रविवार, 5 फ़रवरी 2023

कविता में कविता कहाँ है? 🎊 [ व्यंग्य ]

 58/2023 


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 ✍️व्यंग्यकार © 

 🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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           धड़ल्ले से कवियों के सम्मेलन हो रहे हैं और बराबर होते भी रहेंगे।कवि हैं,तो उनके सम्मेलन तो होंगे ही।ये अखिल भारतीयता के स्तर से नीचे तो हो नहीं सकते। कोई विराट कवि- सम्मेलन हो सकता है ,किंतु आज तक एक भी बैनर ऐसा नहीं देखा या सुना गया ; जिस पर 'लघु कवि सम्मेलन' अथवा 'मध्यम कवि सम्मेलन' अथवा 'मोहल्ला कवि सम्मेलन' लिखा हुआ हो। भानुमती के पिटारे की तरह हैदराबाद, गाज़ियाबाद, फ़िरोज़ाबाद, इलाहाबाद, फ़तेहाबाद, मुरादाबाद,नजीबाबाद आदि शहरों से कुछ 'निःशुल्क' और कुछ सपारिश्रमिक (बेचारे इतनी दूर से परिश्रम करके आते हैं; इसलिए सशुल्क नहीं कह सकते ; 'सपारिश्रमिक' ही कहेंगे) ।

           आप जानते ही हैं ,नि:शुल्क तो निःशुल्क ही है। उसे तो कुछ मिलना नहीं है।इसलिए वह स्थानीय भी हो सकता है। घर की मुर्गी दाल बराबर जो होने लगी है।इसलिए उसे ही हलाल करना अधिक आवश्यक माना जाता है।कभी- कभी उसे बैनर झंडे लगवाने ,टेंट के गड्ढे खोदने या खुदवाने, टेंट का विशाल पांडाल बनवाने, दरियाँ बिछवाने , मंच- सज्जा कराने जैसे अति महत्वपूर्ण कार्यों के लिए भी बाइज्जत नियुक्त कर लिया जाता है। तब कोई एक 'अखिल भारतीय कवि सम्मेलन' सफलता पूर्वक सम्पन्न होने की स्थिति की प्राथमिक दशा को प्राप्त होता है।

          'सपारिश्रमिक कवि' को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं। उसे तो बारात में पधारे हुए वरयात्रियों की तरह सब कुछ पका - पकाया चहिए।आए और जीमने बैठ गए। अब बात आती है कवि सम्मेलन की।भले ही मोहल्ले भर के दर्शक और श्रोता इकट्ठे न हों ,किंतु अखिल भारतीय के स्तर से कम तो कहलाया ही नहीं जा सकता। यह कवि सम्मेलन का न्यूनतम सोपान है। विश्व स्तर के कवि सम्मेलन में किसी पड़ौसी देश का प्रवासी भारतीय यदि पधार जाए तो उसकी विश्व स्तरीयता का मानक पूरा हो जाता है।इस देश में 'अखिल ब्रह्मांड स्तर' के कवि सम्मेलन होना भी सामान्य - सी बात है, बस बैनर ही तो बनवाना है।शेष सब वही का वही। 

                इन महा कवि सम्मेलनों की एक विशेषता यह देखी जाती है कि इन्हें कवि सम्मेलन कहने से पहले सोचना पड़ता है कि ये कवि सम्मेलन हैं या कुछ और।मेरे मंतव्य के अनुसार इनका नाम 'महा हा ! हा !!ठी! ठी!! सम्मेलन', 'महा चुटुकला सम्मेलन', 'महा हास्य सम्मेलन' अथवा ऐसा ही कोई अन्य नाम होना उचित जँचता है; परन्तु नामकारण से पूर्व भला मुझ अकिंचन को कौन पूँछने जा रहा है? जब इन कवि सम्मेलनों का नामकरण बदला जाएगा तो कवियों को भी कवि नहीं कहा जायेगा।उन्हें भी चुटकुलेबाज,लतीफ़ेबाज, या हास्यकार आदि किसी भी नाम से सम्मानित किया जाएगा। 

           अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि इन तथाकथित सम्मेलनों में अस्सी प्रतिशत समय में केवल चुटकुले सुना - सुना कर श्रोताओं को मूर्ख बनाया जाता है। उधर हमारे श्रोतागण भी वैसे ही हैं ,जिन्हें कविता और चुटकुले में अंतर ही पता नहीं है। वे चुटकुले को ही कविता -   पाठ समझ लेते हैं।कोई कवि किसी कवि के निजी जीवन की हस्यपरक धज्जियाँ उधेड़ने लगता है ,कोई किसी की सुंदर पत्नी के सौंदर्य सागर में गोते लगाने लगता है। और यदि मंच पर कोई सुंदरी कवयित्री दिख गई तो कहना ही क्या?सोने में सुहागा वाली कहावत ही चरितार्थ हो गई।फिर तो श्लीलता को ताक पर रख कर जो कुछ कहा औऱ सुनाया जाता है ;उससे तो बड़े बूढ़ों में भी वसंत का संचार हो- हो जाये। उधर कवयित्री भी कब पीछे रहने वाली हैं, वे भी नहले पर दहला मारते हुए तीर पर सुपर तीर बौछार करने में कब पीछे हटने वाली हैं? इस प्रकार वाद- संवाद की स्थिति के दौर से गुजरता हुआ तथाकथित सम्मेलन अपनी चरम गति को प्राप्त हो जाता है। अंत में चलते -चलते रही- बची ऊर्जा के साथ दो चार मिनट की कविता भी अपनी अंतिम गति को प्राप्त हो लेती है ।एक छोटी - सी कविता की भूमिका लघु महाभारत ही हो लेती है। वह भी विषयेतर ,अप्रसांगिक औऱ असंवैधानिक।इन हँसोड़- सम्मेलनों को कवि सम्मेलन का नाम देते हुए भी कविता की मट्टी पलीद करते हुए देखकर हँसना नहीं ,रोना ही आता है।

        अगले दिन अखबारों में औऱ ताज़ा का ताजा सोशल मीडिया पर तथाकथित कवि सम्मेलनों के स्तरोन्नयन पर आत्म स्तुतियाँ देखकर तो हँसी रोके नहीं रुकती।सुर्खियां बटोरने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते , यदि एक सच्चे साहित्यकार को भी नौटंकी के जोकर की भूमिका में जाना पड़े ,तो साहित्य की क्या गति होगी, यह सोचनीय ही होगा। हास्य के इन प्रपाती प्रतापी फब्बारों के बीच कविता के नन्हे गुब्बारे ढूँढ़े भी नहीं मिलते।ऊँचे स्तर की कविता सुनने के लिए कुछ तो खोना पड़ता है ,इसलिए आज का श्रोता अपना बहुमूल्य समय और समझदारी का बलिदान कर ही देता है। वैसे भी जीवन में हँसने- हँस पाने का सुअवसर नहीं मिलता ,तो इन सम्मेलनों में आने के बाद वह सब कमी पूरी हो लेती है।अंत में बस यही कसक शेष रह जाती है कि इस पूरे कार्यक्रम में कविता कहाँ थी?दाल में नमक का आस्वादन कराती हुई कविता जाए तो किधर जाए ,जब कवि जन ही चुटुकुलेबाज हो जाएँ। 

 🪴शुभमस्तु ! 

 05.02.2023◆ 6.45 पतनम मार्तण्डस्य।

 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

चलें प्रकृति की ओर 🌳 [ दोहा ]

 57/2023

 

[फसल,सोना,कृषक,कुसुम, बसंत]

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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       🌻 सब में एक 🌻

श्रमजल से ही सींचता,अपनी फसल किसान

अन्न, शाक,फल  दे रहा, दाता सदा  महान।।

मौसम के आघात से,फसल  हुई  बरबाद।

आसमान में  देखता, करे कृषक प्रभु-याद।।


उत्पादित  सोना  करे,धरती माँ  का  रूप।

पालन हो जन-सृष्टि का,कृषक धरा का भूप।

संतति सोना है  वही, करती  जो उपकार।

मात-पिता गुरु धन्य वे,मिलता नेह अपार।।


कर्षित कर अवनी-मृदा,कृषक  उगाए अन्न।

मानव   की   रक्षा   करे,  देश बने    संपन्न।।

सैनिक  सीमा  पर डटा,रक्षा का  प्रतिमान।

कृषक स्वेद अपना बहा,करता अन्न प्रदान।


कुसुम स्वेदजल से खिलें,उनकी अलग सुगंध

अलग तृप्ति फल दें वही,जो फलते निर्बंध।।

कुसुम सुगंधित देखकर, होता  हर्ष  अपार।

पत्थर का अंतर जहाँ,दिखता उसे न सार।।


फागुन में होली जली, हुआ वर्ष  का  अंत।

चैत्र और  वैशाख  में, आया नवल  बसंत।।

आते  मास बसंत के,प्रकृति  बदलती  रूप।

खिलतीं कलियाँ बाग में, स्वागत में ऋतु-भूप


    🌻 एक में सब 🌻

कृषक -फसल सोना बनी,

                      खिलते कुसुम अपार।

आया   नवल   बसंत   है,

                       छाया   मद  -  संभार।।


🪴शुभमस्तु !


