गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

एक निमिष करतार की [ सोरठा ]

 320/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 जग कहता   करतार,प्रभु जी आप महान हो।

 हिले न पल्लव भार,बिना कृपा के आपकी।।

करती  कृपा अनंत, एक निमिष करतार की।

रत मानव बहु संत,  जन्म -मृत्यु  के खेल में।।


जो जग में बस एक,नमन करूँ करतार को।

जाग्रत   रहे विवेक,  रमू अहर्निश  भक्ति में।।

 जो  जग का करतार,भूल न   जाऊँ ईश को।

 जगती का उपहार ,मुझको   नर जीवन दिया।।


उठ प्रतिदिन प्रति भोर, आओ हम वंदन करें।

 चलें  उन्हीं   की ओर,कर्ता  प्रभु   करतार  हैं।।

कर्ता  के वरदान,   अन्न दुग्ध   फल   फूल  हैं।

पोषण जीव प्रधान,  कृपा   बड़ी करतार की।।


बचा न कुछ भी   शेष,भुला दिया करतार को।

भ्रमें न   बनकर   मेष, हो कृतज्ञ उस ईश का।।

रहे    जीव   सब   भोग,  बहुजीवी   संसार में।

 करे    न   निमिष वियोग ,  सर्वश्रेष्ठ करतार ही।।


मान   सदा    उपकार, हो कृतज्ञ करतार का।

 महिमा अपरंपार  ,क्षण-क्षण   तू    भूले नहीं।।

पौधे   लता     अनंत,  शहर   गाँव  पर्वत नदी।

पावस   शीत वसंत, सृजन   सभी  करतार के।।


सृष्टा- दृष्टा   नेक,  नाम   बड़ा   करतार का।

जाग्रत   करें   विवेक, उसके  नाम अनंत हैं।।


शुभमस्तु,

01.10.2026◆6.30 आ०मा०

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जग कहता करतार [ दोहा ]

 319/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रभु जी आप महान हो, जग कहता करतार।

बिना कृपा के आपकी, हिले न पल्लव भार।।

एक निमिष  करतार की,करती  कृपा अनंत।

जन्म- मृत्यु  के खेल  में,रत मानव बहु संत।।


नमन करूँ करतार को,जो जग में बस एक।

रमू  अहर्निश  भक्ति में, जाग्रत   रहे विवेक।।

भूल न जाऊँ ईश  को, जो  जग का करतार।

मुझको नर  जीवन दिया,जगती का उपहार।।


आओ हम वंदन करें,उठ प्रतिदिन प्रति भोर।

कर्ता  प्रभु करतार  हैं, चलें  उन्हीं   की ओर।।

अन्न   दुग्ध  फल   फूल हैं,  कर्ता  के वरदान।

कृपा  बड़ी  करतार  की,पोषण जीव प्रधान।।


भुला दिया करतार को,बचा न कुछ भी शेष।

हो कृतज्ञ   उस ईश  का,भ्रमें न बनकर मेष।।

बहुजीवी   संसार    में , रहे  जीव   सब भोग।

सर्वश्रेष्ठ  करतार  ही,करे  न  निमिष वियोग।।


हो कृतज्ञ   करतार  का, मान   सदा उपकार।

क्षण -क्षण  तू भूले  नहीं, महिमा अपरंपार।।

शहर   गाँव   पर्वत   नदी, पौधे   लता अनंत।

सृजन  सभी  करतार के, पावस शीत वसंत।।


नाम    बड़ा    करतार  का,   सृष्टा- दृष्टा नेक।

उसके नाम   अनंत   हैं,   जाग्रत   करें विवेक।।


शुभमस्तु,

01.10.2026◆6.30 आ०मा०

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बुधवार, 30 सितंबर 2026

अनुवाद [ रोला ]

 318/2026



         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

जननी-जनक    निनाद, गेह   में   रौनक लाए।

अवनी पर अनुवाद,सभी  परिजन  को भाए।।

'शुभम्' करे कल्याण, मुदित मन लाड़ लड़ाता।

संतति शोभित त्राण,शुभद   का  जीवन दाता।।


                          -2-

सहज   नहीं  अनुवाद,बदलती  कोई  भाषा।

अंतर्मन   का   नाद,   करे    पूरी अभिलाषा।।

'शुभम्'   न रहे  दुरूह,  समझना भाव अनोखे।

टूटे     दुष्कर   व्यूह, नहीं   बचते  फिर धोखे।।


                         -3-

सबके     अपने   भाव, अलग भाषाएँ  सारी।

शब्द न   देते   घाव, मधुरता   सबमें   प्यारी।।

अनुवादों   से  मूल,  बदलता   उसका सारा।

हिल   जाती   है चूल,शेष   रस बचे  न प्यारा।।


                         -4-

प्रियता   में अनुवाद,   नहीं  वे भाव जगाए।

उठे     न    अंतर्नाद,  अहंता अपनी   लाए।।

'शुभम्'  बनें  तैराक, नाव क्यों उनकी खेना।

छान रहे क्यों   खाक,बुलाकर  उनकी सेना।।


                          -5-

बदल   शब्द  - अनुवाद, नहीं कुछ इतना  भाए।

सुने    नहीं    फरियाद, हृदय  को सरस रिझाए।।

'शुभम्'  सीख  वह ज्ञान,शक्तिमय हो निज भाषा।

प्रियता का  रख मान, हृदय अभिनव  अभिलाषा।।

शुभमस्तु,


29.09.2026◆8.15 प०मा०

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तुम्हें बस चलना [ गीतिका ]

