सोमवार, 24 जनवरी 2022

देश का उत्सव तिरंगा 🇮🇳 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आ   गया   है   शुभ   तिरंगा।

देश  का     उत्सव    तिरंगा।।


बलिदान    का   रँग   केसरी,

शांति का  सित  रँग   तिरंगा।


लहलहाती    फसल     जैसा,

हरित     लहराता      तिरंगा।


शान ध्वज  की  कम  न होवे,

तन खड़ा   भू   पर    तिरंगा।


नोंच लें  वे   आँख  अरि  की,

देखता   जल    कर   तिरंगा।


गणतंत्र   गायन   कर    रहा ,

भा  रहा   नभ  पर    तिरंगा।


सत 'शुभम'  सम्मान  उर  में,

भारती   का   प्रण     तिरंगा।


🪴 शुभमस्तु !


२४.०१.२०२२◆१.४५

पतनम मार्तण्डस्य।


सजल 🇮🇳

  

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समांत: इया।

पदांत :करते हैं।

मात्राभार :24.

मात्रापतन :नहीं है।

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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देश की आन को निज प्राण दिया  करते  हैं

वीर बलिदानी  सदा त्राण किया  करते   हैं


देश  की  भक्ति   ये बातों  के बतासे   नहीं

सपूत  देशभक्त   मातार्थ जिया  करते   हैं


सीमांत  धन्य  प्रहरी  सोते न   जागते   ही

साड़ी  फटे  जो  माँ की  गुप्त सिया करते हैं


सैनिक - उर धड़कता संतति है,   वीर  पत्नी

मात - पिता  से  पूछो  अश्रु पिया  करते  हैं


फहरा  ध्वज  तिरंगा  करता  है  शान  ऊँची

धीर  'शुभम'  सारे  परिणाम दिया  करते  हैं


🪴 शुभमस्तु !


२४.०१.२०२२◆९.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

रविवार, 23 जनवरी 2022

सुन साँचों का साँच ⛵ [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

⛵ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                       -1-

साँचे  में  ढल आदमी, हुआ साँच  से   दूर।

जैसे  मेढक  कूप  का,उछले नित   भरपूर।।

उछले   नित  भरपूर,वही  है दुनिया  सारी।

सजी  चार ही  हाथ,  कूप  में चारदिवारी।।

'शुभम'  कूदता  मूढ़,भरे नर नित्य  कुलाँचे।

समझ स्वयं को ईश, बना माटी  के  साँचे।।

                        -2-

रंगा  जी  ने रँग  लिए, साँचे कितने    आज।

लाल,हरे , पीले  चुने,  बनने को    सरताज।।

बनने  को सरताज ,अलग पहचान दिखाए।

गिरगिट   जैसे   रंग, देह पर बदले    पाए।।

'शुभम'  कहाँ  है  साँच, नहाते गदहे   गंगा।

चमके भाल त्रिपुंड, पैर से सिर  तक  रंगा।।

                        -3-

मानवता  के  नाम का,गढ़ा न साँचा   एक।

पक्षपात  की आग  में, झोंकी करनी  नेक।।

झोंकी  करनी  नेक, वाद  की भट्टी जलती।

शेष नहीं है न्याय,मनुजता निज कर मलती।

'शुभम'   झपट्टामार,  सदा से है   दानवता।

साँचों  का संसार ,मर रही नित  मानवता।।

                         -4-

अपने - अपने  मेख  से, बाँध मेखला  एक।

चमकाता निज नाम को,नहीं कर्म की टेक।।

नहीं  कर्म   की टेक,बदलता सिर की टोपी।

दिखा धर्म की आड़,बाड़ उपवन में रोपी।।

'शुभम' झूठ के गान,दिखाते स्वर्णिम सपने।

कुर्सी से यश मान,जाति के सब जन अपने।

                          -5-

माटी साँचों  की नहीं, होती अति  मजबूत।

सीमा  भी उसकी कभी,होती नहीं  अकूत।।

होती नहीं अकूत, सोच  को रोक  लगाती।

स्वच्छ नहींआकाश,घुटन नित बढ़ती जाती।

'शुभम' जानता साँच, धूल धरती  की चाटी।

सीमाओं को त्याग, फाँक मानव की माटी।।


*मेख =खूँटा।

*मेखला= शृंखला,जंजीर।


🪴 शुभमस्तु !


