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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
होता है कुछ भी नहीं, अतिशय सरल उदार।
अग-जग सारा वक्र है, करके देख विचार।।
करके देख विचार, भानु शशि अंबर तारे।
सागर धरती नीर, साथ जो नित्य हमारे।।
'शुभम्' गमन पथ वक्र,वक्र है जीवन सोता।
कुक्षि जननि की देख,सरल कब मानव होता।।
-2-
चाहत है तेरी यही, मिले सरल पथ एक।
नहीं किंतु संभव कभी, सोचें लगा विवेक।।
सोचें लगा विवेक, वक्रता ही पथ तेरा।
खोज रहा सारल्य,किंतु पथ वक्र घनेरा।।
'शुभम्' करें स्वीकार, मिलेगी तुझको राहत।
सब विधना के हाथ,जदपि कुछ तेरी चाहत।।
-3-
खुलता द्वार प्रवेश का,कभी परीक्षा हाल।
प्रश्न सरल या कठिन हों,लगे खड़ा है काल।।
लगे खड़ा है काल,नहीं सूझे क्या करना।
समय न जाए भाग, सभी के उत्तर भरना।।
'शुभम्' वृथा तू बैठ, सीट पर यों क्यों घुलता।
सबके उत्तर खोज, कक्ष जब तेरा खुलता।।
-4-
चलना ही सब चाहते, सरल -सरल हो राह।
कठिन नहीं चुनना पड़े,मिले किंतु नित वाह।।
मिले किंतु नित वाह, मंत्र मिल जाए कोई।
पंथ सरल अवगाह,मिले सब महिमा खोई।।
'शुभम्' भले ही मित्र, पड़े करनी नित छलना।
सभी चाहते पंथ, सरल ही केवल चलना।।
-5-
सीमा पर सैनिक खड़ा, चुना कठिन ही पंथ।
सरल उसे भाया नहीं,पढ़े न भारी ग्रंथ।।
पढ़े न भारी ग्रंथ, रात-दिन कठिन लुभाया।
पत्नी संतति छोड़, देश-रक्षा में आया।।
'शुभम्' न बीमा एक,चला पथ उलझा धीमा।
कठिन पंथ का वीर, बचाए भारत सीमा।।
शुभमस्तु,
29.10.2026◆ 5.45 प०मा०
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