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शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

अलगनी पर धूप टाँगे [ नवगीत ]

 692/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अलगनी पर

धूप टाँगे

मुस्कराते  भानु दादा।


ओढ़कर चादर

हिमानी

चल पड़े हैं राह अपनी

थरथराते

हम धरा पर

शीतकारी  देह  कँपनी

पश्चिमांचल 

जा रहे वे

कर रहे आने का वादा।


पौष अगहन

माघ की ही

बात है थोड़ा निभाओ

है विवशता

भी हमारी 

अगर मानव जान जाओ

रंग खेलो

होलिका के

अब बनो मत और नादाँ।


देर से

मुझको जगाए

लाल ऊषा मुस्कराती

क्या करूँ

दिन भी सिमटते

ठंड भी मुझको सताती

जानता

तुमको सताऊं

है नहीं कुत्सित इरादा।


शुभमस्तु !


27.11.2025●11.30आ०मा०

                  ●●●

रातें रजाई में रमी हैं [ नवगीत ]

 691/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सिमटते दिन

कम्बलों में

रातें रजाई में रमी हैं।


दाँत की पाँतें

बजातीं

कट- कटाहट कट -कटाहट

नाक की नाली

बहातीं

सुरसुराहट - सुरसुराहट

बाजरे के

बूलरे पर

हिम तुषारों की जमी है।


शकरकंदी

गर्म मीठी

सोंधती है  गंध न्यारी

डाल पाटल की

खिली है

जाफ़री की रम्य क्यारी

आसमा से

इस जमीं तक

शीत की शीतल नमी है।


गर्म रोटी

बाजरे की

गुड़-घृती भाने लगी है

साग सरसों की

महक यों

घ्राण में आने लगी है

देख कोहरा

श्वेत बाहर

लगता हमें कुछ तो कमी है।


शुभमस्तु !


27.11.2025●10.45आ०मा०

                      ●●●

फिर भी बढ़ते रहना है [ नवगीत ]

 690/2025


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आगे का पथ

पता नहीं है

फिर भी बढ़ते रहना है।


जो होना है

होना ही है

पर तारीख हमें अज्ञात

सोच समझकर

बढ़ता जा तू

होनी ही अब लंबी रात

नई सुबह

फिर होगी बंदे

रहे न तन का गहना है।


माया साथ न

जाए किसी के

महल बैंक कारें सोना

रहे न तन पर

धागा किंचित

मचे यहाँ रोना-धोना

राख बने 

या गड़े खाक में

या सरिता में बहना है।


द्वेष बैर

सब छोड़ 

यहाँ के झूठे सारे नाते हैं

प्रेम मंत्र से

जग चलता है

खग 

कलरव कर गाते हैं

उठे कँगूरे

ऊँचे -ऊँचे 

जाने किस पल ढहना है।


शुभमस्तु !


27.11.2025●10.00आ.मा.

                 ●●●

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

पढ़ते थे किताबें प्रेम से [ नवगीत ]

 651/2025


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पढ़ते थे

किताबें प्रेम से

वे जन विदा क्यों हो गए?


आदमी का

आलसीपन

नित्य ही  बढ़ता   गया

वह डिजीटल

के लिए

मरु  शृंग पर चढ़ता गया

व्यक्ति श्रम से

यों निरंतर

श्रम जुदा हो सो गए !


कौन

जिम्मेदार है

अब सत्य कहने के लिए

गूगली 

हर बात सच है

अब तथ्य  चुनने के लिए

धूल खातीं

पोथियाँ हैं

जो मित्र थे सब खो गए।


हो सकें बच्चे

अगर पैदा

डिजीटल ही करो

क्यों

 फिजीकल की फ़िकर में

रात अब काली करो

कुंजीपटल की

कुंजियों से

ब्रेन सबके  धो गए।


शुभमस्तु !


