गुरुवार, 11 जून 2026

शपथ बनाम कुपथ [ अतुकांतिका ]

 185/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शपथ से

शुरू हुआ सिलसिला

किस पथ पर 

जा पहुँचे

कोई नहीं जानता,

शपथ लेने वाला भी  नहीं।


शपथ लेना एक रस्म है

विवाह की वेदी पर

सात भाँवरों की तरह

भाँवर के भँवर में

वर भी गोते लगाता है

और वरनी भी,

कितना निर्वाह कर पाते हैं,

यह  आगामी वक्त ही जानता है ,

यही हाल शपथों का है,

शपथ खाकर 

कुपथ चला जाना आम बात है।


शपथ एक वचनबद्धता है,

कलयुग में  शपथ -निर्वाह 

सहज   नहीं 

एक वहम है,

एक औपचारिकता 

जो पूरी करनी पड़ी,

बिना इसके काम भी

नहीं चलने वाला।


निभाने वाले

बिना शपथ के भी निभाते हैं,

जिन्हें नहीं निभाना

वे इधर-उधर जाते हैं,

उचित यही है कि

अपने-अपने शर्ट या कुर्ते के

बटन खोलकर कर

अपने गरेबाँ में 

झाँक लिया जाए,

तो अपना वादा 

शायद याद आ जाए।


शपथ वह गङ्गा है

जिसमें चोर डाकू हत्यारे

गबनी साधु संत खास या आम

सभी गोते लगाते हैं,

 चलते रहते हैं अपने पथ पर

कभी नहीं पछताते हैं,

बने हुए उपदेशक

आई ए एस आई पी एस को

आँखें दिखाते हैं,

सतराते हैं,

ऊपर से इतराते हुए

अपना रॉब दिखाते हैं।


शुभमस्तु,


11.06.2026◆12.15प०मा०

                  ◆◆◆

धरते हैं अवतार प्रभु [ सोरठा ]

 184/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 कहलाया     अवतार,   ऊपर   से  नीचे गया।

धरती   पर   उपहार, राम  कृष्ण या  बुद्ध  हों।।

त्रेता    युग   में   राम, मूल  रूप  हरि विष्णु  हैं।

मथुरा   में   घनश्याम,द्वापर   में  हैं  कृष्ण   वे।।


धरती पर अति भार,जब-जब बढ़ता पाप का।

धरते    हैं अवतार,  प्रभु   तब   मानव रूप में।।

 नित्य    रचाएँ    रास,मानव   की  लीला करें।

 लें   अवतार सहास,राधा    के  घनश्याम जी।।


अवतारी    शुभ   रूप,  संत   विवेकानंद का।

 बना  मनुज  का भूप, दिव्य शुभद नर   देह में।।

रक्षक       प्राणाधार , भक्तों     के   भगवान हैं।

बदल देह   आकार,  लेते   हैं    अवतार वे।।


कहते   नहीं   महान, महापुरुष या  नारियाँ।

करें   प्रेम -रस   दान,   लेते   हैं  अवतार वे।।

जिनका   रूप विचित्र,प्रतिभाएँ  वे और ही।

मात-पिता सचरित्र,   चुनते  वे   अवतार को।।


और     उधर   वसुदेव,  मथुरा   में थीं देवकी।

जन्माधार   तवैव, चयन किया  अवतार को।।

लिया   राम अवतार,  कौशल्या के  धाम में।

कर्मों   का   उपहार,दशरथ  जीवन धन्य है।।


एक   अलग  इतिहास ,ईश्वर के अवतार का।

कभी यमक अनुप्रास,युग-युग में तद रूप वे।।


शुभमस्तु,


11.06.2026◆11.00आ०मा०

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अवतार [ दोहा ]

 183/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऊपर से    नीचे   गया,  कहलाया अवतार।

राम कृष्ण  या  बुद्ध हों,धरती पर उपहार।।

मूल रूप  हरि  विष्णु  हैं,  त्रेता  युग  में राम।

द्वापर  में हैं   कृष्ण  वे,मथुरा   में घनश्याम।।


जब-जब बढ़ता पाप का,धरती पर अति भार।

प्रभु   तब   मानव  रूप  में, धरते  हैं अवतार।।

मानव   की   लीला करें,  नित्य    रचाएँ रास।

राधा  के  घनश्याम  जी, लें   अवतार सहास।।


संत     विवेकानंद   का, अवतारी  शुभ रूप।

 दिव्य शुभद नर  देह में ,बना मनुज का  भूप।।

भक्तों   के    भगवान      हैं,  रक्षक प्राणाधार।

लेते     हैं  अवतार   वे,   बदल   देह आकार।।


महापुरुष    या   नारियाँ,   कहते नहीं महान।

लेते     हैं   अवतार   वे,  करें   प्रेम रस दान।।

प्रतिभाएँ   वे   और   ही, जिनका रूप विचित्र।

चुनते   वे   अवतार को,   मात-पिता सचरित्र।।


मथुरा    में थीं   देवकी,   और   उधर वसुदेव।

चयन     किया  अवतार को,जन्माधार तवैव।।

कौशल्या    के    धाम में,  लिया राम अवतार।

दशरथ    जीवन  धन्य   है,कर्मों  का उपहार।।


ईश्वर   के  अवतार का,एक अलग इतिहास।

युग-युग में तद रूप वे,कभी यमक अनुप्रास। 


शुभमस्तु,


11.06.2026◆11.00आ०मा०

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बुधवार, 10 जून 2026

दूर-दूर तक वीराना है [ गीत ]

