सोमवार, 28 सितंबर 2026

ऐसा नहीं है [ गीतिका ]

 315/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तेल    में   ही  आग हो,  ऐसा  नहीं  है।

नाग में   ही नाग   हो,  ऐसा   नहीं    है।।


आदमी    में   आदमी  को, खोजता   हूँ,

फाग   में   ही फाग हो, ऐसा   नहीं   है।


भक्त   है  वह  देश  का, कहता  जुबाँ   से,

उर में बसा अनुराग  हो,   ऐसा  नहीं  है।


खाक   से उठकर  बना   है ,लाख का जो,

बाकी न   कोई दाग हो,   ऐसा   नहीं   है।


चाल   हंसों  की    सदा से, चल   रहा  है,

बैठा न   दिल में  काग हो, ऐसा   नहीं है।


त्याग   दी   सहधर्मिणी,  तो   बात  क्या है,

तन में   नहीं बैराज   हो,  ऐसा   नहीं  है।


वेश  में   ही    गीध   चीलें,   चिलचिलाएँ,

सिर पर न   कोई बाज   हो, ऐसा नहीं है।


शुभमस्तु,


28.09.2026◆4.00 प०मा०

                  ◆●◆

कोई मुर्गा फँस जाए! [ गीतिका ]

 314/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऊपर  की  इनकम आए,कोई मुर्गा फँस जाए।

जब ड्यूटी पर हम जाएं,कोई मुर्गा फँस जाए।।


सड़क हमारे बप्पा  की, जाएगा  क्यों कोई यों,

डंडे से वह  थम  जाए,  कोई   मुर्गा फँस जाए।


नज़र    हमारी   तेज बड़ी, कैसे  कोई बचना   है,

कभी अधिक धन कम लाए,कोई मुर्गा फँस जाए।


साँप बनाना  रस्सी का, रोज हमारा  काम यही,

कदम ताल छम- छम गाए,कोई मुर्गा फँस जाए।


यार   बुरे   हम   दुश्मन   भी,  दूर-दूर ही रहना बे!

ज़रा न  जोखम ले  पाए,  कोई  मुर्गा फँस   जाए।


ऐब   न  कोई शेष यहाँ,सदाचरण की बात न कर,

ढोल बजा ढमढम  गाए, कोई  मुर्गा फँस  जाए।


'शुभम्' उठा  हम लाशों को, टुकड़े-टुकड़े भरते हैं,

शेष   रहम   क्यों  रह जाए, कोई मुर्गा फँस जाए।


शुभमस्तु,


28.09.2026 ◆3.00 प०मा०

                    ◆●◆

ये ख़्वाब मेरा [ गीतिका ]

 313/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देश   की  सेवा  करूँ, ये  ख्वाव   मेरा।

मुफ़्त की   मेवा चरूँ,ये   ख्वाव    मेरा।।


वेश  की  पूजा  यहाँ   होती   बड़ी   ही,

नाव  को  खेवा  करूँ, ये  ख्वाव    मेरा।


धर्म की चादर तले   कुछ   भी करूँ  मैं ,

मालिका  फेरा  करूँ,  ये   ख्वाव   मेरा।


जाकर सियासत की सड़क चौड़ी अनोखी,

नाम   निज  पैदा  करूँ, ये  ख्वाव  मेरा।


नारी   बिना होती  सफलता  भी न कोई,

सहभतृका   बेवा  करूँ, ये  ख्वाव   मेरा।


बगुला  भगत की भक्ति  का  डंका बजाऊँ,

रस   भरी    शेवा   करूँ, ये  ख्वाव   मेरा।


ऐ  'शुभम्'  कुछ  और  ही  है  सोच अपनी,

वचन का   केवा   करूँ,  ये    ख्वाव  मेरा।


शुभमस्तु,

28.09.2026◆9.30आ०मा०

                ◆●◆

खोल भुजाएँ मिले गले [ गीतिका ]

 312/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोल       भुजाएँ     मिले   गले।

सत्य   यही   जब   उर   पिघले।।


दुनिया  में   छल - छद्म     बढ़ा,

उल्लू     सीधा   किया      चले।


नहीं     समझना     अपना-सा,

सभी   नहीं    नर-नारि     भले।


नजदीकी      में        देवी      वे,

गए    दूर     तो     बड़े     खले।


सोच-समझकर     करनी   कर,

मनुज    अन्यथा   हाथ     मले।


सड़क  नहीं      सीधी    दुनिया,

पता   नहीं   कब   कौन    छले।


'शुभम्'  दूध     से   जल    जाए,

रखे    फूँक   निज   पाँव - तले।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆10.30 प०मा०

                 ◆●◆

सत्य यही जब [ सजल ]

 311/2026


    

समांत          : अले

पदांत            : अपदांत

मात्राभार       :  14.

