गुरुवार, 5 नवंबर 2026

प्रकाश [ सोरठा ]

 393/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ज्यों नभ में शशि भानु,तम - प्रकाश अनिवार्य है।

जब  हो प्रबल   कृशानु,पकता है आहार तब।।

 दिन  में भानु   प्रकाश,ज्ञान बिना मानव नहीं।

 व्यापक गिरि  कैलाश,गिरिवर में सर्वोच्च है।


है प्रकाश   चहुँ    ओर, दीप पर्व दीपावली।

 चमके   नभ के छोर,खिली अमा में चाँदनी।।

 हम फैलाएं    आज,आओ ज्ञान प्रकाश का।

सजे ज्ञान का  साज  ,अज्ञ  तमस का नाश हो।।


करता   जगत  उजास,तेरा नाम प्रकाश  है।

करे  न कौशिक रास,तमस नहीं रहता कहीं।।

 है प्रकाश के   छंद,प्राची में अरुणिम छटा।

तमस   हुआ  है  बंद,बिखरी काव्य कुमोदिनी।।


नभ   में   तारे-चाँद,घर-घर भव्य प्रकाश है।

 निशि अंबर  में  फाँद,तमस  मिटाते रात   का।।

रहता  नहीं   उजास, तमस  बिना रजनी   नहीं।

दिन का खिलता हास,सित प्रकाश अस्तित्व से।।


अधरों में   नव  हास,मुक्ता  सम तव दाँत हैं।

 शेष न लेश  उदास,है प्रकाश छवि मोहिनी।।

 प्रमुदित  आनन  रंग,रूप छटा को   देखकर।

दर्शक   होते   दंग,बिखरी ज्योति प्रकाश की।


जहाँ न तम की बाड़,'शुभम्' चलें उस ओर हम।

सदा   बनाए चाड़, नव प्रकाश की   दिव्यता।।


शुभमस्तु,


04.11.2026◆10.00प०मा०

                   ◆●◆

तम-प्रकाश अनिवार्य हैं

 392/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तम - प्रकाश अनिवार्य हैं,ज्यों नभ में शशि भानु।

पकता  है आहार  तब, जब  हो प्रबल   कृशानु।।

ज्ञान बिना   मानव नहीं, दिन  में भानु   प्रकाश।

गिरिवर में  सर्वोच्च  है,  व्यापक गिरि  कैलाश।।


दीप    पर्व     दीपावली, है प्रकाश   चहुँ    ओर।

खिली   अमा   में   चाँदनी, चमके   नभ के छोर।।

आओ ज्ञान  प्रकाश   का,  हम फैलाएं    आज।

अज्ञ   तमस   का नाश    हो,सजे ज्ञान का साज।।


तेरा     नाम  प्रकाश है, करता जगत  उजास।

तमस  नहीं  रहता  कहीं, करे  न कौशिक रास।।

प्राची में  अरुणिम    छटा,  है प्रकाश के   छंद।

बिखरी  काव्य  कुमोदिनी,तमस   हुआ  है  बंद।।


घर-घर    भव्य प्रकाश  है,नभ   में   तारे-चाँद।

तमस   मिटाते  रात का, निशि अंबर में  फाँद।।

तमस   बिना   रजनी   नहीं,रहता  नहीं  उजास।

सित प्रकाश अस्तित्व से,दिन का खिलता हास।।


मुक्ता सम  तव  दाँत  हैं, अधरों में   नव  हास।

है प्रकाश  छवि  मोहिनी,  शेष न लेश  उदास।।

रूप   छटा   को देखकर, प्रमुदित  आनन  रंग।

बिखरी   ज्योति प्रकाश की,दर्शक   होते   दंग।।


'शुभम्' चलें उस ओर हम,जहाँ न तम की बाड़।

नव प्रकाश   की   दिव्यता,सदा   बनाए चाड़।।


शुभमस्तु,


04.11.2026◆10.00प०मा०

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धन [ रोला ]

 391/2026


               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

धन है   मनुज   शरीर, रहे यदि सदा निरोगी।

करे सदा शुभ   काज, करें  ज्यों कर्मठ योगी।।

रखिए    सदा   सँवार,   बनाए वर्षों   रखना।

जीवन का हर स्वाद, मनुज को मीठा चखना।।


                         -2-

शुभ   धन तेरस   आज, खरीदें  सोना-चाँदी।

धन्वंतरि     भगवान,     पूजते  दादा -दादी।।

रौनक देख  अपार, हर्ष  मन  में अति आया।

भरे कहीं   भंडार,   कहीं बस धन की छाया।।


                         -3-

करें   नहीं   सत्कर्म, चाहते  धन मिल जाए।

रखे   हाथ   पर   हाथ, विराजे  वे ललचाए।।

कैसे   हो  मन   साध, पूर्ण   तेरी  रे मानव।

करे नीच ही  काम,रहा  है  निशिदिन  दानव।।


                         -4-

धन   धन   धन का मंत्र,नहीं देता धन भारी।

कर्मठ    बनें    सुजान, नहीं   तेरी  लाचारी।।

होंगे   कर्म  महान, नहीं  अभाव हो धन का।

बनी रहेगी शान, धनिक बन मानव मन का।।


                         -5-

नहीं    पूछता   बात,   बिना धन कोई तेरी।

मिले न जग में  मान, पड़े  भी विपद घनेरी।।

पूजनीय   वे लोग, जगत   में सब धन वाले।

करें   कर्म   वे   श्रेष्ठ, सदा   ही रहें   निराले।।


शुभमस्तु,


04.11.2026◆8.00 आ०मा०

                 ◆●◆

जीवन प्रभु की देन है [ दोहा ]

