मंगलवार, 2 जून 2026

रंजन [ चौपाई ]

 176/2026


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करें  हृदय का   प्रियवर  रंजन।

भंग  नहीं  होगा   शोभन     मन।।

मन जीवन का  सब  सुख   दाता।

किसे न मन    का   चैन  सुहाता।।


रंजन  से  खिल उठती  क्यारी।

बिखरे भव्य   नवल  छवि  न्यारी।।

भंजित  को   रंजन  ही   जोड़े।

सफल पंथ  की दिशि   में    मोड़े।।


रंजन  है  शुभता   का   वाचक।

जहाँ सफलता चमके    लकदक।।

रंजनकारी        सदा       सुखारी।

रहता  नहीं    हृदय    तव   भारी।।


नित  रंजन  परहित ही करता।

सकल वेदना  दुख    का    हर्ता।।

पर   उपकारी   रंजन   सादर।

सदा  खुशी को   करे    उजागर।।


रंजन से   समाज-हित    होता।

खुले नेह का     अविरल    सोता।।

रंजनकारी        नदियाँ       सारी।

अभिसिंचन  से   भरतीं    क्यारी।।


रंजन  के     आयाम     अनोखे।

नहीं जहाँ पर     मिलते      धोखे।।

स्वच्छ       मनोरंजन      उपकारी।

किंचित  जहाँ न   दिखे    उधारी।।


उपदेशक  करते     मन  रंजन।

प्रमुदित कर स्रोता का   तन-मन।।

जादूगर     या      बंदर     वाला।

खेल दिखा खोलें      उर- ताला।।


गुरुवर जब       कक्षा     में  जाते।

'शुभम्' सदा  नव    पाठ   पढ़ाते।।

रंजन कर  मन     मोहित   करते।

सम्मोहन    से     निधियाँ     भरते।।


शुभमस्तु,


01.06.2026◆7.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

रविवार, 31 मई 2026

पूछ रहीं दुल्हन से सखियाँ [ गीतिका ]

 175/2026





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूछ    रहीं    दुल्हन    से  सखियाँ।

लाज भरीं  तव  दृग की   छवियाँ।।


ब्याह  हुआ   पति-गृह    से  लौटीं,

श्वसुरालय    की   कैसी   गलियाँ।


साथ  मिला  साजन  का अनुपम,

लगी  न होंगीं पल   की   सदियाँ।


पायल   मौन    करधनी  मुखरित,

गूँज उठीं   होंगीं   मधु    ध्वनियाँ।


रात-रात   भर   सो   न सकीं तुम,

करती थीं क्या पति से   बतियाँ?


फूट  रहे       हैं  मन    में      लड्डू,

हमको  भी जतलाओ   खुशियाँ।


'शुभम्'  बताओ अनुभव   हमको,

लिखती हो क्या अब भी चिठियाँ।


शुभमस्तु,


31.05.2026 ◆10.30 प०मा०

                     ◆◆◆

लाज भरी तव दृग की छवियाँ [ सजल ]

 174/2026



समांत          : इयाँ

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पूछ    रहीं    दुल्हन    से  सखियाँ।

लाज भरीं  तव  दृग की   छवियाँ।।


ब्याह  हुआ   पति-गृह    से  लौटीं।

श्वसुरालय    की   कैसी   गलियाँ।।


साथ  मिला  साजन  का अनुपम।

लगी  न होंगीं पल   की   सदियाँ।।


पायल   मौन    करधनी  मुखरित।

गूँज उठीं   होंगीं   मधु    ध्वनियाँ।।


रात-रात   भर   सो   न सकीं तुम।

करती थीं क्या पति से   बतियाँ??


फूट  रहे       हैं  मन    में      लड्डू।

हमको  भी जतलाओ   खुशियाँ।।


'शुभम्'  बताओ अनुभव   हमको।

लिखती हो क्या अब भी चिठियाँ।।


शुभमस्तु,


31.05.2026 ◆10.30 प०मा०

                     ◆◆◆

शनिवार, 30 मई 2026

किताब या मोबाइल [ अतुकांतिका ]

 173/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खुली हुई किताब न बन

कोई भी न पहचानेगा

कोई भी नहीं पढ़ेगा तुम्हें

धूल खाओगे धूल

रैक में सजी हुई

 किताबों की तरह।


मोबाइल बन जाओ

 हर हाथ में तुम्हीं होगे

शौचालय से फटफटिया तक

डीएम से  रिक्शा पोलर तक

झोंपड़ी से महलों तक

हाथों हाथ उठाए जाओगे।


कोई तुलना नहीं

किताब की मोबाइल से

न मोबाइल की किताब से

समझो तो किताब 

कुछ कम नहीं

मोबाइल एक घटना है

जो घट रही है

घटती जा रही है,

कहाँ राजा भोज

कहाँ गंगू तेली !


