गुरुवार, 21 मार्च 2019

आज होली हम खेलेंगे [गीत]

तुम्हारे संग आज होली हम खेलेंगे।
तुम्हारे नाज़-नख़रे सभी हम
झेलेंगे।।

मुलायम गौर चिकने गाल हैं तुम्हारे।
नागिन से लहराते बाल हैं तुम्हारे।।
आँखों में शर्बत होठों पर लाली।
चितवन तुम्हारी बड़ी ही निराली।।
भाँग भरी गोली भी हम झेलेंगे।
तुम्हारे संग आज ....


रंगों से भरी है मेरी पिचकारी।
छोड़ेगी लम्बी लाल रंग की धारी।।
लगे जो कमर पर कमर झुक जाए।
पनघट पर पनिहारिन देख रुक जाए।।
अंडे भी तुम्हारे हम से लेंगे।।
तुम्हारे संग आज....


मैसम है गुलाबी तन-मन गुलाबी।
मैं तेरा देवर तू मेरी भाबी।।
ऊपर से नीचे तक रंग में डुबाएंगे ।
मादक  अदाओं से तुमको लुभाएंगे।।
गुझिया तुम खिला दो हम पापड़ बेलेंगे।
तुम्हारे संग आज ...


रंगों से भरे हैं ये फूले गुब्बारे।
नयनों से झरते हैं रंगों के फुव्वारे।।
लाल हरी चोली भी गीली कुछ बोली।
अँगिया भी चिपक रही हरी लाल नीली।।
गुब्बारे का बदला पिचकारी से ले लेंगे।
तुम्हारे संग आज ....


चंदन अबीर रंग उड़ता गुलाल है।
मन में तरंगों की ताल का सवाल है।।
नृत्यलीन मंडली  ढप ढोल मंजीरा है।
होली में फ़ाग  गाया जा रहा कबीरा है।
रंगों के साथ 'शुभम' कीचड़ न  पेलेंगे।
तुम्हारे संग आज ..........।।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

कीचड़ माई की जय (व्यंग्य)

