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रविवार, 14 दिसंबर 2025

झुनझुना [ व्यंग्य ]

 736/2025 


 

 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 झुनझुना पकड़ा के,पल्ला झाड़ लेते हैं।

 देश के नेता ज़मीं में गाड़ देते हैं।। 

 आदमी का झुनझुने से परिचय कोई नया नहीं है।शैशवावस्था से ही जब माता -पिता ने झुनझुना पकड़ाया तो उसे जानने पहचानने में कोई भूल नहीं हुई।समझदारी आने पर जब पहली बार हमें झुनझुना पकड़ाया गया, हमें तुरन्त याद आ गया कि मम्मी हमें रोने से चुप कराने के लिए झट से झुनझुना पकड़ा दिया करती थीं। झुनझुना तो हमारा संस्कार है।इससे हमारा पुराना नाता है,बड़ा प्यार है। यह तो हमारा पुराना लँगोटिया यार है।इसको जानने और पहचानने में भला भूल कैसे हो सकती है ! इसीने तो हमें रोते से चुपाया है, कितनी ही बार माँ ने हमें बहकाया है।जरूरत पड़ी तो बजाया है और हमें भी बजा के दिखाया है। इस झुनझुने ने ही हमारा ध्यान डायवर्ट किया है।इसे तो बचपन से ही हमने बड़ी अच्छी तरह जिया है। 

 अब इस समय यह फिर हमारे सामने मुखौटा लगाकर आ गया। हमारी मन और बुद्धि पर छा गया। चलो खैर ,फिर से इसके नए रूप को आजमाते हैं और बहुरूपियों के इस बहुरूपिया को क्यों सुहाते हैं। वस्तुतः यह झुनझुना कम धोखा ज्यादा है।अब बड़े होने पर भी ये हमें समझ रहा नादाँ है।ये समझता है कि इसकी झनझनाहट से हम अपने अस्तित्व और अस्मिता को भूल पाएँगे और अब भी इसकी भूलभुलैया में भूल जाएँगे। 

 झुनझुना पकड़ाने वालों में किस- किस के नाम गिनाएं। और किस -किस से दें इनकी उपमाएँ। इन पर तो लिखी जा सकती हैं,बड़ी -बड़ी कविताएँ।झुनझुना दाताओं में पूरी बारात की बारात है।इन सबकी एक ही मंशा है कि हमारे ऊपर इन्होंने लगाई हुई घात है।अधिकारी अपने कर्मचारी पर, व्यभिचारी किसी नारी पर,बेईमान ग्राहक ,बिचौलिया और कराधिकारी व्यापारी पर झुनझुने की घात लगा रहा है।नेता जनता को आश्वासन का झुनझुना थमा कर वोट बटोर रहा है।दलाल दोनों हाथों से पैसा टटोल रहा है।ये सभी झुनझुनेबाज हैं। झुनझुनों के सरताज हैं।एक दूसरे को बहका रहा है।अपने महलों को महका रहा है। 

 झुनझुना एक छल है,छद्म है।प्रापक के लिए सुमन पद्म है और दाता के लिए एक बलि के शीश पर रखा कदम है। ये मोबाइल कंपनियां कोई कम झुंझुनेबाज नहीं हैं। झुनझुना थमाने में कोई किसी से कम नहीं हैं।एक से एक बड़ी बाजी मार लेना ही इनका मक़सद है। झुनझुने में ही तो एजेंटों की रसद है। उपभोक्ता की किंचित सी मदद है। इसी बात का इनका एलान है अहद है।झुनझुने का एरिया बड़ा ही वृहद है।भले ही उपभोक्ता का नहीं इतना बड़ा कद है।अमीर पर कोई फर्क नहीं पड़ता और झुनझुने के बोझ तले गरीब निपट जाता है।पर इससे उन्हें क्या ? वे झुनझुने बजाकर लुभाए जा रही हैं।अपना -अपना इतिहास बनाये जा रही हैं। 

 आदमी जन्म से झुनाझुना प्रेमी तो था ही, अब उसे झुनझुना जीवी बना दिया गया है।बिना झुनझुना पाए वह बहलता ही नहीं,उसका स्टेटस बदलता ही नहीं। झुनझुना के नाम पर उससे कुछ भी करवा लो, वह अहर्निश तैयार है।झुनझुना उसकी दाढ़ से ही नहीं लगा,उसकी दाढ़ी में भी उलझ गया है।अब झुनझुना आदमी की आवश्यकता ही नहीं,अनिवार्यता है। यह एक जरिया भी उसके सुधार का है।भला कौन है जो सुधरना नहीं चाहता।यदि सुधार इसी से होना हो तो हो ले।फिर क्यों देखेगा वह पैरों में पड़े फफोले।इसके लिए उसे तेज दौड़ना पड़े या चाल रहे हौले -हौले। पर उसे चमकाने हैं विकास के नभ में गोले। टीवी, अखबार ,विज्ञापन, सोशल मीडिया सभी पर झुनझुनों की भरमार है। झुनझुना ही तो आज भगवान का अवतार है। इसीलिए भिखारियों से भी बड़ी लगी झुनाझुनों की कतार है।अब यह अलग बात है कि कोई गाए फाग या सावनी मल्हार है। अब फिर से क्या बताएँ झुनझुने से तो आदमी का बचपन का दुलार है। वह उसका एकमात्र लँगोटिया यार है। 

 शुभमस्तु ! 

 14.12.2025●4.30 प0मा0 

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शनिवार, 13 दिसंबर 2025

गाँव चला शहर की ओर [ व्यंग्य ]

 732/ 2025 


 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 गाँव शहर की ओर दौड़ रहा है ,दौड़ा जा रहा है। थामे थम नहीं रहा है वह सोच रहा है कि जल्दी से जल्दी वह गाँव से शहर हो जाए।कितनी जल्दी ईश्वर की महर हो जाए कि वह शहर की लहर हो जाए। अब वह गाँव नहीं बने रहना चाहता।उसे किंचित मात्र भी सब्र नहीं है।गाँव के शहर होते चले जाने से किसी को कोई उज्र नहीं है।गाँव अपने ग्रामत्व से संतुष्ट नहीं है, अंदर ही अंदर वह वह रुष्ट ही है।पहले वह पढ़ता नहीं था, आज पढ़ रहा है ,नए नए प्रतिमान गढ़ रहा है और आगे और आगे बढ़ रहा है।उच्च शृंगीय तुंग शिखरों पर चढ़ रहा है। अब वह गाँव नहीं कहलवाना चाहता।वह अपने पाँव पीछे भी हटाना नहीं चाहता। वह शहर ही हो जाना चाहता है।उसका मन गाँव के एकांत से ऊब गया है। अब उसे शहर की चहल-पहल भा रही है। अब कोयल की कम, मोटरों की पों पों लगता है ; कुछ सुना रही है।गाँव की वीरानगी उसे डुबा रही है। 

 क्या कभी किसी ने शहरों का मन टटोला है ?क्या शहरों से कभी किसी ने कुछ शांति पूर्ण ढंग से बोला है? जो भी यहाँ रहा है या रहने आया है, सदा विष घोला है।गाँव और शहर का सब घालमेल हो गया है।आदमी से आदमी का तालमेल खो गया है ।इसलिए आदमी शहर में रहकर भी बिला गया है।आँसू दिखाई नहीं दे रहे,भीतर से तिलमिला गया है। गाँव में रहकर उसके अस्तित्व की पहचान है। शहर में आकर लगता है कि वह मेहमान है। हर समय तानी हुई कमान है। हर तीसरा आदमी उससे अनजान है।

 शहर को शांति की तलाश है।इसीलिए वह अपने चेहरे पर दिखता निराश है।यद्यपि शहर में सुविधाएं सभी हैं ,पर यहाँ खुले हुए खेत और नीम के पेड़ की हवा की कमी है।न यहाँ बागों में कोयल की मधुर बोली है,न बच्चों की उच्छऋंखल किलकारी है न ठिठोली है।न मेंड़ के पीछे दूर जंगल में मेहो-मेहो करते मोर हैं और न दूर पूरब में होता हुआ सुनहरा भोर है। यहाँ सब कुछ बनावटी है और गाँवों से ही आयातित है। आदमी अंदर ही अंदर कितना व्यथित है। यहाँ बीमारियां हैं तो दवाएँ भी हैं।गाँव में अभाव हैं तो संवेदनाएँ भी हैं। यहाँ सब कुछ दिखावट है, प्लास्टिक के फूल पौधों की सजावट है।सुख है पर शांति नहीं है। प्रकृति से निरंतर बढ़ती हुई दूरी है। यहाँ बहुत कुछ होकर भी बहुत मजबूरी है। 

 गाँव और शहर मिल रहे हैं। जिज्ञासु चेहरे खिल रहे हैं।कुछ मिला है तो गाँव में बहुत कुछ खोया है। गिल्सरीन के आँसू ने चेहरा भिगोया है। औपचारिकताओं की भरमार है। आदमी की इज्जत तार -तार है।पैसे और धन की चकाचौंध है। आदमी को निज स्वार्थ का बोध है। यहाँ नहीं हैं ओसारे और झोपड़ियों में जलते हुए अलाव, यहाँ नहीं है गौरैया की चूँ चूँ और कागा की काँव- काँव, भले नहीं जलते अब खुली रेत में पाँव ,पर अभी भी जिंदा है वहाँ बरगद की घनी छाँव। 

 गाँव का मशीनीकरण हो गया है। न दो बैलों की जोड़ियाँ हैं, अब तो धड़धड़ाते हुए ट्रैक्टर हैं ,ट्रॉलियाँ हैं।न चरसे न ढेंकुली न नहर बम्बे का पानी। अब कौन है जिसको रात- रात भर कहानियाँ सुनाएगी उसकी बूढ़ी नानी।घर- घर सबमर्सिबल हैं ,ट्यूबवेल हैं, न रेतीली जमीन है ,बस डामरीकृत काली-काली सड़कें हैं। हाथ-हाथ में मोबाइल यहाँ भी है। चला जा रहा है वह कान से स्मार्टफोन दबाए। न किसी की सुने बस अपने में ही मस्त उड़ा जाए। गाँव दौड़ रहा है शहर की ओर और शहर भर रहा है कुछ और ही हिलोर। दोनों का संगम हो रहा है। रंग में तरंग का च्वंगम चुस रहा है। सड़कों और कंक्रीट के ऊँचे भवनों का जमघट है। न कहीं टेंट में बरात है न पनघट हैं। सब कुछ कलमय है। कलयुग जो चल रहा है। आदमी आदमी मचल रहा है। विकास का विवेक नहीं ,विकास की आँधी है। आदमी ने आदमी की लक्षमण रेखा जो लाँघी है। 

 शुभमस्तु !

 13.12.2025●1.15 आ0मा0 

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रविवार, 7 दिसंबर 2025

चटखारे [ व्यंग्य ]

 713/2025


          

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

यों तो दाल-रोटी या सब्जी -रोटी नित्य नियमित रूप से खाना है,किंतु वहाँ कभी किसी के लिए 'चटखारे' का भाव नहीं आना  है ;क्योंकि हर नर -नारी बाल युवा या वृद्ध के लिए यह ढर्रा पुराना है। 'चटखारा' एक ऐसा भाव है जो सहज और सरल रूप में नहीं ही आता। जब यह आता है तो व्यक्ति से फिर रहा नहीं जाता। चटखारे लेने के लिए वह पगहा तक तुड़ाता। जब तक चटखारे न मिल जाएं,वह आपे में नहीं समाता। अंततः चटखारा है ही ऐसी चीज कि व्यक्ति दीवाना हो जाता है।

यों तो चटखारे लेने के लिए इस संसार में अनेक खाद्य व्यंजन हो सकते हैं।यह अलग-अलग व्यक्ति पर लागू होता है कि कौन किसमें चटखारे लेता है। हम तो  यहाँ मात्र एकसूत्री चर्चा के चटखारे लेने के लिए बैठे हैं तो चटखारे भी उसी के लेंगे।एक के चटखारे में दूसरे से रसभंग भला कौन करे,इसलिए जिसके लिए आए हैं,उसी के चटखारे लेंगे,अन्यथा फिर तो वही बात हो जाएगी कि आए थे हरिभजन को और औटन लगे कपास। हमें कपास नहीं औटना है। हरि भजन ही करना है।

अब विलम्ब क्यों करें,जिसके चटखारे लेने हैं ,उसी रास्ते पर चलें और अपनी मंजिल ग्रहण करें।तुरंत ही मुद्दे की बात पर आते हैं और आपको सबको 'गोलगप्पों' के चटखारों का लुत्फ दिलवाते हैं। वैसे इसमें अन्यथा लेने की कोई बात नहीं ,गोलगप्पा - प्रिय सभी भाभियों, सालियों, सलहजों,आँटियों और सर्व आदरणीआओं को निमंत्रण भिजवाते हैं  कि चलो चलो चलो आ गया , मंदिर वाले बरगद के नीचे गोलगप्पे वाला आ गया।वह कब से अममन्त्रण -बैल बजा रहा है,अपने ठेले पर गोलगप्पे सजा रहा है,मोहल्ले भर की बालिकाएँ,किशोरियाँ,खट्टे नमकीन चरपरे स्वाद की पिटारियाँ घिर रही हैं और अपनी-अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं। यों तो किशोर युवा भी खड़े हैं, वे चटखारे लेने के लिए उतावले बड़े हैं।

बहुत अच्छा किया कि मेरी एक आवाज पर आप सब पधार गईं। गोलगप्पे चीज ही ऐसी कि उसके नाम से ही मुँह में पानी भर-भर आता है। यहाँ खड़े -खड़े खाने में भला कौन शरमाता है! यहाँ तो नई- नई आई हुई  दो -दो फुटी घूँघट वाली नवोढ़ाएं भी दौड़ी चली आती हैं,घूँघट को किंचित टेढ़ा सरकाती हैं और गप्प गाल में गोलगप्पा सरकाती हैं।गोलगप्पे की लाइन में खड़े-खड़े वे पूर्ण अनुशासिता रहती हैं, वैसे उनकी जबान भले ही पल भर को बंद न हो,यहाँ पर मौन खड़ी गप्प से मुँह के अंदर गपकाती हैं।यहाँ एक क्षण की भी जल्दबाजी नहीं दिखातीं,हाथ में दोना लिए हुए अपनी बारी का इंतज़ार करतीं और अंदर ले जातीं।किसी ने बीस के खाए ,किसी ने तीस के और किसी किसी ने तो पचास के लुढ़काए। पर आखिर करें क्या  पेट भले भर ले,पर तृप्ति नहीं हो पाए।पर जो शुरू हुआ है ,उसका अंत भी होना है। भले ही गोलगप्पों का स्वाद कितना ही चटपटा और सलोना है।

अंत में ला दी एंड कर, एक सूखा और मीठा और खिला दे,और एक दोना हरा खट्टा इमली का पानी  भी पिला दे। पर मन है कि हटता ही नहीं।चटखारे पर चटखारे चल रहे हैं,उधर खड़े कुछ किशोर मचल रहे हैं कि ये हटें तब जाएँ और हम भी चटखारे का स्वाद ले पाएँ।

बात ऐसी नहीं कि पुरुष नहीं खाते, पर वे कभी दीवानगी की सीमा तक नहीं जा पाते।वे तो बस औपचारिक रिश्ता निभाते हैं,जैसे पत्नी या साली जी के संग खा लिया, किसी भौजी के आग्रह पर पा लिया।ठीक वैसे ही जैसे होली का गीत सावन में गा लिया।

चटखारे के लिए जीभ ही नहीं मन की भी अहं भूमिका है। बनाने वाले ने उनकी जीभ और मन दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित किया है।जीभ और उनके मन का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।खटास और चरपराहट का कोई विशेष नाता है,जहाँ यह मिलता है कोई लेशमात्र नहीं शरमाता है।जो लुत्फ ठेले के चारों खड़े होकर खाने में आता है,वह कुर्सी- मेज पर बैठकर किसी होटल में कहाँ ? सबका अपना अपना-अलग ही महत्व है। तभी तो ठेले के गोलगप्पों का अस्तित्व है। अब आप यह मत कह दीजिए कि यह तो पूरा का पूरा स्त्रीत्व है। दो चार फीसद पुरुष भी इन चटखारों के स्वादी होंगे।पर बहुमत तो बहूमत से ही बना है,इसलिए गोलगप्पे वाला यहाँ आकर रोज होता खड़ा है। जहाँ बहूमत बढ़ा की बहुमत का मीटर चढ़ा।यह तो एक प्राकृतिक पसंद की बात है। जब प्रकृति प्रेमी जो चाहते हैं,वह सब कुछ यहाँ सहज सुलभ हो जाता है। इसीलिए कहा है:-----


गोल-गोल गप्पे यहाँ,जब तक खाने खाँय।

प्राण गए  परलोक में, जाय नहीं पछिताएँ।।


चटखारे  लेती   रहो,  जब  तक  नामा पर्स।

खाती गप्पे गोल   तुम,  करना  नहीं अमर्ष।।


जीभ  कहे ललकार के, चल बरगद की छांव।

उड़ने    अब कैसे   लगे,  भाभी जी के पाँव।।


तीखा चटपट मिर्च का,इमली भरी खटास।

गोल   गोल   गप्पे भरे ,आलू  मटर भरास।।


समाहार   के  वास्ते,   मीठा   भी   दे  एक।

दोना भर खटजल  मिले,जागे बुद्धि विवेक।।


शुभमस्तु !


