गुरुवार, 23 जुलाई 2026

छुछून्दर के सिर में [ नवगीत ]

 243/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छुछूँदर के

सिर में

चमेली का तेल।


बरसाती मेढकों की

टर्र-टर्र 

पोखर को जगाया है

घूरे के  ढेर  पर

कुकुरमुत्ता

उग आया है

कॉकरोच भी

लगा रहे हैं

संसद की सेल।


मुद्दा है एक यही

शांति न रहे

कोई कुछ कहे

हम तो

सदा से भेड़ थे

भेड़ ही रहे

मूँछों को

ऐंठ  कर

फेंकना है ढेल।


साजिश ये

देश को बर्बाद 

करने की है

शांत  शुद्ध 

पानी में

धरना धरने की है

चलती हुई 

गाड़ी को 

करना ही है डिरेल।


शुभमस्तु,


22.07.2026◆3.15 प०मा०

               ◆●◆

पनपने लगे कॉकरोच! [ अतुकांतिका]

 242/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखकर घोड़े को 

ठुकवाते हुए नाल

मेढकी ने भी सोचा

मैं भी ठुकवा लूँ,

अपनी टाँगों को

और भी मजबूत बना लूँ।


बैठ गई वह भी 

ठुकवाने नाल,

पहली ही चोट में

बिगड़ गया हाल,

क्या करती बेचारी

टाँगें फैलाईं और

चारों खाने चित्त! 


यही हाल है

 कॉकरोचों का,

चौबे जी छब्बे जी

 बनने गए थे

दुब्बे जी बनकर चले आए,

क्या करते बेचारे

बहुत -बहुत पछताए!


बढ़ गया जब

बहुत सारा प्रदूषण,

कॉकरोच पनपने लगे,

संसद की कुर्सी के हित 

लार टपकाने लगे,

गंदगी से उगे कीटों का

यही हस्र होता है,

हुआ भी वही।


होती है जब  बरसात

उगते ही हैं कुकुरमुत्ते,

देखते नहीं रस्ते कुरस्ते

फिर क्या भेड़चाल में

निकल पड़ते हैं,

जंतर मंतर पर

ढूंकने लगते हैं,

सियासत का नया- नया

स्वाद चखने के वास्ते।


देश की समस्याएँ

कीड़े-मकोड़ों का खेल नहीं,

पीं- पीं करती 

बच्चों की रेल नहीं

ठीक है लोकतंत्र 

 बहुमत का 

परिणाम है,

लेकिन इतना भी

सस्ता नहीं की

गीदड़ गङ्गा पार उतर जाए!


शुभमस्तु,


22.07.2026◆2.30प०मा०

                  ◆●◆

कॉकरोच [ दोहा ]

 241/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूषण   का  उत्पाद हैं,  कॉकरोच के झुंड।

रेंगें   शुद्धाहार  में, चमकाते    निज  मुंड।।

कॉकरोच बढ़तेतभी,जब हो रुग्ण समाज।

रहें   उपेक्षित   वे सदा,बनें कोढ़ में खाज।।


नहीं जरूरत देश को , कॉकरोच की आज।

बढ़ते स्वच्छ समाज में, करें अहं पर नाज।।

कॉकरोच   सुनते   नहीं,झूठ   बनाते बात।

कहते बस   उनकी सुनो,करें  अन्यथा घात।।


कब-कब शासन में रहे,कॉकरोच मतिहीन।

दूषण   पर जो पल रहे,सदा -सदा से दीन।।

जंतर -मंतर   रोड    पर,संसद   पर है ढेर।

कॉकरोच   बढ़वार  का,कहते  हैं हम शेर।।


किटकिन्ना    आता   नहीं,संविधान का लेश।

कॉकरोच   चिल्ला   रहे, बढ़ा   शीश के केश।।

बहकावे   में   आ   गए,  कॉकरोच   के झुंड।

अमराई    में     रेंगते,   पालित काकभुशुंड।।


कॉकरोच   शासन    करें, तब   हो बंटाढार।

नियम नीति कानून का, नहीं  जहाँ आधार।।

नाले-नाली   में बना, जिनका   मूल निवास।

कॉकरोच   वे   चाहते, संसद   में लें श्वास।।


कॉकरोच   जन  पार्टी, वर्षा का उत्पाद।

कूकरमुत्ते   उग  रहे, चाहत लेना स्वाद।।


शुभमस्तु,


22.07.2026◆2.00 प०मा०

                    ◆●◆

छरर -छरर छर बरसें [ गीत ]

