बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

कैसे-कैसे रंग:कैसे-कैसे ढंग [ आलेख ]

 096/2026



©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सम्भवतः विपत्तियाँ मनुष्य को सबक सिखाने के लिए ही आती हैं।यह बतलाती हैं कि आपका कौन अपना है और कौन पराया है।किसी की विपत्ति में किसी का पास खड़ा हो जाना ही धूप में तपते राही को  वटवृक्ष की सघन छाँव जैसा होता है।लेकिन इस आकस्मिक आई मेरे किशोर पुत्र के विछोह ने दुनिया के कैसे -कैसे रंग दिखाए, मैं ही जानता हूँ।ये आगामी होली के रंग नहीं थे,ये रंग थे उनकी भावनाओं के,संभावनाओं के,उपेक्षाओं के,उपहासों के,कुछ अंदर ही अंदर प्रसन्नों के ,कुछ उदासों के।सब कुछ मेरी इन डूबती हुई नजरों ने पढ़ा,देखा और अनुभव किया।मेरे हृदय के कोने में कुछ ने स्थान बनाया तो कुछ हृदय से निकल गए। मेरा मति भ्रम दूर हुआ कि वे मेरे शुभचिंतक थे। जी,नहीं  यहाँ और इस विपत्ति काल में भी उनका स्वार्थ बहुत कुछ कह रहा था। एक परीक्षा हो रही थी।हमारी परीक्षा तो अंतर्यामी परमात्मा ले ही रहे थे,साथ ही इस व्यक्ति और समाज की परीक्षा भी हो रही थी।

इधर मेरे किशोर पुत्र साई दत्त का निष्प्राण शरीर माँ धरती की गोद में विश्रांति पाए हुए था,उधर नर नारियों का हुजूम विविध भाव और भंगिमाओं के साथ मूक दर्शक बना हुआ था।किसी का हृदय वास्तव में मेरे दुःख से दुःखी था,किन्तु कुछ नर- नारी ऐसे  भी थे; जो मात्र एक  पाषाण दर्शक थे। जैसे कोई तमाशा हो,एक नजर तमाशे की ओर अपनी वज्र दृष्टि डाली और  ये गए वह गए। जैसे उन्हें किसी से कोई मतलब ही न हो।जैसे उनके हृदय में मानवीय दिल नहीं कोई पत्थर का टुकड़ा फिट कर दिया गया हो। कुछ लोगों की आँखों में आँसू भले ही न हों,पर उनका हृदय द्रवीभूत था। जिससे जो बना वह सहयोग कर रहा था। आगरा से बच्चे के देह को लाने पर घर के बराबर के प्लाट में मेरे शुभचिंतकों ने पहले से ही दरियाँ आदि बिछाकर और धूप से बचाव के लिए टेंट लगाकर सारी व्यवस्थाएँ कर रखी थीं। यह दृश्य देखकर मेरा हृदय उनकी सद्भावना और दूरदर्शिता से भर-भर आया। गाँव से घर परिवार के लोग तो कुछ घण्टे के बाद आए किन्तु उससे पूर्व सारी व्यवस्थाएं उनके द्वारा कर दी गई थीं।

दुनिया और समाज का एक रंग यह भी देखा गया कि सभी लोग स्वार्थी नहीं होते । कुछ ऐसे भी निस्वार्थ लोग हैं जो दूसरों के दर्द का अनुभव कर पाते हैं और समय आने पर अपनत्व से भर जाते हैं। यही सच्ची ईश भक्ति है, समाज से अनुरक्ति है, और उत्पीड़ित की मुक्ति है।पता नहीं कब उड़ता हुआ तिनका डूबते का सहारा बन जाए और कब भारी भरकम शहतीर भी डुबा देने का काम करे। अपना वही है जो समय पर साथ दे। औपचारिकता तो सभी करते हैं किंतु सच्चे मन और तन से साथ निभाने वाले विरले ही होते हैं।उन सबके प्रति मैं नतमस्तक हूँ,जिन्होंने मुझे अपना समझा और डूबती किश्ती के लिए पतवार बने। आभारी मैं उनका भी हूँ जिन्होंने अपने आचरण और व्यवहार से मुझे वह सबक सिखाया ,जो किसी विश्वविद्यालय की बड़ी से बड़ी डिग्री से भी हासिल नहीं हो सकता। 

