सोमवार, 22 जुलाई 2019

मैं प्याला [बाल गीत]

चीनी   मिट्टी  का मैं प्याला।
चिकना सुंदर रूप निराला।।

गर्म  चाय मैं रोज  पिलाता।
नहीं होठ मैं कभी जलाता।।
गर्म दूध   कॉफी  भी  पीना।
चैन तुम्हारा कभी न छीना।।
सुंदर   साँचे   में   मैं  ढाला।
चीनी  मिट्टी का ....

केओलिन   कहलाती मिट्टी।
जिससे   होती  मेरी   सृष्टी।।
चीनी मृदा का असली नाम।
सारी दुनिया   करे  सलाम।।
मैं  मजबूत  टिकाऊ  वाला।
चीनी मिट्टी का ....

केओलिन का जनक चीन है।
बने क्रोकरी  नित  नवीन है।।
भारत में   दिल्ली  या केरल।
कुंडारा बिहार हिल बेंगोल।।
पथरगटा राजस्थान निकाला।
चीनी मिट्टी ....

भंगुर हूँ  सँभाल के  रखना।
गर्म ताप से नहीं पिघलना।।
तरह - तरह  के रंग रूप में।
घर -घर में बदले स्वरूप में।।
रंग -बिरंगा   पीला   काला।
चीनी मिट्टी ....

💐 शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
🥣 डॉ. भगवत  स्वरूप 'शुभम'

विरहिन [विधा:सायली]

मटकी
मटक - मटक
सिर   पर     धर
पनघट  चली
घरनी।

रात
अँधेरी काली
कुंडी  खटका  रही
मिलन हित
प्रीतम।

 पायल
 बजी छमाछम
सास   जग   पड़ी
कैसे होगा
मिलन।

बोले
पिउ -पिउ
पपीहा  सावन मास
जलाए जियरा
बैरी।

कोयल
काला  कूके
कुंज  लता   द्रुम
याद  सताए
साजन।

सावन
बरसे सरसे
मन वृंदावन पावन
श्याम
न आए।

टपकी
स्वाती बूँद
सीप  मुख  खोले
सृजित मोती
होता।

चातक
प्यासा - प्यासा
स्वाति   बिंदु  कण
तृप्त हुआ
तन।

सावन
आया मनभाया
विरहिन निरत प्रतीक्षा
पिया  आएँगे
कब ?

बीती
लम्बी  अवधि
न  पावस  आया
अपना क्या
वश?

💐 शुभमस्तु!
✍रचियता ©
🦜 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

शनिवार, 20 जुलाई 2019

तुलसी इक्कीसी [दोहा]

तुलसी    बिरवा   रोपिये,
जो   चाहो  सुख - शांति।
औषधीय  गुण खान यह,
तनिक   नहीं  है भ्रांति।।1।

सर्दी     और   ज़ुकाम  में,
खाँसी     में       उपयोग।
श्वास  - रोग  तुलसी   हरे,
करे      देह      नीरोग।।2।

पूजनीय     तुलसी   सदा,
बिरवा       रोपो       गेह।
वायु  शुद्ध   घर   की करे,
बढ़े      परस्पर     नेह।।3।

तुलसी  माला  कर   गहो,
फेरो         सुबहो - शाम।
ग्रीवा   में    धारण  करो,
शांति मिले उर  धाम।।4।

श्वसन-क्रिया को खोलता,
वाणी      का     अवरोध।
अंत  समय  रस    डालते-
तुलसी  नहीं   विरोध।।5।।

वात   रोग   मूर्छा   वमन ,
कफ   की   औषधि मित्र।
वन तुलसी  हरती  जलन,
औषधि एक  विचित्र।।6।

पथरी में अति  लाभकर,
मूत्र    निस्सारक   होय।
सुख से प्रसव करा सके-
तुलसी सुख से सोय।।7।

यूगेनल   थयमोल   सम,
उड़नशील    बहु    तेल।
वन तुलसी   के घटक हैं,
देते     शांति   सुमेल।।8।


