शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

रिफाइंडी पीढ़ी [मुक्तक]

 262/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखने  में  पारदर्शी  है, कहलाता रिफाइंड है,

सूँघने को नहीं देशी घी, यहीं   सैट माइंड   है,

जलेबियाँ       कचौड़ी       समोसा    पूरियाँ,

घेवर  का  ढेर लगा, स्वाद  बड़ा  काइंड है।1।


शौक   से     ज़हर   का,  सेवन करवाते   हैं,

खुद भी   तो  करते हैं,  मरते  हैं मरवाते हैं,

मधुमेह   हृदय  रोग,  मिलते   हैं  तोहफ़े  में,

जी-जान के दुश्मन, कैसे- कैसे इतराते हैं।2।


मिठाइयाँ   पकवान, सब रिफाइंड के जाए,

त्यौहार  ब्याह  शादी,सब  तल-तल पकाए,

खुली हुई आँख,   विष   आहार   करना है,

जन्मदिन   तेरहवीं, रिफाइंड   से   मनाए।3।


कोई   रोक-टोक नहीं, विष- पान कीजिए,

नील हृदय नील वृक्क,नाम निज लीजिए,

सरकार  भी क्यों  भला,  रोकेंगीं  आपको,

सरसों का तेल छोड़,  रिफाइंड   पीजिए।4।


रिफाइंडी आहार  की,  रिफाइंड नई पीढ़ी है,

जलती   है  थोड़ी   देर,  बुझी   हुई  बीड़ी  है,

भूल गए  गोघृत   गोरस,  काल  के हाथों में,        

भूत भविष्य   वर्तमान, पीढ़ी   गई   मीढ़ी है।5।


शुभमस्तु,


14.08.2026◆10.30आ०मा०

                    ◆●◆

तिरंगे का मजा लो [मुक्तक]

 261/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अब      तक   रहा   जो   अत्यंत  खास,

कर दिया   गया  उसका    बड़ा उपहास

सड़क -सड़क गलियों का आम  हो गया,

अवमानना देखकर मन हो गया उदास।।1।।


ऊँचे   आसमान      में  लहराता    है तिरंगा,

कर दिया गया  है उसे  भी आदमजात नंगा,

टपरी   पर        छप्पर      पर   ट्रैक्टर    पर,

दंगाइयों के   हाथ में    हो   रहा   नित्य दंगा।।2।।


आन   बान   शान   का    प्रतीक  था तिरंगा,

बहती    थी   देश   में   नित  प्रेम  की गंगा,

आज  वह   गङ्गा    भी   मैली    हो  गई है,

केरलम्   यूपी   हो  या  जम्मू -कश्मीर बंगा।।3।।


कहाँ   गई    राष्ट्रभक्ति     कोरा   मत   तंत्र है,

तिरंगा हुआ   आम   वस्त्र   फैशन   का मंत्र है,

नेताओं     के    वोट    की  पक्की सड़क एक,

स्वेच्छाचारी  भारत    का   डंडासीन यंत्र है।।4।।


"ब्लैकमेल   करना   हो   तो  तिरंगा उठा लो,

सौगन्ध   दिला   झंडे की  अरमान  सजा लो,

नेताओं   को   ट्रम्प    कार्ड   भुनाना   ही है,

जब   तक   जैसे  लो   तिरंगे   का मजा लो।।5।।


शुभमस्तु,


14.08.2026◆ 9.45 आ०मा०

               ◆●◆

झंडा ऊँचा रहे हमारा [ अतुकांतिका ]

 260/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आया है सुअवसर

देशभक्ति के 

प्रदर्शन का,

छोड़ना नहीं है

बस तिरंगा 

लहरा दो।


छत हो 

कि छप्पर हो

अट्टालिका

या टप्पर हो

गाड़ी हो

बंगला हो

महानगर

या नगला हो,

प्रदर्शन ही तो है।


कितनी है राष्ट्रभक्ति !

स्वदेश के प्रति अनुरक्ति !!

जिसका खाते अन्न जल

उसके कृतज्ञ तो हो लेना,

अन्यथा सब ढोंग ही होगा।


पहले तिरंगे के 

नियम और विधान जानो

गिरे नहीं धरती पर

मत फटा हुआ तानो,

मत बनो लकीर के फ़क़ीर

आदमी हो  नेता हो

पाजामा हो

या वजीर,

सभी तिरंगे के नीचे हैं।


किसे पड़ी है आज देश की

बस दिखावा जरूरी है,

अपना उल्लू होता रहे सीधा

करते रहो जी हुजूरी है,

भीतर जाके चाहे 

चढ़ावा चुराओ

प्लॉट खरीदो

भवन बनवाओ

बीबियों और प्रेयसियों को

खुश करवाओ

बस झंडा ऊँचा रहे हमारा,

वाह रे रामभक्तो !

वाह रे देशभक्तो !!

