मंगलवार, 4 अक्तूबर 2022

उनका शगुन बिगाड़ें !अपनी नाक कटवाएँ !🔥 [ व्यंग्य ]

 395/2022 

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 ✍️ व्यंग्यकार© 

 🙊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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 दूसरों को देखकर ,जी हाँ, मात्र देखकर जलने लगना ,मानव स्वभाव है।'स्व' अर्थात अपना भाव है।अर्थात यह भाव किसी अन्य का चोरित या अपहृत भाव नहीं ; अपना ही भाव है।इसे दूसरे शब्दों में 'अंतर डाह' की संज्ञा से सुशोभित किया जा सकता है। शब्द के उदर में प्रवेश करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव का यह एक ऐसा 'प्रिय भाव' है ;जिसके बिना उसका 'सुख?' पूर्वक जीना प्रायः दूभर ही हो जाता है।इसलिए यह भाव अर्थात 'अंतर डाह'(अंतर दाह) उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता। सदा उसके साथ ही रहता है। 

      अब आप कहेंगे /कहेंगीं कि भला यह 'अंतर डाह' कहाँ- कहाँ पाया जाता है? तो प्रत्युत्तर में यही कहूँगा कि कहाँ नहीं पाया जाता? 'जहाँ जहाँ पैर पड़े संतन के तहँ - तँह बंटाढार' के अनुसार जहाँ- जहाँ आदमी (औरत भी) तहाँ - तहाँ महाशय 'बंटाढार' अर्थात 'अंतर डाह' अर्थात 'परस्पर जलन' भी मिलना अनिवार्य ही नहीं स्वाभाविक है। अब आपको इसकी विशद व्याख्या करना भी आवश्यक हो गया है कि यह कहाँ-कहाँ,क्यों औऱ कैसे-कैसे पाया जाता है।

     घर से लेकर बाहर,नारी से लेकर नर,गाँव से लेकर नगर -नगर,डगर- डगर, अपने अड़ोस-पड़ोस, परिवार,समाज, देश -देश, सास- बहू,नर -नारी , नारी- नारी (नारि न मोह नारि के रूपा), बहन - बहन, अधिकारी - अधिकारी,नेता नेता, नेत्री - नेत्री, अभिनेता -अभिनेता (उत्तरी ध्रुव का उत्तरी ध्रुव से विकर्षण के कारण),अभिनेत्री -अभीनेत्री (दक्षिणी ध्रुव का दक्षिणी ध्रुव से विकर्षण के कारण),कवि,लेखक ,पत्रकार,कर्मचारी -कर्मचारी, वकील -वकील ,डॉक्टर - डॉक्टर, इंजीनियर - इंजीनियर, ठेकेदार -ठेकेदार, छात्र - छात्र ,शिक्षक -शिक्षक, धनी-निर्धन, महल-झोंपड़ी आदि -आदि ;बल्कि यों कहें कि इस 'अंतर डाह' का कहाँ निवास नहीं है? जहाँ दिल वहीं दिलदार, दिलों की बहार, जो नहीं मानती कभी भी हार। 

   'अन्तर डाह' के व्यापक क्षेत्र को जानने के बाद भी प्रथम दृष्टया यह जिज्ञासा भी स्वाभाविक है कि यह होती ही क्यों है? औऱ यदि नहीं होती तो क्या होता? विचार करने पर ज्ञात होता है कि 'अंतर डाह' किसी सामने वाले को देखकर इसलिए पैदा होती है कि जितनी ऊँचाई इसकी है ,मेरी क्यों नहीं? अब वह प्रयास करके भी उसके समान या उससे बढ़कर नहीं बन सकता ,इसलिए चुपचाप भीतर ही भीतर किसी उपले की तरह सुलगता हुआ अपना धुँआ आप ही ग्रहण करता हुआ जीता रहता है।जिस प्रकार एक अंगारा किसी अन्य वस्तु को जलाने से पूर्व जब तक स्वयं पूरी तरह जलकर खाक नहीं हो जाता ,तब तक किसी को जला नहीं पाता।इस प्रकार नर और नारी भीतर ही भीतर सुलगते रहते हैं।सामने वाले के समान हो नहीं पाते और सुलगकर तसल्ली का सुख लेते हुए जीने को विवश होते हैं। 

