तु !


२७.०३.२०२२◆६.३०

पतनम मार्तण्डस्य।

रविवार, 20 मार्च 2022

बैंगन जी की सगाई 🍆 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🍆 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बैंगन   जी  की   हुई   सगाई।

भिंडी  जी  ने  खुशी  मनाई।।


मन  ही  मन   आलू   गुर्राया।

कैसे    इसने   उसे   पटाया।।


मुझसे   दूर  -  दूर   रहती थी।

मुझसे वह  भैया कहती थी।।


गुपचुप बैंगन  पोट  लिया है।

धोखा   मेरे   साथ किया है।।


मैं  गोरा   वह   बैंगन  काला।

सिर पर  चोटी  रखने वाला।।


भिंडी  बोली  चुप  रह आलू।

उनको मत तुम कहना कालू।


उनके सिर पर मुकुट सोहता।

जो देखे वह सहज  मोहता।।


मैं   बैंगन  जी  की   दीवानी।

उनसे  ही शादी   की  ठानी।।


देख  मुझे  भी  आलू   भैया।

बैंगन जी  अब   मेरे   सैंया।।


भैया  भात    हमें   पहनाना।

सँग  में लाल  रतालू  लाना।।


उनको 'शुभं' न कुछ भी कहना।

मैं  उनके  जीवन    का गहना।।


🪴 शुभमस्तु !


१९.०३.२०२२◆२.३० पतनम मार्तण्डस्य।

शनिवार, 12 मार्च 2022

आया फागुन 🎊 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🎊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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आया      फागुन।

अति मनभावन।।


होली         खेलें।

रँग  भी    ले लें।।


पंक    न   डालें।

रंग       उछालें।।


ले     पिचकारी ।

मारें        धारी।।


महके      चंदन।

कर   लें  वंदन।।


बजें      मजीरे।

धीरे  -    धीरे।।


फूल   खिले  हैं।

गले   मिले   हैं।।


सब     फगुनाए।

धूम      मचाए।।


🪴 शुभमस्तु !


११.०३.२०२२◆६.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

होली आई 🎊 [बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🎊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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होली    आई ।

रँग भर  लाई।।


चुन्नू    आओ।

चंदन  लाओ।।


अपनी   टोली।

खेले     होली।।


फ़ाग     सुनाएँ।

मिलजुल गाएँ।।


ढप जब बजता।

ढप -ढप करता।।


बजें       मजीरे।

धीरे      -  धीरे।।


ढोलक    बोली।

खेलें      होली।।


सब    हमजोली।

लें   रँग    रोली।।


कविता     आई।

गुड़िया     आई।।


हेमा        दुबकी।

ज्योती   मटकी।।


साईं        आओ।

क्यों    शरमाओ!!


भारत      भैया ।

ला पिचकरिया।।


खुशी    बुलाती।

छाया     आती।।


कहाँ     जानवी।

मैं न    जानती।।


अमोल    आया।

ओशी     लाया।।


खाय     मिठाई।

होली     आई।।


🪴 शुभमस्तु  !


२२.०२.२०२२◆ ७.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

सूरज -चाँद 🌕 [ बाल कविता ]


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✍️शब्दकार ©

🌞 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सूरज  के हिस्से  दिन  आया।

निशि-अँधियारा शशि ने पाया।


सूरज   देता   तेज    उजाला।

चमकाता चंदा   तम  काला।।


संग उषा   के   सूरज  आता।

साथ  चाँदनी  चाँद  सुहाता।।


डरते   सूरज   चाँद   अकेले।

चलते सँग में  नारी ले -  ले।।


उषा विदाकर रवि को जाती।

साथ चाँदनी सदा  निभाती।।


अँधियारे  से    सूरज   डरता।

अतः उषा का सँग वह करता।


किंतु औऱ  भी   डरता   चंदा।

चले  चाँदनी  के  सँग   मंदा।।


उदय काल से साथ  निभाती।

उगती भोर-किरण तब जाती।


सूरज जब  अस्ताचल  जाता।

चंदा  उदयाचल  पर  छाता।।


 🪴शुभमस्तु  !