२३.०१.२०२२◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

साँचे का संसार यह ! 🤿 [ व्यंग्य ]

 

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 ✍️ व्यंग्यकार © 🤿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम ' 

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 साँचे का संसार यह,नित साँचों की खोज।

 साँचों में बहुजन फँसे,ढूँढ़ रहे निज ओज।

 जिधर भी दृष्टि डालिए ,साँचे ही साँचे दिखाई देते हैं।जो जन पहले से ही साँचों में सटे हुए हैं, वे वहाँ पर अपनी सट-पट कर रहे हैं। किंतु जो अभी साँचों से बाहर हैं, वे साँचों की तलाश में भटक रहे हैं।अपना - अपना सिर पटक रहे हैं। साँचों में सटे हुए कोई-कोई जन मटक रहे हैं ,कुछ अटक रहे हैं औऱ किसी अन्य को खटक रहे हैं। साँचे मानो मानव की शांति की तलाश हैं।साँचों के बिना मानो वे जिंदा लाश हैं।घूरे पर चरने वाले विचरते हुए गधों की घास हैं।बड़े ही निराश हैं। साँचों के बिना तो जैसे कागज़ के ताश हैं। कोई कहीं भी फेंक देता है और अपना उल्लू सीधा कर लेता है। इसलिए उन्हें एक उचित साँचे की तलाश है। 

           कोई समाज सेवा के साँचे में सटा है। तो दूसरा सियासत के साँचे में जुटा है।कोई धर्म की चदरिया रँग रहा है औऱ अपने चर्म - चरणों को पुजवाकर साधु - संगत में सज रहा है। किसी को नशा है धन कमाने का ,किसी औऱ का धन लूटने का।किसी को मोह माया के बंधन से यथाशीघ्र छूटने का।कोई किसी कामिनी की काया में अपने को सिमटाये हुए है। तो उधर कामिनी निज साँचे में अपना तन मन रमाए हुए है। कोई ज्ञानी बनने की राह पर निकल पड़ा है , सब भटक रहे हैं अंधकार में ; इस अहं में गड़ा है।कोई झुकते - झुकते दुहरा हो रहा है।उधर जो तना हुआ है , निज गुरूर में इतरा रहा है। मानो साँचे ही अंतिम गंतव्य हैं।साँचों में घुस बैठना ही उनका वास्तविक मंतव्य है।इसलिए साँचे ही प्रणम्य हैं। उनके लिए वही उनकी श्रेष्ठतम शरण्य हैं। 

           समाज, सियासत, धर्म ,दल, ज्ञान, पांडित्य,व्यवसाय, अमीर, गरीब,स्त्री,पुरुष, कवि ,लेखक, चोर ,डकैत ,डॉक्टर, अभियंता ,अधिवक्ता ,शिक्षक, कर्मचारी ,अधिकारी, नेता , अभिनेता,मंत्री,संतरी,साधु , महात्मा ,पुजारी,महंत,:चेहरे अनंत, साँचे भी अनंत।साँचे से बाहर रहना ; मानो मिट्टी का लोंदा। एकदम बोदा।अस्तित्व विहीन।कहीं भाषा का साँचा, कहीं जाति ,वर्ग ,वर्ण ,सम्प्रदाय का साँचा। सब कुछ है वह ,परंतु यदि नहीं तो कोई मानव नहीं। कहीं मानवता नहीं। मानव नाम का कोई साँचा ही नहीं। कोई भी अस्तित्व नहीं मानवता के साँचे का।

          पशु को एक खूँटे से बाँधा जाता है। पर मानव तो स्वयं खूँटा बंधित है। वह खूँटा प्रिय है। बंधना उसकी प्रकृति है।उसकी मति में यही उसकी सद्गति है। बिना बँधे हुए वह रह नहीं सकता , जी नहीं सकता। इसीलिए न्याय नहीं; सर्वत्र पक्षपात का बोलबाला। जैसे सभी कूओं में भंग का मसाला भर डाला। नाम भर साँचा , पर साँच का नाम नहीं। 

