मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गिनती सीख [ बाल कविता]

 086/2026


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक एकम एक।

हम   बनें  नेक।।


एक   दूनी   दो।

पड़ा  मत  सो।।


दो   दूने    चार।

छोड़ दे खुमार।।


तीन  दूनी  छह।

यों ही  मत  बह।।


चार  दूनी  आठ।

याद  कर  पाठ।।


पाँच  दूनी  दस।

अभी नहीं  बस।।


छह    दूनी    बारह।

सचाई का पथ गह।।


सात    दूनी   चौदह।

अत्याचार मत  सह।।


आठ    दूनी  सोलह।

करेंगे      किलोलह।।


नौ    दूनी   अठारह।

गोपनीय मत  कह।।


दस     दूनी    बीस।

जिएं    सौ   बरीस।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆3.15प०मा०

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कोयल कुहू- कुहू कर बोली [ बाल कविता ]

 085/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कोयल    कुहू- कुहू   कर   बोली।

उठो    बालको     आई      होली।।


फूल    खिले     हैं   क्यारी -क्यारी। 

रंग-बिरंगी          है          तैयारी।।


गेंदा      और     गुलाब     महकते।

जिन  पर तितली  भ्रमर  चहकते।।


जंगल- जंगल     दहकन      कैसी।

आग  लगी हो    वन     में   ऐसी।।


टेसू      लाल-लाल       हैं     फूले।

कीट - पतंगे     डालें           झूले।।


सरर-सरर     बह      रहीं    हवाएँ।

भरी  गलन में       धूप      तपाए।।


'शुभम्'  लगे  वसंत     ऋतु  आई।

चलती  शीतल     सद     पुरवाई।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆6.45आ०मा० 

                  ◆◆◆

जीवन में मजबूरियाँ [ गीत ]

 084/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आ जाती हैं

कैसी- कैसी

जीवन में मजबूरियाँ।


पास न

माता-पिता बहन भी

गोद धरा की सो जाना

लगा

ईंट पत्थर का तकिया

नव सपनों में खो जाना

बने  विषम

हालात रही क्यों

निज पालक से दूरियाँ।


जीवन में

क्या -क्या होना है

कौन जानता भावी को

वक्त दिखाए

दिन ये कैसे

ताला बंद न चाबी को

इस वीरान

धरा पर कोई 

उसे सुनाए लोरियाँ।


मैले वस्त्र

देह पर धारे

फटी चप्पलें पैरों में

आ जाती है

देख दशा ये

दया हृदय में गैरों में

नहीं मुलायम 

गद्दे बिस्तर

नहीं फटी भी बोरियाँ।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆ 6.00आ०मा०

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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

आहट विरल वसंत की [ दोहा गीतिका ]

 083/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल,

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल,

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात,

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच,

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल,

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर,

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

क्यारी में पाटल खिले [ सजल]

 082/2026


  

समांत          : ईर

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल।

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न  उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल।

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात।

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच।

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल।

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर।

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

कांति कामिनी काय की [ दोहा ]

 081/2026


   

[कांति,चमक,आभा,प्रभा,सुषमा]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक


कांति कामिनी काय की,करती क्रमिक कमाल।

दो  दृग  से  उर  में   धँसे,  भरती   हुई उछाल।।

कांति बिना इस रूप का,जीवन में क्या मोल।

भ्रमर  झूमते  शाख  पर,मधुरस  चखें अडोल।।


चमक बिना   चंदा   नहीं, नहीं चंद्रिका   चारु।

जीव     सभी   हैं  चाहते, चमक बिखेरे आरु।।

तड़ित   कौंधती   मेघ में,लिए चमक का  तेज।

कंपित उर   नर-नारि  के,निज को रखें सहेज।।


यौवन   की आभा   नई,  भरती ओज अपार।

तन-मन  में नव जोश का, करती सघन प्रसार।।

आभा   से  आकृष्ट   हो, आतीं तितली   पास।

महक  रहे   उद्यान   में,अनगिन   सुमन सहास।।


प्रभा   नई   आकाश में,उषः काल की दिव्य।

प्राची   का      शृंगार   कर,    दर्शाती मंतव्य।।

सौर प्रभा   मंडल  नया,भरता दिव्य प्रकाश।

उषा  न  जाती साथ में, दिनकर नहीं निराश।।


सुषमा सज्जित कामिनी,यौवन का नव  रंग।

आकर्षित   नर   को   करे,भरता हृदय उमंग।। 

सुषमा में  उद्यान  की,भ्रमित हुआ मन  मोर।

नाच उठा   प्रमुदित   बड़ा,बिना  मचाए शोर।।


                 एक में सब


कांति चमक आभा प्रभा,सुषमा के सब नाम।

जैसी   भी   हो भावना, करें  सकल निज काम।।


शुभमस्तु,


08.02.2026◆9.45आ०मा०

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शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

किटकन्ना [ संस्मरण ]

 080/2026


               

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

उस समय मेरी अवस्था लगभग सात वर्ष की थी और वर्ष 1959 का ;जब मैं अपने खेल के  हमजोलियों के साथ पहली-पहली बार प्राथमिक पाठशाला ग्राम धौरऊ  में पढ़ने के लिए ले जाया गया। यों तो सहज ही मेरे मन में पढ़ने-लिखने और पाठशाला में जाने का कोई मन नहीं था;किंतु अनिच्छापूर्वक ही सही मुझे पढ़ने के लिए  जाना ही पड़ गया। यह अलग बात है कि कालांतर में मेरा मन वहाँ लग गया और दैनिक चर्या में साथियों के साथ ढलने लगा।मेरे हाथ में लकड़ी की हत्थेदार एक तख्ती जिसे हम पट्टी कहते थे,पकड़ा दी गई।जिन कोमल हाथों से मैं गेंद बल्ला और कंचा गोली खेलता था,उनमें लकड़ी की यह तख्ती जैसे एक बोझ ही हो गई। पर क्या करता,पढ़ना जो था। मेरे पिताजी अम्मा दादी और बाबा को मुझे पढ़ाना था न ! तो मेरी गाड़ी पढ़ाई की पगडंडी पर चल पड़ी ; अनिच्छा से ही सही ,पर चलने लगी।

पाठशाला जाने का रोज का वही एक ही क्रम था, सुबह उठो ,तैयारी करो ,पट्टी बस्ता सँभालो,दोपहर के खाने को एक कपड़े में पैक करो,बस्ते में रखो, लकड़ी की काली पट्टी को तवे की कालोंच से काला करो, काँच के हरे- हरे मोटे घोंटे से उसे चमकाओ उस पर सीतासरसों के नरम -नरम हरे -हरे पत्ते रगड़ो ,एक हाथ में पट्टी और एक कंधे पर बस्ते का झोला लटकाओ और चल पड़ो।

स्कूल में पहुँचकर टाट पट्टियों पर अपना स्थान ग्रहण करने के बाद जैसे ही प्रार्थना की घण्टी बजे ,पंक्तियाँ बनाकर एक के पीछे एक हाथ जोड़कर खड़े हो जाओ और  'वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जावें।' प्रार्थना को समवेत स्वर से गाओ और अंत में भारत माता की जय  और जय हिंद के नारे लगाकर अपने -अपने स्थान पर बैठ जाओ। इसके बाद मुंशी जी श्री अजंट सिंह जी कक्षा में आते और सभी बच्चों को किटकंनों पर इमला लिखने का आदेश करते। कितकन्ने कभी बड़े बच्चे और कभी स्वयं मुंशी जी बना दिया करते।बस पढ़ाई शुरू। जब लिख लिया जाता ,उसके बाद उसका निरीक्षण मुंशी जी करते और सुंदर लेख वाले बच्चों को शाबाशी देते ,पीठ थपथपाते। इमला के बाद गिनती और पहाड़े याद करने का आदेश होता ,जिसका पालन सभी बच्चे अनुशासित होकर करते। कभी -कभी हमें एक गोलाकार में बैठा दिया जाता ,उस समय एक छात्र कोई पहाड़ा या गिनती बोलता जाता और शेष बच्चे उसे एक स्वर में जोर-जोर से गीत जैसे स्वर में सुनाते। नित्य निरंतर पढ़ने-पढ़ाने का यही क्रम चलता था। लगभग दो बजे भोजनावकाश होता ,सभी बच्चे अपने साथ लाए हुए खाने को खोलते और इधर उधर बैठकर खा लेते। पानी पीकर पुनः अपने स्थान पर जाकर टाटपट्टी पर बैठ जाते।

