शनिवार, 31 जनवरी 2026

उल्लू बनाम अनुल्लू! [ अतुकांतिका ]

 059/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अनुल्लूओं की सरकार

कुछ उल्लूओं के 

कंधों पर चलती है,

उल्लूओं को सीधा 

करना पड़ता है, 

अन्यथा एक उल्लू ही

गले के नीचे

नहीं सरकता है।


सभी उल्लू टेढ़े ही क्यों ?

यदि उल्लू टेढ़े न हों

तो जलेबी समझकर

सब कोई निगल जाए,

अंततः उल्लू का भी

मान है, 

उसका भी स्वाभिमान है।


उल्लू  जब चाहे 

लड़ बैठते हैं,

कारण अकारण 

यों ही ऐंठते हैं,

उनसे चाहे

 बाँस बल्लियाँ गड़वा लो

अथवा नारे लगवा लो

जरूरत पड़े तो

कहीं भी आग जलवा लो।


 ये  उल्लू बहुमुखी

प्रतिभासंपन्न हैं

ये भी इसी देश की

माँओं से उत्पन्न हैं,

इन उल्लूओं से ही 

सियासत धन्य है।


कभी सोचना भी मत

कि देश उल्लू विहीन हो,

देश का उल्लू

देश की माटी में विलीन हो,

उल्लू वही सर्वश्रेष्ठ

जो जितना बड़ा कमीन हो।


शाखें  हैं  तो उल्लू भी हैं

और हर शाख पर

उल्लू विराजमान है,

आखिर उल्लू भी तो

इंसान है,

वही तो उनका

चुनाव चिह्न है

उल्लूओं से यह देश

बना हुआ महान है।


उल्लू जिंदाबाद के

नारे लग रहे हैं,

अनुल्लू पर्दे में

मजे कर रहे हैं,

देखते हैं उल्लू

 किस करवट बैठता है,

हर उल्लू दूसरे पर

अनायास ऐंठता है।


शुभमस्तु ,


30.01.2026◆ 6.00आ०मा०

                 ◆◆◆

उल्लू सदैव टेढ़ा क्यों? [ व्यंग्य ]

 058/2026

 

          

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

विचारणीय प्रश्न यह है कि उल्लू सदैव टेढ़ा ही क्यों होता है,जिसे सीधा करने की आवश्यकता पड़ जाती है ? इसके उत्तर में इतना कहा जा सकता है कि कुछ चीजें जन्मजात टेढ़ी ही बनाई जाती हैं।जिन्हें आवश्यकतानुसार सीधा करना पड़ जाता है। अब हर उल्लू जलेबी तो नहीं हो सकता ,जिसे ऐसे ही उदरस्थ कर लिया जाए।उल्लू के हाथ पैर पंख अस्थियाँ आदि सभी टेढ़े होते होंगे इसलिए उसे सीधा करना पड़ता है। एक बात यह भी है कि उल्लूओं के बिना आदमी का काम भी नहीं चलता। सभी अक्लमंदों की सरकार कुछ उल्लूओं के आसरे चलती है। यदि दुनिया में उल्लू न हो तो कितनी बड़ी समस्या पैदा हो जाए!उल्लू व्यक्ति ,समाज और देश की अनिवार्य आवश्यकता हैं। ये कुछ प्रतिशत उल्लू ही हैं ,जिनके सिर पीठ और हाथों में हम सबके भविष्य का दारोमदार है। यदि परिवार समाज और देश में सभी अनुल्लू पैदा होने लगें तो कौन किसकी बात मानेगा ! वह तो बेचारा उल्लू ही है कि उसे थोड़ा सा अपनी ओर सीधा कर लो और अपना काम निकाल लो।यह अलग बात है कि काम निकल जाने के बाद उल्लू को दूध की मक्खी की तरह बाहर निकालकर फेंक दो।उल्लू कोई घी की मटकी में गिरी हुई मक्खी तो है नहीं कि घी छानकर या अँगुली की नोंक पर रखकर बाहर फेंक  दिया जाए और घी को पुनः इस्तेमाल में ले लिया जाए !

