शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

पराकाष्ठा [ अतुकांतिका ]

 353/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पीने को मिले 

या नहीं मिले

फैल ही जाए

यदि दूध की मटकी

बिल्ली खुश रहेगी।


अभी तो दूध  फैलाने की

जुगत में लगी है बिल्ली,

एक दिन वह भी आना है

कि खंभा नोचेंगी बिल्ली।


किसी तिलचट्टे को

देश से क्या लेना-देना,

उसका तो लक्ष्य है

सत्तासन को 

उधेड़ देना उखाड़ देना।


उनके जाने ये देश 

भाड़ में जाय

या देश ही भाड़ बन जाए,

उन्हें तो करनी ही है

काँय !  काँय!!  काँय!!!

हाय!   हाय !!   हाय !!!


कभी मच्छर मक्खियों 

कॉकरोचों ने 

झंडे गाड़े हैं? 

विदेशी हवा से फूले हुए

गुब्बारे हैं,

हवा निकली 

कि फुस्स !!

जाएँगे नालियों में घुस।


तिलचट्टों-तिलचट्टियों का

'समुचित इलाज'  भी

जरूरी है,

देख रहे हैं कैरोसिन की धार

वरना कोई नहीं मजबूरी है।


इनका कर्म नहीं

इनके 'कांड' 

इन्हें छुट्टा साँड़ 

नहीं रहने देंगे,

कानून के हाथ लंबे हैं,

जनता को देश को

और अधिक नहीं

सहने देंगे।


शुभमस्तु,


15.10.2026◆9.30 प०मा०

                    ◆●◆

अभिलाषा [ कुंडलिया ]

 352/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

मेरी   अभिलाषा    यही,  रहूँ    शब्द  में  लीन।

श्रेष्ठ काव्य लेखन करूँ,क्रीडित  ज्यों जल  मीन।।

क्रीडित   ज्यों जल मीन, छंद  लय का हो  साँचा।

करे न जन हित क्षीण,काव्य - फल  रहे न  काँचा।।

'शुभम्'    जदपि    हो   रात, अँधेरी   बड़ी  घनेरी।

रहूँ   अहर्निश   व्यस्त, लेखनी     रुके    न   मेरी।।


                         -2-

जीवन  प्रभु  की  देन है, विगत जन्म का खेल।

कर्मों   के   परिणाम   से, चले  योनि की  रेल।।

चले    योनि  की   रेल,  उतरना- चढ़ना  जारी।

अभिलाषा हो   एक, धर्म  पर  चले न   आरी।।

'शुभम्'  रमे  प्रभु भक्ति,नहीं उखड़े सत -सीवन।

रहें     धर्म   आरूढ़,सुगति   से   बीते  जीवन।।


                         -3-

अभिलाषा करते सभी, अर्जित हो धन खूब।

माटी से  कंचन   बने,  जमे   शिला   पर दूब।।

जमे   शिला  पर  दूब,आम उस पर आ लटकें।

रहे न कण भर  ऊब, कभी  सत पथ से भटकें।।

'शुभम्'  चलें  पथ  नेक,सभ्य हो अपनी भाषा।

जाग्रत     रहे  विवेक,   हमारी   है अभिलाषा।।


                          -4-

उनकी अभिलाषा   यही, करना रेल डिरेल।

तिलचट्टे    शासन  करें,  रहे  व्यवस्था फेल।।

रहे   व्यवस्था   फेल, नाच    हो   नंगम  नंगा।

जन -जन   हो    हैरान,  कराएँ   भीषण दंगा।।

'शुभम्'  बुद्धि  से हीन,सभी तिलचट्टे सनकी।

जले आग  में   देश, यही   अभिलाषा उनकी।।


                         -5-

जिनके   हाथों    में  नहीं,   सत्तासन  की डोर।

अभिलाषा उनकी   यही, उठती    रहें हिलोर।।

उठती    रहें   हिलोर, चैन  शासन    का खोए।

जन - जन की हो हानि, सजल हो नैन  भिगोए।।

'शुभम्'   सोच   यह   बात, हमारा माथा ठनके।

सत्ता से जो   हीन, नहीं  कुछ    कर   में जिनके।।


शुभमस्तु,


15.10.2026◆ 8.15 प०मा०

                   ◆●◆

कॉकरोच भुनगे मच्छर [ गीत ]

: 351/2026


     

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देश चलाएँगे 

अब मक्खी

कॉकरोच भुनगे मच्छर!


