रविवार, 16 फ़रवरी 2020

मैं घन ,बादल कहलाता हूँ [ बालगीत ]


★★★★★★★★★★★★★
✍ शब्दकार ©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
★★★★★★★★★★★★★

मैं    घन,बादल  कहलाता  हूँ।
सबको    ही  मैं  नहलाता   हूँ।।

खारे   सागर  से  जल  भरता।
 नभ    में   ले जा मीठा करता।। 
धरती   पर  फिर   बरसाता  हूँ।
मैं  घन  ,बादल  कहलाता  हूँ।। 

गरमी    में  धरती   तपती  है।
प्यासी!प्यासी!नित जपती है।
बुँदियाँ   बरसा  सहलाता   हूँ।
मैं    घन, बादल  कहलाता हूँ।।

बंजर ,  जंगल  या फसलों पर।
खेतों ,  नगरों सब नस्लों पर।।
नम    शीतलता   गहराता  हूँ।
मैं   घन, बादल  कहलाता  हूँ।।

अधनंगे     बच्चे   छत  जाते ।
हम  बादल उनको  नहलाते ।।
गर्जन     कर  उन्हें  डराता  हूँ।
मैं घ   न,   बादल कहलाता हूँ।।

जब    हवा  साथ   में  होती है।
झंझा    में    रजनी   रोती  है।।
बिजली    से 'शुभम' डराता हूँ।
मैं घन, बादल   कहलाता हूँ।।

💐 शुभमस्तु !

16.02.2020 ●4.00अपराह्न।

ग़ज़ल


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✍ शब्दकार©
🌾 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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  अपनी    ग़लती का यहाँ एहसास है किसको !
  फूल खिलते क्यों नहीं  आभास है किसको !!

              डालना   मत   हाथ  बेबस  के गरेबाँ पर तू ,              
इस  जहाँ  में  प्यार,वफ़ा रास  है किसको!

अपनी       नज़रों  के   तले   अंधे  हुए हैं हम,
कुछ  नज़   र आता नहीं उजास है किसको। 

नज़ारा करती है  दुनिया गमों का क्या करें,
अँधेरे     शहर     में उजाला पास है किसको!

हमारे       घर   का जोगी जोगना होता यहाँ,
'शुभम' जज़्बात का उसके कयास है किसको!

💐 शुभमस्तु !

16.02.2020 ■ 12.20 अप.

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

हर्रा लगे न फिटकरी [ व्यंग्य ]


