315/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
तेल में ही आग हो, ऐसा नहीं है।
नाग में ही नाग हो, ऐसा नहीं है।।
आदमी में आदमी को, खोजता हूँ,
फाग में ही फाग हो, ऐसा नहीं है।
भक्त है वह देश का, कहता जुबाँ से,
उर में बसा अनुराग हो, ऐसा नहीं है।
खाक से उठकर बना है ,लाख का जो,
बाकी न कोई दाग हो, ऐसा नहीं है।
चाल हंसों की सदा से, चल रहा है,
बैठा न दिल में काग हो, ऐसा नहीं है।
त्याग दी सहधर्मिणी, तो बात क्या है,
तन में नहीं बैराज हो, ऐसा नहीं है।
वेश में ही गीध चीलें, चिलचिलाएँ,
सिर पर न कोई बाज हो, ऐसा नहीं है।
शुभमस्तु,
28.09.2026◆4.00 प०मा०
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