बुधवार, 12 जून 2024

घुमक्कड़ विचार! [ व्यंग्य ]

 267/2024 



 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 जब भी मैंने उसे देखा चलते -फिरते, घूमते-भ्रमते,इधर से उधर और उधर से कहीं और जिधर चल पड़े उस डगर ;पर ही देखा। वह कभी भी शांत और संतोष पूर्वक नहीं बैठा।जैसे विश्राम तो वह जानता ही नहीं।कितना भी सहलाओ ,वह मानता ही नहीं।बस चलना और चलना और चलते ही रहना। लगता है 'चरैवेति चरैवेति' का मंत्र इसी के लिए बना है। वह कितना घुमक्कड़ है, बतलाना कठिन है। विराम तो जैसे जानता ही नहीं। 

 यह मेरा, आपका, सबका विचार है।हर समय यात्रा करने को लाचार है। इसको रोक पाने का भी नहीं कोई उपचार है।प्रतिक्षण अहर्निश इसका संचार है। जागरण, स्वप्न और सुसुप्ति में भी वह नहीं निर्विचार है। कभी अकेला ही चल पड़ता है।बड़ी - बड़ी ऊंचाइयों की सैर करता है।मानसून के बादलों जैसा उमड़ता है,घुमड़ता है।कभी इधर तो कभी उधर को मुड़ता है। यह विचार ही है ,जो सदैव चढ़ता बढ़ता है।

 कभी - कभी यह अपना जोड़ा भी बना लेता है।अकेले न चलकर बेड़ा सजा लेता है।आपस में बहुत से विचार घुल - मिल जाते हैं।कभी झूमते हैं तो कभी मंजिल को पाते हैं।कैसे कहूं कि विचार बेचारा है।विचार के चलने से ही तो आदमी को मिलता किनारा है।यह आदमी भी विचारों की गंगा-धारा है।विचार अपनी सुदीर्घ यात्रा में न थका है ,न हारा है।ये विचार भी मेरे मन में बड़ा प्यारा है।

 यह भी कम अद्भुत नहीं कि यह विचार ही है ,जो उसे अन्य दोपायों या चौपायों से विलग करता है।वही उसका विकासक है, इसी के पतन से आदमी मरता है।चौपायों के पास खाने और विसर्जन के अतिरिक्त कोई विचार ही नहीं है।इसीलिए मनुष्य सर्वश्रेष्ठ दोपाया है,यह बात सत्य ही कही है।यह अलग बात है कि इस दोपाये मनुष्य के भी कुछ अपवाद हैं। जो देह से तो मानव हैं,किंतु विचार की दृष्टि से पशु निर्विवाद हैं। क्योंकि उनका काम भी केवल आहार और विसर्जन है। विचार का तो उसके लिए पूर्णतः त्यजन है, वर्जन है।

 यह विचार ही है, जो मनुष्य की कोटि का निर्धारक है।विचार ऊँचा भी होता है और नीचा भी।छोटा भी होता है और बड़ा भी।ओछा भी होता है,महान भी। बढ़ाता या घटाता है संबंधित की शान भी। बन जाता है ,मानव का विचार महान भी।यह विचार ही है जो काट लेता है अच्छे अच्छों के कान भी।विचार ही जीवन है, विचार ही उसकी मान त्राण भी। 

 विचार की यह यात्रा यों ही निरर्थक नहीं है।मानव की बुद्धिशीलता का मानक यही है।मानव मानव की श्रेणी का यह विभेदक है।विचार के वितान का जन - जन बंधक है।विचार से ही कवि कवि है, वैज्ञानिक वैज्ञानिक।विचार से ही नेता नेता है, डाकू डाकू। विचार ही सुमन है, विचार ही है चाकू।चलेगा नहीं तो मार्ग में बढ़ेगा कैसे! बढ़ेगा नहीं तो शिखर पर चढ़ेगा कैसे! यह तय है कि कोई विचार बेचारा नहीं है।जो भी यह सुनिश्चित करता है,पात्रातानुसार वह उसके लिए सही है।इतना अवश्य है कि हम अपने विचारों को परिमार्जित करते रहें।विचार की संजीवनी से जीते रहें,आगे बढ़ते रहें। 

 शुभमस्तु !

