सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

मनुज योनि इस सृष्टि में [ दोहा गीतिका]

 357/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मनुज  योनि इस  सृष्टि में, सर्वश्रेष्ठ उपहार।

कर्मों से हर  जीव के,खुलें  जन्म   के द्वार।।


जैसे  जिसके  कर्म  हैं, वैसी  मिलती देह,

कॉकरोच  कोई  बना, राजनीति  की रार।


चील  नोंचती  माँस को,बिल में रहते सर्प ,

कोयल  कूके  बाग में,अति विचित्र संसार।


आया था  हरि भजन को,औटे  किंतु कपास,

योनि न  सुधरी देह की,उर में विषय विकार।


डाल-डाल  उछला करें, वानर बगिया बीच,

भरें उदर आहार को,छीन  मनुज घर चार।


नेताजी   की   देह  में, बसते  दनुज पिशाच,

छीन-झपट अर्जित करें,कंचन  कपटी यार।


'शुभम्'  विलक्षण सृजन का,है विराट अस्तित्व,

टपकाता   क्यों   आदमी, परनारी   पर लार।


शुभमस्तु,


19.10.2026◆12.15 आ०मा० (रात्रि)

                ◆●◆

सर्वश्रेष्ठ उपहार [सजल]

 356/2026


         


समांत          : आर

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       : 24.

मात्रा पतन     : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मनुज  योनि इस  सृष्टि में, सर्वश्रेष्ठ उपहार।

कर्मों से हर  जीव के,खुलें  जन्म   के द्वार।।


जैसे  जिसके  कर्म  हैं, वैसी  मिलती देह।

कॉकरोच  कोई  बना, राजनीति  की रार।।


चील  नोंचती  माँस को,बिल  में रहते सर्प,

कोयल  कूके  बाग में,अति विचित्र संसार।।


आया था  हरि भजन को,औटे  किंतु कपास।

योनि न  सुधरी देह की,उर में विषय विकार।।


डाल-डाल  उछला करें, वानर बगिया बीच।

भरें उदर आहार को,छीन  मनुज घर चार।।


नेताजी   की   देह  में, बसते  दनुज पिशाच।

छीन-झपट अर्जित करें,कंचन  कपटी यार।।


'शुभम्'  विलक्षण सृजन का,है विराट अस्तित्व।

टपकाता   क्यों   आदमी, परनारी   पर लार।।


शुभमस्तु,


19.10.2026◆12.15 आ०मा० (रात्रि)

                ◆●◆

पूजा [ चौपाई ]

 355/2026


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मात-पिता     हैं     देव     हमारे।

जीवनदाता      मात्र       सहारे।।

करें  सदा   इनकी    जो  पूजा।  

 सेवा  सम   है   कर्म   न   दूजा।।


जननी  पहली    गुरुवर    होती।

जनती संतति  का   वह   मोती।।

संतति कर पूजा  जननी  की।

इच्छित पद   पाती   करनी की।।


मातु   शारदा    दुर्गा    माँ     ही।

वही    रमा    ब्रह्मा    कहलाही।।

करते हैं  जो   पूजा  माँ   की।

मिले स्वर्ग की   भू   पर  झाँकी।।


ब्रह्मा विष्णु कृष्ण   शिव   शंकर।

जनक  हमारे    दानी    अवढर।।

करे  पिता    की  पूजा   कोई।

इनके सम  तीरथ   नहिं    होई।।


जिन गुरुओं   ने   ज्ञान   दिया है।

स्वार्थ बिना   सत्कर्म   किया है।।

गुरु  पूजा जो   नर  कर लेता।

ज्ञान ज्योति उर    में   भर देता।।


सूरज    चाँद        देवता     मेरे।

देते     मिटा      सभी     अंधेरे।।

करे  नित्य   इनकी  जो पूजा।

काज   बड़ा   क्या   कोई दूजा!!


