बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

आहट मिली बसंत की [ दोहा ]

 068/2026



[फागुन,आहट,अभिसार,बसंत,पतझर]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक

रंग भरे मधुमास का,फागुन   ही    शुभ मास।

फूल -फूल  गुंजार  है, मधुकर  का परिहास।।

अंत भला तो   सब भला, फागुन गाए फाग।

वर्ष समापन  हो   रहा,  तोड़    खुमारी जाग।।


कुहू-कुहू   कोकिल  करे,  अमराई   के कुंज।

आहट मिली वसंत की,गुंजित अलिदल पुंज।।

आहट पा निज  कन्त  की, मन में उठी  तरंग।

सन्नारी  कब  सो  सकी,  देख   हुआ प्रिय दंग।।


प्रियतम से अभिसार का, अवसर फागुन मास।

कलियाँ   चटकीं   बाग   में,उड़ती प्रबल सुवास।।

मर्यादा     की   आड़    में,करे  प्रिया अभिसार।

पहने श्यामल   शाटिका,  नयन सजल रतनार।।


यौवन    वयस बसंत है,  राग   रंग   रस   रास।

किसलय विकसित शाख में,जागी सुमन सुवास।।

टेसू      पाटल      रंग     में,   झूम   रहे रतनार।

है  बसंत    मनभावना,   तितली    करे दुलार।।


सदा  न   वेला  फूलते, सदा   न   रहे खुमार।।

पतझर आया  बाग   में,सेमल   सुमन  बहार।

संकेतक   नित   नव्यता,  का   देता मधुमास।

एक  ओर पतझर  हुआ,उधर सुमन की वास।।


                एक में सब

आहट मिली बसंत की,फागुन का मधुमास।

रमणी रत अभिसार में,पतझर भरे उसास।।


शुभमस्तु,


04.02.2026◆7.15 आ०मा०

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नियति यही है [ गीत ]

 067/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इधर अँधेरा

उधर उजाला

नियति यही है।


उगा दिवाकर

जब प्राची में 

मचा जगत में शोर

उषा जगी

कलियाँ मुस्काईं

हुआ सुहाना भोर

नमन प्रणाम

करे जन जीवन

सुगति यही है।


संध्या काल

हुआ तम छाया

खग जाते निज नीड़

घटने लगी

बाजार सड़क पर

नर-नारी की  भीड़

हुआ दिवस-

अवसान शांति से

प्रगति यही है।


उदय हुआ जो

अस्त उसे भी

होना ही यह सत्य

सिंहासन से

पतित हुए नृप

अविचल जीवन तथ्य

पुनः एक 

नव नृप आना है

निरति यही है।


शुभमस्तु ,


03.02.2026◆4.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

मनोरथ [ चौपाई ]

 066/2026


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध  मनोरथ  जिसका    कोई।

उसने     लता    सुंगंधित    बोई।।

हरियाली   उर   में     भर    देती।

हर  नकार को   वह    हर  लेती।।


दूषित   मन  से   काम   न   होता।

सफल मनोरथ  पथ  से  खोता।।

तिलक  छाप का  ढोंग  न  करना।

अभिनय  से सत काज  न सरना।।


करें मनोरथ  मन     से    सच्चा।

बने रहें    ज्यों        भोला    बच्चा।।

छल कपटों  से    करे      विमुखता।

करे पलायन       हृदय - विकलता।।


मन   के   रथ   की   करें     सवारी।

भले-बुरे      विकृत        नर-नारी।।

कैसे    सफल    मनोरथ    होते।

वही   अंत      में     मानुष     रोते।।


अश्व   मनोरथ  के    हों    चंचल।

यत्र    तत्र     करवाते        दंगल।।

भग्न  करे   रथ   रथी   न   बचना।

शेष न रहती   तन    की    रचना।।


नर स्वतंत्र     जो   करे   मनोरथ।

रहे  हाथ में   भावी     का   पथ।।

वल्गा   थाम    नियंत्रित    करना।

नहीं  हवा    में     ऊँचा    उड़ना।।


'शुभम्' मनोरथ  सब  सुखदाता।

यदि    मानव    कर्तव्य   निभाता।।

वहीं  सफलता    करतल    होती।

मिलें  गहन  सागर    में     मोती।।


शुभमस्तु !


02.02.2026◆4.00प०मा०

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शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट [ गीतिका ]

 065/2026


    शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट

                

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल,

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।


निज सतपथ से  मत विचलित हो,

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ,

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी,

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं,

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका,

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

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नहीं उघाड़ो प्रिय अन्तर्पट [ सजल ]

 064/2026




समांत          :अट

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल।

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।।


निज सतपथ से  मत विचलित हो।

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ।

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी।

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं।

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका।

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆◆◆

चलती उलटे पाँव सियासत [ ग़ज़ल ]

 063/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलती  उलटे    पाँव    सियासत।

समझे  शहर न   गाँव सियासत।।


उसका  अपना  एक    न    कोई,

नहीं  बनाए    ठाँव     सियासत।


सुनती  नहीं  कान   से कुछ   भी,

अपनी कर - कर  काँव सियासत।


गलत  सही  कुछ   भी  कब माने,

मस्त  चांव ही    चांव   सियासत।


मरे    धूप     में    सारी     जनता,

वोटों  की   घन   छाँव   सियासत।


अपना   सीधा     करती      उल्लू,

पर जन को नित खांव  सियासत।


पाशा 'शुभम्'  पड़े  यदि     उलटा ,

लेती  अपना     दाँव     सियासत।


शुभमस्तु ,


01.02.2026◆12.00मध्याह्न

                ◆◆◆

जो दहका वह निखर गया [ ग़ज़ल]

 062/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप शुभम्'


जो  दहका    वह     निखर   गया।

टूट   गया  जो      बिखर    गया।।


चलता       गया      राह     अपनी,

मंजिल  के    वह     शिखर   गया।


मंजता     रहा     रात -दिन      जो,

बर्तन  घर   का      सँवर        गया।


सहने   की      ताक़त     न     रही,

कमजोरी     में       बिफ़र     गया।


गर्म     रेत    को      छुआ      नहीं,

छुआ  तुरत     ही    सिहर     गया।


आया   था     कुछ     करने    को,

किए  बिना    कब    किधर   गया।


'शुभम्'      गए      कितने    आए,

इधर     दिखा था    उधर     गया।


शुभमस्तु ,


01.02.2026◆11.30 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...