मंगलवार, 17 मार्च 2026

'वैसे मैं नीरस नहीं' [ संस्मरण ]

 112/2026


    


©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक बड़ा -सा हाल लोगों से खचाखच भरा हुआ था।उसमें सैकड़ों पंक्तिबद्ध  लोग कुर्सियों पर बैठे हुए  परस्पर वार्तालीन थे। सामने की एक पंक्ति में कुछ सम्मानन्नीय लोगों के मध्य मैं भी बैठा हुआ था। तभी क्या देखता हूँ कि एक व्यक्ति मेरे तथा अन्य कुछ लोगों के सामने पड़ी हुई मेज पर एक -एक फाइल रखता जा रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कोई प्रतियोगितात्मक कार्यक्रम होना है,जिसमें हम इने-गिने लोगों को  निर्णायक बनाया गया है।  

तभी मेरे पीछे बैठे हुए एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा -रस आया था,क्या आपको मिला? उसके इस अनायास प्रश्न पर मैंने भी कह दिया -'वैसे मैं नीरस नहीं। रस मैं पीता नहीं।' मेरे इस प्रत्युत्तर पर वह  निःशब्द हो गया। तभी यकायक मेरी आँख खुल गई और  मैं बिस्तर से उठ कर बैठ गया। कर्पूर दान के  मध्यम  प्रकाश में समय देखा तो ब्रह्म मुहूर्त के सवा तीन बज रहे थे। और मैं यह सोचने लगा कि यह कैसा स्वप्न था। घटित हुई पूरी घटना के साथ उस व्यक्ति द्वारा मुझसे पूछा गया प्रश्न और मेरा उत्तर मुझे नहीं भूला और तुरंत मोबाइल खोलकर एक स्थान पर उन्हें अंकित करने के साथ -साथ अपने हृदय पटल पर भी लिख लिया और सोचने लगा कि यह  रस को पीने ,मेरे द्वारा स्वयं को नीरस नहीं होने और रस न पीने की बात का अर्थ क्या है? मंतव्य क्या है ? यह स्वप्न -संस्मरण मेरे अवचेतन से पूर्ण चेतन होने की अवस्था में साकार हुआ,जिसे आपको बता रहा हूँ। यदि आप इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाल सकें तो मुझे भी बताने की कृपा करें।

चूँकि मैं एक अकिंचन कवि हूँ। इसलिए रस तो मेरे काव्य और जीवन का प्राण तत्त्व है।उधर मधुमेही होने के कारण मीठे रस खाद्य या रस आदि से दूर भी रहता हूँ। यही वास्तविकता है।उस व्यक्ति ने जिस अभिधा भाव से प्रश्न किया ,उसका प्रत्युत्तर मेरे द्वारा व्यंजना और अभिधात्मक रूप से दिया जाना युक्तिसंगत ही लगा,जिससे मैं अपने अंतर मन में पूर्णतः संतुष्ट हूं।जब काव्य के नौ- नौ रस इस उरस्थल में निरंतर बहते हों तो किसी बाहरी रस की कोई आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है। उस व्यक्ति ने भले ही हास्य किया हो या  यथार्थ में पूछ लिया हो किन्तु मेरा सटीक उत्तर पाकर वह निरुत्तर हो गया। ये भीड़ ,दर्शक,श्रोता, फाइल आदि किस बात के प्रतीक हो सकते हैं, कहा नहीं जा सकता।

प्रायः हम लोग जागरण के बाद  स्वप्नों को  भूल जाया करते हैं,किंतु इस स्वप्न का विस्मरण न होना और और उस पर अपना मंतव्य प्रकट करना कुछ तो विशेषार्थ हो सकता है ! स्वप्न तो स्वप्न ही है,कहकर टाला भी नहीं जा सकता और उसे प्रायः विशेष गहनता के साथ ग्रहण भी नहीं किया जाता । पर क्या किया जाए इस  नाचीज़ 'शुभम्' को माँ सरस्वती ने एक कोमल और विचारक मन  भी तो दिया है,उसका क्या ? वह किसलिए काम आएगा। जब एक विचारक और चिंतक ही चिंतन नहीं करेगा तो क्या देश- विदेश  के तानाशाह  विचार करेंगे? उन बेचारों को वैसे ही  अवकाश नहीं है ! जो भी है,जो जैसा था;मैंने आप के समक्ष व्यक्त कर दिया। यदि आप भी अवकाश में हों तो विचार करें।

शुभमस्तु ,

17.03.2026◆9.45आ०मा०

                  ◆●◆

फहरा नवल तिरंगा . [ गीत ]

 111/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंबर धरती बीच

शून्य सँग

फहरा नवल तिरंगा।


प्राची में केसरिया

लहरे

कहता  रे जन जागो

तन -मन में

जो आलस व्यापित

उसे शीघ्र ही त्यागो

त्याग तपस्या

धर्म कर्म की

बहे सदा ही गंगा।


भू पर

हरे -भरे खेतों में

श्रमिक कर्म में लीन

खुशहाली का

वे प्रतीक हैं

भाव नहीं मन दीन

कोई रहे न

भूखा -प्यासा

तन से मानव नंगा।


श्वेत गगन में

खग दल उड़ता

हर लेता तम सारा

कलरव से

गुंजित है कण -कण

प्रसरित नव उजियारा

नव उल्लास

नवोदित प्रतिपल

तन-मन जन का चंगा।


शुभमस्तु,

17.03.2026◆9.00आ०मा०

                 ●◆●

आपदा में अवसरों की खोज [ नवगीत ]

