गुरुवार, 24 सितंबर 2026

हम क्या करें [गीतिका]

 299/2026


         


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी   मिलता   नहीं,  हम  क्या   करें।

ढूँढ़  मारा   सब    कहीं, हम   क्या   करें।।


आगे    पीछे    आदमी      ही    आदमी,

दूरियाँ  फिर   भी  रहीं, हम   क्या   करें।


अक्ल  का   पुतला   सभी    कहते  उसे,

खून  की   नदियां   बहीं ,हम  क्या  करें।


अपने   पड़ौसी   को    नहीं   पहचानता,

फिर भी कहें उसको जहीं, हम  क्या करें।


गाँव      जंगल    नगर   में    है   छा   गया,

ख्वाव में   भी   है   यहीं,   हम    क्या  करें।


लोक    में    परलोक    में   उसकी    रज़ा,

अनगिनत   उसकी   महीं,   हम  क्या करें।


खोज    करता    है  'शुभम्'     इंसां   मिले,

होती    नहीं   पर   मनचहीं, हम   क्या करें।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆6.00 आ०मा०

                 ◆●◆

टन-टन टनाटन [ गीतिका]

 298/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जेब   हो  अपनी  गरम, टन-टन टनाटन।

आदमी  है    बे शरम,   टन-टन टनाटन।।


देश जाए  भाड़ में, मुझको   पड़ी   क्या ,

कर्म   ही   मेरा  धरम,   टन-टन  टनाटन।


असलियत का  भेद,यों  खुलता नहीं है,

जिंदा रहे जन का भरम, टन-टन टनाटन।


छातियों में  अब नहीं, धड़का करें   दिल,

पत्थरों   के हैं   मरम,   टन-टन टनाटन।


अब नहीं  अच्छा- बुरा, कुछ भी यहाँ पर,

कर रहा  है सब  करम, टन-टन टनाटन।


वासना  की     भूख    ने,   ऐसा सताया,

सचल है  उनका   हरम,  टन-टन टनाटन।


दूध   के    सम्बंध   भी,  बदबू   भरे   हैं,

चाहिए नर  को चरम,   टन-टन  टनाटन।


शुभमस्तु,


23.09.2026◆10.45 आ०मा०

                     ◆●◆

बज रहा थोथा चना [ गीतिका ]

 297/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बज   रहा   थोथा  चना, क्या  कीजिए।

कर   रहा   है रव  घना,  क्या  कीजिए।।


प्यार  का  नाटक,   निरंतर  छल    रहा,

घर   हुआ   है   अनमना, क्या कीजिए।


आस्तीनों      में    सपोले ,    डंस    रहे,

खून   पीते   अनछना,   क्या   कीजिए।


मंदिरों    में      रूप   बदले,   चोर   हैं,

भक्त   को  है   झुनझुना, क्या कीजिए।


आदमी     अज्ञान     में,  मदमस्त     है,

अज्ञता  ने   ही     जना,  क्या कीजिए।


चूसते    नेता     सभी,  जनता     यहाँ,

छद्म   का   तंबू    तना,   क्या  कीजिए।


कज्जली    है   कोठरी,  बचना 'शुभम्' ,

करना   नहीं    रे   बचपना, क्या कीजिए।


शुभमस्तु,


23.09.2026◆10.00आ०मा०

                ◆●◆

मिट्टी का ये तन-मन सारा [ गीत ]

 296/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिट्टी का ये

तन-मन सारा

मिट्टी का ही गेह बनाए।


अबाबील 

धनचिड़ी पखेरू

तिनके और मृत्तिका लेकर

रखती संतति

वहाँ सुरक्षित

है निश्चिंत अंड निज सेकर

लार और

जलकण पंखों से

निज सपनों से  नेह सजाए।


पाँच तत्त्व की

काया तेरी

पाँच तत्त्व का नीड़ निराला

पाँच तत्त्व में

मिल जाना है

रहे न जीवन गीत उजाला

रहे धूप

वर्षा से  निश्चित

जो देखे  संदेह उगाए।


जब तक जीना

तब तक सीना

खेल यही चलते रहना है

तन का नहीं

भरोसा क्षण भर

इस लोंदे का क्या कहना है

खेह विनिर्मित

खेह नीड़ तज

पुनः देह जा खेह समाए।


शुभमस्तु,


22.09.2026◆3.30 आ०मा०

                      ◆●◆

मानवता [ चौपाई ]

