शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

येन केन प्रकारेण [ अतुकांतिका ]

 249/2026


              

©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


येन केन प्रकारेण

अपना उल्लू सीधा हो,

दुनिया जाए भाड़ में

अपना काम बने

हमेशा रहो तने।


न कोई नीति

न बचा धर्म,

खोटे होने लगे कर्म,

पाषाण का बना मर्म,

न रहा आँखों में पानी

यही है कहानी।


जितना भी सम्भव हो

हल्ला मचाओ,

किसी न सुनो

बच्चों को बर्गलाओ,

पथ भ्रमित कराओ,

स्वतंत्रता की निशानी।


पहले हम बाद में कुछ और

हमारे सिवाय भला

कौन होगा सिरमौर

ऐसा ही है आज का दौर

न माँ-बाप न पति

प्रेमी से ही

पत्नियों की 'सद्गति',

संस्कार शून्यता

पतन की पराकाष्ठा

मानव की मूढ़ता।


संसद में 

सांसदों की असंसदीय भाषा

क्या इनके लिए

किसी दंड का प्राविधान नहीं?

चल रहा है देश और समाज

येन केन प्रकारेण।


सिर चढ़कर

बोलता है विनाश

चिंता नहीं 

यद्यपि होता रहे उपहास,

आम आदमी और

पढ़े-लिखे गँवारों में

क्या कोई भेद शेष है ?

जंतर मंतर पर

मेष ही मेष है।


शुभमस्तु,


30.07.2026◆ 9.45 प०मा०

                    ◆●◆

क्या खूब किसानी!चली गई [ नवगीत ]

 248/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दो -दो बैलों की

 जोड़ी की

क्या खूब किसानी!  चली गई।



वेला थी ब्रह्म मुहूर्त

कृषक भारत का

तज  अपनी शैया 

लेकर बैलों की

जोड़ी को 

धर जुआ कन्ध खेता नैया

अब दौड़ रहे हैं

खेतों में ये ट्रैक्टर

वह अमर निशानी ,छली गई।


तारों से चमकी 

रातों में

खेतों में 'तिक-तिक'  सुनते थे

तब कृषक वीर

हल सीत खुभा

बिटिया के सपने बुनते थे

अब थरथर-टरटर

फोड़ती कान

गोवत्स कहानी ,दली गई।


अब बैल कहाँ

कल-युग आया

चरसा न रहट गाड़ी न रहीं

रथ रब्बे विदा हुए सारे

बछड़े न रहे 

बछड़ी न कहीं

धरती माता की

वह पीढ़ी

व्यवसाय बनिज की गली गई।


शुभमस्तु,


28.07.2026◆ 1.30 आ०मा० (रात्रि)

                     ◆●◆

जंतर मंतर पर है खटखट [ गीतिका ]

 247/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जंतर   मंतर   पर   है    खटपट।

तिलचट्टों   की   भारी  खटखट।।


कहते  तुम्हें    न  आता   शासन,

दौड़  रहे  सड़कों  पर  छट-छट।


लक्ष्य     भूल    बैठे   वे    सारा,

नर्तित    मद    में   फैलाए लट।


अभिनय  मजा मौज  मस्ती का,

भरे    जा    रहे    पापों का घट।


छात्र      न्यून       बहुतेरे    गुंडे,

बस   हल्ले   की   लगी हुई रट।


संसद    रोड   हो   गया   दूषित,

बने  हुए   कोरे    अभिनय-नट।


बढ़ता है जब    दूषण   घर    में,

कॉकरोच  तब   जाते   हैं   डट।


बिना  बहाए     स्वेद   देह    का,

जाते  हैं   तब  मुफ्तखोर    अट।


'शुभम्' कहे क्या   हाल देश का,

खटमल मसक फिरें यमुना तट।


शुभमस्तु,


27.07.2026◆6.45 आ०मा०

                    ◆●◆

तिलचट्टों की भारी खटपट [ सजल ]

 246/2026



समांत          : अट

पदांत           :अपदांत

मात्रा भार     :16.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जंतर   मंतर   पर   है    खटपट।

