बाल geetika लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बाल geetika लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 20 जनवरी 2025

अच्छी लगे रजाई [बाल गीतिका]

 011/2025

         


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अति   की  अच्छी लगे   रजाई।

ऊपर    लेटी    सजे      रजाई।।


शीत   सताए     पूस  - माघ  में,

देती   है     सब     मजे   रजाई।


कौन      चाहता    आना   बाहर,

कैसे       कोई       तजे    रजाई।


सहती     ठंड    तुषार      हवाएँ,

राम   -  राम      ही   जपे  रजाई।


जो       लेटा      बाँहों   में   भीतर,

इधर  - उधर  से      दबे      रजाई।


नहीं      बोझ     भी  लगता  भारी,

जब      ऊपर    से     लदे  रजाई।


कम्बल     में   तो  कम बल होता,

भारी  -  भरकम   फबे      रजाई।


शुभमस्तु !


12.01.2025● 11.00प०मा०

                 ●●●

गुरुवार, 20 जून 2024

बड़े काम का होता चमचा [बाल गीतिका]

 283/2024

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बड़े   काम    का   होता   चमचा।

नेताजी   को      ढोता    चमचा।।


भरे     भगौने    खाली    कर   दे,

मैले  को    भी    धोता    चमचा।


बिना    पूँछ     का  नेता   मुंडित,

नेता को     यदि   खोता   चमचा।


मालपुआ    या     मेवा     मिश्री,

देता  है    यदि    सोता    चमचा।


नेता     के   पैरों    पर  चल कर,

राष्ट्र   -   एकता     बोता  चमचा।


सदा    नहाए      गङ्गा  -  जमुना,

खूब   लगाता      गोता    चमचा।


'शुभम् ' सदा   है   सिर हाँडी में,

घी में   दसों     डुबोता   चमचा।


शुभमस्तु !

20.06.2024●1.30प० मा०

               ●●●


मधुमक्खी का छत्ता देश [बाल गीतिका ]

 282/2024

        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधुमक्खी   का    छत्ता    देश।

देन    एकता     का     संदेश।।


सदा    संगठित    रहना   साथ,

तब बनता  सुदृढ़   निज   देश।


जाति - पाँति   मजहब का भेद,

हर्ष    न     छीने   उनका   देश।


फूलों  से    रस   भरकर  लातीं,

भरा    मधुरता    से   शुभ  देश।


करें    परागण     फूलें      खेत,

विटप शाख पर   सजता  देश।


बाँट -बाँट  कर   करतीं    काम

लड़ना  क्योंकर    अपना  देश।


'शुभम्' मनुज  सब ही लें सीख,

नेक   बनाएँ     शुभकर    देश।


शुभमस्तु !


20.06.2024●12.30 प०मा०

               ●●●

सब कहते हैं मुझको घण्टा [बाल गीतिका]

 

280/2024      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सब     कहते   हैं    मुझको   घण्टा।

पिट-पिटकर क्या  मिलता  घण्टा??


जो   भी    मंदिर   में   घुस    आता,

सबसे    पहले      पिटता     घण्टा।


बहरे     हैं    क्या       देव - देवियाँ,

जो   कहते   हैं     पीटो      घण्टा।


जब तक   भाव  न बजते मन के,

वृथा  पीटना   जन   का   घण्टा।


गर्माता   मैं पिट -   पिट   कर ही,

सुनते  लोग न  मन   का   घण्टा।


मेरे   जीभ   -  गाल       टकराएँ,

स्वर में   एक   बजे   तब  घण्टा।


'शुभम्'  दया  हो   इस घण्टे पर,

निर्मम   हो   मत   पीटो   घण्टा।


शुभमस्तु !


20.06.2024●11.30आ०मा०

                 ●●●

[12:08 pm, 20/6/2024] DR  BHAGWAT SWAROOP: 281/2024

मंगलवार, 7 मई 2024

चप्पल [ बाल गीतिका ]

 213/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सरपट    फटफट    जातीं  चप्पल।

आतीं  -  जातीं  -   आतीं  चप्पल।।


उबड़ - खाबड़   या    समतल   हो,

पदत्राण    बन     पातीं     चप्पल।


कीचड़ , पर्वत      या   हो     ढालू,

बिलकुल  नहीं     डरातीं   चप्पल।


काँटा  चुभे   न    कीचड़     लिपटे,

दोनों    पैर       बचातीं      चप्पल।


न  हो   हाथ    में अस्त्र -  शस्त्र तो,

दुश्मन    पीट     गिरातीं    चप्पल।


होतीं   कभी     हाथ   में   शोभित,

दुष्टों    को      धमकातीं     चप्पल।


'शुभम्'  बहुत   ही   गुण   से भारी,

प्रतिपक्षी      धकियातीं     चप्पल।


शुभमस्तु !


