शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

बैं नी आ ह पी ना ला [ लघुलेख ]


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 ✍लेखक © 🪂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम
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            बैं नी आ ह पी ना ला आकाश में प्रकट होने वाले इंद्रधनुष का एक संकेत- सूत्र है। जिसका पूर्ण रूप क्रम इस प्रकार है : बैंगनी ,नीला, आसमानी ,हरा ,पीला, नारंगी और लाल। पानी के सूक्ष्म कणों पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों का विक्षेपण (फैलाव) ही इंद्रधनुष का कारण है। इसमें सूर्य की किरणें वर्षा की बूँदों से अपवर्तित तथा परावर्तित होती हैं।यह हमारी पीठ के पीछे सूर्य के होने पर ही दिखाई देता है। यह चाप के आकार का होता है। इसे मेघधनुष के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राकृतिक सुंदर घटना बरसात के दिनों में वर्षा होने के बाद देखी जा सकती है।इंद्रधनुष के रंगों का ऊपर बताया गया एक सुनिश्चित क्रम होता है। जिस रंग का तरंग दैर्ध्य जितना बड़ा होता है , वह उतना ही अधिक प्रकाशवान और आकर्षक लगता है। लाल रंग का तरंग दैर्ध्य सबसे अधिक 6.5×10 सेमी.तथा बैंजनी रंग का सबसे कम 4.5×10सेमी. होता है।

         यह तो हुई इंद्र धनुष के रंगों की बात । ये सात प्रमुख रंग हैं। इनके विभिन्न अनुपात में मिश्रण से हजारों रंग बनाये गए हैं। हमारा विशाल सूर्य ही इन रंगों का कारण है। यदि किसी प्रिज्म से प्रकाश की श्वेत किरणों को गुजारा जाता है तो प्रकाश नहीं सात रंगों में इसी क्रम से विश्लेषित हो जाता है।इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रकाश इन्हीं सात रंगों से निर्मित हुआ है। 

            रंगों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। सामाजिक , धार्मिक और आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से रंग हमारे जीवन में विशेष भूमिका अदा करते हैं। प्रत्येक रंग की अपनी विशेषता है।कुछ प्रमुख बातों को यहाँ पर बता देना आवश्यक होगा।

               हमारे व्यक्तित्व को रंग विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। लाल रंग एक ओर प्रेम का रंग माना जाता है ,उसके विपरीत यह खतरे का भी संकेतक रंग है। इसीलिए तो दुल्हन के वस्त्र , बिंदी आदि लाल ही बनाये जाते हैं। यह प्रेम का प्रतीक जो है।उसकी महावर लिपस्टिक, चूड़ियों आदि में भी इसका ध्यान रखा जाता है।हमारे रक्त का रंग भी लाल है। यह व्यक्ति विशेष के गर्म अर्थात क्रोधित रूप का भी निदर्शक है। हरा रंग शांति का रंग है। प्रकृति में पत्तियों की हरीतिमा देखकर हमारे नेत्रों को शांति प्राप्त होती है। इसीलिए प्रकृति ने पेड़ -पौधों की अधिकांश पत्तियां हरे रंग की ही बनाई हैं।इससे हमें सुखानुभूति होती है। यह नेत्रों को चुभता नहीं है। हमारे तिरंगे ध्वज में इसे इसी भाव से नीचे स्थान दिया गया है। सफेद रंग निर्मलता औऱ शांति का अनुभव कराता है।

                केसरिया त्याग और बलिदान का प्रतीक है। राष्ट्र ध्वज में सबसे ऊपर यही रंग विराजमान है , क्योंकि देश की आज़ादी हमें बड़े त्याग औऱ बलिदान के बाद मिली है। बौद्ध भिक्षु ,सन्यासी तथा बहुत से संत स्त्री पुरूष केसरिया रंग के चीवर या वस्त्र धारण करते हैं। नीला और आसमानी रंग व्यापकता के प्रतीक हैं। बैंगनी रंग बच्चों को अधिक पसंद होता है , यह अनुभवहीनता और अपरिपक्वता का प्रतीक है।काला रंग अशुभता , अंधकार और अज्ञान का है। हमारे यहाँ कानून को अंधा माना गया है। तभी तो कानून की देवी को उसकी आँखों पर काली पट्टी बांधकर दिखाया जाता है , और तो औऱ अधिवक्ताओं औंर न्यायाधीशों को कोट आदि काले ही पहनाए जाते हैं।पीला रंग ज्ञान का प्रतीक है। चीवर का रंग भी पीला ही रखने के मूल में यही कारण है। इस प्रकार रंगों का एक विशेष विज्ञान है। जो सर्वांगीण रूप से हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है।   
           रंग - रंग की दुनिया है। एक दुनिया होली की भी है। जिसमें हमारे देश में विविध प्रकार के रंगों से होली खेली जाती है। इसमें बच्चे , वृद्ध , जवान , नर -नारी बड़ी उमंग और प्रेम से खेलते हैं। यह अलग बात है कि युग के अनुरूप होली खेलने के ढंग बदलते जा रहे हैं।रासायनिक रंगों ने रंग में भंग ही कर दिया है। वरना वह भी एक समय था, जब पलाश आदि के फूलों से रंग तैयार करके होली खेली जाती थी। आज तो जहरीले पेंट और कालिख से भी लोग चेहरे विकृत करते देखे जाते हैं। युग -युग में मानव -चरित्र भी बदलता है। जैसा जिसका चरित्र वैसा ही उसका चित्र। वैसी उसकी होली। वैसी ही उसकी बोली। 

         अपने चरित्र की पहचान करनी हो तो अपने पसंद के रंगों की गहराई में उतरिये । ध्यानावस्था में अपनी त्रिकुटी में अपने चरित्र के चित्रों का नज़ारा आप स्वयं देख सकते हैं। उन्हीं सात रंगों में से जो पहले और प्रमुखता से दिखे वही आपके चरित्र का चित्र है। आप उससे बच नहीं सकते। वहाँ भी रंगों का एक अपना संसार है। 💐 शुभमस्तु !
 29.02.2020 ◆7.35 पूर्वाह्न।

ग़ज़ल


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✍ शब्दकार ©
🌿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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इरादे      तुम्हारे    ये    अच्छे  नहीं हैं।
मगर    हम   भी    कोई   बच्चे नहीं हैं।।

जुबाँ      में  ज़हर  है,  हाथों  में पत्थर,
वो    इंसान    ईमां   के   सच्चे नहीं हैं।

 हैं    उनके    ज़हन में नफ़रत के  कीड़े ,
मगर हम   मोहब्बत  में  कच्चे नहीं हैं।

बबूलों    पे     तुमने     लगाया गुलों को,
पता  चल   गया   है     ये  सच्चे नहीं हैं!

'शुभम'  हम  इबादत वफाओं की लिखते ,
ज़माने     में  इसके   क्या  चर्चे नही है?