 ✍ शब्दकार©
 🍀 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'  
                 नकली सोना असली सोने से कुछ ज़्यादा ही चमक का स्वामी होता है।लेकिन जब नकली से असली पीछे छूटने लगे तो असली का क्या काम रह जाता है ? जो उपलब्धि असली से भी नहीं पाई जा सकी और नकली ने वह हासिल करा दी , तो कौन भला हज़ारों गुना कीमती असली को अपने गले का हार बनाएगा।
          आदमी एक ऐसा जीव है ,जो 'शॉर्टकट' प्रेमी है। उसे लम्बा और अधिक समय में पूरा होने वाला काम पसंद नहीं आता।बेचारे के पास इतना समय ही नहीं है कि किसी अच्छी उपलब्धि के लिए अपने को संलग्न कर सके। सब कुछ उसे जल्दी चाहिए। वह तो नौ महीने से पहले माता के गर्भ से बाहर आना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है , अन्यथा समय से पहले ही कूद पड़ता ! पर क्या करे बेचारा ! ऐसा करने की उसकी सामर्थ्य ही नहीं है। वह समय को पीछे छोड़ देना चाहता है।इसीलिए वह ऐसे उलटे उपक्रम करता रहता है कि उसकी 'सुबुद्धि 'की दाद देनी पड़ती है। पर वह दाद कभी न कभी इतनी महँगी अवश्य ही पड़ती है कि खुजाते - खुजाते अंदर का खून बाहर ही झलकने लगता है।
       यों तो मानव के बृहद जीवन के अनेक आयाम हैं। हमारे यहाँ आदमी की देह को आदमी बनाने का काम शायद शिक्षा ही करती है। वह शिक्षा हमें माँ से मिलना प्रारम्भ हो जाती है। इसीलिए उसे हमारी प्रथम गुरु की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। यह सर्वांश में सच भी है। सच ही है। लेकिन जब वह आगे बढ़ने के लिए पगडंडियाँ तलाशने लगता है तो अजीब - सा ही लगता है। वह असली को धता बताकर नकली को असली सिद्ध करने में लग जाता है। विश्वविद्यालय की नकली डिग्रियाँ बनवाकर जब नौकरी मिल सकती है। तो कौन भकुआ कालेज में पढ़ने जाएगा औऱ अपना समय खराब करेगा । इसलिए नकली सोने कोअसली बताकर बेचने वाले ही उसे सच्चा मार्ग दर्शन कर पाते हैं।
                आज ज्ञान की जरूरत नहीं है। बिना पढ़े शिक्षक , डाक्टर , इंजीनियर होना कोई बड़ी बात नहीं समझी जाती। बस एक बार नौकरी या पद मिल जाये फिर कौन देखता है, असली या नकली। कुछ विश्वविद्यालयों की नकली डिग्री बनवाकर गुरुजी बने हुए अपनी पूजा करवा रहे हैं। उन्हें पढ़ाना ही नहीं है , तो पढ़ना क्यों ? अधिकरियों की चापलूसी औऱ नेतागिरी के बल पर मूँछें तानकर नौकरी कर रहे हैं और हर महीने मोटी पगार लाकर बैंक की तिजोरी भारी कर रहे हैं।लेकिन ऊँट कभी न कभी पहाड़ के नीचे आता ही है। जाँच हुई और दूध का दूध पानी का पानी हो गया। अब कहीं सींखचों के पीछे बैठकर कारागार की रोटी खाने का डर सता रहा है। नकली सोना नकली साबित हो ही गया। नकली की चमक कब तक ? कि पानी उतरने तक। अब तो इज्जत का पानी , आँखों का पानी , उतर ही गया। सब नकली की मेहरबानी।'शार्ट कट' की निशानी। नकली अंकपत्र , नकली डिग्री । पढ़ने-लिखने में नानी मरती । जब देश का आदमी इतना पतित हो जाएगा , तो उसे अपना देश क्या ! अपना घर ,परिवार भी बचाना मुश्किल होगा।
               विश्वविद्यालय सो रहा है। उनका काम कोई औऱ ही हल्का कर दे रहा है। उसे क्या ? बिना परीक्षा , बिना पढ़ाई , डिग्री बंट रही हैं। जब पड़ा छापा , तो याद आये बापा। यहाँ से वहाँ नापा। पर चोर डाल गया डाका। यूनिवर्सिटी पर  'सुपर यूनिवर्सिटी'  जो खुल गई हैं। जो अदृश्य हैं। करोड़ों , अरबों , खरबों का शुल्क , फिर फार्म , परीक्षा , रिजल्ट , डिग्री -तमाम झमेले। सीधे - सीधे इधर थमाया नामा, उधर आपके नाम डिग्री का बैनामा। नौकरी प्लेट में नियुक्ति पत्र को सजाकर तैयार जो बैठी है।आओ और पाओ। बच्चे बीबी संग मौज मनाओ। पूज्य पापा जी को खुश कराओ। क्योंकि उनके ही पुण्यप्रताप से ही तो फ़र्जी डिग्री औऱ उस पर असली नौकरी , शादी के बाद छोकरी की सहज प्राप्ति संभव हो सकी। ऐसे सभी पूजनीय माता -पिता धन्य हैं जो फ़र्ज़ी डिग्री से प्राप्त नौकरी के सुख लाभ का उपभोग कर रहे हैं । उधर बेचारे ईमानदार, पढ़ाई करने वाले दर-दर की ठोकरें खाते हुए भटक रहे हैं। टेस्ट , इंटरव्यू औऱ तमाम चक्रव्यूहों में निकलने के लिए रात -दिन एक कर रहे हैं। फिर भी सफलता उनसे कोसों दूर है। क्योंकि कमीशन में भी कमीशन के बिना अंतिम  व्यूह पार कर पाना इतना सहज नहीं है।
            निकम्मे गुलछर्रे उड़ाएं, मेहनतकश पीछे जाएँ। यही नारा है। बिना हर्रा फिटकरी के जब रंग चोखा आए तो कोई क्यों पढ़ने जाए?, कालेज स्कूल के भवन खड़े - खड़े तरसाये   कि कोई बालक  -बालिका अपने दर्शन कराए। कॉलेज धन्य हो जाये। छात्रों की चरण रज अपनी बिल्डिंग से लगाये। वास्तव में मेरा देश इसीलिए महान है। कामचोरी , बेईमानी, पगडण्डीबाजी इसकी शान हैं। सब बाईस पंसेरी यहाँ धान हैं। चोरों के यहाँ बहुतेरे कद्रदान हैं। ऐसे ही नेताओं का यहाँ सम्मान है। खुदा मेहरबान औऱ गधा पहलवान है। तभी तो मेरा देश महान है। मेरा देश महान है।
 💐 शुभमस्तु !
 14.02.2020 ●10.20 पूर्वाह्न।
 www.hinddhanush.blogspot.in