 12.06.2024●10.30आ०मा०

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समय सबल संबल सदा [दोहा]

 266/2024

       

[सिकंदर,मतलबी,किल्लत,सद्ग्रंथ,राजनीति]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

       

                 सब में एक


समय  सिकंदर  से  सभी,सधते हैं  शुभ साज।

समय सबल  संबल सदा,बिना किसी आवाज।।

हाड़ - माँस    का    आदमी, भरता कोरा  दंभ।

समय सिकन्दर ही सदा,है सशक्त शुभ खम्भ।।


परहित   तो   आता  नहीं,यहाँ मतलबी लोग।

छपते   हैं  अखबार   में, जनसेवी का      रोग।।

हाँडी   मतलब   की  सदा, चढ़े एक ही   बार।

बढ़े  मतलबी  लोग   ही,मतलब का संसार।।


जिल्लत की किल्लत बड़ी,इल्लत बड़ी असाध्य।

मिन्नत में  पटु  लोग  जो, कुछ  भी नहीं अबाध्य।।

अच्छे  - अच्छे    लोग   भी, हो  जाते      बेहोश।

किल्लत   आती  भाग्य में, जिल्लत  का आगोश।।


अनुभव के सद्ग्रंथ  को,   पढ़ना देकर   ध्यान।

कदम - कदम  पर  हैं खड़े,दुश्मन खोले म्यान।।

सीख  अगर   शुभ  चाहिए, जीवन है  सद्ग्रंथ।

लीक   नहीं  सीधी  कभी, चलना है जिस  पंथ।।


राजनीति   में  मित्र का,करना मत   विश्वास।

उचित  यही  जा  खेत  में, चर लेना तुम  घास।।

राजनीति से  प्यार  है, फिर  भी घृणा  अपार।

घुसना   ही  सब  चाहते, बना उसे सब   यार।।


                    एक में सब

राजनीति  किल्लत  बड़ी,नहीं एक सद्ग्रंथ।

सभी सिकंदर मतलबी,खोज रहे शुभ पंथ।।


शुभमस्तु!


12.06.2024●3.15आ०मा०

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हालातों से लड़ना है [ गीत ]

 265/2024

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जीवन इतना

सरल नहीं है

हालातों से लड़ना है।


कदम-कदम पर

जटिल समस्या

स्वयं जिसे सुलझाना है।

रखे हाथ पर

हाथ न बैठें

अश्रु नहीं  बरसाना  है।।


तरसें एक 

बूँद पानी को

भूतल में सिर गड़ना है।


अपने ही पैरों

पर चलकर 

मंजिल  अपनी  पाते हैं।

करते काम

नहीं तन- मन से

मनुज वही पछताते हैं।।


लक्ष्य प्राप्ति के

लिए सदा ही

हर जन-जन को अड़ना है।


नहीं कामचोरी 

से चलता 

काम किसी का जगती में।

चींटी भी

निज श्रम से पाती

भोजन  अपना  धरती  में।।


शव बहते

 प्रवाह में सारे

जिनको जल में सड़ना है।


शुभमस्तु !


11.06.2024●8.15आरोहणं मार्तण्डस्य।

नीचे बिछा दो बोरियाँ [गीतिका ]

 264/2024

          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नीचे    बिछा    दो    बोरियाँ,

माँ     गा   रही   है   लोरियाँ।


तप    पालना   संतति     महा,

सब    जानती    हैं     गोरियाँ।


संतान    का    दायित्व     है,

बोले   न   दारुण    बोलियाँ।


संतान   के   हित   ही   जिएँ,

करतीं    न   जननी   चोरियाँ।


खाली   न   होतीं   एक  पल,

जननी-जनक  की  झोलियाँ।


अनुकरण   से    ही   सीखतीं,

माँ     की      लड़ैती   पुत्रियाँ।


आओ  'शुभम्' नर   हम    बनें,

संतान     की   शुचि  ओलियाँ।


शुभमस्तु !


10.06.2024● 4.15आ० मा०

माँ गा रही है लोरियाँ [सजल]

 263/2024

  

सामांत     : इयाँ

पदांत      :अपदांत

मात्राभार  : 14.