💐 शुभमस्तु !

28.02.2020 ◆6.50अप.

ग़ज़ल


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✍ शब्दकार ©
🌿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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इरादे      तुम्हारे    ये   अच्छे  नहीं हैं।
हम       दूध    पीते  वो  बच्चे नहीं हैं।

जुबाँ      में   जहर और हाथों में पत्थर,
जिस्म इंसाँ के में  किन्तु सच्चे नहीं हैं।

ग़ज़बजाते     जेहन   में   कीड़े तुम्हारे,
इतने      भी  हम  फूल   कच्चे नहीं हैं।

बबूलों   पै   खिलेंगे  कहाँ  गुल गुलाबी,
हम     काँच   के    गोली - कंचे नहीं हैं।

'शुभम'  तुम खुदा  की इबादत नहीं हो ,
बाप  हैं   हम    तुम्हारे   चच्चे नहीं हैं।।

💐 शुभमस्तु !

28.02.2020 ◆6.50अप.

ग़ज़ल


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✍ शब्दकार©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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जाने        कैसी    ज़ुबान    है उनकी ?
क़त्ल    करना    ही  शान  है उनकी।।

मुँह   में  पैगामे  - मोहब्बत  है मगर,
हाथ   में    इक    कृपान   है  उनकी।

हमने       पत्थर    में    देवता  देखे ,
शान     पत्थर - फिकान  है उनकी।

वो  जो    हैवां  है  कि   मरता ही नहीं,
किसी   पिंजरे    में  जान   है उनकी।

लुत्फ़    बस्ती    जलाने    में  आता है,
आग     पहचान -  शान    है  उनकी।

दूध      माँ     का     हराम  करता  है,
कैसी    अमनो  - अमान    है उनकी ?

मातृ - भूमि  के  सँग   दग़ा  ही 'शुभम' ,
ऐसा    लगता    कि   शान    है उनकी।

💐शुभमस्तु !

28.02.2020 ◆4.45अप.

तुम सँग खेलिंगे हम होरी [ बालगीत ]


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✍ शब्दकार ©
🌿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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मैं  देवर  तुम   भाभी  मोरी।
तुम सँग  खेलिंगे  हम होरी।।

हमनें  भरी   रंग   पिचकारी।
देंगे  भिगो   तुम्हारी   सारी।।
भौत  नाय   तौ थोरी - थोरी।
तुम सँग  खेलिंगे  हम होरी।।

भीतर  ते बाहिर  कूँ  आऔ।
चंदन औरु गुलाल लगाऔ।।
माथे   मलौ     हमारे   रोरी।
तुम सँग  खेलिंगे  हम होरी।।

कीचड़ - माटी नाहिं   लगाएं।
भरि  गुब्बारे  नाहिं   चलाएं।।
 नाहिं       करिंगे    जोराजोरी।
तुम सँग खेलिंगे   हम  होरी।।

एक      साल   में  होरी  आई।
खेलि रहे सिग लोग -लुगाई।।
नाहिं   खेलिबौ   होरी  चोरी।
तुम सँग  खेलिंगे  हम होरी।।

कान्हा  नें   राधा  सँग  खेली।
जिनके  सँग में निरी सहेली।।
देवर - ननदी   छोरा -  छोरी।
तुम सँग खेलिंगे  हम होरी।।

💐शुभमस्तु !

28.02.2020 ◆5.45पूर्वाह्न

रंग -तरंग [ अतुकान्तिका]


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✍ शब्दकार©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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 फ़ागुन मास 
रंगों का रास
मन में उल्लास
मलयानिल सुवास
नेह के अनुप्रास
भौजी देवर हास
सजन सजनी पास
आया आया मधुमास।

रंगों की होली
चंदन गुलाल रोली
प्यार भरी ठिठोली
कोई चालाक कोई भोली
उफ़न हुलसाती चोली
कुंज-कोयलिया बोली
विरहिन उदास हो ली
कैसे खेलेगी होली !

करता है तंग
उर उठती तरंग
बेदर्द ये अनंग
सजन नहीं संग
बजे ढप ढोल मृदंग
बदले प्रकृति के रंग
कूदे मन के कुरंग
बदले -बदले हैं ढंग।

बहती पछुआ बयार
छाया देह में खुमार
मधुमास की बहार
करे साजन मनुहार
आओ करें प्यार- प्यार
नहीं कल को उधार
गले बाँहें निज डार
मार डाले न मार।

झूमे डाल -डाल 
मस्त सरसों के हाल
नाचे गेहूँ की बाल 
ताना मन्मथ ने जाल
चमकी चिकनी हर खाल
गेंदा ,गेंदी गुलाब
चंदन रोली गुलाल
देख ठूँठों के कमाल!

बौरे -बौरे हैं आम
भौंरे ,तितली पैगाम
देते नित्य सुबह-शाम
नहीं पल को विश्राम
फूल फूलते अनाम
सारी सृष्टि है सकाम
है  किसको विराम
महुए कुचिआए अविराम।

होठ   पीपल के लाल
ब्रज में उड़ता गुलाल
नारि-  नर-नृत्य-ताल
छूट गई शुष्क छाल
बदली यौवन की चाल
'शुभम' देखता बेहाल 
कैसा काम का कमाल?
उठा मन में सवाल ।।

💐 शुभमस्तु !

27.02.2020◆ 7.55अप.

खेलत स्याम - राधिका होरी [ गीत ]


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✍ शब्दकार©
 🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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खेलत  स्याम - राधिका होरी।
गोपी - गोप  करत  बरजोरी।।

इतते  आए   कुँवर   कन्हाई।
उतते    भोरी     राधा  आई।।
राधा    बरसाने     की   गोरी।
खेलत  स्याम-राधिका होरी।।

गालनु लाल  गुलाल लगायौ।
रूप  सुहानों  मन कूँ भायौ।।
रङ्ग  बरसाय  राधिका  बोरी।
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

भरि भरि मारत रङ्ग पिचकारी 
ग्वाल-बाल हँसि रए दै तारी।।
अँगिया, चुनरी रंगि दई कोरी।
खेलत  स्याम-राधिका होरी।।

राधा  नें   सखियाँ   बुलवाईं। 
घेरि लए उन किशन कन्हाई।।
करन लगीं जुरिमिलि बरजोरी
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

फेंटा पकरि  अबीर  लगायौ।
चंदन पीत  मुखहु लपटायौ।।
बिंदिया , काजर  माथे  रोरी।
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

लहँगा , चुनरी पकरि पिन्हाई।
चोली स्याम - वदन  पै भाई।।
होरी खेलि  रहीं  ब्रज - छोरी।
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

ललिता चुड़ियाँ ,पायल लाई।
पद्मा ,   भद्रा   नें   पहिराईं।।
बँधी  कमरि  बंशी  हू  छोरी।
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

सिग जुरि-मिलि घुँघरू बँधवाए।
ढप-ढोलक धुनि स्याम नचाए।।
धरि दधि-मटकी सिर पै फोरी।
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

चुहल करें करि रहीं ठिठोली।
स्याम -सखा कों मारें बोली।।
माखन खायौ तुम करि चोरी।
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

बरस -दिना की बात कन्हैया।
होरी - होरी    जसुदा   छैया।।
'शुभम' सदा रहै नेहिल डोरी।
खेलत स्याम -राधिका होरी।।

💐 शुभमस्तु!