        साँचे में ढल जाने से लाभ ? लाभ ही लाभ। निरंतर लाभ। न साँच की चिंता , न आँच का डर। भेड़ बनकर उनके पीछे -पीछे विचर। बस साँचे का घेरा न टूटे। अपना स्वामी न रूठे। कूप मंडूक बने रहें। चारदीवारी में पड़े - पड़े तने रहें । लकीर के फ़कीर बन मंडल में सजे रहें। हर समय बने - ठने - घने रहें। एक जंजीर से निरन्तर बँधे रहें। जो मिले ,उसी में मजे रहें। 

        जो साँचे में जितना फिट। वह उतना ही रहता है हिट। कैसी खिट-खिट ।कैसा सोचना ,कैसी घिस- पिट।जैसी माटी भरी जाएगी , नाक -नक्स की सूरत वैसी ही बन जाएगी।इसलिए 'सबते भले वे मूढ़ जन, जिन्हें न व्यापे जगत गति।'काहे का सोचना, काहे को लगाए मति।। बिना ही लगाए हर्रा फिटकरी ! मिलते चलें खीर मालपुआ खरी। तो क्यों न किसी साँचे में अपने तन - मन की माटी को जमाए ? नहीं आजमाया है अभी तो क्यों न जाकर के आजमाए? इतना अवश्य देख लेना कि साँचे हों पके -पकाए। वरना ऐसा न हो कि लौट के बुद्धू घर को आए! 

 🪴 शुभमस्तु !

 २३.०१.२०२२◆ १२.४५ पतनम मार्तण्डस्य। 


शनिवार, 22 जनवरी 2022

  कुर्सी - बाज़ार गर्म है ! 🪑 

[ व्यंग्य ] 

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🪑 डॉ. भगवत स्वरूप  'शुभम ' 

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 सज गई हैं दुकानें ,बाजार गर्म है।बिकेगी उसी की सौदा, जिसका जैसा भी कर्म है।तो देवियो!सज्जनो!बहनो! औऱ भाइयो ! ; डाक्टरो! मरीजो ! दवाघरो ! और दाइयो! बाजार लग चुका है।वह दिन पर दिन गरम भी हो रहा है।दुकानदार अपनी दुकानदारी के लिए बेशरम भी हो रहा है। अपने- अपने सामान की सौ -सौ खूबियाँ गिना रहा है।असलियत पूछने पर किनकिना रहा है।


  जैसा कि अपनी सौदा बेचने के लिए हर उत्पादक कम्पनी विज्ञापन करती है।कमियाँ हों भले हजार ,पर हजारों गुणगान से झोलियाँ भरती है। अब ये ग्राहक की इच्छा कि वह सौदा ले अथवा नहीं ले। बाज़ार का हर दुकानदार भी यही कर रहा है।विज्ञापनों से ग्राहक का मन संभ्रम से भर रहा है।


  पर ये मत समझ लीजिए कि आज का ग्राहक विज्ञापन पर रीझकर सौदा खरीद ले। वह चार दुकान पर जाता है,दाम और वस्तु की तुलना करता है। तब कहीं जाकर सौदेबाजी का मन करता है।जिसका जितना अधिक विज्ञापन ,उतना ही फीका पकवान ।विज्ञापन का क्या भरोसा! सड़े हुए आलू का गोरी मैदा से ढँका हुआ समोसा ! खाने के बाद कोसा, तो क्या कोसा ! लगा ही दिया न खोमचे वाले ने लोचा। यही हाल आज के गरम हो रहे बाज़ार का है। आदमी का विश्वास आज हो रहा तार- तार सा है।