मात्रा पतन : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नीचे    बिछा    दो    बोरियाँ।

माँ     गा   रही   है   लोरियाँ।।


तप    पालना   संतति   महा ।

सब    जानती    हैं   गोरियाँ।।


संतान    का    दायित्व     है।

बोले   न   दारुण    बोलियाँ।।


संतान   के   हित   ही   जिएँ।

करतीं    न   जननी   चोरियाँ।।


खाली   न   होतीं   एक  पल।

जननी-जनक  की  झोलियाँ।।


अनुकरण   से    ही   सीखतीं।

माँ     की      लड़ैती   पुत्रियाँ।।


आओ  'शुभम्' नर   हम    बनें।

संतान     की   शुचि  ओलियाँ।।


शुभमस्तु !


10.06.2024● 4.15आ० मा०

                    ●●●

जनता [कुंडलिया ]

 262/2024

                      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

कहते  जनता को सभी,यहाँ जनार्दन  ईश।

जनादेश   देती   वही, कहलाती जगदीश।।

कहलाती   जगदीश,  दृष्टियाँ उसकी पैनी ।

नेता  सब  उन्नीस, छाँटती छन- छन छैनी।।

'शुभम्' न समझें मेष,बंद कर दृग जो  रहते।

बदलें   जितने  वेष, इसे हम जनता कहते।।


                         -2-

मतमंगे  बन  माँगते,  जनता   से   वे वोट।

झुका शीश वे  चाहते,  देना  ही  बस चोट।।

देना  ही  बस  चोट,   सदा  झूठे आश्वासन।

भरे बहुत से खोट,दिखाते जन को ठनगन।।

'शुभम्' निकलता काम, नहाएँ हर- हर गंगे।

लक्ष्य   कमाना   दाम,सभी का जो मतमंगे।।


                         -3-

इतनी  भी भोली नहीं, जितनी समझें   लोग।

जनता अपने  देश  की, भरा स्वार्थ का    रोग।।

भरा स्वार्थ का रोग,मुफ़्त का सब मिल  जाए।

करना पड़े  न  काम,सुमन उर का खिल पाए।।

'शुभम्'  न  पाता जान,अतल  गहराई कितनी।

नेता    है  अनजान,   चतुर है  जनता इतनी।।


                         -4-

नेता    निकला    घूमने,   रैली  की ले टेक।

जनता से कहता  यही,मुझसे भला न  नेक।।

मुझसे    भला    न   नेक, दूसरा नेता  कोई।

मैं   ईश्वर   का  रूप,भाव भर आँख भिगोई।।

'शुभम्' रखें ये ध्यान,नहीं मैं क्या कुछ लेता।

रखता  सबका  मान,  सभी  हैं कहते नेता।।


                         -5-

जनता  को    कोई  नहीं, दे सकता है चाल।

जाता   जो  दरबार  में,  बदले उसका  हाल।।

बदले   उसका  हाल,  वही इतिहास बनाए।

डाल गले  में  माल,  उच्च आसन पर लाए।।

'शुभम्'  वही  नर  मूढ़, मूढ़ ही नेता बनता।

नेता  पर   आरूढ़,   सदा ही रहती जनता।।


शुभमस्तु !

07.06.2024●11.30आ०मा०

झुरमुट में लोकतंत्र! [अतुकांतिका]

 261/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अनिश्चय के 

झुरमुट में

फंसा लोकतंत्र

चिल्ल्ला रहा

बार -बार

त्राहि माम ! त्राहि माम!!


भेड़ियों की 

झपट ने 

लहूलुहान कर दिया

अपना लोकतंत्र,

बड़ा ही असमंजस

बँटने लगी है

जूतों में दाल!

अति बुरा हाल!


अपने -अपने

उल्लुओं को

सीधा जो करना है,

बेपेंदी के लोटों को

यों ही तो

लुढ़कना है।


बड़ा ही अफ़सोस!

किस मोड़ पर

लाकर कर दिया

खड़ा ये देश,

बदल - बदल वेश,

आ गए महत्वाकांक्षी

जिनका नहीं कोई

चरित्र ,

 न बची नैतिकता,

भुगते अब देश,

बढ़ता हुआ

निरन्तर क्लेश।


ठगे गए हम

ठगा गया

 जनता जनार्दन

उसके ही स्वार्थ ने,

'शुभम्'  किसे दें दोष,

खो दिए होश

बढ़ा अति रोष!

आक्रोश ही आक्रोश।


शुभमस्तु !


