गुरुवार, 23 सितंबर 2021

बेटी के प्रति 🪅

  

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अपने   पिता   के   बाग  की,

बेटी   तू   नन्हीं    पौध     है।

रोपूँ   वहाँ   शुभ    बाग़    में,

कर्ता   लिखी   जो  औध है।।


फूले -  फले    हे   आत्मजे!

मेरा   सजल   आशीष    है।

उस वंश की   विकसे  लता,

जिस पर कृपामय   ईश है।।


कर्तव्य   अपना   कर   रहा,

जो    है   यथासम्भव   मुझे।

मत  भूलना माँ - जनक को,

हम भी   न   भूलेंगे    तुझे।।


दो कुलों    की  ज्योति बेटी,

दो   कुलों  का    मान    तू।

वह ज्योति  नित जलती रहे,

आँगन की   मेरे   आन  तू।।


आशीष  के   शुभ  शब्द   दो,

तुझ  पर  निछावर  कर रहा।

तेरा    पिता    नेहिल   सुता!

क्यों अश्रु झर-झर झर बहा।।


 🪴शुभमस्तु  !

२३सितम्बर २०२१◆५.१५पतनम मार्तण्डस्य।

गूँगे बोल नहीं पाते हैं!🙉 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गूँगे    बोल   नहीं    पाते    हैं,

बहरे  भी   कब   सुनते     हैं!

जिनके  दोनों   नयन  नहीं  हैं,

एक    सहारा     चुनते    हैं ।।


अपनी धुन में मस्त  सभी  हैं,

कौन  किसी   की  मान रहा।

जो   मेरा   संदेश   पढ़   रहा,

अज्ञानी    वह   गया  कहा।।

तंतुवाय - से  वे   सब  चादर,

खोए -    खोए     बुनते    हैं।

गूँगे  बोल  नहीं     पाते     हैं,

बहरे  भी   कब   सुनते   हैं!!


उपदेशक,पंडित,  ज्ञानी  भी,

शिक्षक, वैद्य , हक़ीम   खड़े।

नेता ,  दानी , चमचे  भी   हैं,

भरे    भगौने   लिए    अड़े।।

कवियों में दूल्हा वे किसको,

मिलकर    सारे   चुनते   हैं?

गूँगे   बोल   नहीं   पाते    हैं,

बहरे  भी  कब    सुनते   हैं!!


मंचों   पर    चौपालें   लगतीं,

मीन -  मेख      वाहा - वाही!

सीख समीक्षक की भी भारी,

आपस  में     चाहा -  चाही।।

नौसिखिया शरमाते   मन  में,

अपना  ही   सिर   धुनते   हैं।

गूँगे  बोल    नहीं     पाते   हैं,

बहरे  भी  कब    सुनते   हैं!!


कोई   जोकर   जोक  सुनाता,

कोई    ज्ञान    बघार      रहा।

कोई बना चिकित्सक अनपढ़,

साधू    देश    सुधार    नहा।।

रक्त , दाम की माँग  चल रही,

मन ही  मन   जन   घुनते  हैं।

गूँगे    बोल     नहीं   पाते   हैं,

बहरे  भी   कब    सुनते   हैं!!


अपनी -  अपनी   बजा रहे हैं,

ढपली सब स्वर  साज बिना।

नहीं  दूसरे  की   कुछ  सुनते,

रहते   सबसे   सदा    घिना।।

मौन  साधकर  पढ़  तो  लेते,

धागा  एक   न    बुनते     हैं।

गूँगे  बोल     नहीं   पाते   हैं,

बहरे  भी   कब    सुनते  हैं!!


मिलता पानी नहीं अतिथि को

लिए   मोबाइल   घायल - से।

पड़े हुए  सब   यहाँ   वहाँ  वे,

झनक  न  आती   पायल से।।

संक्रामक बीमारी   घर -  घर,

नहीं  किसी  से     रलते    हैं।

गूँगे   बोल   नहीं    पाते    हैं,

बहरे  भी  कब    सुनते    हैं!!