   कोई यदि यह कहे कि क्या यह अदृश्य आग दिखाई भी देती है?जी हाँ, कुछ लोगों की वार्ता, कृत्य और कुछ लोगों की आँखों में स्पष्ट दिखाई भी देती है। जिनकी आँखों में दिखाई नहीं देती ,वह बहुत भयंकर ईर्ष्यालु होता है औऱ कभी भी ईर्ष्या वश कुछ ऐसा कर बैठता है कि वह सामने वाले का अहित करने पर उतारू हो जाता है।बाँझ स्त्री किसी के बच्चे को जहर दे देती है, मरवा देती है या उसी स्त्री के साथ ऐसा टोना- टोटका भी करवाती है कि उसका किसी न किसी प्रकार से अहित हो ही जाए। अपना कूड़ा - कचरा दूसरे के घर के पास फेंकना भी 'अंतर डाह' का एक प्रतिफल है। 

    ज्यों-ज्यों मानव विकास की सीढ़ियों पर चढ़ता जा रहा है,उसी क्रम में यह 'अंतर डाह'(ईर्ष्या ) ,की वृत्ति भी बढ़ती चली जा रही है। जिसका कहीं भी कोई अंत नहीं है।यदि यह नहीं होती तो स्वर्ग की खोज के लिए अन्यत्र नहीं जाना पड़ता। इस 'अंतर डाह' ने धरती पर साक्षात नरक का निर्माण कर दिया है।यूक्रेन से रूस 'अंतर डाह'रखता है ,जिसका परिणाम सामने है। चीन ,पाकिस्तान और भारत के अंतर संबंध जग जाहिर हैं,कि यहाँ कभी भी अमन चैन की वंशी कृष्ण कन्हैया का देश होने के बावजूद नहीं बज सकती।जब वंशी बजते -बजते हुए भी महाभारत का युद्ध भी होकर रहा ,तो अब तो मात्र वंशी ही रह गई है। वह वंशीधारी कृष्ण का वंश ही नहीं रहा। 

    हर व्यक्ति की 'अंतर डाह' के अलग -अलग कारण हो सकते हैं,जो किसी सूक्ष्मदर्शी यंत्र के बिना देखे नहीं जा सकते। ये पृथक शोध का विषय है कि किसी की किसी से 'अंतर डाह' है ही क्यों? वह अवश्य ही किसी न किसी रूप में उसके मन को शांति ही देती होगी।

     यदि सामने वाले का शगुन बिगड़ जाए तो आदमी अपनी नाक को भी सहर्ष कटवाने को तैयार बैठा रहता है।सोचिए ऐसे समाज सेवी, 'देशभक्त?' मानव भक्त, आदि से क्या कोई सकारात्मक आशा की जा सकती है? मुखौटे लगाकर ये सभी केवल कोरा स्वांग दिखाते हैं।ये जनहित , समाजहित औऱ देशहित कदापि नहीं कर सकते।ओट में अपने लिए कुछ अर्जन करना ही इनका लक्ष्य होता है।

     प्रसंगवश एक रोचक जानकारी से अवगत कराना भी व्यंग्यकार अपना धर्म समझता है।वह यह है कि स्व- शोध के अनुसार निष्कर्ष यह है कि पुरुषों की अपेक्षा नारियों में इस 'महाभाव ?' की मात्रा,भार,संख्या,लंबाई , चौड़ाई और ऊँचाई बहुत अधिक होती है।हो सकता है कि कुछ 'महानारियाँ' यह बात पढ़कर मुझे भी अपनी 'अन्तरडाह' का पात्र मान लें। कोई बात नहीं, किंतु यह व्यंग्यकार सचाई कहने में किसी से भी डरता नहीं है ,तो आपसे ही भला क्यों डरे!आप तो किसी की सुंदर साड़ी देखकर ही सुलग उठती हैं,और पति को येन- केन -प्रकारेण वैसी ही नहीं ,उससे भी बेहतर साड़ी क्रय करने को बाध्य कर देती हैं।पड़ोसिन के गले में स्वर्ण हार देखकर आपके भीतर का ज्वालामुखी अब फटा कि  तब फटा की स्थिति में होने लगता है।खाना-पीना,खाना, बनाना ,देना ;सब बंद करते हुए 'गृह - हड़ताल' में पतिदेव का तबला नहीं, तसला बजा डालती हैं। करवा चौथ तभी मनेगी ,जब वैसी साड़ी आएगी। अन्यथा मैं खाना खा लूँगी औऱ ! फिर मेरी ओर से आपकी कोई  गारंटी  - वारंटी  नहीं। 