07.06.2024●1.30आ०मा०

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जनादेश [ दोहा ]

 260/2024

                   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जनमत ही सबसे प्रमुख,प्रजातंत्र में आज।

जनादेश   देता   वही,  बना देश का साज।।

लालच   देकर  चाहते,जनादेश कुछ लोग।

जनता  ठुकराती  उन्हें,लगा पराजय रोग।।


आश्वासन  झूठे   दिए, भाषण भी पुरजोर।

जनादेश   कैसे  मिले , केवल  करते शोर।।

जनादेश  उसको  मिले,  जो जीते विश्वास।

कुछ तो  होनी  चाहिए, दलबन्दों से आस।।


जातिवाद  के  नाम   पर, जनादेश है व्यर्थ।

करे न राष्ट्र विकास जो,उसका भी क्या अर्थ।।

आडंबर   या  ढोंग  से , जनता  जाती ऊब।

जनादेश  मिलता  नहीं, लफ्फाजों को खूब।।


जनादेश  उसको  मिले, जो दे जन को  काम।

विक्रय  करे न  देश  की,सम्पति नमक हराम।।

करना  ही   तुमको   पड़े,  जनादेश स्वीकार।

काम  न आए  देश के, वह जनमत है   भार।।


बने   नहीं   सरकार   तो, जनादेश  है   व्यर्थ।

निधि खा  पीकर  मौज कर,नहीं देश के अर्थ।।

समझें   जनता   को   नहीं, नेता कोई   मूढ़।

भाषण  से  मिलता  नहीं,जनादेश क्या  रूढ़।।


'शुभम्'   देश  को  चाहिए,दल करता संघर्ष।

जनादेश    उसको   मिले,  करे  देश उत्कर्ष।।


शुभमस्तु !


05.06.2024 ● 9.45आ०मा०

                   ●●●

बैठा वट की छाँव में [ दोहा ]

 259/2060

         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भोर  हुआ  सूरज   उठा, गगनांचल की  ओर।

जड़ - चेतन  जलने  लगे,   छू धरती के  छोर।।

लगता  सूरज  क्रोध  में, तप्त  धरा जल  वायु।

अंबर   उगले आग   ही, घटे जीव की  आयु।।


गौरैया  व्याकुल  बड़ी, मिली न जल की  बूँद।

पड़ी  नीड़  में  दुःख में, चोंच  नयन को  मूँद।।

लटका  अपनी  जीभ को,बाहर अपनी  श्वान।

हाँफ   रहे   हैं   छान   में,करें  कहीं जलपान।।


धरती पर  पड़ता  नहीं,  बिना उपानह   पाँव।

बैठा  वट   की   छाँव में, तप्त समूचा   गाँव।।

चलो   तरावट   के   लिए, खाएँ  हम तरबूज।

महक   रहा   है   खेत में, देखो  वह खरबूज।।


नीर    बिना   प्यासी  धरा, मरे  हजारों  जीव।

कहाँ  छिपे  बादल घने, चातक रटता   पीव।।

सूख  रहे    तालाब  भी,  निकल रहे हैं    प्राण।

व्यकुल  मछली  जीव जल, कौन करेगा त्राण।।


भैंस  गाय  व्याकुल  सभी, हाँफ रहे हैं  ढोर।

शूकर  लोटे   पंक  में,  छिपे  छाँव  में   मोर।।

कोई   शर्बत  पी   रहा,  कोई  लस्सी   छान।

गर्मी  का  परिहार   कर, करे जेठ का   मान।।


षट् ऋतुओं के देश में,तप का एक  प्रतीक।

अपना एक निदाघ है,   उत्तम  पावन  नीक।।


शुभमस्तु !


05.06.2024● 6.30आ०मा०

                   ●●●

कैसी बेढब रीति चली है! [ गीत ]

 258/2024


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रौंदा अपने

अधीनस्थ को

कैसी बेढब रीति चली है।


छोटी मछली 

को खा जातीं

बड़ी मछलियाँ बीन -बीन कर।

कुचले जाते

नित गरीब ही

खा जाते हैं चुगा छीन हर।।


कैसे अपनी

जान बचाएँ

देखो तो जन- जनी छली है।


सास बहू को

नहीं समझती

पुत्रवधू भी बेटी जैसी।

निकल पड़ी

कमियाँ ही खोजे

करती उसकी ऐसी - तैसी।।


मैं गृहस्वामिनि

तू बाहर की

यही सोच घर देश-गली है।


हो विभाग

सरकारी कोई

थाना या कि कोतवाली हो।

बूटों तले

कुचलते छोटे

जैसे मच्छर की नाली हो।।


नाखूनों के 

बीच जुएँ - सी

नियति मानवों की छिछली है।


शुभमस्तु !


