सोमवार, 26 अक्टूबर 2026

विद्या [ चौपाई ]

 370/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मात-पिता     हैं     धन्य   हमारे।

भाग्य   हमारे     सदा     सँवारे।।

विद्या    हमें     प्रदान   कराई।

भावी  बने     ताकि    सुखदाई।।


शुभ    सौभाग्य     हमारे    सारे।

विद्या वान    सभी    गुरु न्यारे।।

हमें  ज्ञान    की      शिक्षा    देते।

खगी सदृश    शिष्यों   को सेते।।


बीस बरस  नित    विद्या  पाई।

मात-पिता   गुरु    की प्रभुताई।।

अपने  पाँव   खड़े    जब   होते।

तब  विद्या    के    खुलते  सोते।।


गुरु  से उऋण   नहीं  अब होना।

विद्या  नहीं  एक   पल  खोना।।

गुरुवर    मेरी     पहली    माता।

वही सकल विद्या   की  दाता।।


सूरज     चंदा     श्वेत      सितारे।

विद्या    ज्ञान     प्रदाता   न्यारे।।

कलकल कर  कहतीं   सरिताएँ।

बिसरें  नहीं    मनुज     सीमाएँ।।


धरती     माता      धीरज   देती।

नहीं कभी कुछ    हमसे   लेती।।

ज्ञान  सुखद   विद्या की  दाता।

धन्य हमारी      धरती     माता।।


अंबर  में  हम    सभी     समाते।

सागर     से      गहराई     पाते।।

कुदरत की    अनुपम  विद्याएँ।

मानव को   नित    पाठ   पढ़ाएं।।


शुभमस्तु,


26.10.2026 ◆6.45 आ०मा०

                   ◆●◆

मातु शारदा को करे [ दोहा गीतिका ]

 369/2026


              



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मातु शारदा को  करे,निशिदिन 'शुभम्' प्रणाम।

भाव भूमि  पर है  खड़ा, बना  काव्य सुखधाम।।


अक्षर-अक्षर   ब्रह्म  है,चुन -चुन  सुमन अनेक,

काव्य-मालिका   गूँथता, किंचित  नहीं  विराम।


बिना   कृपा   माँ  भारती, शब्द  न आए एक,

हितकर  देश समाज  को,  लिखे  लेखनी थाम।


सबका ही कल्याण हो,सब हों सुखी अशेष,

बरसें   मेघ  अनंत   से,सदा  न  आठों याम।


करें   परस्पर   प्रीति   सब, रहे  न  कोई बैर,

सरिताएँ बहती रहें, कलरव   कर  प्रभु नाम।


करें प्राप्त लंबी   अवधि,  जीवन   की नीरोग,

पर नेता  चूसें  नहीं,   समझ  मनुज को आम।


'शुभम्' प्राप्त सौभाग्य का,कर उत्तम उपभोग,

रखे शुभद   उर   कामना, जपता राम  अकाम।


शुभमस्तु,


26.10.2026◆5.30 आ०मा०

                   ◆●◆

भाव भूमि पर मैं खड़ा [ सजल ]

 368/2026


        

समांत           : आम

पदांत            :अपदांत

मात्राभार       : 24.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मातु शारदा को  करे,निशिदिन 'शुभम्' प्रणाम।

भाव भूमि  पर है  खड़ा, बना  काव्य सुखधाम।।


अक्षर-अक्षर   ब्रह्म  है,चुन -चुन  सुमन अनेक।

काव्य-मालिका   गूँथता, किंचित  नहीं  विराम।।


बिना   कृपा   माँ  भारती, शब्द  न आए एक।

हितकर  देश समाज  को,  लिखे  लेखनी थाम।।


सबका ही कल्याण हो,सब हों सुखी अशेष।

बरसें   मेघ  अनंत   से,सदा  न  आठों याम।।


करें   परस्पर   प्रीति   सब, रहे  न  कोई बैर।

सरिताएँ बहती रहें, कलरव   कर  प्रभु नाम।।


करें प्राप्त लंबी   अवधि,  जीवन   की नीरोग।

पर नेता  चूसें  नहीं,   समझ  मनुज को आम।।


'शुभम्' प्राप्त सौभाग्य का,कर उत्तम उपभोग।

रखे शुभद   उर   कामना, जपता राम  अकाम।।


शुभमस्तु,


26.10.2026◆5.30 आ०मा०

                   ◆●◆

रविवार, 25 अक्टूबर 2026

कर्म से ही देवता नर [ नवगीत ]

