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रविवार, 7 दिसंबर 2025

अनिश्चय [ अतुकांतिका ]

 711/2025


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न आने का पता

कि कब आना है,

न जाने का पता 

कि कब जाना है।


आता है तू

उसकी इच्छा से,

जाता भी तू

उसी की इच्छा से,

तेरा क्या

तू तो पेंडुलम है

आने-जाने के मध्य का।


दोलन भी

उसी की इच्छा से,

बोलन भी

उसकी इच्छा से,

तू उसकी

इच्छा का दास है।


सोद्देश्य है तेरा

आना -जाना,

बस उसी से

मतलब रख,

आने -जाने के

बीच का

 स्वाद चख।


नियंता है वह

तू नियंत्रित,

पता नहीं

कब दोलन

रुक जाए,

तेरे दोलनों का पथ

कब बदल जाए

कुछ भी नहीं पता,

सब कुछ अनिश्चय।


शुभमस्तु !


04.12.2025 ●3.45 प०मा०

                   ●●●

बुधवार, 12 नवंबर 2025

आजकल की शादियाँ [अतुकांतिका ]

 678/2025



       


©शब्दकार

©डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्


आजकल की शादियाँ

शादियाँ नहीं

शादियों के नाम पर

अपनी रईसी की 

नुमायश भर हैं ।


किसी की दमकती हुई

महँगी साड़ी

किसी की चमकती हुई

घोड़ा गाड़ी

खिलखिलाते हुए 

बल्बों की झिलमिलाहट

चहकती हुई चिड़ियों की

चहचहाट

टीवी की डिस्प्ले पर

महकते हुए व्यंजन

कहीं चंचल नयनों के

फड़कते हुए खंजन

लकदक सूट में सजे हुए

दूल्हा,

उसके संबंधी।


उन्होंने बनवाईं

पचास तरह की रोटियाँ

अट्ठासी प्रकार की मिठाईयां

शत -शत पकवान 

नाश्ते व्यंजन

वे बनवाएंगे

पचपन प्रकार की पूड़ियाँ

पराँठे दोसा छोले भटूरे

कम से कम 

एक सौ एक प्रकार की

देशी विदेशी मिठाइयाँ

सजवाएँगे,

यही नहीं फलों की चाट में

विदेशी चायना जापानी

फल भी होंगे

लोग खायेंगे कम

सराहेंगे ज्यादा,

यही तो आज की

शादियों का नुमाइशी कायदा।


येन केन प्रकारेण 

धन कमाइए

अपनी संतति की 

नुमाइशी शादियों में 

उड़ाइए,

किंचित भी गुप्ता जी से

कम हो गया 

तो शर्मा जी की नाक ही

न कट जाएगी,

फिर ब्याहली की अम्मा

और सासें किसी की

साँस कैसे रोक पाएंगी,

गली के नुक्कड़ पर

उनकी हेठी नहीं हो जाएगी?


मेरे अभिजात्य जनो !

मेरी बात ध्यान से गुनो

झूठी प्रतिष्ठा में 

बरबाद क्यों हुए जाते हो!

किसी अपने का

गला काटने में

 क्यों नहीं शरमाते हो,

झूठी शान दिखाई 

दे ही जाती है,

जब दुल्हन दहेज की

खातिर ससुरालय में

दुत्कारी जाती है,

और सासों के उलाहनों से

सम्मानित की जाती है।


शुभमस्तु !


11.11.2025●11.15 आ०मा०

                      ●●●

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

कुत्ता-वार्ता [ अतुकांतिका ]

 502/2025



              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हम कुत्तों का वंश

मिटाने की

अच्छी साजिश है

आदमी की !

इनकी 

नसबंदी कर दो

शैल्टर होम में

भर दो

खुद ही

मर जाएँगे

लड़- लड़ कर।


किसी पर 

कोई दोष भी नहीं

आएगा,

इनका कुत्ता- संघ

विफल हो जाएगा,

फिर कोई कुत्ता

सुप्रीम कोर्ट तो नहीं

जाएगा।



अंततः

आदमी आदमी है

और कुत्ता कुत्ता है,

आदमी से टकराएगा

भला उसका

 क्या बूता है? 


अब न कोई कुत्ता

आदमी को 

काट पाएगा,

न होगा रेबीज़

न इंजेक्सगन

 लगवाएगा।


चिल्लाते रहें

कुत्तों के हमदर्द

भौंक -भौंक कर

 स्वतः शांत 

हो जाएंगे,

जब कुत्ते पैदा 

ही नहीं होंगे

तो काटने 

क्यों आएँगे !


शुभमस्तु !


04.09.2025● 3.00प०मा०

                   ●●●

रविवार, 24 अगस्त 2025

दंशन प्रेमी [अतुकांतिका ]

 457 /2025


                  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समस्या का हिस्सा

सामान्यतः कोई नहीं

बनना चाहता, 

हर शख्स समस्या से

बचना ही चाहता।


यह कथन

हर व्यक्ति  के लिए

सही नहीं है,

क्योंकि कुछ ऐसे भी हैं

जो दिमाग का

बना देते दही हैं।


यही करना तो

उनकी फितरत है,

सुलझे हुए को

और उलझाना

उनकी क़ुदरत है।


माँसभोजी को

मांसाहार ही 

आनंद देता है,

समस्या के जनकों को

यही सब सुहाता है।


कोई अन्य देता है

यदि उचित समाधान

उलझाऊओं को

होना पड़ता है परेशान

क्योंकि यह

उनकी प्रकृति के 

विपरीत है,

ऐसे में उनके दिल में

बैठ जाता अचल शीत है।


बिच्छू है 

डंक दंशन स्वभाव है,

जहाँ नहीं हो

वहीं बनाना घाव है,

उनके हृदय में 

बसा ही रहता 

सदा दुर्भाव है।


शुभमस्तु !