06.05.2024●5.45प०मा०

                   ●●●

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

एक आदमी [बाल गीतिका]

 164/2024

          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 

 हमने  पाला   एक   आदमी।

बड़ा   निराला  एक  आदमी।।


कहता   पूरब   जाता   पश्चिम  ,

भीतर    काला   एक आदमी।


बतलाता  ये   आँखें     दर्पण  ,

चोटी   वाला   एक    आदमी।


कहता  मैं   गंगा  - सा  पावन,

लगता  नाला   एक   आदमी।


बात - बात  में  कसमें  खाता,

माला  वाला    एक   आदमी।


चलता-फिरता एक   लतीफा,

धुत  नित हाला एक आदमी।


'शुभम्' पहेली चलती -फिरती,

अटक निवाला  एक  आदमी।


शुभमस्तु !


05.04.2024●9.00आ०मा०

                  ●●●

मंगलवार, 5 मार्च 2024

लठिया [बाल गीतिका]

 86/2024

                 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमकद    बाबा   की   लठिया।

खट - खट  करती जाती  लठिया।।


बाबा    के    अब     तीन   पैर  हैं,

आँखें   भी    ये   उनकी   लठिया।


कूकर  पास    न    झाँके  बिल्ली,

 दिन भर   राह  दिखाती  लठिया।


खटिया   छोड़  उठें   जब    बाबा,

सदा    सहारा      देती    लठिया।


पास  न     आए    दुश्मन     बैरी ,

कसके   चोट    लगाती   लठिया।


आगे     नाती       पीछे      बाबा,

पथ  में  सैर     कराती    लठिया।


'शुभम्'  बड़ी  गुणवान  बाँस की,

पी - पी तेल   चमकती   लठिया।


शुभमस्तु !


04.03.2024●8.45प० मा०

खटिया [बाल गीतिका]

 85/2024

                   


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बाबा जी    की    टूटी   खटिया।

चूँ -चूँ चर - मर  करती खटिया।।


बाबा जी   जब   लेटें   उस पर,

डग - मग पूरी हिलती  खटिया।


खर्राटे      भर      सोते    बाबा,

गहरी  नींद    सुलाती   खटिया।


एक   दिवस  मैंने     अजमाया,

हमको  झूला  लगती   खटिया।


बान  कहीं   अधबान   नहीं   है,

जालीदार     झंझरी    खटिया।


सिर पाटी पर   कमर   धरा पर,

पाँव  अधर   उटकाती  खटिया।


गद्दा    नहीं    लगाते    तकिया,

गहरी   नींद   सुलाती   खटिया।


नींद  न होती 'शुभम्'    सेज  में,

मन का   चैन  जताती   खटिया।


शुभमस्तु !


04.03.2024● 8.15प०मा०

बछिया [बाल गीतिका ]

 84/2024

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्


गौ  माता    की   छोटी  बछिया।

भूरे रँग   की   अपनी  बछिया।।


चरने  गाय    घास   जब  जाती,

संग  - संग   जाती    है  बछिया।


जब  माँ   दूध   दुह   रही   होती,

दूध   प्रथम    पीती   है   बछिया।


गाय     चाटती   उसे    जीभ   से,

शांत  खड़ी  हो    जाती  बछिया।


नहलाते     पापा      पानी      से,

विचलित तनिक न होती बछिया।


पहली    रोटी     गौ    माता   को,

कौर  साथ  में    खाती    बछिया।


'शुभम्'  गाय   की   सेवा   करना,

पुण्य कर्म ,  मत   भूलें    बछिया।


शुभमस्तु !


04.03.2024● 7.00 प०मा०

गुरुवार, 29 फ़रवरी 2024

पिचकारी [ बाल गीतिका]

 78/2024

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


निकल  पड़ीं  हैं  अब   पिचकारी।

बरसाने   को    रँग     पिचकारी।।


फ़ागुन   आया    चटकीं   कलियाँ,

रुकती    नहीं    लेश    पिचकारी।


देवर     से    भाभी     यों    बोली,

क्यों  न अभी     लाते   पिचकारी।


बिना  झिझक  साली   यों कहती,

जीजा जी   ला   दो    पिचकारी।


नेता     को     जनता     ललकारे,

देखेंगे         चुनाव   -   पिचकारी।


बोले     श्याम   यशोदा     माँ  से,

राधा    से     खेलें       पिचकारी।


'शुभम्'    फाग  गा    रहे    हुरंगा,

चले   दृष्टि  की  दृग  -   पिचकारी।


शुभमस्तु !


