शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

निराशा [ कुंडलिया]

 291/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

आशा   के   ही   साथ में,सदा निराशा वास।

अपनी   टाँग   अड़ा   रही,संग ले रही श्वास।।

संग   ले   रही   श्वास,  एक  पल दूर न जाए।

खंडित कर विश्वास,  उसे   पथ   से भटकाए।।

रहना   'शुभम्'  सचेत,  नहीं हो  उलटा पाशा।

छोड़ निराशा बंधु, थाम   कर   उज्ज्वल आशा।।


                         -2-

झूले   में   नर   झूलता,  आश-निराशा  बीच।

दोलन   ही  होता    रहे,रही    निराशा सींच।।

रही  निराशा   सींच,डिगाती  प्रति पल रहती।

आशा   के कर  खींच,  बात  बेढब ही कहती।।

'शुभम्' न व्यक्ति प्रबुद्ध,कभी निज आशा भूले।

न   दे   निराशा   साथ, नहीं    भटके पथ झूले।।


                          -3-

आशा   को   मत   छोड़िए,चिंतन  रहे सकार।

नहीं निराशा   पास   में, पल  को फटके द्वार।।

पल को   फटके  द्वार, दिशा सुथरी मिल जाएँ।

भटकन   से    रह   दूर,  दिशाएँ   लोरी गाएँ।।

'शुभम्' न मन में देख, एक पल कभी दुराशा।

महक रहा ज्यों फूल, महकती हो वह आशा।।


                         -4-

चढ़ती   चींटी  शृंग   पर,  विजय पताका साथ।

न हो   निराशा   लेश भी,सदा  उच्च रख माथ।।

सदा   उच्च   रख   माथ,  निरंतर बढ़ती जाती।

करती   पंथ     प्रशस्त,    हंसिनी-सी   मुस्काती।।

'शुभम्'  न  कोई दोष, किसी के सिर पर मढ़ती।

तप   में     रहती   लीन,  शृंग के ऊपर  चढ़ती।।


                          -5-

कछुआ   सँग   खरगोश की,दौड़  न भूले लोग।

आशा   में  कछुआ  रहा,   न   था निराशा-रोग।।

न था   निराशा-रोग,शशक  तरुवर तल सोया।

हार    गया   वह   दौड़, अंत    में   भारी रोया।

'शुभम्' न   हुआ निराश,सदा आशा का सतुआ।

पिया करे   रस  घोल, चला ज्यों पथ में कछुआ।।

शुभमस्तु,


18.09.2026◆5.45 आ०मा०

                     ◆●◆

सीख' [ अतुकांतिका ]

 290/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कितनी ही 

दुर्विनीता माताओं ने

अपनी ही 

जायाओं के

अपनी 'सीख'  से

घर बर्बाद किए हैं,

दोष सासों पर

मढ़ा गया

और मूर्खा 

बेटियों ने

अपने ही हाथ

आग में 

झुलसा लिए हैं।


पति और सास से

भिड़वाया

मोबाइल पर

संदेश भिजवाया

कोई काम 

मत करना,

कुछ भी कहे

अगर सास- ननद

तो एक की

चालीस कहना,

पीछे मत रहना।


जलती हुई आग में

एक चिनगी ने

बड़ा काम किया,

पति-गृह को उजाड़ कर

सास-ननद को 

बदनाम किया,

जबकि चाबी 

कहीं और से ही

भरी गई,

नई बनी गृहस्थी

माँ के हाथों

उजाड़ी गई।


एक नहीं

हजारों निदर्शन 

विद्यमान हैं,

जहाँ माताएँ ही

बेटियों की दुश्मन हैं

कमान हैं,

पर मूर्खाओं को

कोई समझा भी 

तो नहीं सकता।


शुभमस्तु,


18.09.2026◆5.15आ०मा०

                   ◆●◆

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

पेट की ये आग [ गीत ]

 289/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पेट की ये आग

करा लेती है

करतब  कितने-कितने!


देखने वाले

अंगुलियाँ दबा लें 

दाँतों के तले

है नहीं 

कोई घर बार

सब छोड़ चले

बाँध कर नजरें

खड़े हैं

भीड़ में इतने-इतने।


जान की परवाह बिना

पटरे पर चलना

नर्तित होना

सहज नहीं है

ये काम

हँसना -रोना

सोच लेते हैं

ये दर्शकगण

उनके फ़ितने।


आदमी तो आदमी

कम नहीं है

औरत कोई

ज़िंदगी में

कर गुज़रने की

जगी हिम्मत खोई

देह के कमाल

दिखला के

रहते जितने।


शुभमस्तु,


15.09.2026◆3.450 प०मा०

                  ◆●◆

चलता पथ में सँभल-सँभल कर [ गीतिका ]