   सपूतों की माताएँ सदा से उस सम्मान की अधिकारिणी मानी जाती रही हैं, जिन्होंने अपनी कोख से सपूत को जना होता है। ऐसा नहीं कि पिता सम्मान का अधिकारी न हो, किन्तु ये संसार प्रत्यक्ष को कुछ ज़्यादा ही महत्त्व प्रदान करता है। पिता तो पर्दे की चीज़ है। भले ही जन्म के बाद पिता का ही नाम अधिक चलता है। ये अलग बात है कि आज पिता के साथ साथ माता का नाम लिखने का फैशन शुरू हो गया है। माता पर्दे में ही रहती है। वह पर्दानशीं जो ठहरी ! जब वह भी पर्दे से बाहर आने लगी , तो पिता के नाम के साथ अपना नाम भी लिखाने लगी। केवल इन्होंने ही नहीं , सपूत के जनन में इनका ही नहीं , मेरा भी नौ महीने का योगदान है। इनके बिना गर्भ धारण नहीं हो सकता था ,ये ठीक है। लेकिन मेरे नौ महीने के कठिन तप का भी तो नाम प्रकशित होना ही चाहिए।पिता ने सोचा ,चलो तुम भी लिखा लो अपना नाम। बेटा तो मेरा ही कहेगी दुनिया। हाँ, तुम्हारे मैके वाले जरूर तुम्हारा ही बेटा कहेंगे। कोई बात नहीं ,तुम्हारी ख़ातिर ये भी सहेंगे।
   इसीलिए तो कहता हूँ कि कीचड़ मैया की जय। जिस कीचड़ मैया ने कमल जैसा पूत ही नहीं , सुपूत जना, जिसके नाम से इन्सान इतना तना कि एक दल ही बन गया घना। अब किस- किस को करोगे मना कि ये तो कीचड़ मैया ने जना , इसलिए इससे रखो एक दूरी बना। पर जिसका पूत पूत से सुपूत हो जाए ,लक्ष्मी का आसन कहलाए , देवों के सिर चढ़कर इतराए, उसकी माता के किछड़पन को कौन याद रख पाए। पर कमल की मैया कितनी सोभाग्यशालिनी है कि उसके सुपूत का सर्वोच्च सम्मान है। किसी भी फूल को न इतना मान है, न इतनी ऊँची शान है । कीचड़ से जन्म लेकर भी जल तक से निर्लिप्त। ऊपर आया कि लुढ़काया। पर पूर्वजों ने कहा है कि माँ पर पूत पिता पर घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा इस कथन के आधार पर तो जब तक माँ में अच्छे लक्षण नहीं होंगे, तब तक वे महान गुण संतति में आ ही नहीं सकते। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि निश्चय ही कीचड़ मैया पूजनीय, वंदनीय , सम्माननीय और अभिनंदनीय है।उसने अवश्य कोई ऐसी गुप्त तपस्या की है, जिससे उसे कमल जैसा सुपूत मिला । थोड़ा बहुत अनुमान तो लगाया ही जा सकता है।इसके लिए कीचड़ के जन्म के विषय में जानना आवश्यक होगा।
   आपके घर की सफाई, घी, डालडा, तेल की खवाई, माखन, क्रीम की चिकनाई, फ़ल, सब्जी, दाल  रोटी ,दूध-मलाई, घर की नाली में जन्मी कीचड़ माई। ताल- तलैया, तक गहरे में पहुँचाई, जहाँ कमल से कीचड़ की कोख हरियाई। पंक- पिता के सानिंध्य में कमल जैसे सुपूत को जनमाई। इसलिए धन्य कमल की माई। जानो सब बहना भाई।। इसलिए तो बोलता हूँ कि
कीचड़  माई की  जय!
कमल - जननी की जय!!
कमल - नयन की जय!!!
कमल -  चरण  की जय!
कमल - वरण  की जय!!
कमल -शरण की जय!!!
कमल -वदन  की जय!!!
कमल - गुणन  की  जय!
कमल - सुजन की जय!!

 शुभमस्तु !
✍लेखक ©
🌷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

रंग रँगीले दोहे

श्याम   रंग  में  मत रंगो,
यह  अचरज  की  बात।
पहले ही  तुम  श्याम थे,
जैसे      काली      रात।।

जिनके  चेहरे  श्याम  हैं,
दामन     काले    स्याह।
होली  में  उनकी गज़ब,
कैसी    अद्भुत     चाह।।

मन  हैं  काले पंक - से
तन पर  मले    गुलाल।
माथे  पर चंदन -महक,
नेताजी    का     हाल।।

धवल  वसन तन शोभते,
चटख    होलिका     रंग।
मन हैं जिनके  दुग्ध सम ,
'शुभम'  न    होना  दंग।।

होली  तब    अच्छी लगे,
मन    हो  निर्मल    नीर।
कीचड़ पर कीचड़ लगी,
जैसे     कौआ      कीर।।

करतलकालिख पोतकर,
चेहरे     रहे        बिगाड़।
बैठे   नाव     चुनाव  की,
कर  होली    की आड़ ।।

केसरिया     नीले     हरे,
होली    के   रंग    लाल।
पिचकारी  ले - ले  खड़े,
जनता  की   कर  ढाल।।

असली   होली खेल लो,
फ़सली    का  इंतज़ार।।
किसका रंग किस पर चढ़े,
यह     जाने    करतार।।

विदा हुआ फ़ागुन 'शुभम',
चेतो   पहला   मास।
चैत्र मंजु  मधुमास है,
ऋतुराजा  का  वास।।

होली की ज्वाला जले,
जलें    वैर       विद्वेष ।
मानव-उर की कीचड़ें,
कण भर   रहें न शेष।।