१७.०२.२०२२◆४.३०

पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 25 जनवरी 2022

मोहक सूरजमुखी 🦋🌻 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सूरजमुखी  खिले  हैं   न्यारे ।

सुमन बहुत ही लगते  प्यारे।।


भीने - भीने  महक   रहे   हैं।

मधुमक्खी ने वचन कहे  हैं ।।


'तुम कितनी मोहक लगते हो

मौन मूक बनकर सजते हो।।


'ताजा मधुरस  हमें   पिलाते।

छत्ते  में  हम  शहद   बनाते।।


'स्वागत तुम वसंत का करते ।

उड़ने की  थकान  को  हरते।


'हिलो नहीं  रस  पी   लेने दो।

हमको  भी हित कर देने  दो।


'जीवन  है  उपकारी  अपना।

यही  हमारे  तप  का  तपना।


'तुम भी तो पर - उपकारी हो।

'शुभम'खिलेअपनी क्यारी  हो।'


🪴शुभमस्तु !

२५.०१.२०२२◆१२.१५पतनम मार्तण्डस्य।


देश का गौरव तिरंगा 🇮🇳 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आ   गया   है   शुभ   तिरंगा।

देश  का     गौरव     तिरंगा।।


बलिदान    का   रँग   केसरी,

शांति का  सित  रँग   तिरंगा।


लहलहाती    फसल     जैसा,

हरित     लहराता      तिरंगा।


शान ध्वज  की  कम  न होवे,

तन खड़ा   भू   पर    तिरंगा।


नोंच लें  वे   आँख  अरि  की,

देखता   जल    कर   तिरंगा।


गणतंत्र   गायन   कर    रहा ,

भा  रहा   नभ  पर    तिरंगा।


सत 'शुभम'  सम्मान  उर  में,

भारती   का   प्रण     तिरंगा।


🪴 शुभमस्तु !


२४.०१.२०२२◆१.४५

पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

गधा -व्यथा 🦄 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🍁 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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घोड़े   का   कुल वंश हमारा।

फिर भी कहे गधा जग सारा।

रंग- रूप    में  घोड़े    जैसा।

फिर भी मान न पाता  वैसा।


जाकर  घूरे  पर  भी  चरता।

अपना उदर घास से भरता।।

सूखी, हरी  घास  जो  पाऊँ।

खाकर अपनी भूख  पुराऊँ।।


जब अपनी मस्ती में  आता।

ढेंचू - ढेंचू   स्वर  में   गाता।।

सदा विनत  मुद्रा  में   रहता।

दार्शनिकों -सा भाव उभरता।


बहुत निठुर है मालिक  मेरा।

लादे   भार   पीठ  बहुतेरा।।

फिर भी नहीं,नहीं मैं करता।

मालिक के  डंडे  से डरता।।


मंद बुद्धि  के जो  नर  होते।

मानव उनको  कहते  खोते।।

जो गर्दभ -  पदवी  के धारी।

गधा -योनि के नर अवतारी।।


सीधे - साधे    भोले - भाले।

कहलाते  वे   गधे   निराले।।

तोष-शांति  का  मैं हूँ  वाहक।

खाता फिर भी चाबुक घातक।


मालिक की घरनी का गुस्सा।

पड़े पीठ पिटना, हो फुस्सा।।

बाहर   जैसा    भीतर   वैसा।

चाहे  कोई  कह   ले   कैसा।।


मुझको छल-प्रपंच कब आता!

नहीं किसी का पथ भटकाता।

लोक - कहावत  बनी हमारी।

'शुभम' गधे की करते ख्वारी।


🪴 शुभमस्तु!


११.०१.२०२२◆३.००

पतनम मार्तण्डस्य।

बच्चा -बच्ची वीर बनेगा।👮‍♂️ [बाल कविता ]

  

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✍️ शब्दकार ©

👮‍♂️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बच्चा   -   बच्ची       वीर   बनेगी।

दुश्मन     को     शमशीर  तनेगी।।


हम     आगे     बढ़ने     वाले   हैं।

हम  तलवार,    तीर,    भाले   हैं।।


ऊँचा      रहे      तिरंगा     प्यारा।

आन - बान     है    वही  हमारा।।


शान   न      इसकी    जाने  देंगे।

जान  शत्रु    की   हम    ले  लेंगे।।


दृष्टि    अगर    टेढ़ी     जो करता।

करनी  का   फल  ही  वह भरता।


अपना     देश    हमें     है  प्यारा।

देता    है    संबल     नित  न्यारा।।


पहले   हमको    लिखना- पढ़ना।

फिर    हमको    आगे   है   बढ़ना।।


सदा    प्रगति    करनी    है  हमको।

हमें    मिटाना  है  हर   तम को।।


'शुभम'चरित निज उज्ज्वल करना।

यही  ध्येय    निज   उर   में धरना।।


🪴 शुभमस्तु !


