गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

कान को पकड़ें घुमाकर [ नवगीत ]

 076/2026


      शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कान को 

पकड़ें 

घुमाकर हाथ अपना।


चाल टेढ़ी

साँप जैसी 

लहर खाती

नृत्य की

हर भंगिमा को

जो लजाती

उचित होती

डगमगाती

बढ़ खुजाकर माथ अपना।


शब्द की

फुटबॉल से

तू खेलता जा

रूपकों को

घूर से ले

ठेलता जा

गीत में 

अपना 

बना कर पाथ अपना।


तू नए के 

नाम पर

खा छील छिलके

फेंक 

अंतरमाल 

सारी फाँक गिन के

बन जा

अमर भगवान

अनोखा नाथ अपना।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆3.15 प०मा०

                  ◆◆◆

जल रहे टायर पुराने [ नवगीत ]

 075/2026

     ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जल रहे

टायर पुराने

आँच से डरना नहीं है।


कह रहे 

वे चाँद सूरज

और सब तारे अधूरे

मात्र उनमें

रौशनी है

करकटों के अन्य घूरे

बात है

सच्ची खरी तो

साँच से  डरना नहीं है।


नव प्रयोगों

के लिए

वे  सचल शाला स्वयंभू

कोष वे

नव रूपकों के

कान में करते  कभी  कू

अगर हीरा

पास हो तो

काँच से डरना नहीं है।


दंभ इतना

और कोई

पालता मन में नहीं है

अन्य कह दे

गलत है सब

वे कहें सब कुछ सही है

आँधियों के

वे झकोरे

टांच से डरना नहीं है।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 2.15 प०मा०

                  ◆◆●

किटकंनों की सड़क [ नवगीत ]

 074/2026


            


©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


किटकन्ने की

सड़क कच्ची

है मुझे अपनी बनानी।


इधर भी

खिड़की खुली है

उधर दरवाजा खुला

कह रहा तू

आज क्यों फिर

पाँव इतना ही झुला

बन के

ठेकेदार  तुझको

बात ही  अपनी चलानी।


आंचलिकता

रूपकों का

है जखीरा पास मेरे

बन खुदा मेरा

न बंदे

जानता  दुर्भाव  तेरे

एक तू

सूरज नहीं है

धूप की तेरी कहानी।


हंकार की

फुंकार तेरी

सुन रहे हैं कान मेरे

ऑंख भी हैं

बंद तेरी

धी गई है तमस घेरे

गोल चक्कर में

भुलाया

उठ रही ऊपर जवानी।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 1.30 प०मा०

नवगीतों की ठेकेदारी [ नवगीत ]

 073/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नवगीतों की

ठेकेदारी 

हथियाए हैं।


नहीं चाहते

लिखे नए

नवगीत और कवि

ठेका ठोके 

वही चाहते

कवि नभ के रवि

उन्हें न लिखने 

के ढंग किसी 

अन्य के भाए हैं!


शायद घुट्टी में

पीकर 

वे माँ की आए

नहीं शिष्य जो

कभी अन्य के

वे कहलाए

नव कवियों के

भाग्य 

इन्होंने खाए हैं।


बस

कमियों की बात

उन्हें आती है कहना

लिखे पुराने को

पढ़ 

कर किटकन्ना 

अपनी ही 

मस्ती में

ठेके पर इतराए।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆1.00 प०मा०

                ◆◆◆

डिजीटल तर्जनी [ अतुकांतिका ]

 072/2026

    

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तर्जनी-स्पर्श से

कविता

डिजीटल हो गई,

पर्दा मोबाइल का

उजेरा  कह रहा।


अगर चाहें तो

उतारें छाप लें

एक पुस्तक में

नया अवतार लें

आज सम्भव है सभी

देखा गया।


किस रूप में थे 

भाव 

अंतर में छिपे

अब डिजीटल

 मंच पर

आकर रुके

ऑंख छूती मात्र

यह अनुभव नया।


अंतरण धन का

हुआ  डिजिटल सभी

जो कभी

अभिलेख्य था

पकड़े जमीं

विज्ञान की

चमकार का 

खेला नया।


विज्ञान ने

रुकना नहीं

सीखा कभी

कभी धीरे

कभी सत्वर

चाल बढ़ती ही  गई

बद और अच्छा

जो भी हुआ

झेला गया।


शुभमस्तु ,


05.02.202◆12.30प०मा०

                 ◆◆◆

समय ने सब कुछ गहा [ नवगीत ]

 071/2026

    

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समय बदला

समय ने 

सब कुछ गहा।


तर्जनी-स्पर्श से 

कविता

डिजीटल हो गई,

नोटबुक वह

लेखनी

किस ओर जाकर सो गई,

पर्दा 

मोबाइल का

उजेरा  कह रहा।


श्याम अक्षर

शब्द भी

 साकार है,

पटल उजला

काव्य का

 आधार है,

भाव उर का

आज  यों

अविरल बहा।


किस दिशा में

आज हम सब

जा रहे

विज्ञान के

नवरंग

ये जतला रहे

शब्द आखर में

नहीं 

जाता कहा।


शुभमस्तु ,


05.02.2026◆12.15 प०मा०

                  ◆◆◆

मनुहार [ सोरठा ]

 070/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



फुला लिए क्यों गाल,मत रूठो प्रिय भामिनी।

करके   एक   सवाल, करता हूँ मनुहार     मैं।।

मिले आपका प्यार,   नहीं   कभी   मैं रूठती।

 करो   नहीं   मनुहार  ,सदा आपको चाहती।।


जिसका  कोई     मीत,    रूठेगा   केवल वही।

हार नहीं   है   जीत,लगती   प्रिय मनुहार तब।।

 तुम्हें     मनाऊँ      कन्त,तुम   रूठो मनुहार से।

 जीवन विमल वसंत,इसी   तरह  मिलता   रहे।।


 हम      दोनों  का   प्यार,होता   है मनुहार में।

 ऐसा  नेह   दुलार,   कभी - कभी मनभावता।।

प्रेम   न    लेश   लगाव,  कभी  हमारा गैर   से।

नहीं   क्रोध  का   ताव,  वहाँ नहीं मनुहार भी।।


प्रिय     लगती  मनुहार,   पत्नी    हो या प्रेयसी।

अपना    नेह     उदार,  सदा  मनाने   में लगे।।

सभी   मनाते     लोग,  संतति   अपनी रूठती।

करें हर्ष   का   योग,  लालच   दे मनुहार  से।।


चलें   उतार-चढ़ाव,धन ऋण से जीवन बना।

कभी   उपेक्षा -ताव, कभी  हुई मनुहार   भी।।

सदा   अपेक्षित   तेल,जीवन  की घुड़दौड़   में।

कर   रूठे से   मेल,   मस्त   रहें   मनुहार   में।।


आ   जाए  यदि गाँठ,   भेद   मिटाती नेह में।

नष्ट   करे   उर   नाँठ,   अमृत-सी मनुहार से।।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 9.30आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...