27.02.2020●10.15पूर्वाह्न।

श्याम की होरी [ सवैया ]


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 ✍ शब्दकार ©
🌷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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                    1
'प्रिय   राधे   चलौ  जमुना तट पै,
तहँ      रंग सों खेलहिंगे हम होरी।
नव    कंचुकी   देह   पै  धारि चलौ,
लहँगा   -  चुनरी  हू रहें तव कोरी।।
पिचकारी      हमारी  धरी भरिकें,
बाँधहु      निज छोर में चंदन रोरी।
तुम       आगें चलौ  हम  आय रहे,'
मुस्काय कें मानि गई सखि भोरी।।

                    2
'गोरे     तव     गाल   गुलाल  मलूँ,
बिन   रंग  लगाए  न  जावन दैहौं।
नख   से शिख लों तोहि बोरि  दऊँ,
जमुना - जलधार  में जाय कें नैहों।।'
'मति       गाल    मसोसौ  हमारे इते,
वे      देखिहें  तौ  कत  बात बतैहों।
चुनरी     सिग   स्याम   भिगोइ दई,
घर  जात  लजात  हों अँखि बचैहों।।'

                3
सखि    !  फ़ागुन  मास लगौ जब तें,
घनस्याम    भए   मतवारे  हमारे।
धरि   हाथनु   रंग   गुलाल  फिरें  ,
शुभ     औसर   ढूँढि   रहे भिनसारे।।
बारहों         मास   करें    रस - रंग ,
फगुआ       में  उठी  मन चंग पियारे।
कुंज      गली  में  जौ  मिलि औचक,
भए गाल   गुलाल  बिना रङ्ग डारे।।

                 4
ब्रज  ग्वालनु  - ग्वालिनि के सँग में,
घनस्याम        मचाय    रहे    होरी।
मुख         लीपि   भए   बदरंग  सबै,
रंग      बोरि   दई    साँवरि - गोरी।।
ढप ,  ढोल ,   मृदंग      बजाय  रहे,
लय - ताल  सों   नाचि   रही भोरी।
छवि , छींट   की   छाय रही पटुका,
करि     स्याम   रहे   जोरा - जोरी।।

                 5
 भीजि     गई     अँगिया   सिगरी,
रंगरसिया    घनस्याम    न मानें।
लहँगा -     चुनरी    लिपटे  तन सों,
जिद   होरी  की ठानि  लई  जानें।।
जब     घेरि    लए   ब्रजवीथिन में ,
नचिवे      की   सँग  स्यामजू  ठानें।
अपनी     , अपनी  , अपनी  ही रटें,
अपनी  रहै सेर आपनि ज़िद ठानें।।

💐 शुभमस्तु !

25.02.2020 ◆ 9.15 अप.

शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

सुत वसंत आया [ अतुकान्तिका ]


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✍ शब्दकार ©
🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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कामदेव - रति के
घर जाया
प्रकृति के आँगन 
वातावरण सुहाया,
मनभाया ,
सुत वसंत 
है आया।

स्वागत  हित
जड़ -चेतन सारे,
बूढ़े जर्जर 
पीले पल्लव में
अविरत पतझर,
नव कोंपल 
पुष्पित कलियाँ,
किसलय 
वन -उपवन की
वीथी ,गलियाँ,
करतीं रंगरलियाँ।

पल्लव -दल निर्मित
पालना,
वसन सुमनों के ,
लोरी सुना रही भ्रमरी,
कोयल की 
मधु मादक स्वर लहरी,
गेंदा ,डहेलिया,
गुलदाउदी ,गुलाब,
सुमन सरसों के,
आमों के बौर ,
झुंड भ्रमरों के
गुन -गुन गाते
संगीत मधुर।

सद -सुगंध फैलाते
मद में भर -भर जाते,
डाल -डाल पर सुमन,
सभी अति प्रमन, 
नमन ,वंदन,
अभिनंदन में लगन।

नाच उठा कचनार,
बैंजनी फूलों की 
 झोली भर -भर,
 नर्तित खेतों में
सरसों अरहर,
मतवाला चना 
हिलाकर शीश,
दे रहे सब 
 सुत वसंत  को
शुभ -आशीष।

रंग -बिरंगी
पहन शाटिका
तितली मतवाली ,
झूमे डाली -डाली,
काम का वेग 
थामने,
बहाना होली का ,
रंग रोली का,
फाग कबीरा गाए,
रंग  खूब बरसाए,
गुलाल , अबीर 
ललाट पर 
अम्बर में छाए,
चंदन शीतलता लाए,
भाभी -देवर सँग
 गुपचुप बतलाए,
रतिपति की महिमा के
शृंगार सजाए।

'शुभम' प्रतीक्षा
प्रियतम की करती
विरहिन 
कैसे इतराए?
बल -बल खाए,
सजनी -साजन 
तन -मन के 
एकांत सजाए,
रति -कामदेव -घर
वसंत सुत आए।

💐 शुभमस्तु !

 20.02.2020■6.15 अप.

ऋतुराज वसंत [ चौपाई ]


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✍शब्दकार ©
🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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ऋतु   वसंत  की जब से आई।
कोंपल  लाल अधर मुस्काई।।

वन - बागों में कलियाँ  फूलीं।
तितली पी मादक मधु भूली।।

गेंदा   और   गुलाब  महकते।
वन  में टेसू - सुमन दहकते।।

महुए भी   कुचियाए   प्यारे।
टपकें टप -टप वे भिनसारे।।

हुए निर्वसन मधुक ,पलाशा।
बँधी नारि नर की मधु आशा।

जब   निशीथ की वेला  आई।
महुआ  सुमन  रहे  टपकाई।।

महकी  धरती महुआ तरु तर।
फूल    बीनते  टपके   भूपर।।

कोयल  कूक लगे अति प्यारी।
विरहिन के उर हूक निखारी।।

फ़ाग - उमंग  उरों  में   भारी।
नर - नारी तन भरी ख़ुमारी।।

लाल    कोंप पीपल की बोली।
आओ    नेह  करें  हमजोली।।

गेंदा,    गेंदी   से    बतियाए।
संग  पवन   के गले  लगाए।।

सुर्ख  गुलाब  भ्रमर मँडराया।
बार - बार मकरंद  छकाया ।।

पादप   आम   बहुत  बौराए।
झुंड भ्रमर , तितली के छाए।।

पीली  - पीली  सरसों   फूली।
खेतों  में  बयार  सँग   झूली।।

राग - रंग  का   उत्सव  होली।
देवर -  भाभी  करें  ठिठोली।।

कामदेव    का   सुत  जन्मा  है।
युग - युग से वसंत-महिमा है।।

कोयल   गाती   पवन झुलाती।
वसन  सुमन  के नित पहनाती।

नव  पल्लव  का बना पालना।
प्रकृति   अंक में झुला डालना।

शिव  की रात्रि ,पंचमी , होली।
प्रकृति -  सुंदरी चोली खोली।।

कामदेव  - शर  मारक मोहन।
नर - नारी में अति सम्मोहन।।

ऋतुओं    का  राजा  वसंत है।
महिमा -  वर्णन  भी अनंत है।।

💐शुभमस्तु !