११.०१.२०२२◆८.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


सोमवार, 10 जनवरी 2022

मेरी बैंक:मेरी गुल्लक 🏮 [बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏮 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गुल्लक  है  धनवान   हमारी।

लाल -लाल माटी की प्यारी।।


बाहर - भीतर    नोट  भरे  हैं।

नीले , पीले  , लाल ,  हरे  हैं।।


सिक्कों से खन-खन बजती है

बचे  हुए  धन से  ठुसती  है।।


गुल्लक घर की  बैंक  हमारी।

होती  जाती  है  नित  भारी।।


सिक्के एक, पाँच या दस के।

घेर   पड़े  हैं  बाहर   उसके।।


जब  भी  आवश्यकता  होती।

खुशियों से मुखअपना धोती।


गुल्लक   एक भरे  जब  मेरी।

ले  लूँगा  मैं   फिर  बहुतेरी।।


मेरी  अपनी    बैंक  निराली।

'शुभम'बजाएँ जी भर ताली।।


🪴 शुभमस्तु !


०८.०१.२०२२◆११.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।


मंगलवार, 4 जनवरी 2022

राम - कहानी 🛕 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बड़ी  पुरानी  राम  -  कहानी।

नगर अयोध्या   सीता  रानी।।


पिता राम के  दशरथ   राजा।

बजता धीर- वीर का बाजा।।


कौशल्या  के  सुत  व्रतधारी।

सुता कौशलाधीश सु  नारी।।


कैकई  औऱ  सुमित्रा  माता।

माता  जैसा   उनसे  नाता।।


पितुराज्ञा प्रिय  सुत ने मानी।

फिर आगे बढ़ चली कहानी।।


सँग  सीता वनवास सिधाए।

वन में संकट   भारी   पाए।।


चुरा ले गया  रावण  सीता।

बुरा समय आपद में बीता।।


रावण मार  राम   घर आए।

घर - घर मंगल मोद मनाए।।


राजा हुए राम,   सिय रानी।

फिर आगे बढ़ चली कहानी।


'शुभम' बताई  राम -  कहानी।

नित्य  नई  है   भले  पुरानी।।


🪴 शुभमस्तु !

०४.०१.२०२२◆१.००

पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

तुलसी -पूजा 🪴 [ बाल कविता ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🪴  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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माँ    तुलसी     की    पूजा  करती।

सुबह - शाम    घी - दीपक रखती।।


पहले   जल     से    स्वयं  नहाती।

फिर    वह   तुलसी   को नहलाती।।


बिछुआ  ,     चूड़ी      भी पहनाती।

लाल    चुनरिया    उन्हें    उढ़ाती।।


रोली   से      तुलसी     सज जाती।

फिर     माँ      बत्ती    धूप जलाती।।


फूलों    की    माला     भी    डाले।

छूकर   सिर   से   उसे     लगा ले।।


परिक्रमा     गिन- गिन  कर होती।

दिखलाती    दीपक     की ज्योती।।


पूजा     का    प्रसाद    हम   पाते ।

'शुभम'   आरती - मिल- जुल गाते।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.१२.२०२१◆११.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।

रविवार, 19 दिसंबर 2021

गरम रजाई 🍀 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गरमाती   है    नरम    रजाई।

सोने  में    लगती   सुखदाई।।


शीतलता  जाड़े  की   हरती।

अब दादी क्योंऔर ठिठुरती।।


दिन  में  धूप    सेंकती  दादी।

संध्या  से  ही   ऊपर  लादी।।


माँ  के  सँग में  मैं सो जाता।

मिलती शांति तोष मैं  पाता।।


झबरी  म्याऊँ भी  घुस  जाती। 

ठंड उसे  भी   बहुत  सताती।।


ओढ़ें  अलग   रजाई   पापा।

अगियाने  पर   टॉमी  तापा।।


माँ ने   रोज   धूप   दिखलाई।

तब देती  सुख  गरम  रजाई।।


मोटा    गद्दा   लगता    ऊनी।

लगी   हुई  ज्यों  धीमी धूनी।।


रुई    रजाई      में    भरवाई।

इसीलिए       देती   गरमाई।।


'शुभम' न सिंथेटिक भरवाना।

पड़ता  है हमको समझाना।।


🪴 शुभमस्तु !


