शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

वंदन [ कुंडलिया ]

 304/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                       

                         -1-

अपने  दोनों  जोड़  कर, नत  वंदन में भक्त।

सेवा  करता  ईश की,चरण   युगल अनुरक्त।।

चरण युगल अनुरक्त,जनक जननी को ध्याये।

मिलें   सिद्धियाँ  अष्ट,नवों   निधियों को पाये।।

'शुभम्' नमन की रीति,उठाया नर को तप ने।

धन्य -धन्य वह   जीव, करे  वंदन  कर अपने।।


                         -2-

वंदन     का   चंदन   धरे,  रहे   महकता देह।

शुभता के  आशीष   से, मिले   ईश  का नेह।।

मिले   ईश  का  नेह, मिटें   नित   की बाधाएँ।

विपदाएँ     हों    नष्ट, सदा    विश्वास जगाएँ।।

'शुभम्' करें शुभ काज,करे दुनिया अभिनंदन।

विनत   भाव   की   धार, बहाए  निर्मल वंदन।।


                         -3-

वीणा वादिनि   शारदा,  तव   वंदन  में आज।

भक्त विनत अनुरक्त है,सकल सुधारें   काज।।

सकल  सुधारें  काज, काव्य-रथ  रुके न मेरा।

नित  नूतन   हों   भाव, शब्द   का कोष घनेरा।।

'शुभम्'  कृपा  कर  माथ, नहीं  दें कच्चा मीणा।

नत मस्तक दो हाथ,बजा दो  कवि  की वीणा।।


                         -4-

वंदन के  शुभ  भाव  से,  मिले गुणों का कोष।

जागे   विपुल   विनम्रता,मिटें सकल उर- दोष।।

मिटें   सकल   उर-दोष, ओघ-अघ नष्ट कराए।

पावनता    का     कोष, अंग   में नित्य समाए।।

'शुभम्' लगा जब भाल, महकता मह-मह  चंदन।

विपदाएँ   दे   टाल,   भक्त   का   निर्मल वंदन।।


                         -5-

माता   के   शुभ  भाव  से, वंदन करते नित्य।

अपने   भारत   देश को,  शशि   तारे आदित्य।।

शशि  तारे आदित्य,  सिंधु  कलकल  सरिताएँ।

पंच   तत्त्व   के  सत्त्व,  नित्य  गुणगीता गाएँ।।

'शुभम्'   पुत्र जो  नित्य,देश को अपने  ध्याता।

क्यों   न  लड़ावे   लाड़,   पुत्र को भारत माता।।


शुभमस्तु,


25.09.2026◆ 6.30 आ०मा०

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आदमी के पंख नहीं [ अतुकांतिका ]

 303 / 2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी के पंख नहीं

फिर भी उड़ता है

धन बल पैसे से

पाँव धरती पर

नहीं पड़ता है।


रह गए बाज पीछे

नोंचने में माँस को

आदमी डकार लिए बिना

निकाल रहा भड़ास को।


मोर हैं न कोयल

गौरैया न हंस है

कृष्ण लीला कर रहा

कंस का अवतंस है।


मुर्गे की कुकड़ कूं

आहार भी कुछ वैसा ही

गंगा में लगा गोते

प्रयागराज आवाजाही।


आदमी की देह में

आदमी भी तो नहीं

ईंट सीमेंट के गेह में

जमा रहा दिमागी दही।


प्रजाति नई जीव की

आदमी नमूना  है

ठग रहा अपनों को

लगा रहा चूना  है।


शुभमस्तु,


24.09.2026 ◆ 8.00 प०मा०

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कहना बड़ा मुश्किल [ गीतिका ]

 302/ 2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी में  आदमी   है, कहना  बड़ा मुश्किल।

कथन सच्चा लाजमी है, कहना बड़ा मुश्किल।।


आँख   दो   दो  कान   हैं, हैं  हाथ   दो  दो   पैर ,

दर्द   की हलकी नमी  है, कहना  बड़ा मुश्किल।


आदमी   की  भीड़   में ,  खोया   हुआ इंसान,

इंसानियत की ही कमी है, कहना बड़ा मुश्किल।


होंठ   पर   मुस्कान   है,पर  आग   भीतर   है,

प्यार से  सूखी  जमी  है,कहना बड़ा  मुश्किल।


गैर   हों     अपने   भले,   अपने   नहीं  अपने,

आदमी  ये  आलमी है, कहना   बड़ा मुश्किल।


चढ़   रही    चींटी ,  कभी   ऊपर कभी  नीचे,

असल है या   डमी  है, कहना   बड़ा मुश्किल।


सीख   लेता   है 'शुभम्' ,  उन  चींटियों से  ये,

आदमी यदि   उद्यमी   है, चढ़ना  नहीं मुश्किल।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆3.00 प०मा०