मैं सोचता हूँ कि क्या विपत्तियाँ और संकटकाल हमें एक नए जीवन की सीख देने के लिए आते हैं अथवा दुनिया और समाज के नए रंग और ढंगों की पहचान की परख के लिए आते हैं ! आज इस विपत्तिकाल में प्रतीत होता है कि  आदमी कितना बहुरूपिया है और समय ही बलवान है। अपना समय निकल जाने पर आदमी भूल जाता है कि ऐसा समय उसके जीवन में भी आ सकता है और आता ही है।

यह मनुष्य की मनुष्यता की पहचान का अवसर है। जब किसी का सुख स्थाई नहीं तो दुःख भला कैसे स्थाई हो सकता है ? दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन। जीवन का भी यही क्रम है।मेरा छोटा-सा मन  अपने अंतर्मन को यही समझाता है कि चिंता मत कर। जो आज है वह कल नहीं होगा। आशा और विश्वास का सूरज पुनः उदित होगा।

दुःख और विषाद के इन विविध रंगों ने बहुत कुछ सिखाया है। वक्त की पहचान कराई है। सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। इस स्थान पर आकर दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है।उस दूध और पानी के वे सभी रंग मेरी इन छोटी -छोटी आँखों ने देख लिए हैं।मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।हम सब समय की डोर से बँधे हैं। वक्त ही कर्ता है ,वक्त ही ईश्वर है। शेष संसार उनका भोक्ता है। इस अनंत ब्रह्मांड में हमारा स्थान पिपीलिका से भी तुच्छ और नगण्य है।इसी स्थान पर पहुँचकर हमारा अहं मर जाता है। समय सबका सबक प्रदाता है। जीवन के विविध रंगों में यह भी जीवन का एक रंग है,जिसे चीन्हकर हम सभी दंग हैं। सम्भवतः दुनिया का यही एक ढंग है। वक्त की कसौटी पर सब कसे जा रहे हैं,मैं भी आप भी और समग्र संसार का जन-जन भी।खरे स्वर्ण और लोहे की पहचान हो रही है। 

शुभमस्तु ,

24.02.2026◆12.45 प०मा०

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अथिर बुलबुला जीव का [ दोहा ]

 095/2026


  


©शब्दकार

डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अथिर बुलबुला जीव का,जाता है जब फूट।

दिखे अँधेरा   विश्व   में,जब   घट  जाए टूट।।

बुरे वक्त   में   ही दिखे,  अपनेपन   का भाव।

निजी बिराने रूप का,जैसा भी भी हो चाव।।


वक्त  परीक्षा  ले  रहा, अपनों की पहचान।

इने-गिने   ही लोग   हैं,जिनको अपना मान।।

करते   हैं   भगवान   जो,  सभी कर्म वे नेक।

टर्र -टर्र   मानव   करे,  ज्यों   सरवर  में भेक।।


आना-जाना  जीव  का, धर्म  एक अनिवार। 

बंद  पड़ा जो  गेह था,कब  खुल  जाए द्वार।।

खूब समझ जाना यही,गति जीवन का नाम।

सड़ता   जल  तालाब  में,   वृथा  रहे बेकाम।।


जब तक अपने पास है,तब तक अपना जान।

विदा हुआ जब जीव ये,उसे न अपना   मान।।

मोह   मिटाने   के  लिए,जन्म-मृत्यु  का खेल।

खेल रहे   भगवान   जी,  चला जीव की रेल।।


समय   सबक सबका यहाँ,जान सके तो जान।

विनत भाव  रखना  सदा,जगती  को पहचान।।

जोड़-जोड़   घर को  भरे, तुझे न पल का होश।

जीना  है  तो जीव जड़, जीना  तू   बिन  जोश।।


सात   दशक   पूरे किए,किन्तु न पाया ज्ञान।

मेरा - मेरा   कर   रहा, गया  नहीं अभिमान।।


शुभमस्तु,


23.02.2026◆8.15 आ०मा०

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बेकस अदाओं की तेरी दीवानगी [ गीत ]