20.02.2020★5.50 अप.

कवि से पृच्छा [ गीत ]


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✍ शब्दकार ©
☘ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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गीत     तुम सद्भावना  के  गा रहे हो।
आचरण  में भी  कभी क्या ला रहे हो??

खेलते    हो  शब्द से ,  गिल्ली बनाकर।
डोलते हो     मूस की  बिल्ली सजाकर।।
स्वप्न किसको मधुरतम दिखला रहे हो?
गीत    तुम  सद्भावना    के   गा रहे हो।।

व्याकरण   में ढालकर तुम सृजन करते।
भक्ति में भगवान की तुम भजन करते।।
सो    रहा    भूखा  कोई  तुम खा रहे हो।
गीत    तुम      सद्भावना  के   गा रहे हो।।

वर्तनी     की  नाक    टेढ़ी   हो  न जावे।
छंद   की  कटि  अंश भी लचने न पावे।।
भंगिमा   कृत्रिम   सभी , नचवा रहे हो।
गीत   तुम   सद्भावना    के    गा रहे हो।।

आभूषणों  के  बोझ  से कविता थकी है।
हृदय   तल   से  दूर है धी में रुकी  है।।
भाव के  भँवरों  में  क्यों भटका रहे हो?
गीत  तुम  सद्भावना  के   गा रहे हो।।

कथनी तुम्हारी और  करनी भिन्न क्यों है?
गीत   तेरे   कर्म  से   विच्छिन्न क्यों हैं??
कागजों   के    फूल   क्यों महका रहे हो ?
गीत    तुम     सद्भावना    के    गा रहे हो।।
💐शुभमस्तु !

19.02.2020★7.10अपराह्न।

www.hinddhanush.blogspot.in

आया फ़ागुन मास [ कुण्डलिया ]


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💐 शब्दकार©
🌷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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              1
आया   फ़ागुन   मास   जब ,
पतझर       की      भरमार।
उष्ण - शीत  - के  साथ  ही ,
चढ़ने        लगा      खुमार।।
चढ़ने         लगा       खुमार,
नारि -   नर   सब   मदमाते।
तन -    मन    उमड़ा    मार,
भ्रमर    को   पुष्प    सुहाते।।
'शुभम'       कन्त   मधुमास,
चराचर    जग    में    छाया।
कलियाँ       बनतीं     फूल ,
 सँवरता     फ़ागुन     आया।।

                2
फूली  - फूली      हर   कली ,
वीथी  -    वीथी         शोर ।
आएगा      ऋतुराज      अब ,
चहक       उठी   हर    ओर।।
चहक      उठी    हर     ओर,
पखेरू      कलरव     करते।
जब    होती      नित    भोर ,
खुमारी     तन   की   हरते।।
'शुभम'        वसंती       रंग ,
दिशाएँ           भूली - भूली।
चकवा -   चकवी      संग,
शाख  हर  फूली  - फूली।।

  3
गेंदा       कहे        गुलाब   से,
'बिखरो     मत    हे     मीत।
रहो     एकजुट      प्रेम    से ,
तब      ही      होगी   जीत।।
तब     ही       होगी    जीत,
धीर     धर   मन  में जीना ।
पुष्प - जगत     की   नीति ,
धूल   भी    मिलकर  पीना।।
'शुभम'        सुखद   हो वास, 
नहीं    हो      वह     बेपेंदा।'
डाल       गले     में     हाथ ,
कहे        दुलराके       गेंदा।।

    4
फूला      फूल    गुलाब  का ,
महकाता            मधुमास।
गेंदा     से    कहने     लगा ,
'क्षण  की   जीवन  -  आस।।
क्षण   की    जीवन -  आस,
एक   दिन   का   ही जीना।
सूख       रहे    दल   -   रंग,
जिया हूँ ,   मैं      रसभीना।।
'शुभम '  मिली   है    साँस -
गिनी ,   क्यों भूला - भूला।
जीना     है      सुख    साथ ,'
फूल      यों   कहता   फूला।।

                 5
आना  -   जाना      नीति   है,
आदि     काल      से     नेक।
एक      कभी   जाता    वहाँ,
फिर     आता     है     एक।।
फिर       आता    है     एक ,
यही   क्रम   चलते     रहना।
सरिता         जैसी       धार ,
नीर   को    अविरल   बहना।।
'शुभम'      वसन्ती     नीति,
नहीं    जो    भी     पहचाना।
होता        कष्ट         महान,
नीति   यह  आना - जाना।।

💐 शुभमस्तु !

18.02.2020 .5.45 अप.

ग़ज़ल


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✍शब्दकार©
☘ डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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जुल्मते   -    श ब है   शरमाते   क्यों हो !
लब   में   लब    है    फ़रमाते  क्यों हो !!

सभी      को    यक़ीन      है     जो होना है,
हमसे     इतना    दूर   भी   जाते क्यों हो!

मुहज्जब     उसूल     है    ये    तहज़ीब का,
ओट      में    जो    हो   ले , बताते क्यों हो!

खुलेआम      की     तहज़ीब    इंसानी नहीं,
इस       तरह   आग़ोश  में   आते क्यों हो!

सिलवटें  बिस्तर की क्या कुछ छिपा पाएँगीं, 
शरमा    के    'शुभम'    यों छिपाते क्यों हो!!

जुल्मते-शब = रात का अँधेरा
मुहज्जब    =सभ्य
उसूल =सिद्धांत 
तहज़ीब =शिष्टचार।

💐 शुभमस्तु !

