329/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
हाथ से साबुन सरका , उठाया न गया।
आईना गिरा दरका, उठाया न गया।।
चढ़ ही गई है चर्बी, देह पर इतनी,
कमर का घेर न उझका, उठाया न गया।
गिरा है आसमां से जो, अटका खजूर में,
दिया है वक्त ने झटका, उठाया न गया।
रीत जाता है घड़ा, साँस पूरी करके,
छेद से नीर ज्यों ढरका, उठाया न गया।
झाग आँखों में गया, रुदन करतीं दोनों,
दर्द ऐसा फँसा अटका, उठाया न गया।
घाव होते तो , वक्त उनको भरता,
वक्त ने वहाँ ला पटका, उठाया न गया।
जाते-जाते भी 'शुभम्', नहाकर निकले,
रूह निकला बदन पिचका, उठाया न गया।
शुभमस्तु,
04.10.2026 12.15 प०मा०
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