 390/2026



     [दया,दान,सत्कर्म,मानव,धर्म]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


             सब में एक

जीवन   प्रभु   की  देन है, दया मानवी धर्म।

पापाचारी   के   लिए, बुरा   न कोई   कर्म।।

कष्ट उन्हें मत  दीजिए,जीव-जंतु असहाय।

दया भाव   के  पात्र  वे, सबसे श्रेष्ठ उपाय।।


करे दान   असहाय को,उसका   ऊपर हाथ।

ग्राहक  का रहता  सदा,नत  सिर नीचे हाथ।।

दानी    अपने दान  की, करें न महिमा   गान।

वे नर   हैं   ओछे  सभी, करें  याचना   मान।।


अपनी पीठ न ठोंकिये, कर जग में सत्कर्म। 

सत्कर्मी   सब   धन्य   हैं, निभा  रहे जो  धर्म।।

ज्योति   सदा  सत्कर्म की,फैले  सब   संसार।

मानव का  यह धर्म है, करना नित उपकार।।


पाकर मानव-  देह   को,  करे पाशविक कर्म।

पशु   ही   वह साक्षात है,पाषाणी   है   मर्म।।

खेल   बड़ा   प्रारब्ध  का, पाकर मानव गात।

कर्म  करे   अनुरूप   ही ,  करे  नहीं   उत्पात।।


पल-पल जिएं सँभाल कर,डिगे न क्षण को धर्म।

करनी   करना   पुण्य   की,  रखें मोम-सा मर्म।।

धर्म   धुरंधर   का  लिए, कर में   झंडा   एक।

नेतागण   उछले   फिरें,  जिनमें नहीं   विवेक।।


             एक में सब

दया दान   सत्कर्म से,मानव बने   महान।

यही   धर्म का मूल है, करें नहीं  अभिमान।।


शुभमस्तु,


04.11.2026◆6.30 आ०मा०

                  ◆●◆

ज्ञान सिखाते वे ही हमको [ नवगीत ]

 389/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ज्ञान  सिखाते

हमको वे ही 

जिनको हमने ज्ञान सिखाया।


नौबत ऐसी

कभी न आए

कोई हमको सीख बताए

गिरें न अपने

पद से नीचे

वक्त न हमसे भीख मँगाए

विपदा पड़ी

हरिश्चन्द्रों पर

राजपाट सब ठाठ गँवाया।


काल चक्र

पलटा जब खाता 

उलट-पुलट हो जाता सारा

कंटक जो

ऊपर था पहले

नीचे जाकर टाँग चियारा

अनहोनी जब

घटनी होती

समय फलन क्या-क्या न दिखाया।


कालचक्र के नीचे

सारी

दुनिया मस्तक झुका रही है

आगे-आगे

काल हमारे

कभी किसी को रुका नहीं है

हमको तुमको

चलना केवल

पतन  वहीं जो काल गँवाया।

शुभमस्तु,


03.11.2026◆1.00प०मा०

                    ◆●◆

फिर भी पति रहता है मौन [ नवगीत ]

 388/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


डर की बात नहीं 

पत्नी से

फिर भी पति रहता है मौन।


नहीं चाहता

गेह-कलह हो

आपस में जूतम -पैजार

धीरे से 

निज बोल खोलता

मान रहा पत्नी से हार

छत है एक 

चार दीवारें

नहीं शोर से गूँजे भौन।


प्रतिद्वंद्वी वे नहीं

परस्पर

बर्तन वहीं खटकते हैं

अगर रसोई में

हों बर्तन

जब तब वही खनकते हैं

उत्तम शांति रहे

घर भर में

पति जा बैठा अपने लॉन।


यही समझदारी

दोनों की

झगड़े  की क्यों आए नौबत 

एक अगर 

झगड़ालू हो तो

घर बाहर क्यों फैले शोहरत

भला इसी में

चुप्पी साधे

सिर फूटें तो रक्षक कौन।


सभी मुहल्ले के

नर-नारी

हँस-हँस  देखें  खूब तमाशा 

नहीं बीच में

आता कोई

पति-पत्नी को मिले हताशा

अवसर क्योंकर

दें हम उनको

भले चबाएँ नीम दतौन।


शुभमस्तु,


03.11.202612.45 प०मा०

                ◆●◆

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

हरे नोट में बिका आदमी [ नवगीत ]

 387/2026


    


©शब्दकार

©डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हरे नोट में

बिका आदमी

तख्ता पलट चाहते सारे।


चीख रहे

भाड़े के टट्टू

ये सरकार हटानी हमको

कॉकरोच मच्छर

भुनगों ने 

भीतर खींचा अपनी दुम को

जितना भरा

बोलते उतना

नंगे-अधनंगे बजमारे।


पोल खुली

पप्पू की पोली

कितना दम है देख लिया है

आग लगाकर

धुआँ उठाकर

इनके खम को पेख लिया है

खाली आँत

पिचकती काया

दीख गए दिन में ही तारे।


पंचर जोड़

हवा भर दी तो

चलने वाली कितनी गाड़ी

गर्मी बढ़ी

फटा जब टायर

पिचक गए हैं पेट पिछाड़ी

चुकता किए

दाम जनता को

किंतु अंत में  वे सब हारे।


शुभमस्तु,


03.11.2026◆5.15 आ०मा०

                 ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...