   नए - नए रंग हैं। दुकानदारों की अपनी-अपनी तरंग है। किसी-किसी ग्राहक ने चढ़ा ली भंग है।अपन तो देखकर ही ये हाल दंग हैं। दूल्हे की बारात बने हुए अधिकांशत: मतंग हैं। उन्हें क्या कुछ दिन का गुज़ारा तो होगा।खाने के साथ - साथ पीने का भी जुगाड़ा होगा। पहनने को मिलेगा रंग - बिरंगा चोगा। भेड़ाचार के युग में भी सब भेड़ नहीं हैं।पर अधिकतर तो भेड़ ही हैं। तात्कालिक लाभ के पीछे अपना भविष्य भी दाँव पर लगाने वाले ग्राहकों की कोई कमी नहीं है। वे सस्ते विज्ञापनों पर दाँव लगा देते हैं।लेपटॉप ,मोबाइल , सस्ते बिजली ,पानी पर अपना मत ही नहीं, मति भी गँवा देते हैं।लोक- लुभावन विज्ञापन ;विज्ञापन नहीं , ठगी के तरीके हैं। ग्राहक की जेब काटकर उसे उसी के पैसे से खुश कर देने वाले फार्मूले हैं। ये तेज ग्रीष्म में उड़ने वाले बगूले हैं। 


एक बार खरीदोगे, बार -बार पछताओगे।भेड़ बने हुए किसी कुएँ में पड़े पाओगे।अपनी ही अगली पीढ़ी पर गज़ब ढाओगे। जब कोई चीज गर्म होती है ,तो गर्मी पाकर बढ़ती है, फैलती है। ये बाजार ! ये दुकानदार ! सभी फैल रहे हैं और नगर-गाँव के ग्राहक पिछली दुकानदारी अब तक झेल रहे हैं। हे ग्राहको ! तुम सौदा मत बन जाओ, ऐसा न हो कि बाद में पछताओ।अपना हित-अहित स्वयं पहचानो! मेरी कही बात आज मानो या मत मानो! पर इन विज्ञापनबाजों के हाथ में अपनी सौर इतनी भी मत तानो कि तुम्हारे पैर ही बाहर चले जाएँ ?


  मखमली चादरों में ढँके हुए ये माल ! रंग - बिरंगे बैनरों तले दिखलाते हुए कमाल ! बनने ही वाले हैं भविष्य का बवाल ! यही तो है हर ग्राहक के सामने सवाल। भविष्य में अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे होगी ? कौन कर सकेगा? कौन अपना है ,कौन ठग और लुटेरा है ; ये देखना पहचानना है। आज जब सारी दुनिया बारूद के ढेर पर भौंचक्की - सी बैठी है , तब तो औऱ भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है ,कि कौन ठग है ,कौन लुटेरा। कौन दे सकता है , स्थाई औऱ मजबूत बसेरा। इसलिए बाजार की गरमी पर मत जाएँ।ठंडा करके खाएँ। अन्यथा बाद में पछताएं! 


 ये पोस्टर ! ये झंडियाँ!! ये हैं मात्र काष्ठ की हंडियां ! जलेंगीं और तुम्हें भी जलायेंगीं। दुकानों की रंगत पर मत मर मिटो। ये एक बार गर्माएगीं, तुम्हारी आगामी पीढ़ियाँ तुम्हें हमेशा गरियायेंगीं। गरजने वाले कब बरसते हैं! जो इनसे उम्मीद लगाए बैठे हैं ,वे सदा तरसते हैं। पता नहीं ,ये बाजार कुर्सियों का है।पाँच साल मजा मनाने वाली तुरसियों का है। इनकी तुरसी में तुम्हें कुछ भी नहीं मिलने वाला। क्यों करते हो इन नशेड़ियों के हाथों अपना मुँह काला! इनके एक हाथ में झंडा है ,दूसरे में जाला। यदि अब भी जपते रहे इनकी माला; तो पड़ ही जाने वाला है, तुम्हारे हाथ पैरों में ताला। 

 

