बुधवार, 23 जून 2021

मानव, पहले मानव है ? 🦢 [ व्यंग्य ]


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 ✍️ लेखक © 

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                कहा जाता है कि 'मानव पहले पशु है ,बाद में मनुष्य।' किन्तु मुझे इसके ठीक विपरीत ही प्रतीत होता है।अर्थात 'मानव पहले मनुष्य है ,बाद में पशु है।' हो सकता है बहुत पहले जब मानव - सभ्यता का विकास नहीं हुआ था, अथवा वह अपने शैशव काल में रही होगी ,तब मनुष्य, मनुष्य कम ; पशु ही अधिक रहा हो। क्योंकि उसका रहन - सहन, आसन, असन, वसन, व्यसन ,आहार, निद्रा , देह - सम्बन्ध आदि सभी क्रिया -कर्म पशुओं जैसे ही रहे हों, लेकिन शनैः - शनैः विकसित सभ्यता ने उसे पशु से उठाकर मनुष्य की पंगत में बिठा दिया हो।कौवे से हंस, गधे से गाय, बिच्छू से मधुमक्खी,नाली के कीट से फलों की गिड़ार, उल्लू से गरुण, मेढक से घड़ियाल बना दिया हो।

            आज मनुष्य पशुओं से बहुत आगे निकल चुका है। अब वह गुफ़ाओं, बिलों और पेड़ों पर अपने घर- घोंसले बनाने के बजाय ऊँची -ऊँची अट्टालिकाओं और बहु मंजिला भवनों में निवास करता है।पशु, पक्षी , कीड़े - मकोड़े, बेचारे वहीं के वहीं रह गए और वह पशु से मनुष्य बन गया।बंदर आज भी बंदर है, गधा आज भी गधा है, गाय-भैंस आज भी गाय -भैंस ही बने हुए हैं।नाली का कीड़ा आज भी नाली में और सुअर आज भी नाले में किलोलें करते हुए देखे जा सकते हैं। पर वाह रे !मानव, तारीफ़ है तेरी की तू कहाँ से कहाँ पहुँच गया! तू कभी गीदड़ की तरह गुफ़ावासी था , अब महलवासी हो गया। बनैले हिंसक शेर , चीते ,भालू आदि से जान बचाने के लिए भय वश तू पेड़ों पर घोंसले बना कर रहता था , अब एअर- कंडीशंड कमरों में विलास करता है।अब तू पशु नहीं है , न पक्षी और न ही कोई कीड़ा मकोड़ा ।(यह अलग बात है कि कुछ मानव देहधारी प्राणी आज कीड़े-मकोड़ों, कुत्ते ,बिल्लियों की जिन्दगी से भी बदतर जीवन जी रहे हैं।) आमतौर से मानव तिर्यक औऱ इन यौनियों से बहुत ऊपर जा चुका है।

                     आज जंगली जानवरों, चिड़ियों , जलचर जीवों, कीड़े -मकोड़ों, दीमक , चींटी , चींटे में जो एकता ,संगठन औऱ प्रेम संबंध मिलता है ,वह मनुष्य जाति से विदा हो चुका है। आप जानते ही हैं कि अब वह प्रबुद्ध मानव है।अब उसे अन्योन्याश्रित जीवन जीने की क्या आवश्यकता ? वह अब कमजोर थोड़े ही है ,पशुओं ,पक्षियों की तरह! वह बुद्धि बल औऱ देह बल में इनसे आगे निकल कर केवल अपने परिवार ,संतान ,और कुटुम्ब के लिए ही जीने में जीवन की सार्थकता मानता है। उसे अब अपने स्वार्थ में दूसरे के सहयोग की भी आवश्यकता नहीं है। वह अकेले जीने में खुश ही नहीं, संतुष्ट भी है।उसे अपने छोटे से घरौंदे के घेरे में ही रहना और जीना पसंद है।

                     अब आज का मानव एकता में नहीं ,विभाजन में विश्वास करता है। इसलिए उसने वर्ण- भेद, जाति- भेद, भाषा -भेद, क्षेत्र -भेद ,प्रदेश -भेद, जनपद -भेद, नगर -ग्राम -भेद, और न जाने कितने भेद में विभाजित होकर खंड - खंड होकर जीने को ही सुखी जीवन की आधार शिला माना है। मुँह से एकता, अखण्डता, संगठन के गीत गाने वाला मानव इन सब को केवल आदर्श की किताबों, उपदेशों, कविताओं और गीतों में लिखकर रखता है, लेकिन वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। उसे प्रेम के बजाय लड़ना अधिक पसंद है। तभी तो महाभारत और दो - दो विश्वयुध्द हुए । तीसरे विश्वयुध्द की तैयारी में बारूद के ढेर पर बैठकर परमाणु बम बनाकर उस 'शुभ पल' की प्रतीक्षा में उतावली से बैठा हुआ है। खून -खराबा देखने में आनन्द लेना ,मनुष्य की हॉबी है। तभी तो मरते हुए आदमी को बचाने के बजाय उसके वीडियो बनाना, फ़ोटो खींचना उसे ज्यादा पसंद है। उसे किसी के मरण को अपना प्रिय उत्सव बनाना उसका बहुत ही रोचक कर्म है। कहीं आग लगे, दुर्घटना हो , किसी के प्राण निकलने वाले हों, तो वह सबसे पहले अपना मोबाईल निकाल कर पत्रकार की भूमिका में आकर उसे प्रसारित करना अपना धर्म समझता है। उसका यह कृत्य उसे पशुओं से भी बहुत ऊपर उठा देता है। 

