गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

पितर हमारे [ अतुकांतिका ]

 344/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पितर हमारे

आए हैं

शुचि कृपा करेंगे,

दिखलाते निज रूप

स्वप्न में 

मौन धरें वे।


पितरों का आशीष 

फला है

हम जीवन जीते

वही खोलते भाग्य

घटों को

जो थे रीते।


करें दुग्ध तिल

गंगाजल से

पितरों का तर्पण

उनके ही हम रूप

नेह निज करते अर्पण।


शुभता का संदेश

पितर अपनापन देते

करें महक से तृप्ति

नहीं कुछ हमसे लेते।


'शुभम्' पिता माँ

बाबा दादी पितर हमारे

हम उनकी संतान

सदा वे  सहज सहारे।


शुभमस्तु,


08.10.2026 ◆ 5.00प०मा०

                   ◆●◆

कुसुमित कलियाँ बाग में [ कुंडलिया ]

 343/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                          -1-

कुसुमित कलियाँ बाग में, बगराईं  चहुँ ओर।

डाल-डाल  है  झूमती, प्रमुदित संध्या  भोर।।

प्रमुदित संध्या  भोर,सुरभि प्रसरित मनभाई।

नृत्य   करें  वन  मोर,  नयन  में  भरी लुनाई।।

'शुभम्' पखेरू-गान,नीड़ में होता विलसित।

करें  शरद सम्मान, बाग में कलियाँ कुसुमित।।


                         -2-

लगते    आश्विन    मास  के, बदल गया परिवेश।

अंबर   में    बादल   नहीं,  अलग   मिले संदेश।।

अलग     मिले      संदेश,  धूप   में  तेजी आई।

हुआ     शीत      संचार,   नहीं   चलती पुरवाई।।

'शुभम्' खिले नर-नारि,हरित कुसुमित तरु खिलते।

सीताफल     अमरूद,  आँवला    शोभन लगते।।


                          -3-

कुसुमित उर कलिका वही,अब तक  थी  बेजार।

तेज  तपन  घटने   लगी,मास  लगा शुभ क्वार।।

मास   लगा    शुभ   क्वार,  पूजते   दुर्गा माता।

भक्ति  भाव   में डूब,  भक्त  जन माँ को ध्याता।।

'शुभम्' भक्तिमय गीत, गूँजते जन-जन विहसित।

हरे   जवारे   दिव्य,  देव   आलय   में कुसुमित।।


                         -4-

कुसुमित मन कलिका करें, सजा हुआ दरबार।

माँ   दुर्गा   का   आगमन,   हुआ   हमारे द्वार।।

हुआ   हमारे   द्वार,   रूप धर  नव्य बालिका।

सिद्धिदातत्रिका  मातु, कभी वे मातु कालिका।।

'शुभम्' सृष्टि शृंगार, किया करतीं माँ सुरभित।

अग-जग   का  उद्धार, सर्वदात्री   से कुसुमित।।


                         -5-

माता   के  दरबार   में, कुसुमित पल्लव  फूल।

विनत भक्त का भाल है,करूँ न किंचित भूल।।

करूँ   न   किंचित भूल,सौम्यता मन में लाऊँ।

रहें    मातु    अनुकूल,पाँवड़े  पलक  बिछाऊँ।।

'शुभम्'   सदा   अनुराग,भाव से माँ को ध्याता।

कृपा   करें   नव रूप , मातु   के    गौरी माता।।


शुभमस्तु,


08.10.2026◆4.45 प०मा०

रहें नहीं अभिशाप [ सोरठा ]

 342/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कतिपय मानव देह,धरती पर अभिशाप हैं।

