मंगलवार, 31 मार्च 2026

बौराए हैं आम [ गीत ]

 121/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बौराए हैं आम

बाग में

महक रही है अमराई।


ऋतु वसंत का

हुआ आगमन

कुहुक-कुहुक कोकिल कूके

कानों में 

अमृत घुलता है

नहीं एक पल को चूके

कभी हवा

चलती है पछुआ

कभी लहकती पुरवाई।


भौंरे चले

झुंड में  अनगिन

चलो मंजरी को चूमें

मतवाले हों

पीकर मधुरस

ले-ले अँगड़ाई  झूमें

मुस्काती हैं

अरुण कोंपलें

गमक रही नव तरुणाई।


रहें तितलियाँ

क्यों अलि दल से

मधुरस पीने में पीछे

रंगबिरंगी

पहन साड़ियाँ

चहक रहीं ऊपर नीचे

भू पर बिछी

पीत चादर-सी

मंजरियों की उफनाई।


शुभमस्तु,


31.03.2026◆5.15 आ०मा०

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नील गगन की छटा [ गीतिका ]

 120/2026


   



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नील  गगन  की  विमल   छटा है।

नहीं  तनिक भी   कहीं  घटा   है।।


चैत्र मास   मधु    बाँटे    प्रतिदिन,

अलि   गुंजन   से   बाग  पटा  है।


तपने    लगा   गगन    में     सूरज,

लटकी  वट  की सघन  जटा   है।


ब्रह्म    मुहूरत    में     आ    चहके,

चिड़िया , प्रभु का नाम   रटा  है।


वन   में   गए   भ्रमण   करने  हम,

मिला न  किंचित  एक    गटा   है।


करती है   कल - कल  सुरसरिता,

नहीं  नीर     में     कहीं   भटा  है।


राजा   है     वसंत   ऋतुओं    का,

'शुभम्'   यत्र   सर्वत्र    खटा    है।


शुभमस्तु,


30.03.2026◆ 5.45 आ०मा०

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नहीं घटा है [ सजल ]

 119/2026


           


समांत          : अटा

पदांत           : है

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन     : शून्य.


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नील  गगन  की  विमल   छटा है।

नहीं  तनिक भी   कहीं  घटा   है।।


चैत्र मास   मधु    बाँटे    प्रतिदिन।

अलि   गुंजन   से   बाग  पटा  है।।


तपने    लगा   गगन    में     सूरज।

लटकी  वट  की सघन  जटा   है।।


ब्रह्म    मुहूरत    में     आ    चहके।

चिड़िया , प्रभु का नाम   रटा  है।।


वन   में   गए   भ्रमण   करने  हम।

मिला न  किंचित  एक    गटा   है।।


करती है   कल - कल  सुरसरिता।

नहीं  नीर     में     कहीं   भटा  है।।


राजा   है     वसंत   ऋतुओं    का।

'शुभम्'   यत्र   सर्वत्र    खटा    है।।


शुभमस्तु,


30.03.2026◆ 5.45 आ०मा०

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कविता के दरबार में [ कुंडलिया ]