06.12.2025●11.45आ०मा०

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रविवार, 9 फ़रवरी 2025

मैं व्यंग्य हूँ [ व्यंग्य]


069/2025 

 

 ©व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 कोई मुझे कितना ही टेढ़ा कहे,पर मैं अपने चाल -ढाल में सीधा हूँ।हाँ,इतना स्प्ष्ट है कि मैं मुंहफट हूँ।सच बात कहने में किसी से डरता नहीं, किसी के दबाव में नहीं रहता। जो भी कहता हूँ, बेबाक ही कहता हूँ। इसी बात पर लोग मेरे ऊपर टेढ़ा चलने का दोषारोपण करते हैं।ये गलत है। आज मैं अपनी बात आप ही बताने चला हूँ। अब तक मेरे कर्ता को आप पचास वर्षों से औरों की सड़क पर औरों को चलवाते हुए देखते रहे। आज आप मुझे मेरी अपनी ही चाल में चलायमान,गतिमान और प्रगतिमान देखेंगे। 

 मेरा उद्देश्य कभी किसी की हँसी उड़ाना अथवा अपमानित करना कदापि नहीं होता। बस यथार्थ को सबके सामने लाना होता है। कविता में जहाँ आदर्श पर मखमली दुशाला ओढ़ा दिया जाता है,वहीं मैं उस पर कोई आवरण नहीं डालता।आवरण के बिना तो आदमी को भी असभ्य करार दिया जाता है,यह तो निश्छल अभिव्यक्ति है। मैं कोई शृंगार की साड़ी और आभूषणों में लिपटी हुई नायिका नहीं, कोई कविता नहीं ;खुला हुआ संदेश हूँ। अब किसी को भला लगे या बुरा;मैं इसकी कभी कोई चिंता नहीं करता। अब मेरे सामने चाहे नेता हो या अभिनेता, मंत्री हो या संतरी, बहीखाता हो या जंत्री,अधिकारी हो या कर्मचारी, मिलावटखोर हो या गबनी,झाड़ू हो या छलनी सबकी सही -सही बात कहनी।अब इसे आप मेरी प्रकृति कहें या दोष।जब कहता हूँ एक- एक सच बात, तो खो देता हूँ होश। इतना बेहोश भी नहीं कि किसी मधुपाई की तरह औंधे मुंह नाले की शोभा बढाऊँ। मैं अपनी सहज और स्वाभाविक राह से कभी इधर -उधर नहीं जाऊँ।इसी बात के कारण तो आलोचकों का बुरा कहलाऊँ।

 मैं कोमलांगिनी कविता की कमनीयता की तरह कोमल नहीं हूँ। अलंकारों से अलंकृत ,रसों की झंकार से झंकृत कोई नृत्यांगना नहीं, लंगोटधारी नट हूँ।अपनी कथनी और करनी में उद्भट हूँ। बातों के बतासे नहीं खिलाता और न ही रस के रसोगुल्ले ही चटाता। मैं चटपटी चटनी के संग कुछ तीखे कुछ रूखे भल्ले ही छकाता।

 मैं थोड़ा खुरदरा अवश्य हूँ। अब मेरा खुरदरापन किसी को चुभे तो चुभे।किसी को फबे या न फबे। जिसकी कमजोर नस पर मेरा हाथ पड़ जायेगा तो वह हँसेगा या खुश तो नहीं होगा, बिलबिलायेगा , अपना रोष बिखरायेगा। पर मुझे अपनी प्रकृति के विरुद्ध काम नहीं करना। मैं किसी नेता का चमचा तो नहीं हूँ,जो किसी की चमचेगीरी करूँ! मक्खनबाजी करूँ अथवा तेल मालिश करूँ? मैं तो अष्टावक्र की तरह हर अंग से वक्र हूँ। कोई ये भी न समझे कि मैं किसी के विरुद्ध रचता कोई कुचक्र हूँ। दूध के दही से बना हुआ खट्टा-तीखा तक्र हूँ। एक आईना हूँ देश और समाज का, व्यक्ति का उसकी शक्ति या आसक्ति का। साहित्य का खुला हुआ दर्पण। जहाँ से लिया ,उसी को अर्पण।जितना ही करोगे इस च्युंगम का चर्वण ,उतना ही रस मिलेगा,करेगा नहीं गड़बड़। 

 मैं वही हूँ,जिसे देखने सुनने से आप डरते हैं।झूठे रस भरे काव्य और गुलाब और जूही की सुगंध से सँवरते हैं। वस्तुतः आप चापलूसी को पसंद करते हैं।कंचन,कामिनि, कुसुम और कलिका ही आपको भले जँचते हैं।हम तो वही शूल हैं जो शूल से शूल का इलाज करते हैं।मैं झूठ को सच बनाकर नहीं दिखाता।मैं सच को ही सच का आईना दिखलाता। मैं न तो बिहारी घनानंद का शृंगार हूँ ,न पंत का प्रकृतिगत उद्गार। निराला की तरह प्रगतिवाद का शंख फूँकता हूँ,किसी कायर कवि की कविता नहीं धूंकता हूँ। सूर तुलसी की तरह भक्ति से दूर हूँ, अपनी नग्न कथनी की कहन में चूर हूँ। न कामायनी की कमनीयता है ,न आँसू की बूँद हूँ,न गोपियों का विलाप हूँ और न भक्त कवि सूर हूँ।बाबा नागार्जुन का आशीर्वाद मुझे सदा से प्राप्त है, उनका एक-एक अक्षर मुझे मंत्र आप्त है। मैं 'व्यंग्य' हूँ , अनुमन्य हूँ।कोई कहे जंगली ,मैं स्वयं कहूँ वन्य हूँ ।आप भले न थपथपाओ मेरी पीठ ,मैं मेरे चहेतों में धन्य हूँ।

 शुभमस्तु !

 09.02.2025●12.00मध्याह्न 

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रविवार, 8 दिसंबर 2024

मोबाइल के बच्चे ! [व्यंग्य]

 552/2024


 ©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

सुबह हो गई है।मोबाइल जाग गए हैं।रात में जो स्वप्न आ रहे थे,वे सब भाग गए हैं।रसोइयों में बर्तनों की खटपट नहीं सुनाई पड़ रही है।पत्नी पति से नई साड़ी के लिए लड़ रही है। उसे कल अपने भैया की शादी में जाना है।यद्यपि कार्डिगन को अटैची में ही सजाना है,उपस्थित जनियों को मात्र दिखलाना है।इसलिए उसे अनिवार्यतः लाना है। यद्यपि साड़ियों से अलमारी अटी पड़ी है, पर वही पुराना सूत्र दुहराना है कि मेरे पास तो साड़ी ही नहीं है ,मैं कैसे जाऊँ। वहाँ जो ठिठुराती हुई ठंड में खुली नंगी पीठ और स्लीवलैस ब्लाउज में निज यौवन चमकाना है।

      सब जागे तो मोबाइल भी जाग गए। वे सोए ही कब थे।किसी पर सुबह वेला के भजन बज रहे हैं तो किसी पर गुड मॉर्निंग और सुप्रभात के मैसेज सचित्र सज रहे हैं।यद्यपि करनी से बहुत दूर है ,पर क्या करे आदमी दूसरों को ज्ञानोपदेश देने के लिए मजबूर है।इसलिए नित्य प्रति भोर वेला में ही जबरन दिए जा रहा है।भले ही उसे कोई ले या न ले। देखते ही डिलीट कर दे और मोबाइल को कचरे का डिब्बा बनने से क्लीन कर ले।कविगण कविता लिखने में मगन हैं।उन्हें नित्य प्रति काव्य लेखन की लगन है। कोई कोई अपना वीडियो बना रहा है और अपना सुंदर सा मुख बिंब सजा रहा है।बच्चे भी कहीं किसी से क्या कम हैं ,वे भी बिस्तर में पड़े -पड़े पी रहे मोबाइली रम हैं।युवा युवती सब नशे में चूर हैं। वे कब समझती हैं वे कम नहीं वे भी धरती की हूर हैं। उनका मन अनेक अदाओं में रीयल की रील में जमता है।कभी नृत्य तो कभी गायन से खूब फबता है।मोबाइल को पल भर का चैन नहीं है।

      मोबाइल बहुआयामी है। बहुमुखी है।आज का आदमी मोबाइल से सुखी है। मुझे तो यही लगता है कि मोबाइल सौ दवाओं की एक दवा है। इसके समक्ष तो 'अतिथि देवो भव' भी हवा है। कोई किसी के घर आया है, उसे दुआ सलाम भी भारी है,उसने अभी उसे एक गिलास पानी तक नहीं पिलाया है । पत्नी- बच्चे बड़े सब अपने -अपने मोबाइल में मगन हैं। सभी की इसी दिशा में भयंकर लगन है।लगता है जैसे घर में कोई है ही नहीं। सन्नाटा पसरा है। न बच्चों की चहल- पहल न कहीं महकता हुआ गजरा है।जब कोई उसे कुछ नहीं पूछता है तो क्या करे बेचारा वह बिना चाय-चारा या भाई चारे के ही पलायन कर जाता है और पूरा घर भर यह सोचता रह जाता है कि किसलिए आए थे और किसलिए चले गए? तुम्हारी ऐसी -तैसी के लिए आए थे ,वह कर दी और विदा हो लिए। जब कोई बोलेगा बतलाएगा ,आवभगत करेगा ;तभी तो कोई तुम्हारे घर में चरण धरेगा !

      हाथ -हाथ को एक- एक खिलौना है। वह जैसे कोई फोन नहीं ;अपना ही छौना है।जिसे दुलाराना है, पुचकारना है,सँवारना है।शेष सबको दुत्कारना है।सब मोबाइल में आकंठ डूबे हैं। विडियोबाजी,फोटोबाजी,रीलबाजी, गीत, मनोरंजन, फेशबुकबाजी,व्हाट्सएपबाजी, इंस्टाग्रामबाजी ,ऐयाशी,जुआ, सट्टा, खेल, बैंक, कैलकुलेटर,टीवी, समाचार, कम्प्यूटर क्या कुछ नहीं है मोबाइल पर ;जो सुबह जागते ही उसे अपने आलिंगन में न ले ले।कर लो दुनिया मुट्ठी में ; लो हो गई दुनिया एक चुटकी में। अकेले अकेले बतलाओ या मत बतलाओ। रात दिन चौबीसों घण्टे इसी से अपने को बहलाओ,रिझाओ,अपने ही अपने में खो जाओ। सारी दुनिया जहान को बिसराओ।घरनी और बच्चों को झूठ बोलना सिखलाओ। पापा घर पर नहीं हैं। जबकि वे मुँह ढँके हुए पड़े रजाई में यहीं कहीं हैं।दुनिया मोबाइल की दीवानी है। किस- किस की कहें घर- घर की यही कहानी है।जैसे मोबाइल कोई पाला हो जो एक ओर से दूसरे छोर तक मार गया है।

         लालाजी की दुकान छूटे न छूटे ;पर किसान की हल की मुठिया छूट गई। घरनी की गृहस्थी की रौनक लुट गई। स्कूल कालेज के बच्चों की पढ़ाई विदा हो गई। रही बची वह ऑन लाइन क्लास ने पूरी कर दी।गिल्ली डंडा ,कबड्डी,क्रिकेट, ताश, इक्का ,बादशाह,बेगम ,गुलाम नदारद हो गए।टीवी को टीबी नहीं कैंसर हो गया।रेडियो,ट्रांजिस्टर,टेप रिकॉर्डर, कैलकुलेटर,जाने कहाँ चले गए। इस एक ने इन सबको ही मार डाला।यह विज्ञान का कोई उज्ज्वल युग है या है अध्याय काला।कुएँ में जब भाँग पड़ जाए तो यही होता है ;गीत गाए तो गीत ही गाता रहे ,रोए तो रोता ही रहे।सोए तो सोता रहे और नदी में उतर जाए तो गोता ही लगाता रहे।

         ऐसा नहीं है कि विज्ञान के आगे बढ़ते हुए चरण रुक जाएँ। विज्ञान न रुकना जानता है और न झुकना। वह बस निरन्तर चलना ,चलना और चलना जानता है। जब चलेगा तो नई -नई मंजिलें हासिल करेगा। इसलिए ये न समझें कि बस मोबाइल में ही सिमट जाना है। अभी तो देखते जाइए आगे -आगे क्या होना जाना है ! आदमी ने भी कब कहीं रुकना थमना ठाना है। जो रहेंगे ;वे आगे आने वाले मोबाइल के बच्चों से हिलेंगें -मिलेंगे।बस देखते जाइए। हममें से कितने भाग्यशाली होंगे जो वह मोबाइल के बच्चों से खेलेंगे। 

 शुभमस्तु !

 08.12.2024●8.15आ०मा०

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शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

ऊपर की कमाई [ व्यंग्य]

 475/2024 

 

 ©व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 ऊपर वाले को कौन नहीं जानता।उसको न मानने वाले भी प्रकारांतर से उसे मानते ही हैं। वह है,इसीलिए तो उसके न मानने की बात लोग करते हैं।जब बुरा वक्त आता है तो अच्छे - अच्छे नास्तिक भी उसे मानने को विवश हो जाते हैं।ऐसे नहीं तो ऐसे सही।आस्तिक लोग तो यह भी कहते हुए पाए जाते हैं कि ऊपर वाले की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।जब सब कुछ ऊपर वाला ही हिलाता-झुलाता है,फिर लोग जब ऊपर की कमाई लेते हैं तो उसे क्यों अनदेखा कर जाते हैं।क्यों मनमाना कर जाते हैं। क्यों अनजाने हो जाते हैं।कैसे ऊपर की कमाई का तानाबाना बुन पाते हैं। 

   आम हो या खास, दूर हो या पास, भरा उदर हो या किए हुए हो उपवास ;ऊपर वाले की मान्यता,पूजा -पाठ,भक्ति भाव,सबको सहज और सहर्ष स्वीकार है। ऊपर की कमाई में सम्पन्नता की भरमार है। ऊपर की कमाई से खुल रहे उनके उन्नति के सर्व द्वार हैं। क्या आपको मेरी इस बात से इनकार है? मैं तो कहता हूँ कि छोटा हो या बड़ा ,आम या खास, बालक हो या बूढ़ा, नर हो या नारी - सभी को लगी है ये आम बीमारी। लोगों की खिल - खिल उठी हैं फूलों की क्यारी। इसीलिए जब तक नहीं आती है घर में ऊपरी कमाई तब तक तो खुश नहीं रहती घर की लुगाई। अब यह अलग बात भी नहीं कि वह अपनी हो या पराई; सभी को चाहिए ऊपरी कमाई। ऊपरी कमाई के सामने पुण्य, पूजा, प्रण, परमात्मा सब कुछ नगण्य हो जाता है।ये ईश पूजक आदमी ऊपर की कमाई का इतना दीवाना हो जाता है कि उसे इतना भी होश नहीं रहता कि वह सामने वाले का गला काट रहा है। किसकी गर्दन पर छुरा फेर रहा है,किसके बच्चों के पेट पर लात मार रहा है। अपने को आबाद करने के लिए किसे बरबाद कर रहा है।

   ऊपरी कमाई या ऊपर की कमाई के अनेक रूप - स्वरूप हैं।ये अलग बात है कि उनके कुरूप ही कुरूप हैं ,क्योंकि वह तुम्हारी नहीं किसी और की कमाई के यूप हैं।वे किसी के लिए कितने ही कुरूप हों, परन्तु प्रापक के लिए सु -रूप ही सु-रूप हैं।मिलावट,रिश्वत,दलाली,कमीशन ,दहेज सब में ऊपरी कमाई की जान बसती है।इसे अन्याय से कमाई हुई अन्य आय की शुद्ध शुद्ध हिंदी संज्ञा से सम्मानित किया जा सकता है।अपनी कन्या के लिए वर की तलाश करते समय लोग उसकी ऊपरी कमाई पर अधिक और वास्तविक ईमान की कमाई पर कम नज़र रखते हैं। उसका बाप कितना अधिक दहेज दे सकता है,यह आकलन भी वे सहज रूप में कर लेना चाहते हैं।यह दहेज भी कन्या -धन के नाम पर लिया जाने वाला ऊपरी कमाई का सघन स्रोत है।लिया तो दाता की अनिच्छा से ही जाता है,किन्तु कहा यही जाता है, हमने माँगा नहीं,वे स्वेच्छा से अपनी लड़की को दे रहे हैं।