उन्हें  न जन  से  नेह,कर्महीन   रहते यहाँ।।

वाणी विष की   खान,  वाणी  में अमृत बसा।

वाणी  से सम्मान, वाणी   ही  अभिशाप है।।


जो  नर केवल भार,मात-पिता को जानते।

सदा रहें   अनुदार, संतति वे अभिशाप हैं।।

 जो जन अपना पेट,देशद्रोह   कर भर रहे।

लीन सदा आखेट, धरती  के अभिशाप हैं।।


उससे करें न पाप,  जिसका खाते अन्न हम।

बनें न जन अभिशाप,  धन्य   मात भू भारती।।

गुरुवर से   कर   द्वेष,छल -छ्द्मों  में लिप्त हैं।

क्षम्य न एक निमेष,अर्जित  कर अभिशाप को।।


वही  बने अभिशाप,  कर्म   पुण्य है पाप भी।

मानवीय    हर ताप,  कर्मों    से  ही दूर हों।।

हो न सदा वरदान,हर   संतति   माँ-बाप को।

 प्रतिशोधक इंसान,  बनती है  अभिशाप भी।।


 कर्म     तुम्हारे   बंधु,   आगे-आगे   चल रहे।

वही मधुर जल सिंधु, वही पुण्य अभिशाप भी।।

 कवि   होना सौभाग्य,ईश्वर   का   वरदान    है।

कुछ   धरते   वैराग्य,  कुछ भोगें अभिशाप भी।।


 लगते फल   निष्पाप, 'शुभम्'  कर्म के खेत में।

  रहें  नहीं अभिशाप, सुखद जिएं   जीवन वही।।


शुभमस्तु,


08.10.2026◆8.30 आ०मा०

                  ◆●◆

वाणी में अमृत बसा [ दोहा ]

 341/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


धरती पर अभिशाप हैं,कतिपय मानव देह।

कर्महीन   रहते  यहाँ, उन्हें  न जन  से नेह।।1

वाणी में अमृत बसा, वाणी विष की खान।

वाणी ही  अभिशाप  है, वाणी  से सम्मान।।2


मात-पिता  को  जानते, जो  नर केवल भार।

संतति   वे  अभिशाप  हैं,सदा रहें अनुदार।।3

देशद्रोह  कर  भर  रहे, जो जन अपना पेट।

धरती के  अभिशाप   हैं,लीन सदा आखेट।।4


जिसका  खाते   अन्न हम,उससे करें न पाप।

धन्य मात भू  भारती,बनें न जन अभिशाप।।5

छल-छ्द्मों   में लिप्त   है, गुरुवर से कर द्वेष।

अर्जित कर अभिशाप को,क्षम्य न एक निमेष।।6


कर्म  पुण्य है  पाप   भी,वही  बने अभिशाप।

कर्मों   से ही  दूर   हों,  मानवीय    हर ताप।।7

हर  संतति माँ-बाप  को, हो न सदा वरदान।

बनती है अभिशाप  भी, प्रतिशोधक इंसान।।8


आगे-आगे     चल    रहे,  कर्म   तुम्हारे   बंधु।

वही पुण्य अभिशाप भी,वही मधुर जल सिंधु।।9

ईश्वर   का    वरदान   है, कवि   होना सौभाग्य।

कुछ भोगें  अभिशाप   भी, कुछ धरते वैराग्य।।10


'शुभम्'   कर्म  के खेत   में, लगते फल निष्पाप।

सुखद जिएं जीवन  वही,  रहें  नहीं अभिशाप।।11


शुभमस्तु,


08.10.2026◆8.30 आ०मा०

                  ◆●◆

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

बंदरों जैसी भी हरक़त देख ली [ गीतिका ]

 340/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्


बंदरों    जैसी   भी   हरक़त देख ली।

उष्ट्र   जैसी   भी   करवट   देख  ली।।


आदमी     की     देह  में    वानर  लगे।

इस बाग के तरु   बेल   क्या  तेरे सगे??

