शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

किटकन्ना [ संस्मरण ]

 080/2026


               

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

उस समय मेरी अवस्था लगभग सात वर्ष की थी और वर्ष 1959 का ;जब मैं अपने खेल के  हमजोलियों के साथ पहली-पहली बार प्राथमिक पाठशाला ग्राम धौरऊ  में पढ़ने के लिए ले जाया गया। यों तो सहज ही मेरे मन में पढ़ने-लिखने और पाठशाला में जाने का कोई मन नहीं था;किंतु अनिच्छापूर्वक ही सही मुझे पढ़ने के लिए  जाना ही पड़ गया। यह अलग बात है कि कालांतर में मेरा मन वहाँ लग गया और दैनिक चर्या में साथियों के साथ ढलने लगा।मेरे हाथ में लकड़ी की हत्थेदार एक तख्ती जिसे हम पट्टी कहते थे,पकड़ा दी गई।जिन कोमल हाथों से मैं गेंद बल्ला और कंचा गोली खेलता था,उनमें लकड़ी की यह तख्ती जैसे एक बोझ ही हो गई। पर क्या करता,पढ़ना जो था। मेरे पिताजी अम्मा दादी और बाबा को मुझे पढ़ाना था न ! तो मेरी गाड़ी पढ़ाई की पगडंडी पर चल पड़ी ; अनिच्छा से ही सही ,पर चलने लगी।

पाठशाला जाने का रोज का वही एक ही क्रम था, सुबह उठो ,तैयारी करो ,पट्टी बस्ता सँभालो,दोपहर के खाने को एक कपड़े में पैक करो,बस्ते में रखो, लकड़ी की काली पट्टी को तवे की कालोंच से काला करो, काँच के हरे- हरे मोटे घोंटे से उसे चमकाओ उस पर सीतासरसों के नरम -नरम हरे -हरे पत्ते रगड़ो ,एक हाथ में पट्टी और एक कंधे पर बस्ते का झोला लटकाओ और चल पड़ो।

स्कूल में पहुँचकर टाट पट्टियों पर अपना स्थान ग्रहण करने के बाद जैसे ही प्रार्थना की घण्टी बजे ,पंक्तियाँ बनाकर एक के पीछे एक हाथ जोड़कर खड़े हो जाओ और  'वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जावें।' प्रार्थना को समवेत स्वर से गाओ और अंत में भारत माता की जय  और जय हिंद के नारे लगाकर अपने -अपने स्थान पर बैठ जाओ। इसके बाद मुंशी जी श्री अजंट सिंह जी कक्षा में आते और सभी बच्चों को किटकंनों पर इमला लिखने का आदेश करते। कितकन्ने कभी बड़े बच्चे और कभी स्वयं मुंशी जी बना दिया करते।बस पढ़ाई शुरू। जब लिख लिया जाता ,उसके बाद उसका निरीक्षण मुंशी जी करते और सुंदर लेख वाले बच्चों को शाबाशी देते ,पीठ थपथपाते। इमला के बाद गिनती और पहाड़े याद करने का आदेश होता ,जिसका पालन सभी बच्चे अनुशासित होकर करते। कभी -कभी हमें एक गोलाकार में बैठा दिया जाता ,उस समय एक छात्र कोई पहाड़ा या गिनती बोलता जाता और शेष बच्चे उसे एक स्वर में जोर-जोर से गीत जैसे स्वर में सुनाते। नित्य निरंतर पढ़ने-पढ़ाने का यही क्रम चलता था। लगभग दो बजे भोजनावकाश होता ,सभी बच्चे अपने साथ लाए हुए खाने को खोलते और इधर उधर बैठकर खा लेते। पानी पीकर पुनः अपने स्थान पर जाकर टाटपट्टी पर बैठ जाते।

भोजनावकाश के बाद लगभग डेढ़ घण्टे का समय बचता था। इस समय में कभी पीटी तो कभी गिनती पहाड़ों की पुनरावृत्ति तो कभी अन्य मनोरंजक कार्यक्रम कराए जाते। कभी -कभी अंत्याक्षरी भी कराई जाती। कभी- कभी पीटी में लेजम चलाना सिखाया जाता। इस प्रकार एक डेढ़ घण्टे का समय ज्यों ही पूरा होता ,एक बच्चा चार बजे की घण्टी टन -टन का जैसे ही बजाता ,सभी बच्चे खुश हो जाते और हल्ला गुल्ला करते हुए आजाद पंछी की तरह घर की ओर दौड़ पड़ते।

