299/2026
© शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आदमी मिलता नहीं, हम क्या करें।
ढूँढ़ मारा सब कहीं, हम क्या करें।।
आगे पीछे आदमी ही आदमी,
दूरियाँ फिर भी रहीं, हम क्या करें।
अक्ल का पुतला सभी कहते उसे,
खून की नदियां बहीं ,हम क्या करें।
अपने पड़ौसी को नहीं पहचानता,
फिर भी कहें उसको जहीं, हम क्या करें।
गाँव जंगल नगर में है छा गया,
ख्वाव में भी है यहीं, हम क्या करें।
लोक में परलोक में उसकी रज़ा,
अनगिनत उसकी महीं, हम क्या करें।
खोज करता है 'शुभम्' इंसां मिले,
होती नहीं पर मनचहीं, हम क्या करें।
शुभमस्तु,
24.09.2026◆6.00 आ०मा०
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