सोमवार, 29 जून 2026

चोरी [ चौपाई ]

 220/2026


               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम-रतन    की     बेढब    चोरी।

हुई  अयोध्या    धाम   न   थोरी।।

जिनका  चरित    नहीं   था  गोरा।

लगा  मुखौटा     लगता     भोरा।।


रक्षक  ही    भक्षक    बन   जाएँ।

फिर  किस पर विश्वास  टिकाएँ ।।

जो  धन  दानपात्र      का   गिनते।

नोट जेब    में    वे    ही    चिनते।।


नैतिकता  जब  मर     जाती    है।

मानवत्व  को  छल     पाती    है।।

इष्ट मित्र     थे        साला-जीजा।

नित्य  चोरते        चचा -भतीजा।।


सोना    चाँदी        हीरा       मोती।

चुरा    रहे     थे    सभी     सगोती।।

जिसको  'ट्रस्ट'  कहा    था    सबने।

वही भ्रष्ट   पाया      है      जग  ने।।


ट्रस्ट -  छाँव    में     चोरी    होती।

भक्त  माँगते          राम- मनोती।।

चंपत  जी  सब    जान     रहे   थे।

पर जिद     अपनी     ठान रहे थे।।


भेद     खुले   नाकें     कट    जाएँ।

फिर  कैसे    मुखड़ा    दिखलाएँ।।

दबी  आग    बाहर    आ    जाती।

भारत  भर को    वह   झुलसाती।।


कहते  चोर   राम     नित   जपना।

समझे दान पात्र       धन  अपना।।

'शुभम्'  चोर की  अशुभ   मिताई।

पिटे    संग       पिटवाए     भाई।।


शुभमस्तु,


29.062026◆4.15 प०मा०

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भले खुले मंदिर के द्वार [ गीतिका ]

 219/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भले  खुले    मंदिर      के      द्वार।

नैतिकता      की      छुट्टा     हार।।


सजे     अयोध्या      धाम      खड़े,

किंतु  पाप    का    बड़ा      प्रचार।


मंदिर   धंधे     का      घर      नेक,

धर्म     हुआ        है      तारम तार।


हया    नहीं     आँखों     में     शेष,

चचा-भतेजे       सब      हुशियार।


झोंक     कैमरा-दृग     में       धूल,

टपकाते  थे     मुख     से     लार।


जीजा-साले       सब       सम्बंधी,

सोना-चाँदी           करते      पार।


ऊँचे-ऊँचे         भवन          खड़े,

जिनमें     सुखी     रहें     नर-नार।


चोर  कहे      औरों     को     चोर,

उड़ें       हवाई       काली     थार।


'शुभम्'  पहनते       पीले     वस्त्र,

करते   घर    भर    का     उद्धार।


शुभमस्तु,


29.06.2026◆ 6.45 आ०मा०

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संत-असंत डकैत लबार [ गीतिका ]

 218/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संत-असंत       डकैत        लबार।

सबको   खुले    राम    के    द्वार।।


राम-नाम    की    हुई     न   लूट,

राम-दाम        लुटते       उपहार।


जीजाजी-साले      का        जोड़,

सबकी   मिली- जुली     सरकार।


चाचा    संग         भतीजा     एक,

लूट     रहा    मंदिर    में     प्यार।


धाम अयोध्या     धन   का   स्रोत,

नहीं      पता     था    होगी   रार।


बाँध       पोटली     गहना     नोट,

महल  बनाए       औध     उजार।


अलग - अलग    हो     पानी- दूध,

कानूनी      पंजा          अनिवार।


देख  पराए     धन      की     भेंट,

टपक     उठी     रसना   से  लार।


'शुभम्'   कहानी     बनी   अनेक,

धर्म    किया    अघियों   ने   छार।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆11.00प०मा०

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सबको खुले राम के द्वार [ सजल ]


217/2026

         

समांत          : आर

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार       :15.