सप्ताह में शनिवार की सबको प्रतीक्षा रहती थी। उस दिन बालसभा का आयोजन होता था,जिसमें बच्चे गीत आदि से मनोरंजन करते ।उस समय विद्यालय के सभी शिक्षक भी उपस्थित रहते थे। यहाँ यह बता देना भी आवश्यक है कि हमारी प्रारंभिक कक्षाओं में बस्ते का कोई पाँच दस किलो का वजन नहीं होता था। उस समय कच्ची एक और पक्की एक दो प्रारंभिक कक्षाएं होती थीं,जिनको पार करके ही विद्यार्थी कक्षा दो में जाता था। उस समय एक पतली सी हिंदी की पुस्तक ,जिससे अक्षर बोध कराया जाता था और एक पतली सी आठ दस पन्नों की गिनती पहाड़ों की पुस्तक बस।कक्षा दो में जोड़ बाकी(घटाना) सिखाया जाता था। पट्टी छूटने लगती थी और उसका स्थान  पत्थर की स्लेट ले लेती थी। जिस पर एक कड़ी पेंसिल की बत्ती से लिखा जाता था। इसी पर जोड़ घटाने के प्रश्न हल किए जाते थे। तीसरी कक्षा में हिंदी गणित कृषि विज्ञान और कला की नोटबुक मिल जाती थी। पहाड़ा तो सदा ही हमारा साथी रहा ,जो गणित के प्रश्न हल करने में सहायक होता।हमने बीस से अधिक पहाड़े याद नहीं किए, आगे के गणित का काम उन्हीं से चलता रहा।गिनतियाँ सौ तक आती ही थीं ,बस इतने से ही गणित का काम हो जाता था।

पाँचवीं कक्षा उत्तीर्ण करने तक अंग्रेज़ी का कहीं दूर-दूर तक भी पता नहीं था। पहली बार छठी कक्षा से ही अंग्रेज़ी हमारी जानकारी में आई ,फिर तो संस्कृत,इतिहास,भूगोल, विज्ञान, जीव विज्ञान,कला ,कृषि विज्ञान  आदि  बहुत कुछ पढ़ा। किटकंनों की इसी सड़क पर चलकर आज तक की मंजिल तय की है। यद्यपि हम आजकल की नई पीढ़ी की तरह आधुनिक भले ही  न हुए हों , तथापि किसी भी जीवन मूल्य और किसी भी अर्थ में किसी तरह के  हीनताबोध से भी ग्रस्त नहीं हैं।पथरीली जमीन और गर्म रेत की तपन को भी इन पाँवों ने महसूस किया है और  इन हाथों ने हर ठंडे गर्म के ताप को भी झेला है। इस जीवन की यह कठोर सच्चाई है। जो मैंने अपने अतीत के किटकंनों पर चलकर बताई है।

शुभमस्तु ,

07.02.2026◆6.00आ०मा०

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किटकंनों की पगडंडी [ नवगीत ]

 079/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


डॉट पैन

तब न थी नोटबुक

किटकंनों की पगडंडी।


एक हाथ में

तख्ती लटकी

कंधे पर बस झोला

नाम मात्र की

तीन किताबें

चंचल था मन डोला

पहुँचे जब 

शाला में अपनी

किटकंनों की पगडंडी।


इमला और

सुलेख रोज का

काम यही जो करना था

समय मिले तो

खिलंदड़ी भी

लिखने से कब डरना था

मुंशी जी

गिनती रटवाते

किटकंनों की पगडंडी।


गा- गाकर

समवेत पहाड़े

बैठ गोल में रटते थे

बीच-बीच में

मुंशी जी भी

प्रश्न सभी से करते थे

जँचवाते

अपनी इमला को

किटकन्नों की पगडंडी।


शुभमस्तु ,


07.02.2026◆4.45 आ०मा०

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किटकन्नों पर चलकर आया [ नवगीत ]

 078/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बनी काठ की

श्यामल तख्ती

किटकन्नों पर चलकर आया।


अ आ इ ई

उ ऊ ए ऐ 

ओ औ अं अ: बारह आखर

क च ट त प

पंच वर्ग सब

य र ल   व ह    से   बढ़कर 

बावन की

संख्या कर पूरी

गिनती और पहाड़े लाया।


सूखी खड़िया के

किटकन्ने

चलती सरकंडे की कलमें

खड़िया घोल

दवातों में हम

रहते थे  रोजाना   हल में

एक- एक

अक्षर हम सीखे

अपनी मंजिल का पथ पाया।


जोड़-जोड़

अक्षर मात्राएँ

वाक्य बनाना आया जब से

भाषा ज्ञान 

दिया गुरुवर ने

कविता लिखना आई तब से

कृपा शारदा 

माँ की ऐसी

कविता का शृंगार सजाया।


शुभमस्तु,


07.02.2026◆4.00आ०मा०

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कितने बंधन जीव को [ कुंडलिया ]