       हृदय -हृदय में निवास करने वाली 'अंतर डाह' से बड़े -बड़े ज्ञानी, प्रकांड पंडित, साधु- संत,ज्ञान के सागर भी नहीं बच पाए।यह हर एक आम और खास में समान रूप से पाई जाती है। देवी- देवताओं में होती है अथवा नहीं, इसका अनुभव मानव होने के नाते अभी कर नहीं पाया।यदि मानव से देवता हो जाता तो संभवतः इसकी अनुभूति अवश्य हो जाती। क्योंकि आप सबकी तरह कुछ न कुछ मात्रा में मैं व्यंग्यकार भी तो 'अंतरडाह' का कृपा पात्र हो सकता हूँ। कभी न कभी मेरे अंतर में भी जागती होगी।इस बार जब जागेगी तो अवश्य उसे पकड़ कर झकझोर दूँगा औऱ पूछूंगा कि यहाँ भी   तू आकर अपना आसन जमाने लगी? चल दूर हट, बाहर निकल जा मेरे भीतर से। मैं तुझे दुत्कारता हूँ। धिक्कारता हूँ। 

 🪴 शुभमस्तु !

 04.10.2022◆11.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य। 


 

सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

परहित से जीवन बगिया है! 🪴 [ गीतिका ]

 394/2022

  परहित से जीवन बगिया है! 🪴

             [ गीतिका  ]

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✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिसने     जग   -   विष  सदा पिया     है।

मानव        बन  कर       वही  जिया   है।।


अपना        उदर       श्वान     भी      भरते,

दाता    जन       का      वृहत   हिया     है।


दिया       अहर्निश       उसने  जल     को,

फिर        भी        कहलाती   नदिया     है।


परछिद्रों           में         अँगुली         डालें,

किंतु       साधु       ने     फटा  सिया     है।


इधर      -       उधर    ताकाझाँकी     क्यों,

सत्कर्मी          ने          कर्म   किया      है।


बुरा          देखता          है     औरों     का,

जीवन    भर    वह      नर       दुखिया   है।


'शुभम्'       सुगंधों       से सुरभित     कर,

परहित       से          जीवन   बगिया     है।


🪴शुभमस्तु !


03.10.2022◆7.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

नदिया देती नीर अहर्निश 🏞️ [ सजल ]

 393/2022

  

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समांत : इया।

पदांत : है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन : शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिसने     जग   -   विष  सदा पिया     है।

मानव        बन  कर       वही  जिया   है।।


अपना        उदर       श्वान     भी      भरते,

दाता    जन       का      वृहत   हिया     है।


दिया       अहर्निश       उसने  जल     को,

फिर        भी        कहलाती   नदिया     है।


परछिद्रों           में         अँगुली         डालें,

किंतु       साधु       ने     फटा  सिया     है।


इधर      -       उधर    ताकाझाँकी     क्यों,

सत्कर्मी          ने          कर्म   किया      है।


बुरा          देखता          है     औरों     का,

जीवन    भर    वह      नर       दुखिया   है।


'शुभम्'       सुगंधों       से सुरभित     कर,

परहित       से          जीवन   बगिया     है।


🪴शुभमस्तु !


