शनिवार, 7 नवंबर 2026

उतनी नहीं दीवाली की [ नवगीत ]

 398/2026



  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चकाचौंध 

वैभव की जितनी

उतनी नहीं  दिवाली की।


बैठे धरे धरा पर

माटी के दिवले 

देखें राहें

आने जाने वालों को 

 हैं तकते

फैला लाल-लाल बाँहें

इतरातीं 

बिजली की लड़ियाँ

दारोगा  कुतवाली की।


लिपे पुते तब

आँगन देहरी

अब टाइल चमचम करतीं

खील खांड के

बने खिलौने 

श्रीगणेश- लक्ष्मी  पुजतीं

दमक रहे हैं

महल-दुमहले

पूछ नहीं  कुछ चाली की।


सूप खटखटाना

क्या जानें

नई आधुनिक नारीं ये

स्याहू 

घर दर दीप जलाना

चमचम चमकीं साड़ी ये

देवी रमा

शारदा थीं तब

घर-घर की  घरवाली थी।


शुभमस्तु,


07.11.2026◆3.45 प०मा०

                ◆●◆

दीवाली के वे भी दिन थे [ नवगीत ]

 397/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दीवाली के

वे भी दिन थे

 माँ का ज्योति जगाना।


गोबर माटी से

घर लीपे 

सौंधी गंध सुहाए

माटी के

दिवलों में भरकर

घर में दीप जलाए

माटी की लक्ष्मी

गणेश की 

प्रतिमा को पुजवाना।


जगमग- जगमग

करे अवलियाँ

दीवट काजल पूरे

मंदिर छत

घर आँगन देहरी

छोड़े नहीं अधूरे

काजर आँज

आँख में मेरी

मन-मन बहुत सिहाना।


वेला भोर हुई

जब उजली

उषा लाल चमकाए

सूप उठाकर

खट -खट करती

दारिद दूर हटाए

तब करती

जा स्याहू पूजन

घृत का दिया जलाना।


तब बिजली की

झालर लड़ियाँ

एक नहीं थी जलती

जलते थे

माटी के दीपक

मन में मीन उछलती 

छत पर जाकर

समा निहारें

युग था वही पुराना।


शुभमस्तु,


07.11.2026  2.00 प०मा०

                  ◆●◆

माटी का दिवला कहता है [ नवगीत ]

 396/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


माटी का दिवला

कहता है

तम को दूर भगाएँ।


बतियाता है 

शीश हिला कर

शब्द न एक उचारे

एक बूँद भी

तेल बचे तो

फैलाए उजियारे

खील खिलौनों से

कर पूजा

दारिद  सभी हटाएँ।


जिस कुम्हार ने

अनगढ़ माटी 

से मुझको गढ़ डाला

रहे न भूखा

नंगा वह भी

कष्ट न दे जड़काला

माटी से

संसार बना है

वह माटी  शीश लगाएँ।


माटी का ही

रूप तुम्हारा

माटी में मिल जाना

करे न गर्व

रूप माटी पर

बने फूल खिल जाना

श्रम किसान का

स्वेद गंध को

'शुभम्' सभी अपनाएँ।


शुभमस्तु,


07.11.2026◆1.45 प०मा०

                 ◆●◆

धनतेरस [ अतुकांतिका]

 395/2026


                 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


धन के लिए

मारामारी की प्रथा का

श्रीगणेश करने का दिन

धन तेरस।


किसी को चाहिए

सोना चाँदी वैभव

किसी को 

कुर्सी का उत्सव।


ज्ञान किसी की 

ज़रूरत नहीं,

वह तो सबके पास है,

जिसका जिसे अभाव है,

उसी का उसे चाव है।


धन अनेक हैं

धन को समझने का

अपना-अपना विवेक है

किसी के लिए कुछ है धन

किसी के लिए कुछ और।


किसी को संतान धन है

किसी को सम्मान धन है,

किसी को ऊपरी कमाई

सबसे बड़ा धन है,

उसने वेतन को निवेश माना है

उत्कोच पाने का उसका मन है।


धन के लिए पूजा-पाठ

हाट बाट नौकरी व्यापार 

राजनीति धर्म का ठेकेदार

बड़े-बड़े ठाठ,

उसमें ईमानदारी का

कोई स्थान नहीं,

सत्य का कहीं मान नहीं।


क्या यही उपलब्धि है

धन तेरस की ?

स्व हितार्थ बनाई गईं

प्रथाएँ परम्पराएं

 त्यौहार पर्व, 

आदमी कहता सगर्व।


शुभमस्तु,


05.11.2026◆10.00प०मा०

                  ◆●◆

दीपावली [ कुंडलिया]