दिन के साथ रात का होना अनिवार्य है। अन्यथा दिन को कोई क्या समझेगा ! इसी प्रकार देश और समाज को चलाने के लिए उल्लुओं की परम आवश्यकता है। प्रयोगकर्ता को उल्लू सीधा करने की कला का विशेषज्ञ होना चाहिए। हर आदमी भी यह काम बखूबी नहीं कर सकता। उसे इसका हुनर जानना और सीखना पड़ता है। 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान' के अनुसार जब उल्लूओं से पाला पड़ता है तो हुनर भी आ ही जाता है।

उल्लू देश और समाज के व्यक्तित्व की रीढ़ हैं। ये वही हैं जिन्हें नेताओं ने झंडे- बैनर लगाने ,मंच सजाने,कुर्सियाँ लगाने,नारों को ऊँची से ऊँची आवाज में बुलंद करने,गड्ढे खोदने, टेंट तंबू में बम्बू गाड़ने, रातों रात पेंफलेट चस्पा करने आदि महत कार्यों में लगा दिया जाता है और वे  मद्यपान की एक बोतल में ही खुश ही नहीं होते ,उसके टैंक में आकंठ डूब-डूब जाते हैं।एक बार डूबे कि बस ,फिर उन्हें कुछ कहने और बताने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। वे अपना काम अच्छी तरह सँभाल लिए जाते हैं। इतना अवश्य है कि कोई उल्लू बस एक बार सीधा करना पड़ता है,उसे बार बार सीधा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अरे भाई !उल्लू तो बहुत ही संतोषी प्राणी है, बस एक बार उसकी समझ में उसका काम आ जाए ,फिर तो वह जिस समर्पण भाव से कार्य करता है,उतना तो कोई भक्त भी भगवान के साथ समर्पित नहीं होता।

देश के उल्लू समाज के कंधों पर देश का बहुत बड़ा भार है। जब कहीं कोई लड़ाई ,आगजनी,तोड़ फोड़,विद्रोह आदि की बात आती है तो देश के ये उल्लू ही सेना की हरावल बन कर आगे आते हैं। और उल्लूओं की फौज से जा जूझते हैं। और उधर उनका नायक गुप्त निर्देश देता हुआ मूँछों पर ताव देता हुआ श्रेय से बचता या श्रेय को ओढ़ता बिछाता दिखाई देता है। बुद्धिमान या अनुल्लू तभी प्रकाश में आते हैं,जब उनके गलों में  भारी भरकम माला पहनाई जाती हो। अन्यथा वे अपना चेहरा छिपाए हुए मुक्तहस्त मुस्कराते रहते हैं।  ऐसा कोई युग नहीं रहा,जब देश और समाज में उल्लू पैदा न हुए हों। गेहूँ के साथ भले ही घुन पिस जाता हो ,परंतु उल्लू इतने उल्लू भी नहीं होते कि सहजता से पिस जाएँ।उन्हें अपने मालिकों के लिए कितने बड़े-बड़े काम जो करने हैं। उल्लू ही इस देश का भविष्य हैं। उनका अपना एक सुनियोजित और सुनिश्चित एजेंडा है,जिसके तहत उन्हें सक्रिय रहना है।

उल्लूओं के सम्बंध में एक विशेष और महत्वपूर्ण बात यह भी है किजो  'महान'  स्त्री-पुरुष  उल्लू पालते हैं, वे भी किसी अन्य के उल्लू हो सकते हैं। भले ही उल्लू होना गौरव की बात न मानी जाती हो ,किन्तु हर उल्लू को अपने उल्लूत्व के गौरव का अभिमान होता है। कोई उल्लू अपने को उल्लू कहलवाना अथवा कहना कदापि पसंद नहीं करता। वह तो बस होता है। यह एक अंडरस्टूड तथ्य है। इन उल्लूओं की आंखें सामान्य उल्लूओं की तरह रात में भी नहीं खुलतीं। वे रात- दिन और बारहों मास बन्द ही रहती हैं। वे इन उल्लूओं के भी बाप के बाप हैं।उल्लू के सम्बंध में यह तथ्य भी ज्ञातव्य है कि उल्लू अपने को छोड़ सबको उल्लू समझता है।वह इसी भ्रम में जीवन बिता देता है कि मैंने सबको खूब उल्लू बनाया।

शुभमस्तु !

