350/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
माँ दुर्गा का
साज सजाऊँ
आया मास क्वार।
नवराते में
धूप दीप ले
करूँ अर्चना माँ की
चुनरी लाल
ओढाऊँ माँ को
रहे दिव्य नित झाँकी
शंख और
घड़ियाल बजाकर
झंकृत हो दरबार।
दुर्गासप्तशती के
अनगिन
मंत्रों से अभिषेक करूँ
स्तोत्र कुंजिका
पाठ करूँ नित
भूत प्रेत से
नहीं डरूँ
शुम्भ निशुम्भ
असुर माँ मारें
कभी न हो माँ हार।
घृत का दीप
जला मंदिर में
हवन और पूजन करना
सात्विक भाव भरे
निज उर में
शंखनाद कूजन भरना
और अंत में
करूँ आरती
माँगूँ कृपा अपार।
शुभमस्तु,
12.10.2026◆10.45 प०मा०