जब किया  है  कर्मकांड

तो भुगतो ही भुगतो।


शुभमस्तु,


14.08.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆●◆

देखभाल अपने अंडों की [ गीत ]

 259/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखभाल अपने 

अंडों की 

करती चिड़िया एक।


पल्लव-तृण से

स्वयं बनाया 

सुघर डाल पर नीड़

रहती है

निज पिया चिड़ा सँग

जहाँ न कोई भीड़

कुशल चितेरी

चिड़िया भोली

रखती  विमल विवेक।


नहीं हानि हो

सर्प आदि से

रखती इसका ध्यान

भोर हुआ

नित चीं-चीं करती

सूर्य उदय का गान

हानि नहीं

पहुँचाती किंचित

भाव भरे उर नेक।


चारों ओर

घनी हरियाली

शांत सौम्य परिवेश

वर्षा का जल

नहीं टपकता

भय न शेष लवलेश

अपने में

मतवाली गाए

करती नित अभिषेक।


शुभमस्तु,


11.08.2026◆10.30आ०मा०

                  ◆●◆

देख तरक्की देश की [ दोहा गीतिका]

 258/2026

         

     



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देख  तरक्की  देश   की,फन   फैलाए व्याल।

अवसर  देखें   छद्म से,  बने हुए हैं     काल।।


कुटिल दृष्टि है गीध की,कॉकरोच  बहु   कीट,

आग  लगाएँ    देश  में,  दूषित   करते हाल।


छिड़ी हुई   हैं  विश्व में, आधिपत्य     की जंग,

बुझी पड़ीं आचार की,शुभता सृजित मशाल।


अभिभावक    वे  मूढ़     हैं,  संतति आज्ञाहीन,

आग   लगाते  देश में,हँस-हँस  हाथ   कराल।


भ्रमित  हुई     पीढ़ी   नई,  व्यभिचारी  मतिहीन,

नहीं   नियंत्रण  लेश   भी,चलते चाल   कुचाल।


परिणीता   पति   से नहीं,करती  तृण भर  प्रेम,

जारों   में  ही  मन  रमा, चुमा  रही निज गाल।


'शुभम्'  विषम दारुण दशा,विषज हुआ परिवेश,

पति   को  नहीं  परोसती, पत्नी   भोजन थाल।


शुभमस्तु,


10.08.2026◆ 7.30 आ०मा०

                    ◆◆◆

अवसर देखें छद्म से [ सजल ]

 257/2026


समांत          : आल

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देख  तरक्की  देश   की,फन   फैलाए व्याल।

अवसर  देखें   छद्म से,  बने हुए हैं     काल।।


कुटिल दृष्टि है गीध की,कॉकरोच  बहु   कीट।

आग  लगाएँ    देश  में,  दूषित   करते हाल।।


छिड़ी हुई   हैं  विश्व में, आधिपत्य     की जंग।

बुझी पड़ीं आचार की,शुभता सृजित मशाल।।


अभिभावक    वे  मूढ़     हैं,  संतति आज्ञाहीन।

आग   लगाते  देश में,हँस-हँस  हाथ   कराल।।


भ्रमित  हुई     पीढ़ी   नई,  व्यभिचारी  मतिहीन।

नहीं   नियंत्रण  लेश   भी,चलते चाल   कुचाल।।


परिणीता   पति   से नहीं,करती  तृण भर  प्रेम।

जारों   में  ही  मन  रमा, चुमा  रही निज गाल।।


'शुभम्'  विषम दारुण दशा,विषज हुआ परिवेश।

पति   को  नहीं  परोसती, पत्नी   भोजन थाल।।


शुभमस्तु,


10.08.2026◆ 7.30 आ०मा०

                    ◆◆◆

बाज [अतुकांतिका]

 256/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूसरों के हाथ पर सवार

करने लगे हैं बाज क्यों शिकार

स्वजनों का 

अपनी ही जड़ों को काट

कर रहे हैं ठाठ

अपना ही सर्वनाश

करने पर तुले हुए कनाश।


मर गया आँख का पानी

बरबाद करने को 

मिली राजधानी

संसद और संसद पथ

जंतर मंतर  पर चढ़े दुर्मति।


पढ़े -लिखों के लिए

अपढ़ों का हिंसक हंगामा

अमेरिका का दिया हुआ

 फटा पाजामा

नकलियों द्वारा 

असली का बैनामा?

वाह रे मतिमंदो !

पढ़े-लिखे गुंडो ! मुस्टंडो।


इनके माँ-बाप भी क्या हैं !

बची नहीं आँखों में हया है !

अपनी ही औलाद को

झोंक रहे भाड़ में

अमरीका की आड़ में,

भविष्य करवाते बरबाद

तिलचट्टे कभी हुए हैं आबाद?


दुर्बुद्धि एक मिसाल है

आहूत करते अपना ही

काल हैं,

कमाल है !

बेमिसाल है,

आज देश का ये हाल है!

सद्बुद्धि दें प्रभु जी इन्हें।


शुभमस्तु !


07.08.2026◆6.58 आ०मा०

                     ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...