17.02.2020◆8.15 अपराह्न।

पाखंड -पुराण [ व्यंग्य ]

✍ लेखक © 
 🚸 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 
              मुझे यद्यपि पाखंड का अर्थ बताने ,समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है, तथापि जब बात पाखंड की चली है  ,तो उसकी याद दिलाना भी आवश्यक हो गया है। पाखंड का अर्थ होता है : कहना कुछ और करना कुछ। जो इस पावन दायित्व का निर्वाह करता है , वह बिना संदेह के पाखंडी कहलायेगा। लेकिन क्या कोई भी पाखंडी , अपने को पाखंडी कहलाना पसंद करेगा। क्यों ? क्योंकि उसके लिए पाखंडी होना या कहलवाना एक गाली है। गाली खाने जैसा है।गाली भी एक ऐसी शै है(वस्तु ) है कि इसे कोई अपने आप नहीं खा सकता। यह या तो खिलाई जाती है , या दे दी जाती है। अब ये बात अलग है कि कोई ले या न ले। जब कोई लेगा नहीं तो दाता की चीज दाता के पास। गाली दी गई औऱ ली या नहीं ली ,इसकी पहचान ये है कि उसे बदले में वही चीज कम या कुछ बढ़ चढ़कर मिले।एक की चार मिलें तो और भी ज़्यादा अच्छा।तब देने वाले के मन में अंगारे जैसे दहकते फूल खिलने लगते हैं।खाना तो जबरन ही पड़ता है। लेना या नहीं लेना अलग बात है । बात पाखंड की चली है तो पुनः लौटकर वहीं आ जाते हैं।

              वैसे तो इस संसार में पाखंडियों की संख्या में कोई कमी नहीं है।दस बीस प्रतिशत को छोड़कर सारा जगत ही पाखण्डमय है। मैं क्यों किसी का नाम लूँ कि कौन नेता पाखंडी है , अथवा यह कहूँ कि नेता नाम ही पाखंडी का है , तो क्यों कहूँ भला? क्योंकि यदि कोई थोड़ा सा भी ईमानदार है , तो वह अपने गरेबान में झाँककर बड़े आराम से देख सकता है। अपने धड़ -धड़ धड़कते हुए हृदय -पंप पर हाथ रखकर बहुत अच्छी तरह अनुभव कर सकता है। अब चाहे वह बहुत ऊपर पहुँचा हुआ महात्मा हो , उपदेशक हो , (पर उपदेश कुशल बहुतेरे । इसीलिए तो कहा गया।), शिक्षक हो , कथावाचक हो ,मंत्री या उससे भी ऊपर का हो ।अधिकारी हो , अधिवक्ता हो , कर्मचारी हो, नर या नारी हो। मैं तो किसी का नाम नहीं लेता। क्योंकि जो व्यक्ति जो होता है , वह भला क्यों कहे कि मैं यह हूँ ।यह आत्म- स्तुति जो मानी जाती है।औऱ हमारे 'अति सभ्य' जगत में आत्म-स्तुति अच्छी नहीं मानी जाती। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसे महापाप बतलाया है। कोई ईमानदार पाखंडी अपने को स्वप्न में भी पाखंडी नहीं कहेगा।कितने बड़े ईमानदार हैं पाखंडी लोग ! इसकी दाद देनी ही पड़ेगी।

         पाखंडी का एक औऱ भी अर्थ मेरी समझ में आ रहा है। यदि आप उसे भी जानने के जिज्ञासु हैं , तो मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती हैं। क्योंकि मैं तो पाखण्ड -पुराण लिखने ही बैठा हूँ। हाँ , तो दूसरे अर्थ में पाखंडी वह भी है जो अपने को उस रूप में प्रदर्शित करता है , जो वह है ही नहीं। इसे पाखंडी अपने वस्त्रों, गणवेश और वाणी के द्वारा दिखाने का सफल - असफ़ल प्रयास करता है। जो सफल हो जाता है , वह पुजने लगता है।फूलमाला , शॉल औऱ प्रतीक चिन्हों से मानित - सम्मानित होने लगता है।

             वैसे पाखण्ड का यह विशेष गुण मानव जाति की अमूल्य धरोहर है। पशु -पक्षी , कीड़े - मकोड़े बेचारे क्या खाकर पाखण्ड करेंगे। वे तो कपड़े भी नहीं पहनते । प्राकृतिक अवस्था में ही पैदा होते , जीते और मरते हैं। आदमी पैदा तो उन्हीं की तरह नंगा ही होता है। लेकिन सभ्यता के कपड़े पहनकर उसका चरित्र भी दोगला हो जाता है।गाय , भैंस , गधे , घोड़े , हाथी ,ह्वेल, मछली, मच्छर , मक्खी , गिलहरी , मोर , तोते , कौवे, गौरैया , कबूतर , गलगल, कोई भी पाखण्ड से सर्वथा विरत रहते हैं। क्योंकि वे मानवीय छद्म - सभ्यता के रेशमी चोले नहीं धारण किए रहते ।

              जिसने जितने आवरण अपने देह पर लादे , वह उतना ही बड़ा पाखण्डी। पाखंड की माया अपार है। इसमें डूबा हुआ सारा मनुज - संसार है। जितना बड़ा पाखण्डी , उतना ही महान। उतनी ऊँची उसकी शान। एक गरीब, निम्नवर्गीय या समस्तरीय क्या खाकर पाखण्डी बनेगा। पाखण्ड एक कला है , विज्ञान नहीं। कलाकारी के बिना इसकी शान नहीं।जो जितना बड़ा कलाकार ,उतना ही बड़ा समझदार। अब आप ही विचारिए कि क्या पाखण्ड से ही होगा देश का बेड़ापार? आँकड़े कुछ , बताये कुछ, मौके पर न कुछ।अनन्त है ये पाखंड पुराण और धन्य हैं देश औऱ विदेश के पाखण्डी। फिर आम को तो चुसना ही है। क्योंकि आम की नियति ही चुसने की है।मजा तो पाखण्डी के लिए हस्तामलक वत है।

 💐शुभमस्तु !
 21.02.2020 ◆5.50 अप.




रविवार, 16 फ़रवरी 2020

मैं घन ,बादल कहलाता हूँ [ बालगीत ]


★★★★★★★★★★★★★
✍ शब्दकार ©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
★★★★★★★★★★★★★

मैं    घन,बादल  कहलाता  हूँ।
सबको    ही  मैं  नहलाता   हूँ।।

खारे   सागर  से  जल  भरता।
 नभ    में   ले जा मीठा करता।। 
धरती   पर  फिर   बरसाता  हूँ।
मैं  घन  ,बादल  कहलाता  हूँ।। 

गरमी    में  धरती   तपती  है।
प्यासी!प्यासी!नित जपती है।
बुँदियाँ   बरसा  सहलाता   हूँ।
मैं    घन, बादल  कहलाता हूँ।।

बंजर ,  जंगल  या फसलों पर।
खेतों ,  नगरों सब नस्लों पर।।
नम    शीतलता   गहराता  हूँ।
मैं   घन, बादल  कहलाता  हूँ।।

अधनंगे     बच्चे   छत  जाते ।
हम  बादल उनको  नहलाते ।।
गर्जन     कर  उन्हें  डराता  हूँ।
मैं घ   न,   बादल कहलाता हूँ।।

जब    हवा  साथ   में  होती है।
झंझा    में    रजनी   रोती  है।।
बिजली    से 'शुभम' डराता हूँ।
मैं घन, बादल   कहलाता हूँ।।

💐 शुभमस्तु !