30.01.2026◆5.15आ०मा०

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अभिमान [ कुंडलिया ]

 057/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता नर अभिमान जो,झुकता उसका शीश।

रहता  नहीं  विवेक  भी, करे  अन्य   से रीश।।

करे  अन्य  से  रीश,किसी  का   मान न जाने।

कहता  वही  अहीश,   खींचकर    लंबी ताने।।

'शुभम्'   निरंकुश मूढ़,  वनैला पशु ज्यों चरता।

अभिमानी नर   क्रूर, नहीं   हित   कोई करता।।


                         -2-

मानव  जो अभिमान में, हुआ मगन मदहोश।

नहीं मानता अन्य को, भरा  हुआ नित जोश।।

भरा हुआ  नित  जोश, बड़ों  को मान न देता।

रिक्त   विवेकी   कोष, स्वार्थ  हित  अंडे सेता।।

'शुभम्'  कर्म   से  हीन, बना  कर्मों  से दानव।

मिली मनुज  की  देह, कौन कहता है मानव।।


                         -3-

मानव जो गुणहीन हो,फिर भी हो अभिमान।

सभी   जानते    हैं   उसे, वह अज्ञान वितान।।

वह    अज्ञान   वितान , हठी अविवेकी होता।

प्रेम  दया   से  हीन,   धर्म    का  सूखा सोता।।

'शुभम्'अशुभ का रूप,शून्य कर्मों का अनुभव।

धर्म   पड़ा  भव  कूप, नाम का  है वह मानव।।


                         -4-

करता  जो संगति  कभी, अभिमानी के साथ।

डूबे  वह  अभिमान    में, पकड़ आपका हाथ।।

पकड़  आपका  हाथ, पतन  का कारण होगा।

कभी   न    देता    साथ, बदलता केवल चोगा।।

'शुभम्'  सुलगती आग,आप  मरता  ही मरता।

उस नर   का   दुर्भाग, साथ उसका जो करता।।


                         -5-

रहता  नहीं    विवेक का,  जिस नर को संज्ञान।

भरा   हुआ उसमें   रहे, नित अकूत अभिमान।।

नित  अकूत  अभिमान, न जाने  ममता क्रोधी।

धर्म  कर्म  या  दान, मान  का  ज्ञान   न बोधी।।

'शुभम्' पिता की बात,कभी पल भर भी सहता।

करता   वह   आघात,   नहीं   सीमा   में रहता।।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆9.30प०मा०

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दूरदर्शिता की बात [ अतुकांतिका ]

 056/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अपना उल्लू 

सीधा करने के लिए

कुछ उल्लुओं को

 लड़वाना भी

एक हुनर है,

राजनीति है,

यह बात 

सभी नहीं जानते

दूरदर्शिता की बात है।


कभी-कभी गलतियाँ

होतीं नहीं

की जाती हैं,

सबके दिमाग में

यह बात नहीं आती

ये वही समझते हैं

जो खुराफ़ाती हैं।


जमालो आग लगाकर

दूर खड़ी 

तमाशा देखती है,

जलती हुई आग पर

अपने हाथ सेंकती है,

इसे मूर्ख कैसे समझें !

सियासत सबके 

वश की बात नहीं मित्रो!


खुराफातियों को

देश में शांति नहीं भाती,

उठती हुई

आग की लपटें ही

उन्हें खूब ही सुहाती ,

नए के नाम पर

कुछ ऐसा करवा देना है

जिसे निज हित में

अपने अंडे ही सेना है,

समझदार के लिए

इशारा ही

बहुत होता है,

मालिक लिए है

हाथ में बड़ा-सा डंडा

भारी भरकम बोझ तो

ढोता ही  सदा खोता है।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆ 8.15 प०मा०

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आया है मधुमास [ सोरठा ]

 055/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आया  है मधुमास, कुहू-कुहू  कोयल    करे।

