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बुधवार, 5 फ़रवरी 2025

कुंभ -स्नान [मनहरण घनाक्षरी]

 061/2025

          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

आस्था का प्रवाह कुंभ,चेतना की थाह कुंभ,

संतों का उछाह   कुंभ  ,सभी   उमाह   रहे।

ज्ञानी-ध्यानी ऋषि -मुनि,आम या विशेष जन,

शुद्ध   करें     देह   मन,  पाप   निवार   रहे।।

एकमेक   हुए   सब,  जाति   है न याद  अब,

संप्रदाय      भी   विलग,  त्रिवेणी-धार   बहे।

मन   में   है  एक   चाव, एक ही पवित्र  भाव,

कर्म   की   ही   काम्य   नाव,देह सुकान गहे।।


                          -2-

सबका  ही  एक  ध्येय, सबका  ही नेक   प्रेय,

सब भी  हों  एकमेव,   एक     ही विचार    है।

भाषा  जाति  भिन्न भले,सभी ध्वज एक  तले,

सबके     ही   पाप    जले, जीवन असार    है।।

एकता     का    महायज्ञ,   जन   हैं  दृढ़प्रतिज्ञ,

आए    नर   मूढ़     विज्ञ,   जन पारावार   है।

उलट  आचार   रहें,  कुंभ -  नीर   संग     गहें,

त्रिवेणी   की   धार बहे,   एकता  सवार    है।।


                         -3-

नर - किन्नर     संत   हैं, सघन   एक तंत्र    है,

ये   कुंभ शुचि मंत्र  है,  एक   ही सु - धार  है।

कीर्तन     भजन   नेक,  भले ही पृथक    टेक,

नहीं कहीं रोक  - टोक  ,पूजन  से  प्यार   है।।

मानव - संदेश    एक,    पूर्ण  विश्व के    सहेत,

नेह     बहे       समवेत,    त्रिवेणी विचार    है।

गाँव   नगर  कस्बे  हैं,  भले  अलग चश्मे     हैं,

एक   साथ     चलते    हैं,  ट्रेन   में सवार    हैं।          


                         -4-

भारत     देश     एक    है,  मजहब अनेक   हैं,

एकता      ही     टेक     है,   हर - हर   बोलिए।

सुसंग     सेवा    साधना,  करते   हैं आराधना,

आपदाओं   का    सामना,  अमृत ही  घोलिए।।

मुख  के अमिय   बोल,  शब्द-शब्द बोल  तोल,

जीवन   है   अनमोल,  हृदय  -  द्वार   खोलिए।

सबका  है    एक   चाव,  रहे    नहीं  शेष   घाव,

कुंभ - जल  छत्र  छाँव,   उलट   मत  डोलिए।।


                         -5-

संगम  सहिष्णुता  का,  मानव  की समता  का, 

प्रेम   दया   ममता   का, और   कहाँ    पाइए।

ज्ञान   भक्ति   और   कर्म, मानवीय सत   धर्म,

सांस्कृतिक नित्य    मर्म,  जान    यहाँ   जाइए।।

गङ्गा है  विनम्र  ज्ञान, यमुना  सु- भक्ति    खान,

सरस्वती    कर्म      मान,    नित्य  अपनाइए।

सबकी   है  एक चाह,   त्रिवेणी   में   अवगाह,

कुंभ  का  सुखी  प्रवाह,    पुण्य   भी   कमाइए।।


शुभमस्तु !