    कर्मचारी, अधिकारी,सरकारी या गैर सरकारी ;सब ही ही हैं ऊपरी आय के भिखारी।नेता ,डाक्टर,इंजीनियर ; यहाँ कौन बचा है जो ऊपरी कमाई का रसिया न हो। शिक्षक का पेट भी नौकरी से नहीं भरता तो वह क्लास का कोर्स कोचिंग में पूरा करता है। बेचारा कितना ईमानदार है ! इसीलिए या तो क्लास में जाता ही नहीं ,और यदि जाता है तो विद्यार्थियों को इधर -उधर की बातों में उलझा कर कोर्स को कोचिंग में पूरा करने का पक्का वादा करता है और उसे निभाता भी है।यही हैं आजकल के पूजनीय गुरु जी।जहां से ईमानदारी के प्रशिक्षण की शिक्षा होती है शुरू भी। 

   दुनिया में अनेक व्यवसाय हैं।उनमें ऊपरी कमाई का बहुत बड़ा संजाल है।दाल में नमक के बराबर तो उचित है ,न्याय संगत है किंतु दाल ही नमकीन हो जाए तो यह सीमा की पराकाष्ठा है।घी,तेल,दालें, मसाले, धनिया ,मिर्च, हल्दी, दूध,फल ,सब्जी आदि सभी स्थानों पर ऊपरी कमाई मिलावट के रूप में सुलभ है। इस आदमी के पेट के गड्ढे को कोई ऊपरी कमाई भी काम आने में हिचहिचाती है।यह वही त्रिपुंडधारी, जनेऊधारी,मालाधारी, घण्टाबजैया, करता ता ता थैया, परिक्रमा लगैया, सजनी हो या सैयां, बहना हो या भैया,: सब जगह है नम्बर दो वाला सबसे बड़ा रुपैया। 

   नेता विधायक या सांसद बनते ही कुछ ही वर्षों में खाक पति से लाख पति नहीं, अरब खरब नील पद्म और महापद्म पति के सिंहासन पर विराजता नजर आता है। अंततः यह चमत्कार भी तो वेतन की कमाई का नहीं ,ऊपरी कमाई का ही है।बेबस जनता के खून से निचोड़ी गई दवाई का ही है।जो सच के विरुद्ध आवाज उठाए उसे सलाखों के पीछे ठूँस दो। सत्य बोलना अपराध हो गया है।झूठ हवाई यान पर सवार है।यह भी ऊपरी कमाई का चमत्कार है। देश सुधार का नारा लगाते रहिए और छुपे -छुपे रसोगुल्ले खाते रहिए।दूसरों को उपदेश देते रहिए और मेज के नीचे से उत्कोच लेते रहिए। आखिर उनके पालित दलाल किस दिन काम आएँगे! यों ही देश आगे बढ़ता रहेगा और ऊपरी कमाई से सम्पन्न होता रहेगा। मेरा देश महान जो है। महान था और रहेगा भी। 

 शुभमस्तु ! 

 19.10.2024●10.45 आ०मा० 


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सोमवार, 2 सितंबर 2024

ईमानदारों का देश [ व्यंग्य ]

 375/2024

 

 © व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 विश्व के कुल 195 देशों में अपना भारत देश सबसे अधिक ईमानदार है।यदि आप चाहें तो लाखों जुगनुओं की टोर्च लेकर इस तथ्य की खोज कर सकते हैं।यहाँ का कोई दुकानदार चाहे समय पर दुकान खोले या न खोले किन्तु इस देश का शिक्षक अपने काम और ड्यूटी के प्रति सर्वाधिक सत्यनिष्ठ है। बेचारा अपने घर - गृहस्थी, खेती-बाड़ी,दुकान आदि के काम छोड़कर ठीक समय पर विद्यालय में हाजिर हो लेता है।कौन कहता है कि वह समय से क्लास नहीं लेता।इस देश के प्राइमरी और जूनियर स्कूल के शिक्षक का वेतन मुश्किल से आठ-दस लाख से अधिक नहीं होता ।इसके बावजूद वह अपनी पूरी निष्ठा से वर्ष भर काम करता है।लेट होना क्या होता है,इससे तो वह परिचित ही नहीं है।कौन कहता है कि वह तो अपनी खेती - बाड़ी या दुकान में व्यस्त रहता है। बच्चों की शिक्षा की ओर उसका कोई ध्यान ही नहीं है।सरकार को उसकी निष्ठा पर तनिक भी विश्वास नहीं है,इसलिए उसकी उपस्थिति का डिजिटल फरमान जारी कर देती है। इस देश का शिक्षक तो जगत गुरु है।उससे सबको प्रेरणा लेनी चाहिए। वह सबको ही सीख देता है। वह ईमानदारी और कर्मठता का पावन आदर्श है।

 केवल बेसिक और जूनियर शिक्षकों की ही बात नहीं ,इनसे भी अधिक उत्तरदायी और कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक माध्यमिक और उच्च शिक्षा के होते हैं। वे भी बिना नागा समय से विद्यालय जाते हैं और राजनीति आदि में समय बर्बाद नहीं करते।उच्च शिक्षा के प्रोफेसरों का वेतन पच्चीस तीस लाख है तो क्या हुआ। बेचारे आठ आठ घंटे कालेज में और उसके पहले और बाद में घर के क्लास रूम में कितनी मेहनत करते हैं ,तब उनकी दाल-रोटी का गुजारा मुश्किल से हो पाता है।वे चार पहिए की गाड़ी इसीलिए तो रखते हैं,कि समय से कालेज पहुँचकर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकें। उधर सरकार है कि उनके पीछे ही पड़ी रहती है कि डिजिटल अटेंडेंस लगाओ। उनके ऊपर तनिक भी विश्वास ही नहीं है।यदि वे ट्यूशन करते हैं ,तो क्या बुरा करते हैं? कितनी मेहनत से पढ़ाते हैं बेचारे। फिर भी उनके ऊपर आरोपों -प्रत्यारोपों की झड़ी लगाई जाती है कि इनका कोर्स इनके घर की क्लास में पूरा होता है। कॉलेज में तो पढ़ाते ही नहीं हैं।

 शिक्षकों के बाद राजस्व,विभिन्न कार्यालयों,डाक,बैंक,पुलिस,कचहरियों,ब्लाक,तहसील, जिला मुख्यालय के तमाम कर्मचारी और अधिकारी अपनी नियमित ड्यूटी के बाद भी अपनी कर्मठता का परिचय देते हैं। फिर भी उन पर ऊपरी आय सृजित करने का झूठा आरोप लगाया जाता है।समय पूर्व गंतव्य पर पहुँचना और समय पश्चात दफ्तर से लौटना उनकी दैनिक चर्या का एक अहम हिस्सा है।फिर भी उनके लिए डिजिटिलाइजेशन करना उनके साथ कितना बड़ा अन्याय है? 

 शिक्षकों ,कर्मचारियों और अधिकारियों के बाद यदि व्यापारियों और दुकानदारों की निष्ठा की बात की जाय तो अप्रासंगिक नहीं होगा। देश की जनता के हित में यदि किसी कलाकार ने धनिये में गधे की लीद, हल्दी मिर्च में रंग,दूध में पानी,काली मिर्च में पपीते के बीज,आटे में चावल या कोई अन्य सामान,सरसों के तेल में पामोलिव ऑयल,घी में चर्बी की मिलावट कर दी तो कौन सा बड़ा तूफान खड़ा हो गया।ये सभी मिलावट खोर डॉक्टरों के शुभचिंतक हैं।यदि वे मिलावट नहीं करेंगे तो बेचारे डॉक्टर तो भूखे ही मर जायेंगे। इसलिए इस देश में मिलावट एक राष्ट्रीय आवश्यकता है। इसके बिना व्यवसाय लँगड़ा हो जाएगा।मेरा देश है ईमानदारी की जलती हुई मशाल।अब इसमें जनता जले या उसकी खाल।देख ही रहा है सारा देश फिल हाल।पर इन तथाकथित 'ईमानदारों' के बने रहने चाहिए गाल लाल। देश का हर ईमानदार ठोक रहा है ताल।उसकी निष्ठा ही तो बनी हुई है उसकी ढाल। अब आपको ज्यादा क्या बताना समझाना यह देश ही है बेमिसाल। अब इस निष्ठा भाव को देखकर आपकी भी तो नहीं टपकने लगी राल?

 इस देश के कर्णधार इस देश के 'महान नेतागण' हैं। यह देश उन्हीं के मजबूत कंधों पर ही तो टिका हुआ है।उनकी निष्ठा पर भी भला कोई प्रश्न चिह्न लगाया जा सकता है?उनके लिए उपस्थिति की तो कोई बात ही नहीं है। वे तो सर्व शक्तिमान और सर्वत्र विद्यमान हैं।वे भाषण के मंच पर सदा 'समय से' ही विराजते हैं।कभी चार -छः घण्टे देर हो भी जाये तो क्या फर्क पड़ता है।इस देश का श्रोता वर्ग खाली और निठल्ला तो है ही।उसे नेताजी के अमृत वचन सुनने ही हैं।इसलिए वह अपने स्थान से तिल मात्र भी नहीं हिलता। बिना सुने पूरा भाषण उसे 'भक्ति' का पुण्य नहीं मिलता।देश में यदि नेता न हों तो देश के विकास के पहिए का चलना तो दूर की बात है,उसका पिपीलिकावत रेंगना भी असम्भव हो जाए।नेता ही तो देश को चला रहे हैं।इसीलिए तो वे टॉल फ्री गाडियाँ दौड़ा रहे हैं।लाखों नहीं,करोड़ों की फ्री सुविधाएँ पा रहे हैं। पाएँ भी क्यों न ! ये देश भी तो उन्हीं का है। देश के असली 'देशभक्त' तो नेतागण ही हैं।आज उनका स्थान देवी देवताओं और पुराने भगवानों से भी ऊपर है। जरूरत होने पर भगवान के दर्शन हो सकते हैं ;किन्तु नेताजी उनसे भी 'सुपर भगवान' हैं।नेता-दर्शन एक दुर्लभ प्रक्रिया है। वे समय से क्यों चलें,समय को ही उनके साथ चलना पड़ता है।

 देश के कोने - कोने जल थल और आकाश में सर्वत्र खोजने पर यही शोध हुआ है कि इस देश के शिक्षक, नेता, कर्मचारी, अधिकारी, व्यापारी,नर -नारी,हल्के या भारी, दूध या दारू से करते गुजारी, समय निष्ठ ,कर्तव्यनिष्ठ और देशनिष्ठ हैं। भूलकर भी उन पर शक -ओ - सुबह करना सर्वथा असंगत और अवांछनीय होगा। यही तो देश के आदर्श हैं।उनसे डिजिटल उपस्थिति की आशा करना व्यर्थ है,क्योंकि उनके विरोध के उग्र रूप को सहन करना असम्भव हो जाएगा।कभी वे काली पट्टी बांधेंगे तो कभी बसें और ट्रेनें भी नहीं चलने देंगे।नतीजतन भारत ही बंद हो जाएगा। तात्पर्य यही है कि मेरा समग्र देश ईमानदार था ,ईमानदार है और ईमानदार रहेगा। उसकी घड़ी में शक की सुई लगाना भी अन्याय होगा।यद्यपि अन्य आय तो सबको ही चाहिए। चाहे वह जैसे भी मिले, जहाँ से भी मिले ,जिससे भी मिले। बस मिलनी चाहिए।जन - जन की 'ईमानदारी'के मूल में यही सिद्धांत कार्य करता है। शुभमस्तु ! 

01.09.2024●8.45प०मा० 

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शनिवार, 29 जून 2024

मैल का मेला [ व्यंग्य ]

 292/2024 


 

 © व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 वह तो पहले से ही बहुत अधिक कुख्यात थी,किन्तु अब तो मर्यादा ही टूट रही है।उसका मैलापन दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है।इस बढ़ते हुए मैलेपन के कुछ कारण अवश्य हैं। आदमी दिन प्रति दिन नीति,धर्म,मर्यादा,चरित्र और विनम्रता से विमुख होता चला जा रहा है।तो फिर राजनीति से ही यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वह दूध की धुली बनी रहे।अंततः उसमें जो आदमी है ,वह भी तो इसी धरती और समाज की देन है।धरती पर बढ़ता हुआ कचरा और आदमी में बढ़ती हुई अपवित्रता क्या कुछ नहीं कर सकती। 

 देश और समाज में निरन्तर बढ़ते हुए सपोले और उनके पालनहार नहीं चाहते कि सर्वत्र खुशहाली हो। दूसरे को त्रास देने में आनन्दानुभूति करने वालों को इसी से तुष्टि मिल रही है।परपीड़क आनंद में हैं।आमजन और मध्यवर्ग उत्पीड़ित और भयाक्रांत है।जहाँ भी देखिए ,वहीं परपीड़ा का वातावरण जन्य दूषण फैला हुआ है।चारों ओर असंतोष और विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं।मतदान और जीवन यापन मात्र औपचारिकता बनकर रह गए हैं। कहीं भी किसी की कोई रुचि नहीं है।मन के अंदर और बाहर विरोध और असंतोष की ज्वालायें धधक रही हैं। 

 सबको ऊँची कुर्सी चाहिए।निरंतर जारी कुर्सी-दौड़ में बड़े- बड़े महारथी शामिल हैं।जिनको कभी दरी का बिछौना भी सुलभ नहीं था,वे कुर्सी - दौड़ में सबको पीछे खदेड़ना चाहते हैं।साम,दाम,दंड और भेद :इनमें से कोई भी नीति या अनीति को अपनाने में वे येन केन प्रकारेण संलग्न हैं।नैतिकता को खूँटी पर टाँग दिया गया है,अपनी टाँग आगे लाने के प्रयास में दूसरे की टाँग में टंगड़ी मारकर गिरा देना ही उनका धर्म है।आज की राजनीति का यही मर्म है।चारों ओर का वातावरण गर्म है।आज का क्या नेता क्या चमचा ,सब कोई इतना बेशर्म है कि दाना डाल के मुर्गी फँसाने में वह बेहद नर्म है। 

 दानेबाजी और नारों का बाजार गर्म है।नामियों को नामे से लगाव है तो किसी को प्यारा किसी का चर्म है। जनता विकास की गंगा में नहीं, वैतरणी में गोते लगा रही है।चमचों की चासनी उन्हें निरंतर जगा रही है। मैल से मैल कभी साफ भी हुआ है ? जनता के लिए माध्यम वर्ग के लिए इधर आग तो उधर कुँआ है।जो पहले कभी न हुआ वह वर्तमान में हुआ है।लोगों के लिए देश ,देश नहीं मात्र एक जुआ है।मध्यम वर्ग की तो बस यही दुआ है कि सब कुछ ठीक - ठाक चले।मैलापन जो आया है ,वह शीघ्र ही टले।पर उसे चैन से कब रहने देते हैं ये दिलजले। रात - दिन मुश्किलें लग रही हैं उनके गले।सुख चैन की वर्षा हो न हो, वे जाते रहेंगे अनवरत दले।

 सबको जनता से शिकायत है,किन्तु जनता की शिकायत सुनने वाला कोई तो नहीं। जनता की वेदना सुनने वाला कहीं कोई तो नहीं।वह तो आम है न ? जिसे चुसना है। बराबर चुसना है।ऊँची कुर्सी पर कोई भी बैठा हो,उसे रसातल में धँसना है। चैन की वंशी बजाना उसका सपना है।गोल-गोल रोटी के परित: उसे घूमना है।बनावटी हँसी हँसते हुए उसे झूमना है।काल्पनिक सफलता के इर्द - गिर्द कोमल कपोल चूमना है।मन ही मैले हैं,तो बगबगे वसन पहनने से क्या स्वच्छता आ जायेगी।दूर के ढोल बड़े सुहावने हैं।पर पता है उसमें भी पोल है!छल -छद्मों की किलोल है।

 वक्ताओं की वाणी का बोलबाला है।झूठ दौड़ रहा हेलीकॉप्टर पर और साँच का मुँह काला है।लगा गया अटूट ताला है।गली-गली, बस्ती -बस्ती में बहता हुआ जो नाला है, उसी के बाहर महक रहा 'गरम मसाला' है।आँखों मे हया नहीं, जुबाँ पर सुदृढ़ ताला है।क्या नर और क्या नारी ! सब जगह फैली मैल की बीमारी!दूर के ढोल बड़े ही सुहाने हैं। नेताओं को चमकाने अपने - अपने पैमाने हैं।'अंधभक्त' उनके अंध प्रचार में दीवाने हैं। उनकी प्रशस्ति में गा रहे तरन्नुम भरे गाने हैं। अपनी हेय करनी पर क्या कभी वे लजाने हैं? उन्हें मिल ही रहे स्वर्ण निर्मित दाने हैं।पर एक दिन दूध का दूध पानी का पानी हो ही जाता है। जो अब तक इतराता सतराता था, उसे अतीत और औकात याद आ जाता है।यहाँ वहाँ मैल का मेला है। नेताओं के पीछे भेड़ों का रेला है। गरीब के हाथों में रोज का हथठेला है। उधर नोटों की बरसात ,इधर न कौड़ी न धेला है। अँगूठा छापों का आई ए एस चेला है।इधर भी और उधर भी मैला ही मैला है।इधर पॉली थैली पर भी जुमार्ना उधर सोने भरा थैला है। 

 शुभमस्तु !