श्यामा  तुलसी  ज्वर हरे,
करे   दूर    पित     रोग।
रक्तदोष  कफ़  कोढ़ भी,
नहीं  करें  तन -भोग।।9।

मलेरिया   क्षयरोग    के,
मरते    सब      कीटाणु।
तुलसी की  सद्गन्ध  ही,
हरती  हर रोगाणु।।10।

हिचकी पसली -दाह में,
तुलसी    का   उपयोग।
नेत्रज्योति   में  वृद्धि  दे,
हरे  पित्त के रोग।।11।

  काया    में   थिरता  भरे,
'कायस्था'  है      नाम।
  तुलसी   तीव्र  प्रभावमय,
' तीव्रा' नाम सुनाम।12।

देवगुणों      का    वास  है,
'देव दुंदुभी'         नाम।
दैत्य   -    रोग     संहारती,
'दैत्यघि' 'शुभम' सुनाम।13।

मन     वाणी  औ'  कर्म से,
करती      सदा       पवित्र।
नाम  'पावनी' है शुभम,
'सरला ' भी यह मित्र।।14

 नारी     के    यौनांग   को ,
करती         निर्मल     पुष्ट।
'सुभगा' तुलसी  नाम है,
   है घर - घर  की इष्ट।।15।

निज    लालारस   से   करे,
सारी      ग्रंथि         सचेत।
'सुरसा' कहलाती शुभम,
तुलसी   मानव  हेत।।16।

देह     गेह    पल्लव    करें ,
पावन      जहाँ      निवास।
'पूतपत्री' भी    नाम   है,
तुलसी 'शुभम ' सुवास।।17।

तुलसी  सेवन   जब   करें,
दूध  न       लेना      पान।
चर्म  - रोग    गर्मी     बढ़े,
बात 'शुभम ' की मान।।18।

तुलसी-दल शिवलिंग पर,
नहीं       चढ़ाना     मीत।
ग्रंथों    में   ऐसा    लिखा ,
यही   पुरानी   रीत।।19।

तुलसी  शोभा    गेह  की,
पावन      करती      देह।
सद सुगंध   व्यापित करे,
बढ़े  शांति  उर  गेह।।20।

तुलसी      पौधा    रोपिये,
पावन     दिन      गुरुवार।
विष्णु  -प्रिया   कहते  इसे,
कार्तिक'शुभम'विचार।।21।

💐शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🌱 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

जल -चेतना [विधा:सायली]

पनघट
सूने -  सूने
क्या करती पनिहारिन
कूप  सूखते
सारे।

 भीड़
बढ़  गई
नल  पर भारी
क्या  करती
बेचारी।

दोहन
जल  का
बहा  रहा  तू
वृथा  क्यों
पानी।

लम्बी
लगी कतारें
डिब्बे बर्तन लेकर
नर  - नारी
आए।

समझें
 नीर महत्ता
प्यासा पत्ता -पत्ता
जल - संकट
भीषण।

सुधरो
हे  मानव!
जल -  चेतना  न
आई  तुझको
तरसेगा।

सावन
सूखे - सूखे
बिन पानी  सब
प्यासी - भूखी
जनता।

गौरैया
निज नीड़
न  बरसा  पानी
प्यासी -प्यासी
मरती।

सरसी
सर सारे
बिना सलिल सब
लीन प्रतीक्षा
हारे।

आँख
दिखाए बादल
डाँटें गरज -गरज
बिजली तड़पाए
गुस्साए।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
💦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

सायली की सायली [विधा : सायली]

'सायली'
नई विधा
काव्य की लोकप्रिय
विशाल  इंगले
जनक।

शब्द
दो शब्द
तीसरी में तीन
पुनः दो
शब्द।

मात्र
नौ शब्द
शब्द आधारित विधा
काव्य की
मराठी।

पँक्तियाँ
मात्र पाँच
कुल शब्द नौ
अद्भुत विधा
'सायली'।

पंक्क्ति
प्रत्येक पूर्ण
हाइकु की तरह
वाक्य तोड़
मत।

पढ़िए
ऊपर से
नीचे की ओर
अथवा विपरीत
क्रम।

बनाइए
हिंदी समृद्ध
'सायली' लिखें 'शुभम'
प्रयोग नवीन
कीजिए।

💐शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

आदर्शों की सुगंध [व्यंग्य]