04.02.2025●10.30 आ०मा०

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गुरुवार, 25 जनवरी 2024

राम में समाइए ● [ मनहरण घनाक्षरी]

 033/2024

             

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● ©शब्दकार

● डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                       -1-

राम नाम है     महान,  नित्य  जपें राम  गान,

भक्त   तेरी   आन  बान,  राम   रूप ध्याइए।

पापी जन  दिए  तार, किए   पाप  से      निवार,

राम    हैं    महा    उदार,   उर    से लगाइए।।

राम - से ही  एक राम,  और से न दूजा    काम,

राम  नाम   मात्र   धाम,   राम   क्यों  भुलाइए।

कण-कण   बीच  राम, हिय  के नगीच   राम,

राम   से   ही    सींच  धाम, राम  में   समाइए।।


                        -2-

राम का  स्वरूप  एक, राम  की  है नेक  टेक,

हिय   में  टटोल  देख,  खोज - खोज    लाईए।

तात - मात  बात  मान, लिया एक प्रण   ठान,

संग      जानकी       पयान,   राम  ऐसा    चाहिए।।

भीलनी  के जूठे   बेर,  खाए  बिना सूक्ष्म  देर,

भ्रात     प्रिय    रहे   हेर,   ऐसे    बन   जाइए।

राम  - सा है और कौन,शास्त्र या  पुराण   मौन,

छवि    है   माधुर्य   लौन,   राम   में  समाइए।।


                        -3-

राम  कृष्ण  का  है  देश, पीत गेरुआ है वेश,

भक्ति   प्रेम  का   सँदेश,   हिय  में बसाइए।

विष्णु - अवतार  श्रेष्ठ,कौन लघु कौन   ज्येष्ठ, 

कौन   राम  कृष्ण  ठेठ,  सोच  में  न  लाइए।।

अयोध्या के राजा  राम,ब्रजवासी एक  श्याम,

युगल   हैं   पवित्र   नाम, कोई  एक    पाइए।

गोपियों  के  मध्य  एक, अवध - नरेश  एक,

ज्ञान-चक्षु   खोल   देख,    राम   में  समाइए।।


                        -4-

भक्ति  का  आगार  राम,  राम ही औदार्य  धाम,

जपें  भक्त   प्रातः - शाम,  राम  मन      लाइए।

एक  ही   आदर्श   राम, लीलाधर कृष्ण   श्याम,

दिव्य   रूप   अभिराम,  और  कहाँ    जाइए।।

सीता  मात  राधा रूप, काटें  बंध अघ     यूप,

खिल  उठे   भक्ति - धूप,      औध पुरी   आइए।

लखन  भी   बलराम,  शक्ति   के स्वरूप   नाम,

कान्हा    राम       अकाम,    राम    में    समाइए।।


                  -5-

हिया   ये  अयोध्या  धाम,बसें जहाँ  प्रभु     राम, 

दूर   खड़ा   रहे  काम,  चले  क्यों  न   जाइए!

रखें  मन   एक    ध्येय,  राम  मात्र एक    प्रेय,

मिले    तुम्हें     यह   श्रेय,   थापना   कराइए।।

नेह  -  सरयू   की   धार, खोलती विवेक-द्वार,

राम   - भक्ति   उपहार ,   उर       में    बसाइए।

कर्म    तेरे    सदा    नेक, बने नहीं कूप -  भेक,

'शुभं'     राम - नाम  टेक,  राम   में     समाइए।।

● शुभमस्तु !


20.01.2024●12.30प०मा०

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मंगलवार, 7 मार्च 2023

गोरी के गुलाल गाल 🎊 [मनहरण घनाक्षरी ]

 108/2023

     

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✍️ शब्दकार ©

🎊 डॉ .भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

लाल-लाल,लाल-लाल,गोरी के गुलाल गाल,

श्याम रंग  बाल  लाल,  होली मनभाई   है।

अधरों की ओप लाल,आँख बंद नाक लाल,

पीत भए   हाथ  लाल,  देह  पै लुनाई    है।।

खोई-खोई रही  सोच, बंद  भई चारु  चोंच,

छीनि  लई देह  लोच,  रंग  की  पुताई   है।

खेलि गयौ रंग कौन, छीनि लियौ गात लौंन,

कैसे  करि  जाऊं  भौन,सोचि कें  डराई  है।।

  

