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मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

अपना किसान🥦 [ कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अपना   किसान    प्यारा।

भगवान   है        हमारा।।


खाद्यान्न      दूध       देता।

इस  भूमि  का   विजेता।।


आलू   के     संग    मूली ।

सरसों   है  खूब     फूली।।


जीना   अभाव   का    है।

घर   संग   बूढ़ी   माँ  है।।


थिगली   भरी   है  साड़ी।

हर    काम   में  अगाड़ी।।


अम्मा     वही      हमारी।

प्राणों से  हमको  प्यारी।।


वे    नाव     हम   सवारी।

हैं      जिंदगी     हमारी।।


गंगा   वे    हम   किनारा।

कृश  कृषक   है  हमारा।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.१२.२०२१◆ ३.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

शनिवार, 16 मई 2020

🙊 नरकरतलाधारिता 🙊 (कविता )

चित्र चिंतन :


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✍ शब्दकार ©
🌷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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अल्प     आश्रय ही बहुत है,
नारियों     को   पुरुष  का।
पहुँच  जातीं वे शिखर पर,
पुष्प    खिलता   हर्ष का।।

नारियाँ  -   नर   हैं  परस्पर,
पूरक       चलाते   गेह  को।
विश्वास ,     निष्ठा,      प्रेम ,
करते   वृद्धि उनके श्रेय को।।

पुरुष  की दृढ़ अँगुलियों पर,
नाचती        नारी       यहाँ।
पर   नहीं    इतरा  के चल तू,
भूलकर     नर   का  जहाँ।।

पुरुष      का     साहचर्य  तेरे,
स्वत्व         का   रक्षक  बड़ा।
डगमगाना       नारियो   मत,
मृत्तिका      निर्मित    घड़ा ।।

मत    समझ  नर की हथेली,
सड़क        डामर   की  कड़ी।
जो    उठाए     है   अधर   में, 
 समझ    वह    हिम्मत  बड़ी।।

एकला      चलना   असम्भव,
पुरुष -   नारी      के      लिए।
वह     आम     है  तू  बेल  है ,
लिपटती          तेरे       हिये।।

वह   परुष तू है कांत कोमल,
सृष्टि        का    विस्तार  तू।
वह      बीज    है  सोया हुआ ,
नर     सृष्टि    का   संसार तू।।

तू   'शुभम'   की  माँ बहन है,
अंकशायिनि         कामिनी।
सृष्टि   की   जननी भी तू ही,
देवी      तू     ही    भामिनी।।

हम  उऋण   तुझसे न होंगे,
जन्म      जन्मांतर     कभी।
तुमने    अँगुली  गह चलाया,
तोतले      मधु      बोल भी।।

सबल    मेरा   आज करतल ,
'शुभम'     का   यह   धर्म है।
हाथ     पर    तुझको   उठाऊँ,
यह    पुरुष     का  कर्म है।।

💐 शुभमस्तु !

16.05.2020 ◆11.00पूर्वाह्न।

❤️🌱❤️🌱❤️🌱❤️🌱❤️

शनिवार, 9 मई 2020

माँ [ कविता ]


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✍ शब्दकार ©
🌷 डॉ. भगवत स्वरूप' शुभम'
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हे    माँ     तेरे    चरणों   में
नित    नत -   नत वंदन है।
मैं      तो     बस   माटी    हूँ
अम्मा      तू     चंदन     है।।

तेरे    रक्त  का  ही हर कण
मेरे   तन    में रचा  - बसा।
उर       देह    और     आत्मा
तुझसे      ही   प्राण  रिसा।।

अम्मा         तू    तपसी    है
तेरे     तप   का   सार हूँ मैं।
तव    अमृत     से   जीवित
वरना      निस्सार    हूँ   मैं।।

तू       ही    मम    धरती है
जीवन -  ज्योति प्रदात्री तू।
मैंने      तो      मात्र   लिया
सब    कुछ  निर्मात्री     तू।।

अस्तित्व       मेरा     तुझसे
है   गर्व     मुझे      इसका।
सबकी       हो    ऐसी    माँ
सौभाग्य     बने     उसका।।

पीकर           अमृत       तेरा
पाया           मैंने       जीवन।
जिसे     दूध   कहे     दुनिया .
पोषित       मेरे   तन - मन।।

माँ       से     निर्मित   चेतन
माँ    तू     ही      परमेश्वर।
बस        तुझको      देखा   है.
 देखा   न      कभी    ईश्वर।।

साक्षात        प्रकृति    तू  ही
प्रत्यक्ष       ईश    तू      ही।
तेरा       आँचल   स्वर्ग बना
 सुख     शांति      धीश तू ही।।

किस      लोक   की   वासी है
माँ    बहुत       उदासी     है।
समृद्धि          सदा        देना .
आत्मा       अविनाशी      है।

कामना            यही     है   माँ
जब      तक   जीवन  जाँ है।
'शुभम'     कर्म    करे   अच्छे
तन  -   प्राण    का   साझा है।।

💐 शुभमस्तु!

