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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
करना मत वे काम जो, करते हैं बदनाम।
रात-दिवस उज्ज्वल बनें,सुबह न बिगड़े शाम।।
सुबह न बिगड़े शाम, सुकृत में हृदय लगाना।
नहीं कमाना दाम,पाप से बिगड़ न जाना।।
'शुभम्' अमर है कर्म,पड़ा करता फल भरना।
निर्मल रखना मर्म, कर्म खोटे मत करना।।
-2-
होते हैं बदनाम जो,करनी से हर बार।
खो देते विश्वास को, करते नहीं विचार।।
करते नहीं विचार, कर्म करने से पहले।
ऐसों पर ही लोग, करें नहले पर दहले।।
'शुभम्' कर्म का बीज, आप ही मानव बोते।
गुड़ पर चींटे रीझ, पंक में फँसते होते।।
-3-
मानव यह सब जानता,जीवन का करणीय।
मार कुल्हाड़ी पाँव में,राह बना वरणीय।।
राह बना वरणीय, भाड़ में खुद को झोंके।
अनुचित को भी जान, नहीं अपने को रोके।।
'शुभम्' करे दुष्कर्म, बना है पूरा दानव।
नित्य हुआ बदनाम,कहाँ अब सच्चा मानव।।
-4-
करता है अपमान जो,मात-पिता का नित्य।
होता है बदनाम भी, लिखता बद साहित्य।।
लिखता बद साहित्य, बिगाड़े अपनी भावी।
बिगड़ गया भवितव्य,फेंक दी घर की चावी।।
'शुभम्' करे दुष्कर्म, बना अपना संहर्ता।
डुबा वंश का नाम, बुरा अपना ही करता।।
-5-
सबसे श्रेष्ठ महान है,जीवन में सत्कर्म।
वही पुण्य है जीव का, वही श्रेष्ठ सद्धर्म।।
वही श्रेष्ठ सद्धर्म, कभी बदनाम न करता।
रहे समुज्ज्वल मर्म, ओघ अघ सारे हरता।।
'शुभम्' सोच ले आज, उठेगा ऊपर नभ से।
पर्वत से भी उच्च, तनेगा ऊँचा सबसे।।
शुभमस्तु,
05.06.2026◆11.15 आ०मा०
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