                        -2-

गालनु  पै  हाथ  धरे ,   हाथनु गुलाल   भरे,

नैन  बंद  ध्यान  करे,    गोरी हुरिहाई    है।

अंग-अंग लाल पीत,छोड़ि कें अनीत -नीत,

रंग  खेलती अभीत, ब्रज  की लुगाई    है।।

रंग  की  तरंग  नई, खेलि  रही     मोदमई,

छोड़ि  गाम  धाम गई ,पिया से  सवाई    है।

मन में उमंग एक, खेलिबे  की लगी   टेक,

हाथ  मुद्रिका  अनेक,  मार की  मलाई   है।।


                        -3-

कोरी है कमोरी एक, ब्रज की तू गोरी नेक,

रंग   में    समोई    टेक,   भई  मतवारी  है।

लाल औऱ पीत रंग,थोड़ी-थोड़ी  पिए   भंग,

मन में जागी   उमंग, काम की   सवारी है।।

बिखरे हैं मत्त बाल ,लाल  पीत   वर्ण गाल,

बिंदिया   सजाए   भाल, नारि हुरिहारी   है। 

रूप की तू धूप - छाँव,डोलि रही गाँव- ठाँव,

लाल  देह  हाथ  पाँव, काम  ने निखारी  है।। 


                        -4-

साँवरे कौ   ध्यान  करि,  देह में  तरंग   धरि,

मन  में    उमंग  भरि,   रंगनु निखारी     है।

ब्रज की  तू मत्त गोरी,रंग की सुरंग    बोरी,

चली  आई  चोरी - चोरी, कामदेव ढारी है।।

रंग कौ धमाल लाल, खेलिबे की ठोंकि ताल,

रँगे भए  गाल  भाल,  साँचे  में  उतारी   है।

तानि लियौ काम बान,नाहिं रह्यौ देह भान,

होठ लाल बिना पान, भाव की  अनारी  है।।


🪴शुभमस्तु !


07.03.2023◆9.15

आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सोमवार, 30 जनवरी 2023

आया शुभ नववर्ष 🪷 [मनहरण घनाक्षरी]

 12/2023

 

