222/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
नहीं राम का अब यह घर है।
नोट लूटने का शुभ दर है।।
डाकू-चोर नोट नित गिनते,
लगे न जिन पर कोई कर है।
सभी बताएँ धाम अयोध्या,
रहता इसमें छलिया नर है।
राम नाम की आड़ सजी है,
यहाँ लुटेरों का ही डर है।
तिलक लगा पीतांबर धारी,
रतन नोट सोने का सर है।
चचा-भतीजे जीजा-साले,
इनकी जेब नोट से तर है।
कंगाली में आटा गीला,
उनका देखो महल इधर है।
'ट्रस्ट' भ्रष्ट हो गया कलंकित,
बिना सींग का उजला खर है।
मिली भगत की गंगा मैली,
स्वर्ण भवन संगेमरमर है।
मन में राम नहीं अब रहते,
नोट गड्डियों की चर-चर है।
रक्षक शुभम् हुए जब भक्षी,
भक्त काँपता अब थर-थर है।
शुभमस्तु,
30.06.2026◆9.15आ०मा०
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