जन मानस को

नियम सिखाते

जिनका कोई धर्म नहीं

लोकतंत्र को

तोड़ रहे हैं

नहीं देह पर चर्म  कहीं

चींटा कहे

उठाए गिरिवर

लेता है अपनी टक्कर।


अनुभव शून्य

कॉकरोचों का

जमघट  नंगा नाच करे

हाथ पाँव के

बिना  फ़िसलते

बिना आँख के वाच करे

पछुआ हवा 

भरी  पीछे से

चाहत बस मीठी शक्कर।


टूटे देश

भाड़ में जाए

उन्हें चाटने का चसका

उल्लू सीधा

करके अपना

देखो कहाँ गया खिसका

पता नहीं क्यों 

पों- पों करते

छात्र भले पर पूर्ण निरक्षर।


शुभमस्तु,


15.10.2026◆12.15 प० मा०

                    ◆●◆

[8:24 pm, 15/10/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 352/2026ववाद

बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

माँ दुर्गा का साज सजाऊँ [ गीत ]

 350/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


माँ दुर्गा का

साज सजाऊँ 

आया मास क्वार।


नवराते में

धूप दीप ले

करूँ अर्चना माँ की

चुनरी लाल

ओढाऊँ माँ को

रहे दिव्य नित झाँकी

शंख और 

घड़ियाल बजाकर

झंकृत हो दरबार।


दुर्गासप्तशती के

अनगिन 

मंत्रों से अभिषेक करूँ

स्तोत्र कुंजिका

पाठ करूँ नित

भूत प्रेत से

नहीं डरूँ 

शुम्भ निशुम्भ 

असुर माँ मारें

कभी न हो माँ हार।


घृत का दीप 

जला मंदिर में

हवन और पूजन करना

सात्विक भाव भरे

निज उर में

शंखनाद कूजन भरना

और अंत में

करूँ आरती

माँगूँ कृपा अपार।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆10.45 प०मा०

शक्ति [ चौपाई ]

 349/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शक्ति       स्वरूपा        दुर्गा     माता।

'शुभम्' चरण में       निशिदिन   ध्याता।।

ब्रह्मचारिणी            शैल            सुपूती।

दैन्य   दुःख     दव    करतल         छूती।


नारी    शक्ति      रूप      जो     होती।

पावन    शुचिता      नर       में     खोती??

नारी   -   शक्ति          सहारा     चाहे।

बदले       राह       सड़क         चौराहे।।


शक्ति       बिना      अस्तित्व  नहीं     है।

हर    कागज   क्या   नोट    कहीं     है??

शक्ति   अलग      से      डाली       जाती।

बढ़ता       मोल         अमोल     कहाती।।


अश्वशक्ति       मानक       से       मापें।

दुर्बल    खड़े   शक्ति      से      काँपें।।

ट्रेनें     बस       ट्रक      मोटर      लारी।

बिना  शक्ति   इन   सबकी    ख्वारी।।


शक्ति हीन    की    पूछ    न     कोई।

शक्ति       बिना         मर्यादा     खोई।।

धन   विद्या    की    शक्ति    अनोखी।

जहाँ     मिले     कीमत  हो       चोखी।।


शक्ति      बाण       से    असुर   सँहारे।

लगे    राम      की       जय     के  नारे।।

जहाँ     शक्ति     है     जीत     वहीं  है।

सत्य     धर्म      की     कमी      नहीं    है।।


'शुभम्'     शक्ति   मत    जाया    करना।

असुर   वृत्ति   से     कभी    न    डरना।।

सदा      सत्य       का    साथ  निभाना।

धन    बल   विद्या    सब     अपनाना।।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆ 10.30 आ०मा०

                ◆●◆

विरल वर्ण्य महनीय सदा [ गीतिका ]

 348/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



विरल  वर्ण्य    महनीय   सदा   है देने वाला।

याचक   छोटा   क्षुद्र  क्षम्य    है    लेने वाला।।


दिनकर  देता दिव्य ज्योति जगती को जी भर,

भरी   नदी   में      त्राता    नैया    खेने वाला।


मोल  नहीं   कम   उस  जननी का जो जनती है,

पूजनीय    है    वंद्य    अंड    को    सेने वाला।


अगणित  हैं   मिष्ठान्न  धरा  पर  स्वाद  अनोखे,

अनुपम   कोमल  श्वेत  मधुरतम    छेने  वाला।


'शुभम्'    हवाई   द्वीप  लुप्तता  की कगार पर,

दुर्लभ     संज्ञा    का   मराल   मृदु नेने   वाला।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆6.30 आ०मा०

                   ◆●◆

याचक छोटा क्षुद्र क्षम्य है [ सजल ]

 347/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समांत          : एने

पदांत           : वाला

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :  शून्य।


विरल  वर्ण्य    महनीय   सदा   है देने वाला।

याचक   छोटा   क्षुद्र  क्षम्य    है    लेने वाला।।


दिनकर  देता दिव्य ज्योति जगती को जी भर।

भरी   नदी   में      त्राता    नैया    खेने वाला।।


मोल  नहीं   कम   उस  जननी का जो जनती है।

पूजनीय    है    वंद्य    अंड    को    सेने वाला।।


अगणित  हैं   मिष्ठान्न  धरा  पर  स्वाद  अनोखे।

अनुपम   कोमल  श्वेत  मधुरतम    छेने  वाला।।


'शुभम्'    हवाई   द्वीप  लुप्तता  की कगार पर।

दुर्लभ     संज्ञा    का   मराल   मृदु नेने   वाला।।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆6.30 आ०मा०

                   ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...