 094/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बेकस 

अदाओं की तेरी

दीवानगी ने मार डाला।


ओट खिड़की की

बचाकर 

नज़र अपनी

देखती 

आँखें चुराकर

विकल हिरनी

मधुर तेरे

बोल दो

मनुहार बाला।


देखकर

अनदेख बनना

क्या कहें हम

लाल बिंदी

लाल साड़ी

सहज सरगम

बिखरे हुए 

कुंतल 

नहीं सिर पर दुशाला।


इश्क का

इज़हार

चिलमन में लुकाकर

पास होकर भी

नहीं मिलती

उजागर

ढल रही है

युगल दृग से

मधुर हाला।


द्वार पर तेरे

खड़े 

नजदीक आओ

ओट में

दुबकी खड़ी

मत शर्म खाओ

लक्षमणी रेखा

बनी

अटका निवाला।


शुभमस्तु,


17.02.2026◆9.30आ०मा०

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करते हैं जग का कल्याण [ गीतिका]

 093/2026




©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते   हैं    जग   का      कल्याण।

नीलकंठ    नित     करते     त्राण।।


जगवंदित      जगपूजित       शंभु,

जगत     पुकारे    कहें      पुराण।


गंगाधर            वे         भोलेनाथ,

तरकस  नहीं    हाथ   में     बाण।


शिव  का    नाम  जपें    हर   बार,

रक्षा    करें     जीव    के     प्राण।


हिम   आवृत    मनहर      कैलाश,

फिर भी  शिव को प्रियल मसाण।


धर्मप्राण    जो     मानव      जीव,

अक्षतवीर्य         करें      निर्वाण।


'शुभम्'  जपे   हर   ॐ     शिवाय,

दिखने      में    प्रतीत     पाषाण।


शुभमस्तु,


16.02.2026◆5.45 आ०मा०

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नीलकंठ नित करते त्राण [ सजल ]

 092/2026


  

समांत         :आण

पदांत          : अपदांत

मात्राभार     : 15.

मात्रा पतन   : शून्य


©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते   हैं    जग   का      कल्याण।

नीलकंठ    नित     करते     त्राण।।


जगवंदित      जगपूजित       शंभु।

जगत     पुकारे    कहें      पुराण।।


गंगाधर            वे         भोलेनाथ।

तरकस  नहीं    हाथ   में     बाण।।


शिव  का    नाम  जपें    हर   बार।

रक्षा    करें     जीव    के     प्राण।।


हिम   आवृत    मनहर      कैलाश।

फिर भी  शिव को प्रियल मसाण।।


धर्मप्राण    जो     मानव      जीव।

अक्षतवीर्य         करें      निर्वाण।।


'शुभम्'  जपे   हर   ॐ     शिवाय।

दिखने      में    प्रतीत     पाषाण।।


शुभमस्तु,


16.02.2026◆5.45 आ०मा०

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शुभम्' कहमुक़री:3

 091/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                       -1-

