गुरुवार, 18 अगस्त 2022

काजल मेघों का सजा! ⛈️ [ दोहा ]

 330/2022

 

[पराग,काजल,किताब,फुहार,गौरैया]

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✍️ शब्दकार©

📚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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       💎 सब में एक 💎

कलिका से मिलता नहीं,अलि को प्रेम पराग

अंतर  में कसमस करे, मंद-मंद  सी आग।।

सुमन - कर्ण  में भृंग ने,किया कुंज   गुंजार।

लिपटा  पीत पराग भी, मान  रहा आभार।।


काजल मेघों का सजा,निकली चपला एक।

स्वर्ण - शाटिका  सोहती,तारे जड़े  अनेक।।

काली काजल कोर से,बढ़ी नयन की ओप।

पल भर  भी रुकता नहीं, बाले  तेरा  कोप।।


पढ़ना क्या आसान  है, तेरी देह - किताब।

कंचन-सी चमचम करे,रुके न पल को आब।

अक्षर  पढ़े किताब के, पढ़े न  जाने  भाव।

गूढ़  पहेली  यौवने, पल - पल  बदले  हाव।।


परस करों का देह पर,लगता मेघ - फुहार।

हे कामिनि!रह दूर ही,कल्लोलिनि-अवतार।

झर- झर झरें फुहार की,बुँदियाँ शीत अमंद।

स्पंदन    हो     देह     में,  भरे असीमानंद।।


घर  के  लता  - निकुंज में,गौरैया  का नीड़।

चहल-पहल चूँ - चूँ करे,नहीं चाहती भीड़।।

गौरैया  तव  नीड़  की, रहूँ तुम्हारे    पास।

बस दाना - दुरका  मिले,औऱ न कोई आस।।


      💎 एक में सब 💎

होती  नहीं  पराग  की,

                  काजल -   वर्ण  फुहार।

गौरैया   करती    'शुभम्',

                  किस किताब को  प्यार??


   🪴 शुभमस्तु!


१७.०.८२०२२◆३.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

लीलाधारी 🦚 [अतुकान्तिका ]

 332/2022

        

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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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 लीलाधर ,

लीलावतारी,

लीलाधाम में

आज लीला करेगा,

घर - घर 

मंदिर - मंदिर

मानव की तरह

जन्म में शिशु बन

अवतरेगा।


लीलाभूमि है

यह  भारत, 

अवतरित होते रहे

यहाँ सदा राम श्याम 

मानव रहा सदा आरत,

फिर भी रहा गारत,

कैसा है इस जन का

स्वार्थ भरा परमारथ!


होती रही  जब- जब

धर्म की हानि,

सिमटने लगी 

जब नर- नारी की कानि,

 भुला बैठा जब

अपनी अस्मिता पहचान,

आदमी का आदमी पर ही

तीर संधान!

हिन्दू की हिन्दू से

छुअन - छुआन,

कोई ईसाई कोई मुसलमान,

क्या यही है आज का

नया इंसान?

फ़िर कैसे करें

मानव देहधारी का

मानव - रूप में संज्ञान?

हो गया 

कहाँ नहीं

वह पशु समान! 

क्या करें लीलावतारी

बचाएँ कैसे उसका मान?


निर्वसन स्नान पर

लाज बचाने वाले!

नारियों को सिखाने

चेतावनी देने वाले!

क्या आज की नारी ने

कुछ भी संज्ञान लिया?

अपनी ही मर्यादा को

अपने ही हाथों 

क्या स्व- नग्नता में

डुबा ही न दिया?

पुनः - पुनः क्या चेताना!

ईश्वरीय चेतावनी की

मिट्टी पलीद करवाना?

क्या उचित होगा?

क्या उसी लीला को

पुनः दोहराना होगा?


द्वापर था तब,

चल रहा अब कलयुग!

कोई किसी की

नहीं मानता,

अपने ही अहं में

मनमानी करता

विलोम ठानता,

भले ही वह

कुछ नहीं जानता,

पर क्षत -विक्षत ध्वज को

छत,कार ,बाइकों पर तानता।


क्या यही देशभक्ति है?