29.02.2024◆ 9.45आ०मा०

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2024

गुबरैला [बाल गीतिका[

 072/2024

              

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गोबरवासी       है     गुबरैला।

बनना  नहीं    हमें   गुबरैला।।


भाती   जिसे  गंध   गोबर  की,

कहलाता   है    वह    गुबरैला।


कलाकंद    रबड़ी   न   सुहाती,

बतलाता      सबको    गुबरैला।


छोटी -  सी   दुनिया  है उसकी,

छोड़   कहाँ      जाए   गुबरैला !


मतलब नहीं   किसी  से उसको,

स्वयं  लीन  है   नित    गुबरैला ।


क्षण  भर को  वह  बाहर  झाँके,

गोबर    में      जाता     गुबरैला।


गोबर   घर   गोबर    ही   खाना,

रंगमहल       कहता     गुबरैला।


'शुभम्'  बहुत मानव   भी   ऐसे,

कहते   हम   जिनको    गुबरैला।


●शुभमस्तु !


22.02.2024● 10.15आ०मा०

रविवार, 1 अक्टूबर 2023

टेसू ● [बाल गीतिका ]

 431/2023

           

आओ     खेलें     टेसू    टेसू।

दर - दर   गली -गली में टेसू।।


माँग   रहा  है    दही -पकौड़े,

मेरा  तीन     टाँग   का   टेसू।


ब्याह  रचायेगा    झाँझी सँग,

बैंड    धमाधम  बजता  टेसू।


रात  हो गई   चलो  साथियो,

सबके घर खेलें    जा    टेसू।


दिया तेल - सरसों का लेकर,

लगा     घूमने     मेरा    टेसू।


झाँझी  देख    उसे   शरमाए,

मिल  जाए जब मेरा    टेसू।


'शुभम्'लोक की रीति पुरानी,

गीत  सुनाए   गा -गा    टेसू।


●शुभमस्तु !


01.10.2023●12.30 प.मा.

मंगलवार, 8 अगस्त 2023

अम्बर में जाती बारात ● [बालगीतिका]

 342/2023

 

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

● ©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

अंबर  में    जाती    बारात।

यहाँ - वहाँ    छाती बारात।।


बजते  घड़- घड़ काले मेघ,

पास  नहीं   आती   बारात।


दूल्हा कौन दुल्हनिया कौन,

किस मंडप जाती    बारात।


छायाकार   खींचता   चित्र,

चकाचौंध  ढाती     बारात।


आतिशबाजी   धूम - धड़ाक,

बैंड    लिए    माती    बारात।


लगता  जीम   रही   ज्यौनार,

नीर  गिरा   खाती     बारात।


देखो  ये     बाराती  -    भीड़,

दादुर    से     गाती     बारात।


वीर बहूटी      लाल -  गुलाल,

'शुभम्' नहा जाती    बारात।।


●शुभमस्तु !


08.08.2023◆12.15प०मा०

क्यों ?क्यों??क्यों??● [बाल गीतिका]

 341/2023

 

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

●©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

कूकर पूँछ     हिलाता क्यों ?

टाँग    उठा    उतराता    क्यों??


मुर्गी    अंडा       देती    रोज,

मुर्गा  बाँग       लगाता   क्यों?


मोर  शुभंकर       पक्षी    है,

किसको नाच   रिझाता क्यों?


साँप  रेंग     कर   चलता    है,

पाँव  न कभी   दिखाता क्यों?


स्तनधारी          चमगादड़,

खँडहर   में   दिख  पाता क्यों?


वास्तुकार    है   बया    बड़ा,

सुंदर    नीड़    बनाता    क्यों ?


गौरैया   घर      का    पंछी,

चूँ - चूँ     कलरव  गाता  क्यों?


बंदर   नटखट     क्रोध भरा,

खंभा   थाम     हिलाता   क्यों ?


लंबी    पूँछ    धरे      लंगूर,

कपि को   डर  दिखलाता क्यों?


कोयल   गाए      कुहू - कुहू,

काग    काँव    कुर्राता   क्यों?


'शुभम्'  प्रकृति   सबकी अपनी,

उलट  रूप     दिखलाता क्यों?


●शुभमस्तु !