१९.१२.२०२१◆९.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

धूप को ज़ुकाम 🌆 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌆 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हुआ    धूप     को    तेज जुकाम।

नाक     टपकती      प्रातः  शाम।।


छिपता   सूरज    गुम   हो  जाती।

भोर      हुई     आती   शरमाती।।


ओढ़      रखी   कुहरे    की चादर।

बादल  से    लगता    भारी  डर।।


पेड़ों   से   जल   टप  - टप  बरसे।

धूप        सेंकने        छाया  तरसे।।


डर- डर  कर   तितली   है आती।

बैठ  सुमन   पर   झट  उड़ जाती।।


दादी        बैठी      ओढ़    रजाई।

दही      बिलोतीं     अम्मा   ताई।।


धूप      कुनकुनी     सबको भाती।

पिलिया     उछले      कूद लगाती।।


भूसे  में       छिप    बिल्ली ब्याई।

करते     बच्चे     म्याऊँ   -  म्याई।।


बतखें,     मुर्गी,       मुर्गे     धाए।

भोजन     कचरे    में  वे  पाए।।


धूप  जगी    उठ    दुनिया  जागी।

'शुभम '    अलसता   पूरी  भागी।।


🪴 शुभमस्तु !


११.१२.२०२१◆८.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

हमारा भारत ☘️ [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अद्भुत  अनुपम     भारत प्यारा।

बहती       पावन     गंगा   धारा।।


यमुना    सरयू   नित   बहती  हैं।

कलरव    वे   करती    रहती हैं।।


उत्तर   में   हिमगिरि    है   प्रहरी।

झीलें   जिसमें      शीतल  गहरी।।


हिंद    महासागर      दक्षिण    में ।

 बसते   ईश्वर  हर  कण - कण में।।


मैदानों       में       फ़सलें      झूमें।

पवन   बालियों     के     मुख  चूमें।।


गेहूँ,      चना,         धान   लहराते।

नाच     रहे         लगते    मदमाते।।


वेश     अनेक      रूप    रँग   वाले।

नर -  नारी       हैं         बड़े निराले।।


सबको    लगती        हिंदी  प्यारी।

यद्यपि      हैं       भाषाएँ    न्यारी।।


षट    ऋतुओं     का   देश हमारा।

अपना  भारत     जग    से न्यारा।।


हम   करते      नित   भारत वंदन।

महके  'शुभम'     हवा    में चंदन।।


🪴 शुभमस्तु !


०३.१२.२०२१◆७.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।


रविवार, 28 नवंबर 2021

आसमान में तारे ✨ [बाल कविता ]

 

★★★★★★★★★★★★★★★

  ✍️शब्दकार

✨ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

★★★★★★★★★★★★★★★

आसमान  में  टिमटिम   तारे।

लगते  नयनों को अति प्यारे।।


भानु रोज  अस्ताचल   जाता।

अँधियारा वह   लेकर आता।।


तारे   खेलें   आँख   मिचौनी।

लगते हैं मटकी   की  लौनी।।


सारी  रात    नहीं    सोते  हैं।

हँसते  सदा  नहीं   रोते    हैं।।


झलकें    जैसे    फूले   बेला।

बिखरा  है   अंबर   में  रेला।।


नदिया के जल के  उजियारे।

आसमान    के   सारे   तारे।।


सँग में    आते    चंदा  मामा।

पीला  पहने   हुए    पजामा।।


'शुभम' न दिन में वे दिख पाते।

जाने  कहाँ    चले   सब जाते।।


चमक   रहे  वे  अद्भुत  न्यारे।

आसमान में झिलमिल तारे।।


🪴 शुभमस्तु !

२७.११.२०२१★९.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...