03.10.2022◆7.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शनिवार, 1 अक्तूबर 2022

शारदा - स्तुति 🪷 [ गीतिका ]

 392/2022

    

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम् '

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मातु         शारदे  !     उर   बस   जाओ।

कवि  - भावों    में   शुचि   रस     लाओ।।


शब्द   -  शब्द      हो      जन   हितकारी,

मंगलकारी                  जस    बरसाओ।


'शुभम्'           तुम्हारा     नन्हा    साधक,

वीणा          उसको        सरस   सुनाओ।


सबका            हो        कल्याण    निरंतर,

स्मिति      से        जन  -  जन   हँसवाओ।


हों         नीरोग      जगत      के      प्राणी,

शांति  -  सुधा    माँ  बन   अस      आओ।


विश्वा,             महाबला ,      माँ     वसुधा,

रमा,           परा,         वरप्रदा    सजाओ।


शिवा ,          वैष्णवी,         हे  ब्रह्माणी !

शुभदा             'शुभम्'     सु-पद     बैठाओ।


🪴शुभमस्तु!


01.10.2022◆5.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 29 सितंबर 2022

हम महान! हमारा देश महान!🙉 [ व्यंग्य ]

 391/2022


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✍️ व्यंग्यकार ©

⛳ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अपनी पीठ आप ही थपथपाना हमारा स्वभाव है।जिसे मुहावरेदार भाषा में कहें तो कहा जायेगा तो मियाँ मिट्ठू बनना ही कहेंगे।हम अपने समाज, देश और राष्ट्र की परंपराओं और मनमानियों को महान मानने के आदी हैं।इसीलिए हम महान देश के महान नागरिक हैं।अब जब हमारा देश महान है ,तो हम भी इसी देश के वासी होने के नाते महान ही हुए।हमारी हजारों लाखों महानताओं  के हजारों लाखों निदर्शन परोसे जा सकते हैं ,जो हमारी बहुमुखी गौरव वृद्धि में चार नहीं चौवन चाँदों की चाँदनियों का चमत्कार चमका सकते हैं।

धरती से आसमान तक और सागर से पर्वत तक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है ,जहाँ हमारी 'महानता' न बरसती हो!अब ज्यादा पीछे औऱ दूर जाने की आवश्यकता नहीं है कि अभी कुल जमा डेढ़ महीने पहले की ही बात है कि सरकार नेतेरह से पंद्रह अगस्त तक देश की  स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती के शुभ अवसर पर प्रत्येक भारतीय को अपने घर,वाहन आदि पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए अनुमत किया था।किंतु इसका परिणाम क्या निकला?वह हम सबके सामने है।वे तिरंगे झंडे आज तक ससम्मान उतारे नहीं गए हैं। झंडा फहराना एक पावन पर्व नहीं, शौक बनकर कर आदमी की मनमानी का प्रतीक बन गया है।लोगों की छतों, पानी की टंकियों, ट्रैक्टरों,मेटाडोरों, ऑटो रिक्शाओं, ट्रकों आदि पर आज तक लहरा फहरा रहे हैं। जिस देश के नागरिकों को अपने कर्तव्यों का भान तक नहीं ,वहाँ ज्ञान का  भानु   भला कैसे उदित हो सकता है? देश के 'महान'वासियों की 'महानता' का इससे अच्छा नमूना भला मिलेगा भी कहाँ? झंडा फैशन होकर रह गया है। 

इस महान देश में बिना कुर्सी के  न तो समाज सेवा हो सकती है और न ही देश सेवा। इसलिए कुर्सी पाने के लिए कितने भी नीचे उतर जाने में सेवार्थीयों को कोई हिचक नहीं होती।सेवा से मेवा मिलती है, यह भला कौन नहीं जानता! लेकिन दिखाया यही जाता है कि हम तो तन, मन और स्व- धन से भी देश ,धर्म और समाज की सेवा करने को अहर्निश तत्पर हैं। यही समाज और देश सेवक कुछ ही अवधि में खाक से लाख करोड़ में गिल्ली - डंडा खेलने लगते हैं।

