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गुरुवार, 21 जून 2018

ये कैसा योग है!

रोकी  नहीं      चित्त की  वृत्ति
फिर  ये       कैसा      योग है !
नियमन  नहीं  श्वांस   का तेरा
फिर क्यों  ये    सब   योग है?

उठ - बैठक  औ' धमा- चौकड़ी
हाथ - पैर       फेंकना     उधर,
ये   तो सब  आसन हैं   तन के
योग   नहीं   तन की   कसरत।।

चित्तवृत्ति  से   जुड़ा हुआ  जो
साँसों      का     आना - जाना,
प्राणों का     आयाम   सुधारक
उसे   योग  समझा        जाना।

ऊपर    नीचे     देह     घुमाना
सिर   जमीन     ऊपर दो पाँव,
शीर्षासन   सुनते  थे    हम तो
चले   जाओ    नगर   या गांव।।

शीतकारी    भस्त्रिका    भ्रामरी
कपालभाति    के     प्राणायाम,
अनुलोम -विलोम भी देखे जाने
योग  के इनमें    बसते   प्राण।।

स्वेद   बहाना    योग     नहीं है
हाँ, आसन  हैं    तन के    सारे,
केवल तन   से जुड़े हुए    सब
किन्तु    योग  से   रहते न्यारे।।

भ्रमित  करो मत    राजनीति से
परिभाषा    बदलो  न योग   की,
इतने  मत     संकीर्ण   बनो जन
लगे चमक ज्यों चपल भोग -सी।

क्या   पतंजली      ने   बतलाया
योग    बराबर   आसन     होते?
फिर  तो नेता औऱ  संत     सब
एक   तराजू     तुलते       होते ?


नए    जमाने      के    ए    लोगो
नष्ट  न   करो   संस्कृति   अपनी,
शुभम  योग   से  जोड़ों निज को
राजनीति  की     त्यागो  नपनी।।

💐शुभमस्तु! 

✍🏼रचयिता©
 डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

रोज़ करें योग

     रोज़     करें    तो    योग है,
     वरना         बस     संयोग।
     क्या  होता एक   दिवस  में,
     देखा     -    देखी      लोग।।

     ना      होली       त्यौहार  ये,
     नहीं          दिवाली   -  दीप।
     रोज़     मनाना      नियम से,
     तब    तन  -   मन   उद्दीप्त।।

      भोजन      पानी  की   तरह ,
      नित्य      चाहिए         योग ।
      सांस  - सांस   गति  योगरत,
      तब   हो       देह      निरोग।।

     फोटू    भी     खिंचवा   लिए,
     छप    भी     गए    अखबार।
    वर्ष   -   वर्ष    फिर    आएगा,
     इक्कीस     जून   हर    बार।।

    बाईस   जून    को   क्यों  करें,
    फ़ोटो       नहीं        अखबार।
    आज    टी वी      पर  आयेगा,
   योग -दिवस         सौ      बार।।

 योग    नाम   है      जोड़   का ,
 करें     नियम         से    नित्य।
 देश   भी     अपना    योग    है,
 यही       बात       है      सत्य।।

जाति  -   धर्म      में      टूटकर ,
किया     अगर      तुम     योग। 
 ढकोसला       बन        जाएगा,
टूट -फूट         का           रोग।।

सिर्फ     दिखावे      के      लिए ,
करो     न                प्राणायाम  ।
प्राणों      के        आयाम      में,
बस       साँसों       पर    ध्यान।।

कपालभाति        या    भस्त्रिका,
या        अनुलोम  -       विलोम।
श्वांस  -नियम     के    योग    हैं,
हर्षित     हो          हर      रोम।।

जीवन     के        हर    क्षेत्र  में,
योग          जरूरी           तत्त्व।
'गर  मज़हब         लड़ते    रहे, 
मिटे           एकता  -       सत्व।।

छोट- बड़ाई         की      कथा ,
फिर      कैसे        हो       योग!
मन   में     जब    कीड़े     घुसे,
जल   से   अनल         विरोध।।

अपने    -    अपने      रोग    हैं,
अपने      -    अपने         योग।
मानवता   से      जो       जुड़ा,
नित्य           करेगा         योग।।

आयु      बढ़े       निरोग   तन,
मन      में         जोश   अपार।
योग   धर्म      मज़हब   बिना ,
करता        सबका      उद्धार।।

शुभम  योग    की   गहनता,
आदि काल               संस्कार।
 जुड़   जाएँ  तन -मन   सकल,
जाएँ       विनश         विकार।।

💐शुभमस्तु!

✍🏼रचयिता©*डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...