मोबाइल  की  इस डिबिया ने,

ऐसा   जाल     बिछाया    है।

बच्चे  से   लेकर    बूढ़े   तक,

सबको  ही    भरमाया     है।।

चहल -पहल लूटी हर घर की,

सन्नाटे   ही      पलते      हैं।।

गूँगे   बोल   नहीं     पाते   हैं,

बहरे  भी   कब   सुनते    हैं!!


🪴 शुभमस्तु !


२३सितम्बर२०२१◆१२.१५पतनम मार्तण्डस्य।

वैदेही 🧡🧡 [ अतुकांतिका ]


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✍️ शब्दकार  ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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विदेह हो तुम

अदृष्ट निराकार,

चर्म-चक्षुओं के उस पार,

पूरित तुम में 

तत्त्व भरित  सार,

महिमा अपार।


मेरे अंतर्मन में

नित नए -नए  रूपों में

बदल-बदल कर

अदृश्य वसन,

बिना किसी यत्न,

अवतरित होती हो,

भावों के राग में

डुबोती हो।


लगता नहीं

मुझे तुम कभी सोती हो?

सोती है मेरी देह,

निस्संदेह,

अनवरत अनथक 

जागती होती हो।

सोच भी नहीं पाता मैं

कि तुम मेरी हो,

हाँ ,हाँ तुम मेरी हो।


तुम्हीं ने दी हैं

मुझे कितनी कविताएँ,

कितने लेख 

कितनी नव रचनाएँ,

कितने ग्रंथ, खंड काव्य

महाकाव्य ,

जितना भी था मुझसे संभाव्य,

बन गया है आज 

वही मेरा सौभाग्य,

किन्तु सदा मौलिक ही,

कभी कोई बासीपन नहीं,

पुनरावृति नहीं,

सदवृत्ति ही बही,

जो भी बात तुमने  कही।


मैं भी क्या हूँ!

एक खोखला ढोल ही तो!

तुम्हारा ही नृत्य साज बाज,

ध्वनि संयोजन का राज,

रस, अलंकार, छंद,

गीतों के बोल 

नव बंध,

मात्रा स्वर व्यंजन,

जैसे उछलते हुए खंजन,

लय गति प्रवाह

 तुम्हारी ही शुभ वाह !वाह!!

सब तुम्हारा ही तो है।


कहते हैं सब

रचना मेरी है,

परन्तु यथार्थ है यही

कि तुम्हारे बिना

सब अँधेरी ही अँधेरी है,

मेरी ये छोटी सी बुद्धि

तुम्हारी चिर चेरी है।


तुम हो यों तो 

सबके ही पास,

पर वे सब हैं बड़े उदास,

उन्हें नहीं है तव आभास।।

 पूज्या माँ वीणावादिनी ने

सबको नहीं दी वह कला,

कि उनका एक भी वाक्य

रचना में  नहीं ढला,

सभी हो जाते यदि 

मानव कवि,

नहीं बना सकता

हर व्यक्ति स्वयं को हवि।


वैज्ञानिकों ने खोज डालीं

रहस्य की खोज,

भूगोल खगोल में 

हर रोज़,

नहीं होती कहीं

वैज्ञानिकों की फौज,

कवियों का भी

 वही हाल है,

उनमें से अकिंचन 'शुभम' भी

एक नन्हीं दाल है।


शत - शत नमन करता है

तुम्हारा ये 'शुभम',

प्रार्थना है यही 

न हो तुम्हारी कृपा

कभी भी कम,

जन्म जन्मांतर तक

तुम्हारी साधना आराधना

करता  रहूँ,

जीव मात्र की 

हित साधना में रत रहूँ,

ऐ ! मेरी उरवासिनी,

वैदेही कल्पने!


🪴 शुभमस्तु !


