बुधवार, 24 जून 2026

न दे गरीबी कभी विधाता [ गीत ]

 210/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न दे गरीबी

कभी विधाता

तरस-तरस मन जाए।


नहीं देह पर

वसन ढंकें जो

सुत-माता दुखियारे

नहीं आँत में

भोजन पानी

दिखते दीन बिचारे 

मदद नहीं

करता जन कोई

मन किस पर पतियाये।


देख रहीं

ललचाई आँखें

काश हमें मिल जाता

एक वक्त तो

शुष्क देह में

भोजन उदर समाता

कैसे प्रभु का

भजन करे मुख

गीत राम के गाए।


नहीं माँगना आता

भोजन

मांगे बिना न मिलता

बिना पाँव पर

खड़े हुए तो

फूल खुशी का  खिलता

जितना सोचें

'शुभम्' जिंदगी

उतनी ही उलझाए।


शुभमस्तु,


23.06.2026◆10.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

सोने के जब अंडे पाए [ पद ]

 209/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

राम राशि अपने घर लायौ।

सीता - हरण  करौ  रावण ने नहीं नेंक शरमायौ।

बात   पुरानी  त्रेता युग की अपनों जोर चलायौ।।

चढ़ौ  चढ़ावौ रामलला पै भौत-भौत मन भायौ।

गिनती में करि गड़बड़ सारी अपनी जेब भरायौ।।

कलयुग  की   ये बात नई है बड़ौ - बड़ौ इतरायौ।

बीवी   कहै   सफाई   देती  पति ने सभी कमायौ।।

होटल   भवन  दुकानें सिगरी अपने धन बनवायौ।

'शुभम्' कमाई चोरी करके मुख अपनौ चमकायौ।।


                         -2-

बगुला भगत देह के गोरे।

मर्यादा    पुरुषोत्तम    छोड़े   बने भए अति भोरे।

मर्यादा   अपनी   तजि   सारी  नोट चुराए   कोरे।।

पाँव  तले    भगवान  राम  के  सोना चाँदी   जोरे।

याद न रहौ कर्म फल पल को मन में लेत हिलोरे।।

सात   नहीं   सत्तर  पीढ़ी  को  हार खड़ाऊँ  चोरे।

बने   राम   के  कुशल प्रशासक भरे नोट के   बोरे।

'शुभम्' पाप कौ फूटि घड़ा गयौ गिरे शीश पै ओरे।।


                         -3-

राजनीति मंदिर पर भारी।

नातेदार   जाति   वारे भरि करें प्रशासक   यारी।

सत्रह-सत्रह साल एक ही गणक बनों अपचारी।।

जड़ें जमी भ्रष्टाचारी  की खेलि गयौ निज   पारी।

कोई कहै  बकै   कछु  कैसौ ऐसी लीक   बिगारी।।

दर्शक आए गए भेंट  करि  बाल  वृद्ध नर-नारी।

नाश करौ श्रद्धा कौ सिगरौ भई न चोरनु ख़्वारी।।

राम   कहाँ   बैठे   बनि  दर्शक   मूक चुराई   जारी।

'शुभम्' भेद जब खुलौ पाप कौ भांजि रहे तलवारी।।


                         -4-

सोने के जब अंडे  पाए।

दोनों    हाथ   फोड़ते   लड्डू   शीश कढ़ाई  धाए।

खांड़ खूँदते   जब  पावों से क्यों न प्रेम से  खाए।।

मूढ़   बने   वे   भक्त  राम   के सोना चाँदी  लाए।

बैठे     चोर  लुटेरे     डाकू    सोच-सोच पछताए।।

पीला पहन   दुपट्टा   धोती  भजन राम के     गाए।

चढ़ा प्रसाद नोट गहनों का किसको नहीं रिझाए।।

कृपा   करी   भगवान  राम ने  मंदिर माँहि   बिठाए।

'शुभम्' सफल जीवन चोरनु कौ दान लूटि घर धाए।।


                         -5-

राम राशि की लूट मचाई।

छिपौ भयौ तिनकौ दाढ़ी में नेंक न देत दिखाई।

कहा   जाँच   में करें जचैया उनकी हाथ सफाई।।

साँप   भगे    मोरी   ते बाहर   करते रहो खुदाई।

पीटो   जितनी   आप  लकीरें मिलनी नहीं सचाई।।

इधर   उधर    नेता नगरी   है ऊपर करें   खिंचाई।

साँप    मरै    टूटै  जनि   लाठी ऐसी राम   दुहाई।।

करें राम जी   चमत्कार  कछु मिलिहै दान चुराई।

'शुभम्' सोच मन में कछु ऐसौ दिखे राम प्रभुताई।।


शुभमस्तु,


23.06.2026◆9.15 आ०मा०

                      ◆◆◆

राम दाम की अजब कहानी [ पद ]

