सोमवार, 24 अगस्त 2026

प्रश्न [ चौपाई ]

 273/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रश्नों     का    सागर    उमड़ाया।

समाधान    क्या  कोई   पाया??

रिक्त   एक    स्थान     नहीं    है।

प्रश्नों  की   नित बाढ़   बही   है।।


देख  प्रश्न     त्यौरी    चढ़   जाए।

सहज  समझ   कोई कब  पाए।।

टेढ़ी  खीर    प्रश्न    हल   करना।

जीते जी कुछ जन   का  मरना।।


जीवन  जटिल  प्रश्न हल  कर लें।

यथाशक्य निज  घट को भर लें।।

समाधान   जो    उनका   करता।

रिक्त घड़े   को   जल  से भरता।।


देख   प्रश्न    जो   खुश हो  जाए।

वही सहज   हल   उनका  पाए।।

प्रश्न     देश    के    लिए   बड़े हैं।

हल करने   को   सभी  खड़े  हैं।।


प्रश्नों  का     सटीक    हो   उत्तर।

नहीं  तीस का  लिखना   सत्तर।।

जस का  तस   हो  सीधा  उत्तर।

बारह का   मत   करो   बहत्तर।।


प्रतियोगिता     निरंतर    चलती।

वस्तुनिष्ठ   की  छलना  छलती।।

सहज नहीं विकल्प का   चुनना।

टूटी    खाट   पलों    में  बुनना।।


'शुभम्' प्रश्न    से    मत घबराना।

पाहन     से    लहरें    टकराना।।

आओ    अपने     भीतर    पाएँ।

समाधान    प्रश्नों     के     लाएँ।।


शुभमस्तु,


24.08.2026◆10.30 आ०मा०

                ◆●◆

जाति-भेद अलगाव से [ दोहा गीतिका ]

 272/2026


          



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक,

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग,

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद,

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार,

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट,

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल,

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

एक राष्ट्र ध्वज एक ही [ सजल ]

 271/2026


        

समांत           : आन

पदांत            :अपदांत

मात्राभार        :24

मात्रा पतन       : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक।

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग।

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद।

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार।

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट।

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल।

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

यही तपस्या आज हुआ [ गीत ]

 270/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भारी बोझ 

रखा कंधों पर

यही तपस्या आज हुआ।


पढ़ना-लिखना

ज्ञान बढ़ाना

नहीं कभी भी जाना

शिक्षित बन कर

पद पा लेना

कभी  नहीं  पहचाना

उस काँवरिया पर

फूल बरसना

जिनके सिर का ताज हुआ।


पिछड़े दबे-कुचे

यदि ये जन

यदि ऊपर चढ़ जाएँ

शासन करें

हमारे ऊपर

सब ऊपर बढ़ जाएँ

इनका पढ़ना-लिखना

हमको 

आज समस्या, खुदा कुआ।


भुना रहे हैं

नाम धर्म का

अगड़ों की ये बड़ी सियासत

काँवरिया को

प्रेरित करते

किंचित ये ही बने विरासत

बड़े बड़े 

नेता भी खुश हैं

पुत्र लगाओ दाँव जुआ।


पुलिस अधीक्षक

जिलाधिकारी

सब अगड़ों के नाम लिखे

दौड़ रहा हो

यदि पिछड़ा तो

मार टंगड़ी  ,  गिरे दिखे

जिसने 

कूटनीति ये समझी

छोड़ी काँवर लक्ष्य छुआ।


यादव लोधी

पाल बघेले

कुर्मी नाई  काँवरिया

शर्मा गुप्ता

ठाकुर जी क्या

बनते ऐसे बावरिया

वे शासक 

ये शासित सारे

देखो कैसा लाड़ चुआ!


शुभमस्तु,


23.08.2026◆7.00आ०मा०

                    ◆●◆

स्त्री थीं,मिस्त्री हो गईं! [ अतुकांतिका ]

 269/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऐसे-ऐसे कारीगर

देख लीजिए हर घर-घर

जो बिना ईंट पत्थर

दीवारें खड़ी करें

सुख चैन भी हरें

दिलों के बीच में।


ब्याह जब नहीं हुआ

वे भाई- भाई थे

रक्षक थे सिपाही थे,

हो गया जब ब्याह

तो मिट गई प्रेम की चाह

रात -दिन बस आह!