साँवरिया ब्रजभूमि का,
लिए   गोपियाँ    साथ।
होली   खेले    झूमकर ,
'शुभम'   नवाए   माथ।।

💐 शुभमस्तु!
✍ रचयिता ©
🎊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

बुधवार, 20 मार्च 2019

मैं आया! आया!!आया!!! [गीत]

मच्छर   ने   गीत  सुनाया -
मैं आया! आया!! आया!!!
मौसम  मनमोहक  मादक,
मनभाया    साया    छाया।।

होर्डिंग   बैनर     वर्जित   हैं,
परचे  भी    नहीं     छपाए।
परिजन  चमचे  सँग  लेकर,
हम    खून    चूसने    आए।।
शोभित   नालियाँ     अँधेरा,
मच्छर महिमा  दल-बल से।
कानों     में   गीत   सुनाते,
चूसते नहीं    छल - बल से।
लगता    है   अपना   भैया ,
चरखा  चुनाव  का  लाया।
मच्छर ने गीत ....


धीरे  -   धीरे      गर्मी    भी ,
अनुकूल       हमारे     होगी।
परिवार     बढ़ेगा     अपना ,
और  मलेरिया      के  रोगी।
रैली     अपनी     निकलेगी,
भाड़े   पर  मच्छर    लेकर।
बाइक   न    कार    चलेंगी,
जायें       संदेशा      देकर।।
अपना  तो    धर्म  यही   है,
जिसे  खून  चूसना   आया।
इस धरती  पर  वह  प्राणी,
मच्छर   प्यारा   कहलाया।
मच्छर  ने गीत....


तन  तो    अपना  काला  है,
पर काला   धन   नहीं मेरा।
जो बहता   मानव-  तन में,
वह   लाल  रक्त   है  मेरा ।।
मैं    भारतीय    हूँ    सच्चा,
उड़ता न   यान में    ऊपर।
जाता न कभी मैं स्विस भी,
रहता।   हूँ।   केवल भूपर।
झूठे     भाषण  दे     देकर,
अख़बार  न कभी छपाया।
मच्छर ने गीत .....


मीठे       आश्वासन   देकर,
ठगता न किसी  को मच्छर।
डिग्री  से    रहित   अनाड़ी,
भैंस   सदृश    हर   अच्छर।
दंशन  का    मुझे    भरोसा,
पंखों  की   शक्ति  निरंतर।
बल भरती   रहती   तन में,
यह  मानव -मच्छर अंतर।।
छोटा - सा    पेट   हमारा ,
छोटी -सी   अपनी काया।।
मच्छर ने गीत ..........   ।।

💐शुभमस्तु !
✍रचयिता©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

गुरुवार, 14 मार्च 2019

ऊँट आया पहाड़ के नीचे [अतुकान्तिका ]

अब ऊँट आया है
पहाड़ के नीचे,
अहंकार ने 
इसके मरुथल सींचे,
अपने कूबड़ को
रहा है भींचे,
पड़ गया है
अब तो कोई
उसके पीछे।

विवेक की आँखों पर
 पड़ा हुआ पर्दा,
हो गया था 
इकट्ठा बहुत ज़्यादा गर्दा,
हटना ही था,
हटाना ही था।
बकरे की अम्मा
कब तक खैर मनायेगी,
कटने के लिए जन्मा
कटना ही था।

उठाए हुए ऊँची 
नाक अब बची ही कहाँ?
कर रहा है थू! थू!!
सारा  जहाँ',
अपनी औक़ात से
बाहर जो जाएगा,
इसी तरह 
अपनी ही
 जग हंसाई  कराएगा,
न सही प्रत्यक्ष
झुकाए हुए अपनी गर्दन
पहाड़ से नज़र
 नहीं मिलाएगा।