फिर क्यों श्याम 

कुंजों में मुरली बजायेगा,

तुम्हारे प्लास्टिक

 सुमन सज्जित

सजावट - धाम पर

नंगे पैरों

 दौड़ा चला आएगा?

क्या अशरीरी  

शरीर धर कर 

'शरीर' को बचाएगा! 


आज उसी अशरीरी का

शरीर धरने का,

लीला मंच का

पर्दा उठेगा,

लगाकर तिलक चंदन

मानव की बुलंद बोली का

जयकारा जगेगा,

हे श्याम !

वह तुमसे कम 

नाटकबाज जो नहीं है,

वेश बदल कर 

क्या कुछ करने में

सक्षम नहीं है ?


🪴 शुभमस्तु !


१८.०८.२०२२◆११.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

तिरंगा -भक्त आधुनिक भारत 🇮🇳 [ दोहा ]

 331/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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देशभक्ति  होती  नहीं, तारीखों   को    देख।

बनता शुभ इतिहास तब,रच कर्मों का लेख।

लगा  तिरंगा   वैन  पर, दौड़ा भक्त   महान।

टॉल अदा करता  नहीं, रँग बाजी की शान।।


बिना काज बिजली जले,पंखा भी पुरजोर।

देशभक्ति  की  शान  में, करे तिरंगा   शोर।।

नल को तेज जुकाम है,नगरपालिका मौन।

लगा तिरंगा वैन पर,गया भक्त वह  कौन??


सबमर्सिबल  भक्त  की, चलती   धारासार।

टंकी  पर  फहरा रहा, देश भक्ति  का प्यार।।

नियम  तिरंगा  के  नहीं, भक्त जानते  एक।

फहराना  ही ध्येय  है,फैशन की   है   टेक।।


छत की भग्न मुँडेर पर,फहरा बिना विचार।

एक तिरंगा रेशमी,  सजे तिपहिया   कार।।

अंगवस्त्र  बनियान के,भी होते कुछ   रूल।

टाँग  तिरंगा   भक्त जी, गए एकदम   भूल।।


'सब कुछ' करने के लिए,देश हुआ  आजाद।

आड़ तिरंगे की भली,नियम -भंग का स्वाद।

टाँग दिया छत, कार पर,गए भक्तगण भूल।

कौन  तिरंगे  को रखे, सीखा नहीं   उसूल।।


समझ तिरंगे को लिया,अपनी पेंट  कमीज़।

नहीं उतारें आठ दिन,शेष न रही  तमीज़।।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०८.२०२२◆८.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 15 अगस्त 2022

घर मुंडेर तिरंगा 🇮🇳 [ गीत ]

 329/2022

  

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पानी की टंकी पर  फहरे,

घर  मुंडेर  तिरंगा।


बीते साल पचहत्तर अमृत-

उत्सव  का दिन आया,

ट्रैक्टर,कार, सभी बाइकों पर,

झंडा फर - फर भाया,

रेशम,  सूती,  खादी,

नित हो रही  मुनादी,

देशभक्ति में रंगा।


नन्हे - मुन्ने  विद्यालय  के,

झंडे  लिए  गली में,

देशभक्ति  के गीत गा रहे,

सजे हुए तितली में,

मातृभूमि  जय गाते,

माँ को शीश  नवाते,

तन - मन से हैं चंगा।


रँग हरित श्वेत है केसरिया,

पहने   बाला   नारी,

सभी दुकानें सजीं पताका,

संस्था सब सरकारी,

सबकी   है     तैयारी,

आजादी अति प्यारी,

उचित नहीं  है   दंगा।


आजादी की  मिली धरोहर,

बाद   जन्मने    वाले,

रखना इसे सँभाल शुभंकर,

करना 'शुभम्' निराले,

अन्न  देश  का  खाया,

रहना ध्वज की छाया,

जब  तक  यमुना गंगा।


🪴 शुभमस्तु ! 