मात्रा पतन     :शून्य

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संत-असंत       डकैत        लबार।

सबको   खुले    राम    के    द्वार।।


राम-नाम    की    हुई     न    लूट।

राम-दाम        लुटते       उपहार।।


जीजाजी-साले      का        जोड़।

सबकी   मिली- जुली     सरकार।।


चाचा    संग         भतीजा     एक।

लूट     रहा    मंदिर    में     प्यार।।


धाम अयोध्या     धन   का   स्रोत।

नहीं      पता     था    होगी   रार।।


बाँध       पोटली     गहना     नोट।

महल  बनाए       औध     उजार।।


अलग - अलग    हो     पानी- दूध।

कानूनी      पंजा          अनिवार।।


देख  पराए     धन      की     भेंट।

टपक     उठी     रसना   से  लार।।


'शुभम्'   कहानी     बनी   अनेक।

धर्म    किया    अघियों   ने   छार।।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆11.00प०मा०

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दूध-दूध अलग-अलग [गीतिका ]

 216/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूध-दूध अलग-अलग पानी-पानी अलग-अलग।

लूट-लूट अलग-अलग राम-कहानी अलग-अलग।।


धुँआँ   उठा  आग  जली  लपटों में जल उठा देश,

जितने मुँह उतनी बात मुख बयानी अलग-अलग।


चोर   कहे  मैं   चोर  नहीं  शेष   सब  राम   जाने,

राम की कृपा है सब कहता लुभानी अलग -अलग।


राम-दान-दाम    गया   भवन   बने   हैं नए-नए,

पितांबर ओढ़ नव्य  नैया  डुबानी अलग -अलग।


दूध का   धुला  न  एक दाल सभी काली-काली,

झूठी सब बीबियाँ बतियाँ बनानी  अलग-अलग।


पाप-पुण्य       धर्म   नहीं   बोध   अपराध   नहीं,

दुनिया की फ़िक्र नहीं फसलें उगानी अलग-अलग।


'शुभम्'   राम   मंदिर   है  कमाने का स्रोत   एक,

पल रहे डाकू चोर दुनिया दिवानी अलग -अलग।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆10.30 आ०मा०

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शनिवार, 27 जून 2026

अखंड ज्योति [ संस्मरण ]

 215/2026


                 

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मनुष्य के जीवन में सामाजिक परम्पराओं और रीति रिवाजों का विशेष महत्त्व है। अपने दस शतक पहले के जीवन की कुछ मधुर स्मृतियों को वाणी प्रदान करता हूँ तो लगता है कि अभी कल ही की बात है। उन दिनों होली दीवाली रक्षाबंधन आदि सभी त्योहार बड़े ही उत्साह और हर्षोल्लास पूर्ण ढंग से मनाए जाते थे। मुझे यह अच्छी तरह से याद है कि जिस रात  होलिका दहन होता था,उस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पिताजी होली की आँच एक जलते हुए उपले के रूप में घर पर लाते थे।  मेरी माँ उसी उपले की आँच से घर की होली की अग्नि प्रज्वलित किया करती थीं।गोबर की बनी हुई गुलरियों के ढेर को सजाकर उसकी पूजा करने के बाद उसी होली की आग से उसे जाग्रत किया जाता था।


सुबह होने पर घर के चूल्हे की आग इसी होली की आग से जलाई जाती थी। घर की होली की आग में जौ और गेहूं की बालियाँ भूनकर खाई जाती थीं,जिन्हें आखत डालना कहा जाता था। आखत अर्थात नवान्न का श्रीगणेश। आखत ,जो अक्षत का ही भाव लिए हुए है। सबसे महत्त्वपूर्ण और खास बात यह थी कि यही आग वर्ष भर जिंदा रखी जाती थी। 


