मंगलवार, 3 नवंबर 2026

हरे नोट में बिका आदमी [ नवगीत ]

 387/2026


    


©शब्दकार

©डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हरे नोट में

बिका आदमी

तख्ता पलट चाहते सारे।


चीख रहे

भाड़े के टट्टू

ये सरकार हटानी हमको

कॉकरोच मच्छर

भुनगों ने 

भीतर खींचा अपनी दुम को

जितना भरा

बोलते उतना

नंगे-अधनंगे बजमारे।


पोल खुली

पप्पू की पोली

कितना दम है देख लिया है

आग लगाकर

धुआँ उठाकर

इनके खम को पेख लिया है

खाली आँत

पिचकती काया

दीख गए दिन में ही तारे।


पंचर जोड़

हवा भर दी तो

चलने वाली कितनी गाड़ी

गर्मी बढ़ी

फटा जब टायर

पिचक गए हैं पेट पिछाड़ी

चुकता किए

दाम जनता को

किंतु अंत में  वे सब हारे।


शुभमस्तु,


03.11.2026◆5.15 आ०मा०

                 ◆●◆

शरद ऋतु आई [ गीत ]

 386/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वन खिले

काँस के फूल

शरद ऋतु आई।


अस्ताचल जाता

भानु 

छटा बिखराए

स्वर्णिम आभा

भंडार 

धरा पर लाए

बुढ़ा गई

ऋतु 

पावस देखो भाई।


चलती है 

पछुआ हवा

मूँज बल खाए

जब उठे

झकोरा 

तेज  खूब लहराए

है सुखद

सुहानी

छटा बड़ी मनभाई।


अंबर है नीला

अभी 

परी -सी उतरी

संध्या रानी 

धरती पर

सुथरी निखरी

नीड़ों में

लौटे कीर

पखेरू  धाई।


शुभमस्तु,


03.11.2026◆ 4.15 आ० मा०

                    ◆●●

सोमवार, 2 नवंबर 2026

राम नाम से रमता कण-कण [ गीतिका ]

 385/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम नाम  से रमता   कण-कण।

हमें  राम   से   शुभ   आकर्षण।।


थिरता    नहीं   लेश   जगती में,

रूप रंग  परिवर्तित   क्षण-क्षण।


क्षीण    हो   रही   है    मानवता,

दानवता  से कंपित   तृण -तृण।


लगे  सताने    लोग    अन्य  को,

नोंच रहे    हैं   वे   रिसते  व्रण।


रावण  ध्वंश    तभी   हो   पाए,

जब  हो   जाए   राम-अवतरण।


राजनीति     का  रावण    देखो,

सता  रहा   है   सारा   जनगण।


'शुभम्'  अमोलक मानव जीवन,

नहीं लगाना    इसको    तू पण।


शुभमस्तु,


01.11.2026◆10.45 प०मा०

                   ◆●◆

हमें राम से शुभ आकर्षण [ सजल ]


384/2026


    


समांत          : अण

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       : 26.

मात्रा पतन    : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम नाम  से रमता   कण-कण।

हमें  राम   से   शुभ   आकर्षण।।


थिरता    नहीं   लेश   जगती में।

रूप रंग  परिवर्तित   क्षण-क्षण।।


क्षीण    हो   रही   है    मानवता।

दानवता  से कंपित   तृण -तृण।।


लगे  सताने    लोग    अन्य  को।

नोंच रहे    हैं   वे   रिसते  व्रण।।


रावण  ध्वंश    तभी   हो   पाए।

जब  हो   जाए   राम-अवतरण।।


राजनीति     का  रावण    देखो।

सता  रहा   है   सारा   जनगण।।


'शुभम्'  अमोलक मानव जीवन।

नहीं लगाना    इसको    तू पण।।


शुभमस्तु,


01.11.2026◆10.45 प०मा०

                   ◆●◆

[11:01 pm, 1/11/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

दर्पण [ चौपाई ]

 383/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दर्पण   किंचित    झूठ      न     बोले।