देवी-देव    सभी      की    सेवा।

इनकी  पूजा सरिस  न मेवा।।

जो  जन    दीनबंधु     हितकारी।

शांति सुयश की खिलती क्यारी।।


'शुभम्' चलें पूजा  कर आएँ ।

मात-पिता   पद   शीश झुकाएँ।।

निज गुरुवर के   पद   मत भूलें।

शिखर प्रगति   के   पाएँ   छूलें।।


शुभमस्तु,


18.10.2026◆8.45 प०मा०

                    ◆●◆

ज्ञान बिना जीवन नहीं [ दोहा ]

 354/2026



[ज्ञान,बोध,विद्या,चेतना,अनुभूति]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक


ज्ञान बिना जीवन नहीं,अर्थहीन   नर योनि।

जीव-जंतु तरु-बेल की,पृथक महत्ता छोनि।।

पंडित   बाँटें   ज्ञान  को, करें  नहीं व्यवहार।

भीड़  सीख   कब  मानती,दूषित   हैं आचार।।


आत्म बोध जिसको  हुआ,उसे मिला प्रभु नेह।

स्वयंसिद्ध   गुरु  है वही,सफल मनुज की देह।।

बचपन   में   निज  बोध से,सँवर गए आचार।

उच्छ्रंखलता  मिट  गई, उदित   नवल आकार।।


नर विद्या से हीन जो,सुललित कला विहीन।

बिना बोध साहित्य के,अधम जंतु जड़ दीन।।

बिना ज्ञान गुरु भी नहीं, मनुज न विद्या हीन।

घूम रहा है  ढोर-सा,मति  अति  रहे मलीन।।


जब तक  तन में  चेतना, तब तक है अस्तित्व।

रहे   अन्यथा  देह  का, जड़  जगती  में तत्त्व।।

शक्ति चेतना   चहुँमुखी, जीवन  का  आधार।

कभी न उसका ह्रास   हो,मिले जीव का प्यार।।


ईश्वर  की अनुभूति का,हो न मनुज  को  ज्ञान।

नहीं    आत्मा   मानती, तब तक सुफलाधान।।

'शुभम्' काव्य- अनुभूति से,सदा रहे शुचि लीन।

जन-जन के   कल्याण   में,रत  हो नित्य प्रवीन।।


                एक में सब

ज्ञान     बोध नव  चेतना, विद्या का    संचार।

सदा     ईश अनुभूति का,  उर  में हो आधार।।


शुभमस्तु,


18.10.2026◆3.45 प०मा०

                    ◆●◆

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

पराकाष्ठा [ अतुकांतिका ]

 353/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पीने को मिले 

या नहीं मिले

फैल ही जाए

यदि दूध की मटकी

बिल्ली खुश रहेगी।


अभी तो दूध  फैलाने की

जुगत में लगी है बिल्ली,

एक दिन वह भी आना है

कि खंभा नोचेंगी बिल्ली।


किसी तिलचट्टे को

देश से क्या लेना-देना,

उसका तो लक्ष्य है

सत्तासन को 

उधेड़ देना उखाड़ देना।


उनके जाने ये देश 

भाड़ में जाय

या देश ही भाड़ बन जाए,

उन्हें तो करनी ही है

काँय !  काँय!!  काँय!!!

हाय!   हाय !!   हाय !!!


कभी मच्छर मक्खियों 

कॉकरोचों ने 

झंडे गाड़े हैं? 

विदेशी हवा से फूले हुए

गुब्बारे हैं,

हवा निकली 

कि फुस्स !!