04.06.2024●2.45 आ०मा०

चार जून आ गई ! [बालगीत ]

 257/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



चार   जून  आ  गई।

गाँव  नगर  छा  गई।।


ऊँट किधर  सो रहा।

करवटों  में खो रहा।।

अजब गजब ढा गई।

चार   जून   आ  गई।


जाने  कब उठे   यह।

बोझ पीठ पर दुसह।।

शांति  सुख  खा गई।

चार   जून   आ गई।।


कैसा  ये    खुमार   है।

लगे    गया   हार   है।।

मंजिलों को   पा  गई।

चार   जून   आ   गई।।


कितने  डग  पार   है?

जनमत     दुलार   है।।

आम  जन  लुभा गई।

चार  जून   आ    गई।।


नींद   नहीं    रात  को।

समझें कब  बात को।।

खाज -  सी खुजा गई।

चार  जून  आ     गई।।


लगता  नहीं   घाम  है।

जपें    राम  -  राम  है।।

अटकलें    नई -  नई ।।

चार  जून    आ   गई।।


ऊँट     जागने    लगा।

करवटें   लेने    जगा।।

खुशी  नई     छा  गई।

चार  जून    आ    गई।।


'शुभम्' मोबाइल  खोल।

बज   रहे    देख   ढोल।।

बढ़    रही     है    दंगई।

चार  जून     आ   गई।।


शुभमस्तु !


03.06.2024●3.00प०मा०

                    ●●●

छुट्टियाँ [चौपाई]

 256/2024

              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलो    छुट्टियाँ    वहाँ     मनाएँ।

जहाँ  शांति से   हम  रह   पाएँ।।

गर्मी   हुई    तेज    अति   भारी।

यात्रा    की     अपनी    लाचारी।


किसे  छुट्टियाँ   सदा   न  भातीं।

करता श्रम  उसको  ललचातीं।।

पढ़ने   वाले   या   किसान   हों।

सीमा  पर   लड़ते  जवान    हों।।


करें      नौकरी      या    मजदूरी।

मिलें    छुट्टियाँ   उनको      पूरी।।

तन थकता तो  मन   भी थकता।

अनथक  कैसे   मग   में चलता।।


 गर्म    मशीनें     भी    हो   जाती।

श्रम   क्षमता    उनकी   मुरझाती।।

उन्हें  रोक  कर    शीतल   करना।

थकन मशीनी  को  नित    हरना।।


श्रम   क्षमता    छुट्टियाँ   बढ़ातीं।

नई  चेतना    तन    में     लातीं।।

कर्मशील    कोई    भी   कितना।

सभी  थकित हों करता जितना।।


मेले     ब्याह    पर्व    हैं    आते।

किसे नहीं वे     खूब     रिझाते।।

इसी      बहाने     छुट्टी       लेते।

काम  सभी   हम   निबटा   देते।।


'शुभम्'   चलो     छुट्टियाँ   कराएँ।

मात -  पिता   सँग      घूमें  आएँ।।

खेलें -  कूदें      मौज       मनाएँ।

नैनीताल     घूम      कर    आएँ।।


शुभमस्तु !


03.06.2024●10.45आ०मा०

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सोमवार, 3 जून 2024

पाँच वर्ष के बाद में [दोहा गीतिका]

 255/2024

       


नेताजी   करते    नहीं, जन जनता से  प्यार।

आता  समय  चुनाव  का,बाँटें  प्यार उधार।।


नेतागण    चाहें   नहीं,  करना  पूर्ण विकास,

कौन   उन्हें  पूछे  भला ,खोल घरों के  द्वार।


पाँच    वर्ष   के  बाद   में, आता   है मतदान,

सत्ता    पाने    के   लिए, टपके सबकी  लार।


राशन  बिजली  तेल  के, आश्वसन  दें   नित्य,

बना   निकम्मा   देश  को,वांछित है गलहार।


जनता   को  सुविधा  नहीं, भोगे कष्ट  अनेक,

नेतागण     परितृप्त   हैं,  छाया  रहे खुमार।


चमचे    गुर्गे  मौज  में, खाते  मक्खन   क्रीम,

चूसे   जाते   आम  ही, डाल  करों  के   भार।


'शुभम्' देश  की  भक्ति का,अंश नहीं  लवलेश,

प्रजातंत्र   में    ही   प्रजा,  का   नित बंटाढार।


   शुभमस्तु!