सच  के  हित  ही    निज  मुख  खोले।।

जो     जैसा      है       वही      बताए।

अपना    नमक    न     मिर्च    लगाए।।


निज    व्यक्तित्व       बनाएँ      दर्पण।

सत्य    पंथ       को     करें     समर्पण।।

तभी      जगत     में       पूजा     होगी।

रहे      देह        मन      सदा    निरोगी।।


दर्पण    वत       बालक    सब    भोले।

देख     उन्हें      सबका       मन  डोले।।

छल-छ्द्मों      से     रहे     न     नाता।

किसे   न   निश्छल      बालक    भाता।।


ज्यों-ज्यों      मानव       बढ़ता      जाता।

दर्पण        नहीं       शेष       रह   पाता।।

मन     में        मैल         समाए     भारी।

नरक       गमन        की      है     तैयारी।।


भंग      अगर       दर्पण     हो    जाएँ

मिलें    न      साबुत       टुकड़े      पाएँ।।

निर्मल    मन       शुभ    दर्पण   होता।

नहीं       कभी        पछताता      रोता।।


निज        आनन       देखें    नर-नारी।

रखते   दर्पण     घर        में      भारी।

धूल  जमी     है    मुख      पर    भारी।

झाड़       रहे       दर्पण        नर-नारी।।


मन    की          रेणु     हटाएँ    आओ।

तभी   'शुभम्'     दर्शन    कर    पाओ।।

दर्पण -सा           व्यक्तित्व     बनाया।

'शुभम्'      तभी     कविवर   कहलाया।।


शुभमस्तु,


01.11.2026◆ 10.15 प०मा०

                ◆●◆

शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

आठ पहर चौंसठ घड़ियाँ ही [ नवगीत]

 382/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आठ पहर 

चौंसठ घड़ियाँ ही

सबको मिलीं बराबर।


कहता कोई

समय नहीं है

करूँ काम मैं कैसे

रहे न कमतर

समय काम को

बढ़ूँ राह में ऐसे

सोलह पहर

समय के होते

करता प्राण निछावर।


हो मजदूर

बड़ा अधिकारी

मंत्री या कि विधायक

खेत जोतता

हो किसान भी

गृहणी घर के लायक

सबको मिले

समय सम क्षमता

अकबर राणा बाबर।


कितना सोया

खाया खोया

कितना काम किया है

कोई जिए 

पेट की खातिर

नित मधुपान लिया है

बतलाता परिणाम

जगत को

कितना किसमें पावर।


सभी सोचते

भला स्वयं का

मुल्ला ईश पुजारी

पेट काटते

मानवता का

धन की भर- भर लारी

नेता चोर

डकैत लुटेरे

सब जाते पूजाघर।


होड़ लगी है

सबसे आगे

निकल दौड़ मैं जाऊँ

आठ पहर

चौंसठ घड़ियों में

सबसे ऊपर पाऊँ

नाद अनाहत

बजा रहा है

कालदंड घण्टाघर।


शुभमस्तु,


31.10.2026◆3.30 प०मा०

                  ◆●◆

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

त्यौहार करवा चौथ है [ नवगीत ]

 381/ 2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जोड़ने का युगल

बेशक

त्यौहार करवा चौथ है।


एक दूजे के लिए

वे

जी रहे सब जानते

मन में बसी

सद्भावना

इस बात को हम मानते

नेह का लासा  

लगा

व्यौहार करवा चौथ है।


यों तो रसोई में

भले

बर्तन खटक जाते कभी

युगल भी  लड़ते

 परस्पर

पथ से भटक जाते कभी

रूठे हुए 

पति देवता

मनुहार करवा चौथ है।


याद सातों भाँवरें हैं

बीते 

दशक कितने  हमें

भूलें नहीं वे वचन 

सातों

याद आते आज  वे

आनंदमय भावी रहे

बस

उपहार करवा चौथ है।


जिंदगी कल आदमी की

तेल

पड़ना  चाहिए 

एक करवा के 

बहाने

प्यार बढ़ना चाहिए

आओ मिलें गल बाँह

डाले

उद्गार करवा चौथ है।


शुभमस्तु,


30.10.2026◆11.45 आ०मा०

                ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...