 208/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                        -1-

अरे मन नेंक नहीं पछितायौ।

राम  नाम की पीत चदरिया ओढ़ि अजुध्या   धायौ।

मिलौ नोट गिनिवे को मौकौ देखि- देखि ललचायौ।।

गिनतौ लाख करोड़ों निशिदिन काम बहुत ही भायौ।

सोना - चाँदी  चढ़े  अनेकों लार मुखनि भरि आयौ।।

बढ़तौ   रहौ लोभ मुख टपकौ साहस खूब जुटायौ।

एक   दिना  रखि  हरे नोट की  गड्डी  घर कूं लायौ।।

रोक न टोक मिली काहू की नित कौ नियम बनायौ।

'शुभम्' पतित है गयौ गणक मैं अपनो भवन बनायौ।


                         -2-

जाँच भई मन बहुत डरानौ।

काँपि रहौ मन भीतर-भीतर अब तौ पड़े  निभानौ।

कछु ऐसी तरकीब बताऔ  हे प्रभु राम जु  जानौ।।

राज्य  प्रमुख योगी जी अपने बुलडोजर चलवाते।

बड़े सख्त हैं   अनुशासन  के भवन बने गिरवाते।।

बचे  न डाकू चोर एक भी सबकी हालत पतली।

नाम सुनें जब-जब  अपचारी तन में आवै मितली।।

कैसे  करें  प्राण  कत बचिहें  गाइ   राम कौ गानौ।

'शुभम्'  झूठ  ही  एक सहारौ मान सकें तौ  मानौ।।


                         -3-

राम दान की हुई सफाई।

टूट गए   विश्वास   सभी के  डरते लोग -लुगाई।

लाखों   नहीं   करोड़ों    लूटे पड़ता कान सुनाई।।

शक की सूई कहाँ  रुकेगी  कौन आज यह जाने।

राजनीति   है  रही    देश   में  गिरते चारों  खाने।।

जितने मुँह   उतनी ही  बातें  कहें वही जो  भावै।

बिना करे की मिलै सेंत  में  कौन  नहीं ललचावै।।

बचें   प्राण  कैसे अब  अपने हमें बताओ   भाई।

'शुभम्' शेर  योगी  को गरजै बचें न  ताऊ ताई।।


                         -4-

राम दान कित जाइ सिधारौ।

हलचल मची देश भारत में पड़ौ बहुत ही भारौ।

भयौ   कपूर  उड़ो  अंबर  में बिना लगाए नारौ।।

पकड़ौ जाइ चोर जा दिन कूँ पकड़ि पीठ पै मारौ।।

जाँच करें जितने  अधिकारी सब इनाम पा जाएँ।

टीवी   वारे  और   मीडिया   सिगरे   रार मचाएं।।

लूटि   रहे   हैं मजा  विरोधी दिखे दाल में कारौ।

'शुभम्' लगे उनको सत्तासन आज अभी से हारौ।।


                         -5-

दाढ़ीजार कहाँ ते आए।

राम  नाम   कूँ खूब भुनायौ राम दाम ललचाए।

पहनि पीत अंबर तन ऊपर भक्तन कूँ भरमाए।।

कहते   अपनी  करी  कमाई अपने महल बनाए।

नंगे नहीं फ़क़ीर सहस  चौदह  में साज सजाए।।

गोबर में   दस लाख मिले तो नेंक नहीं शरमाए।

गहने   बेचि ईंट   बनवाईं   लूटि-लूटि धन  खाए।।

कहते   राम कृपा है हम पर जो हम शृंग चढ़ाए।

'शुभम्' पाप के घड़े भरे अब तबहुँ नहीं पछताए।।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆ 4.45 प०मा०

                     ◆◆●

योगी [ चौपाई ]