01.02.2023●5.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 31 जनवरी 2023

जगत वही, गतिशील जो 🌎 [ दोहा ]

 56/2023


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✍️ शब्दकार ©

🌎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सदा रहे गतिशील जो, वही जगत   है  मीत।

रुका न रुकना है कभी,चली आ  रही  रीत।।

समझ   नहीं  तेरे  बिना, रुक जाए    संसार।

यथापूर्व जग की चले,गति सुचारु  सरकार।।


कितने  आकर जा  चुके, आएंगे  बहु  और।

बूँद -बूँद घट रिक्त हो,फिर भरने  का  दौर।।

कभी किसी अस्तित्व से,रिक्त न  हो  संसार।

यह   तेरी  अज्ञानता, तेरे   सिर सब  भार।।


क्रम यह आवागमन का,रीति सनातन एक।

तेरा बस अधिकार ये,करनी कर  ले  नेक।।

आज भरा कल रिक्त हो,घड़ा नीर से  मीत।

फिर से भर जाता वही, जीवन का यह गीत।


कल क्या हो यह जानना,सदा असंभव तथ्य

भावी के सत गर्भ में,छिपा हुआ ये  सत्य।।

अगले पल के ज्ञान से,जो मानव अनभिज्ञ।

मूढ़  अहंता  में  पड़ा,कहता मैं  ही  विज्ञ।।


देह मात्र साधन मिला,करने को  बहु  काज।

नहीं मात्र ये साध्य है,रहे न कल जो आज।।

साधन बिना न साध्य का,चले न पग भी एक

साधक साधन को करे,सात्विक सुदृढ़ नेक।।


'शुभं'अतिथि संसार का,नहीं सुनिश्चित काल

आया  है तो  जायगा,जब तक रोटी - दाल।।


🪴शुभमस्तु !


31.01.2023◆4.00

पतनम मार्तण्डस्य।

सबको भाया एक खिलौना 📲 [ बालगीत ]

 55/2023

 

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✍️ शब्दकार ©

📱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सबको  भाया  एक  खिलौना।

चाचा,  चाची,  मौनी , मौना।।


सुघर   खिलौना  ऐसा आया।

सबके मन को अति ही भाया

लंबा   हो   या   मोटा,  बौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


मोबाइल सब उसको कहते।

उसके बिना न पलभर रहते।।

नहीं   चाहता   कोई   खोना।

सबको भाया एक खिलौना।।


घंटों   तक   वे  चिपके  रहते।

विरह न मोबाइल का सहते।।

लगता   है   जादू   अनहोना।

सबको भाया एक खिलौना।।


खेल   पहेली    खेले    कोई।

सीखे   कोई    जनी   रसोई।।

ऑनलाइन क्रय करे बिछौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


मुखपोथी   में  कोई   खोया।

व्हाट्सएप के सँग  में सोया।।

यू -ट्यूबर  का  बड़ा  भगौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


बालक  बाला  नर  या नारी।

सबको लगी  एक   बीमारी।।

हुआ मुबाईल के सँग गौना।

सबको भाया एक खिलौना।।


🪴 शुभमस्तु!


30.01.2023◆6.30

पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 30 जनवरी 2023

रचना कर परहित में🇮🇳 [गीतिका ]

44/2023


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बिना    कर्म   मिलता    न  तुझे     कण।

करता    है     क्यों    वृथा    मनुज  रण??


समय     नष्ट     करता     है    यों       ही, 

क्यों       न     बनाता   उपयोगी     क्षण?


आस्तीन           का     साँप    बना    नर,

फैलाता        अपना       चौड़ा       फण।


देशप्रेम         धर     जनहित   कर     ले,

कर         अमृत - वाणी     का   प्रसवण।


अपना          पेट        श्वान  भी      भरते,

पर   -    उपकारी      बन    कर    अर्पण।


रचना        कर      परहित    में   कृतियाँ,

वृथा     नहीं     धरती     पर लघु     तृण।


चुम्बक     'शुभम्'     बने यदि      मानव,

सदा         मिले           पावन आकर्षण।


🪴शुभमस्तु !