 29.06.2024●1.00प०मा० 

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गुरुवार, 20 जून 2024

नई साड़ी ! [ व्यंग्य ]

 285/2024



 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 किसी कवि ने क्या खूब कहा है: 'लड़की वह अचार की मटकी,हाथ लगे कीड़े पड़ जाएं।' नारी की नाजुकता की यह पराकाष्ठा है।इससे भी आगे बढ़ें तो एक बात यह भी है कि साड़ी स्त्री की देह से छू जाने के बाद पुरानी हो जाती है ।तभी तो स्त्रियां अलमारी भरी रहने के बावजूद प्रायः यही कहती पाई जाती हैं कि उनके पास पहनने के लिए साड़ी ही नहीं है। शायद उसकी दैहिक अपवित्रता का यह बहुत बड़ा कारण है।इसलिए विवाह शादी या किसी उत्सवीय अवसर पर वे यही कहती हैं नई साड़ी हो तभी तो जाऊँ! और पुरुष का कोई वस्त्र कभी अशुद्ध नहीं होता और वह एक ही जोड़ी कुर्ता धोती या पेंट शर्ट को दसियों वर्ष खुशी - खुशी पहनता रहता है। बिना किसी शिकायत या ताने के। कितनी विडम्बना की स्थिति है? 

   हर अवसर पर नई साड़ी का मुद्दा घर परिवार और उसके पति के लिए चिंतनीय अवश्य है, किन्तु यदि राधा को नचवाना है तो नौ मन तेल का इंतजाम भी करना होगा।यदि नहीं करते तो समझ लीजिए कि क्या होगा , घर का गैस का चूल्हा भी नहीं जलेगा। और जब चूल्हा नहीं जलेगा तो दूल्हा भी आगे नहीं चलेगा।नित नवीनता का नारी चिंतन पुरुष वर्ग के लिए कितना भी महँगा पड़ जाए ,तो पड़ता रहे।कोई कुछ कहे तो कहता रहे ,पर यह तो नारी - संविधान की धारा 'त्रिया चरित्रम : नारी अपवित्रम' में कनकाक्षरों में खचित किया हुआ है;जिसे मिटाया नहीं जा सकता।

   यदि नारी के इस साड़ी प्रेम की तह में जाएं तो ज्ञात होता है कि इसकी असली जड़ तो पुरुष के मष्तिष्क में ही मिलेगी। अपनी आँखें सदा शीतल बनाए रखने के लिए उसने स्वयं ही अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारी है।विवाह के बावन वसंत व्यतीत होने के बाद भी वह पत्नी को षोडशी ही देखना चाहता है।इसीलिए कहीं भी अपनी जन्मतिथि लिखवाते समय वह तारीख महीना और सन पूरे- पूरे लिखवाता है। यह अलग बात है कि भले ही चार छ:साल कम लिखवा दे।किन्तु नारियों को यह संस्कार की घुट्टी में घिस - घिस कर पिला दिया जाता है कि कभी किसी को अपनी सही -सही उम्र मत बता देना अन्यथा तुम्हें बुढ़िया करार दिया जाएगा।स्कूल में नाम लिखवाते समय यदि पूरी जन्मतिथि लिखवाने की अनिवार्यता नहीं होती तो वहाँ भी लिखवा दिया जाता :जन्मतिथि -20 जून। अरे ! वर्ष और महीने से क्या लेना - देना ? बाबा तुलसीदास जी की चौपाई के 'अनृत' शब्द की सार्थकता की यहाँ पुष्टि हो जाती है : (साहस, अनृत, चपलता ,माया) । यदि विचार किया जाए तो वे कुछ गलत भी नहीं करतीं। जब जन्मतिथि पूछी गई है तो तारीख ही तो लिखनी चाहिए। तिथि में मास और वर्ष तो आते ही नहीं हैं।इसलिए वे उन्हें अनावश्यक रूप से लिखें ही क्यों ? इसीलिए यह भी एक नारी सूत्र बन गया कि कभी किसी स्त्री की उम्र नहीं पूछनी चाहिए। यह असभ्यता की श्रेणी में गिना जाता है। 

    स्त्री को आसमान पर चढ़ाए रखने में बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। अपने स्वार्थ की पूर्ति के कामी पुरुष ने नारी को सोने की जंजीरों में जकड़ दिया।उसे फूल,गुलाब,चंपा, चमेंली,रात की रानी की उपमाएँ देकर कहाँ से कहाँ ले जाकर विराजमान कर दिया। वह उसकी झील जैसी आँखों की गहराई में आकंठ डूब ही गया : (झील-सी गहरी आंखें चाँद-सा रौशन चेहरा)। गाल गाल न रहे,गुलाब हो गए।गर्दन सुराही हो गई। क्षीण कटि मृणाल हो गई। जाँघें भी जाँघें ही कब रह सकीं, वे कदली स्तम्भ बन गईं।केश सघन मेघ में तब्दील हो गए। कुल मिलाकर स्त्री, स्त्री नहीं रही , वह फूल पत्तियों का सचल बागीचा ही बन गई। जिसमें झील भी है,फूल पत्तियां ,लताएँ ,झुरमुट चाँद - सभी कुछ तो है। यदि नहीं है ,तो बस वह स्त्री नहीं है। 

    सोचिए नारी के पुरुष द्वारा इतने नाज नखरे उठाए जाएँगे तो उसे क्या पड़ी कि वह एक साड़ी को एक बार देह से छू भर जाने के बाद उसे पुरानी न कहे ? अब लो ! और झेलो! चाहे उसके अरमानों से खेलो! अब कहा है कि एक भी साड़ी नहीं है ,तो एक और ले लो! अब ये अलग बात है कि साड़ी- सेंटर में मिलने वाली हर साड़ी पुरानी ही होगी। क्योंकि वह भी तुम्हारी ही किसी अन्य बहिन की देह से छुई गईं होगी। तुम्हारे लिए नई है, पर उतरन ही होगी। 

 शुभमस्तु ! 

 20.06.2024● 8.30 प० मा०

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सोमवार, 4 दिसंबर 2023

सुख की खोज ● [ व्यंग्य ]

 520/2023


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●© व्यंग्यकार 

● डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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           जीवन की सारी भागदौड़ सुख के लिए है।यह अलग बात है कि प्रत्येक जीव के लिए सुख की अलग - अलग परिभाषा है।सबकी अलग - अलग आवश्यकताएँ हैं। कुछ जीवों की आवश्यकताएं बहुत ही सीमित हैं तो कुछ जीवों का जीवन विस्तार ही बहुत बृहत है ,विस्तृत है। उनमें सम्भवतः मनुष्य का जीवन विस्तार अत्यन्त व्यापक परिधि को घेरे हुए है। मनुष्य और पशुओं की तुलना करते हुए कहा गया है: 'आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत पशुभिर्नराणाम्। धर्मो हि तेषांमधिको विशेषः धर्मेणहीना: पशुभिः समानः।।' अर्थात आहार ,निद्रा ,भय और मैथुन मनुष्यों और पशुओं में एक समान (आवश्यकताएं) हैं।किंतु मनुष्यों में एक धर्म ही वह विशेष तत्त्व है ,जो उसे पशुओं से अलग करता है।धर्म से हीन मनुष्य तो पशुओं के समान ही है।

              इन चारों मानवीय विशेषताओं की आजीवन यात्रा इन चारों की पूर्ति की ही है। कितने मनुष्य ऐसे हैं ,जो धर्म का आचरण करते हैं और उसके आचरण और संवर्धन के लिए पशु से इतर जीवन जीते हैं। इसके विपरीत मनुष्य की सारी दौड़भाग एक गोल -गोल रोटी के चक्कर लगाने में ही पूरी हो जाती है।रोटी कमाने के लिए वह खेती,नौकरी,व्यवसाय,चोरी,डकैती,गबन,राहजनी, मिलावटखोरी,नेतागीरी, गुंडागीरी, जेबकटी,स्मगलिंग और न जाने कितने वैध और अवैध धंधे करता है और उन्हें करते -करते जिस संसार को असार कहता भर है , परंतु उसे ही सबसे बड़ा सार मानता है ; उसके लिए ही दिन -रात एक करता है। उसी संसार के लिए न पाप देखता है और न पुण्य ,धर्म देखता है न अधर्म, नीति देखता है न अनीति,वैध देखता है न अवैध -अपनी जी तोड़ शक्ति से करता है।

              मात्र रोटी (आहार)के नाम पर दुनिया का सारा बखेड़ा इस आदमी नामधारी जंतु द्वारा फैलाया गया है।जब रोटी मिल जाती है तो शरीर ढँकने के लिए कपड़े की आवश्यकता सामने आती है।इसलिए तरह- तरह के कपड़े सूती,टेरीन, टेरीकॉट,रेशम, खादी, ऊनी,लैदर,रैग्जीन,कृत्रिम रेशम और अन्य कृत्रिम धागों से बने हुए आवरण की खोज शुरू होती है।कपड़े की डिजाइनें, रंग, आदि का निर्माण विभिन्न कल - कारखानों में होने से उसकी आय के स्रोत बढ़ जाते हैं।जब उसे कपड़े मिल गए तो अपने रहने के लिए बड़े -छोटे भवनों का निर्माण भी वह करने लगता है। इस प्रकार एक आम या खास हर व्यक्ति को इन तीन आवश्यकताओं :रोटी,कपड़ा और मकान की पूर्ति के लिए संघर्ष करना पड़ता है। और इन्हें पूरा करते -करते उसका जीवन पूर्ण हो जाता है। धर्म को बुढ़ापे के लिए छोड़ देता है। किसी -किसी को तो बढ़ावा आने से पहले ही बुलावा आ जाता है। यदि सौभाग्य से उसे बुढ़ापे से दो -चार होना हो पड़ा तो इन्द्रियाँ साथ छोड़ने लगती हैं। पहले तो हाथ पैर ही जवाब दे जाते हैं। न पैरों से चला जाता है और न हाथों से माला ही पकड़ी जाती है।आँखों से दिखता नहीं, कान सुनते नहीं, दाँत बे -दाँत होने लगते हैं। धर्म कैसे हो ?जब धर्म ही नहीं तो मनुष्य और पशु में अंतर ही क्या रह गया ?

            मनुष्य के लिए मान्य चार पुरुषार्थों में जिसे पहले ही स्थान पर रखा गया है ,उस धर्म को वह अंतिम पायदान पर रखकर लतिया धकियाता रहता है। और धकियाते -धकियाते वहाँ जा पहुँचता है कि समय का धक्का उसे ही ऐसा धकियाता है कि वह सीधा परलोक यात्रा पर सिधार जाता है।वह केवल दूसरे पुरुषार्थ अर्थ (रोटी,कपड़ा और मकान) तथा तीसरे पुरुषार्थ काम ( मैथुन तथा अन्य कामनाओं की पूर्ति) में ही जीवन गुजार देता है। इस प्रकार उसके आहार,निद्रा,भय और मैथुन की पूर्ति इन दोनों पुरुषार्थों में सम्पूर्ण हो लेती है। मोक्ष की साधना तो कोई करोड़ों जन में एक दो व्यक्ति ही कर पाते हैं। 

          अर्थ का विस्तार धर्म ,कर्म,पाप , पुण्य,प्रदर्शन,फैशन( क्रीम,इत्र, पाउडर,रूज,काजल,बिंदी,लिपस्टिक,गहने, चूड़ी, साड़ियाँ आदि) के अनन्त कोस तक फैला हुआ है।मनुष्य बस इसी में सिमट -लिपट कर रह गया है।रात -दिन इन्हीं के लिए मारामारी,खून पसीना बहाना, दौड़भाग, नौकरी ,दुकान, ,चोरी ,गबन,राहजनी,नेतागीरी, गुंडागर्दी,जन सेवा,स्वास्थ्य सेवा, कचहरी सेवा, दलाली सेवा,शिक्षा सेवा, कानूनी सेवा,राजस्व सेवा,डाक सेवा , रेल सेवा ,बस परिवहन सेवा ,हवाई सेवा ,ठगी, व्यापार , दूर संचार आदि करता हुआ संसार के मद मधुर सार का रस ग्रहण कर रहा है। इसी में सुख का सार तत्त्व का परिणाम प्राप्त कर रहा है।

                   मनुष्य को धर्म और अध्यात्म में कोई रुचि नहीं है। ये उसके सबसे नीरस और दुखद पहलू हैं।उसकी।मान्यता इन्हें गौण मानने में है। यही कारण है कि लाखों में कोई एक दो ही सच्चे संत बन पाते हैं। मनुष्य गृहस्थ आश्रम को भले ही तप मानता हो ,तीर्थ कहता हो। किन्तु आचरण उसके विपरीत ही करता हुआ देखा जाता है। दूसरों की दृष्टि में महान बनने के लिए वह तिलक ,छाप,माला , शॉल,दुशाला सब कुछ ग्रहण करता है किंतु वहाँ धर्म कम दिखावा अधिक है। फोटो खिंचाने, अखबार की सुर्खियों में आने, टी वी और सोशल मीडिया में कहर ढाने की उसकी मानसिकता आदर्श है। 'राम -राम जपना, पराया माल अपना ' की उक्ति सार्थक करने में आदमी कोई कोर कसर शेष नहीं छोड़ता।

                   मनुष्य की सुख की खोज की अनंत यात्रा है।सारा जीवन इसी में गुजार देना उसके जीवन का परम लक्ष्य है।यह यात्रा किसी गुबरैले ,केंचुए ,कुत्ते, सुअर की यात्रा से कुछ भिन्न नहीं है।अंतर मात्र इतना है कि वह बुद्धिजीवी और वे सब देहजीवी। मनुष्य कोई इनसे कम देहजीवी नहीं है।कर्म की परिणति उसे मनुष्य या मनुष्येतर जन्तु बनाती है।इसलिए आहार निद्रा भय और मैथुन की समानधर्मिता मनुष्यों और पशुओं को एक ही मंच पर लाकर खड़ा कर देती है।अपने अहंकार के वशीभूत वह भले ही उनसे कितना ही श्रेष्ठ क्यों न समझता रहे।मनुष्येतर जीव ढोंग नहीं कर सकते, बस यही खग - पशुओं और मनुष्यों में अंतर है। न वहाँ धर्म है न यहाँ धर्म बचा है। यहाँ तो शर्म भी नहीं बची कि वह चुल्लू भर जल में डूब सके । यदि चलते -चलते उसका कदम फिसल जाता है ,तो यही कहेगा कि मैं जान बूझकर नाटक कर रहा था। 

 ●शुभमस्तु ! 