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

आया  शुभ   नया  वर्ष,छाया नवल  उत्कर्ष,

भरा  हृदय  में  हर्ष, जागी  नई   भोर    है।

जगी उषा रश्मि लाल,भरे झोली में  प्रवाल,

करे प्राची  को  निहाल , खग -वृंद  रोर   है।।

धूप  चाहें नारी - नर,  पूस शीत   करे   तर,

ओस  रही  सूक्ष्म  तर,बैठा मौन   मोर   है।

गली -  गली   तमचूर, बाँग  दे रहे     सुदूर,

भरा   खेत  वन नूर,  चारों ओर  -  छोर है।।


                         -2-

गया  और  एक  साल,गूँज रही  नव  ताल,

घड़ी  बदली  है  चाल, शीत  में उभार   है।

ओढ़ शॉल या रजाई,गाय भैंस को ओढ़ाई,

पिएँ   दूध गर्म   चाई,  बढ़ा ओस ज्वार  है।।

नृत्य   करें  वन  मोर, देख हर्षित  हैं    पोर,

जन  आनंद    विभोर,  सूर्य समुदार     है।

सुख  बाँट रही  धूप, उष्ण नीर  भरे   कूप,

नववर्ष   का   सुरूप , दान करे प्यार    है।।


                         -3-

बहू आई  ससुराल, चले हंसिनी - सी चाल,

भिन्न  रूप  रंग ढाल, लगी  नई  साल   है।

मोर   नाचते   मुँडेर,  झूम   रहे  बेर   केर,

मिटा  रात  का  अँधेर, तारा रिक्त थाल  है।।

भाभी - भाभी  की गुहार, करे ननदी   उदार,

मीठे   बोल  में   उचार,  राग बेमिसाल  है।

मुग्धा  यौवन-उजास , प्रेम हर्ष  करे   वास,

भरे  सौम्यता  सहास,  रंग  का उछाल  है।।


                         -4-

नया  ईसवी  का  साल,उषा रश्मि है प्रवाल,

भानु    फैलाए    सँजाल , प्रेम   अपनाइए।

भूलें  गत   दुख  दर्द,झाड़ वसनों  की  गर्द,

शीत  ऋतु    बड़ी   सर्द, ठंड  से   बचाइए।।

देख  कोहरे  की  धूम, बढ़ा जीवन  की  बूम,

सत   पंथ   को   न भूल, खुशियाँ    मनाइए।

सदा  करें   उपकार,   जीव मात्र  का सुधार,

यही   जीवन   का   सार, नवगीत    गाइए।।


                         -5-

करें सभी काम-काज,शादी ब्याह के सुसाज,

बीते  कल  और  आज,नया नहीं  मानें   वे।

तान अपनी ही तान,दिखा खोखली वे शान,

दिया  करें   महाज्ञान, धरे  नए    बाने   वे।।

कसें  जींस  शर्ट  धार,करें पीत का  प्रसार,

ठानें  एक  नई   रार, भले  नहीं   जानें   वे।

ऐसे  अंधभक्त  मूढ़,  पंथ  चलें सदा  रूढ़,

आकंठ गए  वे बूड़, ति छन्नों में  छानें   वे।।


🪴शुभमस्तु !


07.01.2023◆4.00 

पतनम मार्तण्डस्य।

स्वदेश के लिए जिया ⛳ [मनहरण घनाक्षरी ]

 51/2023

 

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✍️ शब्दकार ©

⛳ डॉ .भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

स्वदेश के लिए जिया,वही जिया वही जिया,

सनेह  देश  से  किया, भ्रांति ये  न  मानिए।

परोपकार व्यक्ति  का, सदुपयोग शक्ति  का,

दुरंत दैन्य  मुक्ति का, ज्ञान- क्रांति   ठानिए।।

स्वतंत्र ही विचार हो,न दासता का भार  हो,

सकार  ही  सकार हो,आदमी को   छानिए।

बनें न आस्तीन साँप, शत्रु रहे भीत   काँप,

पाप  कर्म  को  न   ढाँप, मीत पहचानिए।।


                         -2-

मिटे न कर्म आपका,तजे न दोष पाप का,

सुपुण्य ईश - जाप   का,भारती  पुकारती।

बने न श्वान  ढोर-सा,रहे सुकान्त  भोर-सा,

सु नेह  मेघ  मोर -सा, करें मातृ  - आरती।।

स्वदेश  आप  मानिए, भ्रांति वृथा न पालिए,

प्रवीर   क्रांति   ठानिए,   मातृ भू   उबारती।

अनेकता  में  एकता,  है देशभक्त   देखता,

रहे  न   बुद्धि - मेषता,  धर्म मर्म  ज्यारती।।


🪴शुभमस्तु !


28.01.2023◆3.00

पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 23 जनवरी 2023

अक्षुण्ण गणतंत्र 🇮🇳 [मनहरण घनाक्षरी ]

 39/2023

   

