173/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
खुली हुई किताब न बन
कोई भी न पहचानेगा
कोई भी नहीं पढ़ेगा तुम्हें
धूल खाओगे धूल
रैक में सजी हुई
किताबों की तरह।
मोबाइल बन जाओ
हर हाथ में तुम्हीं होगे
शौचालय से फटफटिया तक
डीएम से रिक्शा पोलर तक
झोंपड़ी से महलों तक
हाथों हाथ उठाए जाओगे।
कोई तुलना नहीं
किताब की मोबाइल से
न मोबाइल की किताब से
समझो तो किताब
कुछ कम नहीं
मोबाइल एक घटना है
जो घट रही है
घटती जा रही है,
कहाँ राजा भोज
कहाँ गंगू तेली !
किताबें गुरु हैं
ज्ञान - दर्पण हैं
पथ प्रदर्शक हैं
ज्ञान वर्द्धक हैं
मोबाइल में कुछ भी
टिकाऊ नहीं।
अहसान मान
उन किताबों का
जिन्होंने यहाँ तक पहुँचाया,
मोबाइल का क्या
डिजीटल के मिथ्या भ्रम ने
हर आदमी ललचाया।
समय बदलेगा
आदमी भी बदलेगा
किताबों का अवमूल्यन
नहीं होगा,
तू फिर से
किताबों की ओर लौटेगा।
तराजू के पलड़ों में
किताब सदा भारी है,
हर बुद्धिमान ने
उसकी आरती उतारी है
अब पुनः सोच ले तू
किताब बनेगा या
सस्ता मोबाइल ?
तू किसके साथ है
और किसके लिए है लॉयल!
वेद गीता रामायण
उपनिषद पुराण
यही किताबें तो हैं
जीवन के प्राण,
जीवंतता के प्रमाण,
अब सोच ले फिर से
कि किताब बनेगा
अथवा चालू चीज मोबाइल?
शुभमस्तु,
29.05.2026◆6.00आ०मा०
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