बुधवार, 5 मई 2021

गिद्ध - बाजार 🦅 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जीवित जन को खा रहे,वर्तमान में  गीध।

कौन नहीं पहचानता,चलें नाक की सीध।।


गिद्धों को बस चाहिए, जीवित ताजा माँस।

सीता या पद्मावती, चलती हो बस   साँस।।


गीधों  के  अवतार को, पहचाना   है    देश।

नोंच-नोंच नर खा रहे,बदल-बदल कर वेश।।


कोई  ठेले   पर  खड़ा,रहे देश कुछ    ठेल।

गिद्धों  के बाज़ार  में,अवसर का  है  मेल।।


दूध  मिलाया  नीर  में,गए गीध सब  गीद।

धनिए में धनियाँ कहाँ, मिले गधे  की लीद।।


लोहे  के  पर लग गए,गीध बने नभ - यान।

पाँव नहीं अब भूमि पर,बहरे उनके  कान।।


था जटायु बस एक ही,नहीं लिया अवतार।

श्रीराम  के  अंक में, गया मोक्ष  के   द्वार।।


इस  कोरोना - काल में,गीधों की  है   बाढ़।

कितने ही बहुरूपिए, लुंचक माँस  प्रगाढ़।।


गीध-वेश पहचानना,'शुभम'न संभव आज।

कोई   है   दूकान   में,   पहने कोई    ताज।।


अपने - अपने  ढंग से ,नोंच रहे  हैं  माँस।

गीध सभी इस देश के,बंद कर रहे   साँस।।


गली, मुहल्ला,सड़क पर,मंचों पर हैं  गीध।

लेताजी तो जा रहे,ठीक नाक की   सीध।।


🪴 शुभमस्तु !


०५.०५.२०२१◆१२.४५ पत नम मार्तण्डस्य।

आज का मानव कैसा! 🪢 [ कुंडलिया ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                      -1-

उसकी  नज़रों  से नहीं,बचता कोई   काम।

चाहे   परदे  में करो,  चाहे खुलकर  आम।।

चाहे खुलकर  आम,बुरा अच्छा सब  जानें।

दिखे न प्रभु की आँख,भाव की डंडी तानें।।

'शुभं'कर्म का फूल,खिले तब निकले सिसकी

सौ का नीबू एक ,नज़र है सब पर  उसकी।।


                      -2-

बोया बीज  बबूल  का,लगें न मीठे  आम।

काँटे ही पथ में मिलें,करुणा करें  न राम।।

करुणा   करें  न  राम,दाम ही ईश्वर    तेरा।

छूटेंगे  जब   प्राण, मुक्त  होगा तब    घेरा।।

'शुभं'न जाए साथ,कनक तज जब तू सोया।

फ़लते  वही  बबूल, बीज  जो तूने   बोया।।


                       -3-

कर्ता  ख़ुद  को मानता,प्रभु कर्ता  को भूल।

करनी का फ़ल जो मिले, हिल जाती है चूल।

हिल  जाती  है  चूल,याद आ जाती    नानी।

लगे प्यास जब तेज़, बूँद भर मिले न पानी।।

'शुभम'  दे  रहा दोष,कर्म की गागर    भर्ता।

मानव  बनता  ईश,जानता प्रभु   ही  कर्ता।।


                        -4-

लिखता  अपने नाम में,नर करता शुभ काम।

बुरा थोपता गैर को,जिसका कटु  परिणाम।।

जिसका कटु परिणाम,झेल पाना क्या संभव

अखबारों  में  नाम, छपाता बनता   दुर्लभ।।

'शुभम' ईश के धाम,जीव हर नंगा   दिखता।

शुभ कर्मों का श्रेय,नाम वह अपने लिखता।।


                        -5-

जलता मानुष देखकर,परयश निधि परकाज

बिना आग  बिन धूम के,छीने वह पर ताज।।

छीने वह पर ताज,सुलगता भीतर  -  भीतर।

भखना चाहे आम,स्वयं हो चाहे    कीकर।।

'शुभम' मीत  को मीत, देख लें कैसे  छलता।

पशु से गर्हित काम,मनुज करता नित जलता


🪴 शुभमस्तु !


०५.०५.२०२१◆ १०.३० आरोहणम मार्तण्डस्य।

रविवार, 2 मई 2021

ज्ञान - दान की बाढ़🤳 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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ज्ञान बाँटने  की लगी, पढ़े-लिखों  में होड़।

चुरा - चुराकर बाँटते, ज्ञान सभी जी तोड़।।


स्वयं  कभी  करते नहीं,औरों को दें  ज्ञान।

ज्ञानी  ऐसे  देश के, इन  पर हमें  गुमान।।


लूट  मची  है  ज्ञान  की,लूट सके तो लूट।

लूट न  पाया  ज्ञान  जो, हो जाएगा   हूट।।


व्हाट्सएप पर ज्ञान की,आती है नित बाढ़।

जनसेवा  में  व्यस्त हैं,  दुखती अपनी दाढ़।।


मुखपोथी  पर  भेजते, बना वीडियो  लोग।

कर  दें   छूमंतर  सभी, कोरोना  का  रोग।।


चिड़ियों  जैसी  ट्वीट का, देते छोटा   मंत्र।

परहित में  टुटिया  रहा, भारत का जनतंत्र।।


करनी  कड़वी  माहुरी,कथनी जैसे    खाँड़।

नौटंकी   में  गा   रहा,  जैसे कोई    भाँड़।।


देख - देख  नित ज्ञान का,मोबाइल भंडार।

बिना  किए ही   हो रहा,अपना बेड़ा   पार।।


मंचों  पर  देखो  खड़ी, दो- दो सौ की भीड़।

पर्वत की  वनभूमि पर, खड़े हुए ज्यों चीड़।।


मास्क   लगाने  के  लिए,देते पर  उपदेश।

स्वयं  खड़े नंगे  बदन,धर ज्ञानी  का  वेश।।


जारक की चोरी करें,निज रक्षा का स्वार्थ।

नाम  छपा  अख़बार में,करते वे   परमार्थ।।


माहुरी =विषैली।

जारक= ऑक्सिजन।



🪴 शुभमस्तु !