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✍️ शब्दकार *

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

 भव्य स्वर्ण-सा विहान,लागू हुआ संविधान,

बना  देश   ये  महान,  तथ्य सत्य   जानिए।

देश  स्वयं  के  अधीन, देखें नहीं  मेख-मीन,

बनें  आप  में  प्रवीण,     डोर नहीं   तानिए।।

याद  रखें  बलिदान,   देश  हित दिए   प्राण,

करें   नाम   गुणगान,   सु-वीर   सम्मानिए।

'शुभं' देश  गणतंत्र, एक  ध्वज  एक  मंत्र,

व्यक्ति -व्यक्ति  चल यंत्र,पूत  प्रण ठानिए।।


                         -2-

लेश  सोए  नहीं  नींद, खोल जागे निज दीद,

मरे  नहीं  वे   शहीद,  रक्त  याद     कीजिए।

त्याग  दारा  परिवार,  झेल दुःख   पारावार,

देश - दासता  निवार, मीत सीख   लीजिए।।

आए  देश हित  काम,नहीं जाना  है  आराम,

रात-दिन   भोर-शाम,  थोड़ा तो  पसीजिए।

क्षय हो न   गणतंत्र,  मान एकता   का   मंत्र,

नर -  नारी  बन  यंत्र,  प्रेम -सुधा   पीजिए।।


                         -3-

कोई समझे  न  ख़्वाब,  देव तुल्य भीमराव,

देश- भूमि  से  सु-भाव, दिया संविधान   है।

जाति-वर्ण  भेद भूल,मात्र दृष्टि  में   उसूल,

बोए   यहाँ-वहाँ  फूल, कंचनी विहान    है।।

प्राप्त सबको हो  न्याय,नहीं शोषण अन्याय,

चैन  मिले  प्रति  काय,  भारत की  शान  है।

नहीं एक का था काम,दिया मिलके  अंजाम,

झेल शीत  ताप  घाम,आज निज मान  है।।


                         -4-

त्याग उर के विकार,करें न्याय का   प्रसार,

माँगें   तब     अधिकार,   देश गणतंत्र   है।

करें  पहले   कर्तव्य,  यह  देश बने    भव्य,

आग जला नित हव्य,सद भाव  मंत्र    है।।

छोड़  जाति वर्ण भेद, गात बहे  तव   स्वेद,

मात्र श्रम  न्याय  वेद, नारि- नर   यंत्र  है।

करें  नहीं  मनमानी,  बनके मूढ़  अज्ञानी,

बना  कर्म को निशानी, देश ये स्वतंत्र  है।।


                          -5-

लिया  हमने  ये  भाँप,  छिपे बैठे  गुप्त साँप,    

रहा  देश   निज   काँप,  सर्प नाश  कीजिए।

एक   श्रेष्ठ   संविधान,   रहे सबको   समान,

तने  एक   ही  वितान,  देश - रंग  भीजिए।।

बनें  नहीं  भूमि -भार, लेना देश  को  उबार,

शत्रु  करें  क्षार - क्षार ,सूक्ष्म न पसीजिए ।

फूँक  एकता का  मंत्र, रखें देश  को स्वतंत्र,

है   अक्षुण्ण  गणतंत्र,  नेह- छोह  दीजिए।।


🪴शुभमस्तु!


21.01.2023◆12.30पतन्म मार्तण्डस्य।


शनिवार, 17 दिसंबर 2022

शंखनाद 🏫 [ मनहरण घनाक्षरी ]

 533/2022

       

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✍️ शब्दकार©

⛳ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                           -1-