२३ सितम्बर २०२१ ◆९.५५आरोहणं मार्तण्डस्य।

बुधवार, 22 सितंबर 2021

पत्थर के प्रभु 🛕 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🛕 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पत्थर के प्रभु अगर न होते।

तुमसे हम   बतियाते  होते।।


मंदिर में  जब   हम  जाते हैं।

बात  न अपनी कह  पाते हैं।।

दिखे  न हमको  हँसते- रोते।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


भोग  नहीं   तुम  थोड़ा खाते।

फिर भी तुम प्रसाद खिलवाते।

पता नहीं  कब जगते - सोते।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


मूर्तिकार   ने   तुम्हें   बनाया।

लोगों ने फिर   खूब सजाया।।

स्नान   कराते   दे - दे    गोते।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


वसन रजत- भूषण  पहनाते।

इत्र  लगाकर  भी   महकाते।।

बजते घंटे    ले -  ले    झोंटे।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


धूप दीप की ज्योति जलाकर।

करते हम  आरती   उजागर।।

'शुभं' न खुश फिर भी तुम होते।

पत्थर के प्रभु  अगर न होते।।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०९.२०२१◆६.१५पतनम मार्तण्डस्य।


शहीद भगत सिंह 🤺 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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भगत सिंह की अमर शहादत,

करते     भारतवासी    वंदन।

चूम  लिया  फाँसी  का फंदा,

बनी देश की   माटी   चंदन।।


बंगा   ग्राम  जिला  लायलपुर,

में  जन्मा   वह  पूत  देश का।

प्रांत धरा   पंजाब   जन्म  की,

साक्षी थी वह सिक्ख वेश था।

क्रांति  प्रणेता  देशभक्त   वह,

करता है जन- जन अभिनंदन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


धनी कलम का चिंतक लेखक

पत्रकार   वह   महामना  था।

देशप्रेम   का   लावा   उसकी,

रग-रग में सरि सा उफना था।

नहीं चैन  से   सोता  था  वह,

नहीं फ़िरंगी  लगते  प्रियजन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


किया  कठिन   विद्रोह  देश में,

 काकोरी   में   लूट   खज़ाना।

नाम  उज़ागर   किया भगत ने, 

निर्भय  वीर सिंह  जग जाना।।

जलियाँवाला    बाग  कांड से,

जलने लगा  देह का कन-कन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते   भारतवासी     वंदन।।


बिस्मिल  राजगुरू   का साथी, 

भगत सिंह रसगुल्ला प्रिय था।

बड़ा  शौक  फिल्मों  का उसको,

देशप्रेम  रत उसका हिय था।।

उड़ा  दिया   सांडर्स  फेंक बम,

धीर   वीर   भारत  का   है धन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


स्वर्ण अक्षरों     में   अंकित वह,

 भगत   सिंह का नाम अमर है।

अंतिम  साँसों   तक   जो  जूझा, 

अग्निशिखावत किया समर है।।

साथ  दिया   आज़ाद   वीर ने,

नहीं जानता  है  यह जन- जन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०९.२०२१◆११.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।


शब्द आधारित सृजन 🌸 [ दोहा ]


(चंपा, परिमल,मकरंद,कली,प्रभात)

             

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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चंपा  खिलती  बाग  में,लेकर रूप  सुगंध।

मोहक पीले पुष्प पर,अलि को है प्रतिबंध।।


चंपा राधा  रूपिणी, भ्रमर कृष्ण का भक्त।

इस  मर्यादा  हेतु ही,भ्रमर न हो अनुरक्त।।


परिमल तेरे रूप का, मादक विमल अपार।

 हम भँवरे  आए  हुए, पीने रस   की  धार।।


परिमल में विद्वान सब,चर्चा कर सुविचार।

श्रोता जन  को  मोहते,  करते  ज्ञान प्रसार।।


बेला की कलिका खिली,मीठा नव मकरंद।

परिमल से आकृष्ट हो,अलि झूमे स्वच्छंद।।


लोभी   मैं  मकरंद का,आया   तेरे  पास।

भौंरा  बोला  पुष्प से,सत्य, नहीं  परिहास।।


कली-कली खिलने लगी,हुई सुनहरी भोर।

पादप  पर   करने  लगे,सारे पक्षी    शोर।।


अभी कली  फूली नहीं, आकर्षण -आगार।

जब  बन  जाए  फूल तू,हमें हनेगा   मार।।


रूपसि  तेरे रूप का,मधु लावण्य  प्रभात।

फूले रूप - तड़ाग में,'शुभम'रूप जलजात।।


नव प्रभात कर भानु से,लिखता है शुभवार।

कहता नहीं उदास हो,'शुभम' न होगी हार।।


चंपा परिमल ले खड़ी, किंतु नहीं मकरंद।

ये प्रभात भी सोचता,कली खिली स्वच्छंद।


🪴शुभमस्तु !