 सहलाने वाले
चिकने -चुपड़े नागों से
होशियार 
सदा रहना है,
इनकी सरसराहट भरी
बातों में नहीं
रीझना है।
ये सपोले ही 
आस्तीन के
 काले विषधर हैं,
मौके की तलाश में
अभी बिल में 
जा छुपे उधर हैं,
नज़र रखनी है
चौकसी भी पूरी,
बनाये रखनी है बराबर
एक निश्चित दूरी,
कितना भी दूध
 पिलाओ इनको,
न कभी अपने हुए हैं
न कभी अपना
समझना इनको।

खुल ही गई है
अब पूरी तरह
पोल इनकी,
ऊँट के गले की
आदत नहीं
जाएगी कभी इनकी।

न रहेंगे ये ऊँट
न सपोले नाग सभी,
मिटा के रहेगा
पहाड़ कुचल के
रख देगा तभी।

💐 शुभमस्तु !
✍ रचयिता ©
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

नेता हमारा सौभाग्य हैं [व्यंग्य]

   हमारा और हमारे देश का यह परम सौभाग्य है कि यहाँ नेता हैं। नेता हैं इसलिए देश आगे जा रहा है।' नेता ' शब्द का शाब्दिक अर्थ भी तो यही है ' आगे ले जाने वाला'। देश को आगे ले जाना है ,यह तो वे अच्छी तरह जानते हैं, किन्तु कहाँ ले जाना है ? कितना आगे ले जाना है ? किस ओर आगे ले जाना है ? ऊपर की ओर या नीचे की ओर? उजाले की ओर या जाले की ओर? अंधकार की ओर या प्रकाश की ओर? इसका अभी उन्हें ज्ञान नहीं है ।बस आगे ले जाना है। सो वे आगे ले जाने में जुट गए हैं। आगे ले जाते ले जाते यदि ज़्यादा आगे निकल गए तो भी खतरा है। क्योंकि यदि चालक वाहन चलाते -चलाते दिल्ली जाते समय दिल्ली से आगे निकल जाए तो लौटना ही पड़ेगा। वक़्त भी ज़्यादा बर्वाद , ईंधन भी ज़्यादा जलेगा।अंततः लौटना तो पड़ेगा ही। यदि आगे आगे चलने की होड़ में इतना भी आगे चले गए कि थल से सागर में ही गोते खाते लगे, तो भी मुसीबत। इसलिए देश को ज़्यादा आगे ले जाना भी ख़तरे से खाली नहीं है। अरे माननीयो ! देश को आगे तो ले जाइए पर सोच -समझ कर ही आगे बढ़िए। 
   देश को आगे ले जाना, पर इतना मत भूल जाना कि यहाँ की जनता ,जिसमें आप अपने को शामिल नहीं करते , पर हैं तो आप भी शामिल। क्योंकि आप पहले जनता हैं , फिर नेता । जनता ही नेता की जन्मदाता है , जन्मदात्री भी है। जनता नहीं , तो नेता भी नहीं। इसलिए मानो या न मानो पहले आप जनता , बाद में आप नेता बनता। ये अलग बात है कि आप जनता की नहीं सुनता। जनता की नहीं मानता। क्योकि आप इस देश के सबसे अधिक बुद्धिमान प्राणी हैं। बुद्धिमान होने के लिए एम .ए., पी एच. डी.की डिग्रियाँ हासिल करना जरूरी नहीं है। इसके लिए बुद्धि चाहिए बुद्धि। पढ़ने लिखने का बुद्धि से कोई सम्बन्ध नहीं है।तमाम एम.ए पास निरे मूर्ख मिल जाएंगे। और तमाम अँगूठा छापने वाले नेता आई ए एस को भी आदेशित करते हुए मंत्री बनकर डाँटते -फटकारते , उनकी सी आर लिखवाते , सजा के रूप में ट्रांसफर करते , धमकियाते, गरियाते, जुटियाते मिल जाएंगे। ऐसे देश के कर्णधारों पर देश को गर्व है कि वे देश को आगे ले जाने के लिए शिक्षा , शिक्षक और शिक्षालयों को कोई महत्व न देकर सिर्फ़ औऱ सिर्फ़ अपनी बुध्दिमता को ही सलाम करते हैं। जब वे करते हैं तो हमें अर्थात देशवासियों को उन्हें सलाम करना मज़बूरी हो जाती है। अरे भई! देश को आगे जो ले जाना है। 
   आए दिन टी वी चैनल, नेताओं के भाषण , अख़बार सभी चिल्ला चिल्लाकर आंकड़े पेश कर रहे हैं कि देश कितना आगे बढ़ गया है। कितने शौचालय बने , भले ही कागज पर बने, पीली ईंटों और बालू से चिने, पर बने तो सही। कुछ प्रधानों की प्रधानता से बने , कुछ सचिवों की महानता से सने -पर बने। जो खांड खुंदेगा वही खांड खायेगा भी , सो ये नेता प्रधान जी नाली , खड़ंजा, शौचालय , निर्माण में 45 परसेंट खांड खा रहे हैं , तो आपकी जेब से क्या जा रहा है। सरकार का है सरकार के नेता- प्रधान , प्रधान - नेता , अधिकारी -नेता , अधकृत नेता , खा रहे हैं। तो जनता को क्यों आपत्ति हो? वे सभी मिल कर देश को आगे ले जा रहे हैं। यही तो माननीय नेताओं का कर्म है , धर्म है। सौभाग्य है देश का कि हमें ऐसे देश को आगे ले जाने वाले नेता मिले हैं। 
देश के नेता जिंदाबाद! 
जिन्दाबाद , जिन्दाबाद!!