शुचि  शंखनाद सुन,गूँजती अबाध  धुन,

स्वप्न  रहे  आश  बुन,   उर  में उमंग   है।

पवित्र  शिवधाम   में,   करता प्रणाम  मैं,

रहता  हूँ अनाम मैं, भाल दिव्य  गंग   है।।

पार्वती  गणेश  संग, सोम वास  है निरंग,

क्षणेक  जीता अनंग, वंद्य  रूप रंग   है।

काल महाकाल  एक,विश्व वंद्य  व्यतिरेक,

लिखे भाग्य लिपि लेख,प्राण की तरंग है।।


                         -2-

गूँज  उठा  शंखनाद,  जाग त्याग  मृषोन्माद,

यहाँ  वहाँ   भरे नाग, देश  की पुकार    है।

देशभक्त   यहाँ  कौन, शक्तिवान  खड़े मौन,

लीन  काठ  तेल  नौन,नीचता- खुमार   है।

भंग  हुआ  देशराग,  सुलगती  है   कुआग,

आदमी  ज्यों मेष छाग, अंधता  ग़ुबार  है।

देश  को  बचाएँ  हम,  शत्रु  से  रहें न कम,

सत्त्व से  बनें 'शुभम्',चिन्त्य समुदार   है।।


                         -3-

शंख  बजे  भूत  भगे, गेह  में सकार  जगे,

कीट भी  विकार तजे, शंखनाद  कीजिए।

शत्रु सीमा पार खड़ा,डाल के पड़ाव बड़ा,

सोता देशवासी पड़ा,देश-  भाव  भीजिए।।

पवनपुत्र    हनुमान,   महावीर हैं   महान,

मारें  गदा  शक्ति- बान,प्रेरणा तो   लीजिए।।

भूल  नहीं पार्थ  वीर, याद करें शब्द - तीर,

वेग  ज्यों  बहे   समीर, देश   पै  पसीजिए।।


                         -4-

शंख  में  रमा  निवास,  सत्य, नहीं उपहास,

गेह  में   शुभ  उजास, शंखनाद  मंत्र   है।

धाम  को  पवित्र  करें,नकार दोष  भी  हरें,

'शुभम्'  गान  उच्चरें, प्राकृतिक   यंत्र    है।।

दक्षिणावर्ती स्वरूप, धनहीन या  कि  भूप,

बैठता  है  शंख चुप,ये  विचित्र   तंत्र    है।

पुरुष श्रेष्ठ  या कि नारि,वादन करें  सँभारि,

श्वास- शक्ति अनुहारि, शुचिता  स्वतंत्र  है।।


🪴 शुभमस्तु!


17.12.2022◆3.00 

पतनम मार्तण्डस्य।

शनिवार, 10 दिसंबर 2022

सर्द भरी रात है! 🌳 [ मनहरण घनाक्षरी ]