होली की आग को अगली होली तक जिंदा रखने की यह अमर परम्परा निरंतर चलती रहती थी। ऐसा नहीं था कि तब घरों में माचिस नहीं होती थी। घर पर माचिस होने के बावजूद यह एक रीति और परम्परा की बात थी। सुबह भोजन बनने के बाद किसी उपले को जलाकर चूल्हे की राख में गाड़  दिया जाता था। शाम होने पर पुनः उसी उपले को निकाल कर आग सुलगा ली जाती और भोजन बनने के बाद अगली सुबह के लिए पुनः गाड़ दी जाती।उस आग की ज्योति को इसी क्रम से वर्ष भर जिंदा रखा जाता था। जब बोरसी में दूध औटाया जाता तो भी इसी आग से काम लिया जाता। यही हमारी सामाजिक परम्परा की एक अखंड ज्योति थी। 


एक वर्ष तक निरंतर आग को इस प्रकार जीवित रखना कोई आसान काम नहीं है। आज भी गाँवों में गैस के साथ साथ लकड़ी उपलों के चूल्हे हैं,किन्तु अब वह बात नहीं है। अब तो खट से लाइटर जलाया और स्टील का चूल्हा जला लिया। यह भी न हुआ तो सर्र से माचिस जलाई और खाना बनाना शुरू। अब न ऐसी कोई परम्परा है और  अखंड ज्योति। वे सब बातें समय के साथ चली गईं।न वे लोग रहे और न वे बातें। सब कुछ बदल गया। अब आदमी का धैर्य चुक गया है। यह बहुत बड़े धैर्य का ही प्रतीक था कि होली की आग की एक ही ज्योति को वर्ष भर जिंदा रखा जाता था।


उस समय मिट्टी के बने हुए चूल्हे प्रायः खुले आँगन अथवा दालानों में हुआ करते थे।ऐसे समय में उस आग को सुरक्षित रखते हुए अगले दिन के लिए बचाये रखना कठिन होता था। बरसात और जाड़े के दिनों में बहुत कठिनाई होती थी।उन दिनों की बरसात आजकल की तरह होने वाली हल्की फुल्की बरसात नहीं थी।एक एक पखवाड़े तक सूरज देवता के दर्शन भी दुर्लभ हो जाते थे। ऐसे में चूल्हे  की राख की रजाई में आग की ज्योति को बचाना किसी तरकीब का काम होता था। बरसते हुए बादलों के नीचे चूल्हे पर परात उढ़का  कर आग को बचाया जाता था।


यही मेरी माँ की अखंड ज्योति थी। जिसकी रोटी खाकर हम बड़े हुए और होश सँभाला। अतीत के दिनों की वे मधुर स्मृतियाँ भुलाए नहीं भुलाई जातीं। ईश्वर ने वही अखंड आग की ज्योति हमारे मन और आत्मा में भर दी है और साहित्य की ज्योति के रूप में निरंतर प्रकाशवान है। यही तो मेरे माता और पिता के वे संस्कार हैं, जो हमारे जीवन का पाथेय हैं। अब न वे दिन रहे और न वे बातें ,पर उनकी अमर स्मृतियाँ तन मन में स्थायी रूप से प्रवाहमान हैं। 


शुभमस्तु,


27.06.2026◆8.00 प०मा०

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ऊँट की चोरी निहुरे-निहुरे! [ व्यंग्य ]

 214/2026 


 

 © व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है कि ऊँट की चोरी निहुरे- निहुरे नहीं होती।पर यहाँ तो हो गई।शायद चोरों को इस बात का गुमान भी नहीं था कि वे न जाने कब से ऊँट की चोरी कर रहे हैं,वह ऊँट देश दुनिया और समाज की नज़र से कब तक छिपा रह सकता है ! ऊँट तो ऊँट है, किसी न किसी दिन उसे पहाड़ के नीचे आना ही पड़ेगा। इस बात को ऊँट कभी नहीं सोचता। और यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि कोई ऊँट ही ऊँट को चुराए ! पहले आदमी ऊँटों की चोरी किया करते थे ।अरे अब तो ऊँट ही ऊँटों को चुराने लगे! देश और दुनिया को भरमाने लगे। राम नाम की पीली चदरिया ओढ़कर राम को छकाने लगे। पर क्या किया जाए कि वे अपने को ही सर्वोपरि समझ कर ठगने लगे।भक्तों के दान का पैसा सोना चाँदी हीरे जवाहरात चुराने लगे। घड़ा फूटा तो चौराहे पर टूटा। अब न रहा किसी चोर में अपनी थूथन खोलने का बूता। भगवान के मंदिर में डाका पड़ा। चोरों और डाकुओं की दाढ़ियों में ऐसा अड़ा कि तिनकों का पहाड़ ही हो गया खड़ा!

