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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
जननी-जनक निनाद, गेह में रौनक लाए।
अवनी पर अनुवाद,सभी परिजन को भाए।।
'शुभम्' करे कल्याण, मुदित मन लाड़ लड़ाता।
संतति शोभित त्राण,शुभद का जीवन दाता।।
-2-
सहज नहीं अनुवाद,बदलती कोई भाषा।
अंतर्मन का नाद, करे पूरी अभिलाषा।।
'शुभम्' न रहे दुरूह, समझना भाव अनोखे।
टूटे दुष्कर व्यूह, नहीं बचते फिर धोखे।।
-3-
सबके अपने भाव, अलग भाषाएँ सारी।
शब्द न देते घाव, मधुरता सबमें प्यारी।।
अनुवादों से मूल, बदलता उसका सारा।
हिल जाती है चूल,शेष रस बचे न प्यारा।।
-4-
प्रियता में अनुवाद, नहीं वे भाव जगाए।
उठे न अंतर्नाद, अहंता अपनी लाए।।
'शुभम्' बनें तैराक, नाव क्यों उनकी खेना।
छान रहे क्यों खाक,बुलाकर उनकी सेना।।
-5-
बदल शब्द - अनुवाद, नहीं कुछ इतना भाए।
सुने नहीं फरियाद, हृदय को सरस रिझाए।।
'शुभम्' सीख वह ज्ञान,शक्तिमय हो निज भाषा।
प्रियता का रख मान, हृदय अभिनव अभिलाषा।।
शुभमस्तु,
29.09.2026◆8.15 प०मा०
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