 520/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

पूस ओढ़ शॉल  सेत,मौन धर खड़े  खेत,

शांत  सुप्त  सौम्य रेत,सर्द भरी  रात  है।

पत्र-पत्र लदी ओस,पास नहीं कोस-कोस,

मंद तेज  धूप  जोश,बही शीत वात  है।।

बोल  रहे खग वृंद, गढ़े नित्य दिव्य  छंद,

फूले  सर  अरविंद, रम्यता प्रभात   है।

रेंक  रहे   बँधे  ढोर,  नाचते मुँडेर    मोर,

देख तो  सुरम्य भोर, शून्य हुआ  गात है।।


                         -2-

ठिठुर  रही  चाँदनी,  न गाए गीत रागनी,

सुधामयी  सुहावनी, मंद  बही धार   है।

मौन पेड़ बेल सभी,काँप उठें कभी-कभी,

शीत सुप्त शांत जमीं, जम उठी लार है।।

चाँद भी न बोल रहा,ओस में तनहा नहा,

कठोर  शीत को सहा,मौसमी उभार   है।

वेला उषः सकाल की, चहकती प्रवाल-सी,

प्राची गुलाल  भाल-सी, दिव्य उपहार  है।।


                         -3-

सर्द  भरी  रात  शीत, गात करे कंप  मीत,

गई  है  हेमंत  बीत, सी - सी सिसकारी है।

माँग  रहे   पूस  माघ, आग तापने   निदाघ,

कोस  नित्य   रहे  भाग,  काट रही आरी है।।

पड़े  नहीं  लेश   चैन,  देख  पंथ  थके  नैन,

विरहिणी   दिन  रैन,  शीत  से  दुखारी  है।

शोर  करे  पायलिया, 'शुभं' हुई   बाबरिया,

सर्द  सेज  नागिनिया,शीत की सवारी  है।।


                         -4-

सर्द  भरी   शीत  रात, बहती नीहार  वात,

दुग्ध  स्नात  है   प्रभात, ताम्रचूड़  बोलते।

बतखों  की  बातें सुन,चल रहीं  बाँधे धुन,

केंउ   -  चेंउ    रुनझुन,  नभचर   डोलते।।

मछली  सरि  तैरती,लगन लगी   सैर   की,

रखती  वह  धैर्य  भी, गलफड़े खोल  के।

बकरी मिमियाती है, भैंस  अब  रँभाती है,

गैया  भी पगुराती  है, देती डग तोल   के।।


                         -5-

सर्द भरी श्याम रात,शून्य गात हाथ  लात,

साथ  आग  का  सुहात, उष्ण आहार करें।

कड़री  चने  के  साग,खाते हैं जो  बड़भाग,

पास  बजे   ताप- राग, काजू छुहार   चरें।।

धूप मिले  घनी  ओट,धार गात  गर्म  कोट,

रुई   के  लिहाफ़  लोट, कान बाँध   विचरें।

घरनी हो  सुंदरी-सी, अँगुली में मुंदरी - सी,

नहीं  तेज  बंदरी- सी, सेवामयी    संचरें।।


🪴 शुभमस्तु!


10.12.2022◆2.45प.मा.

रविवार, 23 अक्टूबर 2022

आई है दीपावली [मनहरण घनाक्षरी]

 436/2022

 

        


✍️ शब्दकार©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

आई है दिवारी आज,देखि-देखि भव्य साज,

दीप  जले    राम - काज, भारत महान   है।

नदी   घर - द्वार सजे, अंधकार गेह   तजे,

भक्त राम -नाम भजे ,ऐक्य का  वितान है।।

छतें देहरी अटारी,नव्य ज्योति की  पिटारी,

दीप - पुंज ने  निखारी, स्वर्ग के  समान  है।

आओ  दीप  ही  जलाएँ, दूर करके  बलाएँ,

बाग  देहरी   सजाएँ, स्वदेश की  शान   है।।


                         -2-

मावस  की आज रात,अश्व नहीं भानु सात,

नेत्र  से  न दृश्य  गात,  घन अँधियार  है।

दूर्जा  संग  मातु  रमा, विभु देव  प्रियतमा,

पूजन  का  साज जमा,दीपों की  कतार  है।।

शारदा की बीन बजी,रम्य दिशि दस सजी,

अंधकार  मही तजी,ज्योति का  प्रहार  है।

पुष्प धूप की सुवास, धन-धान्य का प्रकाश,

आया 'शुभम्' को रास, विज्ञता - बहार है।।


                         -3-

देखि  धरा - चमकार,  तारे करते    गुहार,

देखि ज्योति की फुहार,आई है दीपावली।

नदी,  नद,  घर,  द्वार, छत, अटारी,  पनार,

जली   दीपनु  कतार, रात  गई है    ढली।

जलें  शून्य  फुलझड़ी, अनार बम भी  बड़ी,

नारि  अटारीनु खड़ी,सजी- धजी  है   गली।

खील, फूल,लड़ीमाल,बदली-बदली है चाल,

नृत्य  करें  खूब बाल,खिल उठी  है   कली।।


                         -4-

खेत-खेत  में किसान, झूमि रहे देखि धान,

खील  खिलीं  सेत फूल,श्री गणेश   आइए।

गेह में  समृद्धि  होइ, नेह  के सु-बीज बोइ,

विनष्ट   होंइ    कु-शूल, नियति   सजाइए।।

गाँव-गाँव  धाम-धाम, जपें जन  राम-राम,

मन   में   न  शेष   धूल, ज्ञान सों   भिगाइए।

निरोगता   सदा  बढ़े,  प्रगति पंथ    पै   चढ़े,

मिले    देह   को     दुकूल, वीरता  दृढ़ाइए।।


                         -5-

चाँदनी  न शून्य  बीच, घनान्ध तम  नगीच,

दिवस - उजास  भरा, दिवाली - बाजार में।

यथार्थ है कि भ्रान्तिका,शंख ध्वनित क्रांतिका

तम   गया   मान  हार, राम  के  प्रचार   में।।

श्याम  कहत श्यामा सों, रेवती बलरामा सों,

जगमगा   रही   धरा, दीप -पर्व   प्यार   में।

धन्य  शुचि ब्रजधाम,राम नाम अंत   काम,

निधिवन   हरा  -   हरा,   शुभं उपहार    में।।


🪴शुभमस्तु !


22.10.2022◆ 3.00

पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...