 कंदर्पी    अनुप्रास,    आम्रकुंज    में  गूँजते।।

  नर   कोयल     के  बोल, अमराई गुंजारती।

मादक मधुरस घोल,सजग  करें परिवेश को।।


नर  ही   करे जगार,  मादा  कोयल मौन है।

नर  से  सुंदर नार,इस   भ्रम  में  रहना नहीं।।

भ्रमर  उड़ें चहुँ  ओर,सरसों  फूली  खेत में।

नाच  रहे  वन मोर, कोयल    कूके  बाग में।।


नर मनमोहक   जान,  कोयल मानव  मोर  में। 

प्रभु का यही विधान, मेढक   भी नर ही फबे।।

पर वाणी   रसदार,   कोयल   काला रंग का।

करना प्रथम   विचार,  नहीं   रूप पर मोहिए।।


ठगे गए हैं काग, समझें  कोयल - कपट  को।

लिखा   यही    दुर्भाग,  सेते   अंडे   छद्म से।।

कोयल धरती मौन,  ऋतु   वसंत   आई नहीं।

वचन समझता कौन,असमय उचित न बोलना।।


रंग न जानें लोग,  अशुभ  सदा   काला नहीं।

मसधुरस भरे प्रयोग,कोयल  की  वाणी सुनें।।

नहीं देख रँग -रूप,प्रथम   आचरण जानिए।

है   माधुर्य  अनूप,कोयल  ज्यों  काली भले।।


भले एक   ही   रंग,  कोयल   कागा एक-से।

सुनते ही सब दंग,जब   खोलें   रसनांग को।।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆8.45 आ०मा०

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कुहू-कुहू कोयल करे [ दोहा ]

 054/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कुहू-कुहू   कोयल   करे,आया  है मधुमास।

आम्रकुंज   में    गूँजते,    कंदर्पी  अनुप्रास।।

अमराई  गुंजारती,   नर  कोयल   के बोल।

सजग करें परिवेश को,मादक मधुरस घोल।।


मादा   कोयल  मौन है,नर  ही   करे जगार।

इस भ्रम  में  रहना  नहीं, नर  से  सुंदर नार।।

सरसों  फूली खेत  में, भ्रमर  उड़ें चहुँ ओर।

कोयल   कूके  बाग  में, नाच  रहे  वन मोर।।


कोयल  मानव  मोर में,नर मनमोहक जान।

मेढक भी नर ही फबे,प्रभु का यही विधान।।

कोयल  काला  रंग का,  पर  वाणी रसदार।

नहीं रूप  पर  मोहिए,करना  प्रथम विचार।।


 समझें  कोयल-कपट को,ठगे गए हैं काग।

सेते  अंडे   छद्म  से,  लिखा   यही दुर्भाग।।

ऋतु वसंत  आई  नहीं,   कोयल   धरती मौन।

असमय उचित न बोलना,वचन समझता कौन।।


अशुभ सदा काला  नहीं,रंग  न जानें लोग।

कोयल की वाणी सुनें,  मधुरस  भरे प्रयोग।।

प्रथम  आचरण जानिए, नहीं  देख रँग-रूप।

कोयल   ज्यों  काली  भले,है   माधुर्य अनूप।।


कोयल  कागा  एक-से, भले  एक ही   रंग।

जब खोलें  रसनांग  को, सुनते  ही सब दंग।।


शुभमस्तु !


29.01.2026◆8.45 आ०मा०

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बचपन मेरे अभी न जाओ [ बालगीत ]

 053/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बचपन   मेरे  अभी    न  जाओ।

कुछ  दिन  मेरे  साथ   बिताओ।।


पुनः  नहीं       आवर्तन      होना।

मुझे    पड़ेगा     तुमको    खोना।। 

 आओ  सँग-सँग   खेलो    खाओ।

बचपन   मेरे   अभी   न    जाओ।।


कंचे      और     कबड्डी     खेलें।

चलो  उधर    हम   दंडें     पेलें।।

अपनी   धूनी    यहीं      रमाओ।

बचपन  मेरे  अभी  न    जाओ।।


वर्षा  हुई      भींग     लें   थोड़ा।

मस्त  घूम    लें     मोड़ी -मोड़ा।।

दूर  नहीं  तुम    हमसे    आओ।

बचपन  मेरे  अभी  न   जाओ।।


कागज   की हम    नाव   चलाएं।

जुगनू  पकड़ें    उन्हें     खिलाएं।।

छोड़  गज़ब हम   पर  मत ढाओ।

बचपन  मेरे   अभी    न   जाओ।।


बड़े  नहीं      है   हमको     होना।

नहीं   चाहते     तुमको     खोना।।

झंडा  ऊँचा    मिलकर      गाओ।

बचपन  मेरे   अभी   न    जाओ।।


शुभमस्तु ,


27.01.2026◆11.15 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...