धोती कुर्ता ,साड़ी ब्लाउज के युग से लेकर हमने आज 'कपड़े-फाड़ -फैशन'  के युग में धड़ल्लेदार एंट्री कर ली है।अब शील,सादगी और सदाचार पिछड़ेपन की निशानी मानी जाने लगी है।इसलिए  'देह दिखाऊँ' प्रदर्शन की होड़ में हमने पश्चिम को भी पीछे छोड़ दिया है। नंगापन हमारी अत्याधुनिकता औऱ फेशनीय   प्रतियोगिता का मानदंड है। जो जितना देह से नंगा है ,उतना ही प्रगतिशील और महान है।अपनी परम्परागत संस्कृति औऱ सभ्यता को पीछे छोड़कर 'घुटना छू' सभ्यता हमारे गौरव गान का    महाचरण है।अपनी भाषा और  मातृभाषा को छोड़कर अंग्रेज़ी बोलना या दो चार शब्दों के  अधकचरे ज्ञान के बल पर काला अंग्रेज बनने   में हमें शर्म नहीं आती।वह गिटपिट ही हमारी योग्यता का मानक है। 

मुझे  स्वदेश में ऐसा कोई क्षेत्र दिखाई नहीं देता है ,जहाँ हमारी 'महानता' के डंके बजते हुए सुनाई न दे रहे हों। शाकाहारी से मांसाहारी होना, मधुशाला की शोभा बढ़ाना या घर को ही मधुशाला बना देना भी हमारी महानता के महत्त्व को  बढ़ाता है।निरन्तर बढ़ते हुए वृद्धाश्रम  देश की 'महान' 'आज्ञाकारी संतानों? और उनकी 'देवी? स्वरूपा' पत्नियों के 'महान' चरित्र की दुंदुभी बजाता हुआ विश्व विख्यात है।विवाह होते ही देश की  ये महान 'देवियां?' अपने सास- ससुर को बर्दाश्त नहीं कर पातीं। इसलिए वे उन्हें बाहर का रास्ता दिखाते हुए अपना विलासिता पूर्ण जीवन निर्विघ्न रूप से बिताती हैं।देश के नागरिको की 'महानता' के जितने भी गीत गाए जाएँ, कम ही हैं।

हमारी 'धर्म भीरुता' में हमसे कुछ भी करवाया जा सकता है। यहाँ तक कि रोग,भूत ,प्रेत, जिन्न,सबका समाधान यहाँ टोने-टोटके और ताबीजों के बीजों में अंकुरित होता है।ये क्या कुछ कम 'महानता' की बात है,जहाँ मेडिकल साइंस भी असफल हो जाए, वहाँ हमारे तांत्रिक ,यांत्रिक ,मांत्रिक ही रोगों को छूमंतर कर दें।लाखों का काम चुटकी भर भस्मी भभूत से हो जाए औऱ भूत का पूत तो क्या दादा परददा भी हमेशा के लिए विदा हो जाएँ,इससे महान उपलब्धि और क्या होगी? धर्म की अफ़ीम ने जनता जनार्दन को क्या कुछ नहीं दिया। ये वह सिंहासन है जहाँ बड़े -बड़े राजे - महाराजे आई.ए. एस. ;पी .सी.एस. भी  नतमस्तक हैं।दंडवत प्रणाम करते हैं और चुनाव जीतने के लिए उनके पाँव धो -धो कर पीते हुए देखे नहीं जाते ,छिप-छिपाकर पी आते हैं। 

इस महान देश की उर्वरा भूमि में नेता सदैव से 'महान' ही पैदा हुए, हो रहे हैं और यही हाल रहा तो होंगे भी।विधान नियामक होकर भी विधान भंग उनका नित्य का नियमित नियम है।पहले स्वयं, उनका परिवार,  इष्ट मित्र ,जाति  और बाद में कुछ और।पहले अपनी सत्रह पीढ़ियों का पूर्ण प्रबंध प्राथमिकता में होना ही है। वे भी तो देश के आदर्श नागरिक हैं , यदि वे स्व-उदर पोषण ,शोषण ,चूषण के लिए कुछ 'इधर - उधर' कर लेते हैं ,तो बुरा ही क्या है!यह भी तो देश सेवा ही है। 

