304/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
अपने दोनों जोड़ कर, नत वंदन में भक्त।
सेवा करता ईश की,चरण युगल अनुरक्त।।
चरण युगल अनुरक्त,जनक जननी को ध्याये।
मिलें सिद्धियाँ अष्ट,नवों निधियों को पाये।।
'शुभम्' नमन की रीति,उठाया नर को तप ने।
धन्य -धन्य वह जीव, करे वंदन कर अपने।।
-2-
वंदन का चंदन धरे, रहे महकता देह।
शुभता के आशीष से, मिले ईश का नेह।।
मिले ईश का नेह, मिटें नित की बाधाएँ।
विपदाएँ हों नष्ट, सदा विश्वास जगाएँ।।
'शुभम्' करें शुभ काज,करे दुनिया अभिनंदन।
विनत भाव की धार, बहाए निर्मल वंदन।।
-3-
वीणा वादिनि शारदा, तव वंदन में आज।
भक्त विनत अनुरक्त है,सकल सुधारें काज।।
सकल सुधारें काज, काव्य-रथ रुके न मेरा।
नित नूतन हों भाव, शब्द का कोष घनेरा।।
'शुभम्' कृपा कर माथ, नहीं दें कच्चा मीणा।
नत मस्तक दो हाथ,बजा दो कवि की वीणा।।
-4-
वंदन के शुभ भाव से, मिले गुणों का कोष।
जागे विपुल विनम्रता,मिटें सकल उर- दोष।।
मिटें सकल उर-दोष, ओघ-अघ नष्ट कराए।
पावनता का कोष, अंग में नित्य समाए।।
'शुभम्' लगा जब भाल, महकता मह-मह चंदन।
विपदाएँ दे टाल, भक्त का निर्मल वंदन।।
-5-
माता के शुभ भाव से, वंदन करते नित्य।
अपने भारत देश को, शशि तारे आदित्य।।
शशि तारे आदित्य, सिंधु कलकल सरिताएँ।
पंच तत्त्व के सत्त्व, नित्य गुणगीता गाएँ।।
'शुभम्' पुत्र जो नित्य,देश को अपने ध्याता।
क्यों न लड़ावे लाड़, पुत्र को भारत माता।।
शुभमस्तु,
25.09.2026◆ 6.30 आ०मा०
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