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

आप ही आप [ अतुकान्तिका ]


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✍ शब्दकार  ©
🌻 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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जब पड़ी
हाथ की थाप,
बोल ही पड़ी
ढोलक बस
आप , आप ही आप,
आप ही आप,
आप ही आप,
गूँजता 
श्रुतियों में संगीत
आप ही आप,
हृदय को करती
झंकृत,
धमकती ध्वनि की
तंत्री 
आप ,
आप ही आप।

वसन्ती ऋतु का
वासन्ती नाद,
ग्रहण करते हैं कान,
करते संवाद,
मौन ही
बिना विवाद,
कौन होता 
सुनकर नाशाद!
ढोल का
माधुर्य भरा
संवाद
आप ही आप।

हवाएँ दूषित
लगतीं काँप,
छोड़तीं ऊष्मित
धुँधली भाप,
होलिका के
फागों का ताप,
बरसता 
 ब्रज वनिता के साथ,
निकल पड़ती 
कान्हा की
पिचकारी
बरसात ,
आप ही आप।

हृदय में उठती
मृदुल हिलोर ,
भिगोती 
तन -मन के
सब छोर ,
नाचते वन में
कितने मोर !
साँझ या भोर ,
कलेजे में
चिंहुँकी रोर 
बड़ी बरजोर
आप ही आप।

वनस्पतियों में
नर , पतियों में
काम या रतियों में,
नवल उल्लास,
कहाँ है कोई 
आज उदास,
समर्पित साँस ,
सँजोती सपने
आप ही आप।

'शुभम' जड़ -चेतन ,
पशु -पक्षी 
लता विटप 
ढोल वंशी ढप ,
मृदंग मंजीर,
किंकिणि पायल ,
गले के हार,
जल , थल , नभचर,
एक रस - राग ,
आया है आया है
ऋतुराज,
स्वागत में 
सब खड़े ,
अभिनंदन करने ,
गुलमुहर अमलतास,
आप ही आप,
आप ही आप।।

💐 शुभमस्तु !

13.02.2020 ◆4.45अप.

प्रेम, ज्ञान का पर्व:मधुमास [ दोहा ]


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 ✍  शब्दकार ©
🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
अब   तो  यह  मधुमास  भी ,
लगता        है       ठगमास।
बूढ़ों  को     भी     दे    रहा,
रोमांचक         कामास।।1।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
बूढ़े    नीम     बबूल     भी ,
हरिआए       इस       बार।
लाल   अधर   मुस्का    रहे,
करते     जनु    मनुहार।।2।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
कलिका  यह  कचनार  की,
कच्ची     कोमल       कांत।
चमकाती    नीले      नयन,
नाच     रही    उद्भ्रांत।।3।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
ठूँठों      में     कोंपल    नई ,
करती -  सी    कुछ    बात।
तरुणाई       में    अरुणता,
का   मनहर   अवदात।।4।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
कलशी    अपने    शीश   धर,
नाचे          अलसी        पेड़।
नीली         आभा       झूमती, 
 खड़ी   खेत    की    मेंड़ ।।5।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
स्वागत    अभिनंदन    करें,
आया       द्वार        वसंत।
पुष्पार्चन      कर     वंदना ,
सब  ऋतुओं   का कन्त।।6।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
अमलतास  , गुलमुहर   भी ,
सहरा         में      मदमस्त।
लहराता    सिर         सेहरा ,
सज्जा   सह  विन्यस्त।।7।।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
गेहूँ  ,  जौ     की    बालियाँ ,
नाच         रहीं      पुरज़ोर।
कटि   पतली   सबला  बनी,
मचा      रही    हैं   शोर।।8।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
पीली       सरसों      झूमती ,
तितली      पी       मकरंद।
फूल -  फूल   रस    चूसती,
मना     रही    आनंद ।।9।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
मधुमक्खी    भँवरे   मगन,
पीकर     रस         संतृप्त।
करें  परागण    सुमन   में ,
नहीं    एक    भी सुप्त।।10।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
अरहर    रह -  रह   झूमती ,
पीकर        हाला      मस्त।
पीले     नन्हे     सुमन   पर,
तितली    भौंरे  व्यस्त।।11।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
नर -  नारी   में   काम   का ,
नव     मादक         संचार।
चुम्बक -सा   मन  खींचता,
फूल  न दिखते   खार।12।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
आया  जब  मधुमास   शुभ,
मधु    की    बरसे        धार।
जड़ - चेतन  में   प्राण  का ,
हुआ   नवल   संचार।।13।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
कानों   में    कोकिल  करे ,
कुहू -  कुहू    दिन -   रात।
लगता   फ़ागुन   आ   गया,
मनसिज   करता घात।14।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
प्रेम , ज्ञान   का   पर्व     है,
मंगल      शुभम   अनन्त।
प्रकृति     मंत्र में  जप  रही,
वंदित  विमल  वसंत।।15।

💐 शुभमस्तु!