भोजनावकाश के बाद लगभग डेढ़ घण्टे का समय बचता था। इस समय में कभी पीटी तो कभी गिनती पहाड़ों की पुनरावृत्ति तो कभी अन्य मनोरंजक कार्यक्रम कराए जाते। कभी -कभी अंत्याक्षरी भी कराई जाती। कभी- कभी पीटी में लेजम चलाना सिखाया जाता। इस प्रकार एक डेढ़ घण्टे का समय ज्यों ही पूरा होता ,एक बच्चा चार बजे की घण्टी टन -टन का जैसे ही बजाता ,सभी बच्चे खुश हो जाते और हल्ला गुल्ला करते हुए आजाद पंछी की तरह घर की ओर दौड़ पड़ते।

सप्ताह में शनिवार की सबको प्रतीक्षा रहती थी। उस दिन बालसभा का आयोजन होता था,जिसमें बच्चे गीत आदि से मनोरंजन करते ।उस समय विद्यालय के सभी शिक्षक भी उपस्थित रहते थे। यहाँ यह बता देना भी आवश्यक है कि हमारी प्रारंभिक कक्षाओं में बस्ते का कोई पाँच दस किलो का वजन नहीं होता था। उस समय कच्ची एक और पक्की एक दो प्रारंभिक कक्षाएं होती थीं,जिनको पार करके ही विद्यार्थी कक्षा दो में जाता था। उस समय एक पतली सी हिंदी की पुस्तक ,जिससे अक्षर बोध कराया जाता था और एक पतली सी आठ दस पन्नों की गिनती पहाड़ों की पुस्तक बस।कक्षा दो में जोड़ बाकी(घटाना) सिखाया जाता था। पट्टी छूटने लगती थी और उसका स्थान  पत्थर की स्लेट ले लेती थी। जिस पर एक कड़ी पेंसिल की बत्ती से लिखा जाता था। इसी पर जोड़ घटाने के प्रश्न हल किए जाते थे। तीसरी कक्षा में हिंदी गणित कृषि विज्ञान और कला की नोटबुक मिल जाती थी। पहाड़ा तो सदा ही हमारा साथी रहा ,जो गणित के प्रश्न हल करने में सहायक होता।हमने बीस से अधिक पहाड़े याद नहीं किए, आगे के गणित का काम उन्हीं से चलता रहा।गिनतियाँ सौ तक आती ही थीं ,बस इतने से ही गणित का काम हो जाता था।

पाँचवीं कक्षा उत्तीर्ण करने तक अंग्रेज़ी का कहीं दूर-दूर तक भी पता नहीं था। पहली बार छठी कक्षा से ही अंग्रेज़ी हमारी जानकारी में आई ,फिर तो संस्कृत,इतिहास,भूगोल, विज्ञान, जीव विज्ञान,कला ,कृषि विज्ञान  आदि  बहुत कुछ पढ़ा। किटकंनों की इसी सड़क पर चलकर आज तक की मंजिल तय की है। यद्यपि हम आजकल की नई पीढ़ी की तरह आधुनिक भले ही  न हुए हों , तथापि किसी भी जीवन मूल्य और किसी भी अर्थ में किसी तरह के  हीनताबोध से भी ग्रस्त नहीं हैं।पथरीली जमीन और गर्म रेत की तपन को भी इन पाँवों ने महसूस किया है और  इन हाथों ने हर ठंडे गर्म के ताप को भी झेला है। इस जीवन की यह कठोर सच्चाई है। जो मैंने अपने अतीत के किटकंनों पर चलकर बताई है।

शुभमस्तु ,

07.02.2026◆6.00आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...