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कंबल दो रजाई दो [ गीतिका ]

 301/ 2026



       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बढ़ने  लगा  है   शीत, कंबल   दो रजाई  दो।

मन   गा   रहा है गीत, कंबल  दो रजाई दो।।


झरने   लगी है ओस,अंबर   से  नहीं दिखता,

रातें   हुईं   विपरीत, कंबल   दो   रजाई  दो।


बिजली  नहीं बादल  नहीं,  बरसा नहीं  पानी,

है   धूप  ही  मनमीत, कंबल   दो रजाई  दो।


याद  भी  उनकी, भुलाई   ही    नहीं जाती,

तन-मन जगी   है प्रीत, कंबल  दो रजाई दो।


आग  की   लपटें,  बुलातीं   पास में  अपने,

तन की  सुखानी तीत,  कंबल दो रजाई दो।


चिड़िया  सिकुड़ती  नीड़ में, है से रही अंडे,

वर्षा    गई   है   बीत,  कंबल   दो रजाई दो।


चल 'शुभम्'  हम  भी चलें, बढ़ता  अँधेरा है,

होना  नहीं   भयभीत,   कंबल दो रजाई दो।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆ 1.45 प०मा०

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अब तो उजाला हो [ गीतिका ]

 300/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खुल  गए   कॉलेज,  अब  तो  उजाला हो।

बढ़-चढ़ मिले नॉलेज, अब तो  उजाला हो।।


बिल्डिंगें   ऊँची ,   भवन   मरमर   जड़े सारे,

उचित   है   मैसेज, अब    तो   उजाला हो।


दिखते   नहीं   विद्यार्थी,ऑफिस   में   हैं बाबू ,

मालिक  बने   अंग्रेज, अब  तो  उजाला हो।


बैंक   में    अंबार ,  शुल्कों   के    लगे    ऊँचे,

सज   गई   है    सेज, अब   तो  उजाला हो।


बिन  पढ़े     होगी  नहीं , शादी कहीं  से भी,

बढ़   गया   है  क्रेज़,  अब   तो   उजाला हो।


पढ़ते  सभी लड़के,यहाँ पर लड़कियाँ भी हैं,

मोटा  मिले    पैकेज, अब   तो  उजाला  हो।


देखे   सभी   ये  दृश्य,  सारे आँख  से अपनी,

पलटे  नहीं  बस  पेज, अब  तो उजाला हो।


शुभमस्तु,

24.09.2026◆ 12.15 प० मा०

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गुरुवार, 24 सितंबर 2026

हम क्या करें [गीतिका]

 299/2026


         


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी   मिलता   नहीं,  हम  क्या   करें।

ढूँढ़  मारा   सब    कहीं, हम   क्या   करें।।


आगे    पीछे    आदमी      ही    आदमी,

दूरियाँ  फिर   भी  रहीं, हम   क्या   करें।


अक्ल  का   पुतला   सभी    कहते  उसे,

खून  की   नदियां   बहीं ,हम  क्या  करें।


अपने   पड़ौसी   को    नहीं   पहचानता,

फिर भी कहें उसको जहीं, हम  क्या करें।


गाँव      जंगल    नगर   में    है   छा   गया,

ख्वाव में   भी   है   यहीं,   हम    क्या  करें।


लोक    में    परलोक    में   उसकी    रज़ा,

अनगिनत   उसकी   महीं,   हम  क्या करें।


खोज    करता    है  'शुभम्'     इंसां   मिले,

होती    नहीं   पर   मनचहीं, हम   क्या करें।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆6.00 आ०मा०

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टन-टन टनाटन [ गीतिका]

 298/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जेब   हो  अपनी  गरम, टन-टन टनाटन।

आदमी  है    बे शरम,   टन-टन टनाटन।।


देश जाए  भाड़ में, मुझको   पड़ी   क्या ,

कर्म   ही   मेरा  धरम,   टन-टन  टनाटन।


असलियत का  भेद,यों  खुलता नहीं है,

जिंदा रहे जन का भरम, टन-टन टनाटन।


छातियों में  अब नहीं, धड़का करें   दिल,

पत्थरों   के हैं   मरम,   टन-टन टनाटन।


अब नहीं  अच्छा- बुरा, कुछ भी यहाँ पर,

कर रहा  है सब  करम, टन-टन टनाटन।


वासना  की     भूख    ने,   ऐसा सताया,

सचल है  उनका   हरम,  टन-टन टनाटन।


दूध   के    सम्बंध   भी,  बदबू   भरे   हैं,

चाहिए नर  को चरम,   टन-टन  टनाटन।


शुभमस्तु,


23.09.2026◆10.45 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...