१५.०८.२०२२◆६.४५ पतनम  मार्तण्डस्य।


🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

विदा हुआ अब सावन 🌈 [ गीत ]

 327/2022


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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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रिमझिम-रिमझिम कजरी गाता,

विदा हुआ अब सावन।


रजोमती   सरिताएँ   धाईं,

रजमयता  निज  हरने,

हरी घास पर दौड़ लगातीं,

भैंसें      गायें     चरने,

हवा  बहे  बरसाती,

हैं प्रसन्न सुत नाती,

धरती  है  मनभावन।


भैया ने कर  में   बंधवाई,

लाई  बहना  राखी,

कोकिल मोर हुए मतवाले,

नाच रहे  सब पाखी,

करते कृषक किसानी,

सोहे    साड़ी    धानी,

धरा  नित  रम्य  सुपावन।


श्रीकृष्ण  की   जन्मअष्टमी,

मना    रहे     नर - नारी,

भादों कृष्ण पक्ष  की काली,

निशा  सजल  अँधियारी,

जन्मे  कृष्ण कन्हाई,

बजती  रही   बधाई,

गोपी  -  गोप रिझावन।


नील गगन तल उड़ते  बगुले,

मोर बाग  में  नाचें,

भोर हुई  ले - ले  निज पोथी,

पाखी तरु पर बांचें,

पंडुक भजन सुनाती,

वेला    प्रेय   प्रभाती,

आए  हैं   घर   साजन।


🪴 शुभमस्तु !


१४.०८.२०२२◆१०.०० पतनम मार्तण्डस्य।

सजल 🪷

  

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समांत: आड़।

पदांत: के नीचे।

मात्राभार :16.

मात्रा पतन:शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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करभ  गया   पहाड़  के नीचे।

खीझा  वह  दहाड़ के  नीचे।।


अपने  से   ऊँचा   जब पाया।

छिपता त्वरित आड़ के नीचे।


नहीं मिली बरगद  की छाया।

पहुँचा  विटप  ताड़ के नीचे।।


इतराया    आजादी    पाकर।

गीदड़  गया  झाड़  के  नीचे।।


लड़-भिड़ कर मित्रों से आता,

छिपता सुत किवाड़  के नीचे।


शेर    दहाड़ें     भरता  ऊपर,

गया न शल्य - बाड़  के नीचे।


'शुभम्' कर्म ऐसे नित करना।

जाए   क्यों  उजाड़ के नीचे!!


🪴 शुभमस्तु !


१५.०८.२०२२◆६.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

रविवार, 14 अगस्त 2022

जिसकी पूँछ उठाई 🪺 [ गीत ]

 326/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🪹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिसकी पूँछ उठाई जाती,

निकल रहा  है मादा।


अवसर जिसको मिले 'सुनहरा',

क्यों करनी में छोड़े,

राम नाम की ओढ़ चुनरिया,

अपना मुख वह मोड़े,

दस -दस पीढ़ी खाएँ,

बैठी    मौज   मनाएँ,

बाहर  से   है   सादा।


बहुत जरूरी रँगना तन को,

राजनीति से रँग ले,

बन समाज का सेवी प्राणी,

राम श्याम का सँग ले,

झंडा  एक  लगा  ले,

मुखड़ा देह सजा ले,

या बन  गुंडा  दादा।


'कोई   नहीं  देखने वाला',

सोच  यही   है  तेरी,

पीकर के  अमृत तू आया,

किंतु नहीं  अब देरी,

होगी     जब    सुनवाई,

कुछ हो न सके हरजाई,

बतला  नेक   इरादा।


बोए  बीज  बबूल  हाथ से,

आम  कहाँ  से खाए,

कपड़े   रँगे  जलें अर्थी में,

ऊपर    नंगा    जाए,

बहुत  बड़ी  लाचारी,

हुई   जिंदगी  ख़्वारी,

बोझ गधे  का  लादा।


🪴 शुभमस्तु !


१४.०८.२०२२◆५.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...