देश की जनता शिक्षित हो या न हो ,इसकी चिंता वे क्यों करें। उन्हें तो अपनी संतति को विदेश में पढ़ने- लिखने का पूरा इंतजाम करना है।तथ्य तो यही है कि जनता जितनी पिछड़ी , निरक्षर ,रूढ़िवादी हो उतना ही अच्छा।इससे देश में नेतागिरी चमकाने का सुअवसर मिलता है औऱ पिछलग्गू जनता गड्ढे खोदने, बल्लियाँ गाड़ने ,बैनर लटकाने ,दरियां बिछाने,टेंट लगाने, प्रचार करने जैसे महान कार्यों में लगी रहती है।जब नारों से   ही बहारों का प्रबन्ध हो जाए , फिर और कुछ करने की आवश्यकता भी क्या है ? राजनीति वह मीठी मादक माधुरी है कि हर व्यक्ति इसे बुरा बताकर भी इससे गलबहियाँ करने को सुमत्सुक दिखाई देता है। यह राजनीति की 'महानता ' का 'महान' प्रमाण है।

सारांशत: यही कहा जा सकता है कि  ',महानता' हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है;जिसे हमसे कोई भी नहीं छीन सकता। हर क्षेत्र में हमने अपनी प्रचंड 'महानता' के अखंड झंडे गाड़े हैं, भले ही गाड़कर उन्हें गलने ,सड़ने, उड़ने और उधड़ने के लिए उनके अपने ही डंडे के सहारे छोड़ दिया हो।हमें उन्हें पुनः उन्हें मुड़कर देखने की फुर्सत ही कहाँ है ? हम तो वहीं हैं ,जहाँ हमारे भारतवर्ष की आत्मा है। अब आत्मा तो अदृश्य,अविनाशी, सूक्ष्म औऱ सारे देश - गात में व्याप्त है।उसे खोजने की कोशिश भी मत करना।हम सब महान हैं, तो हमारा देश हमारे ही बलबूते पर  महान है।

🪴 शुभमस्तु !

२९.०९.२०२२◆ १२.३० पतनम मार्तण्डस्य।

🙊🙈🙊🙈🙊🙈🙊🙈🙊

झंडारोहण -परीक्षा!' 🙉 [अतुकान्तिका]

 390/2022




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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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'झंडारोहण- परीक्षा' 

हुई देशवासियों की,

परिणाम भी

देख लिया सबने,

पचास प्रतिशत से

भी अधिक 

असफल ही रहे,

इनकी देशभक्ति की

'अति' की कौन कहे!


जानते नहीं

ये देश आजाद है !

कोई भी काम

करने की 

क्या कोई मरजाद है?

कानों में तेल

आँखों पर हरी पट्टी,

यही तो गई है

पिलाई इन्हें जन्मघुट्टी!


टाँग दिया!

बस टाँग ही दिया,

तिरंगा घर की छत

ट्रैक्टर, जल टंकी पर,

दृष्टि क्यों जाएगी अब

ध्वज नोंचते हुए

मंकी पर,

झुके,फटे,मैले

तिरंगे ,

वर्षा- जल में नहा रहे

हर - हर गंगे,

बस यहीं पर

हम भारतीय हो लिए

ऊपर से नीचे तक

 पूर्णतःनिर्वस्त्र नंगे!


क्या यही राष्ट्रभक्ति है?

तिरंगे के प्रति

अनुरक्ति है!

परीक्षा भी हो चुकी,

परिणाम है सामने,

खोल देख लें नयन,

क्या किया है आपने!

डेढ़ महीने के बाद

छत, टेम्पो, ट्रेक्टर पर

तिरंगा लहरा रहा है,

हिंदुस्तान का ये

'तथाकथित देशभक्त',

अंधा और बहरा रहा है!

अरे !देख भी ले 

तेरी भी छत पर

सरकार का 'आदेश'

अभी भी गहरा रहा है।


राष्ट्रध्वज का अपमान!

देश का अपमान!

सो रहा भारतीय

लंबी-सी चादर तान,

जानता ही नहीं

राष्ट्रध्वज की 

आचार संहिता,

लगा जो बैठा है

 'स्व-सद्बुद्धि' को पलीता!

यही तो तेरे भविष्य का

दर्पण !

क्या यही  है  तेरा

देश को समर्पण ?

स्वाधीनता का है

अंध -चर्वण !

क्या कर ही दिया

श्राद्ध पक्ष में

स्व- विवेक का तर्पण ?

यह तो  है एक निदर्शन,

अंधेरगर्दी का दर्पण ।


🪴 शुभमस्तु !