 317/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खुद  हमीं   बनाते  रोड,  तुम्हें  बस चलना।

 हैं   हमीं   तुम्हारे  गोड, तुम्हें    बस चलना।।


करना   मत   बुद्धि  प्रयोग,कहें    वह मानो,

सब  चलते अपने  कोड, तुम्हें   बस चलना।


हम    सब     बरसाती     भेक,  सदा  टर्राते,

तुम  रहो   उछलते   टोड, तुम्हें    बस चलना।


मूषक     के     ऊपर    हाथ,   हमारा रहता,

रख दें   तुमको जिस मोड, तुम्हें   बस चलना।


खाने-पीने       का        काम ,   हमारा   होता,

तुम तो बस  एक  कमोड, तुम्हें   बस चलना।


कंधों    पर   भारी      भार,   हमारे     रहता,

हम   उठा रहे  सब  लोड, तुम्हें   बस चलना।


रख   'शुभम्'    वोट  की लाज,एक जुट होना,

हम   देंगे     हाथ    मरोड,  तुम्हें   बस चलना।।


शुभमस्तु,


29.09.2026◆2.00प०मा०

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ताप रहे अगियाने पर [ गीत ]

 316/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उतरी रात 

पेड़ के नीचे

 ताप रहे  अगियाने पर।


हमजोली

कुछ संगी-साथी

गुड़-गुड़ करते हैं हुक्का

कोई किस्सा

सुना रहा है

कोई लगा   रहा  तुक्का

एक नहीं

दो -दो हुक्कों को

बैठे लिए बिछाने पर।


नम्बरदार

खाट पर सोहें

बिछा चटाई कुछ बैठे

लगता है

जाड़े की रातें

नहीं भाव उनके ऐंठे

बातों में

मशगूल सभी हैं

याद नहीं जाएँ अपने घर।


घनी छाँव 

बरगद की ऐसी

रजनी रानी आई है

दीप एक जलता

खटिया पर

रजनी भी शरमाई है

बाँधे हुए 

शीश पर अपने

गमछे कान पिराने पर।


शुभमस्तु,


29.09.2026 ◆7.00 आ०मा०

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सोमवार, 28 सितंबर 2026

ऐसा नहीं है [ गीतिका ]

 315/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तेल    में   ही  आग हो,  ऐसा  नहीं  है।

नाग में   ही नाग   हो,  ऐसा   नहीं    है।।


आदमी    में   आदमी  को, खोजता   हूँ,

फाग   में   ही फाग हो, ऐसा   नहीं   है।


भक्त   है  वह  देश  का, कहता  जुबाँ   से,

उर में बसा अनुराग  हो,   ऐसा  नहीं  है।


खाक   से उठकर  बना   है ,लाख का जो,

बाकी न   कोई दाग हो,   ऐसा   नहीं   है।


चाल   हंसों  की    सदा से, चल   रहा  है,

बैठा न   दिल में  काग हो, ऐसा   नहीं है।


त्याग   दी   सहधर्मिणी,  तो   बात  क्या है,

तन में   नहीं बैराज   हो,  ऐसा   नहीं  है।


वेश  में   ही    गीध   चीलें,   चिलचिलाएँ,

सिर पर न   कोई बाज   हो, ऐसा नहीं है।


शुभमस्तु,


28.09.2026◆4.00 प०मा०

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कोई मुर्गा फँस जाए! [ गीतिका ]

 314/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऊपर  की  इनकम आए,कोई मुर्गा फँस जाए।

जब ड्यूटी पर हम जाएं,कोई मुर्गा फँस जाए।।


सड़क हमारे बप्पा  की, जाएगा  क्यों कोई यों,

डंडे से वह  थम  जाए,  कोई   मुर्गा फँस जाए।


नज़र    हमारी   तेज बड़ी, कैसे  कोई बचना   है,

कभी अधिक धन कम लाए,कोई मुर्गा फँस जाए।


साँप बनाना  रस्सी का, रोज हमारा  काम यही,

कदम ताल छम- छम गाए,कोई मुर्गा फँस जाए।


यार   बुरे   हम   दुश्मन   भी,  दूर-दूर ही रहना बे!

ज़रा न  जोखम ले  पाए,  कोई  मुर्गा फँस   जाए।


ऐब   न  कोई शेष यहाँ,सदाचरण की बात न कर,

ढोल बजा ढमढम  गाए, कोई  मुर्गा फँस  जाए।


'शुभम्' उठा  हम लाशों को, टुकड़े-टुकड़े भरते हैं,

शेष   रहम   क्यों  रह जाए, कोई मुर्गा फँस जाए।


शुभमस्तु,


28.09.2026 ◆3.00 प०मा०

                    ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...