 367/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कर्म से ही

देवता नर

भद्र नारी देवियाँ।


भाल पर 

किसके लिखी है

देवत्व-लिपि उभरी हुई

कोकिलों के

बोल ने 

माधुर्य की  महिमा छुई

क्या पता

कब रंग बदलें

शीश की ये वेणियाँ।


देवता-दानव

इसी में

बस रहे जाना नहीं

आदमी 

जो कर  रहा  है

बद उसे माना नहीं

दूसरों पर

दोष की

थोपा करें निज गलतियाँ।


देवता में भी

असुर है

किंतु किंचित अंश ही

आदमी में

उभय का

अंश भी बहुलांश ही

आज मीठे

बेर देतीं

चुभती कभी वे बेरियाँ।


शुभमस्तु'


25.10.2026◆2.30 प०मा०

              ◆●◆

शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

भिखारी [ अतुकांतिका ]

 366/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मंदिर में

तुम मांगने गए

भिखारी ही तो हो!

अंदर गए

पुजारी ने माँगा

वह भी भिखारी है,

बाहर आए

मंगतों ने माँगा

वे भी भिखारी सभी।


सभी भिखारी हैं

सब माँग रहे हैं,

कोई बेटा- बेटी

कोई नौकरी छोकरी

कोई माँग रही वर

होकर निडर,

भिखारियों से

रहना है सँभलकर।


भिखारित्व

एक परंपरागत

अनवरत प्रक्रिया है,

इससे कोई भी नहीं बचा,

दिखावे के लिए

सब दातापन का

 ढोंग किए जा रहे,

कहीं न कहीं

वे सब भी 

पल्ले दर्जे के 

भिखारी हैं।


देना न पड़े किसी को

बस मिलता रहे,

अन्तर्भाव है यही,

माँगे बिना

 काम चलता नहीं

कभी धनियां

कभी मिर्ची

प्याज लहसुन अदरख

चीनी चाय की पत्ती

दूध आटा दाल भी,

सभी भिखारी श्रेष्ठ जो 

कहलाए गए।


लाया नहीं 

कोई कहीं से

कुछ भी, 

यहीं से लेकर

यहीं दे डाला

अपने भिखरित्व पर

दे ताला,

और बन गया दाता

महादाता

लूटता खसोटता

चैन से बैठ कर खाता,

पर भिखारी नहीं

कहलवाना चाहता।


शुभमस्तु,


23.10.2026◆ 1.45 प०मा०

                 ◆●◆

खाल को क्या रंग देना? [ नवगीत ]

 365/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आचरण मैला

तुम्हारा

खाल को क्या रंग देना ?


शक्ल पोती

देवियों-सी

कर्कशा के बोल खारी

चाहती 

पुजना पुरुष से

मर्द पर अतिचार भारी

नीले ड्रमों में

पैक कोई

गेह में हुड़दंग देना।


देवियों -सी

मूर्ति तेरी

किंतु भीतर कालिमा है

छोड़ प्रीतम

देहरी को

प्रेमियों से लालिमा है

त्याग दी

संतति जनी जो

सिर्फ़ छ:-छः अंड सेना।


नापने का 

नारियों को

एक भी मीटर बना क्या?

मर्म से

बहिरंग की

होती कभी है तोलनी क्या?

दोनों चलाते

नाव घर की

पतवार ले  कर संग खेना।


शुभमस्तु,


23.10.2026◆1.00 प०मा०

                   ◆●◆

खुदा के खेल में [ नवगीत ]

 364/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 खुदा के

खेल में

खलल डाला है तुमने।


देह की

दीवार का

रँग बदल डाला

बदल  डाली है

त्वचा

रंग था जो काला!

कमी पाई है

सृजन में

सिफर डाला है तुमने।


भैंस तो है

भैंस

क्या वह गाय होगी!

माँगता हो 

भीख

फिर होगा न योगी

पूतना के

कर्म को

संभलवाया है तुमने।


ये लिपस्टिक

क्रीम की

जादूगरी है

है सफाई 

हाथ की 

बाज़ीगरी है

पार्लर के

भाग्य को

बदल डाला है  तुमने।


कष्ट था

इस रूप-रँग से

बोल देतीं

गर्दभी सित 

रंग दें

यह खोल देतीं

जिंदगी में

आप ही 

गरल डाला है तुमने।


शक्तिरूपा

नाम है

अबला कहें क्यों

प्रतिमा

विरोधाभास की

नारी सहे क्यों

तुम पहेली

बन गई खुद

उगल डाला है तुमने।


शुभमस्तु,


23.10.2026◆10.45 आ०मा०

                   ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...