शुभमस्तु!
✍ लेखक©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

मच्छर - उवाच [अतुकांतिक ]

भू भुवन के वासी इंसान,
हम भी हैं 
अपने माँ-बाप की संतान,
किन्तु हमारी रगों में
बहता है 
तुम्हारा ही रक्त ,
इसीलिए तो हैं
हम आप इंसानों के भक्त,
मिश्रित ही सही
कभी तुम्हारा 
कभी उनका
रक्त हम पीते हैं,
तुम्हारे ही रक्त से
तो हम जीते हैं,
हमारा और तुम्हारा 
है बहुत ही निकट का रिश्ता,
तुम्हीं तो हो
हमारे लिए फ़रिश्ता,
तुम्हारे ही भाई -बहन हैं हम
बहुत ही आभार तुम्हारा,
जो हम जीवन धारण करते हैं
उसका तुम ही हो सहारा,
और उधर तुम
हमारे संहार के लिए,
बनाते हो टनों मनों
कॉइल , ऑल आउट,
गुड नाइट, अगरबत्तियां,
जिनसे उजड़ जाती हैं
हमारी बस्तियां,
बड़ी -बडीं हस्तियाँ।

हमारे विध्वंश के लिए
न जाने क्या - क्या बनाते हो,
लगाते हो बिस्तरों पर
मच्छरदानियाँ,
फिर भी हमें
नहीं रोक पाते हो।

चोरी से नहीं,
पहले तुम्हारे कान में
सुनाते हैं संगीत मधुर,
उसके बाद चुपके से
चूस ही लेते हैं,
तुम्हारा लाल लोहू सुघर।

अवसरवादी हैं हम पूरे
माननीय नेताजी की तरह,
अपना काम कर ही लेते हैं
समस्त आवरणों को भेदकर,
इतने भी दुस्साहसी हैं हम,
कि मरने से नहीं डरते हैं,
अपने विश्वास की रक्षा 
इसी दर्शन से करते हैं,
कि आत्मा अमर है
पुनर्जन्म होना ही है,
अगले जन्म में
योनि परिवर्तन करके
सांसद विधायक मंत्री जी
बनना ही है,
काम तो बस वही 
इस मच्छर -योनि का,
तुम्हारे रक्त से अपना 
और अपनों का 
उदर भरना ही है।

💐 शुभमस्तु!
✍रचयिता ©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...