16.02.2020 ●4.00अपराह्न।

ग़ज़ल


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✍ शब्दकार©
🌾 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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  अपनी    ग़लती का यहाँ एहसास है किसको !
  फूल खिलते क्यों नहीं  आभास है किसको !!

              डालना   मत   हाथ  बेबस  के गरेबाँ पर तू ,              
इस  जहाँ  में  प्यार,वफ़ा रास  है किसको!

अपनी       नज़रों  के   तले   अंधे  हुए हैं हम,
कुछ  नज़   र आता नहीं उजास है किसको। 

नज़ारा करती है  दुनिया गमों का क्या करें,
अँधेरे     शहर     में उजाला पास है किसको!

हमारे       घर   का जोगी जोगना होता यहाँ,
'शुभम' जज़्बात का उसके कयास है किसको!

💐 शुभमस्तु !

16.02.2020 ■ 12.20 अप.

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

हर्रा लगे न फिटकरी [ व्यंग्य ]


 ✍ शब्दकार©
 🍀 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'  
                 नकली सोना असली सोने से कुछ ज़्यादा ही चमक का स्वामी होता है।लेकिन जब नकली से असली पीछे छूटने लगे तो असली का क्या काम रह जाता है ? जो उपलब्धि असली से भी नहीं पाई जा सकी और नकली ने वह हासिल करा दी , तो कौन भला हज़ारों गुना कीमती असली को अपने गले का हार बनाएगा।
          आदमी एक ऐसा जीव है ,जो 'शॉर्टकट' प्रेमी है। उसे लम्बा और अधिक समय में पूरा होने वाला काम पसंद नहीं आता।बेचारे के पास इतना समय ही नहीं है कि किसी अच्छी उपलब्धि के लिए अपने को संलग्न कर सके। सब कुछ उसे जल्दी चाहिए। वह तो नौ महीने से पहले माता के गर्भ से बाहर आना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है , अन्यथा समय से पहले ही कूद पड़ता ! पर क्या करे बेचारा ! ऐसा करने की उसकी सामर्थ्य ही नहीं है। वह समय को पीछे छोड़ देना चाहता है।इसीलिए वह ऐसे उलटे उपक्रम करता रहता है कि उसकी 'सुबुद्धि 'की दाद देनी पड़ती है। पर वह दाद कभी न कभी इतनी महँगी अवश्य ही पड़ती है कि खुजाते - खुजाते अंदर का खून बाहर ही झलकने लगता है।
       यों तो मानव के बृहद जीवन के अनेक आयाम हैं। हमारे यहाँ आदमी की देह को आदमी बनाने का काम शायद शिक्षा ही करती है। वह शिक्षा हमें माँ से मिलना प्रारम्भ हो जाती है। इसीलिए उसे हमारी प्रथम गुरु की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। यह सर्वांश में सच भी है। सच ही है। लेकिन जब वह आगे बढ़ने के लिए पगडंडियाँ तलाशने लगता है तो अजीब - सा ही लगता है। वह असली को धता बताकर नकली को असली सिद्ध करने में लग जाता है। विश्वविद्यालय की नकली डिग्रियाँ बनवाकर जब नौकरी मिल सकती है। तो कौन भकुआ कालेज में पढ़ने जाएगा औऱ अपना समय खराब करेगा । इसलिए नकली सोने कोअसली बताकर बेचने वाले ही उसे सच्चा मार्ग दर्शन कर पाते हैं।
                आज ज्ञान की जरूरत नहीं है। बिना पढ़े शिक्षक , डाक्टर , इंजीनियर होना कोई बड़ी बात नहीं समझी जाती। बस एक बार नौकरी या पद मिल जाये फिर कौन देखता है, असली या नकली। कुछ विश्वविद्यालयों की नकली डिग्री बनवाकर गुरुजी बने हुए अपनी पूजा करवा रहे हैं। उन्हें पढ़ाना ही नहीं है , तो पढ़ना क्यों ? अधिकरियों की चापलूसी औऱ नेतागिरी के बल पर मूँछें तानकर नौकरी कर रहे हैं और हर महीने मोटी पगार लाकर बैंक की तिजोरी भारी कर रहे हैं।लेकिन ऊँट कभी न कभी पहाड़ के नीचे आता ही है। जाँच हुई और दूध का दूध पानी का पानी हो गया। अब कहीं सींखचों के पीछे बैठकर कारागार की रोटी खाने का डर सता रहा है। नकली सोना नकली साबित हो ही गया। नकली की चमक कब तक ? कि पानी उतरने तक। अब तो इज्जत का पानी , आँखों का पानी , उतर ही गया। सब नकली की मेहरबानी।'शार्ट कट' की निशानी। नकली अंकपत्र , नकली डिग्री । पढ़ने-लिखने में नानी मरती । जब देश का आदमी इतना पतित हो जाएगा , तो उसे अपना देश क्या ! अपना घर ,परिवार भी बचाना मुश्किल होगा।
               विश्वविद्यालय सो रहा है। उनका काम कोई औऱ ही हल्का कर दे रहा है। उसे क्या ? बिना परीक्षा , बिना पढ़ाई , डिग्री बंट रही हैं। जब पड़ा छापा , तो याद आये बापा। यहाँ से वहाँ नापा। पर चोर डाल गया डाका। यूनिवर्सिटी पर  'सुपर यूनिवर्सिटी'  जो खुल गई हैं। जो अदृश्य हैं। करोड़ों , अरबों , खरबों का शुल्क , फिर फार्म , परीक्षा , रिजल्ट , डिग्री -तमाम झमेले। सीधे - सीधे इधर थमाया नामा, उधर आपके नाम डिग्री का बैनामा। नौकरी प्लेट में नियुक्ति पत्र को सजाकर तैयार जो बैठी है।आओ और पाओ। बच्चे बीबी संग मौज मनाओ। पूज्य पापा जी को खुश कराओ। क्योंकि उनके ही पुण्यप्रताप से ही तो फ़र्जी डिग्री औऱ उस पर असली नौकरी , शादी के बाद छोकरी की सहज प्राप्ति संभव हो सकी। ऐसे सभी पूजनीय माता -पिता धन्य हैं जो फ़र्ज़ी डिग्री से प्राप्त नौकरी के सुख लाभ का उपभोग कर रहे हैं । उधर बेचारे ईमानदार, पढ़ाई करने वाले दर-दर की ठोकरें खाते हुए भटक रहे हैं। टेस्ट , इंटरव्यू औऱ तमाम चक्रव्यूहों में निकलने के लिए रात -दिन एक कर रहे हैं। फिर भी सफलता उनसे कोसों दूर है। क्योंकि कमीशन में भी कमीशन के बिना अंतिम  व्यूह पार कर पाना इतना सहज नहीं है।
            निकम्मे गुलछर्रे उड़ाएं, मेहनतकश पीछे जाएँ। यही नारा है। बिना हर्रा फिटकरी के जब रंग चोखा आए तो कोई क्यों पढ़ने जाए?, कालेज स्कूल के भवन खड़े - खड़े तरसाये   कि कोई बालक  -बालिका अपने दर्शन कराए। कॉलेज धन्य हो जाये। छात्रों की चरण रज अपनी बिल्डिंग से लगाये। वास्तव में मेरा देश इसीलिए महान है। कामचोरी , बेईमानी, पगडण्डीबाजी इसकी शान हैं। सब बाईस पंसेरी यहाँ धान हैं। चोरों के यहाँ बहुतेरे कद्रदान हैं। ऐसे ही नेताओं का यहाँ सम्मान है। खुदा मेहरबान औऱ गधा पहलवान है। तभी तो मेरा देश महान है। मेरा देश महान है।
 💐 शुभमस्तु !
 14.02.2020 ●10.20 पूर्वाह्न।
 www.hinddhanush.blogspot.in

