रविवार, 27 सितंबर 2026

मालूम है ये [ गीतिका ]

 309/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोजने में  वे लगे हैं छेद,  मालूम   है ये।

जानना इस राज का भी भेद,मालूम है ये।।


ख़ुद गिरें   वे   कूप    में,   या    आग  में,

दिल में  न उनके क्लेद,  मालूम    है  ये।


चैन    से   रहना    नहीं,    भाता    उन्हें,

खून में खड़िया घुली सफेद, मालूम है ये।


प्रेम  का   दुर्भिक्ष    ही,  लिखवा   लिया,

आठों    फहर     निर्वेद,   मालूम  है   ये।


क्या    कहा   कैसे  कहा , अज्ञात   सब,

सिर में   भरा    बस  मेद, मालूम  है   ये।


जो बना    जिसके   लिए,  करता   वही,

उनको नहीं कुछ  खेद, मालूम   है    ये।


नाव    डूबे      देश     की   चाहे  'शुभम्',

उनसे  नहीं      उम्मेद,   मालूम   है   ये।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆4.15 प०मा०

                  ◆●◆

मैंने छान मारा [ गीतिका ]

 308/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तुझ-सा  नहीं  गुस्ताख़, मैंने छान मारा।

देखे   करोड़ों  लाख , मैंने   छान मारा।।  


खा रहा   जिस  थाल  में, आहार अपना,

करता   वहीं   सूराख, मैंने  छान मारा।


साँप बिच्छू   से    नहीं,  उम्मीद   कोई,

है  वत्स तू   वैशाख, मैंने  छान    मारा।


झोंपड़ी  की   छाँव  में,  नाटक  दिखाए,

खाता गपागप  दाख, मैंने    छान  मारा।


पंडित कभी मुल्ला कभी,क्रिस्तान भी तू,

तेरी  नहीं कुछ   साख, मैंने छान   मारा।


सबसे   बड़ी   कुर्सी तुझे, मिलनी नहीं है,

उम्मीद    तेरी    राख,   मैंने   छान मारा।


दुर्भाग्य   होगा    देश  का,पी एम हो तू,

देता 'शुभम्'  ये भाख, मैंने  छान   मारा।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆2.00प०मा०

               ◆●●

तू मत समझना [ गीतिका ]

 307/2026



           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बुद्ध   की   संतान  है, तू   मत समझना।

इस देश  का तू  मान है,तू मत समझना।।


संस्कृति नहीं है  सभ्यता,  तेरी यहाँ की,

तेरा न हमको ध्यान है, तू  मत समझना।


उगतीं  कँटीली  झाड़ियाँ  भी, जंगलों में,

हमको नहीं संज्ञान  है, तू मत समझना।


जोड़ता  जिस देश  को,  टूटा  नहीं   है,

योजक नहीं विषखान है,तू मत समझना।


आते  मिटाने  के लिए,  संतान   कुछ तो,

वंश  की   पहचान  है,  तू  मत समझना।


मूढ़ता    के   ढेर   में,    है     कूढ़ता  ही,

चलना  न तेरा प्लान है,तू  मत समझना।


देश की नजरें 'शुभम्' , तुझ पर टिकी हैं,

सठिया गया तू  ज्वान है,तू मत समझना।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆12.30 प०मा०

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वे चाहते हैं [ गीतिका ]

 306/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हिंदोसितां   बरबाद   हो, वे  चाहते हैं।

दुश्मन कुटिल आज़ाद हो,वे चाहते हैं।।


लूटने   की     दास्तानें  ,  सब    पुरानी,

सुननी नहीं फरियाद हो,  वे  चाहते  हैं।


है   हलाहल  देह में , फन  भी  विषैला,

हर ओर केवल   गाद   हो, वे चाहते  हैं।


भाषणों   में   गालियाँ,  केवल उगलना,

जीभ   में   सुस्वाद  हो ,वे   चाहते   हैं।


रोना  कलपना  चीखना, उनको लुभाए,

आतंक  का आच्छाद  हो, वे चाहते हैं।


कर्म   खोटे   हैं,   रखा   क्या  नाम  तेरे,

बुद्धि   में    जल्लाद   हो, वे  चाहते  हैं।


समझें  नहीं केवल सपोले, साँप  हैं जो,

बढ़ता रहे    अवसाद  हो ,   वे चाहते हैं।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆11.45 आ०मा०

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परम पिता परमात्मा [ दोहा ]

 305/2026


      

[भगवान,ईश्वर,प्रभु,विधाता,

परमात्मा ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


              सब में एक

             