27.10.2025●2.15 प०मा०

                  ●●●

भेड़ों के रेवड़ को कुत्ते घेर खड़े [ नवगीत ]

 647/2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भेड़ों के रेवड़ को

कुत्ते

घेर खड़े हैं।


जो वे कहें

वही तुम करना

लीक न छोड़ें

दाना वहीं भरा

कूपों में

रुख मत मोड़ें

हाँक बड़ी

मजबूत

लगाते वहीं अड़े हैं।


दाना ही तो

लक्ष्य

मुफ्त का पाना इनको

 मूँद  आँख

सिर के बल चलतीं

जान न छल को

पैनाये निज 

दंत

पहरुए बड़े कड़े हैं।


उच्चासन आसीन

श्वान के

दल बल भारी

बाँटें दाना 

मुफ़्त

मेष दल की लाचारी

लेबल 

सबके अलग

भक्ष्य में बढ़े -चढ़े हैं।


शुभमस्तु !


26.10.2025●3.45 प०मा०

                     ●●●

एक गधे की कीमत! [ नवगीत ]

 646/2025


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक गधे की 

कीमत

मित्रो तुम क्या जानो ?


एक नहीं

दो तीन लाख में

गर्दभ आते

दूध दे रही

भैंस गाय

वाले शरमाते

गधे हुए

अनमोल

सत्य यह मेरी मानो।


आज गधे 

ऊपर हैं

नीचे और सभी हैं

अश्व हिनहिना रहे

अस्तबल

बड़ी गमी हैं

कौन पूछता

मेष अजा को

बड़ी न तानो।


समय-समय  की

बात

फिरें घूरे के भी  दिन

गधे हुए

सिरमौर

नहीं कर इतनी किनकिन

रोल्स-रॉयस बोट टेल का

स्वाद

सुना क्या अपने कानों?


शुभमस्तु !


26.10.2025●3.00प०मा०

               ●●●

दलहनों के खेत में आलू [ नवगीत ]

 645/2025


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दलहनों के

खेत में

आलू खड़ा है।


खिलखिलाती

पीत सरसों

अब नहीं है

झूमते गोधूम

मकई

भी कहीं हैं?

प्लेट में

भल्ला सजा

ना दधिबड़ा है।


गनगनाती

गाजरें 

मूली न शलजम

नाचते

वे चणक

या मटरें

न हरदम

जिधर देखो

आलुओं का

ध्वज गड़ा है।


नाचती 

अरहर  न रहरह

खेत में अब

बाजरे की

कलगियाँ

करतीं न करतब

सघन 

छाई धुंध में

आलू  पड़ा है।


शुभमस्तु !


26.10.2025●2.45प०मा०

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

दियों का काम क्या है! [ नवगीत ]

 634/2025


  


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उजालों में

अहिंसा के 

दियों का काम क्या है।


हर  शाख  पर

उल्लू 

बसेरा कर रहे हैं

गधे अब 

दाख पर

गुजारा कर रहे हैं

कौन लूटे

या खसोटे 

जानते अंजाम क्या है !


सड़क पर

हो लूट

दर्शक ही मिलेंगे

विडियोबाजी करें

मरदूद

हर्षक ही दिखेंगे

रौशनी में

प्राण रक्षक को

हुआ आरामगाह है।


खोखले 

आदर्श के

दिन अब नहीं हैं

अब हकीकत 

और है

सब कुछ सही है

धर्मशाला

देश है

खामा खाम क्या है !


शुभमस्तु !


21.10.2025●12.15 प०मा०

                 ●●●

देश धर्म की शाला [ नवगीत ]

633/2025


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आओ खुली हुई

स्वागत को

देश धर्म की शाला।


भाई को चारा ही समझो

पंखहीन बेचारा समझो

जब चाहो तब काटो

सरकारी जमीन हथियाओ

राशन गैस मुफ़्त में पाओ

नित्य  मलाई  चाटो

कुछ भी करना  रोक नहीं है

किंचित कण भर टोक नहीं है

फैला डालो जाला।


देव अतिथि है सभी मानते

गले लगाते   बिना ज्ञान के

आओ  सिर पर बैठो

जिस थाली में खाना खाओ

छेद करो पग से ठुकराओ

और  बाद  में   ऐंठो

दुनिया   में  जो  कहीं नहीं है

सुविधा साधन सभी  यहीं है

फैला      गड़बड़झाला ।


जो भी   आया  उसने चूसा

वैभव जन को डटकर मूसा

हम उदारतावादी

नंगे   रहो   उन्हें  पहनाओ

सत्य अहिंसा के गुण गाओ

पहन देह पर खादी

छँटे हुए   हैं   मूढ़   यहीं  पर

मिट जाएँ पर हिले नहीं कर

प्रतिबंधों पर ताला।


शुभमस्तु !