 182/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूर -दूर तक

वीराना है

तपती धरा अपार।


तपे गगन में

ऊपर सूरज

बरस रही है आग

सूखे तरुवर

एक न पल्लव

शून्य सकल अनुराग

फटे नहीं 

बस होंठ धरा के

देह हो गई छार।


दिखती नहीं

एक भी चिड़िया

दिखे न कोई ढोर

नहीं कूकती

कोकिल तरु में

एक नहीं खग मोर

जेठ मास की

तपन भयंकर

मनुज गया है हार।


आशाओं पर

जीवन रक्षित

जीता है इंसान

लगे झड़ी 

पावस की मनहर

होगा सजल विहान

अमराई में

कोकिल बोले

खिले नील कचनार।


भर जाएँगे

ताल-तलैया

नदिया करे किलोल

टर्र -टर्र फिर

मेढक बोलें

रजनी में रस घोल

आषाढ़ी दौंगरे 

लुटाएँ

जन-जन को रस प्यार।


शुभमस्तु,


09.06.2026◆6.15 आ०मा०

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मिटा अँधेरे मन के काले [ गीतिका ]

 181/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिटा     अँधेरे     मन    के   काले।

बंद  पड़े     खोलो   सब     ताले।।


निज  मन में  उज्जवलता  भर लो,

हटें तमस    के     बढ़ते     जाले।


मन की    हर     निर्मलता  कहती,

गीत प्रेम     के    सस्वर    गा  ले।


सफल   वही      होता   जीवन  में,

कठिन  परिस्थिति  में  जो   ढाले।


नब्ज  समय  की  जान  मुसाफिर,

नहीं     पड़ेंगे      कड़े     कसाले।


जानें      कौन   पराया  - अपना,

मत  सबको निज मित्र   बना ले।


'शुभम्' आज  का काम आज कर,

नहीं  व्यर्थ में   कल    पर     टाले।


शुभमस्तु,


08.06.2026◆6.15 आ०मा०

                     ◆◆◆

निज मन में उज्ज्वलता भर ले [ सजल ]

 180/2026



समांत          :  आले

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिटा     अँधेरे     मन    के   काले।

बंद  पड़े     खोलो   सब     ताले।।


निज  मन में  उज्जवलता  भर लो।

हटें तमस    के     बढ़ते     जाले।।


मन की    हर     निर्मलता  कहती।

गीत प्रेम     के    सस्वर    गा  ले।।


सफल   वही      होता   जीवन  में।

कठिन  परिस्थिति  में  जो   ढाले।।


नब्ज  समय  की  जान  मुसाफिर।

नहीं     पड़ेंगे      कड़े     कसाले।।


जानें      कौन      पराया-अपना।

मत  सबको निज मित्र   बना ले।।


'शुभम्' आज  का काम आज कर।

नहीं  व्यर्थ में   कल    पर     टाले।।


शुभमस्तु,


08.06.2026◆6.15 आ०मा०

                     ◆◆◆

बदनाम [कुंडलिया]

 179/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

       

                        -1-

करना   मत वे   काम   जो,  करते हैं बदनाम।

रात-दिवस उज्ज्वल बनें,सुबह न बिगड़े शाम।।

सुबह न बिगड़े  शाम, सुकृत  में हृदय लगाना।

नहीं   कमाना   दाम,पाप  से बिगड़  न जाना।।

'शुभम्'   अमर है  कर्म,पड़ा करता फल भरना।

निर्मल   रखना   मर्म,  कर्म  खोटे   मत करना।।


                         -2-

होते    हैं  बदनाम  जो,करनी    से   हर बार।

खो   देते  विश्वास   को,  करते    नहीं विचार।।

करते    नहीं   विचार,  कर्म   करने   से पहले।

ऐसों    पर   ही   लोग, करें   नहले  पर दहले।।

'शुभम्'  कर्म  का  बीज, आप  ही  मानव बोते।

गुड़   पर   चींटे   रीझ, पंक   में   फँसते होते।।


                         -3-

मानव यह  सब   जानता,जीवन का करणीय।

मार   कुल्हाड़ी   पाँव  में,राह  बना वरणीय।।

राह  बना  वरणीय, भाड़  में  खुद  को झोंके।

अनुचित  को  भी जान, नहीं अपने को रोके।।

'शुभम्'    करे   दुष्कर्म,   बना  है  पूरा दानव।

नित्य  हुआ बदनाम,कहाँ अब सच्चा मानव।।


                         -4-

करता है  अपमान  जो,मात-पिता का नित्य।

होता है  बदनाम  भी, लिखता बद  साहित्य।।

लिखता  बद   साहित्य, बिगाड़े अपनी भावी।

बिगड़  गया  भवितव्य,फेंक दी घर की चावी।।

'शुभम्'   करे   दुष्कर्म,  बना   अपना संहर्ता।

डुबा   वंश  का  नाम,  बुरा अपना   ही करता।।


                         -5-

सबसे   श्रेष्ठ   महान   है,जीवन  में सत्कर्म।

वही  पुण्य   है  जीव का, वही  श्रेष्ठ सद्धर्म।।

वही   श्रेष्ठ  सद्धर्म, कभी बदनाम न करता।

रहे समुज्ज्वल मर्म, ओघ  अघ  सारे  हरता।।

'शुभम्'  सोच ले  आज, उठेगा ऊपर नभ से।

पर्वत   से   भी   उच्च, तनेगा   ऊँचा सबसे।।


शुभमस्तु,


05.06.2026◆11.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...