जाएँगे नालियों में घुस।


तिलचट्टों-तिलचट्टियों का

'समुचित इलाज'  भी

जरूरी है,

देख रहे हैं कैरोसिन की धार

वरना कोई नहीं मजबूरी है।


इनका कर्म नहीं

इनके 'कांड' 

इन्हें छुट्टा साँड़ 

नहीं रहने देंगे,

कानून के हाथ लंबे हैं,

जनता को देश को

और अधिक नहीं

सहने देंगे।


शुभमस्तु,


15.10.2026◆9.30 प०मा०

                    ◆●◆

अभिलाषा [ कुंडलिया ]

 352/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

मेरी   अभिलाषा    यही,  रहूँ    शब्द  में  लीन।

श्रेष्ठ काव्य लेखन करूँ,क्रीडित  ज्यों जल  मीन।।

क्रीडित   ज्यों जल मीन, छंद  लय का हो  साँचा।

करे न जन हित क्षीण,काव्य - फल  रहे न  काँचा।।

'शुभम्'    जदपि    हो   रात, अँधेरी   बड़ी  घनेरी।

रहूँ   अहर्निश   व्यस्त, लेखनी     रुके    न   मेरी।।


                         -2-

जीवन  प्रभु  की  देन है, विगत जन्म का खेल।

कर्मों   के   परिणाम   से, चले  योनि की  रेल।।

चले    योनि  की   रेल,  उतरना- चढ़ना  जारी।

अभिलाषा हो   एक, धर्म  पर  चले न   आरी।।

'शुभम्'  रमे  प्रभु भक्ति,नहीं उखड़े सत -सीवन।

रहें     धर्म   आरूढ़,सुगति   से   बीते  जीवन।।


                         -3-

अभिलाषा करते सभी, अर्जित हो धन खूब।

माटी से  कंचन   बने,  जमे   शिला   पर दूब।।

जमे   शिला  पर  दूब,आम उस पर आ लटकें।

रहे न कण भर  ऊब, कभी  सत पथ से भटकें।।

'शुभम्'  चलें  पथ  नेक,सभ्य हो अपनी भाषा।

जाग्रत     रहे  विवेक,   हमारी   है अभिलाषा।।


                          -4-

उनकी अभिलाषा   यही, करना रेल डिरेल।

तिलचट्टे    शासन  करें,  रहे  व्यवस्था फेल।।

रहे   व्यवस्था   फेल, नाच    हो   नंगम  नंगा।

जन -जन   हो    हैरान,  कराएँ   भीषण दंगा।।

'शुभम्'  बुद्धि  से हीन,सभी तिलचट्टे सनकी।

जले आग  में   देश, यही   अभिलाषा उनकी।।


                         -5-

जिनके   हाथों    में  नहीं,   सत्तासन  की डोर।

अभिलाषा उनकी   यही, उठती    रहें हिलोर।।

उठती    रहें   हिलोर, चैन  शासन    का खोए।

जन - जन की हो हानि, सजल हो नैन  भिगोए।।

'शुभम्'   सोच   यह   बात, हमारा माथा ठनके।

सत्ता से जो   हीन, नहीं  कुछ    कर   में जिनके।।


शुभमस्तु,


15.10.2026◆ 8.15 प०मा०

                   ◆●◆

कॉकरोच भुनगे मच्छर [ गीत ]

: 351/2026


     

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देश चलाएँगे 

अब मक्खी

कॉकरोच भुनगे मच्छर!


जन मानस को

नियम सिखाते

जिनका कोई धर्म नहीं

लोकतंत्र को

तोड़ रहे हैं

नहीं देह पर चर्म  कहीं

चींटा कहे

उठाए गिरिवर

लेता है अपनी टक्कर।


अनुभव शून्य

कॉकरोचों का

जमघट  नंगा नाच करे

हाथ पाँव के

बिना  फ़िसलते

बिना आँख के वाच करे

पछुआ हवा 

भरी  पीछे से

चाहत बस मीठी शक्कर।


टूटे देश

भाड़ में जाए

उन्हें चाटने का चसका

उल्लू सीधा

करके अपना

देखो कहाँ गया खिसका

पता नहीं क्यों 

पों- पों करते

छात्र भले पर पूर्ण निरक्षर।


शुभमस्तु,


15.10.2026◆12.15 प० मा०

                    ◆●◆

[8:24 pm, 15/10/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 352/2026ववाद

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...