 295/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव     देह    धरे    जो  आया।

जीव  वही   मानव    कहलाया।।

मानवता    का    धर्म   यही    है।

तन   अनुरूपी   कर्म   सही  है।।


सेवा     धर्म     निभाता    कोई।

मानवता   पटु वह    नर    होई।।

ममता  दया  प्रेम   करुणा   का।

बहता  है नद नित  वरुणा  का।।


मानवता   नर    जो    खो  देता।

दनुज वृत्ति   उर   में  भर  लेता।।

मानव  तन     में    दानव   होते।

ममता   प्रेम    मृदुलता    खोते।।


क्रूर  कंस     रावण    अतिचारी।

निज कर्मों   से   करते   ख्वारी।।

सत्य  आचरण   जो   झुठलाया।

मानवता  को     दूर     भगाया।।


दुर्व्यसनों    में     रत   हो  जाता।

तज मानवता  सत  को   खाता।।

अहंकार   हर    तप   का  नाशी।

हरिद्वार   क्या     गंगा    काशी।।


बड़े-बड़े       तपसी     सन्यासी।

त्याग   तपस्या    हुए    उदासी।।

तज मानवता  बन   व्यभिचारी।

हुए धरा   पर    सिल   से भारी।।


'शुभम्'  नहीं   तजनी  मानवता।

यद्यपि हो  कितनी   भी लघुता।।

दानव   अंत   बुरा    ही    होता।

शकटासुर - सा   मिटता   रोता।।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆12.00मध्याह्न

                 ◆●◆

त्योहारों का देश ये [ दोहा गीतिका ]

 294/2026

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


त्योहारों   का   देश   है,   भारतवर्ष महान।

दीवाली  होली  सदा,  विजयादशमी शान।।


गुजराती   बँगला    कई, भाषाओं की धूम,

सर्वश्रेष्ठ  हिंदी  सदा, करता  जग गुणगान।


राम  कृष्ण  प्रकटे  यहाँ,यही  बुद्ध का देश,

तुलसी  सूर  कबीर  के,अमर  नाम का मान।


सरस्वती   गंगा    यहीं,  सरयू  यमुना   धार,

पावन   करतीं   हैं धरा,भारत  की पहचान।


हिंदू सिख मुस्लिम सभी,रहते मिलकर एक,

भारत  के  रणबाँकुरे,सुगठित सुखद वितान।


धर्म   सनातन   देश में,  सरसाए नित भव्य,

कर्ण वीर   रणधीर   का, सदा अमर है दान।


'शुभम्' बड़ा  सौभाग्य  है, जन्मा मैं इस देश,

कागज पर मसि लेखनी,चलती नित्य विहान।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆7.30 आ०मा०

                      ◆●◆

सर्वश्रेष्ठ हिंदी सदा [ सजल ]

 293/2026

 

समांत          : आन

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


त्योहारों   का   देश   है,   भारतवर्ष महान।

दीवाली  होली  सदा,  विजयादशमी शान।।


गुजराती बँगला    कई, भाषाओं की धूम।

सर्वश्रेष्ठ  हिंदी  सदा, करता  जग गुणगान।।


राम  कृष्ण  प्रकटे  यहाँ,यही  बुद्ध का देश।

तुलसी  सूर  कबीर  के,अमर  नाम का मान।।


सरस्वती   गंगा    यहीं,  सरयू  यमुना   धार।

पावन   करतीं   हैं धरा,भारत  की पहचान।।


हिंदू सिख मुस्लिम सभी,रहते मिलकर एक।

भारत  के  रणबाँकुरे,सुगठित सुखद वितान।।


धर्म   सनातन   देश में,  सरसाए नित भव्य।

कर्ण वीर   रणधीर   का, सदा अमर है दान।।


'शुभम्' बड़ा  सौभाग्य  है, जन्मा मैं इस देश।

कागज पर मसि लेखनी,चलती नित्य विहान।।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆7.30 आ०मा०

                      ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...