   आदर्शों की मात्र सुगंध लेना हम चाहते हैं नाक भर। अपनाने की बात होती है बस ढाक के तीन पात भर।साधुओं से लेकर संसद तक, स्कूल से लेकर कॉलेज तक, घर से लेकर बाहर तक, कथावाचकों से लेकर उपदेशकों तक, देश से लेकर विदेशों तक :सर्वत्र एक ही ध्वनि सुनाई पड़ती है-आदर्श, आदर्श और आदर्श। ऐसा करो , ऐसा करना चाहिए। ऐसे रहो , ऐसे रहना चाहिए। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि कौन करे? पहले कहने वाले ही करके दिखायें न! -व्यक्ति देख सुनकर , जितना सीखता है, उतना किसी के कहने या उपदेश देने से नहीं सीखता! यह एक ऐसा कटु सत्य है , जिसके विषय में श्री तुलसीदास जी को भी लिखना पड़ा :
पर उपदेश कुशल बहुतेरे। 
जे आचरहिं ते नर न घनेरे। 
   जितना आसान किसी को यह कहना है कि ऐसा करो, उतना आसान स्वयँ अपने द्वारा किया जाना नहीं है। तभी तो कहा गया है:
कथनी मीठी खांड सी, 
करनी विष की लोय। 
कथनी तजि करनी करे, 
विष ते अमृत होय।।
   लेकिन इस बात की कहीं कोई परवाह नहीं करता कि कि हम कितना करते हैं! जब हम स्वयं नहीं करते तो हमारे कहने का सामने वाले पर क्या असर पड़ सकता है? लेकिन हम हैं कि कहकर अपनी जीभ की खुजली भर मिटा लेते हैं, औऱ कहने के लिए कहकर अपने कर्तव्य की इतिश्री ही कर लेते हैं।परिणाम मात्र शून्य ही रहता है।
   एक शिक्षक महोदय अपनी कक्षा में बच्चों को सिगरेट नहीं पीने की सलाह देते थे, लेकिन कक्षा के बाद स्वयं कोने में जाकर जमकर धुआँ उड़ाते थे। एक दिन किसी छात्र ने उन्हें धुआँ उड़ाते हुए देख लिया , फिर क्या अगले दिन से उपदेश बंद! क्योंकि उसी छात्र के द्वारा टोके जाने का भय जो था। इसी प्रकार यदि हमारे मंत्री , सांसद , विधायक, अधिकारी, उपदेशक , साधु- संत, कथावाचक, भागवत वाचक, अपना सुधार कर लें , तो समाज औऱ देश को सुधारने की भाषणबाजी नहीं करनी पड़ेगी। पर आख़िर वे अपनी भाषणबाजी बंद क्यों करें? क्योंकि यही तो उनकी रोजी - रोटी का मज़बूत आधार - कार्ड है।यदि समाज औऱ देश सुधर ही गया तो एक दिन उनकी आवशयकता ही समाप्त हो जाएगी ! फिर उन्हें भला पूंछेगा कौन? जब मरीज बने रहेंगे , तभी तो डाक्टर के महत्व का पता रहेगा। ये सभी उपदेशक समाज और देश के ऐसे डाक्टर हैं , जो कभी नहीं चाहते कि व्यक्ति ,देश औऱ समाज सुधरे! उनका काम केवल और केवल भाषण करना भर रह गया है। 'ज्यों-ज्यों दवा की, त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया।' वाली स्थिति है। रामायण पढ़- सुनकर न तो कोई राम हुआ , न सीता न भरत न लक्ष्मण। पर घर -घर रावण दर - दर लंका, इतने राम कहाँ से लायें। विभीषणों औऱ शूर्पणखाओं की कोई कमी नहीं है। भागवत सुनी , पर कभी नहीं गुनी। इस कान सुनी ,उस कान चली। सबने यही कहा कि ऐसा करना चाहिए। राम , कृष्ण, सीता, लक्ष्मण , भरत स्वामी विवेकानन्द , महात्मा गांधी आदि सबने अपने कृतित्व से करके दिखाया। पर हमने केवल दूसरों को सिखाया कि राम बनो, सीता बनो, स्वयं कभी अपने चरित्र में रामत्व औऱ सीतात्व का उद्भव नहीं होने दिया। स्वयं वही बने रहे , जो थे। औऱ कसम खाली कि हम नहीं सुधरेंगे, चाहे जग सुधरे।
   आदर्श औऱ यथार्थ में बहुत अंतर है, दूरी है।जिस दिन आदर्श ही हमारा यथार्थ बन जाएगा।इन भारी -भरकम ग्रंथों की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाएगी। जब आदमी अपने आदमीपन को समझ लेगा, वह आदमी से देवत्व की ओर कई कदम आगे बढ़ जाएगा। पर समस्त उपदेशकों के लिए खुशखबरी है कि ऐसा होगा नहीं , क्योंकि फिर वे कैसे जी सकेंगे! उनका परिपोषण तो इसीसे जिंदा है।