03.06.2024●5.15आ०मा०

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आया समय चुनाव का [ सजल ]

 254/2024

        

समांत :  आर

पदांत  :  अपदांत

मात्राभार : 24.

मात्रा पतन: शून्य


नेताजी   करते    नहीं, जन जनता से  प्यार।

आता  समय  चुनाव  का,बाँटें  प्यार उधार।।


नेतागण    चाहें   नहीं,  करना  पूर्ण विकास।

कौन   उन्हें  पूछे  भला ,खोल घरों के  द्वार।।


पाँच    वर्ष   के  बाद   में, आता   है मतदान।

सत्ता    पाने    के   लिए, टपके सबकी  लार।।


राशन  बिजली  तेल  के, आश्वसन  दें   नित्य।

बना   निकम्मा   देश  को,वांछित है गलहार।।


जनता   को  सुविधा  नहीं, भोगे कष्ट  अनेक।

नेतागण     परितृप्त   हैं,  छाया  रहे खुमार।।


चमचे    गुर्गे  मौज  में, खाते  मक्खन   क्रीम।

चूसे   जाते   आम  ही, डाल  करों  के   भार।।


'शुभम्' देश  की  भक्ति का,अंश नहीं  लवलेश।

प्रजातंत्र   में    ही   प्रजा,  का   नित बंटाढार।।


शुभमस्तु!

03.06.2024●5.15आ०मा०

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रविवार, 2 जून 2024

मौनव्रत का संलयन [व्यंग्य]

 253/2024 



 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 आप अपनी जानें।मैं तो अपनी जानता भी हूँ और पहचानता भी हूँ।वैसे अपनी - अपनी करनी सबको जाननी चाहिए। अब आप नहीं जानते तो कोई क्या करे? अपनी जानने के बाद ही मैं यह कहने का साहस कर पाया हूँ कि मैं एक प्राचीन मौनव्रती हूँ।यह मौन व्रत कोई बनावटी या अखबारी मौन व्रत नहीं है कि ध्वनि प्रसारक यंत्र लगाकर इसका विज्ञापन किया जाए! यह मौन व्रत तो मेरे जन्म काल से ही मेरे साथ आया है और जीवन के अंत के साथ स्थाई मौनव्रत में बदल जाना है।आप में भला कौन -कौन पहचाना है?कि यह मौनव्रत बहुत पुराना है। 

  जब मैं पहली -पहली बार इस धरा धाम में धरती माँ की गोद में आया तो प्रकृति ने मेरा नौ मास का अंतः मौन व्रत तुड़वाया।जननी की कुक्षि में मैं नौ माह से मौन ही तो प्रभु भक्ति में लीन था। वह दीर्घकालिक मौन व्रत तभी तो टूटा,जब 'हुआ -हुआ' के मेरे क्रंदन ने बाहर आने का सुख लूटा। जन्म के बाद भी मैं प्रायः मौन ही रहता, जब लगती भूख प्यास तो रुदन की वाणी में अपनी बात कहता।वरना मौन पड़ा-पड़ा अड़ा रहता। अधिकांश समय शयन में मौन ही तो रहना। कभी किसी से यह नहीं कहना कि मैं बहुत बड़ी तपस्या कर रहा हूँ।खबर अख़बार में छपवा दो अथवा टी वी पर फोटो वीडियो प्रसारित करा दो। 

  तब से आज तक मौन रहकर मौन व्रत साधना ही तो कर रहा हूँ।यह मौन तो जैसे जीवन की श्वास है।इसके बिना भी क्या जीवन है,जीवन का प्रकाश है? तब से आज तक मैंने अपने मौन के प्रचार- प्रसार के लिए न कैमरे लगवाए और नहीं देश - दुनिया में घोड़े दौड़ाए कि जाओ कि एक अकिंचन भी मौन व्रत कर रहा है। लोग जानें कि यह क्या विलक्षण हो रहा है,जो आज तक किसी ने नहीं किया।पर वास्तविकता यही है कि आप सब भी तो यही कर रहे हैं।पर अपने मौन व्रत का डंका बजाने से डर रहे हैं। क्यों ?क्यों?क्यों ?वह इसलिए कि यह तो जीव और जीवन की प्रकृति है। जीवन का अनिवार्य अंग।इसके बिना तो है जीवन का रंग में भंग। जब जब भी रात या दिन में निद्रा देवी की गोद में सोया, मौन व्रत से ही अपना मुख और तन धोया।कम से कम नित्य प्रति दस- दस घण्टे।जब की गई साहित्य- साधना या एकांत- साधना तब भी समय के वे क्षण मौन में ही बंटे।एक-एक महीने में तीन सौ घण्टे की मौन साधना। इस प्रकार प्रति वर्ष 3600 घण्टे की निराहार मौन- साधना।365 दिन में 150 दिन की व्रत- साधना।