  पहले कहा जाता था कि राम नाम की लूट है,लूट सके तो लूट।पल में परलै होइगी प्राण जाएँगे छूट। पर अब ? यह कहावत झूठी पड़ गई है । राम नाम लूटने से भला क्या होगा ! राम दाम ही न लूट लो। राम नाम से घर गृहस्थी थोड़े ही चलती है ,राम दाम से ही चलती है। जब राम जी ने उन्हें खाँड़ खूँदने का 'सुनहरा' 'रूपहरा' और 'नोट हरा' मौका दिया है ,तो क्यों न लूटें!और उन्होंने ने यथासंभव लूटा।सारी दुनिया को बना दिया झूठा। खांड़ खाई और खूब खूब कूटा। राम की भेंट से बन गए सेठ। आ गई ऐंठ। मंदिर के बड़े प्रशासक ! आप अपने ही सर्वनाशक !! भगवत भक्ति के घाती, चलते फुलाए हुए छाती। ये कलयुगी 'राम शंकर' ! बड़े ही प्रलयंकर ।वही पालक , वही ध्वंशक ,विध्वंशक । 'चंपतों को चपत लगना ज़रूरी है।लोग कहते हैं कि पेड़ों की जड़ें होती हैं। यहाँ तो आदमियों की जड़ें निकल आईं , जो मंदिर के कण- कण में ऐसे समाईं कि वे भगवान राम के मंदिर को अपनी बपौती समझ बैठे। और विशाल दरख़्त बनकर कुछ ऐसे ऐंठे कि राम भी न रहे उनसे जेठे। ये छोटे मोटे पेड़ नहीं, वट वृक्ष बन गए। मंदिर ही नहीं अयोध्या पर छा गए।इनके दाँव तले क्या किसी का पत्ता भी हिल सकता था, हाँ ये पत्ता काट तो जरूर सकते थे। शक्ति के अहंकार में रावण जैसे न रहे, इन 'राम शंकरों' की भला क्या बिसात ! जो राम के ऊपर ही करें घात! घाट- घाट का पानी पीने वाले ये!अंततः कब तक बचने वाले थे!

 राम मंदिर चोरों लुटेरों और डकैतों की आजीवन आय का मोटा अजस्र स्रोत बन गया। इससे चोरों का दल ऐसा तन गया ,जैसे देश के राम भक्तों पर साँप का फन ही तन गया। आस्था पर चोर भारी पड़ गए। देश ने जब सुना जब मंदिर का हाल ! धीमी पड़ गई भक्तों की चाल। उन्हें दिखाई देने लगा मंदिर के बीच खड़ा काल। सुनते ही देश हो गया बेहाल।इससे एक अनुमान यह भी लगाया है कि देश के अन्य मंदिरों में क्या सतयुगी देवताओं को दान संग्रह पर बैठाया है ?जी नहीं। दाल में काला नहीं,ये दाल ही काली है। दान चोरों की नित्य होली और दिवाली है। यह जानकर आस्था शंकित है, थकित है,भ्रमित है, व्यथित है। पर क्या करिए , और क्या न्याय का इंतजार करिए। और किया भी क्या जा सकता है।चोरों का बंधने लगा बस्ता है। भक्तों की आस्था का दान , इतना नहीं सस्ता है। देश के सभी मंदिरों के दान का हिसाब होना चाहिए।उनकी जांच होनी चाहिए।जाँच पूरी होने तक मंदिरों में यथास्थिति बनाई रखी जानी चाहिए। 

