रविवार, 19 जुलाई 2026

न ही अयोध्या मैं गया [ दोहा ]

 237/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न   ही  अयोध्या    मैं गया,  और न देखे  राम।

चोर   चढ़ावा ले  उड़े,  मैं  गिर  पड़ा धड़ाम।।

राम न माना   राम  को,  समझा  बस पाषाण।

चोर डाकुओं का करें,राम कवन विधि त्राण।।


चोर   चढ़ावा     चोरते,मौन  खड़े   सब श्वान।

लगता स्वीकृति   मौन   थी,चोरों   से पहचान।।

श्वान-चोर   की   मित्रता, देख अयोध्या धाम।

भौंचक    हैं  श्रीराम  जी,  खबर   हुई  है आम।।


भरता जब घट पाप का,कब तक रखो सँभाल।

देख   दान-धन  चोर  की,टपक उठी मुख  राल।।

पहले   ही   मुख   श्याम था,काला है अब  देख।

ग्रीवा -दर्पण    झाँक  ले,अमिट   काल का लेख।।


श्वानों    के   ही   सामने,  चुरा   रहे  धन चोर।

मौन धरे   सब  श्वान वे,हिली   न  रसना कोर।।

चोरों   के   सरदार   जो,  छुई न उनको आँच।

नोट-गणक  जलते सभी,इने-गिने   दस पाँच।।


चोरों   के   सरदार  का, बहुत बड़ा   आतंक।

शासन    की   चूलें   हिलीं,  मार  रहे वे डंक।।

छाँव   सियासत    की   बुरी,  रामालय  के  बीच।

रक्षक   ही   भक्षक   बने, बिखर   गई   है   कीच।।


लगता   है    अनुमान   ये, बैठे   चोर लबार।

देवालय   के    साँप    हैं, नहीं   पड़ेगी पार।।


शुभमस्तु,


17.07.2026◆ 1.30 प०मा०

                    ◆●◆

'महा संत' [ अतुकांतिका ]

 236/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भगवानों को

जीवंत भगवान नहीं

पत्थर की मूर्तियाँ

समझते हैं,

इसीलिए तो

उनके चरणों के दास

बैठकर उनके 

चरणों में

भेंट के नोटों को

अपनी जेबों में

अंटियों में उड़सते हैं।


राम आ गए,

उनकी कुटिया के

भाग खुल गए,

वे कुटिया को छोड़

महलों में रम गए,

राम की ही आँखों में

धूल झोंकते रहे

और उधर राम 

मौन बने हुए 

पत्थर  बने खड़े रहे।


दूध का दूध 

पानी का पानी

कैसे हो,

चिंतनीय है

सोचनीय है,

निंदनीय है,

पर क्या और कैसे?

सदियां बीत जाएंगी ऐसे!


चम्पतियों की चपतें

कब तक 

चंपी करेंगीं!

और जलती हुई आग को

राख में दबाती रहेंगीं !


व्यवस्था की

दुरावस्था अंततः

कब तक

भगवानों को

चूना लगाएगी!

भक्तों की भक्ति को

भुनाया जाता रहेगा ।


जब तक सियासत

मंदिरों में घुसी रहेगी,

चोरों की चाँदी

चमकती रहेगी,

सियासत की छाँव तले

मंदिरों के  भगवानों को

यों ही ठगा जाता रहा है,

ठगा  जाता ही रहेगा,

चोर चोर जीजा सालों का

चाचा  भतीजों का

चौर्य कर्म जिंदा रहेगा।


खून ही जिसका 

दूषित हो,

उस आदमी से

भगवान को

उम्मीद करना भी क्या!

लोभ-लालच के हाथों में

भगवानों का 

रहना भी क्या ?


वे नहीं मानते 

कि राम देख रहे हैं,

और वे उनके ही सामने

डाका डाल रहे हैं!

बेशर्मी की पराकाष्ठा की 

सीमा अनन्त है,

पीले कपड़ों में

 तिलक छापधारी आदमी

  यहाँ   'महा संत' है।


शुभमस्तु,


17.07.2026◆1.45 आ०मा०

                 ◆◆◆

बुधवार, 15 जुलाई 2026

हलधर वीर किसान [गीत]