 04.12.2023●9.00प०मा० 

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सोमवार, 20 नवंबर 2023

जुनून बनाम पागलपन● [ व्यंग्य ]

 497/2023

   

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● © व्यंग्यकार

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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     शब्दकोश में पाए गए शब्दों में यह कदापि आवश्यक नहीं कि उनके शब्दार्थ या भाव सुरुचिपूर्ण, सकारात्मक और सर्वानुकूल ही हों। यदि किसी व्यक्ति में किसी कार्य को करने का जोश सामान्य न होकर असामान्य हो, तो प्रायः उसे जुनूनी कह दिया जाता है।यह सुनकर संबंधित को कभी भी कुछ बुरा या नकारात्मक नहीं लगेगा।इसके विपरीत यदि उसे पागल अथवा विक्षिप्त कह दिया जाए ,तो उसे कदापि सकारात्मक अनुभव नहीं होगा।इसका अर्थ यह हुआ कि किसी शब्द का किसी भाषा में ठीक वही अर्थ देना अनिवार्य नहीं है,जिसके लिए उसका निर्माण हुआ है।विभिन्न भाषाओं में उसके विविध भावान्तर हो सकते हैं। जब 'जुनून' शब्द  का कोशीय पर्याय  जानने का प्रयास किया गया तो उसके अनेक भाव रूप अर्थ प्राप्त हुए।जैसे :पागलपन,विक्षिप्त,उन्माद,सनक, दीवानापन,ख़ब्त।

यदि दुनिया में विद्यमान पागलपन के आकलन की बात की जाए तो यह अनेक कोटियों में विभाजित किया जा सकता है।कुछ ऐसे भी पागल हैं ,जिन्हें कोई पागल नहीं कहता। इसके एक नहीं अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। जैसे : कोई कुर्सी के लिए पागल है ,तो उसके लिए कुछ भी कर सकता है। और वह इसके लिए भी तैयार बैठा है कि  ' कबिरा खड़ा बजार में लिए लुकाठी हाथ।जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ।' कोई राजनीति का दीवाना है तो किसी पर समाज सेवा का भूत सवार है। कोई धर्म के लिए 'झंडा ऊँचा रहे हमारा' करने में कोर कसर नहीं छोड़ रहा है। किसी पर सम्मान पाने का भूत बैठा हुआ है।ये सभी प्रकार की 'अतियाँ'  ही जुनून हैं ।दीवानापन हैं, सनक हैं ,ख़ब्त हैं और ज़्यादा आगे बढ़कर कहना चाहें तो पागलपन ही हैं। 

जब कोई व्यक्ति किसी कार्य की तल्लीनता में इतना निमग्न हो जाए कि दिन- रात का भेद भी भूल जाए।  किसी काम की सफलता का श्रेय भी प्रायः ऐसे ही जुनून को दिया जाता है।यदि महान वैज्ञानिक महामहिम अबुल कलाम जी अपने विज्ञान के जुनून में इतने न खो गए होते तो वह विश्व के इतने महान वैज्ञानिक नहीं बन पाते। यहाँ तक कि उन्हें विवाह करने और पत्नी के साथ रहने का भी समय नहीं था।यदि अतीत के पन्नों में झाँक कर देखें तो राजकुमार सिद्धार्थ भी यदि दुःख की खोज के लिए सन्यास नहीं लेते तो संसार को इतना बड़ी वैराग्यवान महान विभूति नहीं मिलती। इसे पागलपन नहीं कह सकते।यह जुनून का ही  सत - परिणाम है।महाकवि कालिदास के जुनून ने ही संस्कृत साहित्य का महाकवि बना दिया।  

 महाकवि कालिदास का नाम आया तो कवियों की बात भी क्यों न कर ली जाए।जब तक कोई कवि या रचनाकार जुनून की हद से भी उस पार नहीं चला जाए ,तब तक महानता उसके चरण नहीं  चूमती। इसका अर्थ यह हुआ कि महानता का जुनून या पागलपन से निकटता का सम्बंध अवश्य है। पागलखाने में कपड़े फाड़ने वाले या ईंट पत्थर फेंकने वालों को भी यदि सही दिशा मिल जाए तो कोई संदेह नहीं कि उनमें भी कुछ न कुछ  ख्याति लब्ध करने वाली हस्तियाँ मिल जाएं।इसके लिए उनके चिकित्सकों को भी जुनून की सीमा तक प्रशिक्षण देना होगा।अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि पागलों के बीच रहकर वे भी पागल हो जायें।

जुनून या पागलपन की परिभाषा से एक बात यह भी निकल कर आती है कि केवल सामान्य बने रहकर आदमी दाल,रोटी और हरी सब्जी खाने वाला चुसा हुआ आम ही बनकर रह जाएगा। उसके वक्ष पर 'महान' का  तमगा तभी झिलमिलायेगा जब वह इन 'आमों' के ढेर  से बाहर निकल कर अपनी अलग ही सुंगध छोड़ेगा। 'फूल वो सर पे चढ़ा जो चमन से निकल गया।' 

देश और दुनिया के नक्शे पर नजर डालें तो देखते हैं कि महान विभूतियाँ बिना किसी विशेष उन्माद ,जुनून या सनक के नहीं अवतरित हो गईं! आप भी अपने भीतर टटोल कर देख लें कि आप में भी 'महान' बनने के जरासीम तो नहीं कुलबुला रहे। यदि हाँ, तो निकट भविष्य में आपको भी महान कवि ,लेखक,व्यंग्यकार, वैज्ञानिक,राजनेता,समाजसेवी, धर्म-धुरंधर बनने से कोई नहीं रोक सकता।लैला -मजनू, शीरीं फ़रहाद कोई यों ही नहीं बन जाता। तलवार की दो धारों पर चलना पड़ता है।ये भी एक जुनून है। संसार का कोई भी क्षेत्र हो, बस समर्पण चाहिए। वहीं आप अपनी 'महानता' का लोहा मानने के लिए इस दाल - रोटी और  हरी सब्जी खाने पचाने वाली दुनिया को बाध्य कर ही देंगे।बस कर्म के पीछे लट्ठ लेकर दौड़ पड़िए और किसी की  भी इधर से सुनिए और उधर से आर-पार कर डालिए।बस जुनून का डंडा उठाने भर की देर है !  अब देरी भी क्यों ?चल पड़िए! अपने गंतव्य की ओर और 'सामान्य 'से  'असामान्य' हो जाइए।

●शुभमस्तु !

20.11.2023●7.15 प०मा०

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गुरुवार, 13 जुलाई 2023

माननीय टमाटरजी की बात ● [ व्यंग्य ]

 306/2023

    

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● ©व्यंग्यकार

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जी महोदय! जी मान्यवर!!यह मौसम तो आम का ही है।किंतु आम के मौसम में टमाटर की चर्चा ही खास है।आम को पूछता ही कौन है ! आम के नाम पर तो नेता भी हो जाता मौन है।तैयार बैठा है बैंक भी देने उसे लोन है। लगता है अब टमाटर के पेट में ही समय का वास है।इसलिए हर खास-ओ-आम की जुबाँ पर माननीय टमाटर जी का आवास है। अपना भी कुछ ऐसा ही विचार है। क्या टी वी,क्या सोशल मीडिया सबका एक ही आधार है।और तो और यही तो कह रहा आज का अखबार है।सबका कुल मिला कर यही एक सार है , कि आम सभा से संसद तक टमाटर की भरमार है।

क्या सास बहू, क्या भैंस, बकरी या गऊ,दिल्ली,बनारस  या मऊ,किस - किस की बात कहूँ? सब जगह टमाटरी बुखार है।जो इतने ऊँची डिग्री पर जा चढ़ा है ,लगता नहीं कि कब उसकी बाढ़ का उतार है। मैंने स्वयं अपने कानों से सुना है।नहीं,मैंने कोई ये सपना नहीं बुना है कि अब टमाटर   की  प्रोन्नति होने से उसका आसन बहुत ऊँचा हो गया है। अब वह फ्रिज़ में नहीं रहता ,वह तिजोरियों की शोभा बन गया है। सासें बहू को दाल में तड़का लगाने के लिए अलमारी का लॉकर खोलती हैं,फिर उसमें से आहिस्ते से एक टमाटर बाहर लाती हैं, अलमारी में ही रखा चाकू उठाती हैं। और टमाटर को लाड़ लड़ाती हैं। तब कहीं जाकर एक मंत्र जैसा बुदबुदाती हैं और उदासी भरा मुँह बनाती हैं। तब जाकर टमाटर को शहीद कराती हैं। बचा हुआ आधा भाग पुनः तिजोरी में सजाती हैं।इतना ही नहीं, ताला लगा चुकने के बाद चाबी का गुच्छा अपने पेटीकोट में छिपाती हैं।

 जब किसी 'आम' को उसकी अपनी औकात से अधिक ऊपर चढ़ा दिया जाता है ,तो ऐसा ही नजारा देखने में आता है।जहाँ  किसी खास को एकदम नहीं सुहाता है।जो आम से खास हो गया हो,सब्जी से बढ़कर सेव ,कीवी से ऊपर पास हो गया हो।उसके रुतबे फिर देखे नहीं जाते। सभी कोई समझ भी नहीं पाते।क्योंकि वह अहं में डूब जाता है इतराते-इतराते।उसे फिर प्याज, गोभी, शलजम आदि  कदापि नहीं भाते। जिन टमाटरों पर धनिक लोग लगाने लगें छाते, उन टमाटरों की रक्षा में होने लगे जगराते। चोर डाकू भी  उन्हें चुराने अथवा डकैती डालने चले आते।

 टमाटर से सारे सब्जी क्या फल बाजारों में गरमाई है।कहने लगी हैं हरी मिर्च,भिंडी ,तोरई  कि इस मुए को धर्म बदलने में भी शर्म नहीं आई है? कभी हमारे साथ फिरता था मारा-मारा ! अब चार ही दिन इतना बढ़ गया पारा कि हमारा छोड़कर के साथ जा बैठा सेव अन्ननास के संग! लगता है कि इसको भी आदमी की तरह चढ़ गई है भंग, इसलिए बदल रहा लाल से गुलाबी रंग।

पूँछ की तरह साथ में लगा रहता था हमारे। थोड़ी सी ललामियात क्या बढ़ गई कि कर गया किनारे।अन्यथा लूटता था हमारे संग में बहारें।कभी आलू-टमाटर, कभी बैंगन -टमाटर, कभी गोभी - टमाटर, कभी आलू मटर - टमाटर,कभी दाल में टमाटर, कभी तड़के में टमाटर, कभी नाश्ते की मेज पर  बैठता था बराबर। पहले तो हम ही थीं, बाद में पीछे चिपका रहता था। अब तो धर्म परिवर्तन कर सब्जी से फल हो गया। हमें क्या अपने लिए ही काँटे बो गया। 'भई गति साँप छुछून्दर केरी' के अनुसार इधर का रहेगा न उधर का। एक दिन सेव ,संतरा ,मौसमी ,कीवी सब इसे दुत्कार देंगे।ऐ!कहाँ आ घुसा रे तू हम फलों के बीच में।हमें क्यों घसीटना चाहता है तू कीच में।तू जो भी है वहीं जा।और सब्जी वाले की जबान से अपनी आवाज गुंजा; :आलू है! गोभी है !बैगन हैं!टमाटर हैं !हरी मिर्चें हैं !धनिया हैं! तेरी हमारे साथ क्या संगत, सही बैठ नहीं पाएगी तेरी रंगत, इसलिए बदल कर वहीं जा जहाँ सजी है तेरी पंगत। चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात। यही तो होनी है आगे न सुन तात। आज तो बस यहीं तक करनी है हमें माननीय टमाटर जी की बात।

●शुभमस्तु !

13.07.2023◆4.15प०मा०

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गुरुवार, 4 मई 2023

पत्नी की लात -कथा! [ व्यंग्य ]

 186/2023

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 व्यंग्यकार ©

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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    पत्नी के साथ पहली - पहली रात को बतियाए या न बतियाए ; हाँ, कुछ महापुरुष  उस महारात को बड़े ही लतियाए ! लतियाते - लतियाते वे देश के महाकवि बन पाए। पत्नी की लात की भी बड़ी महिमा है; मुदित (मुंदे हुए) ब्रह्मरंध्र को भी खोल देने वाली  है यह पवित्र लात ! इसीलिए हमने आज उठाई है यह बात। गूँगी जिह्वा से अभूतपूर्व बोल देने वाली। बंद बुद्धि रंध्र को भी खोल देने वाली। अपने कर्तव्य का बोध तोल देने वाली।     जिस डाली पर बैठे हुए थे ,उसी डाली को कुल्हाड़ी के प्रहार से काटने वाले   कालिदास और भटके हुए तुलसीदास को महाकवि बनाने वाली विद्योत्तमा और रत्नावली की लात- कथा को कौन नहीं जानता ?यह पत्नी की लात की ही महिमा है कि वे रातों -  रात एक आम इंसान से महाकवि बन गए।प्रणय को छोड़ कर वे काव्य के उपवन गए।

आज भी लोग रातों - रात महाकवि न सही ; कवि तो बन ही जाते हैं।आम आदमी के लिए वे बिना फलों वाली डाली की तरह तन जाते हैं। अब मुझे क्या पता कि गुपचुप पत्नी की लात खाते हैं  और जमाने को नहीं बतलाते हैं कि यह सब पत्नी की लात की माया है। जो उनके ब्रह्म रंध्र में महाकवि उतर आया है।उनकी हर रचना में लात , लात और लात का प्रपात बरपाया है। रातों - रात बने हुए कवि की ख्याति से मेरा मन बड़ा ही मुरझाता है।कैसे कोई एक रात में महाकवि बन जाता है।

कवि बन जाने का वास्तविक रहस्य हमें नहीं बताता है।बस मेरे लिए तो वह ईर्ष्या का सुपात्र बन जाता है।भला हो उस कोरोना काल का जिसने बैठे बिठाए ठलुओं को कवि बना दिया।ये बात अलग है कि उन्हें भाषा ,वर्तनी, छंद,छंद -विधान,अलंकार, लिंग बोध, वचन, व्याकरण आदि का ज्ञान नहीं। बस उनके मतानुसार वे अपने दिल के भावों को बहाने में कविता के बहाने अपने को  कुशल पाते हैं। यदि कोई उन्हें समझाए बताए तो उसकी भी न सुनते हैं ,न मान पाते हैं। बस अपनी एक अलग ही ढपली का राग अलापते हैं।

इधर हम भी एक हैं।जो साठ वर्षों से अपने ही तालाब में टरटराते भेक हैं।चिड़ियों की तरह नित्य का कमाना,नित्य का खाना।अपने को महाकवि तो क्या कवि भी कहने में सकुचाते हैं और वे नए- नए उपनामों से   निज शीश पर  स्वयं सेहरा  सजाते हैं।कोई 'प्रज्ञा' है तो कोई 'प्रवीण' है; कोई ' कुशल' है तो कोई काव्य का 'नीड़ 'है।कोई 'बहार'है ,'मल्हार 'है ; कोई जेठ मास की लरजती 'फुहार ' है।इसी प्रकार मौन, खामोश, सोम,कनक, निर्मल, विमल, पथिक,यश, प्रांजल,मेघ,बादल, विज्ञ, महक ,ख़ुशबू, शुभ आदि  नाम और उपनाम धारी कवि कवयित्रियों का भरापूरा जगत है। मुखपोथियों ,इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐपियों की मिलीभगत है।रातों- रात के चमत्कारों की भी बड़ी जुगत है।

एक महत्त्वपूर्ण बात और।करके देखिए न कुछ गौर।कवियों के भी बड़े -बड़े ,बढ़े -चढ़े, अगड़े -पिछड़े 'गिरोह' हैं।अब मैं यह तो नहीं कहता कि चोरों-डाकुओं जैसी गिरोहबन्दियाँ हैं।रंग -रंग के जिनके आधार हैं। कौन कहता है कि ये कवि गिरोह निराधार हैं? इनके भी लुके -छिपे आकार हैं।ये अपनी- अपनी अभिजात्यता प्रदर्शन के लिए लाचार हैं। इनका भी अपना -अपना विशेष खुमार है।नहीं ,नहीं ये मत कहिए कि ये यश लिप्सा के बीमार हैं! यदि हों भी तो उतने भी यहाँ तीमारदार हैं।

अब कवियों की तीमारदारी की बात आई है तो आई- गई  तो  नहीं हो सकती।चाहे मार हो ,बीमार हो या काव्यत्व का बुखार हो! तीमारदारी का भी अहम  योगदान है!  कोई तीमारदार  गदगुदाता है, तो कोई तेज इंजेक्शन चुभाता है; भले ही सामने वाला उसे सहन नहीं कर पाता है। कभी -कभी तो वह ऐसी अदृश्य जगह ठोक देता है,कि  वह मौन आह भर कर रह जाता है। करे भी तो क्या ? वह यह सोचकर  स्वीकृति में सिर हिलाता है कि  इससे उसे लाभ ही होने वाला है। खुलकर मना भी नहीं कर पाता। इसकी एक वजह यह भी है कि खुलेआम सुई घोंप देना  भी तो ठीक नहीं है।पर क्या किया जाए जब खुले चबूतरे पर लगें कैंप में दिखाओगे तो इंजैक्शन भी खुले में ही लगेगा। वहाँ रंग -बिरंगा पर्दा कहाँ धरा है?जो कोई देख न पाए!

अंत में यही कहूँगा कि मनुष्य होना भाग्य है तो कवि होना सौभाग्य है और महाकवि होना सहस्र भाग्य है।अब ये अलग बात है कि वह आदि कवि वाल्मीकि की तरह क्रोंच युगल की विरह वेदना जन्य हो,  अथवा पत्नी की लात -प्रहार जघन्य हो।बस कवियों के दरबार में अनुमन्य हो।पर्दे की लात और वेदना की बात कौन जानता समझता है?बस तीर में तुक्का ,धुएँ में धक्का आना चाहिए।सिद्ध यही हुआ कि कवि का जन्म केवल आह से ही नहीं होता, पत्नी की उलाहना भरी लात से भी होता है। नहीं मानें तो इतिहास के पन्ने पलट कर देख लीजिए।

इति पत्नी - लात -कथा समाप्यते!

शुभमस्तु !