 240/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छरर-छरर छर

छर-छर बरसें

आसमान से बूँदें।


फैला अपने

हाथ हथेली

भर-भर अँजुरी पीते

जेठ मास के

प्यासे मानव 

थे मुरझाए जीते

गिरतीं बूँदें

जब पलकों पर

नयन सभी हम मूँदें।


आँगन

गली- गली में बालक

क्रीड़ा में हैं लीन

छपर-छपर छप

छप -छप जल की

तैर रहीं  ज्यों मीन

नव किशोर

बालाएँ जल में

नाच-नाच कर कूदें।


तरु पल्लव

हरियाये कोमल

टपर-टपर टप होती

गिरें धरा पर

हरी घास पर

बिखर रहे ज्यों मोती

बिजली- सी

दौड़ती देह में

बूँद मेह की छू दें।


शुभमस्तु,


21.07.2026◆10.30 आ०मा०

                  ◆●◆

मधुकर के मन में बसी [ गीतिका ]

 239/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधुकर के मन में बसी,पाटल मधुर सुवास।

झूम-झूम मँडरा रहे,खिली कली के पास।।


तितली  भँवरे से कहे, चलो चलें उस ओर,

कोयल करती काग से,बगिया में परिहास।


कोयल - कागा   से  नहीं,  लेना-देना   एक,

और नहीं   सम्बंध  भी,उनसे अपना खास।


सब अपनी रुचि से करें,अपने काम अनेक,

टाँग फटे में क्यों अड़ा,हमको करनी आस।


सबके सूरज-चाँद का,अलग-अलग है तेज,

जुगनू निकले रात में,सीमित सफल उजास।


नेताजी  नित   चाभते,  काजू   या अखरोट,

गाय  भैंस  बकरी सभी, चबा  रहे बस घास।


'शुभम्' तुम्हारी   राह हैं,अलग-अलग अभिप्रेत,

अलग -अलग जीते सभी,अलग मिले हैं श्वास।।


शुभमस्तु,


20.07.2026◆6.30 आ०मा०

                     ◆●◆

झूम -झूम मँडरा रहे [ सजल ]

 238/2026


    

समांत           : आस

पदांत            : अपदांत

मात्रभार         :24.

मात्रा पतन      :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधुकर के मन में बसी,पाटल मधुर सुवास।

झूम-झूम मँडरा रहे,खिली कली के पास।।


तितली  भँवरे से कहे, चलो चलें उस ओर।

कोयल करती काग से,बगिया में परिहास।।


कोयल - कागा   से  नहीं,  लेना-देना   एक।

और नहीं   सम्बंध  भी,उनसे अपना खास।।


सब अपनी रुचि से करें,अपने काम अनेक।

टाँग फटे में क्यों अड़ा,हमको करनी आस।।


सबके सूरज-चाँद का,अलग-अलग है तेज।

जुगनू निकले रात में,सीमित सफल उजास।।


नेताजी  नित   चाभते,  काजू   या अखरोट।

गाय  भैंस  बकरी सभी, चबा  रहे बस घास।।


'शुभम्' तुम्हारी   राह हैं,अलग-अलग अभिप्रेत।

अलग -अलग जीते सभी,अलग मिले हैं श्वास।। 


शुभमस्तु,


20.07.2026◆6.30 आ०मा०

                     ◆●◆

रविवार, 19 जुलाई 2026

न ही अयोध्या मैं गया [ दोहा ]

 237/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न   ही  अयोध्या    मैं गया,  और न देखे  राम।

चोर   चढ़ावा ले  उड़े,  मैं  गिर  पड़ा धड़ाम।।

राम न माना   राम  को,  समझा  बस पाषाण।

चोर डाकुओं का करें,राम कवन विधि त्राण।।


चोर   चढ़ावा     चोरते,मौन  खड़े   सब श्वान।

लगता स्वीकृति   मौन   थी,चोरों   से पहचान।।

श्वान-चोर   की   मित्रता, देख अयोध्या धाम।

भौंचक    हैं  श्रीराम  जी,  खबर   हुई  है आम।।


भरता जब घट पाप का,कब तक रखो सँभाल।

देख   दान-धन  चोर  की,टपक उठी मुख  राल।।

पहले   ही   मुख   श्याम था,काला है अब  देख।

ग्रीवा -दर्पण    झाँक  ले,अमिट   काल का लेख।।


श्वानों    के   ही   सामने,  चुरा   रहे  धन चोर।

मौन धरे   सब  श्वान वे,हिली   न  रसना कोर।।

चोरों   के   सरदार   जो,  छुई न उनको आँच।

नोट-गणक  जलते सभी,इने-गिने   दस पाँच।।


चोरों   के   सरदार  का, बहुत बड़ा   आतंक।

शासन    की   चूलें   हिलीं,  मार  रहे वे डंक।।

छाँव   सियासत    की   बुरी,  रामालय  के  बीच।

रक्षक   ही   भक्षक   बने, बिखर   गई   है   कीच।।


लगता   है    अनुमान   ये, बैठे   चोर लबार।

देवालय   के    साँप    हैं, नहीं   पड़ेगी पार।।


शुभमस्तु,


17.07.2026◆ 1.30 प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...