कारीगर जो आ गई

बँटवारे की

दीवार खड़ी करने,

सुख - शांति को हरने।


बिखर गया ठाठ-बाट

मिट गई टूटी खाट

कारीगर पलंगासीन है

बेलदार बेचारा पति

बड़ा ही दीन है,

ये व्यवस्था आधुनिक है

नवीन है।


सोहनी की सींक-सींक 

बिखर गई,

तो घर को बुहारे कौन,

सभी पड़े  विवश  मौन,

पत्तों से भर गया लॉन।


पूजनीया देवियाँ

दीवार खड़ी करने के लिए

स्त्री थीं,  मिस्त्री हो गईं,

घर की एकता अखंडता

खण्ड- खण्ड  रो रही।


संगठन बिखर गया

जिंदा जन मर गया

घर आँगन अखाड़ा है

गर्मी या जाड़ा है

हर ओर वैमनस्य ने

लाल ध्वज गाड़ा है।


21.08.2026◆8.15आ०मा०

                 ◆●◆

सब चूल्हे कच्ची माटी के [ अतुकांतिका ]

 267/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शादी से पहले

राखी बंधन त्योहार

भाई -बहन का प्यार,

बरसता हुआ लाड़,

खड़ा प्रेम का पहाड़।


शादी के बाद

सास-ससुरे से रार

देवर से जेठ पर प्रहार

आँगन के बीच खड़ी

ऊँची लंबी दीवार।


नव रात्रि की देवियाँ

विदा देवित्व हुआ,

ससुरालय में 

बँटवारे का

 खुदवा दिया कुँआ।


मानो या न मानो

कारण केवल एक,

अतीत की देवी हुई

बंटाढार की चुड़ैल।


अब नहीं रहा 

भाई भाई में प्रेम,

बो रहीं पत्नियाँ

कानों में वहम,

भाड़ में जाएँ 

सास-ससुर

देवर ननद जेठ,

वैमनस्य का बीज-वपन

नारी कर्म श्रेष्ठ।


गार्हस्थ के महाभारत का

मूल विवाहिता नारी,

प्रेम की दुश्मन 

पैनी छुरी आरी,

न मानो तो

घर-घर में देख लो,

सभी चूल्हे 

द्रव पेट्रोलियम गैस पर

दिखते हैं स्टील के,

पर कच्ची माटी के 

बने हैं।


शुभमस्तु,


20.08.2026◆6.15 प०मा०

                  ◆●◆

जलधर [ कुंडलिया ]

 268/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

सागर से लेकर चले,जलधर जल-आगार।

सुख देने जल-वृष्टि से,विपुल लुटाने प्यार।।

विपुल लुटाने प्यार,प्यास जीवों की हरते।

मानव जलचर जंतु,विटप की सेवा करते।।

'शुभम्' महत् उपकार,सृष्टि में करें उजागर।

अभिसिंचन के हेतु, नीर के उड़ते सागर।।


                         -2-

महिमा जलधर की सदा,सत्य कहें कवि लोग।

खुले    गगन  में   घूमते, करें    रात-दिन योग।।

करें रात-दिन  योग,  कहें   हम  उनको योगी।

पर उपकारी   मेघ,  नहीं   विचरण   के रोगी।।

'शुभम्'   देव  पर्जन्य,  नहीं   है   इनकी उपमा।

वे   जगती  के  प्राण,करे  जग जलधर महिमा।।


                         -3-

विरही   यक्ष  कुबेर   का,  हुआ प्रिया से दूर।

त्यागी   निज अलकापुरी, दुखी हृदय मजबूर।।

दुखी   हृदय मजबूर,एक दिन जलधर आए।

दिया   विरह-संदेश,  गगन   में   जो मँडराए।।

'शुभम्'  किया स्वीकार, मेघ ने प्रेम बतकही।

सुनी   यक्ष   की   बात,दंड   का भागी विरही।।


                         -4-

बरसे  जलधर   व्योम से,  धारासार अपार।

नदियाँ उमड़ी   वेग   से,करतीं जग उपकार।।

करतीं जग  उपकार,  कहीं हैं बाढ़ भयंकर।

काँवरधारी  लोग,चढ़ाते  जल शिव शंकर।।

'शुभम्'  बहे कुछ  गाँव,नगरवासी सब हरसे।

जलधर के  उपकार, विविध  रूपों  में बरसे।।


                           -5-

गरजे   जलधर   व्योम   में,तड़पी तड़ित अधीर।

रजनी   में     भर     दिव्यता,   बरसाते सन्नीर।।

बरसाते       सन्नीर,     ताल     में   दादुर बोले।

टर्र-टर्र     का   साज,  सजा  अपना  मुख  खोले।।

'शुभम्' मत्स्य साम्राज्य,किसी को क्योंकर बरजे।

श्रावण का   शुभ   मास, गगन  में जलधर गरजे।।


शुभमस्तु,


21.08.2026◆ 6.30आ०मा०

                     ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...