04.05.2023◆11.30आरोहणम् मार्तण्डस्य।

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रविवार, 2 अप्रैल 2023

समीक्षा के गुर!✅ [ व्यंग्य ]

 142/2023


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✍️व्यंग्यकार ©

✅ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मीत  समीक्षा मत करो,करो सदा  चितलाय।

मक्खन लीपो प्रेम से,या फिर गाली  खाय।।

मंचों की बरसात का मौसम है। साहित्यिक मंचों पर रातों- रात कवि बनने के चक्कर में लोग औऱ लुगाइयाँ,जवान, बालक और बुड्ढे -बुढ़बाइयाँ,बढ़े -बूढ़े ताऊ और ताइयाँ, धोती साड़ियाँ और टाइयाँ अपने प्रेम पत्रों की शाइरी को काव्य का रंग देने की फिराक में फ़िराक गोरखपुरी के नाना और मीराबाई की नानियाँ बनने पर उतारू हैं।यही कारण है कि समीक्षा -गुरुओं की भी अंधी बाढ़ ही आ गई है।चीनी और गुड़ के स्वाद का पता नहीं,परन्तु समीक्षा तो उन्हें करनी ही है।

क्या कीजिए । समीक्षा -गुरुओं की भी बड़ी विवशता है। अब जानें या न जानें ;उनकी मोटी- मोटी डिग्रियों को देखकर या पढ़कर उन्हें समीक्षक के ऊँचे सिंहासन पर  पधरवा देते हैं।एडमिन बनने के बाद वे महाकवि तो बन ही जाते हैं, साथ ही आई. ए. एस .औऱ आई.पी.एस. से भी बड़े स्वयम्भू एडमिस्ट्रेटर  स्वघोषित हो लेते हैं।कोई भी क्या कर सकता है;क्योंकि इस देश में किसी चीज की कोई आचार संहिता तो है नहीं। और यदि हो भी ,तो भी क्या  इस देश का स्वतंत्र नागरिक क्या किसी आचार संहिता का अनुपालन करता हुआ दिखाई देता है? बिना ज्ञान अर्जित किए ज्ञान का बघार देना यहाँ के नागरिकों की खूबी है।जिससे आज तक यहाँ की जनता नहीं ऊबी है। भले ही देश के नेताओं की तरह देश को ले डूबी है।

बात समीक्षकों की योग्यता की हो रही थी। जिस देश में बिना पढ़े लिखे एक कंपाउंडर एम.बी.बी.एस. ; एम.डी. ;डी. एम.को धता बताकर  डॉक्टर बना बैठा हो ,उस देश के कवियों , साहित्यकारों और कलमकारों को लिक्खाड़ बनने से भला कौन रोक सकता है? जैसे लिक्खाड़ वैसे ही समीक्षक। यदि आप जानकार  हैं औऱ सही समीक्षा करते हैं ,तो आपको गालियों की बैलगाड़ी भरी हुई तैयार मिलेगी।' साला! समीक्षक बनता है!' ' 'समीक्षक की पूँछ ! उसे क्या आता -जाता है?' ; 'इसके बाप दादों ने भी कभी कविता पढ़ी है! या समीक्षा की है!जो हमारी समीक्षा करने चले हैं!' जिसे स्वयं भाषा, विराम चिह्न, व्याकरण ,छंद, शब्द शक्ति, रस,अलंकार, समास, आदि का समुचित बोध न हो,उसका समीक्षा करना ठीक वैसे ही है ,जैसे नौसिखुआ के हाथ में बस का स्टेरिंग पकड़ा दिया गया हो।

एक समीक्षा औऱ होती है,जिसे कोई भी अक्षर बोध धारी बखूबी कर सकता है।उसे सम  + इक्षा (समान रूप से देखना) से कोई मतलब नहीं है। उसकी तो बस इच्छा ही इच्छा है। उसकी इच्छा ही समीक्षा है। बानगी देखें:


 1.'वाह!वाह !! क्या शब्द शृंगार किया है!कलम ही तोड़कर रख दी आपने तो!'

2.'क्या कहने! आप तो महान हैं! महादेवी हैं! साक्षात सरस्वती की अवतार हैं आप!'

3.'जी चाहता है कि आपकी अंगुलियाँ चूम लूँ, कैसे लिख लेती हैं /लिख लेते हैं आप इतना सुंदर, मनोरम और शानदार! '

4.'इतनी सुंदर रचना को पढ़ कर जी चाहता है कि यदि सामने होते तो आपके चरण छू लेता।'

5.'आपने तो कवि कालिदास और केशव को भी पीछे छोड़ दिया। जितना कहा जाए कम ही है।'

आदि आदि।

बोरी भर - भर  सम्मान पत्र बटोरने की होड़ में बाजी मार चुके कवियों औऱ कलमकारों की रचना बता देती है कि वे कितने पानी में  हैं। बड़े- बड़े  प्रोफ़ेसर, प्राचार्य, योगाचार्य, अधिकारी और उच्च पदस्थ जन और जनियाँ गाड़ी भर सम्मान पत्र प्रदर्शित कर बताना चाहते हैं, कि उन्होंने कबीर ,सूर और तुलसी को भी पीछे छोड़ दिया है।परंतु उनकी एक ही रचना की भाव योजना ,शब्द रचना, विरामादि का सदुपयोग, वर्तनी उन्हें आईना दिखा देता है। उन्हें एक नहीं अनेक बार बताने समझाने पर भी ऐसा लगता है कि  समीक्षक- शिकारी के बाण पाहन की शिला से लौट- लौट कर बाहर आ रहे हैं और शिकारी स्वयं स्व बाणों से घायल हो रहा है।

इस देश में समीक्षक होने के लिए एक श्रेष्ठ साहित्यकार होना आवश्यक नहीं है। कोई भी अप्रशिक्षित चालक सीट पर बैठकर  पाइलट बन जाता है। कवियों को एकमात्र प्रशंसा ही चाहिए।उनकी दृष्टि में वही समीक्षक उत्तम है ,जो उनकी पीठ थपथपाए।उनकी सराहना में  गीत गाए और अधकचरी रचना को उत्तम बताए।कवि बनने का एक नया ट्रेंड औऱ आ गया है कि मुक्त काव्य के नाम पर कुछ भी ऊँटपटांग लिख डालो, हो गई कविता। न छंद, न बंध, न तुक न तुकांत। बस नॉनस्टॉप चलने का रचनांत। कोरोना- काल ने अनेक ऐसे कवि -केंचुएं ( केंचुई भी) पैदा कर डाले।इन कवि - केंचुओं /कैंचियों ने अच्छे -अच्छे कवियों की मिट्टी पलीद कर दी। वे न जानें , न किसी की मानें।बकते रहो समीक्षक ।वे तो कचरे में  शब्द -  बुहार  कूड़ावत फेंक कर ही खुश हो लेते हैं । 'प्रमाण पत्र-लूटो- प्रतियोगिता' में समीक्षकों की आफ़त कर देते हैं।रचना की गुणवत्ता पर उनका कोई ध्यान नहीं। रात-दिन एक कर उठा लेना है सकल मही। वे जो भी लिख दें,बस वही सही।जमा देना है मंच -मष्तिष्क का दही।किंतु उन्हें रहना है वहीं के वहीं।

हमारे यहाँ एक प्रसिद्घि- लब्ध कहावत है कि 'सारी कुत्तियाँ जब इंग्लैंड चली जाएँगी ,तो फिर भिर कौन चाटेगा? बात कुनैन- सी है, कानों में शहद नहीं घोलती।जहाँ पात्रता न हो, वहाँ पत्तलों पर सिर फोड़ने का कोई औचित्य नहीं है।इसलिए दीवाल पर नाप -चिह्न लगाकर अपने कद का मापन आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। कवि हो या समीक्षक ; अपने -अपने गरेबान में झाँकें ,तब औरों से पहले अपने को ही आँकें।तभी तो मिलेगी सही खिड़की से अपनी झाँकी।बिना गुणवत्ता के आएगी याद माँ की।माली है तो काट -छाँट तो करेगा ही।अनावश्यक टहनियों को अलग धरेगा ही।क्यों  न आप स्वयं माली बन जाएँ औऱ अपने काव्योद्यान की क्यारी को सुगंध से महकाएं।

🪴 शुभमस्तु !

02.04.2023◆8.30 आ.मा.


गुरुवार, 2 मार्च 2023

लुटिया डुबाऊ वे ! (व्यंग्य )

 99/2023


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✍️ व्यंग्यकार©

⚱️ डॉ .भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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ये तो वे भी भली भाँति जानते ही हैं कि लुटिया तो डूबनी ही है।जब अपनी ही नहीं बचा सकते ,तो देश की कैसे बचा पाएँगे।उधर लुटिया लुटिया की क्षमता की बात भी है। उनकी अपनी लुटिया चुल्लू भर पानी की है।जो डूब भी गई तो क्या?  इससे किसी का कुछ अहित नहीं होगा। किंतु जब देश की बात आती है ;देश की लुटिया डूबने से बचाने की बात आती है,तो माथे पर बल आ ही जाते हैं। यह स्वाभाविक भी है।

  कुछ लोग स्व-आत्ममुग्धता के  शिकार इस सीमा तक होते हैं, कि उन्हें यह भी पता नहीं होता कि वे कितने पानी में हैं।जब तक पानी उनके गले ही नहीं ;ऊपरी मंजिल के प्रथम प्रवेश द्वार में नहीं जाने लगता ,तब तक वे खर्राटे मार कर सपने देखने में तल्लीन रहते हैं।और वे बराबर सपने देख रहे हैं। भला सपने देखने पर भी क्या रोक ?,क्या रुकावट? उन्हें नहीं है अभी तक बाहरी दुनिया की आहट। होगी भी क्यों? वे आत्म मुग्ध जो ठहरे! इसीलिए तो हैं उनके उभय कर्ण सर्वथा बहरे! भला कैसे नाप सकेंगे वे नदी नाले हैं कितने गहरे ? उन्हें तो लुटिया भर चुल्लू में डूब ही जाना है।और डुबाने का सारा श्रेय किसी अंदरूनी पर गिराना है।

देश की भलाई के किसी भी काम में उन्हें भलाई दिखाई नहीं देती । वे इस बात की कसम खाकर ही बैठे हैं,कि भले को भला नहीं कहना। छोटे से छिद्र में भी अपनी अँगुली प्रवेश करके उसे बड़ा करते रहना।कोई भी जीव अपनी प्रकृति से भिन्न कुछ भी नहीं कर सकता।मनुष्य भी एक जीव है, उसकी भी अपनी प्रकृति है।यह भी कोई अनिवार्य नहीं कि मानव शरीर में प्रत्येक जन मानव ही हो। सम्भव कि  उसके किसी सत्कर्म के कारण उसे मानव देह प्राप्ति का लाभ सुलभ हो गया हो,किन्तु प्रारब्ध के संस्कार की शक्ति कहाँ जाएगी। इसलिए कुछ मानव देहधारी जीव गिद्ध,बाज, चील,मच्छर, खटमल तथा अन्य हिंसक जीव की प्रकृति न छोड़ पाने के लिए बाध्य हैं।सफेद पंख धारण करके बगुला हंस नहीं हो सकता।फिर उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे देश की लुटिया डुबाने आए हैं या शक्ति संतुलन के भारी बाँट बनकर उभरे हैं।

स्पीड - ब्रेकर का काम ही स्पीड को ब्रेक करके चलती हुई तेज रफ्तार गाड़ी को धीमा कर देना है। वे भी पूरी लगन के साथ इसी काम को अंजाम दे रहे हैं।नदी पार करते समय गाय की देह पर चिपकी हुई जोंक की तरह वे देश का रक्त चूस रहे हैं।जोंक किसी की मित्र नहीं हो सकती ।तो वे भी कैसे देश के हितचिंतक हो सकते हैं! बल्कि देश का हित चिंतन कर्ताओं की पीठ में सूजे ठोंकने की जुगत ढूँढने में खोए रहते हैं।लुटिया डुबाऊ उनकी कोई नीति है न नैतिकता।जैसे भी हो उन्हें डुबाना ही है।

लुटिया डुबाकर खटिया खड़ी करने की उनकी जिद बंटाढार करने पर तुली हुई है।ऐसे लुटिया डुबाने को उतारू लोगों से देश खाली नहीं है।वह अच्छा ही है कि उनका पलड़ा सामने के पलड़े की तुलना में आसमान में टंगा हुआ है, अन्यथा लुटिया  डुबाने में उन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।उन्होंने पहले से ही यह धारणा बना रखी है कि  हम तो डूबे हुए ही हैं सनम ,तुम्हें भी डुबाने की कसम खाए बैठे हैं।बिल्ली खाएगी नहीं तो लुढ़का तो देगी ही।बेपेंदी की लुटिया किस करवट क्या करे, यही देखा समझा जा रहा है।किसी  को डुबा तो पाएगी नहीं, स्वयं डूबकर इतिहास  का काला पृष्ठ  अवश्य  बन जाएगी।

🪴शुभमस्तु !

02.03.2023◆6.00प.मा.

शुक्रवार, 20 जनवरी 2023

कान से ली ; जुबान से दी [ व्यंग्य ]

 ३७/२०२३ 

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व्यंग्यकार © 

 🐁 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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      निंदक औऱ निंदा समाज के आवश्यक तत्त्व हैं।इनके बिना समाज में गति नहीं आती।इसीलिए महात्मा कबीरदास ने सैकड़ों वर्ष पहले कहा था: 'निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।बिन साबुन पानी बिना,निर्मल होत सुभाव।।' 

     'निंदा रस' एक ऐसा रस है,जो मानव मात्र में एक अनिवार्य तत्त्व की तरह विद्यमान है।भोजन के षट रसों औऱ साहित्य के दस रसों से सर्वथा भिन्न इस रस के स्वामी और ग्राहक को किसी विद्यालय ,महाविद्यालय में पढ़ने किंवा प्रक्षिक्षण लेने अथवा किसी विश्वविद्यालय की उपाधि प्राप्त करने की भी आवश्यकता नहीं है।वास्तविकता यह है कि इससे निंदक की ऊँचाई और गहराई की पड़ताल अवश्य हो जाती है ।कहने का तात्पर्य यह है कि यह निंदक की अपनी बुद्धि का बैरोमीटर है।उसके अपने स्तर की माप करता है।इसके साथ ही जो निंदा को सुनता है, उसकी माप तो स्वतः ही हो जाती है ;क्योंकि निंदक सदैव अपने स्तर के श्रोता को खोजकर ही निंदा- प्रवचन करता है।जैसे दो सासें अपनी बहुओं की निंदा तभी करती हैं ,जब श्रोता सास उतना ही रस लेकर उसका आस्वादन करे। बीच बीच में उसकी जिज्ञासा और प्रश्न तो उसको और दीर्घता प्रदान करते हुए अगणित गुणा रस वृद्धि करते हैं। जैसे :' उसके बाद?' ' फिर क्या हुआ?' 'फिर उसने भी लौटकर मारा ? ' आदि वाक्यांश उसके रस उद्भव में चार चाँद लगा देते हैं। निंदा और निंदक मानव - चरित्र की पहचान का पैमाना ही है। 

        निंदा में कभी भी सच तथ्य को नहीं कहा जाता ।झूठ और सच का अनुपात 90 - 100 या कभी -कभी 100-100 भी रह सकता है।यदि कभी कोई सच बात कह भी दे तो उसे सिद्ध करने के लिए प्रमाण देना भी अनिवार्य हो जाता है।यदि ये कहा जाए कि कल्लू के बेटे की बहू आई. ए. एस. हो गई तो कोई भी सहज रूप में विश्वास नहीं कर सकता। उसमें अनेक कैसे ?क्यों?कब?कहाँ?पैदा हो जाएंगे। इसके विपरीत यदि किसी के कान में ये फुसफुसा दिया जाए कि कल्लू के बेटे की बहू देवर के साथ फरार हो गई ,तो बिना किसी क्यों ?कब?कैसे? के बिना सहज रूप में शत- प्रतिशत बात स्वीकार ही होगी।औऱ वह समाज में ऐसे फैल जाएगी ,जैसे पानी के तल पर पड़ी हुई तेल की बूँद। 

         पूर्व में भी कहा जा चुका है कि निंदक की उपाधि कम या अधिक मात्रा में सबके ही पास होती है, क्योंकि वह जन्मजात है। स्वभावगत है।इसलिए सामान्य नर- नारी, चोर या व्यभिचारी, कर्मचारी या अधिकारी, नेता या मंत्री, मालिक या संतरी, शिक्षक या छात्र, कवि या आलोचक, सास या बहू,अड़ौसी या पड़ौसी,मौसा या मौसी ;कहाँ नहीं है। ऐसा व्यक्ति दिन में भी रोशनी- पुंज लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलने वाला ,जो निंदक या निंदा रस लोलुप न हो ! यह एक सर्वप्रिय मुफ़्त का रस है। इसके लिए किसी साक्ष्य ,किसी सौगंध, किसी गंगाजली, किसी गीता पर हाथ रखने आदि की कोई अवश्यकता नहीं है। निंदा सुनकर कोई कभी प्रश्न नहीं करता, सहज विश्वास ही करता है औऱ प्रचारक बनकर उसे जितना हो सकता है ,फैलाने में लग जाता है।