23.01.2023◆6.30आरोहणम् मार्तण्डस्य।


देशप्रेम धर जनहित कर⛳ [ सजल ]

 43/2023


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●समांत  : अण ।

●पदांत :अपदांत ।

●मात्राभार: 16.

●मात्रा पतन :शून्य ।

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बिना    कर्म   मिलता    न  तुझे     कण।

करता    है     क्यों    वृथा    मनुज  रण??


समय     नष्ट     करता     है    यों       ही,

क्यों       न     बनाता   उपयोगी     क्षण?


आस्तीन           का     साँप    बना    नर,

फैलाता        अपना       चौड़ा       फण।


देशप्रेम         धर     जनहित   कर     ले,

कर         अमृत - वाणी     का   प्रसवण।


अपना          पेट        श्वान  भी      भरते,

पर   -    उपकारी      बन    कर    अर्पण।


रचना        कर      परहित    में   कृतियाँ,

वृथा     नहीं     धरती     पर लघु     तृण।


चुम्बक     'शुभम्'     बने यदि      मानव,

सदा         मिले           पावन आकर्षण।


🪴शुभमस्तु !


23.01.2023◆6.30आरोहणम् मार्तण्डस्य।

आया शुभ नववर्ष 🪷 [मनहरण घनाक्षरी]

 12/2023

 

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

आया  शुभ   नया  वर्ष,छाया नवल  उत्कर्ष,

भरा  हृदय  में  हर्ष, जागी  नई   भोर    है।

जगी उषा रश्मि लाल,भरे झोली में  प्रवाल,

करे प्राची  को  निहाल , खग -वृंद  रोर   है।।

धूप  चाहें नारी - नर,  पूस शीत   करे   तर,

ओस  रही  सूक्ष्म  तर,बैठा मौन   मोर   है।

गली -  गली   तमचूर, बाँग  दे रहे     सुदूर,

भरा   खेत  वन नूर,  चारों ओर  -  छोर है।।


                         -2-

गया  और  एक  साल,गूँज रही  नव  ताल,

घड़ी  बदली  है  चाल, शीत  में उभार   है।

ओढ़ शॉल या रजाई,गाय भैंस को ओढ़ाई,

पिएँ   दूध गर्म   चाई,  बढ़ा ओस ज्वार  है।।

नृत्य   करें  वन  मोर, देख हर्षित  हैं    पोर,

जन  आनंद    विभोर,  सूर्य समुदार     है।

सुख  बाँट रही  धूप, उष्ण नीर  भरे   कूप,

नववर्ष   का   सुरूप , दान करे प्यार    है।।


                         -3-

बहू आई  ससुराल, चले हंसिनी - सी चाल,

भिन्न  रूप  रंग ढाल, लगी  नई  साल   है।

मोर   नाचते   मुँडेर,  झूम   रहे  बेर   केर,

मिटा  रात  का  अँधेर, तारा रिक्त थाल  है।।

भाभी - भाभी  की गुहार, करे ननदी   उदार,

मीठे   बोल  में   उचार,  राग बेमिसाल  है।

मुग्धा  यौवन-उजास , प्रेम हर्ष  करे   वास,

भरे  सौम्यता  सहास,  रंग  का उछाल  है।।


                         -4-

नया  ईसवी  का  साल,उषा रश्मि है प्रवाल,

भानु    फैलाए    सँजाल , प्रेम   अपनाइए।

भूलें  गत   दुख  दर्द,झाड़ वसनों  की  गर्द,

शीत  ऋतु    बड़ी   सर्द, ठंड  से   बचाइए।।

देख  कोहरे  की  धूम, बढ़ा जीवन  की  बूम,

सत   पंथ   को   न भूल, खुशियाँ    मनाइए।

सदा  करें   उपकार,   जीव मात्र  का सुधार,

यही   जीवन   का   सार, नवगीत    गाइए।।


                         -5-

करें सभी काम-काज,शादी ब्याह के सुसाज,

बीते  कल  और  आज,नया नहीं  मानें   वे।

तान अपनी ही तान,दिखा खोखली वे शान,

दिया  करें   महाज्ञान, धरे  नए    बाने   वे।।

कसें  जींस  शर्ट  धार,करें पीत का  प्रसार,

ठानें  एक  नई   रार, भले  नहीं   जानें   वे।

ऐसे  अंधभक्त  मूढ़,  पंथ  चलें सदा  रूढ़,

आकंठ गए  वे बूड़, ति छन्नों में  छानें   वे।।


🪴शुभमस्तु !


07.01.2023◆4.00 

पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...