शनिवार, 16 मई 2026

राज नीति [अतुकांतिका ]

 164/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'राज' की 'नीति' है

अथवा

'नीति' का 'राज' है ?

इसी बात को समझ लेना

राज की बात है!

(जहाँ नैतिकता नहीं

वहाँ नीति कैसी?

वह नीति कैसी?)


सबने इसे बुरा कहा

पर मन से खूब चाहा,

काश कहीं मिल जाती

तो बिना कुछ किए ही

करोड़ों करोड़ की

लॉटरी लग जाती।


हर जगह घुसी पड़ी है

तिरछी होकर अड़ी है

बिना मूल की जड़ी है

स्व चरित्र में 

भले ही सड़ी है,

नाकों तक 

बदबू में गड़ी है।


चोरी का गुड़

किसको नहीं भाता

घर बार को महकाता,

थोड़ी तिकड़में चाहिए

तालाब में तैरने के लिए

हाथ-पैर भी चलाने पड़ते हैं।


देश को चरित्र नहीं

राजनीति चलाती है,

कौन पूछता है चरित्र

कुछ भी करो,

कुछ भी कहो,

कौन किसकी

जुबान पकड़ पाता है !


सोना हो कि चाँदी

सब जगह इसकी चाँदी

पैट्रोल या डीजल

रसोईघर या ह्वीकल

सबकी हवा निकाल दी।


ये देश उनकी इच्छा से चलता है

जो स्वकर्म से इसे छलता है,

अपनी बात कहना देशद्रोह है

राजनीति अनचाहे ही

चिपकी हुई गोह है।


 भगवान समझने लगा है नेता

स्वयं विदेश में जा अंडे सेता

स्व घोषित भगवान है,

रहा नहीं वह इंसान है

फिर इंसानित कहाँ से आए!

चील के घोंसले में सेव कहाँ ?

राजनीति में सत्यमेव कहाँ?


शुभमस्तु,


15.05.2026◆7.30 आ०मा०

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चरित्र [अतुकांतिका ]

 163/2026


                    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मुखौटे का पता लगा

मुखौटा उतर जाने के बाद

यथार्थ उजागर हुआ,

होना ही था

अंततः वही हुआ।


अँधेरे की भी

अपनी एक सीमा है

उसे हटना ही पड़ता है

दूध का दूध 

पानी का पानी 

हो ही जाता है।


कहाँ नहीं हैं बहुरूपिए

छलते हुए इसे उसे

सर्प विष ही उगलता है

उसकी इसी में सफलता है।


शरीर आदमी का है

तो क्या है !

शेर की खाल ओढ़े

भेड़िए अनगिनत यहाँ,

क्या समाज !

क्या धर्म!

क्या राजनीति!

कोई क्षेत्र रिक्त नहीं,

एक ढूंढ़ो हजार 

हाज़िर हैं।


गहरी हैं जड़ें

भ्रष्टाचार की

रक्त की हर बूँद में

भरा हुआ है,

कौन है शेष 

जिसका मुँह

दूध से धुला हुआ है।


शुभमस्तु,


15.05.2026◆7.00आ०मा०

                 ◆◆◆

मुँह बाए प्यासी है धरती [ गीत ]

 162/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मुँह बाए 

प्यासी है धरती

करे मेघ की आस।


तपता सूरज

जेठ मास में

सूख रहे द्रुम-बेल

त्राहि-त्राहि 

मच रही धरा पर

जीव रहे सब झेल

घुटन हो रही

चलतीं लूएँ

कठिन श्वास- प्रश्वास।


सघन हरी थी

घास जहाँ पर

वहाँ उड़ रही रेत

भांय-भांय 

कर रही तप्त लू

तनिक नहीं है चेत

बहता स्वेद

देह से भारी

नेंक न आए रास।


तप का फल

अषाढ़-सावन में

जब मिलता है मित्र

तृप्त धरा होती

सुख पाती

तब बदले हर चित्र

दिखता है 

किसान के घर में

हर दिन नया उजास।


शुभमस्तु,


12.05.2026◆4.30आ०मा०

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बंदरिया के बच्चे नटखट [ बालगीत ]

 161/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बंदरिया     के    बच्चे      नटखट।