 इन्हें तो बस कुर्सी चाहिए। चाहे जैसे भी मिले। साधन उचित हों या अनुचित ;उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है। ये वही हैं ,जो अपने मतलब के लिए गधे को भी अपना बाप बना लेते हैं। औऱ मतलब निकल जाने के बाद मार दुलत्ती ठुकरा भी देते हैं। हे प्यारे ग्राहको! अपना भला आपको स्वयं देखना है ,सोचना है। बात मात्र पाँच साल की नहीं, पाँच युगों की है। हमारी भावी पीढ़ियों की है। इन शवों के सौदागरों से बचके रहना है। इन्हें तो कुर्सी पाकर तुम्हें भूल ही जाना है। ये वे घोड़े नहीं ,जो घास से दोस्ती कर लें! घास तो खाई ही जाने वाली है। तुम्हें घास नहीं बनना है , न इनके ग्रास का चयनप्राश बनना है।


  ये तुम्हारे मालिक नहीं, स्वामी नहीं। ठगियों को ठुकराने में कोई बदनामी नहीं। अपने आत्मज्ञान को जगाना है। तब बाजार से सौदेबाजी करना है। 'कु ' 'रसी ' ने सदा 'कु' 'रस' ही दिया है। इस कु रस में इतने दीवाने मत हो जाओ ,जो इनके कारण अपना अस्तित्व नसाओ ! ये नहीं होंगीं ,तब भी आप होगे। ये बाजार ,ये समाज, ये राष्ट्र , ये देश तुमसे ही है, कुर्सी - बाजारों से नहीं। कुर्सियों से भी नहीं। कुपात्र को दिया गया दान भी पाप है। इसलिए सुपात्र चुनें। तब अपना भरा कटोरा किसी के झोले में डालें। 


 🪴 शुभमस्तु !


 २२.०१.२०२२◆३.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

सघन कोहरा छाया 🌼 [ दोहा गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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  सघन   कोहरा छागया  , दिशा-दिशा  में   शीत।

छिपे  कीर  निज  नीड़ में, जीव-जंतु  भयभीत।


चादर  ओढ़े    दूध - सी, छिपे हुए   हैं   भानु,

निष्प्रभ   चंदा- चाँदनी, नहीं गा   रहे   गीत।


पल्लव-पल्लव ओस के, चमके  मुक्ता चारु,

जेठ  पराजित हो गया,पूस-माघ  की  जीत।


छुआ  न जाए  देह  को,पोर-पोर  हिम  सेत,

कैसे हो  अभिसार अब,रूठ गया  है   मीत।


अवगुंठन   अपना  हटा,नहिं चाहती    नारि,

आलिंगन   कैसे करें, गए दिवस   वे   बीत।


पाटल - दल  भीगे हुए,स्वागत को   तैयार,

उत्कंठा    ऐसी  जगी,  भाव नहीं   विपरीत।


'शुभम'  कामना  आग  - सी,दहकाती है  देह,

झरते उर नव स्रोत के,निर्झर नित नवनीत।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०१.२०२२◆११.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


अतीत 🧡 [अतुकांतिका]

 

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✍️ शब्दकार ©

🧡 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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शेष नहीं हो

जिसकी तीत,

हो गया हो 

जो पूरी तरह रिक्त,

वही तो है 

हे मानव तेरा अतीत।


यह अतीत ही 

कभी था जब

सतीत ,

शुष्कता नहीं थी,

उष्णता भी नहीं थी,

तीत ही तीत थी,

तभी तो उर में

विद्यमान प्रीति थी।


सतीतता में

होता है नव अंकुरण,

स्फुरण ,

संचरण,

क्योंकि वहाँ नमी है,

जो है अपरिहार्य

नहीं उसकी 

कहीं भी तृण भर

कमी है।


फिर भी आज की अपेक्षा

बीता हुआ कल

सुख देता है,

बीत जाने पर

रीत जाने पर

रिक्त पात्र भी

मधुर स्मरण देता है।


यह अतीत ही

कभी वर्तमान था,

मेरी तेरी पहचान था,

कैसे किया

 जा सकता है

विस्मृत,

उसका तो 

प्रत्येक आयाम है

 अति विस्तृत,

उसी ने किया है

सदा ही तुम्हें उपकृत,

वही तो है 

जीवन का ऋत,

उसी का  वरदान है

'शुभम' है जीवन का सत।


*तीत =नमी ,आर्द्रता।


🪴 शुभमस्तु !



२१.०१.२०२२◆८.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...