 288/2026





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलता पथ में सँभल-सँभल कर।

लगता  किंचित नहीं   उसे  डर।।


डूब  गया    है   घट    पानी   में,

क्षण भर  में   वह  जाता है भर।


मेला    लगा    भीड़    है   भारी,

सहस-सहस  मिलते  नारी-नर।


पावस  लगा     भेक   करते  हैं,

दिवस-रात   में   मीठी   टर-टर।


अमराई     में      तेज     हवाएँ,

करती  रहतीं  सर-सर   मर-मर।


रहता  दुखी     सदा   वह  प्राणी,

अन्य जीव   के   रहता     ऊपर।


'शुभम्'  देह    पर  चढ़ा  बुढ़ापा,

अंग-अंग   होता   नित   जर्जर।


शुभमस्तु,


14.09.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆●◆

डूब गया है घट पानी में [ सजल ]

 287/2026



समांत          : अर

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       : 16.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलता पथ में सँभल-सँभल कर।

लगता  किंचित नहीं   उसे  डर।।


डूब  गया    है   घट    पानी   में।

क्षण भर  में   वह  जाता है भर।।


मेला    लगा    भीड़    है   भारी।

सहस-सहस  मिलते  नारी-नर।।


पावस  लगा     भेक   करते  हैं।

दिवस-रात   में   मीठी   टर-टर।।


अमराई     में      तेज     हवाएँ।

करती  रहतीं  सर-सर   मर-मर।।


रहता  दुखी     सदा   वह  प्राणी।

अन्य जीव   के   रहता     ऊपर।।


'शुभम्'  देह    पर  चढ़ा  बुढ़ापा।

अंग-अंग   होता   नित   जर्जर।।


शुभमस्तु,


14.09.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆●◆

कपड़ा एक न पास में [ दोहा ]

 286/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप ' शुभम्'


जिस   पर   जो   होता नहीं, रहे उसी की माँग।

फटी  जींस   में   झाँकती,    रहतीं   दोनों टाँग।।

कपड़ा    एक   न   पास   में,मुझे   नहीं मालूम।

पहनूँ   क्या   तुम   ही  कहो,बनो न बालम सूम।।


भरी हुई  अलमारियाँ,  फिर भी वस्त्र-अभाव।

औरत  को  खलता रहे, डगमग घर की नाव।।

हर अवसर की साड़ियाँ, अलग रहें दस- बीस।

शादी  सोहर   की अलग, महँगी   और नफ़ीस।।


यदि   साड़ी   लाए  नहीं, रूठ गई घर- नार।

खटपाटी   लेकर   पड़ी, बदल गया आचार।।

नव-नव साड़ी में बसे, नित्य नारि की जान।

शांति ग्रहों की  चाहिए, लेना तिय पहचान ।।


सक्षम   भले न आदमी,फिर भी करे खरीद।

भरी   रहें घर  साड़ियाँ, जिद में खोए नींद।।

देख पड़ौसिन के यहाँ,  नवल साड़ियाँ चार।

घर आई बदला हुआ, प्रियतम से व्यवहार।।


एक   पेंट   टी-शर्ट में,   काट  रहा पति साल।

पर   पत्नी   की साड़ियाँ, बनतीं   नई मिसाल।।

हों हज़ार घर साड़ियाँ, फिर भी सदा अभाव।

ले   उधार  ऋण  में दबे,  पति  की डूबे नाव।।


घर-घर की यह बात है,सत्य 'शुभम्' की खोज।

उसे   न   पल   को चूकना,महके  सुमन सरोज।।


शुभमस्तु,


13.09.2026◆4.30 प०मा०

                ◆●◆

शनिवार, 12 सितंबर 2026

हिंदी गौरव [ गीत ]

 285/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हिंदी गौरव

सौरभ हिंदी

हिंदी है भारत की प्राण।


माँ के पहले बोल

इसी हिंदी से

जुबाँ बोल पाई

रोटी दूध

नीर की वाणी

हिंदी ने ही बुलवाई

हिंदी से ही जीवन मेरा

हिंदी है 

जीवन का त्राण।


सूर कबीर 

संत तुलसी ने 

हिंदी में वह नाम लिखा

अमर हो गई

मीराबाई

बार-बार हरि नाम सिखा

हिंदी के तरकस में

अनगिन 

घुसे हुए हैं सुमधुर बाण।


संस्कृत सुता

सलौनी हिंदी

इसका है अपना विज्ञान

भारत के

कण-कण में व्यापे

तना जीभ पर एक वितान

मिसरी घुली हुई 

रसना में

लगती है ज्यों रिसती खाण।


आओ हम

अपनाएँ हिंदी

रचनाकार गा रहे गीत

लिखते काव्य

कथाएँ अनुपम

बनी हुई है दुनिया मीत

शब्द -शब्द कसकर

तो देखो

हिंदी की है विस्तृत शाण।


शुभमस्तु,


12.09.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...