 394/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

जलती   अवली दीप की,   दीपावली     महान।

घर-घर   आँगन सज गए,तम का मिटा निशान।।

तम का मिटा निशान,  झिलमिलाती   सुरसरिता।

तनता ज्योति वितान,चमकती निशि ज्यों सविता।।

'शुभम्' सभी की आज,हर्ष उर - कलिका खिलती।

उजियारा  चहुँ  ओर,दीप   की अवली  जलती।।


                         -2-

आया कार्तिक मास अब, निशा  निराली श्याम।

हुआ   आगमन   राम का, हर्षित हैं जन   वाम।।

हर्षित   हैं   जन   वाम,  सभी   ने   दीप  जलाए।

दीपावली    अनूप,  मुदित   मन  मोद   मनाए।।

'शुभम्' सभी   नीरोग, भक्ति की निखरी   छाया।

जन -जन   है खुशहाल,  पर्व   दीपों   का  आया।।


                         -3-

घर- घर में दीपक  जले,नगर  गाँव  बाज़ार।

कहते  जन दीपावली , हर्षित सभी अपार।।

हर्षित सभी अपार, जलें छत पर बहु लड़ियाँ।

रहे   पटाखे   फोड़,चलाएँ जन फुलझड़ियाँ।।

'शुभम्' मधुर पकवान, महकते मीठे दर-दर।

खेलें   बालक   खेल,नए वसनों में   घर -घर।।


                         -4-

आया   पर्व    महान   ये, दीपावली    स्वदेश।

घर -घर में   पूजित      हुए,   लक्ष्मी   श्रीगणेश।।

लक्ष्मी    श्रीगणेश, धूप   फल मोदक    लाएँ।

छुएँ   पिता   के पाँव, जननि   ले रही बलाएँ।।

'शुभम्'  मुदित मन आज, हर्ष से प्रमुदित काया।

पावन   पर्व   महान, आज  धरती   पर आया।।


                         -5-

आओ   हिलमिल   प्रेम से,उत्सव   मना सगर्व।

दीपावली     मनाइए,   दीप मालिका     पर्व।।

दीपमालिका    पर्व,   स्वच्छता घर   में   लाएँ।

लीप -पोत   कर   साज,  गेह का भव्य सजाएँ।।

'शुभम्' एकता गान, सभी मिलजुल कर गाओ।

रहे न   द्वेष  वितान, संगठित   हों  सब आओ।।


शुभमस्तु,


05.11.2026◆ 9.30 प०मा०

गुरुवार, 5 नवंबर 2026

प्रकाश [ सोरठा ]

 393/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ज्यों नभ में शशि भानु,तम - प्रकाश अनिवार्य है।

जब  हो प्रबल   कृशानु,पकता है आहार तब।।

 दिन  में भानु   प्रकाश,ज्ञान बिना मानव नहीं।

 व्यापक गिरि  कैलाश,गिरिवर में सर्वोच्च है।


है प्रकाश   चहुँ    ओर, दीप पर्व दीपावली।

 चमके   नभ के छोर,खिली अमा में चाँदनी।।

 हम फैलाएं    आज,आओ ज्ञान प्रकाश का।

सजे ज्ञान का  साज  ,अज्ञ  तमस का नाश हो।।


करता   जगत  उजास,तेरा नाम प्रकाश  है।

करे  न कौशिक रास,तमस नहीं रहता कहीं।।

 है प्रकाश के   छंद,प्राची में अरुणिम छटा।

तमस   हुआ  है  बंद,बिखरी काव्य कुमोदिनी।।


नभ   में   तारे-चाँद,घर-घर भव्य प्रकाश है।

 निशि अंबर  में  फाँद,तमस  मिटाते रात   का।।

रहता  नहीं   उजास, तमस  बिना रजनी   नहीं।

दिन का खिलता हास,सित प्रकाश अस्तित्व से।।


अधरों में   नव  हास,मुक्ता  सम तव दाँत हैं।

 शेष न लेश  उदास,है प्रकाश छवि मोहिनी।।

 प्रमुदित  आनन  रंग,रूप छटा को   देखकर।

दर्शक   होते   दंग,बिखरी ज्योति प्रकाश की।


जहाँ न तम की बाड़,'शुभम्' चलें उस ओर हम।

सदा   बनाए चाड़, नव प्रकाश की   दिव्यता।।


शुभमस्तु,


04.11.2026◆10.00प०मा०

                   ◆●◆

तम-प्रकाश अनिवार्य हैं

 392/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तम - प्रकाश अनिवार्य हैं,ज्यों नभ में शशि भानु।

पकता  है आहार  तब, जब  हो प्रबल   कृशानु।।

ज्ञान बिना   मानव नहीं, दिन  में भानु   प्रकाश।

गिरिवर में  सर्वोच्च  है,  व्यापक गिरि  कैलाश।।


दीप    पर्व     दीपावली, है प्रकाश   चहुँ    ओर।

खिली   अमा   में   चाँदनी, चमके   नभ के छोर।।

आओ ज्ञान  प्रकाश   का,  हम फैलाएं    आज।

अज्ञ   तमस   का नाश    हो,सजे ज्ञान का साज।।


तेरा     नाम  प्रकाश है, करता जगत  उजास।

तमस  नहीं  रहता  कहीं, करे  न कौशिक रास।।

प्राची में  अरुणिम    छटा,  है प्रकाश के   छंद।

बिखरी  काव्य  कुमोदिनी,तमस   हुआ  है  बंद।।


घर-घर    भव्य प्रकाश  है,नभ   में   तारे-चाँद।

तमस   मिटाते  रात का, निशि अंबर में  फाँद।।

तमस   बिना   रजनी   नहीं,रहता  नहीं  उजास।

सित प्रकाश अस्तित्व से,दिन का खिलता हास।।


मुक्ता सम  तव  दाँत  हैं, अधरों में   नव  हास।

है प्रकाश  छवि  मोहिनी,  शेष न लेश  उदास।।

रूप   छटा   को देखकर, प्रमुदित  आनन  रंग।

बिखरी   ज्योति प्रकाश की,दर्शक   होते   दंग।।


'शुभम्' चलें उस ओर हम,जहाँ न तम की बाड़।

नव प्रकाश   की   दिव्यता,सदा   बनाए चाड़।।


शुभमस्तु,


04.11.2026◆10.00प०मा०

                   ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...