08.08.2023◆11.00आ०मा०

मंगलवार, 25 जुलाई 2023

बदली -बदली-सी लगती माँ ● [ बाल गीतिका ]

 317/2023


●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

● © शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

बदली-बदली-सी  लगती  माँ।

रंग-बिरंगी  जब   सजती माँ।।


काली   से   गोरी   हो  जाती,

रगड़ चाम जब तुम धुलती माँ।


सुबह  और   ही  रूप तुम्हारा,

अलग रात को तुम फबती माँ।


मुख पर  क्रीम  सफ़ेदी  पोतो,

लाल अधर  में हो खिलती माँ।


मामा    जैसी   कला बदलती,

पूनम जैसी   तुम  खुलती माँ।


दादी की   नजरों  में   डाहिन,

गुपचुप पापा   से  छनती माँ।


बाबा - दादी    तुम्हें   न  भाते,

नाना -  नानी  से  मिलती माँ।


सबको संतति   अपनी प्यारी,

औरों से  हो  क्यों जलती माँ?


'शुभम्' समझना  गूढ़ पहेली,

बड़ा कठिन है हर चलती माँ।


● शुभमस्तु !


23.07.2023◆4.00प०मा०

बुधवार, 7 जून 2023

सुराही ● [बाल गीतिका]

 241/2023

         

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

●शब्दकार ©

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

लाल रंग   की सुघर सुराही।

मिट्टी से   ये   बनी  सुराही।।


शीतल जल दे प्यास बुझाती,

अपनापन दे   नित्य  सुराही।


गर्मी  में   सब   इसे    चाहते,

सौंधी दे   सद   गंध   सुराही।


कुम्भकार का श्रम रँग लाया,

तब घर   लाई   नीर  सुराही।


माटी कूट -  पीस  कर छानी,

बनी  चाक पर  गोल सुराही।


गर्दन   सुघर   पेट   है  फूला,

पकी  अवा में  लाल सुराही।


देशी फ्रिज है 'शुभम्'तुम्हारा,

किसे न भाती सजल सुराही।


●शुभमस्तु !


06.06.2023◆11.आ०मा०

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023

टिकोरे 🌳 [ बाल गीतिका ]

 178/2023

         

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

✍️ शब्दकार©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

छोटे    कच्चे    आम  टिकोरे।

आते  अपने  काम   टिकोरे।।


चलती  आँधी टप- टप गिरते,

गिरें सुबह  से  शाम   टिकोरे।


दीदी     ढेले     मार   गिराती,

बगिया  में जा   ग्राम  टिकोरे।


मौसम   हो   वैशाख जेठ का,

करते  अपना  काम   टिकोरे।


कानों में कुछ फुसफुस करती

लाने को जा    घाम   टिकोरे।


हिलती  डाल  भरे मुख पानी,

ललचाते    हर वाम   टिकोरे।


'शुभम्' पुकारे जब कोयलिया,

बिना   दिए   दे   दाम टिकोरे।


🪴शुभमस्तु !


21.04.2023 ◆3.30आ.मा.

कच्ची अमिया 🥭 [बाल गीतिका ]

 177/2023


■●■●■●■●■●■●■●■●■● 

✍️ शब्दकार ©

🥭 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■●■●■●■●■●■●■●■●■●

कच्ची        अमिया     खाए   दीदी।

गुपचुप       हमें         बुलाए    दीदी।।


आँधी       चली         झकोरे    लेती,

बगिया         में        बुलवाए  दीदी।


कहती          चुन्नू         टॉफी  दूँगी,

जाने        को          उकसाए   दीदी।


मानी           बात      गए    अमराई,

झोली        भर -  भर    लाए दीदी।


बोली      नहीं      बताना    माँ    को,

छुप    -  छुप    अमिया   पाए  दीदी।


गिरे         आम    चखकर  हम बोले,

हमें       न         खट्टा     भाए दीदी।


'शुभम्'      बुलाती         करे  इशारे,

होठों          में          मुस्काए  दीदी।


🪴शुभमस्तु !


21.04.2023◆2.30आ.मा.

सोमवार, 27 जून 2022

नहीं करें भेड़ों से यारी 🐏 [ बाल गीतिका ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🐑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

नहीं       करें        भेड़ों       से    यारी।

चलें     चाल      अपनी     हम   सारी।।


सोचे   -     समझे     बिना   न   चलतीं,   

भेड़   -     चाल      है     सबसे  न्यारी।


देखो         एक,     एक       के    पीछे,

चली     जा      रहीं      पंक्ति    सँवारी।


गर्दन     नीचे     झुकी     सभी      की,

लगती       चाल   बड़ी     ही    प्यारी।


एक      कूप     में      यदि  गिरती   है,

गिरतीं    सब       ही      बारी  - बारी।


सीखें       उठा       तान    कर    ग्रीवा,

चलने       की        तब       हो  तैयारी।


भेड़         नहीं     बनना    मानव    को,

बुद्धिमान      हों      सब      नर  -  नारी।


' शुभम्'         आचरण    मानव    जैसा,

करें        सभी ,     मत    मेष  बिचारी।


🪴 शुभमस्तु !


२७ जून २०२२◆ १०.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...