12 फरवरी 2020◆ 4.50. PM

पीला रंग है ज्ञान का [ कुण्डलिया ]


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✍ शब्दकार©
🌾 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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पीली    सरसों    खेत    में,
नाच   रही     चहुँ     ओर।
मानो      पीली    शाटिका,
लहराती             पुरजोर।।
लहराती              पुरजोर,
चढ़ी   है  नयन   - खुमारी।
कामदेव       की         टेर ,
कर    रही   रती   कुमारी।।
'शुभम'       झुका  आकाश,
ओढ़कर    चादर     नीली।
इठलाती        है      भूमि,
धारकर    साड़ी  पीली।।1।।

पीले      पल्लव   झर    रहे,
बिखरी  -     बिखरी   छाँव।
उधर     लाल  कोंपल  उगीं,
निखरे  -    सुथरे     गाँव।।
निखरे   -    सुथरे     गाँव,
नया   जीवन    है   आया।
गोरस        देती        गाय ,
समा   शोभन   मनभाया।।
'शुभम'  सुखद  ऋतुराज,
होलिका  -  गीत     सुरीले।
कानों  में  रस   घोल  रहे ,
भौंरे     पट       पीले।।2।।

पीले   -  पीले    वसन  धर,
आए         हैं        ऋतुराज।
स्वागत   करने   के    लिए ,
खूब     सजाया       साज।।
खूब      सजाया        साज,
देह     फूलों    से   महकी।
गाते           भँवरे       गान,
गूँज  कोकिल  की चहकी।।
गेंदा   'शुभम'     गुलाब,
पुहुप       कचनारी    नीले।
ईख     दे      रही     सीख ,
भरो  रस  पीले -  पीले।।3।।

पीला     रंग    है   ज्ञान का ,
देता          सीख      वसंत।
 वसन  ,मुकुट  सब  पीत हैं,
ऐसा     ऋतुपति    कन्त।।
ऐसा     ऋतुपति      कन्त,
महकता    कली- फूल में।
नहीं        कभी       दुर्गंध ,
दे  रहा    कभी    भूल में।।
'शुभम '      संत   का  गात,
न    ढँकता     काला, नीला।
चीवर           रंगता      पीत,
ज्ञान  का  शुभ  रंग पीला।।4।।

पी ली    जिसने   प्रेम  की ,
कलशी       भर     आकंठ।
उसे   कौन जन कह  सका,
अज्ञानी      या          लंठ।।
अज्ञानी      या           लंठ,
प्रेमऋतु        मनभाई     है।
नर -   नारी         तरु - बेल ,
परस्पर         लिपटाई      है।। .
 'शुभम'        सृजन  का  सार,
जिंदगी         उसने      जी  ली।
होता        उर      का      नेह ,
माधुरी   जिसने  पी   ली।।5।।

💐 शुभमस्तु !

11.02.2020 ◆6.30अप.

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

कवियों का कैसा हो वसंत [ गीत ]


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✍रचयिता ©
🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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कवियों   का  कैसा  हो वसंत।
भावित भावों   से  प्राणवंत।।

अक्षर - अक्षर की खिले कली।
श्रुति में शब्दों की घुले डली।।
वाक्यों की शाखा हों अनन्त।
कवियों  का कैसा हो वसंत।।

हो   छन्दयुक्त  या  छंदमुक्त।
जनजीवन का या स्वयंभुक्त।।
फैले कविता-यश दिग दिगंत।
कवियों  का   कैसा हो वसंत।।

जन गण मन  को हितकारी हो।
निज   राष्ट्र धर्म - उपकारी हो।।
बन   जाय  संत जो हो असंत।
कवियों   का    कैसा हो वसंत।।

लय, ताल, गेयता  की पायल।
कर दे  न मृदुल उर को घायल
नीला   अम्बर   हो    नादवंत।
कवियों   का कैसा हो वसंत।।

भौंरे की कवि-स्वर में गुनगुन।
कोयल  की तानों की हो धुन।।
कवि  हो धरती का'शुभम' संत।
कवियों   का   कैसा हो वसंत।।

💐 शुभमस्तु !

10.02.2020◆5.15अप.

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...