21.10.2025● 10.30 आ०मा०

                     ●●●

[12:17 pm, 21/10/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

सोमवार, 8 सितंबर 2025

रंग-बिरंगे रँग जीवन के [नवगीत ]

 538/2025


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रंग -बिरंगे

रँग जीवन के 

कुत्ता या कि आदमी कोई।


कुत्ता गया

आदमी के सँग

उधर मनुज को डाबरमैन

मिलीं परस्पर

आदत उनकी

मिला मनुज-कुत्ते को चैन

एक- एक मिल

ग्यारह बनते

जाग गईं जो  किस्मत सोई।


सीख रहे हैं

दोनों मिलकर

नई-नई अधुनातन आदत

हाथ मिलाते

युगल परस्पर

करते आपस में वे  स्वागत

नई पौध

हरिआई देखो

जब कुत्ते ने कार भिगोई।


संस्कार का

लेना -देना

कुछ तो  नया रंग लाया

नहीं जानता था

जो करना

सभी श्वान ने सिखलाया

चादर ओढ़

सो रहा मालिक

उधर श्वान ने ओढ़ी लोई।


शुभमस्तु !


07.09.2025● 63.0प०मा०

                ●●●

शनिवार, 6 सितंबर 2025

शकुनी श्वान शकुन बतलाते [ नवगीत ]

 522/2025


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शकुनी श्वान

शकुन बतलाते।


पैरों पर लोटे तो देता

शुभ समाचार संदेश

सूँघे श्वान वाम घुटनों को

धनदायक   परिवेश 

यदि अज्ञात श्वान घर आए

धन का लाभ जताते।


यात्रा में यदि वाम ओर हो

धन का लाभ कराए

रगड़े नाक धरा पर कुत्ता

गड़ा हुआ मिल जाए

गर्दन ऊँची करे श्वान तो

कार्य सफलता लाते।


श्वानों के संकेत समझना

सरल नहीं ये तथ्य

कान फड़फड़ा उठे श्वान यदि

नहीं गमन औचित्य

शुभद और अशुभद श्वानों के

जन को लाभ हानि दे जाते।


शुभमस्तु !


06.09.2025 ●2.00प०मा०

                  ●●●

अजब निराला मेल है! [ नवगीत ]

 511/2025


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सामिष और निरामिष का

 क्या अजब निराला मेल है!


एक गली में 

एक घरों में

कुत्ते हुए आदमी हैं

सुधरा किन्तु न

कभी आदमी

होना यही लाजमी है

सामिष बँधा हुआ

दिखता है

किंतु उलट यह खेल है।


भूल गया

मानवता मानव

कुत्ता मानवता की ओर

कदम रोज ही

बढ़ा रहा है

मानव दानवता की ओर

खींच रहा है

श्वान मनुज को

चली  उलट ये रेल है।


कुत्तों को 

मखमल के गद्दे

बच्चे जिनके भूखे हैं

लाड़ मिले

भरपूर श्वान को

बच्चों के प्रति रूखे हैं

अपने आप 

आदमी ने ये

बना रखी घर जेल है।


शुभमस्तु !


06.09.2025●3.30 आ०मा०

                     ●●●

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

कहने को हम कुत्ते हैं [नवगीत]

 510/2025


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


क्यों न पूँछ हो टेढी अपनी

कहने को   हम  कुत्ते  हैं।


मानव निर्मित 

मुहावरे ये

हम आपत्ति जताते हैं

कभी न उसको

सीधी होना

सत्य बात बतलाते हैं

कहें कहावत कितनी सारी

कहने को हम  कुत्ते हैं।


घी भी हजम

नहीं हो हमको 

क्या तुम हज़म कराओगे!

