बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

माँ दुर्गा का साज सजाऊँ [ गीत ]

 350/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


माँ दुर्गा का

साज सजाऊँ 

आया मास क्वार।


नवराते में

धूप दीप ले

करूँ अर्चना माँ की

चुनरी लाल

ओढाऊँ माँ को

रहे दिव्य नित झाँकी

शंख और 

घड़ियाल बजाकर

झंकृत हो दरबार।


दुर्गासप्तशती के

अनगिन 

मंत्रों से अभिषेक करूँ

स्तोत्र कुंजिका

पाठ करूँ नित

भूत प्रेत से

नहीं डरूँ 

शुम्भ निशुम्भ 

असुर माँ मारें

कभी न हो माँ हार।


घृत का दीप 

जला मंदिर में

हवन और पूजन करना

सात्विक भाव भरे

निज उर में

शंखनाद कूजन भरना

और अंत में

करूँ आरती

माँगूँ कृपा अपार।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆10.45 प०मा०

शक्ति [ चौपाई ]

 349/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शक्ति       स्वरूपा        दुर्गा     माता।

'शुभम्' चरण में       निशिदिन   ध्याता।।

ब्रह्मचारिणी            शैल            सुपूती।

दैन्य   दुःख     दव    करतल         छूती।


नारी    शक्ति      रूप      जो     होती।

पावन    शुचिता      नर       में     खोती??

नारी   -   शक्ति          सहारा     चाहे।

बदले       राह       सड़क         चौराहे।।


शक्ति       बिना      अस्तित्व  नहीं     है।

हर    कागज   क्या   नोट    कहीं     है??

शक्ति   अलग      से      डाली       जाती।

बढ़ता       मोल         अमोल     कहाती।।


अश्वशक्ति       मानक       से       मापें।

दुर्बल    खड़े   शक्ति      से      काँपें।।

ट्रेनें     बस       ट्रक      मोटर      लारी।

बिना  शक्ति   इन   सबकी    ख्वारी।।


शक्ति हीन    की    पूछ    न     कोई।

शक्ति       बिना         मर्यादा     खोई।।

धन   विद्या    की    शक्ति    अनोखी।

जहाँ     मिले     कीमत  हो       चोखी।।


शक्ति      बाण       से    असुर   सँहारे।

लगे    राम      की       जय     के  नारे।।

जहाँ     शक्ति     है     जीत     वहीं  है।

सत्य     धर्म      की     कमी      नहीं    है।।


'शुभम्'     शक्ति   मत    जाया    करना।

असुर   वृत्ति   से     कभी    न    डरना।।

सदा      सत्य       का    साथ  निभाना।

धन    बल   विद्या    सब     अपनाना।।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆ 10.30 आ०मा०

                ◆●◆

विरल वर्ण्य महनीय सदा [ गीतिका ]

 348/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



विरल  वर्ण्य    महनीय   सदा   है देने वाला।

याचक   छोटा   क्षुद्र  क्षम्य    है    लेने वाला।।


दिनकर  देता दिव्य ज्योति जगती को जी भर,

भरी   नदी   में      त्राता    नैया    खेने वाला।


मोल  नहीं   कम   उस  जननी का जो जनती है,

पूजनीय    है    वंद्य    अंड    को    सेने वाला।


अगणित  हैं   मिष्ठान्न  धरा  पर  स्वाद  अनोखे,

अनुपम   कोमल  श्वेत  मधुरतम    छेने  वाला।


'शुभम्'    हवाई   द्वीप  लुप्तता  की कगार पर,

दुर्लभ     संज्ञा    का   मराल   मृदु नेने   वाला।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆6.30 आ०मा०

                   ◆●◆

याचक छोटा क्षुद्र क्षम्य है [ सजल ]

