रविवार, 12 जुलाई 2026

चोर-उचक्के ठोक रहे खम [ गीतिका ]

 232/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर-उचक्के      ठोक   रहे   खम।

बोल   रहे   रसना   से   बम-बम।।


बाहर          बैठा      चोर-सरगना,

उसके  ऊपर    भीतर    भी   दम।


राम-धाम    में        चोरी     होती,

चोर   नहीं   होते   लेकिन    कम।


भाल तिलक   तन  पर  पीताम्बर,

मधुशाला     में    वे    पीते    रम।


कहते  यही    कौन   क्या  कर  ले,

सर्वेसर्वा    मंदिर       के       हम।


नाक  अवध  वालों   की   कटती,

चोर    खा   रहे    रबड़ी  चमचम।


'शुभम्' लिखे   कविता   चिल्लाए,

 किंतु  न  होना    चोरों  को   गम।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆10.30 प०मा०

                  ◆◆●

बोल रहे रसना से बम-बम [ सजल ]

 231/2026



समांत          : अम

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर-उचक्के      ठोक   रहे   खम।

बोल   रहे   रसना   से   बम-बम।।


बाहर          बैठा      चोर-सरगना।

उसके  ऊपर    भीतर    भी   दम।।


राम-धाम    में        चोरी     होती।

चोर   नहीं   होते   लेकिन    कम।।


भाल तिलक   तन  पर  पीताम्बर।

मधुशाला     में    वे    पीते    रम।।


कहते  यही    कौन   क्या  कर  ले।

सर्वेसर्वा    मंदिर       के       हम।।


नाक  अवध  वालों   की   कटती।

चोर    खा   रहे    रबड़ी  चमचम।।


'शुभम्' लिखे   कविता   चिल्लाए।

 किंतु  न  होना    चोरों  को   गम।।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆10.30 प०मा०

                  ◆◆●

हुई राम-मन्दिर में चोरी [ गीतिका ]


230/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हुई         राम-मंदिर   में       चोरी।

चोर    ढूँढ़ते         सँकरी      मोरी।।


बचा     नहीं   पानी    आँखों     में,

शक्ल   बनाते     अपनी      भोरी।


गगन    चूमते       महल - दुमहले,

नित्य  बदलतीं      साड़ी     कोरी।


सोने    चाँदी       के      आभूषण,

देह      धारतीं        वामा     गोरी।


मिली  ढोल    में    पोल    सुरीली,

चढ़ा   रहे    आँखों    की    त्योरी।


अवसर  ताक    रहे      कुछ  नेता,

लाभ    मिले   छल    चोर  ठगोरी।


'शुभम्' विकट यह अजब  कहानी,

उठी      जेठ    में       चोरी- होरी।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆5.15 प० मा०

                  ◆◆●


चोर की दाढ़ी में तिनका [ गीतिका ]

 229/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर   की  दाढ़ी में तिनका  हिल रहा है।

झोपड़ी  में  फूल स्वर्णिम  खिल रहा है।।


दान को   दाता   बिना   अपना  बनाया,

मूषकों    का क्या तुम्हारा बिल रहा है ?


चार दिन की    चाँदनी   अब ढल गई है,

इसलिए तो    अब    अँधेरा मिल रहा है।


राम   के   दरबार     का    तू   चोर  बंदे,

सींखचों के  मध्य  मर  तिल-तिल रहा है।


रामजी    की आँख   में    तू    धूल झोंके,

भामिनी अपनी   सजा क्या  सिल रहा है।


कार    बँगलों  प्लॉट  में     हैं   हाथ   काले,

क्या कभी   काला   न   तेरा   दिल रहा है?


यदि 'शुभम्'  तू  सोचता   परलोक  की भी,

सोचदानी    से    सदा  तू    निल   रहा  है।



शुभमस्तु,


05.07.2026◆3.00प०मा०

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लगता है मर जाए रावण! [ गीतिका ]

 228/2026



   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लगता     है       मर       जाए   रावण।

अब  न     सिया     भरमाए     रावण।।


अपने      को        भगवान    समझता,

उठा      नहीं   मुख   पाए        रावण।


अहंकार       का     किला      बनाकर,

गाज  उसी       पर      ढाए      रावण।


नहीं       देखता       कोई      उसको,

लौट-लौट        बल     खाए    रावण।


बंद     जुबाँ       लटकी     है    गर्दन,

जग     को      दोष    लगाए    रावण।


जो  न    जानते      थे    जाने    सब,

 बहुत-बहुत           पछताए     रावण।


'शुभम्'   कर्मघट      फूट     पड़ा   तो,

पानी     सड़क        बहाए      रावण।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆ 1.45 प०मा०

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जब से राम अयोध्या आए [ गीतिका ]

 227/2026


   


©डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जब      से     राम     अयोध्या     आए।

भक्त जनों        ने        मोद      मनाए।।


भाग       खुल    गए     झोपड़ियों    के ,

चोर      लुटेरे      भी         सिर     नाए।


नहीं       स्वप्न         में     सोचा    ऐसा,

सोना         बने          लौह       निर्माए।


दानपात्र         का         पारस     पाकर,

परस     किया          सोना     बन पाए।


मुख   में    राम      तिलक   मस्तक  पर,

चोरी      करें         चोर        के     जाए।


लोहे       की      अब    खुलीं    सलाखें,

ग्रीवा          झुकी       नयन      शरमाए।


'शुभम्'     गर्म       हो     गई    सियासत,

नेता         खड़े -खड़े         डर      खाए।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆1.00 प०मा०

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रावण की तुन्दी में [ गीतिका ]

 226/2026

 

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप


रावण   की तुन्दी में गहरा  बाण लगा है।

कहता देश   ठगों ने सारा   देश  ठगा है।।


मंदिर में  रहने   वालों   ने   सेंध लगाई,

एक-एक शातिर  सोने के साथ पगा है।


नींद नहीं  आती  है उसको  करे रतजगा,

किसको अपना कहे न कोई एक सगा है।


चोर-चोर   मौसेरे    भाई    जीजा-साले,

चाचा संग  भतीजा  करता  संग दगा  है।


थोड़ा  नहीं   करोड़ों  पर  की हाथ सफाई,

ऐयासी   में   जिसका  कुर्ता  पीत रँगा है।


सोना -चाँदी राम-रतन   को जी भर लूटा,

गुबरैला  सोने   का  समझें  मत  भुनगा है।


'शुभम्'  देखना  अभी  शेष है धार तेल की,

हाथी   पूरा बचा   हुआ   है   शुण्ड दिखा है।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆12.00मध्याह्न

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...