बिल्ली के पीछे 

हम भागें

क्या तुम उसे बचाओगे !

हम भी गढ़ें कहावत तुम पर

कहने को हम कुत्ते हैं।


कुदरत की 

इच्छा है बोलो

वही विसर्जन की है रीति

तुम्हें दिया है

जो कर्ता ने

तुम भी कभी बदलते नीति ?

तुम मानव हो बने रहो वह

कहने को हम कुत्ते हैं।


शुभमस्तु !


05.09.2025●4.00 प० मा०

                     ●●●

कुत्तावाद मदरसे में [ नवगीत ]

 509/2025


     ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शिक्षक हो तो

पढ़ो -पढ़ाओ

कुत्तावाद मदरसे में।


मानव प्रेरणास्रोत हमारा

देता वही ज्ञान की धारा

कहता सब कुत्ते हो तुम तो

वोटों पर मर जाते हो,

इसीलिए टुकड़े हम खाते

साबुत रोटी कभी न पाते

दर-दर सटक भटकते हैं हम

क्यों ऐसा सिखलाते हो,

प्यारे शिक्षक

ज्ञान कराओ

जुत्तावाद मदरसे में।


संसद में कुछ हुआ इज़ाफ़ा

नेता  ने    नेता   को   नापा

भौंक रहे हैं सभी परस्पर

सभी हमीं से सीखा है,

जो जितना भी  झूठ बोलता

देश और     परदेश   डोलता

जनता का धन उड़ा देह पर

सबको लगा पलीता है,

विद्यालय में 

नवाचार हो

उकता नाद मदरसे में।


हम जागें तो तुम भी जागो

कभी देश से हटो न भागो

नहीं पालतू बनो किसी के

नहीं ट्रम्प की मानें एक,

नीति हमारी   करें विसर्जन

एक नियम से जो है  वर्जन

नहीं बेचना देश किसी को

बनें श्वानवत सीधे नेक,

एक कोर्स 

हर विद्यालय में

समतावाद मदरसे में।


शुभमस्तु !


05.09.2025●3.00प०मा०

                 ●●●

चर्चा में हम कुत्ते क्यों? [ नवगीत ]

 508/ 2025


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चर्चा में

हम कुत्ते  क्यों ?


धरती पर 

रहते हैं कितने

ढोर पखेरू मेढक मच्छर,

मछली गायें भैंस बकरियाँ

अंबर में  कुछ 

उड़ते  फर - फर

लगता साथ न

तुमको भाता

समझा हमको जुत्ते क्यों ?


भौंक हमारी

नहीं सुहाई

ऐसा लगता मानव को

जहर भरा है

दाँतों में तो

समझा कूकर  दानव हो

गली- गली 

दरवाजों पर जा

जीते अपने बुत्ते यों।


वाद अदालत में

जा पहुँचा

जज का ग़लत फैसला है

क्या हमको

अधिकार नहीं है

दुनिया मात्र घोसला है?

जिसमें तुम्हें

अकेले रहना

भाता है अलबत्ते यों?


शुभमस्तु !


05.09.2025●9.45आ०मा०

                 ●●●

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

कुत्ता कहन बन गया गाली [ नवगीत ]

 499/2025

  ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कुत्ता  कहन 

बन गया गाली।


कौन कहे 

यह  हमको  भाता

जब कुत्ता 

कह- कह गरियाता

नहीं पीटते

तब हम ताली।


कहे मनुज को

मानव कुत्ता

नहीं सुहाता है

अलबत्ता

मानव की यह

भरी दुनाली।


ए कुत्ते

कुत्ते के पिल्ले

जोड़ बात में

ये दुमछल्ले

उठी 

सामने से ज्यों थाली।


शुभमस्तु !