            कबीर दास के अनुसार यह एक ऐसा शुद्धक और बुद्धि सुधारक है कि इसके लिए कोई डिटर्जेंट ,ईजी या फिनायल ,हारपिक क्या पानी की भी आवश्यकता नहीं है।यह निंदक और ग्राहक दोनों को ही शुद्धि प्रदान करने का पुण्य कमाता है।यह अलग बात है कि यह किसी का भाव है तो किसी -किसी का तो स्वभाव ही बन चुका है। जिसका स्वभाव ही निंदा है, वह कदापि नहीं अपने कर्म से शर्मिन्दा है। क्योंकि वह तो एक ऐसा उड़ता हुआ परिंदा है कि कभी इस डाल पर तो कभी उस डाल का वासिन्दा है। ऐसा निंदक जब तक जिंदा है, तब तक उसकी जबान पर अपना आसन जमाए हुए रानी निंदा है।अब चाहे वह मुम्बई ,कोलकाता हो या भटिंडा है।उसके माथे क्या उसकी सारी देह पर निंदा का बिन्दा है।

        निंदानंद को कभी क्रय नहीं करना पड़ता। इसको देने और लेने में कोई आर्थिक व्यय या हानि भी नहीं है। जब निंदा रस ही है ,तो कष्ट भी क्या होने वाला है? विरस होता तो लेने देने में आपत्ति भी हो सकती थी।गुणकारी जानकर तो लोग नीम और कुनैन को भी प्रेम से रसनास्थ कर जाते हैं।उदर में जाकर तो गुलाबजामुन और भिंडी की सब्ज़ी का भी एक ही हस्र होता है।इसके विपरीत निंदा सदा आनन्दप्रद ही बनी रहती है।अलग- अलग कानों में अलग - अलग मुखरविंदों से निसृत होकर अपना एक नवीन प्रभाव ही भरती है।भर पेट निंदा- रस लेने के बाद भी अपच नहीं होती।दूसरी ओर देने पर यह घटती भी नहीं।

       ठलुआ क्लब में समय व्यतीत करने का इससे अच्छा कोई साधन भी नहीं है।'हर्रा लगे न फिटकरी रँग चोखा ही आए'। यह घर, बाहर, दफ्तर, सड़क, पनघट,गली का नुक्कड़,घूर- स्थल,सभाकक्ष,जल भरण- थल, गली के नुक्कड़,दुकान, मध्याह्न -गोष्ठी स्थल, स्वेटर- बुनाई स्थल,विवाह ,शादी के उत्सव,परस्पर वस्तु-विनिमय काल आदि अनगिनत स्थान औऱ समय हैं ,जब निंदा रस- प्रसार अनवरत और अबाध रूप से होता है। 

       कबीरदास जी ने जब निंदक को नियरे अर्थात पास में रखने की पवित्र औऱ नेक सलाह दी, तो मेरा यह सोचना आवश्यक हो गया कि जब हम निंदकों की बस्ती, गली, दफ्तर, बाजार आदि सभी जगह निंदकों का बहुमत पाते हैं तो चाहे या अनचाहे उनसे बच भी तो नहीं सकते। वे तो धुएंदार हवा की तरह सभी जगह पहले से ही विद्यमान हैं।वे तो पहले से ही हमें छुछून्दर की तरह सूँघने में लगे हुए रहते हैं।उन्हें पास में क्या रखना?वे स्वयं हमें अपने पास रखे हुए होते हैं।वे कोई निराश्रित या बेघर तो हैं नहीं जो उनके लिए आँगन में कुटी छ्वानी पड़े। वे तो बहु मंजिला भवनों ,कोठियों और बिना आँगन के भवनों रहने वाले /वालियाँ हैं।अब आजकल के आवासों में आँगन बनाने का फैशन ही समाप्त हो गया तो कुटी छवाई भी कहाँ जाएगी? निंदा तो एक ऐसी 'बू' है जो सुनने और सुनाने वाले के लिए खुशबू है तो जिसकी फैलाई जाए ,उसके लिए बदबू है।एक ही वस्तु के उभय गुण ।कान से ली औऱ जुबान से दी जाती है;औऱ कभी -कभी तो फुसफुसाहट में ही मैदान पर मैदान पार करती हुई देखी जाती है। वाह री ! निंदा और वाह रे! निंदकों /निन्दकियो! 

 🪴शुभमस्तु! 

 20.01.2023◆ 11.30आरोहणम् मार्तण्डस्य। 

रविवार, 18 दिसंबर 2022

दोषी कोई और है, मैं नहीं 👈 [ व्यंग्य ]

 534/2022

 

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🤫 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                 इस असार संसार में एक मात्र निर्मल प्राणी यदि कोई है, तो वह मनुष्य ही हो सकता है।इस बात को सिद्ध करने के लिए मनुष्य से अच्छा प्रमाण मिलना सम्भव नहीं है।उदाहरण के लिए यदि आपसे कोई गलत, अनैतिक,अनुचित, असामाजिक, अवैध,या देश,कानून औऱ समाज की दृष्टि में गलत कार्य जाने या अनजाने में हो जाता है, तो बिना सोचे समझे आप यही कहेंगे कि यह मैंने नहीं फलां व्यक्ति ने अथवा किसी औऱ ने किया है; मैंने नहीं किया।आप शत- प्रतिशत नकार जाएँगे कि उसे आपने ही अंजाम दिया है।किसी भी तरह आप अपना दोष स्वीकार नहीं करेंगे।स्वदोष स्वीकार न करने की यह कला,प्रवृत्ति या संस्कार मनुष्य मात्र में स्वभावगत है। आपके स्थान पर मैं या कोई अन्य व्यक्ति भी होगा तो वह भी वही करेगा ,जो आपने किया है।

           यदि मनुष्य स्व दोषों को सहजता से स्वीकार कर लेता तो आज के संसार की दशा और दिशा कुछ और ही होती।ये कचहरियाँ, दीवानियाँ,अदालतें, जज ,अधिवक्ता,स्टाम्प वेंडर आदि कुछ भी न होते। हजारों लाखों लोगों का व्यवसाय ही चौपट हो जाता।अदालतें अदालतें न होकर दंगल के मैदान हैं, जहाँ लड़ाई झूठ और झूठ के बीच नहीं, बल्कि सच और सच के बीच है। वादी अपने को सच कहता है,और प्रतिवादी अपनी सचाई का बिगुल बजाता है । फिर ये झूठ क्या वकील साहब के काले कोट की जेब में छिपा बैठा रहता है। यदि प्रतिवादी के ख़िलाफ़ मजबूत प्रमाण मिल गए और उन्होने सही सिद्ध भी कर दिया तो प्रतिवादी पराजित हो जाता है।वह दोषी सिद्ध हो जाता है। यदि सहजता से उसके द्वारा अपना दोष स्वीकार कर लिया जाता तो कोर्ट कचहरी(जहाँ मुकदमा लड़ते लड़ते कच का हरण हो जाए)तो इतना सारा बखेड़ा क्यों खड़ा होता। पर इससे कुछ लोगों का रोजगार चलना भी तो जरूरी था ,इसलिए दूध का दूध पानी का पानी करने के लिए काले कोटों के बीच सफेदी की लड़ाई करनी आवश्यक हो गई।

          इसके विपरीत स्थिति में विचार करके देखें तो स्पष्टत: यह तथ्य प्रत्यक्ष होता है कि मनुष्य बुरे और बुरे से भी बुरे कार्य करने का दायित्व दूसरों पर डालता है।किन्तु यदि अच्छा कार्य करता है तो फोटो खिंचवा कर,वीडियों बनवाकर , अखबारों, टीवी और सोशल मीडिया पर प्रसारित करवा कर स्व श्रेय लूटने में पीछे नहीं रहता।मात्र स्वदोष का प्रक्षेपण ही दूसरों पर किया जाता है ।मनुष्य की इसी प्रवृत्ति की देन हैं ये समस्त प्रकार के कोर्ट, हाई कोर्ट ,सुप्रीम कोर्ट । इसका अर्थ यह भी हुआ कि कोर्ट अच्छे कार्य के लिए न होकर उसके दोषों को उजाकर करने और उसकी सचाई बाहर लाने के लिए ही बनाए गए हैं ,किन्तु क्या इन सबके बावजूद उसने गलत काम करना ,अपराध करना अथवा झूठ से दूर रहना छोड़ा है? इस कार्य में कोई कमी न आकर और भी बढ़ोत्तरी हुई है। आदमी दिन प्रति दिन किस दिशा में जा रहा है ;स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।उसके निरंतर दिशा - विवर्तन के कारण ही उसकी दशा का सुरूप कुरूप होता जा रहा है। 

        अपने को खटाई में न डालकर दूसरों को खटाई में झोंक देने का स्वभाव मनुष्य की काइयाँपन की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है।'मैं सुरक्षित बचा रहूँ , सब भाड़ में जाएँ।' यह सोच उस आदमी की है जो बहुत अधिक धार्मिक,पवित्र, उदार,मानवतावादी, आध्यात्मिक, परोपकारी, जनसेवी और करुणाशील होने के दंभ में चूर रहता है। लेकिन जब समय ,कानून और न्याय का डंडा उसकी पूँछ उठाकर उसका नग्न यथार्थ जग जाहिर कर देता है ,तो उसे अपना मुँह छिपाने के लिए भी सुरक्षित जगह की खोज करनी पड़ती है।

              इस प्रकरण की एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि पढ़े - लिखों और बिना पढ़े लिखों में कुछ तो अंतर अवश्य होता ही है। साधारणतः जितने काइयाँपन और चतुराई से पढ़ा -लिखा व्यक्ति स्वदोष पर आवरण डालने में कुशल होता है,उतनी कुशलता एक सीधा और सरल व्यक्ति नहीं दिखा पाता। पढ़ - लिख कर स्वदोषों को छिपाने की कलाओं, युक्तियों,बुद्धि - चातुर्य,जुगाड़बाजी आदि की मात्रा में कई गुना वृद्धि हो जाती है।पढ़ा ही इसीलिए जाता है। पढ़ा-लिखा व्यक्ति कोरी स्लेट नहीं होता।पढ़ लिख कर भी यदि कोई कोरी स्लेट बना रह गया तो उसका पढ़ना -लिखना ही अकारथ! इसलिए स्वदोष प्रक्षालनार्थ पढ़ाई एक अनिवार्य कर्म है।स्वदोष प्रक्षालन का साबुन है पढ़ाई।वही दोष के मैल को रगड़- रगड़ कर साफ़ कर देती है।इसलिए मनुष्य को खूब पढ़ना भी चाहिए ;क्योंकि वह अपने दोषों को दूसरों के सिर मढ़ने के संस्कार से इस मनुष्य यौनि में तो मुक्त हो नहीं सकता।सभी युगों में जो मनुष्य स्वदोषों को छिपाकर पर प्रक्षेपण में जितना प्रवीण होता है ,वह उतना ही बड़ा नेता, अधिकारी,कर्मचारी, आम या खास नर -नारी बन कर उभरता है।जिनकी कार गुज़रियों से टीवी ,अखबार, सोशल मीडिया आबाद रहता है।यदि विश्वास न हो तो आज का ही अख़बार उठाकर देख लीजिए, अथवा टीवी खोल लीजिए औऱ ज्यादा दूर न जाना चाहें तो हाथ के मोबाइल की झाँकियाँ देख लीजिए।वैसे भी इसमें बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं, ये संसार ही गुण- दोष मय है।  '"जड़ चेतन गुण दोषमय,विश्व कीन्ह करतार। संत-हंस गुण गहहिं पय,परिहरि वारि विकार।। " 

     अब आप और हम न तो संत हैं और न ही हंस हैं ; जो वारि- विकार को छोड़कर केवल दुग्ध पान ही करें। अपने अनिवार्य दोषों को ढँक पाने की कला भी न सीख पाए तो मनुष्य होने का लाभ ही क्या ? सबसे बुद्धिमान प्राणी होने का गौरव जो मिला हुआ है! जिसमें 'स्वदोष -छिपावन -कला' की प्रवीणता भी तो सम्मिलित है।

 🪴 शुभमस्तु! 

 18.12.2022◆ 6.00 पतनम मार्तण्डस्य।


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शनिवार, 6 अगस्त 2022

सबके अलग-अलग पैमाने ! 🚦 [ व्यंग्य ]

 

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व्यंग्यकार © 

 🛝 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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 यहाँ सबके पैमाने अलग - अलग हैं। सबकी अलग- अलग सोच और समझदानी का परिणाम है कि पैमाने ही बदल गए।पुराने समय में आजकल की तरह माता-पिता अथवा स्वयं लड़की अपने लिए वर की तलाश नहीं करते थे।परिवार के लोगों द्वारा नाई - बाँभन पर इतना अधिक विश्वास किया जाता था कि इस कार्य का दायित्व उन्हें ही सौंप दिया जाता था। वे दोनों जहाँ भी रिश्ता तय कर देते थे ,विवाह वहीं कर दिए जाते थे।

     एक बार एक गाँव में एक माँ- बाप ने अपनी युवा विवाह योग्य पुत्री के रिश्ते के लिए गाँव के ही बाँभन और नाई को भेज दिया और उनके पूँछने पर बता दिया कि लड़के की उम्र लगभग उन्नीस बीस इक्कीस होनी चाहिए।वे दोनों लोग कहीं दूर गए औऱ कुछ दिन बाद लौटकर आ गए और बताया कि वे उनकी बेटी का रिश्ता तय कर आए हैं। जब उन्होंने भावी वर की उम्र के विषय में पूछा तो बताया गया कि उन्होंने जो बताया था , उसी उम्र का लड़का है, यही कोई उन्नीस बीस इक्कीस का।घर वाले संतुष्ट हो गए।कुछ समय व्यतीत हुआ और वह शुभ दिन भी आ गया जिस दिन बारात आने वाली थी।ढोल पीपनियों के बैंड के साथ बारात भी दरवाजे पर आ गई।अगवानी की गई ।किन्तु जब गाँव की जनता औऱ घर वालों ने वर को घोड़ी पर मुँह लटकाए हुए,घोड़े की जीन में पैरों को अटकाए हुए ,कमर को झुकाए हुए देखा तो उनकी आँखें खुली की खुली रह गईं।तुरंत नाई -बाँभन की जोड़ी को तलब किया गया, इस साठ साल के बूढ़े के साथ जवान बेटी का रिश्ता तय करके आए हैं, तो उन्होंने भी स्पष्ट उत्तर देते हुए पल्ला झाड़ लिया कि आपने ही तो कहा था कि उन्नीस बीस इक्कीस का होना चाहिए । उन्नीस बीस औऱ इक्कीस कितने हुए ? साठ ही न! इसमें हमारा क्या दोष।उनके पैमाने के तर्क से हारकर कर विवश माँ - बाप को उस साठ वर्षीय वर के साथ अपनी बेटी की शादी करनी पड़ी।तब से हर माँ -बाप ने नाई - बाँभन का विश्वास खो दिया और स्वयं वर पसंद करने जाने लगे।


     ये आदमी जीव ही ऐसा है कि इसके पास अपने प्रत्येक गलत कार्य के लिए बेजोड़ सफाई है। अकाट्य तर्क हैं।ग़लत को भी सही ठहरा देने की सूझबूझ पूर्ण तरकीबें हैं। किसी चोर ,डकैत, गिरहकट, अपहर्ता, गबनी, दुष्चरित्र, बेईमान के पास इतनी सफाइयाँ, तर्क और खूबियाँ हैं कि अच्छे -अच्छे जज भी चक्कर खा जाएँ।इसीलिए तो अदालतों में फैसले सही समय पर नहीं हो पाते और अपराधी साफ बच जाते हैं।निरपराध कारागार की रोटियाँ तोड़ते हैं। पानी में दूध मिलाने वाला कहता है कि आज भैंस ज्यादा पानी पी गई इसलिए दूध पतला है।दूध में पानी नहीं मिलाया , पर जो किया है उसे किसी को नहीं जताया कि दोहनी के पानी में ही धार को गिराया ! 

