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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
करें हृदय का प्रियवर रंजन।
भंग नहीं होगा शोभन मन।।
मन जीवन का सब सुख दाता।
किसे न मन का चैन सुहाता।।
रंजन से खिल उठती क्यारी।
बिखरे भव्य नवल छवि न्यारी।।
भंजित को रंजन ही जोड़े।
सफल पंथ की दिशि में मोड़े।।
रंजन है शुभता का वाचक।
जहाँ सफलता चमके लकदक।।
रंजनकारी सदा सुखारी।
रहता नहीं हृदय तव भारी।।
नित रंजन परहित ही करता।
सकल वेदना दुख का हर्ता।।
पर उपकारी रंजन सादर।
सदा खुशी को करे उजागर।।
रंजन से समाज-हित होता।
खुले नेह का अविरल सोता।।
रंजनकारी नदियाँ सारी।
अभिसिंचन से भरतीं क्यारी।।
रंजन के आयाम अनोखे।
नहीं जहाँ पर मिलते धोखे।।
स्वच्छ मनोरंजन उपकारी।
किंचित जहाँ न दिखे उधारी।।
उपदेशक करते मन रंजन।
प्रमुदित कर स्रोता का तन-मन।।
जादूगर या बंदर वाला।
खेल दिखा खोलें उर- ताला।।
गुरुवर जब कक्षा में जाते।
'शुभम्' सदा नव पाठ पढ़ाते।।
रंजन कर मन मोहित करते।
सम्मोहन से निधियाँ भरते।।
शुभमस्तु,
01.06.2026◆7.15 आ०मा०
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