04.09.2025●10.45 आ०मा०

                    ●●●

बुधवार, 3 सितंबर 2025

मित्र बताओ कारण क्या है! [ नवगीत ]

 494/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मित्र बताओ कारण क्या है

भौं-भौं  भौं- भौं करने का।


भौंक रहा था काला झबरा

मैं तो इसीलिए भौंका

कारण मुझको पता नहीं है

मिला भौंकेने का मौका

उठा रखा है सिर पर अपने

रात्रि-जागरण  करने का।


कुत्ते हैं कुत्ता ही रहना

कैसे मानुस बन जाएँ

एक गधा जो यहाँ पधारा

देख उसे सब तन खाएँ

रहो गली में या कोठी पर

चैन सभी का हरने का।


कुत्ते का दिमाग भी कितना

एक मटर का दाना है

बिना किसी उद्देश्य भौंकना

श्वान- स्वभाव पुराना है

मिलते ही टुकड़ा रोटी का

मिला बहाना टरने का।


शुभमस्तु !


03.09.2025●4.00प०मा०

              ●●●

तू हमसे क्या होड़ करे! [ नवगीत ]

 493/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रंग -बिरंगे अपने बच्चे

तू क्या हमसे होड़ करे !


आजादी   का  लाभ  हमें है

तू कारा में बंद पड़ा

एकल जीवन भी क्या जीना

लगता है बीमार सड़ा

स्वामिभक्त मैं सेवक उसका

तू क्या  हमसे होड़ करे!


है गुलाम समझे तू मालिक

जंजीरों का बंधन क्यों

पड़ा-पड़ा खाता रहता है

हो कोई तू मुर्दा ज्यों

पाया है कुत्ता-दिमाग तू

तू क्या हमसे  होड़ करे!


जो आए   घर  उसे डराता

भौं-भौं थोथी करता है

डंडा पड़े पीठ मालिक का

रोने का ढँग भरता है

एक विसर्जन का ढँग अपना

तू क्या हमसे होड़ करे!


शुभमस्तु !

03.09.2025●3.30प०मा०

                   ●●●

मैं गलियों का राजा कुत्ता [ नवगीत ]

 492/2025


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मैं गलियों का 

राजा कुत्ता

जंजीरों में तू जकड़ा है।


जहाँ चाहता

मैं फिरता हूँ

नहीं किसी से

मैं डरता हूँ

मैं स्वतंत्र

तू बंधन में है

बंद जेल में पकड़ा है।


तू गुलाम 

अपने मालिक का

पट्टा लगा

किसी पालक का

बैठा - ऐंठा

चिकने तल पर

काहे को तू अकड़ा है।


पहरेदार 

गली भर का मैं

तू बोलेगा

इतने में टें

भूल न जाना

यहाँ  न कोई

किसी बात का रगड़ा है।


शुभमस्तु !


03.09.2025● 3.00प०मा०

                    ●●●

मैं भी कुत्ता तू भी कुत्ता [ नवगीत ]

 491/2025


   ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मैं भी कुत्ता

तू भी कुत्ता

फिरता है तू घर-घर द्वार।


डनलप के गद्दे पर सोता

कभी नहीं मैं भूखा रोता

मेरा अपना मान है

दूध मलीदा   मैं   हूँ खाता

नित्य सैर को बाहर जाता

मेरी अपनी शान है

मैं भी कुत्ता

तू भी कुत्ता

नहीं झेलता मैं तकरार।


मालिक  मुझे  लगाए साबुन

और मालिकिन रगड़े मंजन

लगवाता खुशबू का तेल

शीतकाल में ओढ़ रजाई

सोता हूँ मैं   टाँग फसाई

करवाते   मादा   से  मेल

मैं भी कुत्ता 

तू भी कुत्ता

सबका ही मैं पाता प्यार।


तू  तो   नित   दुत्कारा  जाए

मिल जाए तो टिक्कड़ खाए

तेरा क्या ईमान है

रात-रात   भर  तुझे  भौंकना

चैन न तुझको जान  झोंकना

हरा  हमारा  लान है

तू भी कुत्ता

मैं भी कुत्ता

बड़ा कष्ट है तुझको यार।


शुभमस्तु !


03.09.2025●2.45प०मा०

                 ●●●

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...