तुझको मिली हमने वो बरकत देख ली।

बंदरों   जैसी  भी    हरक़त    देख ली।।


लड़ते  हुए   तकदीर   से  देखा तुझे।

पर नहीं  मंज़िल   कहीं    दीखा मुझे।।

साँप   जैसी   भी   हसरत   देख ली।

बंदरों   जैसी   भी  हरक़त   देख ली।।


मियाँ    मिट्ठू   भी  सौ    का  एक   तू।

चाहता   है   पेय   में  हो    सिर्फ़  खूँ।।

सिरफिरी   तेरी   वो   जुर्रत  देख ली।।

बंदरों  जैसी  भी   हरक़त   देख   ली।।


साँप को   बस   साँप  ही   अच्छे लगे।

और   तो   सब   भेक   के   बच्चे  सगे।।

तालाब में    टर  टर्र    टर्रत    देख ली।

बंदरों    जैसी    भी    हरक़त   देख  ली।।


समझता  है  तू  खिलाड़ी   एक  ही।

खींचता  तू    सिर्फ़   गाड़ी  देश की।।

जोड़ने   की  वह मशक्कत  देख ली।

बंदरों   जैसी   भी हरक़त   देख ली।।


शुभमस्तु,


07.10.2026 ◆2.15प०मा०

               ◆●◆

घूम रहे कुछ जंतु घुमंतू [ बाल गीतिका ]

 339/2026

 

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


घूम  रहे       कुछ   जंतु   घुमंतू।

करते   किंतु      परंतु     घुमंतू।।


अपने   पर    विश्वास   नहीं   है।

जो भी   कह दें   वही   सही है।।

उलझे - से      वे    तंतु     घुमंतू।

घूम   रहे   कुछ   जंतु     घुमंतू।।


नहीं   देश   को     अपना   मानें।

सिर्फ़   सपोलों    को   पहचानें।।

मानें खुद    को     कंतु    घुमंतू।

घूम  रहे   कुछ    जंतु     घुमंतू।।


बिल ही   जिनकी  एकल सीमा।

समझ    रहे  भारत   का बीमा।।

मानव  तन   में     अंतु    घुमंतू।

घूम    रहे    कुछ   जंतु   घुमंतू।।


उन्हें    न    कोई    अपना  प्यारा।

लिए    बपौती      देश     हमारा।।

तन - मन   के    वे    हन्तु   घुमंतू।

घूम   रहे    कुछ     जंतु     घुमंतू।।


नहीं     एक   भी   शेष   भलाई।

हिंदू    मुस्लिम सिक्ख   इसाई।।

सदा      चाहते    मंतु      घुमंतू।

घूम    रहे     कुछ    जंतु घुमंतू।।         


कंतु =कामदेव

अंतु= कीड़े -मकोड़े

हन्तु = जान से मारने की इच्छा रखने वाले

मंतु =अन्याय ,अपराध।


शुभमस्तु,

07.102.026◆1.00 प०मा०

                ◆●◆

बिफ़र रही खिसियानी बिल्ली [बाल गीतिका]

 338/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



बिफ़र   रही  खिसियानी बिल्ली।

 इधर-उधर   मिमियानी बिल्ली।।


कभी  इधर का     खंभा    नोचे।

कभी दूध    को    पलटे   सोचे।।

अपने    से  उकतानी     बिल्ली।

बिफ़र  रही खिसियानी बिल्ली।।


साथ  निभाती    बहना    प्यारी।

चढ़ती    फाटक   पर    बेचारी।।

व्यर्थ यहाँ    उलझानी    बिल्ली।

बिफ़र  रही खिसियानी बिल्ली।।


मौज    मनाने     इटली     जाए।

किंतु लौट   बुद्धू    फिर   आए।।

उछल कूद     रपटानी    बिल्ली।

बिफ़र रही  खिसियानी  बिल्ली।।


नहीं  वचन का    ठीक  ठिकाना।

जो मन भाए    गीत     सुनाना।।

कुर्सी   की   भुखियानी   बिल्ली।

बिफ़र रही खिसियानी  बिल्ली।।


चली   विदेशों     में    भड़काने।

अपनी  चालें     लगी    चलाने।।

अपने मन   भखियानी   बिल्ली।

बिफ़र  रही खिसियानी बिल्ली।।


शुभमस्तु,


07.10.2026 ◆12.15 प०मा०

              ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...