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

आप ही आप [ अतुकान्तिका ]


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✍ शब्दकार  ©
🌻 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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जब पड़ी
हाथ की थाप,
बोल ही पड़ी
ढोलक बस
आप , आप ही आप,
आप ही आप,
आप ही आप,
गूँजता 
श्रुतियों में संगीत
आप ही आप,
हृदय को करती
झंकृत,
धमकती ध्वनि की
तंत्री 
आप ,
आप ही आप।

वसन्ती ऋतु का
वासन्ती नाद,
ग्रहण करते हैं कान,
करते संवाद,
मौन ही
बिना विवाद,
कौन होता 
सुनकर नाशाद!
ढोल का
माधुर्य भरा
संवाद
आप ही आप।

हवाएँ दूषित
लगतीं काँप,
छोड़तीं ऊष्मित
धुँधली भाप,
होलिका के
फागों का ताप,
बरसता 
 ब्रज वनिता के साथ,
निकल पड़ती 
कान्हा की
पिचकारी
बरसात ,
आप ही आप।

हृदय में उठती
मृदुल हिलोर ,
भिगोती 
तन -मन के
सब छोर ,
नाचते वन में
कितने मोर !
साँझ या भोर ,
कलेजे में
चिंहुँकी रोर 
बड़ी बरजोर
आप ही आप।

वनस्पतियों में
नर , पतियों में
काम या रतियों में,
नवल उल्लास,
कहाँ है कोई 
आज उदास,
समर्पित साँस ,
सँजोती सपने
आप ही आप।

'शुभम' जड़ -चेतन ,
पशु -पक्षी 
लता विटप 
ढोल वंशी ढप ,
मृदंग मंजीर,
किंकिणि पायल ,
गले के हार,
जल , थल , नभचर,
एक रस - राग ,
आया है आया है
ऋतुराज,
स्वागत में 
सब खड़े ,
अभिनंदन करने ,
गुलमुहर अमलतास,
आप ही आप,
आप ही आप।।

💐 शुभमस्तु !

13.02.2020 ◆4.45अप.

प्रेम, ज्ञान का पर्व:मधुमास [ दोहा ]


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 ✍  शब्दकार ©
🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
अब   तो  यह  मधुमास  भी ,
लगता        है       ठगमास।
बूढ़ों  को     भी     दे    रहा,
रोमांचक         कामास।।1।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
बूढ़े    नीम     बबूल     भी ,
हरिआए       इस       बार।
लाल   अधर   मुस्का    रहे,
करते     जनु    मनुहार।।2।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
कलिका  यह  कचनार  की,
कच्ची     कोमल       कांत।
चमकाती    नीले      नयन,
नाच     रही    उद्भ्रांत।।3।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
ठूँठों      में     कोंपल    नई ,
करती -  सी    कुछ    बात।
तरुणाई       में    अरुणता,
का   मनहर   अवदात।।4।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
कलशी    अपने    शीश   धर,
नाचे          अलसी        पेड़।
नीली         आभा       झूमती, 
 खड़ी   खेत    की    मेंड़ ।।5।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
स्वागत    अभिनंदन    करें,
आया       द्वार        वसंत।
पुष्पार्चन      कर     वंदना ,
सब  ऋतुओं   का कन्त।।6।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
अमलतास  , गुलमुहर   भी ,
सहरा         में      मदमस्त।
लहराता    सिर         सेहरा ,
सज्जा   सह  विन्यस्त।।7।।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
गेहूँ  ,  जौ     की    बालियाँ ,
नाच         रहीं      पुरज़ोर।
कटि   पतली   सबला  बनी,
मचा      रही    हैं   शोर।।8।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
पीली       सरसों      झूमती ,
तितली      पी       मकरंद।
फूल -  फूल   रस    चूसती,
मना     रही    आनंद ।।9।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
मधुमक्खी    भँवरे   मगन,
पीकर     रस         संतृप्त।
करें  परागण    सुमन   में ,
नहीं    एक    भी सुप्त।।10।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
अरहर    रह -  रह   झूमती ,
पीकर        हाला      मस्त।
पीले     नन्हे     सुमन   पर,
तितली    भौंरे  व्यस्त।।11।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
नर -  नारी   में   काम   का ,
नव     मादक         संचार।
चुम्बक -सा   मन  खींचता,
फूल  न दिखते   खार।12।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
आया  जब  मधुमास   शुभ,
मधु    की    बरसे        धार।
जड़ - चेतन  में   प्राण  का ,
हुआ   नवल   संचार।।13।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
कानों   में    कोकिल  करे ,
कुहू -  कुहू    दिन -   रात।
लगता   फ़ागुन   आ   गया,
मनसिज   करता घात।14।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
प्रेम , ज्ञान   का   पर्व     है,
मंगल      शुभम   अनन्त।
प्रकृति     मंत्र में  जप  रही,
वंदित  विमल  वसंत।।15।

💐 शुभमस्तु!