तिलचट्टों   की   भारी  खटखट।।


कहते  तुम्हें    न  आता   शासन।

दौड़  रहे  सड़कों  पर  छट-छट।।


लक्ष्य     भूल    बैठे   वे    सारा।

नर्तित    मद    में   फैलाए लट।।


अभिनय  मजा मौज  मस्ती का।

भरे    जा    रहे    पापों का घट।।


छात्र      न्यून       बहुतेरे    गुंडे।

बस   हल्ले   की   लगी हुई रट।।


संसद    रोड   हो   गया   दूषित।

बने  हुए   कोरे    अभिनय-नट।।


बढ़ता है जब    दूषण   घर    में।

कॉकरोच  तब   जाते   हैं   डट।।


बिना  बहाए     स्वेद   देह    का।

जाते  हैं   तब  मुफ्तखोर    अट।।


'शुभम्' कहे क्या   हाल देश का।

खटमल मसक फिरें यमुना तट।।


शुभमस्तु,


27.07.2026◆6.45 आ०मा०

                    ◆●◆

पाँच क्षणिकाएँ

 245/2026


      

            

       ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

               -1-

प्राचीन काल में

हम मंदिर बनाते थे

और विदेशी आक्रांता

लूट लेते थे,

आज मंदिर भी

हम बनाते हैं

और लूट भी

हम ही लेते हैं।


        -2-

भगवान को

हम कब

 मान्यता देते हैं?

या तो भगवान में आस्था हो

अथवा डर,

आज हमारी 

भगवान के प्रति

आस्था है न डर,

इसीलिए तो

लूटे जा रहे हैं

हमारे ही द्वारा

भगवान के मंदिर।


            -3-

नियम कानून 

ताक पर हैं,

लज्जा हया

नाक पर हैं,

जब सारे वस्त्र ही

 उतार दिए

नंगों का कोई 

कर भी क्या लेगा ?


                 -4-

जो लक्ष्य विधान से

संविधान से न मिले

नंगई से 

अवश्य मिल जाता है,

इसलिए नंगों का

बहुमत बढ़ रहा है,

और संविधान

ताक पर टंग रहा है।


             -5-

नंगा नाचे देखे कौन?

नज़र पड़े तो

सब हैं मौन,

क्या कर लोगे

हमने अपनी उतार दी

तोड़ दी सारी हदें,

तुम भी चाहो तो

कर लो पूरी हसरतें!


शुभमस्तु,


26.07.2026◆ 5.45 आ०मा०

                   ◆●◆

तेरा क्या वश [ गीत ]

 244/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तेरा क्या वश

देह-तंत्र पर

स्वतः अहर्निश चलता।


धड़-धड़ धड़-धड़

हृदय धड़कता

प्राणवंत कहलाए

शक्त-केंद्र

मस्तिष्क शीर्ष पर

तुझको नित्य चलाए

यकृत वृक्क

श्वास फुफ्फुस भी

कभी न तुझको छलता।


हस्त पाद

दो नयन कान की

अपनी -अपनी माया

जीभ नासिका

शीश केश की

अपनी-अपनी छाया

बतला क्या

ये तेरे वश में

इतरा मनुज मचलता।


पाचन ओज -

ग्रहण में तेरी

नहीं भूमिका कण भी

करें विसर्जन

अंग देह से

रहे अवांछित तृण भी

जन्म मृत्यु

क्या तेरे वश में

सूरज तेरा ढलता।


पाकर देह

ऐंठता क्यों तू

तन पर क्रीम सजाए

श्यामल-श्वेत 

रंग कब तेरे

इत्र सुगंध लगाए

एक दिवस

हो हस्र सभी का

एक समान सँभलता।


इच्छा से

आया न जगत में

निज इच्छा कब जाए

मात-पिता 

जो दाता तन के

उनको ही लतियाये

मौन साध

जाता जगती से

हाथ नहीं तू मलता।


शुभमस्तु,


26.07.2026◆4.30 आ०मा०

                     ◆●◆

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

छुछून्दर के सिर में [ नवगीत ]

 243/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छुछूँदर के

सिर में

चमेली का तेल।


बरसाती मेढकों की

टर्र-टर्र 

पोखर को जगाया है

घूरे के  ढेर  पर

कुकुरमुत्ता

उग आया है

कॉकरोच भी

लगा रहे हैं

संसद की सेल।


मुद्दा है एक यही

शांति न रहे

कोई कुछ कहे

हम तो

सदा से भेड़ थे

भेड़ ही रहे

मूँछों को

ऐंठ  कर

फेंकना है ढेल।


साजिश ये

देश को बर्बाद 

करने की है

शांत  शुद्ध 

पानी में

धरना धरने की है

चलती हुई 

गाड़ी को 

करना ही है डिरेल।


शुभमस्तु,


22.07.2026◆3.15 प०मा०

               ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...