               चील ,कौवे, गौरैया, मोर , कोयल, हंस आदि पक्षी, गधे ,घोड़े , गाय बैल, भैंस, बकरी ,भेड़ आदि पालतू पशु, शेर ,चीते , हिरन, खरगोश, सर्प ,गिरगिट , चींटे ,दीमक, चमगादड़, मक्खी , मधु मक्क्खी, भौरें, तितलियाँ आदि कभी रंग भेद या जाति के लिए एक दूसरे के खून के प्यासे नहीं देखे गए। बेचारे इतना वृहत दिमाग़ कहाँ रखते    हैं कि वे महायुध्द कर अपनी अभिजात्यता सिद्ध करें! यह  तो 'अति बुद्धिमान' मानव ही है कि वह छोटी - छोटी बात पर दूसरे मज़हब,जाति औऱ वर्ण के रक्त का प्यासा बनकर उसे चाट जाने में ही अपने को उच्च मानता है। 

                 मानव को ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों में विभाजित होकर उसे बड़े गर्व की अनुभूति होती है। अपने को उच्च और अन्य   को हेय मानकर उसे    निम्न  सिद्ध करने में बड़ा आनन्द आता है। इसी प्रकार ईसाई, यहूदी , मुस्लिम,औऱ न जाने कितने मानव विभंजक रूप हैं ,जो नहीं चाहते कि दुनिया में शांति रहे। उसे लड़ने-लड़ाने में जो आनन्द आता है , वह कहीं भी नहीं मिलता। लड़ाने वाले लड़ाकर आनन्द मनाते हैं। 'अति बलशाली 'लड़कर अपनी मनः शांति मनाते हैं, अपने अहंकार में मिट जाना सहर्ष स्वीकार है मानव को, किन्तु शांति प्रियता उसे कायरता का पर्याय प्रतीत होती है। 

            युद्धप्रियता मानव का प्रिय 'खेला'  है। यही उसकी प्रियता का मेला है । आख़िर मानव भी तो लाल रंग का चेला है।अब वह चाहे साड़ी में हो या माँग में, चूड़ी में हो या दिमाग़ में,रक्त में हो या अनुरक्ति में (प्रेम में, मनुष्य प्रेम का रंग भी लाल मानता आया है , वही रंग शृंगार का भी है।)।इसीलिए किसी युग के राजा लोग युद्ध में लाल खून की नदी बहाकर दूसरे राजा की पुत्री या रानी को छीनकर लाल लाल जोड़े में लाल शृंगार की लाल-लाल सेज पर सुहाग रात मनाते थे। 

                   'विनाश काले विपरीत बुद्धि' के सिद्धांत का उद्घोषक और मान्यता देने वाला मानव इसके विपरीत चलना ही उचित मानता है। आप तो जानते ही हैं कि इनके सिद्धांत केवल उपदेश, ग्रंथों की शोभा बढ़ाने और दूसरों को बताने ,(स्वयं करने के लिए नहीं),अपने धर्म की शेखी बघारने, अपनी अभिजात्यता का डंका पीटने-पिटवाने औऱ प्रदर्शन के लिए ही तो हैं। अब पशु-पक्षी बेचारे क्या जानें ये आदर्शों की 'ऊँची - ऊँची बातें' ! आइए हम सब सब आपस में लड़ें ,कटें, मिटें और पशु - पक्षियों के ऊपर अपने मानव - साम्राज्य की आवाज़ बुलंद करें। अंततः मानव पहले मानव है , बाद में पशु भी हो सकता है। जब मानव होने पर उसका ये हाल है ,तो पशु होने पर क्या हाल होगा ,कल्पनातीत है। भले ही वह कोयल के कलरव, मोरों की मेहो !मेहो !! गौरैया की चूँ -चूँ , कौवों की कांव - कांव ,शहर - शहर या गाँव -गाँव में कोई भी उसे सुनने मानने वाला न हो।

 इसीलिए तो मैंने कहा कि 'मानव पहले मानव है , बाद में पशु।'

 🪴 शुभमस्तु ,! 

