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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
ज्यों नभ में शशि भानु,तम - प्रकाश अनिवार्य है।
जब हो प्रबल कृशानु,पकता है आहार तब।।
दिन में भानु प्रकाश,ज्ञान बिना मानव नहीं।
व्यापक गिरि कैलाश,गिरिवर में सर्वोच्च है।
है प्रकाश चहुँ ओर, दीप पर्व दीपावली।
चमके नभ के छोर,खिली अमा में चाँदनी।।
हम फैलाएं आज,आओ ज्ञान प्रकाश का।
सजे ज्ञान का साज ,अज्ञ तमस का नाश हो।।
करता जगत उजास,तेरा नाम प्रकाश है।
करे न कौशिक रास,तमस नहीं रहता कहीं।।
है प्रकाश के छंद,प्राची में अरुणिम छटा।
तमस हुआ है बंद,बिखरी काव्य कुमोदिनी।।
नभ में तारे-चाँद,घर-घर भव्य प्रकाश है।
निशि अंबर में फाँद,तमस मिटाते रात का।।
रहता नहीं उजास, तमस बिना रजनी नहीं।
दिन का खिलता हास,सित प्रकाश अस्तित्व से।।
अधरों में नव हास,मुक्ता सम तव दाँत हैं।
शेष न लेश उदास,है प्रकाश छवि मोहिनी।।
प्रमुदित आनन रंग,रूप छटा को देखकर।
दर्शक होते दंग,बिखरी ज्योति प्रकाश की।
जहाँ न तम की बाड़,'शुभम्' चलें उस ओर हम।
सदा बनाए चाड़, नव प्रकाश की दिव्यता।।
शुभमस्तु,
04.11.2026◆10.00प०मा०
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