मात्रा पतन     :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोल       भुजाएँ     मिले   गले।

सत्य   यही   जब   उर   पिघले।।


दुनिया  में   छल - छद्म     बढ़ा।

उल्लू     सीधा   किया      चले।।


नहीं     समझना     अपना-सा।

सभी   नहीं    नर-नारि     भले।।


नजदीकी      में        देवी      वे।

गए    दूर     तो     बड़े     खले।।


सोच-समझकर     करनी   कर।

मनुज    अन्यथा   हाथ     मले।।


सड़क  नहीं      सीधी    दुनिया।

पता   नहीं   कब   कौन    छले।।


'शुभम्'  दूध     से   जल    जाए।

रखे    फूँक   निज   पाँव - तले।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆10.30 प०मा०

                 ◆●◆

श्रद्धा [ चौपाई ]

 310/ 2026


          


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्रद्धा  भाव    हृदय  में   आए।

मात-पिता  गुरुजन को   ध्याए।।

अपने  पितरों  को  जो   ध्याता।

सुख-संपति    आजीवन  पाता।।


आदर  भक्ति   अटल   विश्वासी।

श्रद्धा रहे नित्य   प्रति   खासी।।

भक्त चरण    में    बन  अनुरागी।

सत कर्मों का नित  बड़   भागी।।


श्राद्ध पक्ष   श्रद्धा  का  आया।

क्वार मास प्रभु  ने   महकाया।।

पितरों   को   तर्पण   है   करना।

दुग्ध सलिल तिल उन्हें  अर्पना।।


जीवित  मात-पिता   की   सेवा।

श्रद्धा  से   भर      पाएँ   मेवा।।

जीव-जंतु     से     नेह    बढ़ाएं।

आन-मान   सब   बढ़कर   पाएँ।।


श्रद्धा   भाव      घटाए      दूरी।

उर-इच्छाएं         होतीं      पूरी।।

श्रद्धा का    प्रसाद    है  मिलता।

यश का सुमन बाग  में खिलता।।


श्रद्धा  की    सुगंध   जो   बाँटे।

मिलें न उसको  पथ   में   काँटे।।

श्रद्धा से   नतमस्तक    होता।

खुले कृपा का    झरना   सोता।।


आओ    'शुभम्'   बढ़ाएं  श्रद्धा।

नहीं  बड़ों   के    बनें    विरुद्धा।।

श्रद्धावान    जगत      में   जीता।

लिखे    सत्य   कर्मों  की   गीता।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆9.45प०मा०


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रविवार, 27 सितंबर 2026

मालूम है ये [ गीतिका ]

 309/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोजने में  वे लगे हैं छेद,  मालूम   है ये।

जानना इस राज का भी भेद,मालूम है ये।।


ख़ुद गिरें   वे   कूप    में,   या    आग  में,

दिल में  न उनके क्लेद,  मालूम    है  ये।


चैन    से   रहना    नहीं,    भाता    उन्हें,

खून में खड़िया घुली सफेद, मालूम है ये।


प्रेम  का   दुर्भिक्ष    ही,  लिखवा   लिया,

आठों    फहर     निर्वेद,   मालूम  है   ये।


क्या    कहा   कैसे  कहा , अज्ञात   सब,

सिर में   भरा    बस  मेद, मालूम  है   ये।


जो बना    जिसके   लिए,  करता   वही,

उनको नहीं कुछ  खेद, मालूम   है    ये।


नाव    डूबे      देश     की   चाहे  'शुभम्',

उनसे  नहीं      उम्मेद,   मालूम   है   ये।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆4.15 प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...