 २३.०६.२०२१◆११.१५आरोहणम मार्तण्डस्य।

इंद्रधनुष 🌈 [बालकविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सात   रंग  की   पाँती   सोहे।

वक्र,गगन  में दृग  मन मोहे।।


यह  शुचि इंद्रधनुष कहलाता।

हम सबका वह मन बहलाता।


सुबह  पश्चिमी  नभ  में होता।

संध्या   वेला   पूर्व    उदोता।।


पहला   रँग   है   जैसे  बैंगन।

कहें बैंगनी  घर के सब जन।।


फ़िर नीले   की   आती  बारी।

ज्योंअलसी की पुष्पित क्यारी


आसमान का रँग अब आता।

नयनों को  है कितना भाता।।


हरे रंग का  फ़िर क्या कहना!

हरित विटप का बहता झरना।


नीबू   जैसा  रँग  अति पीला।

नारंगी - सा    वर्ण   रसीला।।


अंतिम  लाल  रंग  मन भाया।

नभ  में इंद्रधनुष शुभ छाया।।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०६.२०२१◆११.४५आरोहणम मार्तण्डस्य।

राष्ट्र -धर्म कैसे निभे! 🎋🌾 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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उदर,वंश, निज जाति की,चिंता में रत लोग।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे, सबसे पहले   भोग।।


जाति,  वर्ण  के  भेद  से ,  टूट रहा  है  देश।

राष्ट्र - धर्म  कैसे   निभे,दूषित उर - परिवेश।।


योग - दिवस  की  रस्म में,डूब गए  आकंठ।

राष्ट्र -  धर्म  कैसे  निभे, योगी, भोगी,  लंठ।।


एक  दिवस  है  योग  का,शेष सूपड़ा  साफ़।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे,रोग न करता  माफ़।।


मैं  ऊँचा   सब  नीच हैं,अहंकार  का  रोग।

राष्ट्र - धर्म कैसे  निभे, खंड - खंड हैं लोग।।


चार  बैल  मति - फूट   में,फूटे उनके भाग।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे,डसे जा   रहे  नाग।।


चार  वर्ण  बदरंग  हो,खंड - खंड मति भिन्न।

राष्ट्र - धर्म  कैसे निभे,मति चारों  की खिन्न।।


छिलका  लिपटा  संतरा,बाहर से   है एक।

राष्ट्र-धर्म कैसे निभे, फाँकें भिन्न   अनेक।।


टर्र - टर्र  सबकी  पृथक, नहीं एक  संगीत।

राष्ट्र - धर्म कैसे निभे,मिले न मन का मीत।।


झूठी, थोथी   एकता, का करते   गुणगान।

राष्ट्र - धर्म  कैसे  निभे,नेता यहाँ    महान।।


मत,सत्ता,पदवी मिले,यही 'शुभं'शुचि मन्त्र।

राष्ट्र -  धर्म  कैसे  निभे,ऐसा यह  जनतंत्र।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०६.२०२१◆११.००आरोहणम मार्तण्डस्य।


रविवार, 20 जून 2021

ग़ज़ल 🌴

  

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✍️ शब्दकार©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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काले  दिल  वालों  से ख़तरा,

दुश्मन की चालों   से  ख़तरा।


जिनके   भीतर   जंग लगी है,

बंद  पड़े   तालों    से  ख़तरा।


घर  में  रहें   विभीषण   जैसे,

ऐसे  घर    वालों  से   ख़तरा।


तन के गोरे   मन    के   काले,

गिरगिटिया  खालों से ख़तरा।


पीकर  दूध  ज़हर    ही उगलें,

दाढ़ी   के   बालों   से  ख़तरा।


शांतिदूत  के परचम - वाहक,

पापी परकालों   से    ख़तरा।


'शुभम' मुखौटे    वाले   धोखे,

छिपे   हुए   गालों  से ख़तरा।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०६.२०२१◆२.३०आरोहणम मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🌳

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जागो  देश  पुकार   रहा   है।

तू  क्यों  हिम्मत हार  रहा है।।


महाबली   तू    हनुमत  जैसा,

मन ही मन सत मार  रहा  है।


कर ले  याद  अतीत हिन्द का,

सूर्योदय    का  द्वार   रहा  है।


तू  अपना अस्तित्व  बचा  ले,

नित प्रति जग को तार रहा है।


नहीं  भुजाओं  में बल कम है,

दुश्मन  को  तू  खार   रहा है।


भोथी कर  तलवार  न अपनी,

हितकारी   दो  धार   रहा   है।


'शुभम'उठ खड़ा हो कटि कस ले,

तू   जगती   का   प्यार    रहा है।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०६.२०२१◆२.००आरोहणम मार्तण्डस्य।

माँ 🏕️ [ मुक्तक ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                      -1-

मेरे अस्तित्व का हर कण तुम्हारा है,

तुम्हीं कारण तुम्हीं से तन हमारा है,

मेरे मन में सदा जागृत जीवंत हे माँ!