 207/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


योगी   वेश   धरे  बहु    भोगी।

धर्म - कर्म    के   हैं   सब   रोगी।।

नहीं   योग    की    भाषा    जानें।

हठ की    चादर    तन  पर  तानें।।


योगी का  तप   कठिन साधना।

सबके  वश   का   नहीं   नाथना।।

वन   बीहड़    पर्वत   पर   जाते।

बड़ी  गुफा  में      बसे    सुहाते।।


कृषक  देश    का   साधक  भारी।

करे     साधना      स्वेद    सँवारी।।

समझें   कृषक नहीं  है   योगी।

करे  कर्म   कृषि    रहे     निरोगी।।


घूम     रहे     हैं    पहन    गेरुआ।

ज्यों गलियों में     फिरें  फेरुआ।।

नहीं  समझना   योगी  सबको ।

परखें    उनके    दैनिक   ढब को।।


जानें      नहीं      योग-परिभाषा।

सदा  भोग   रंजित    अभिलाषा।।

स्वाद    ढूंढ़ते     भोजन    माँहीं।

कामिनि चले     साथ ज्यों छाँहीं।।


ध्यान   योग    में    रमता योगी।

कर्म योग    में    निरत    निरोगी।।

योगाचरण    जीव     की    शैली।

विषय भोगरत    तन-मन  थैली।।


एक दिवस    में   योग  न  आता।

छद्म नाट्य  कर   नर   पछताता।।

करे   साधना       जो    आजीवन।

योगी की   क्यों उधड़े   सीवन??


शुभमस्तु,


22.06.2026◆12.30 प०मा०

                    ◆◆◆

कहाँ गया वह राम चढ़ावा [ गीतिका ]

 206/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहाँ   गया    वह   राम    चढ़ावा।

आया    नेंक   न   काम   चढ़ावा।।


दान-पात्र     जो        घेरे      बैठे,

चढ़ा  उन्हीं    के    चाम   चढ़ावा।


जादू     हुआ    कि    टोना   कोई,

गया कहाँ    किस    ठाम  चढ़ावा।


कागा     नहीं    चुगें    अब  दाना,

गढ़ा  किन्हीं    के    धाम  चढ़ावा।


मैंने लिया     न     चोर     बकेगा,

किया     वहीं    विश्राम   चढ़ावा।


बिना     मार    के   भूत  न  बोले,

दिखला   देगा   झाम       चढ़ावा।


'शुभम्'  करें मन   की   सब डाकू,

निकले    निश्चय    दाम  चढ़ावा।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆ 8.15 आ०मा

दाना नहीं दान खाया [ गीतिका]

 205/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दाना     नहीं       दान     खाया।

राम    का      सम्मान    खाया।।


चुग    गए    हैं      काग    मोती,

देश     का      संज्ञान      खाया।


आए     नहीं    डाकू    कहीं  से,

धर्म    का       गुणगान    खाया।


हाथ      की       ऐसी    सफाई,

देख    ली         चुपचान खाया।


नाग  हैं     बैठे       बिलों     पर,

सुप्त         अंतर्ध्यान       खाया।


कौन    कहता     चोर    हूँ     मैं ,

आस्था    का     कान     खाया।


मलिन    सरयू     हो    गई    है,

भक्ति    भाविल    भान   खाया।


खेत     खाया      बाड़    ने   ही,

पुण्य      का    बिरबान    खाया।


अब    करें    विश्वास    किसका,

राष्ट्र     का       उपधान    खाया।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆7.00आ०मा०

                   ◆◆◆

हीरा-मोती सोना-चाँदी [ गीत ]

 204/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हीरा -मोती

सोना -चाँदी

कागाओं के भोग बने।


रामचन्द्र 

कह गए सिया से

ऐसा कलयुग आएगा

चोरी नहीं

पड़ेगा डाका

कौवा मोती खायेगा

दान चुराएँगे

जो भारी

अकड़ दिखाएं खड़े तने ।


कर्ता धर्ता 

नोट गिनैया

चोर नहीं डाकू सारे

राम मौन

सब देख रहे थे

खेल करें सब बजमारे

डाकू नहीं कहेगा

मैंने

किए सकल अपराध घने।


जिसकी पूँछ उठी

वह निकला

डाकू बड़ा ढीठ पाजी

बना लिए

निज महल अटारी

हार गए प्रभु जी बाजी

काम न आया

बजरंगी का

दाँव कड़े हैं कनक चने।


राम राज की

परिभाषा को

अंगीकार किया जिसने

छोड़ा नहीं

सुबूत एक भी

दान हरण करता उसने

तान मूँछ को

घूम रहे हैं

डाकू सारे बने ठने।


कितना दण्ड

मिलेगा इनको

सौ-सौ जन्म  चुकाएंगे

कलयुग के कूकर

कब तक यों

बचकर बाहर जाएँगे

नख से शिख तक

राम-रक्त से

सारे खटमल आज सने।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆5.45 आ०

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...