लीलाएँ प्रतिपल करें,अखिल सृष्टि भगवान।

मानव   यह  जाने  नहीं,व्यापक ईश महान।।

माया    ने भगवान  की, लुभा लिया संसार।

उनकी   इच्छा    से  चले,  सबका कारोबार।।



ईश्वर -महिमा   जानते, नहीं मनुज खग ढोर।

जलजीवी  जो  जंतु  हैं,उन्हें न मिलता छोर।।

ईश्वर   स्वामी   सृष्टि  के, वही नियंता आप।

उन्हें   नहीं   हैं    व्यापते,  शीतलता या ताप।।


प्रभु जी   से   विनती  यही,रखें  कृपा का हाथ।

जीव जिएं जीवन सभी, सुख से मिलजुल साथ।।

प्रभु की   व्यापक   दृष्टि से, बचा न  कोई  एक।

'शुभम्' यही नित सीख से,मत खो जीव विवेक।।


दिया   विधाता  ने   यहाँ,  कर्मों    के अनुसार।

जीव   सभी  नित भोगते, जीवन  बिना विचार।।

बिना   विधाता   के यहाँ, चले न कोई काम।

कर्ता सबका  एक     है,  मात्र   जगत  में राम।।


परम  पिता   परमात्मा, प्रणत  प्रणव सौ   बार।

मनुज   योनि   दी   धन्य मैं, कर्मों   के अनुसार।।

पूर्ण      मात्र  परमात्मा,  अन्य    अधूरे जीव।

वह   विराट  निस्सीम है,  बंधित  सभी जरीव।।


               एक में सब


ईश्वर प्रभु    भगवान के, ब्रह्म विधाता  नाम।

सभी     कहें   परमात्मा,  जगत नियंता  राम।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆7.00 आ०मा०

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शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

वंदन [ कुंडलिया ]

 304/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                       

                         -1-

अपने  दोनों  जोड़  कर, नत  वंदन में भक्त।

सेवा  करता  ईश की,चरण   युगल अनुरक्त।।

चरण युगल अनुरक्त,जनक जननी को ध्याये।

मिलें   सिद्धियाँ  अष्ट,नवों   निधियों को पाये।।

'शुभम्' नमन की रीति,उठाया नर को तप ने।

धन्य -धन्य वह   जीव, करे  वंदन  कर अपने।।


                         -2-

वंदन     का   चंदन   धरे,  रहे   महकता देह।

शुभता के  आशीष   से, मिले   ईश  का नेह।।

मिले   ईश  का  नेह, मिटें   नित   की बाधाएँ।

विपदाएँ     हों    नष्ट, सदा    विश्वास जगाएँ।।

'शुभम्' करें शुभ काज,करे दुनिया अभिनंदन।

विनत   भाव   की   धार, बहाए  निर्मल वंदन।।


                         -3-

वीणा वादिनि   शारदा,  तव   वंदन  में आज।

भक्त विनत अनुरक्त है,सकल सुधारें   काज।।

सकल  सुधारें  काज, काव्य-रथ  रुके न मेरा।

नित  नूतन   हों   भाव, शब्द   का कोष घनेरा।।

'शुभम्'  कृपा  कर  माथ, नहीं  दें कच्चा मीणा।

नत मस्तक दो हाथ,बजा दो  कवि  की वीणा।।


                         -4-

वंदन के  शुभ  भाव  से,  मिले गुणों का कोष।

जागे   विपुल   विनम्रता,मिटें सकल उर- दोष।।

मिटें   सकल   उर-दोष, ओघ-अघ नष्ट कराए।

पावनता    का     कोष, अंग   में नित्य समाए।।

'शुभम्' लगा जब भाल, महकता मह-मह  चंदन।

विपदाएँ   दे   टाल,   भक्त   का   निर्मल वंदन।।


                         -5-

माता   के   शुभ  भाव  से, वंदन करते नित्य।

अपने   भारत   देश को,  शशि   तारे आदित्य।।

शशि  तारे आदित्य,  सिंधु  कलकल  सरिताएँ।

पंच   तत्त्व   के  सत्त्व,  नित्य  गुणगीता गाएँ।।

'शुभम्'   पुत्र जो  नित्य,देश को अपने  ध्याता।

क्यों   न  लड़ावे   लाड़,   पुत्र को भारत माता।।


शुभमस्तु,


25.09.2026◆ 6.30 आ०मा०

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आदमी के पंख नहीं [ अतुकांतिका ]

 303 / 2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी के पंख नहीं

फिर भी उड़ता है

धन बल पैसे से

पाँव धरती पर

नहीं पड़ता है।


रह गए बाज पीछे

नोंचने में माँस को

आदमी डकार लिए बिना

निकाल रहा भड़ास को।


मोर हैं न कोयल

गौरैया न हंस है

कृष्ण लीला कर रहा

कंस का अवतंस है।


मुर्गे की कुकड़ कूं

आहार भी कुछ वैसा ही

गंगा में लगा गोते

प्रयागराज आवाजाही।


आदमी की देह में

आदमी भी तो नहीं

ईंट सीमेंट के गेह में

जमा रहा दिमागी दही।


प्रजाति नई जीव की

आदमी नमूना  है

ठग रहा अपनों को

लगा रहा चूना  है।


शुभमस्तु,


24.09.2026 ◆ 8.00 प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...