किताबें गुरु हैं

ज्ञान - दर्पण  हैं

पथ प्रदर्शक हैं

ज्ञान वर्द्धक हैं

मोबाइल में कुछ भी

टिकाऊ नहीं।


अहसान मान 

उन किताबों का

जिन्होंने यहाँ तक पहुँचाया,

मोबाइल का क्या

डिजीटल के मिथ्या भ्रम ने

हर आदमी ललचाया।


समय बदलेगा

आदमी भी बदलेगा

किताबों का अवमूल्यन

नहीं होगा,

तू फिर से 

किताबों की ओर  लौटेगा।


तराजू के पलड़ों में

किताब सदा भारी है,

हर बुद्धिमान ने 

उसकी आरती उतारी है

अब पुनः सोच ले तू

किताब बनेगा या

सस्ता मोबाइल ?

तू किसके साथ है

और किसके लिए है लॉयल!


वेद गीता रामायण

उपनिषद पुराण

यही किताबें तो हैं

जीवन के प्राण,

जीवंतता के प्रमाण,

अब सोच ले फिर से

कि किताब बनेगा

अथवा चालू चीज मोबाइल?


शुभमस्तु,


29.05.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆◆◆

ब्याह हुआ दुल्हन नई [ दोहा गीतिका ]

 172/2026

         

          ब्याह हुआ दुल्हन नई

                [ दोहा गीतिका ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ब्याह हुआ दुल्हन नई,प्रिय लगती ससुराल।

मात-पिता   बैरी   लगें, घर  में  करें बवाल।।


बिगड़  गए   हैं  आज  के, बेटे   करें कुसंग,

सुरापान    करने   लगे,  लगे    बुरे ऐमाल।


सीख  न  मानें  बाप  की, भूले  सद आचार,

यौवन  जब  चढ़ने लगा,बदल  गई है चाल।


क्रीम लिपस्टिक  पोतकर,रूपसियाँ मदमस्त,

चाँदी-चाँदी   देह  है, महक    रही   है खाल।


जाते    पश्चिम  देश   को, बोल  रहे हैं  झूठ,

पहुँचें   पूरब   देश    में,  ठोक  रहे  हैं  ताल।


गरिमा  नहीं   चरित्र   की,  बढ़ता नित्य गुरूर,

पीढ़ी   नई  कुचाल   में, लीन  झुका है भाल।


'शुभम्' शेष आशा नहीं, बिगड़ गया भवितव्य,

देखी पथ में  कामिनी,   फैलाते    छल जाल।


शुभमस्तु,


25.05.2026◆7.00 आ०मा०

                    ◆◆◆

प्रिय लगती ससुराल [ सजल ]

 171/2026

         

 

समांत          : आल

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ब्याह हुआ दुल्हन नई,प्रिय लगती ससुराल।

मात-पिता   बैरी   लगें, घर  में  करें बवाल।।


बिगड़  गए   हैं  आज  के, बेटे   करें कुसंग।

सुरापान    करने   लगे,  लगे    बुरे ऐमाल।।


सीख  न  मानें  बाप  की, भूले  सद आचार।

यौवन  जब  चढ़ने लगा,बदल  गई है चाल।।


क्रीम लिपस्टिक  पोतकर,रूपसियाँ मदमस्त।

चाँदी-चाँदी   देह  है, महक    रही   है खाल।।


जाते    पश्चिम  देश   को, बोल  रहे हैं  झूठ।

पहुँचें   पूरब   देश    में,  ठोक  रहे  हैं  ताल।।


गरिमा  नहीं   चरित्र   की,  बढ़ता नित्य गुरूर।

पीढ़ी   नई  कुचाल   में, लीन  झुका है भाल।।


'शुभम्' शेष आशा नहीं, बिगड़ गया भवितव्य।

देखी पथ में  कामिनी,   फैलाते    छल जाल।।


शुभमस्तु,


25.05.2026◆7.00 आ०मा०

                    ◆◆◆

हथेली पर बैठी भोली गौरैया [ गीत ]

 170/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


निर्भय 

चावल चुंगें

हथेली पर बैठी भोली गौरैया।


पहले मुझको

पहले मुझको

होड़ लगी है

बैठे मौन 

चिड़े दो लेकिन

सभी सगी हैं

पहले उनको

खा लेने दें

यही सोच बोली गौरैया।


भाँप चुकी हैं

खतरा उनको

नेंक नहीं है

चह -चह करतीं

बतियाती 

निज नीड़ नहीं है

जलदी में टपकाती दाना

धरती पर

हमजोली गौरैया।


मन की तह में 

झाँक लिया तो

मिली निडरता

अपना-सा 

नर मान लिया

पा गईं सफलता

मस्त उड़ातीं

दावत 

भूखी पोली गौरैया।


शुभमस्तु,

19.05.2026◆5.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...