२२.०९.२०२१◆७.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


मंगलवार, 21 सितंबर 2021

  झूठा पुराण बनाम जैसी बहे बयार ⛵

 [ व्यंग्य ] 

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 ✍️ व्यंग्यकार ©

 ⛵ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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        अथ  'झूठा पुराणम' प्रारभ्यते ।

          हमारी हिंदी में एक प्रसिद्ध कहावत है :'जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै'।इस छोटी - सी कहावत में बड़े - बड़े सत्य छिपे हुए हैं। आज के युग में इसकी प्रासंगिकता में कई गुणा वृद्धि हुई है और निरंतर गुणात्मक रूप से अनवरत वृद्धि का स्तर ऊपर चढ़ता जा रहा है।हम जमाने के साथ कदम से कदम मिलाते हुए अग्रसर होने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं।छोड़नी भी नहीं चाहिए। 

          सच को कभी भी बिना सोचे समझे मत बोलिए।यदि आपके दुर्भाग्यवश आपने ऐसा कर दिया तो आपको पछताने के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।इसलिए सच को इस प्रकार डर- डर कर बोलिए, जैसे आप कोई पाप कर्म करने जा रहे हैं। यदि किसी ने आपको सच बोलते हुए देख लिया अथवा पकड़ लिया तो कितने भी झूठ बोलकर भी आप बच नहीं सकेंगे।इसलिए धोखे से भी सच को अनायास जुबां पर मत लाइए ।

              अरे!क्या आप ही अकेले सत्य हरिश्चंद्र की औलाद हैं कि आपने सच बोलने का ठेका ले रखा है? सच को तो स्वप्न के लिए भी बचा कर अपनी तिजोरी में मत रखिए। आपको यह भी अच्छी तरह से मालूम है कि राजा हरिश्चन्द्र ने ऋषि विश्वामित्र को अपना सम्पूर्ण राजपाट दान में दे दिया था। उनका वह स्वप्न भी स्वप्न नहीं रहा । सुबह होते ही वह सच साबित हो गया! औऱ राजपाट लेने के लिए सच में ऋषि विश्वामित्र जी राजदरबार के सामने उसे ग्रहण करने के लिए उपस्थित हो ही गए न? फिर क्या ! स्वप्न में किया गया वादा राजा हरिश्चन्द्र को पूरा करना पड़ा। कहाँ लोग कहते हैं कि सपने तो टूट जाने के लिए ही होते हैं। वे कभी सच नहीं होते।देखा!सपना भी सच हो गया और सच का नतीजा भी देख लिया। राजा, राजा नहीं रहे, सत्य के कारण भिखारी बन गए।क्या आप ऐसे सत्य का साथ देकर भिखारी बन जाने के लिए तैयार हैं?

                 इसलिए सच से सदा सावधान रहें।सच बोलना,सच को धारण करना, सचाई की सीख देना ,सचाई का अनुगमन करना : ये सब कुछ छोड़ ही दीजिए।ये सब इतिहास की बातें किताबों में पढ़ने में ही अच्छी लगती हैं। इन्हें तो इतिहास के साथ ही दफना दीजिए । पूर्व में ही कही गई कहावत को मन - मस्तिष्क में धारण कर लीजिए : 'जैसी बहे बयार.....' 