करते     ही    रहते   हैं   खटपट।।


धमाचौकड़ी  छत      पर    करते।

नहीं    कभी     गिरने    से  डरते।।

उछलकूद  वे       करते    झटपट।

बंदरिया   के    बच्चे       नटखट।।


नोंच     डालते      फूल     हमारे।

गमलों     में   जो   खिलते  प्यारे।।

ईंट   गिराते      नीचे     भटभट।।

बंदरिया    के     बच्चे     नटखट।।


खुला     रसोईघर    रह    जाता।

बंदर - दल     उतपात   मचाता।।

धूमधड़ाका     करते     फटफट।

बंदरिया  के      बच्चे     नटखट।।


सब्जी  -  एक  न    छोड़ें     केला।

वानर-दल    का    जुटता   मेला।।

खा जाते       फैलाते        चटपट।

बंदरिया    के     बच्चे      नटखट।।


नहीं     सूखने       देते      कपड़े।

कभी  फाड़ते     करते     लफड़े।।

डंडा   देख      भागते      सरपट।

बंदरिया  के      बच्चे     नटखट।।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆11.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

अम्मा रोटी गोल बनाती [ बालगीत ]



160/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अम्मा     रोटी      गोल     बनाती ।

दाल -  भात   के   संग  खिलाती।।


गोबर   के     उपले     जलते    हैं।

साँझ    हुई    सूरज     ढलते   हैं।।

चूल्हे      में    माँ    आग  जलाती।

अम्मा   रोटी      गोल      बनाती।।


कभी     हरी     तरकारी     रांधे।

भैंस    कभी     खूँटे  पर    बाँधे।।

छत   पर  धनिया     हरा  उगाती।

अम्मा  रोटी      गोल      बनाती।।


उठे     भोर     में     पीसे   चाकी।

व्यस्त रात -दिन   काम न  बाकी।।

हर पल    फिर    भी  माँ मुस्काती।

अम्मा  रोटी      गोल       बनाती।।


गाढ़ा-गाढ़ा        दही       जमाए।

दही  मथे     फिर   छाछ  बनाए।।

लवनी      सुघर     श्वेत  उतराती।

अम्मा     रोटी      गोल    बनाती।।


जब  पापा जी    घर    पर   आएँ।

अम्मा   उनको    भोजन     लाएँ।।

पंखा झलती      उन्हें     जिमाती।

अम्मा    रोटी      गोल     बनाती।।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆10.30 आ०मा०

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[11:31 am, 11/5/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

जन चरित्र में हो यदि दृढ़ता [ गीतिका ]

 159/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जन-चरित्र     में    शुभ    दृढ़ता  हो।

मन    में  सबके      नैतिकता      हो।।


राष्ट्रभक्ति    कुछ    सरल   नहीं   है,

जन- जन के  प्रति शुभ   समता हो।


जननायक     से      यही    अपेक्षा,

बिना भेद    ही    तम    हरता हो।


हरा  - भरा    हो       देश     हमारा,

सघन  द्रुमों     के    साथ   लता हो।


नर -नारी     सब     रहें     मेल   से,

सबको  निज     कर्तव्य    पता   हो।


सबका   हो    कल्याण    धरा   पर,

दुष्कर्मों     को    सदा      धता   हो।


'शुभम्' समर्पण   रहे   देश     हित,

नहीं    पड़ोसी    भी    चुभता   हो।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆6.30आ०मा०

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जननायक से यही अपेक्षा [ सजल ]

 158/2026


  

सामांत          : अता

पदांत            : हो

मात्राभार        : 16

मात्रा पतन      : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जन  - चरित्र    में     शुभ  दृढ़ता  हो।

मन    में    सबके       नैतिकता    हो।।


राष्ट्रभक्ति    कुछ    सरल   नहीं   है।

जन- जन के  प्रति शुभ समता हो।।


जननायक    से     सुखद   अपेक्षा।

बिना भेद    ही    तम      हरता हो।।


हरा-भरा       हो       देश      हमारा।

सघन  द्रुमों    के    साथ   लता हो।।


नर -नारी     सब    रहें     मेल   से।

सबको  निज     कर्तव्य    पता हो।।


सबका   हो    कल्याण   धरा   पर।

दुष्कर्मों     को    सदा    धता   हो।।


'शुभम्' समर्पण   रहे   देश     हित।

नहीं      पड़ोसी    भी   चुभता   हो।।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆6.30आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...