०२.०५.२०२१◆३.३०पतनम मार्तण्डस्य।


शनिवार, 1 मई 2021

सरसों फूले खेत में 🌻 [ दोहा - ग़ज़ल]

 

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✍️ शब्दकार©

🌻 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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असमय पीला  क्यों  पड़ा, मानव तेरा पात।

चिंतन का यह बिंदु है,देता अघ    आघात।।


बुरे  समय   में मौन ही,उत्तम एक    उपाय, 

सोच समझकर बोलना, बस आशा की बात।


उपवन  उजड़ा  देखकर, कलियाँ  हैं बेचैन,

दिन  में  भी  छाई  घनी, कैसी काली   रात!


किसको  हम  आरोप  दें, कौन नहाया  दूध,

भाँग कूप में जब पड़ी,क्या शह है क्या मात!


गेहूँ  के  सँग घुन पिसें, जग जानी ये रीति,

धुआँ उड़े सबको लगे,फैली जगत बिसात।


सोच न दूषित कीजिए,मन में हो शुभ भाव,

भाषा सदा सकार की,रखना सत अवदात।


'शुभम'सभी निरोग हों,सबका हो   कल्याण,

सरसों  फूले  खेत में,विकसे मानव    जात।


🪴 शुभमस्तु !


०१.०५.२०२१◆६.००पतनम  मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🌳


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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दर्द का दायरा  तेज बढ़ता गया।

गैर पर दोष  इन्सान मढ़ता गया।।


अपना  भी    गिरेबाँ  जरा झाँकिए,

और के शीश पर यार  चढ़ता गया।


आपदा को कमाई का जरिया बना,

दूसरों  के  लिए  मंत्र   पढ़ता गया।


पाप  की खाद से रोग फूला फला,

 रँग  महल पाप के ही  गढ़ता गया।


जैसा बोया  'शुभम' कटना है वही,

छ्द्म  द्वारों  से  मनुज  कढ़ता गया।


🪴 शुभमस्तु !


०१.०५.२०२१◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

घट-घट वासी राम 🫐 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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घट-घट जिसका वास है,उसका घट इंसान।

घट टूटा माटी बना,बिखर गए सब   धान।।


हर घट माटी से बना,प्रभु के यहाँ  न  भेद।

माटी में घट जा मिले, हो जाता जब छेद।।


घट आया  प्रभु  धाम से,बना गलीचा  टाट।

कर्त्ता को भूला हुआ,जा पहुँचा जब घाट।।


माटी में  जब  प्राण का,हुआ पूर्ण  संचार।

माटी  इतराने  लगी,सोचे बिना   विचार।।


माटी  से  गागर  बनी,करती शीतल  नीर।

छोटी  गागर  देखकर,  वह निर्मम  बेपीर।।


रेशा-रेशा  जोड़कर,रज्जु बनी नव    एक।

ताकत बढ़ती जानकर, ऐंठन भरी अनेक।।


ऊपर  बैठा  देखता,   रचना निज  घटकार।

घट  इतराता  ऐंठता,  देता चुपचुप  मार।।


भूल  गया घट घाट ही,उसकी मंजिल एक।

घटिया सबको जानता, खोकर मूढ़ विवेक।। 


घट का उद्भव भूमि पर,घटना एक महान।

पर घट भूला आप में,पहुँचा घाट मसान।।


घट - घट  वासी  एक है, कहलाता  है   राम।

आता  घट संसार में,दिखता उसको   काम।।


घट से मरघट का सफ़र,नहीं जानता जीव।

चिड़ियाँ खेती चुग गईं,क्यों रटता अब पीव!!


🪴 शुभमस्तु !


३०.०४.२०२१◆३.४५पतनम मार्तण्डस्य।

मैं लाल गगरिया पानी की 🏮 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🍎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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मैं  लाल  गगरिया  पानी  की।

माटी  से   बनी  कहानी भी।।


जिस कुम्भकार  ने मुझे गढ़ा।

नव स्वेद कणों का पाठ पढ़ा।

समझा क्या  कोई  मानी भी?

मैं लाल  गगरिया  पानी की।।


खोदी   भू  से  कूटी   माटी।

था खेत  सरोवर  की  घाटी।

गाढ़ा, माढ़ा  औ' छानी  भी।

मैं लाल गगरिया  पानी की।।


वह चाक चलाया तेज -तेज।

मैं गई   सहेजी   धूप   भेज।।

मैं तपी  अवा  मस्तानी - सी।

मैं लाल गगरिया  पानी की।।


मैं  बीच   आग   से आई   हूँ।

तपकर  ही  लाल   बनाई  हूँ।

प्रिय  हूँ  मैं नाना - नानी की।

मैं  लाल गगरिया  पानी की।।


जब तक  शीतल जल देती हूँ।

सम्मान  'शुभम'  का  लेती हूँ।

खोकर गुण हुई  बिरानी - सी।

मैं लाल गगरिया  पानी  की।।


🪴 शुभमस्तु !


३०.०४.२०२१◆२.४५पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...