             आप देख,सुन और समझ रहे हैं कि झूठ का बोलबाला है। सच का मुँह काला है। अतः मित्रो ! झूठ को ही जीवन में सर्वांगीण रूप से धारण करें। उसी के सपने देखें।झूठ बोलने के लिए कुछ भी सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं है।इसलिए धड़ल्ले से झूठ की मूठ में समा जाइए।झूठे लोगों का अनुसरण ,अनुगमन करने में ही (आपकी अपनी कल्याण की परिभाषा के अनुसार) आपका कल्याण है। जब सच रहा ही नहीं ,तो उसकी परिभाषा भी बदल गईं ।इसलिए जैसी जमाने की हवा चल रही है, उसी के साथ उड़ते रहना, चलते रहना,अनुगमन करना यही सर्वाधिक श्रेयस्कर है। 

          झूठ की एक विशेषता यह भी है कि एक बोलो ,सौ बोलो ,हज़ार बोलो : वह झूठ नहीं लगता। वह सच का भी परबाबा बन जाता है। वह जीवंत होकर विश्वास का बीजारोपण कर देता है। इसलिए सर्वांश में झूठ को आज भगवान मान लीजिए। इसलिए थोड़ा नहीं , जी भरकर झूठ ही झूठ बोलें। यदि विश्वास नहीं हो तो हाथ कंगन को आरसी क्या! ज्यादा दूर नहीं जाना, अपने चारों ओर खड़े नेताओं ,सियासतदानों औऱ सियासती दलों को देख लीजिए कि वे किस बेशर्मी से वे झूठ का दामन थामकर " देश का कल्याण ?" करने में लगे हुए हैं। वे जितना भी झूठ बोलते हैं ,वह जनता में सैकड़ों गुनी रौशनी फैलाता है। फिर वह मानव नहीं ,देव दूत बनाकर पचास किलो की माला से पूजा जाता है। उसकी हड्डी,माँस, रक्त ,मज्जा,त्वचा आदि के भार के बराबर तराजू में तोला जाता है। ये सब कमाल एक मात्र झूठ का ही तो है।

        आज का आदमी बहुत बुद्धिमान है। वह बिना स्वार्थ के किसी के कटे हुए पर स्व- मूत्र विसर्जन भी नहीं करता। फिर आप उससे क्या आशा बनाए रखकर अपने विश्वास की मंजिल खड़ी कर सकते हैं? वह झूठ का पक्का अनुयायी बन चुका है। सारे खोंमचे, चमचे , भगौने बस झूठ की 'मधुर' खीर की हँड़िया में आकंठ निमग्न हैं। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि एक मात्र सहारा अब 'झूठ भगवान' का ही बचा है। इसलिए उनके धर्म, कर्म, व्यक्ति, समाज, उत्सव, दंगल, सर्वत्र झूठ का साम्राज्य है।नौकरी में 'अन्य आय' (इसे आप अन्याय न समझें), उत्कोच, व्यापार में मिलावट, सब कुछ झूठ की आधार -भूमि पर ही तो प्रतिष्ठित है।

             झूठ के बिना हानि ही हानि है। आज झूठ , झूठों, झूठनुयायियों का युग है। सच औऱ सचाई के रास्ते पर चलकर महक दुमहले बनाना तो दूर की टेढ़ी खीर ही समझिए, आपको दो वक्त के निवाले के भी लाले पड़ जाएंगे। इसलिए यह तो मानना ही पड़ेगा : 

  झूठ बिना जीवन नहीं,झूठ आज भगवान।

 झूठ बिना मिट जाएगी, मानव तेरी शान।।    


  खाना पीना पहनना,   रहना सहना झूठ।

 झूठ छोड़ तुमने दिया, जाए किस्मत रूठ।।


 झूठ पाप होता नहीं, झूठ  आज है पुण्य।

 नेता जी से पूछ लें,   कर देंगे अनुमन्य।।


 एक  नहीं   दो  भी  नहीं, बोलें  झूठ हज़ार। 

 मान बढ़े  संसार  में, देखें   नित्य बहार।।


 झूठे नित फल फूलते, चमके जग में नाम। 

 अखबारों में छप रहे,करता जगत प्रनाम।।


 चलिए सबके  साथ ही ,जैसी    बहे    बयार। 

 शेर बने तनकर रहें,मिलता 'शुभम' पियार।। 


 झूठों का  अनुगमन कर ,चलें भेड़ की चाल। 

 देखेगा संसार सब,   जब   हों  मालामाल।। 


 इति झूठा पुराणम समाप्यते। 


 🪴 शुभमस्तु ! 


 २१.०९.२०२१◆६.३० पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...