घर      के   भीतर    आवे     जावे।

कभी   रिझावे     कभी     सतावे।।

करता  कभी- कभी   वह अनबन।

क्या सखि साजन? तेज प्रभंजन।।


                       -2-

कठिन   किया     है   मेरा    जीना।

बहे    देह     से    गरम    पसीना।।

मुझे     भावता      उसका     रूप।

क्या सखि साजन? ना सखि धूप।।


                       -3-

चैन    पड़े    जब    मुझको   छूता।

उसके  बिना   न       मेरा    बूता।।

पड़ा - पड़ा    है     घर     में  सूता।

क्या सखि साजन?ना सखि जूता।


                       -4-

मित्र  मंडली    घर     में     लाता।।

चाय    नाश्ता     भी     बनवाता।।

करता  काम    कभी   वह    लेटा।

क्या सखि साजन?ना सखि बेटा।।


                         -5-

एक    हार   वह     भारी    लाया।

पकड़    मुझे   उसने    पहनाया।।

कहता    कोई      उसे     भतार।

क्या सखि  साजन? रहा   सुनार।।


                     -6-

न    थी  जरूरत     उसको    मेरी।

न  की    दान    में     थोड़ी   देरी।।

एक     दिवस    कर     कन्यादान।

क्या सखि साजन? पिता सुजान।।


                      -7-

घूँघट  में      दुबका   कर    लाया।

घर  पर   जाकर    उसे    उठाया।।

क्या  सावन- का   कोमल     घेवर?

 क्या सखि साजन?ना सखि जेवर।।


                    -8-

मेरे     बिना     न    रोटी     खाता।

जब   खाए     मुस्काता     जाता।।

नहीं  समझना     मीठी     लपसी।

क्या सखि साजन?वह चिकना घी।


                       -9-

कहते   चार     दिनों    का    मेला।

जिसने  पाया       उसने     खेला।।

चूसें     मधुरस      करते     गुंजन।

क्या सखि साजन?तन का यौवन।।


                       -10-

समय  मिले   मम  मुख  को  चूमे।

मदमस्ती    में  हर    पल     झूमे।।

घर  में रहे   कभी    वह       लेटा।

क्या सखि साजन?   अपना बेटा।।


शुभमस्तु,


15.02.2026◆4.00प०मा०

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शुभम्' कहमुकरी:2

 090/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                    -1-

पतला -पतला     मोटा     लंबा।

बिना बाल का  कहें  न    दुम्बा।।

देख उसे   सब      जाते    काँप।

ए सखि   साजन,  कहते  साँप।।


                   -2-

जंगल  में   नित   मंगल    करता।

पेट   शिकारों    से    ही   भरता।।

कभी  न    खाता      खट्टे     बेर।

ए सखि साजन, वन   का    शेर।।


                    -3-

नहीं    माँगकर     भोजन   करता।

माँगे  बिना   वसन   तन    धरता।।

साहस  हो    तो    बता    हिसाब।

वह  सखि   साजन, पढ़े  किताब।।


                   -4-

ऋतु   अषाढ़ सावन     की   आए।

अंबर में      वह   छा-छा     जाए।।

नदिया तब चलती हैं    कल- कल।

ए सखि साजन, नभ का   बादल।।


                     -5-

हो  जाता    जब     घना    अँधेरा।

चिड़ियाँ  करतीं    नीड़      बसेरा।।

मिट्टी    उसके      बिना     पलीद।

ए सखि साजन,    कहते     नींद।।


                      -6-

दूर   खड़ा   रहता     है     जाड़ा।

पूस माघ  में     बजे      नगाड़ा।।

सभी   चाहते     उसका    संबल।

ए सखि   साजन, भरके    कंबल।।


                      -7-

नित्य  भोर  में    घर   आ   जाता।

सब    कोई    उसको   ललचाता।।

संडे      मंडे       या       शनिवार।

ए सखि   साजन, वह    अखबार।।


                      -8-

गाढ़ा-गाढ़ा         दूध       पिलाए।

सनातनी  की      माँ     कहलाए।।

जननी    नहीं      नहीं     है   धाय।

ए सखि साजन,    सबकी    गाय।।


                     -9-

ब्रह्मकाल     में      हमें     जगाता।

सिर पर मुकुट    धरे     इठलाता।।

गली - गली    में     दौड़े    सरपट।

ए सखि  साजन,कुकड़ूँ  कुक्कुट।।


                       -10-

मुड़गेरी     पर     पड़ा       रुपैया।।

लेता  चोर   न     उसका     भैया।।

उठा  न       लेना     करो     अदेर।

ए सखि साजन,  खग   की   छेर।।


शुभमस्तु,


14.02.2026◆5.00प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...