175/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
पूछ रहीं दुल्हन से सखियाँ।
लाज भरीं तव दृग की छवियाँ।।
ब्याह हुआ पति-गृह से लौटीं,
श्वसुरालय की कैसी गलियाँ।
साथ मिला साजन का अनुपम,
लगी न होंगीं पल की सदियाँ।
पायल मौन करधनी मुखरित,
गूँज उठीं होंगीं मधु ध्वनियाँ।
रात-रात भर सो न सकीं तुम,
करती थीं क्या पति से बतियाँ?
फूट रहे हैं मन में लड्डू,
हमको भी जतलाओ खुशियाँ।
'शुभम्' बताओ अनुभव हमको,
लिखती हो क्या अब भी चिठियाँ।
शुभमस्तु,
31.05.2026 ◆10.30 प०मा०
◆◆◆