 077/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

शादी   बंधन  प्यार  का,  बँधा  हुआ संसार।

नर-नारी  बँधते सभी, जब  यौवन का ज्वार।।

जब यौवन   का   ज्वार, ढूँढ़ते  उत्तम जोड़ी।

धन भी  लिया  उधार, मिले  बस सुंदर मोड़ी।

'शुभम्'   वंश   की  बेल,  बढ़ाएं  करें मुनादी।

मित्रो  चलो  बरात  ,   हमें   करनी   है शादी।।


                         -2-

बंधन  यह  संसार  का,मिले जदपि अनचाह।

किंतु   निभाना  ही  पड़े, बना  आप ही राह।

बना आप   ही  राह,  सहज  हो या पथरीली।

चलना    है  अनिवार्य, भले वह सूखी गीली।।

'शुभम्' कर्म  कर  मीत, बना बंधन को चंदन।

महके जीवन - गीत,जगत का अनुपम बन्धन।।


                         -3-

आया था  जब  कुक्षि में, जननी  के जब जीव।

बंधन   है   यह   कर्म  का, सुदृढ़   बनी जरीव।।

सुदृढ़  बनी  जरीव, भजन  प्रभु से वह करता।

मुक्त  करो  भगवान, जटिल  बंधन   के हर्ता।।

'शुभम्'  शृंखला   एक, कर्म की लेकर  धाया।

मानव  जीवन  नेक,  जटिल  बंधन   है आया।।


                         -4-

कितने बंधन  जीव  को, सुख-दुख के जो हेत।

कभी  शिखर  पर  जा  चढ़े,मिले  कभी भू-रेत।। 

मिले   कभी   भू -रेत,   नियंत्रण  एक न कोई।

तदपि    नहीं    है  चेत, जदपि   मर्यादा खोई।।

'शुभम्' जगत  जंजाल, हजारों मिलते फितने।

बंधन   अपने   काट,  मिले  जीवन में कितने।।


                         -5-

चाहे      अनचाहे      मिलें,   बंधन    है संसार।

देह  मिली  है  जीव   की,  करना   ही है  पार।।

करना  ही    है  पार,  कलपने    से  क्या होगा।

निज  इच्छा  से जीव,  बदल  क्या  पाए चोगा??

'शुभम्'   न  तजता  प्राण, कभी गाहे- अवगाहे।

निज   बंधन   को   भोग,  भले   चाहे अनचाहे।।


शुभमस्तु,


06.02.2026◆7.30आ०मा०

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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

कान को पकड़ें घुमाकर [ नवगीत ]

 076/2026


      शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कान को 

पकड़ें 

घुमाकर हाथ अपना।


चाल टेढ़ी

साँप जैसी 

लहर खाती

नृत्य की

हर भंगिमा को

जो लजाती

उचित होती

डगमगाती

बढ़ खुजाकर माथ अपना।


शब्द की

फुटबॉल से

तू खेलता जा

रूपकों को

घूर से ले

ठेलता जा

गीत में 

अपना 

बना कर पाथ अपना।


तू नए के 

नाम पर

खा छील छिलके

फेंक 

अंतरमाल 

सारी फाँक गिन के

बन जा

अमर भगवान

अनोखा नाथ अपना।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆3.15 प०मा०

                  ◆◆◆

जल रहे टायर पुराने [ नवगीत ]

 075/2026

     ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जल रहे

टायर पुराने

आँच से डरना नहीं है।


कह रहे 

वे चाँद सूरज

और सब तारे अधूरे

मात्र उनमें

रौशनी है

करकटों के अन्य घूरे

बात है

सच्ची खरी तो

साँच से  डरना नहीं है।


नव प्रयोगों

के लिए

वे  सचल शाला स्वयंभू

कोष वे

नव रूपकों के

कान में करते  कभी  कू

अगर हीरा

पास हो तो

काँच से डरना नहीं है।


दंभ इतना

और कोई

पालता मन में नहीं है

अन्य कह दे

गलत है सब

वे कहें सब कुछ सही है

आँधियों के

वे झकोरे

टांच से डरना नहीं है।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 2.15 प०मा०

                  ◆◆●

किटकंनों की सड़क [ नवगीत ]

 074/2026


            


©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


किटकन्ने की

सड़क कच्ची

है मुझे अपनी बनानी।


इधर भी

खिड़की खुली है

उधर दरवाजा खुला

कह रहा तू

आज क्यों फिर

पाँव इतना ही झुला

बन के

ठेकेदार  तुझको

बात ही  अपनी चलानी।


आंचलिकता

रूपकों का

है जखीरा पास मेरे

बन खुदा मेरा

न बंदे

जानता  दुर्भाव  तेरे

एक तू

सूरज नहीं है

धूप की तेरी कहानी।


हंकार की

फुंकार तेरी

सुन रहे हैं कान मेरे

ऑंख भी हैं

बंद तेरी

धी गई है तमस घेरे

गोल चक्कर में

भुलाया

उठ रही ऊपर जवानी।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 1.30 प०मा०

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...