 110/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आपदा में

अवसरों की खोज का

एक नाम है इंसान।


युद्ध हो 

भूडोल हो

या बाढ़ का अतिचार

रक्तरंजित

लाश से भी

दानवी व्यवहार

कहता धरा पर

श्रेष्ठतम है

मानवी संतान।


मार कर

इंसान को

है  बन रहा जो शेर

नाश के

सन्निकट है

बजता घना रणभेर

कीड़े-मकोड़ों सा

मसलता

विश्व है श्मशान।


आँख से अंधा

प्रभंजन

में उड़ाए तीर

विश्व को

दिखला रहा

वह शक्तिशाली मीर

शांति सुख

भाता नहीं

बहरे हुए हैं कान।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆9.30 आ०मा०

                ◆◆◆

भ्रष्टता के सामने [ अतुकांतिका ]

 109/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भ्रष्टता के सामने

हर नियम

कानून

अनुशासन 

प्रबंधन ध्वस्त हैं।


गैस हो

पेट्रोल डीजल

या कि राशन,

जिसकी लाठी

उसकी भैंस।


आदमी के खून की

हर बूँद में हो

भ्रष्टता

क्या कीजिए,

कम नहीं 

यह भी कि 

जिंदा आप हैं।


न्याय या सच

दिखता नहीं

इस आदमी की

आँख पर बँधी

काली पट्टियाँ।


वक्त सबका

न्याय करता

आईना सच का

दिखाता,

बच सका है

कौन उससे 

आज तक।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆2.15आ०मा०

                  ◆◆◆

जीवन है मधुयामिनी [ दोहा गीतिका ]

 108/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



जीवन है मधुयामिनी,जब  तक  है मधुवास।

समय न रहता एक-सा,सदा  न रहे उजास।।


तब त्रेता में   दुष्ट   था,   रावण   केवल एक,

कलयुग में रावण घने,हरते   शांति-सियास।


पाप बढ़ा है सोच में,  दूषित   मन के   तार,

शांति-सिया  कैसे  बचें,अमरीका  का  त्रास।


मानवता मन में  नहीं, रहा    नहीं  कुछ  शेष,

वन्य  हुआ  है  आदमी,  बुद्धि   चर रही घास।


ढोंग सभ्यता  का करे, अणुबम का कर शोर,

मानस जिसका  मर गया,हिंसा का वह दास ।।


शक्ति प्रदर्शन  हिंस्र का,क्षम्य  नहीं पल एक,

समय बड़ा बलवान है, करता पल में  ह्रास।


'शुभम्' मूढ़ क्यों चेतता,नहीं    इसी क्षण कूर,

करवाता   है  आप    ही,   अपना   तू उपहास।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆1.45आ०मा०

समय न रहता एक-सा [ सजल ]

 107/2026



समांत          :आस

पदांत           :अपदांत

मात्राभार      :24.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



जीवन है मधुयामिनी,जब  तक  है मधुवास।

समय न रहता एक-सा,सदा  न रहे उजास।।


तब त्रेता में   दुष्ट   था,   रावण   केवल एक।

कलयुग में रावण घने,हरते   शांति-सियास।।


पाप बढ़ा है सोच में,  दूषित   मन के   तार।

शांति-सिया  कैसे  बचें,अमरीका  का  त्रास।।


मानवता मन में  नहीं, रहा    नहीं  कुछ  शेष।

वन्य  हुआ  है  आदमी,  बुद्धि   चर रही घास।।


ढोंग सभ्यता  का करे, अणुबम का कर शोर।

मानस जिसका  मर गया, हिंसा का  वह दास ।।


शक्ति प्रदर्शन  हिंस्र का,क्षम्य  नहीं पल एक।

समय बड़ा बलवान है, करता पल में  ह्रास।।


'शुभम्' मूढ़ क्यों चेतता,    नहीं  इसी क्षण कूर।

करवाता   है  आप    ही,   अपना   तू उपहास।।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆1.45आ०मा०

                  ◆◆◆

कब तक चुप होकर बैठोगे! [ तुकांतिका ]

 106/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कब तक 

चुप होकर बैठोगे

यों घुटनों को टेके,

टेप लगा है

क्या होठों पर

स्वयं बने हो जेठे।


अपनी गलियों में 

कुत्ता भी शेर

हुआ करता है,

बाहर नाक

रगड़ता  अपनी

गीदड़ से डरता है।


बना स्वयंभू

दुनिया का जो

शहनशाह अपने को

नोबुल माँग 

रहा फैलाए

उठा युगल वह कर दो।


रावण से भी

अधिक अहं का

चरम न देखा ऐसा

स्वयं थूक कर

चाट रहा है

अभिनय करता कैसा।


भारतवादी

बनना होगा

तोड़ें सब दीवारें

जाति धर्म

विनाश की जड़ हैं

तोड़ी सभी कगारें।


शुभमस्तु,


12.03.2026◆7.00आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...