गुरुवार, 7 मई 2020

चाहत [ कविता ]


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✍ शब्दकार ©
👑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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यदि  होता  नेता स्वदेश का,
ठाठ -   बाट    से     रहता।
चमचे   घेरे   रहते   मुझको,
सबकी     गाली     सहता।।

सौ -  सौ    कारें  होतीं   मेरे,
बँगले     के    परिसर     में।
नौकर-चाकर दास -दासियाँ,
होतीं      मेरे      घर     में।।

तेल   लगाते     सारे  चमचे,
हाथ         जोड़ती    जनता।
पंक्क्तिबद्ध   हो करती वंदन,
मैं    उतना    ही    तनता।।

सेवा - शुल्क   दौड़कर आता,
सदा      तिजोरी         मेरी।
बातों    से  ही खुश करता मैं,
करके             हेरा -  फेरी।।

जनता    का सेवक कहलाता,
पर      मैं       राजा    होता।
सात    पुश्त के   इंतज़ाम के,
बीज     रात -  दिन    बोता।।

बगले   जैसे   वसन धारकर,
रोज़         बदलता      कारें।
सोहें    मोटे    हार    गले में,
आरति        लोग     उतारें।।

चंचल  चितवन चारु चक्षुणी,
चपल      चंचला       बाला।
चितवन   से ही मद से  भर दे,
बिना       पिलाए       हाला।।

सौ-सौ   न्योंछावर वे तरुणी,
सीढ़ी    पर      चढ़ने     को।
रूप   और   यौवन  के मद  में,
मंजिल      पर    बढ़ने   को।।

मेरा    क्या   जाता  अंटी  से,
ज्यों    ही    मैं     तन  छूता।
उन्हें  स्वर्ग - सोपान चढ़ाता,
 जितना         मेरा        बूता।।

अपने    बेटी -   बेटों   को  मैं,
जा        विदेश       पढ़वाता।
औ'     स्वदेश    के  स्कूलों में, 
 नारे        नए        गढ़ाता।।

शिक्षा    के अभियान चलाता,
कोरे         कागज़      भरता।
मिडडे मील खिलाकर निर्धन,
बच्चों    के    दुख    हरता।।

छाप     अँगूठा  होकर भी मैं,
शिक्षा       मंत्री         बनता।
नई   नीतियाँ   लागू   करके,
जा    कुर्सी    पर     तनता।।

पर   क्या ऊँची शिक्षा लेकर,
मैं       शिक्षक   बन     पाया।
नामा   नाम न कमा सका मैं,
मात्र   तुष्टि   सुख    आया।।

'शुभम'  ज्ञान जिसने भी पाया,
मिला          उसे       संतोष।
शिष्यों     को जो ज्ञान दिया है,
वही         बसा       आगोश।।

💐 शुभमस्तु !

04.05.2020 ◆6.30 अप

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

सन्नाटा ही सन्नाटा - कविता


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✍ शब्दकार©
🍀 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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 सन्नाटा    ही    सन्नाटा ! है,
सुनसान  सब गलियाँ  यहाँ।
जाने       कहाँ    है   आदमी,
 एकांत     का  साया    वहाँ।।

क्या  हो गया इस शहर को,
किसकी  लगी इसको नज़र।
आबाद    था  जो  रात- दिन,
उसकी    नहीं  कोई  खबर।।

किससे   कहें किसकी सुनें,
एक    ख़ौफ़ का साया यहाँ।
वह    कौन  है जिससे  कहें,
अब    आदमी   ढूँढें  कहाँ??

कब     तलक   ये  शून्यता ,
कब     तलक चुप आँधियाँ।
क्या     कोई भी  बतलायेगा ,
आबाद   कब हों   वादियाँ??

 ये      हाय !  कैसा   वक्त है,
सब     काम - धंधे  बन्द हैं।
रो      रही   कविता 'शुभम',
रूठे       हुए   से    छन्द  हैं।।

देख कर   के     दृश्य   ये ,
कुछ   समझ में आता नहीं।
अपना    प्यारा आगरा का,
रूप     ये   भाता      नहीं।।

रो    र ही     यमुना    नदी ,
ये     आँसुओं  की    धार है।
प्रकृति      से   संग्राम     में,
ये       आदमी की   हार है।।

जग    शून्यता    वीरानगी ,
कोसों     न दिखता आदमी।
कर्म     का फल भोगना तो,
इंसान     को  था  लाज़मी।।

देखी      नहीं   जाती  दशा ,
इंसान    को    सद्बुद्धि  दे।
हो    गया  अब   तो  बहुत ,
दुष्कर्म     की   भी शुद्धि  दे।।

💐 शुभमस्तु !

25.04.2020◆2.45अप. 

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...