12 फरवरी 2020◆ 4.50. PM

पीला रंग है ज्ञान का [ कुण्डलिया ]


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✍ शब्दकार©
🌾 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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पीली    सरसों    खेत    में,
नाच   रही     चहुँ     ओर।
मानो      पीली    शाटिका,
लहराती             पुरजोर।।
लहराती              पुरजोर,
चढ़ी   है  नयन   - खुमारी।
कामदेव       की         टेर ,
कर    रही   रती   कुमारी।।
'शुभम'       झुका  आकाश,
ओढ़कर    चादर     नीली।
इठलाती        है      भूमि,
धारकर    साड़ी  पीली।।1।।

पीले      पल्लव   झर    रहे,
बिखरी  -     बिखरी   छाँव।
उधर     लाल  कोंपल  उगीं,
निखरे  -    सुथरे     गाँव।।
निखरे   -    सुथरे     गाँव,
नया   जीवन    है   आया।
गोरस        देती        गाय ,
समा   शोभन   मनभाया।।
'शुभम'  सुखद  ऋतुराज,
होलिका  -  गीत     सुरीले।
कानों  में  रस   घोल  रहे ,
भौंरे     पट       पीले।।2।।

पीले   -  पीले    वसन  धर,
आए         हैं        ऋतुराज।
स्वागत   करने   के    लिए ,
खूब     सजाया       साज।।
खूब      सजाया        साज,
देह     फूलों    से   महकी।
गाते           भँवरे       गान,
गूँज  कोकिल  की चहकी।।
गेंदा   'शुभम'     गुलाब,
पुहुप       कचनारी    नीले।
ईख     दे      रही     सीख ,
भरो  रस  पीले -  पीले।।3।।

पीला     रंग    है   ज्ञान का ,
देता          सीख      वसंत।
 वसन  ,मुकुट  सब  पीत हैं,
ऐसा     ऋतुपति    कन्त।।
ऐसा     ऋतुपति      कन्त,
महकता    कली- फूल में।
नहीं        कभी       दुर्गंध ,
दे  रहा    कभी    भूल में।।
'शुभम '      संत   का  गात,
न    ढँकता     काला, नीला।
चीवर           रंगता      पीत,
ज्ञान  का  शुभ  रंग पीला।।4।।

पी ली    जिसने   प्रेम  की ,
कलशी       भर     आकंठ।
उसे   कौन जन कह  सका,
अज्ञानी      या          लंठ।।
अज्ञानी      या           लंठ,
प्रेमऋतु        मनभाई     है।
नर -   नारी         तरु - बेल ,
परस्पर         लिपटाई      है।। .
 'शुभम'        सृजन  का  सार,
जिंदगी         उसने      जी  ली।
होता        उर      का      नेह ,
माधुरी   जिसने  पी   ली।।5।।

💐 शुभमस्तु !

11.02.2020 ◆6.30अप.

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

कवियों का कैसा हो वसंत [ गीत ]


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✍रचयिता ©
🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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कवियों   का  कैसा  हो वसंत।
भावित भावों   से  प्राणवंत।।

अक्षर - अक्षर की खिले कली।
श्रुति में शब्दों की घुले डली।।
वाक्यों की शाखा हों अनन्त।
कवियों  का कैसा हो वसंत।।

हो   छन्दयुक्त  या  छंदमुक्त।
जनजीवन का या स्वयंभुक्त।।
फैले कविता-यश दिग दिगंत।
कवियों  का   कैसा हो वसंत।।

जन गण मन  को हितकारी हो।
निज   राष्ट्र धर्म - उपकारी हो।।
बन   जाय  संत जो हो असंत।
कवियों   का    कैसा हो वसंत।।

लय, ताल, गेयता  की पायल।
कर दे  न मृदुल उर को घायल
नीला   अम्बर   हो    नादवंत।
कवियों   का कैसा हो वसंत।।

भौंरे की कवि-स्वर में गुनगुन।
कोयल  की तानों की हो धुन।।
कवि  हो धरती का'शुभम' संत।
कवियों   का   कैसा हो वसंत।।

💐 शुभमस्तु !

10.02.2020◆5.15अप.

ऋतु वसंत की फिर से आई [ बालगीत ]


★★★★★★★★★★★
✍रचयिता ©
🌻 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
★★★★★★★★★★★

ऋतु वसंत  की फिर से आई।
कली- कली हर्षित मुस्काई।।

सेमल ,  बरगद फूले -  फूले।
कचनारों   पर   भौंरे   झूले।।
अमुआ   की  डाली   बौराई।
ऋतु वसंत की फिर से आई।।

भीनी  - भीनी महक लुटाती।
खेतों में सरसों   छा  जाती।।
पीली   -  पीली   छटा सुहाई।
ऋतु   वसंत की फिर से आई।।

पीली     चादर  ओढ़  खड़े हैं।
कीकर   पादप बड़े -  बड़े हैं।।
मधुमक्खी  उन पर मंडराई।
ऋतु   वसंत की फिर से आई।।

क्यारी में   गुलाब   मुस्काता।
गेंदा   झूम - झूम    इठलाता।।
भौंरों     की     टोली   गुंजाई।
ऋतु    वसंत की फिर से आई।।

गेहूँ , चना , मटर , जौ मनहर।
झूम  उठे   खेतों   में   सुंदर।।
हवा       बही   बाली  लहराई।
ऋतु वसंत की फिर से आई।।

रह - रह   अरहर   झूम रही है।
तितली  मधुरस  चूम रही है।।
'शुभम' सरसता जन-जन भाई ।
ऋतु   वसंत की फिर से आई।।

💐शुभमस्तु !

09.02.2020◆4.30 अप.

ऋतुओं की वयःसंधि [ दोहा ]


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✍रचयिता©
🍀 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'
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श्रीमती           शिशिरावती,
का   यह      देखो      हाल।
धीरे  -   धीरे     जा     रही ,
टेढ़ी   -   मेढ़ी    चाल।।1।।

पीठ    माघ   की    ओर   है,
मुख     फ़ागुन    की   ओर।
गर्म  दुपहरी     शिशिर  की,
ठंडी    -   ठंडी   भोर ।।2।।

शुभागमन     ऋतुराज    का ,
 पीहर        शिशिर    पयान।
फूलों    पर     भौंरे        करें ,
अपने    मधुर     बयान।।3।।

लाज  लग  रही  शिशिर  को ,
जब        आए      ऋतुराज।
मुड़ -  मुड़    पीछे     देखती,
रख  वसंत  सिर ताज।।4।।

फूलों    के    ही    बाण    हैं,
फूलों       सजी       कमान।
कामदेव     रति     से   कहें ,
'चलो       करें    संधान'।।5।।

पीले  पल्लव     झर      रहे,
झोंका       आया         तेज।
धरा  स्वच्छ नित   हो   रही ,
बनी  वसन्ती     सेज ।।6।।

गेंदा  सुमन     गुलाब    की ,
चटकीं       कलियाँ       मंद।
तितली   ,   भौंरे        झूमते ,
पीते      नव    मकरंद।।7।।

यदि    दुराज    होता   कहीं ,
जनता   को    दुख      भीत।
माघ   मास    के     अंत में ,
दुसह     उष्णता - शीत।।8।।

फ़ागुन   लाया     फाग सँग,
चंदन ,     रंग ,        अबीर।
 वन    में      टेसू     फूलते ,
गाते     लोग     कबीर।।9।।

ढप , ढोलक ,  करताल का ,
समा    बंधा      हर    ओर।
नारी  - पग     पायल  बजे ,
किंकिणि  करती शोर।।10।।

दो    ऋतु की   वयसंधि   की,
हलचल     दिन     हर    रात।
'शुभम'   विदा पल शिशिर के,
वासन्ती       है     रात।।11।।

💐शुभमस्तु !

09.02.2020 ●3.30 अप.

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...