💐 शुभमस्तु !
✍लेखक ©
🏵 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

गुरुवार, 18 जुलाई 2019

रिमझिम रिमझिम [अतुकान्तिका]

सावन बरसा
तनमन हरसा,
पादप लता
प्राणि जीव जन
जड़ - चेतन का
कण -कण सरसा,
झरती बुँदियाँ
रिमझिम रिमझिम।

बूँद- बूँद कर
भरे  सरोवर
सरिता ताल -
तलैया पोखर
खेत बाग़ वन
झूमे उपवन,
झरती बुँदियाँ
रिमझिम रिमझिम।

भीगी चोली
चुनरी साड़ी,
देह लिपटती
झुके नयन दो
लाज सिमटती
बाला नारी,
बजती पायल
चुपचुप बिछुआ
धुली महावर
घायल करतीं
बुँदियाँ तन मन,
झरती बुँदियाँ
रिमझिम रिमझिम।

नंग -धड़ंग
निकलते घर से
छोटे बालक ,
गली सड़क आँगन
बागों में ,
खुली छतों पर
हँसते खिल खिल करते
दौड़ लगाते,
 नहीं वर्जना
मात-पिता की
वे सुन पाते,
उधर झकोरे
तेज पवन के
शोर मचाते,
चंचलता में
खूब सिहाते
नग्न नहाते,
ढँके गगन से
मेघाडम्बर से
झरती बुँदियाँ
रिमझिम रिमझिम।

आम्रकुंज में
बड़ी और मजबूत
शाख पर
पड़े हिंडोले
ग्राम् वासिनी सखियाँ
सारी झूला झूलें,
पींग बढ़ाकर
झोटे देतीं
बारी-बारी ,
रक्षाबन्धन
हरियाली तीजों की
 करती तैयारी,
गातीं कजरी
गीत मल्हारें,
मस्त बहारें,
आई पीहर
सधवा नारी सारी
लगा हथेली
मेंहदी अरुणिम,
कम रचती है
उसके हाथों
होतीं जो
निज पिया की प्यारी।
दिखलाती हैं
हिना रची क्या
उसके करतल,
सखी परस्पर,
धुली महावर,
मेघ बरसते
दिन रजनी भर
झरती बुँदियाँ,
रिमझिम रिमझिम।

घर - घर बनतीं
श्वेत सिवइयां,
पूजा अर्चन की तैयारी,
बाला-नारी,
सुखा न पाएँ
बरस रहीं नित
झरतीं  बुँदियाँ
रिमझिम रिमझिम।

ससुरालय में
बूरा खाने
को तत्पर
नव युवक विवाहित
उमंगित उत्साहित
साली सलहज की
संगत में
 रंगत करने
चुहलबाजियों की उड़ान में
नवरंग भरने,
जग की चिंताओं से
मन -बगिया को
पुष्पित करने
और उधर
झर रहीं निरन्तर बुँदियाँ
रिमझिम रिमझिम।।

💐शुभमस्तु!
✍ रचयिता ©
🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...