२९.०९.२०२२◆६.३०आरोहणम् मार्तण्डस्य।

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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'झंडारोहण- परीक्षा' 

हुई देशवासियों की,

परिणाम भी

देख लिया सबने,

पचास प्रतिशत से

भी अधिक 

असफल ही रहे,

इनकी देशभक्ति की

'अति' की कौन कहे!


जानते नहीं

ये देश आजाद है !

कोई भी काम

करने की 

क्या कोई मरजाद है?

कानों में तेल

आँखों पर हरी पट्टी,

यही तो गई है

पिलाई इन्हें जन्मघुट्टी!


टाँग दिया!

बस टाँग ही दिया,

तिरंगा घर की छत

ट्रैक्टर, जल टंकी पर,

दृष्टि क्यों जाएगी अब

ध्वज नोंचते हुए

मंकी पर,

झुके,फटे,मैले

तिरंगे ,

वर्षा- जल में नहा रहे

हर - हर गंगे,

बस यहीं पर

हम भारतीय हो लिए

ऊपर से नीचे तक

 पूर्णतःनिर्वस्त्र नंगे!


क्या यही राष्ट्रभक्ति है?

तिरंगे के प्रति

अनुरक्ति है!

परीक्षा भी हो चुकी,

परिणाम है सामने,

खोल देख लें नयन,

क्या किया है आपने!

डेढ़ महीने के बाद

छत, टेम्पो, ट्रेक्टर पर

तिरंगा लहरा रहा है,

हिंदुस्तान का ये

'तथाकथित देशभक्त',

अंधा और बहरा रहा है!

अरे !देख भी ले 

तेरी भी छत पर

सरकार का 'आदेश'

अभी भी गहरा रहा है।


राष्ट्रध्वज का अपमान!

देश का अपमान!

सो रहा भारतीय

लंबी-सी चादर तान,

जानता ही नहीं

राष्ट्रध्वज की 

आचार संहिता,

लगा जो बैठा है

 'स्व-सद्बुद्धि' को पलीता!

यही तो तेरे भविष्य का

दर्पण !

क्या यही  है  तेरा

देश को समर्पण ?

स्वाधीनता का है

अंध -चर्वण !

क्या कर ही दिया

श्राद्ध पक्ष में

स्व- विवेक का तर्पण ?

यह तो  है एक निदर्शन,

अंधेरगर्दी का दर्पण ।


🪴 शुभमस्तु !


२९.०९.२०२२◆६.३०आरोहणम् मार्तण्डस्य।

जनता आज्ञाकारी? 🪷 [ गीत ]

 389/2022


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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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छत - छत पर फहराते झंडे,

जनता आज्ञाकारी ?


एक  बार   आदेश  हो  गया,

चादर  तानी  सोया!

लगा राष्ट्र ध्वज छत टंकी पर,

राष्ट्रभक्ति  में खोया,

यही  यहाँ  आजादी,

तानी   रेशम   खादी,

भारत माँ का  भक्त  अनौखा,

लगता विस्मय भारी।


होता हो  अपमान  ध्वजा का,

नहीं   भक्त  ने सोचा,

रुई   ठूँस   ली   है   कानों  में,

रुचिकर लगता लोचा,

पत्रकार सब सोते!

बीज दाह के बोते!!

पट्टी   बँधी   हरी  ऑंखों  पर,

हुई   रतोंधी  तारी।


बीत  गया अब  डेढ़ मास भी,

झंडा -  भक्त अनौखे,

मैले,  फटे,   झुके   हैं    झंडे,

किसको  देते धोखे?

हैं   सब   कोरी बातें,

दिन भी इनको रातें,

बीट   कर  रहे   कौवे   काले,

देशभक्ति   बीमारी !


इनको   क्या   दिखला पाएंगे,

 भारत माँ की झाँकी?

करते नित अपमान ध्वजा का,

उन्हें शपथ है माँ की,

घर में   रखें  तिरंगे,

न हों और  भी नंगे,

'शुभम्' स्वांग भी देख लिया अब,

कैसी भक्ति तुम्हारी।


🪴 शुभमस्तु !


२८.०९.२०२२◆१०.००

पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...