 118/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

कविता के दरबार में, खड़ा 'शुभम्' कर जोड़।

करे विनय माँ शारदा,न  दें 'शुभम्'  को छोड़।।

न दें  'शुभम्'  को  छोड़,लिखे मनहारी रचना।

गद्य-पद्य   का  साज, पड़े  यद्यपि  नित तपना।।

'शुभम्' चले उस ओर,न जाए दिनकर सविता।

लगे  चरण  में  ध्यान,करे  कवि  ऐसी कविता।।


                         -2-

बचपन   यौवन     प्रौढ़ता, गए  बीत   युग   तीन।

करता है कवि  कल्पना,   नित  ही दिव्य   नवीन।।

नित ही  दिव्य  नवीन,  नहीं  कुछ इसमें  अपना।

कविता   हो   कमनीय,  देखता हर   पल  सपना।।

'शुभम्'   हृदय   हो  लीन,झूमती कविता रुनझुन।

चौथापन     है   पीन,   याद   आता   है बचपन।।


                         -3-

मानव तन  शुभ  कर्म  का, फल  है एक अमोल।

उसमें भी  कवि कर्म से,  कविता   करे अडोल।।

कविता   करे अडोल, अटल सौभाग्य  मिला  है।

ज्ञात   नहीं  यह तथ्य,बना क्यों काव्य- किला है।।

'शुभम्'     शारदा   मातु, करें आजीवन कलरव।

कविता   ही    सौभाग्य, बने  रहना  नित मानव।।


                         -4-

आओ   कविता  से करें,  जन-जन  का कल्याण।

शुभता   के    संदेश   से,  करें जीव   का   त्राण।।

करें जीव   का  त्राण, कर्म  वाणी   या मन   से।

सबको    करें   कृतार्थ,  देह से अपने   तन   से।।

'शुभम्'  कर्म  ही  सत्य, गीत  यह  मन से  गाओ।

कर्म   योनि   का  बीज,   उसे बोएँ जन  आओ।।


                         -5-

दोहा     चौपाई    लिखे,   कुंडलिया   बहु   छंद।

जनहित   में निज व्यंग्य से,  बिखराया मकरंद।।

बिखराया    मकरंद,  लेख लिख किया चितावन।

ग़ज़ल    सवैया  नेक, किया  कविता को पावन।।

'शुभम्'   कहे अतुकांत, काव्य   ने जनमन मोहा।

करें      वाह    ही   वाह,   लिखे   चौपाई   दोहा।।


शुभमस्तु,


29.03.2026◆5.30आ०मा०

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शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अहंकार [अतुकांतिका]

 117/2026


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अहंकार 

यों ही हार नहीं मानता

वह मरेगा और मारेगा

क्या वह नहीं जानता?


अनादिकाल से

अहंकार

खेल खेल रहा है,

अविवेक के साथ

उसका तालमेल रहा है।


आत्महंता है अहंकार

नहीं जानता वह दुत्कार

भरता रहता है

क्षण -क्षण वह फुंकार

इसीलिए तो हो रहा है

आज दुनिया में हाहाकार।


अहंकार को 

कैसे और क्यों समझाओगे

उसके मूल में

विनाश अंतर्निहित है,

वह नहीं जानता कि 

यह सब अनुचित है।


पीछे हटना

 उसने सीखा नहीं,

साँप के बिल में

हाथ जो डालेगा

उसे साँप

डसेगा ही डसेगा,

इंतजार कीजिए

और अहंकार की

विनाश लीला को देखिए।


शुभमस्तु,


27.03.2026◆5.00आ.मा.

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भारहीन होती हैं खुशियाँ [ गीत ]

 116/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भारहीन

होती हैं खुशियाँ

शब्दों में जो कही न जाती।


आँचल में भर

पकी फसल की

सोने जैसी बाल सुनहरी

नहीं खुशी से

समा पा रही

स्मिति ये बतलाती गहरी

अधरों से

जो खुशी फूटती

हँसी स्वयं में है शर्माती।


पहनी 

लाल शाटिका तन पर

पीले हरे वसन अँग ढाँके

पाँव नहीं

धरती पर पड़ते

सुख के खुले बंद दृढ़ टाँके

लगता

धवल पंक्ति दाँतों की

गीत अधर के भीतर गाती।


श्रम का फल

होता है मीठा 

स्वेद बहाए वही जानता

जिसके पाँव न

फटी बिवाई

कैसे जग की पीर मानता

चली जा रही

पगडंडी पर

ठुमक -ठुमक अँगना इठलाती।


शुभमस्तु,


24.03.2026◆ 6.45 आ०मा०

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सबसे पहले देश है [ दोहा गीतिका ]

 115/2026


               


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबसे     पहले    देश    है, रक्षक  धीर प्रवीर।

जाति-संकुचन व्यक्ति का, देता पद  न कबीर।।


हितकर हो  जो  देश को, करना  है वह काम,

ऊँच -नीच   के  भेद   के, नहीं  चलाएँ   तीर।


सार्थक  मानव  योनि   है, जिए  देश   के हेत,

कर्मों   की   सद्गन्ध   का,  उड़ता   रहे  उशीर।


भर   लेते   हैं  श्वान भी,  यों   तो अपना   पेट,

परपीड़ा   जो    जानते,  कहलाते वह   पीर।


पढ़े-लिखे  शिक्षित  सभी, अनपढ़ मूढ़ गँवार,

जातिवाद    के   भक्त  हैं,अंधा   बाँटे खीर।


देश  रसातल  को  गया, जातिवाद  से आज,

सोच    बड़ी  संकीर्ण   है,देश  दिया   है चीर।


'शुभम्' समर्पित  देश को,भारत जिसका नाम,

नित सेवी  साहित्य   का,  तोड़    क्षुद्र जंजीर।


शुभमस्तु,


23.03.2026◆4.30 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...