      इस मौन व्रत साधना के लिए कोई आडम्बर नहीं करना। चाहे आप दिगम्बर हों या सांबर साधना तो हो रही है और बकायदे हो रही है।जब तक जीव और जीवन का अंतिम क्षण नहीं आ जाता,तभी तक इस आनन पर बोल हैं।फिर तो मौन ही मौन है। स्थाई मौन है।सूक्ष्म शरीर कुछ भी करे,कौन जानता है? चिल्लाए कोई प्रेत या रहे मौन ,सुने भी कौन ?  आज के नए जमाने के आदमी को देखिए। मौन का भी प्रचार है, जोर शोर से प्रसार है।जैसे इनके ही मौन की दुनिया में बहार है।मौन तो शक्ति अर्जन का स्रोत है। अनिवार्य स्रोत है। सबके लिए खुल्लमखुल्ला उपांत है।हर एक जीव ही इस विषय में शांत है। परन्तु विज्ञापन जीवी ही कुछ उद्भ्रांत है।जो खबर बनने के लिए विकल - प्रांत है। 

   आइए ! हम सब भी अपने मौन को पहचानें। मौन को मौन से अधिक कुछ नहीं मानें।जितनी रह सके सीमा में ,उतनी ही तानें।सहजता में ढोंग क्या !आडम्बर क्या !दिखावा भी क्या ?तोल- तोल कर बोलना है। झूठ का जहर नहीं घोलना है। शेष समय मौन ही मौन की आराधना है।इसीलिए तो शयन की अनिवार्य साधना है। जितना जागरण उतना ही शयन।बन्द करें वाणी और दोनों नयन।जीवन में प्राकृतिक है मौनव्रत का चयन,संलयन। 

शुभमस्तु !

 02.06.2024●4.00आ०मा० 


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मेरा मौनव्रत [ दोहा ]

 252/2024

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मौनव्रती  विख्यात मैं,  करता  व्रत प्रति  मास।

तीन शतक  बनते  सदा, मत समझें उपहास।।

नहीं   कैमरों   को सजा,  करता   मैं व्रत    मौन।

टीबी   या  अखबार  में,  जान सका है   कौन??


बारह   मासी   मौन  व्रत, का  है पावन   भाव।

घर   वाले  भी  जानते,  मुझे  मौन का    चाव।।

नहीं    हिमालय    चाहिए, या    कोई  एकांत।

दिनचर्या   मम   मौनव्रत,   मानें  मत अरिहंत ।।


नौ  से  प्रातः  पांच  तक, रहता  मैं नित  मौन।

दिन  में  घण्टे  चार  - छः, मौन रहूँ निज भौन।।

दिनचर्या    का  अंग  है,  मेरा  यह व्रत   मौन।। 

अब  ज्ञापित  करना  वृथा,मधुर या कि हो लौन।।


मुझे    न   कोई   होड़  है,करता  नहीं  प्रचार।

मौन   वाक   का  मौन  व्रत, कहने से  बेकार।।

वीणावादिनि   का   हुआ, मुझे  सूक्ष्म  आदेश।

पुत्र   मौनव्रत  व्यक्त   कर, धरे  बिना  नव वेश।।


तथाकथित की  बात  क्या,छींकें खाँसें  नित्य।

अखबारों   में   जा    छपे, बतलायें औचित्य।।

जैसे  लेते    साँस    नित, वैसे   ही व्रत   मौन।

शक्ति  बढ़ाता भक्ति की, चले श्वास का पौन।।


'शुभम्' शयन  में  मौन  रह,करता कवि  संधान।

बात  नहीं  करता  कभी,कविता हित  अनुपान।।


शुभमस्तु !


02.06.2024●2.00आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...