तुम्हीं ने मेरे संस्कारों को सँवारा है।

  

                        -2-

माँ  का  दूध  ही है रक्त  मम तन का,

माँ का  वजूद    सर्वस्व   मम मन का,

माँ हो तुम्हीं मम भाव कल्पना वाणी,

माँ हो तुम्हीं सर्वोच्च इस तन कन का।


                        -3-

जीवंत  स्नेह   का रूप मेरी जननि माँ है,

सदा  ही  निवारे  कष्ट  वही मेरी  माँ  है,

सोते  जागते  सदा  साक्षात आँखों   में,

जीवन का दृढ़ कवच एक वह मेरी माँ है।


                          -4-

पिता अगर  आकाश धरा है मेरी  माता,

व्यापक पिता महान धैर्य है जननी माता,

माँ की तुलना नहीं किसी से भी हो पाती,

मैं  शिशु हूँ नादान स्नेह- आँचल है माता।


                          -5-

संस्कार  शिक्षा   की   पहली गुरु  माता  है,

होती संतति सुखी जननि को जो ध्याता है,

माँ  की  समता में न टिका है कोई  भू  पर,

सुत 'शुभम' का  अपनी माँ से ये  नाता  है।


🪴 शुभमस्तु !


१७.०६.२०२१◆१०.३०आरोहणम मार्तण्डस्य।

एक हिमालय एक तिरंगा🇮🇳 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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तार -  तार   भारत   माता के,

वसन  फटे  हैं  बिखरे   बाल।

आँखों  पर  संतति पट  बाँधे,

देखो  ये   माता    के  लाल।।


एक  हिमालय   एक  तिरंगा,

एक    मात्र    पावन    गंगा।

क्लीव हो गया  मानव  कैसे,

जिसे  देख   लो   है   नंगा।।

ढोंग  दिखाता  केसरिया का,

वृथा ठोंकता  है  नर  ताल।।

तार -  तार  भारत  माता के,

वसन  फ़टे  हैं बिखरे  बाल।।


वीरों का  इतिहास थाम कर,

उसको  शर्म     नहीं   आती।

संभा जी   रणवीर  शिवा जी,

की  करनी  क्या सिखलाती।।

ऋषियों का वंशज कहलाता,

आँसू  रोते भर -  भर गाल।।

तार - तार  भारत    माता के,

वसन  फ़टे हैं  बिखरे  बाल।।


केरल का  क्या  हाल हुआ है,

देख - जान  कुछ   सोचा   है?

टाँगों  में जो   हरा -  हरा   है,

जटिल  बड़ा  ही  लोचा  है।।

नेता   को  बस  वोट  चाहिए,

जड़ें  खोदता    तेरा   काल।

तार - तार   भारत  माता  के,

वसन फ़टे  हैं  बिखरे  बाल।।


आग लगी   बंगाल  धरा  पर,

नयन   बंद   कर   बैठे    हो !

चीत्कार  सुन कर  भी  बहरे,

राजनीति -  गृह   पैठे    हो!!

कहाँ गई   सब   ऐंठ हेकड़ी,

मंद पड़   गई   तेरी    चाल।

तार  -  तार  भारत  माता के,

वसन  फ़टे  हैं  बिखरे  बाल।।


भुना  रहे  अतीत   का  गौरव,

नाम   बेच  कर    खाते    हो !

सत्ता  पद हासिल   करने को,

जनता   को    भरमाते   हो !!

जुबां  काट  लेते  हो  सत की,

दिखलाता  जो सच्चा   हाल।

तार -  तार   भारत   माता के,

वसन  फ़टे हैं   बिखरे  बाल।।


क्रीत  मीडिया   टी.वी. चैनल,

खबरें छाप    रहे    अखबार।

वे तव   इच्छा   के   गुलाम हैं,

रहते   हैं जो   अश्व -  सवार।।

जनता तड़प रही मछली-सी,

छ्द्म  आँकड़ों के सब जाल।।

तार -  तार   भारत माता के,

वसन फ़टे  हैं  बिखरे  बाल।।


शुभ का श्रेय शीश निज बाँधा

कुत्सित   कर्म    पराए  नाम।

अपनी पीठ   आप   ही ठोंकें,

करते  औरों   को   बदनाम।।

'शुभम'  युगों  से जो पाया है,

वह सब अपने  नाम बहाल।।

तार -  तार  भारत   माता के,

वसन   फ़टे  हैं  बिखरे बाल।।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०६.२०२१◆५.४५पत नम  मार्तण्डस्य।


🏔️🇮🇳🏔️🇮🇳🏔️🇮🇳🏔️🇮🇳🏔️

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...