 347/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समांत          : एने

पदांत           : वाला

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :  शून्य।


विरल  वर्ण्य    महनीय   सदा   है देने वाला।

याचक   छोटा   क्षुद्र  क्षम्य    है    लेने वाला।।


दिनकर  देता दिव्य ज्योति जगती को जी भर।

भरी   नदी   में      त्राता    नैया    खेने वाला।।


मोल  नहीं   कम   उस  जननी का जो जनती है।

पूजनीय    है    वंद्य    अंड    को    सेने वाला।।


अगणित  हैं   मिष्ठान्न  धरा  पर  स्वाद  अनोखे।

अनुपम   कोमल  श्वेत  मधुरतम    छेने  वाला।।


'शुभम्'    हवाई   द्वीप  लुप्तता  की कगार पर।

दुर्लभ     संज्ञा    का   मराल   मृदु नेने   वाला।।


शुभमस्तु,


12.10.2026◆6.30 आ०मा०

                   ◆●◆

चली भेड़ कुर्सी हथियाने [ गीत]

 346/2026

         

   


   ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चली    भेड़      कुर्सी   हथियाने।

लोकतंत्र   को    लगा   ठिकाने।।


झुंड    भेड़    का   एक   बनाया।

लालच दे   उसको    भड़काया।।

ऊलजलूल        मारती      ताने।

चली  भेड़       कुर्सी    हथियाने।


बिना  टिकट  ट्रेनों    पर    छाए।

टिड्डी  के   दल    ज्यों   मंडराए।।

नंगम   नंग   नाच      गा     गाने।

चली  भेड़    कुर्सी     हथियाने।।


मतचोरी - आरोप         सरासर।

जनमत का   कर   रहे  निरादर।।

कोई      नहीं     सुबूत     बताने।

चली  भेड़      कुर्सी   हथियाने।।


चित  भी    मेरी     पट   भी मेरी।

कहता    नहीं    सुनूँगा      तेरी।।

भेड़      चुगेंगीं       मेरे      दाने।

चली  भेड़     कुर्सी    हथियाने।।


जैसे  भी     हो     सत्ता    पाना।

लक्ष्य    नाक   से   चने चबाना।।

आग     लगाकर   नाग   बसाने।

चली    भेड़    कुर्सी   हथियाने।।


शुभमस्तु,


11.10.2026◆1.15 प०मा०


                 ◆●◆

कॉकरोच बेचैन बड़े [ गीत ]

 345/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जुगत जा रहीं

खाली  सारी

कॉकरोच बेचैन  बड़े।


फेल हुआ

जंतर का मंतर

धरना भी नाकाम हुआ

एक नहीं

सुनता है उनकी

इधर आग तो उधर कुआ

तख्तापलट करें

 वे सोचें

सिद्ध हुए वे पोच बड़े।


बचकानी हरकत

वह करता

चढ़ती रैलिंग पर दीदी

तेल छिड़क

वे आग लगाते

टोपी लगा भखें ईदी

उछल कूद 

बंदर वाली है

मैंन और वूमैन बड़े।


खिसियानी बिल्ली

रिसियाई 

नाच मस्त हैं तिलचट्टे

कमर लचकती

तिलचट्टी की

पुलिस तोड़ देती गट्टे

दाल नहीं

गल पाई किंचित

कुर्सी के हैं फैन बड़े।


शुभमस्तु,


09.10.2026◆1.00 प०मा०

               ◆●◆

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

पितर हमारे [ अतुकांतिका ]

 344/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पितर हमारे

आए हैं

शुचि कृपा करेंगे,

दिखलाते निज रूप

स्वप्न में 

मौन धरें वे।


पितरों का आशीष 

फला है

हम जीवन जीते

वही खोलते भाग्य

घटों को

जो थे रीते।


करें दुग्ध तिल

गंगाजल से

पितरों का तर्पण

उनके ही हम रूप

नेह निज करते अर्पण।


शुभता का संदेश

पितर अपनापन देते

करें महक से तृप्ति

नहीं कुछ हमसे लेते।


'शुभम्' पिता माँ

बाबा दादी पितर हमारे

हम उनकी संतान

सदा वे  सहज सहारे।


शुभमस्तु,


08.10.2026 ◆ 5.00प०मा०

                   ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...