 राम के मंदिर में भी भाई भतीजावाद ,जीजा सालावाद, जातिवाद,मित्रवाद, असत्यवाद जम कर चला। जिसने भी अपने गले में झाँका ,उसे अपना चोरत्व नज़र नहीं आया।कहना यह चाहिए कि कलयुग में भला कौन है जो अपने गले की पड़ताल करता है! उसे तो इतना आत्म विश्वास है कि वह जो भी करता है, सत्य ही करता है।यहाँ तो लोग दूसरे के हमाम में झाँका करते हैं। मंदिरों में वही लोग गेरुआ और पीतांबर में विचरते हैं और स्वतंत्र रूप से खड़ी फसल चरते हैं। वे नहीं मानते कि राम कोई जीवंत राम हैं। उनके जाने राम मूर्ति भर हैं। इसलिए वे मूक बने खड़े हैं, हमारे लिए उनके गले में हीरे जड़े गलहार हैं , आज मानवीय मूल्य निहायत सड़े हैं। चोरी को अपना अधिकार मानते हैं। और तो और उनकी पत्नियाँ भी उनकी अंधी समर्थक हैं। क्योंकि उन्हें सोने से लादने में उनकी योजना सार्थक है। इस अंध समर्थन में उनका प्रयास भरसक है। क्या आज की 'पतिव्रताओं' पर किसी को कोई शक है? उनकी विलासिता की हर सामग्री हर साधन चकाचक है।इसलिए वे कैमरे के सामने बयान दे रहीं खटाखट है। 

 सिंहों नहीं, सियारों के झुंड में भी रंगा सियार कब तक नजर नहीं आएगा। एक न एक दिन पकड़ा अवश्य जाएगा।फिर उसका जो हाल होगा,क्या उसकी कल्पना कर पाएगा? पर यह चोर नहीं ,सभी चोरों का आत्मविश्वास है कि ऊँट की चोरी भी निहुरे-निहुरे हो सकती है। और हुई भी । उन्होंने कर भी ली। पर दुर्भाग्य उनका कि अंततः पकड़े ही गए। और अब सलाखों के पीछे अपनी किस्मत को कोस रहे हैं कि काश ! आत्म विश्वास हो तो इन राम दाम के चोरों जैसा ! जिसकी हर दुम पर सोना चाँदी हीरा मोती और पैसा ! चोर चोर होते हैं,राम भक्त या देश भक्त नहीं हो सकते। यदि उन्होंने ये सोचा होता कि ये राम हैं ,सच्चे राम हैं,कोई पत्थर की मूर्ति नहीं ,तो दान धन चुराने में हाथ जरूर काँपते। दान पात्र से लेकर बैंक काउंटर तक किंचित न हाँफते। नौकर को स्वयं के मालिक होने का गुमान हो गया। इसलिए वह अपनी मालिकी के जहान में खो गया। पर अब क्या है !दूध का दूध पानी का पानी हो गया ! किसी ने बाबरा बाबर बनकर लूटा और आज के इन रावणों ने पुनः राम की रमा को लूटा। निर्वेद के स्थान पर उगा दिया वैभव का बूटा। विलासिता ऐयासी छाई रही।भक्ति और धर्म की न परछाईं रही।उनके दिल और दिमाग में जमी काई ही रही।जो कुछ भी किया मनभाई ही बही।मुझे कोई दूध का धोया नज़र नहीं आया। पर राम को राम भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। भक्तों और अनुरक्तों के बिना राम भी राम कैसे ? राम राम राम ! हो गया काम !! कैसे लगे राम मंदिर में चोरों पर लगाम! सुबह से शाम ,एक ही काम। दाम दाम और दाम ही दाम। जय जय श्रीराम! जय जय अयोध्या धाम!! 

 शुभमस्तु, 

 27.06.2026◆12.30 प०मा० 


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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...