 235/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


स्वेद सिक्त तन

चला खेत पर

हलधर वीर किसान।


कहता जगत

अन्न का दाता

 भरता सबके पेट

भूखा और

नग्न तन रहता

सबका ही आखेट

कंधे पर हल रखे

चला है

कृषता का संधान।


एक हाथ में

पात्र सलिल का

नग्न पाँव भू टेक

जुआ लटकता

उसके आगे

जाग्रत सदा विवेक

धैर्य धरे

वह कृषक तपस्वी

कर भू का गुणगान।


जीता सदा

अभावों में ही

नहीं कुशलता खैर

अपने ही

पैरों पर चलता

नहीं किसी से बैर

आँधी पानी

धूल धूप की

उसे नहीं पहचान।


भूखे प्यासे 

बाल कलपते

फटे तिया के चीर

प्याज नमक से

रोटी खाते

मन में धरते धीर

इज्जत नहीं

आन की खातिर

जिंदा  कृषक महान।


शुभमस्तु,


13.07.2026◆10.30प०मा०

                 ◆●●

चिकने -चुपड़े लाल घड़े हैं [गीतिका ]

 234/2026




चिकने-चुपड़े      लाल    घड़े    हैं।

लिए     पताका    सभी   खड़े हैं।।


डाल     रहे     मंदिर   में     डाका,

हठ   पर  अपनी   अड़े   पड़े   हैं।


बाँट    मुबाइल    प्रेयसियों    को,

ऐयासी     में    कनक    जड़े   हैं।


खा    अकूत   धन  लीं  न  डकारें,

ऊँचे-ऊँचे       भाव     कड़े     हैं।


रामालय     को    बेच      कमाते,

सोना -चाँदी      घूर      गड़े    हैं।


बड़े-बड़ों   की    छाया    छादित,

जिनके  मानस  मगर     सड़े  हैं।


'शुभम्'  धर्म     से    धंधा  करते,

पाप     कमाते     बड़े -बड़े     हैं।


शुभमस्तु,


13.07.2026◆ 5.15 आ०मा०

                     ◆◆◆

लिए पताका सभी खड़े हैं [सजल]

 233/2026


 

समांत           : अड़े

पदांत            : हैं

मात्रभार         :16.

मात्रा पतन      : शून्य


चिकने-चुपड़े      लाल    घड़े    हैं।

लिए     पताका    सभी   खड़े हैं।।


डाल     रहे     मंदिर   में     डाका।

हठ   पर  अपनी   अड़े   पड़े   हैं।।


बाँट    मुबाइल    प्रेयसियों    को।

ऐयासी     में    कनक    जड़े   हैं।।


खा    अकूत   धन  लीं  न  डकारें।

ऊँचे-ऊँचे       भाव     कड़े     हैं।।


रामालय     को    बेच      कमाते।

सोना -चाँदी      घूर      गड़े    हैं।।


बड़े-बड़ों   की    छाया    छादित।

जिनके  मानस  मगर     सड़े  हैं।।


'शुभम्'  धर्म     से    धंधा  करते।

पाप     कमाते     बड़े -बड़े     हैं।।


शुभमस्तु,


13.07.2026◆ 5.15 आ०मा०

                     ◆◆◆

रविवार, 12 जुलाई 2026

चोर-उचक्के ठोक रहे खम [ गीतिका ]

 232/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर-उचक्के      ठोक   रहे   खम।

बोल   रहे   रसना   से   बम-बम।।


बाहर          बैठा      चोर-सरगना,

उसके  ऊपर    भीतर    भी   दम।


राम-धाम    में        चोरी     होती,

चोर   नहीं   होते   लेकिन    कम।


भाल तिलक   तन  पर  पीताम्बर,

मधुशाला     में    वे    पीते    रम।


कहते  यही    कौन   क्या  कर  ले,

सर्वेसर्वा    मंदिर       के       हम।


नाक  अवध  वालों   की   कटती,

चोर    खा   रहे    रबड़ी  चमचम।


'शुभम्' लिखे   कविता   चिल्लाए,

 किंतु  न  होना    चोरों  को   गम।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆10.30 प०मा०

                  ◆◆●

बोल रहे रसना से बम-बम [ सजल ]

 231/2026



समांत          : अम

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर-उचक्के      ठोक   रहे   खम।

बोल   रहे   रसना   से   बम-बम।।


बाहर          बैठा      चोर-सरगना।

उसके  ऊपर    भीतर    भी   दम।।


राम-धाम    में        चोरी     होती।

चोर   नहीं   होते   लेकिन    कम।।


भाल तिलक   तन  पर  पीताम्बर।

मधुशाला     में    वे    पीते    रम।।


कहते  यही    कौन   क्या  कर  ले।

सर्वेसर्वा    मंदिर       के       हम।।


नाक  अवध  वालों   की   कटती।

चोर    खा   रहे    रबड़ी  चमचम।।


'शुभम्' लिखे   कविता   चिल्लाए।

 किंतु  न  होना    चोरों  को   गम।।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆10.30 प०मा०

                  ◆◆●

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...