         तर्क के मामले में पढ़ा- लिखा आदमी वकील बराबर,और बिना पढ़ा-लिखा खुदा बराबर। गँवार से भगवान भी हारे। बुद्धिमान तो एक ओर मुँह तकते बेचारे। शायद इसीलिए कहा गया है कि गँवार, बुद्धिमान ,पागल और स्त्री से कभी बहस नहीं करनी चाहिए। इनसे बहस करने से पहले सोच लेना चाहिए कि हार भले ही न हो ,पर हार माननी ही पड़ेगी। आदमी ,इसलिए आदमी नहीं कि वह किसी से भी हार मानेगा! उसे येन- केन- प्रकारेण जीत ही चाहिए।साम,दाम ,दंड ,भेद ;कितनी ही तरकीबें हैं उसे जिताने के लिए।अपनी युक्तियों के बल पर भी वह हाथी जैसे विशाल, शेर चीता जैसे हिंसक औऱ खूँख्वार पशु और सर्प जैसे विषैले जीव को भी अपने चाबुक तले रौंद देता है। आदमी के लिए आदमी चीज ही क्या है! इसीलिए आदमी ,आदमी का स्थाई मित्र नहीं है।उसकी मित्रता भी सशर्त है।अब शर्त जो भी हों। दृश्य हो या अदृश्य ; परंतु क्या आदमी कभी ऐसा भी हो सकता है कि बिना शर्त मिताई करे!सूक्ष्म अदृश्य धागे के बराबर अवश्य स्वार्थ की शर्त होगी ही।यह गहन शोध का गहन विषय है।

         आदमी का पैमाना कब ,कहाँ, कितना परिवर्तित हो जाएगा, कुछ कहा नहीं जस सकता। ये सब स्थितियों, परिस्थितियों पर निर्भर करता है।इसीलिए उसने एक दूसरे का विश्वास खो दिया है ।वह अपने पालतू कुत्ते पर विश्वास कर लेगा ,परंतु अपने चौकीदार पर नहीं।अपने गधे पर विश्वास कर सकता है ,पर गधा चराने वाले पर नहीं। लोग कहते हैं कि जमाना बदल रहा है। जमाना बदल नहीं रहा ,अब वह जम नहीं रहा। उखड़ रहा है।आदमी के दिमाग की माँग उसे कहाँ ले जाएगी, अकल्पनीय है।आदमी के दिमाग की माँग में नीति और नैतिकता को तो भूल ही जाइए।पुराने पैमाने तोड़ने औऱ नए- नए बनाने की उसकी हॉबी अनन्त तक ले जाने वाली है। यही तो उसकी खूबी निराली है।

 🪴शुभमस्तु ! 

 ०६.०८.२०२२◆८.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सोमवार, 25 जुलाई 2022

कबीर एक चाहिए 🛖 [ व्यंग्य ]

 

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 ✍️ व्यंग्यकार ©

 🛖 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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 परम् सौभाग्य का विषय है कि जब हमने इस दुनिया की धरती पर पदार्पण किया और कुछ करने के योग्य हुए तो हमने पाया कि यह समाज जिसके मध्य रहकर हम निर्विघ्न रूप से साँस ही नहीं ले रहे ;वरन रह भी रहे हैं।इस अत्यधिक सुधरे हुए समाज में हमारे करने के लिए कुछ भी नहीं बचा ; अब आप ही बताइए भला कि इस समाज के लिए क्या नया करके हम अपना नाम मुस्कराते हुए फोटो सहित अखबार की सुर्खियों में छपवाएं कि सारा देश और समाज धन्य- धन्य कह उठे कि वाह ! 'देश प्रेमी' जी आप तो आप ही हैं ;जो आपने समाज को ऊपर उठाकर कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया। यदि आप नहीं होते तो इस समाज और देश का क्या होता! ये वहीं का वहीं पड़ा रह जाता।पर खेद है कि क्या करें ;करने के लिए ,अपने समाज सुधारक हाथ दिखाने के लिए कुछ भी शेष नहीं है।सब कुछ पहले से ही ठीक - ठाक मिला है। 

 साहित्य की किताबों में पढ़ते हैं कि आज से छः सात सौ वर्ष पहले समाज के विभिन्न धर्मों ,मज़हबों ,जातियों ,वर्णों के बीच गहरी खाइयाँ बनी हुई थीं, जिन्हें पाटने के लिए एक साहसी समाज सुधारक संत कवि कबीर ने अपने दोहों के फावड़े चला- चला कर देश में घूम - घूम कर दिन- रात पसीना बहाया, पर कह नहीं सकते वे अपने सपनों को साकार करने में कितने सफल हुए।हाँ ,इतना अवश्य हुआ कि उनके सुधार की बात सुनकर ऐसा लगा कि लोगों के कानों में सीसा पिघला कर डाला जा रहा हो।कबीर न हिंदुओं को अच्छे लगे और न मुसलमानों को।क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी कहा वह भले ही सत्य हो ,पर करेले जैसा कड़वा ही था।आप जानते हैं कि करेला चाहे कितना ही गुणकारी हो ,सबको प्रिय नहीं होता।यही बात कबीर के समय में कबीर वाणी के लिए भी थी।जैसे सुअर को कीचड़, गुबरैले को गोबर,मुर्गे को बांग, मुर्गापसंद को टाँग,हालाप्रिय को नाला,मिठाई को लाला,चरित्रहीन को घोटाला, नेताजी को माला -दुशाला,दोस्तों को प्याला, सपेरे को नाग काला ;पसंद है। वैसे ही खाइयों के वासियों को कबीर नापसंद थे। पर क्या करें : 'जो आया जेहि काज सों, तासे औऱ न होय।' के अनुसार तो कबीर दास जी जिस काज से आए थे ,उसमें उन्होंने कोई कमी नहीं छोड़ी:-

- 'अरे इन दोऊ राह न पाई। 

 हिंदुन की हिंदुआई देखी, तुरकन की तुरकाई।

 हिन्दू अपनी करें बड़ाई, गागर छुअन न देई।

 वेश्या के पामन तर सोवें, यह देखो हिंदुआई।

 मुसलमान के पीर औलिया, मुरगा मुरगी खाई।।'

 आज का समाज खाइयों में नहीं ; हिमालय की ऊंचाइयों में निवास कर रहा है।हर वर्ग ,वर्ण,जाति के अपने ऊँचे- ऊँचे पहाड़ हैं, जिन पर इधर - उधर उगाए गए सुंदर कैक्टस के झाड़ हैं,कोई किसी से छोटा नहीं है। सब बड़े हैं। अपनी -अपनी तर्क-संहिता पर अड़े हैं। ऊँच -नीच ,छुआछूत,भेदभाव,असमानता - कबीर काल से भी ऊँची है।लेकिन हॉस्पिटल की उस टेबिल पर जहां उसे रक्त लेना है, जाति ,वर्ण भेद भुलाकर देवता हो जाता है आदमी।भोजन पानी किसी निम्न वर्ण का स्वीकार नहीं ,परंतु यहाँ कोई इनकार नहीं। बस जान! जान !!औऱ जान!!! और किसी से नहीं कोई पहचान।किसी भी तरह बचे जान।चाहे किसी का भी लहू भर दो , पर मरते हुए को जिंदा कर दो।ये भेद भाव, छोट बड़ाई बस चौके से चौकी तक ही है। वास्तव में समाज बहुत ऊँचाई पर आसीन हो चुका है। अब तक तो गधे को बाप बनाने में भी परहेज नहीं था,पर अब तो गधा ही नहीं , सुअर,श्वान या बिना स्नान शूद्र भी चलेगा।जरूरत जब आन पड़ी तो अपनी पवित्र आत्मा को भी छलेगा। मर ही गया तो अपने हाथ भी नहीं मल सकेगा।इसलिए पहले जान, फिर कोई औऱ सामान।सारी हेकड़ी चूर - चूर। समय की माँग है ,होना पड़ा मजबूर। अब नहीं कहता दूर -दूर।पता नहीं कहाँ हो गया परिजन सहित पेशेंट का अहं काफ़ूर। 

  याद आता है कभी संत कबीर ने सही कहा था। जो तब तो लगता था तमाचा ,पर आज समझ में आ रहा है वह था जगाने का बाजा।पर सच की आवाज सुनना ही कौन चाहता है। अपने पैमाने से दुनिया को नापता है।जो समझता है अपने को ऊँचे पहाड़ पर , वह वास्तव में बनाए बैठा है घर आड़ पर। कुएँ का मेढक जब कुएँ से बाहर आया तो उसे बाहर बड़ा - बड़ा दृश्य भी नज़र आया। बेचारा बहुत ही शरमाया।अपने आनन्द को स्वयं ही धक्का लगाया।सड़े हुए जल को पिया और पिलाया।कुल मिलाकर बहुत ही भरमाया।समय भी गँवाया। पर आँख जब खुली तो एक नया जगत ही हुआ नुमाया।जब तक पड़ा रहा दिल दिमाग पर भ्रम का साया , नए युग में समझदार बहुत पछताया।नासमझ कभी पछताते नहीं। क्योंकि अपने को छोड़ किसी को सही बताते नहीं। 

  मुझे लगता है कि आज भी एक कबीर चाहिए।जो अहंवादियों की आँखें खोले ही नहीं ,पुतलियाँ बाहर लाकर दिखला दे कि देख दुनिया कितनी बड़ी है। तेरी अंहवादिता आज भी इतनी कड़ी है,कि तू आँखें बंदकर दिन में भी अंधा है। तू निशाचरी उलूक है या बंदा है? यहाँ किसी का खून हरा है ,किसी का लाल है । किसी का काला है किसी का दहकता लावा है। वर्ण भी तो खून के अनुसार ही है,आहार का प्रभाव है ।तमस, सत्व और राजस का जैसा स्वभाव है,वैसे ही भर देता उसमें बदलते चाव है।कबीर यहाँ आकर भी क्या करें, या तो वे आएँ ही नहीं,या आकर बेमौत मरें।कबीर जैसों का जीना मुहाल है, आदमी की आदमियत पर लग गया सवाल है। जो आदमी आदमियत की बात करे ,वहीं उठने लगता बबाल है। सब जगह सियासत का कमाल है। जहाँ भी देखिए उसी का धमाल है।

        झूठों के साथ ही है जमाना। सच्चों का नहीं है कोई कहीं अपना।एक कबीर बेचारा इस युग के कवियों के बीच कबाड़ है।ये चमचों ,चापलूसों ,चुग़लों की चौपाल है।यहाँ कबीर क्या करेगा ,कविता ही निढाल है। कबीर एक साहस का नाम है। पर आज कवियों में वही तो नहीं है। बस जो कह दिया वही सही है।उसी का सम्मान है।उसके हाथ में लेखनी नहीं, व्हाट्सअप की कमान है।जिससे आप सबकी बड़ी अच्छी जान - पहचान है।इतने सबके बाद भी मुझे लगता है कि आज भी एक अदद कबीर चाहिए। 

 🪴शुभमस्तु ! 

 २५.०८.२०२२◆११.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


शनिवार, 2 जुलाई 2022

जिह्वा - पुराण ! 🗣️ [ व्यंग्य ]

  

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🗣️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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 परदे के पीछे रहकर भी बड़े - बड़े काम किए जा सकते हैं।किए जा रहे हैं, पहले भी किए जाने का लंबा इतिहास रहा है।इससे कोई ज्यादा अंतर नहीं पड़ता कि चीज कितनी बड़ी अथवा छोटी है।भीमकाय मनुष्य भी एक नन्हीं-सी चुहिया नहीं मार पाता और नन्हीं सी पिपीलिका भी हाथी को चिंघाड़ भरने के लिए पर्याप्त है।बात परदे के पीछे छिपकर कार्य करने की है। 

 प्रकृति ने जितनी भी चीजों का निर्माण किया है ,उनके सबके ही नकारात्मक औऱ सकारात्मक दोनों ही पहलू हैं।अब मुँह के भीतर दो गालों ,बत्तीस दाँतों और दो मजबूत जबड़ों के बीच बहुमुखी प्रतिभा की धनी, हर समय रस से सनी,प्रेम के लाल रंग से बनी- ठनी,अस्थि हीन ,लचीली ,रबर की तरह कभी छोटी कभी तनी :जीभ की ही बात करते हैं। 

 ये मत समझिए कि ये बहुत छोटी है ,क्या कर सकेगी। इसकी क्षमता अपार है।ये कभी रस - भरी है , कभी तलवार का प्रहार है।जहाँ ये निवास करती है; वह कभी नरक का द्वार है तो कभी स्वर्ग का सार है। बात केवल उसके प्रयोग की शैली की है। एक लोक प्रचलित दोहा इस प्रकार कहा गया है :

 काने तें कानों कहौ,कानों जागौ रूठ। 

 हौले - हौले पूछिओ,गई तेरी कैसें फूट।। 

 जीभ को अनेक नामों से संबोधित किया जाता है।जैसे रसना,रसज्ञा, रसिका, रसा ,रसेन्द्रिय, जिह्वा, अरुन्धती, वाचा ,वाणी,गिरा,जबान, आदि। नाम के अनुसार ही उसके अनेक गुण भी हैं।जहाँ रस की बात आती है ,ये स्वाद लेने के लिए विख्यात है।इसे खट्टे, मीठे ,तीखे,नमकीन, कड़ुए, कसैले सभी प्रकार के रसास्वादन में आनन्द आता है।दूसरी ओर ये मीठा या कडुवा बोलकर देश ,समाज या व्यक्ति व्यक्ति में क्या से क्या कर डालती है।महाभारत का युद्ध एक नारी की जीभ के कारण ही अठारह अक्षौहिणी सेना, हाथी ,घुड़सवारों आदि के विनाश का कारण बन गया।इस प्रसंग से भला कौन अनभिज्ञ है ? वही बात आती है कि 'काने तें कानों कहौ' तो बुरा मानना (कानों जायगौ रूठ) तो स्वाभाविक है ,फिर उसका दुष्परिणाम भुगतना भी स्वाभाविक ही है। कौन किस सीमा तक जाकर विनाश को दावत दे सकता है ,ये कौन जानता है भला? यही जीभ जब मीठा बोल बोलती है ,तो मानो फूल झड़ते हैं। अमृत की वर्षा ही होती है। मीठा बोलने से बड़े से बड़े असाध्य काम भी सहज साध्य हो जाते हैं। दूसरी ओर बड़ी बड़ी ठगियाँ भी होती हुई देखी जाती हैं।इसका एक नाम 'जबान' भी है, तो इससे यह भी ध्वनि आती है कि ये सदा जवान ही रहती है। कभी बूढ़ी नहीं होती। 

 जीभ की अनेक विशेषताओं में यह भी कि इसकी रचना अति साधारण होते हुए भी जटिल है। इसमें अस्थि या हड्डी जैसी वस्तु नाम मात्र को भी नहीं होने के कारण इसका लचीलापन इसका विशेष चमत्कारिक गुण बन जाता है। चूँकि इससे हम सभी बोलने का काम लेते हैं, तो यदि कोई कही हुई बात का परिणाम हमारे विपरीत होता हुआ दिखाई देता है ,तो ये अवसर देखकर पलट भी जाती है। लचीली जो है।इसे झूठ या सच से कोई मतलब नहीं है ,ये आप जानो, आपका मन जाने, आप ही भुगतो। ये तो बस कहकर तुरंत भीतर घुस जाती है।

 रहिमन जिह्वा बाबरी,कहि गई सरग पताल। 

 आपु तो कहि भीतर रही,जूती खात कपाल।

 रस औऱ विष की एकसाथ वाहिका रसना देवी तेरी महिमा अपरंपार है।तेरे ऊपर नियंत्रण एक हाथी पर अंकुश के नियंत्रण की तरह है।जैसे एक बिगड़ा हुआ अनियंत्रित हाथी सदैव विनाश ही करता है,वैसे ही तू भी परिवार,समाज और देश का विनाश ही करती है। बोलने वाली जीभ चाहे आदमी की हो या औरत की, उस पर नियंत्रण का चाबुक चलना ही चाहिए। बिगड़ैल बोल कभी किसी का भला नहीं कर सकते।युग -युग से बिगड़ैल जीभों की यही कहानी चली आ रही है।राजनेताओं की बिगड़ी हुई ज़बान हमेशा से कीचड़ उछालने में पारंगत रही है। चौराहे से चौपालों तक, रेडियो से टीवी चर्चाओं तक, यहाँ तक कि सारे समाज में राजनेताओं की जीभ की दुर्गंध विष के बीज बोती हुई प्रदूषण को बढ़ावा दे रही है। देश के वही कर्णधार यदि देश को आग से बचाना चाहते हैं ,तो क्या यह कभी सम्भव हो सकता है।बड़बोले पन के समर्थक लोग ,अंधे भक्त, चमचे आदि सभी आग में घृत छिड़काव की नहीं,घृत वर्षा के बड़े -बड़े काले बादल लेकर आ रहे हैं, विषैली वाणी की घृत -वर्षा कर रहे हैं। इनके जाने देश जाए भाड़ में , पर उन्हें गलत जीभों का सबल समर्थन करना है ,तो करना है। सच को स्वीकार करने में इनकी नाक जो कटती है।इसलिए झूठ पर मक्खन लगाकर प्रस्तुत किया जाता है ,किया जा रहा है।एक छोटी -सी ज़हरीली जीभ कितने घातक कांड करवाने की उत्तरदायी है, जाना नहीं जा सकता । पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता।इसीलिए तो कहा है : 

 सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात असत्यम प्रियम। 

 🪴शुभमस्तु ! 

 ०२.०७.२०२२◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।


              

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...