23.08.2025● 9.00आ०मा०

                  ●●●

सींग भिड़ंता [ अतुकांतिका ]


456/2025


               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बस दीवाल होनी चाहिए

उनका उद्देश्य पूरा हुआ

उन्हें सब जगह

सींग मारने की जो आदत है!

यह उनकी विशेष हॉबी है ।


उनके सींग 

उनके विशेष हथियार हैं,

वे समझते हैं कि

वे कृष्ण के अवतार हैं,

जबकि असलियत ये है

कि ये उनके मन का बुखार है।


उन्हें अपने सींग की नहीं है

कोई चिंता

उनका उद्देश्य है

फटे में अड़ाना अपनी टाँग

और करना भी फजीता,

वे अक्सर इसी अवसर की

तलाश में रहा करते हैं

जहाँ मिली

 कोई कच्ची पक्की दीवार

सींगों से सलाम करते हैं।


कोई कहता है कि

यह उनका जातीय संस्कार है

और कोई मानता है कि

आनुवंशिक चमत्कार है।



जो भी हो

वे दीवार में अक्सर 

सींग अड़ाया करते हैं,

कभी किसी को मारते हैं

कभी खुद मरते हैं,

पर वक्त आने पर

सींग अड़ाना बन्द 

नहीं करते हैं।


शुभमस्तु !


23.08.2025● 8.30 आ० मा०

                  ●●●

[9:00 am, 23/8/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

सभ्यता का आच्छादन [अतुकांतिका]

 454/2025

   

         सभ्यता का आच्छादन

                    [अतुकांतिका]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह और देहंगों को

ढँकना सीख लिया,

सभ्य तो हो गया होगा

पर उस मन को तो

ढँका ही नहीं

जो युग- युग से नंगा है

असभ्य है।


यदि वह भी ढँक जाता

 ये आदमी 

और का और हो पाता,

पर नहीं समझा गया

इतना जरूरी

क्योंकि वही तो खिलाता है

कानों को रस 

आँखों को सर्वश

रसना को मधु रस।


सभ्यता कपड़ों में नहीं

भावना में है,

मन की कामना में है,

कोई किसी कुत्ते  को

असभ्य नहीं कहता !

जबकि वह कोई अधोवस्त्र 

नहीं गहता ,

नग्न ही रहता।


कुछ लोग हैं  जो

पंच वस्त्रों में भी असभ्य हैं,

दिगम्बरी संत या नागा बाबा

बिना वस्त्रों के भी भव्य हैं।


असभ्यता वहाँ है

जहाँ आदमी को

आदमी नहीं

कीड़ा-मकोड़ा समझा जाए !

रूप दर्शन के लिए

पहरा लगाया जाए,

मतों का दान लेकर

उनका मान मर्दन किया जाए,

नेताओं के द्वारा आम आदमी क्या

अधिकारियों को भी

दुत्कारा जाए,

मन्दिरों में देव दर्शन में 

उत्कोच लिया जाए,

वी आई पी दर्शन का

धंधा चलाया जाए।


ये सूट ये सदरी

ये टाई की रबड़ी

किसको दिखाते हो,

नंगे हो असभ्य हो

ये अभिनय 

किसे दिखलाते हो ?


ये सब नकली आच्छादन हैं

जैसे कोई शवाच्छादन  हो

जिसे जलना ही जलना

ये अच्छादन भी उतरना है,

कपड़े असभ्यता की पराकाष्ठा हैं

कुत्ते बिल्लियों से इतर

कुछ भिन्नता का वास्ता हैं


शुभमस्तु !


22.08.2025 ●3.15 प०मा०

                   ●●●

सब एक हो जाओ [अतुकांतिका]



452/2025


     

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

       


जब पढ़ना था

तब पढ़ा नहीं,

जब शिखर पर 

चढ़ना था

तब चढ़ा नहीं,

अब छलाँग लगाकर

मंजिल हथियाने की

योजना है ,

 इसके लिए भी 

भला क्या सोचना है?


जब कुछ भी न कर सको

नेता के लबादे में जा घुसो

जहाँ न जाने की हो अनुमति

गेटकीपर को मारो दो धक्का

और जबरन ही जा ठुसो !


कौन  पूछता है 

पढ़ाई -लिखाई

कोरी हेकड़ी ही

सब जगह काम आई!

टेढ़ी करो अंगुलियाँ अपनी

चमकाओ जूते के बल

अपनी ठकुराई।


नेता जी को 

आई ए एस सलाम बजाता है

उसे देखते ही

कुर्सी छोड़ खड़ा हो जाता है

यहाँ  हर तरह की गुंडई का 

फार्मूला काम आता है।


बिना पढ़े- लिखों से

हर नेता चुना जाता है,

पढा- लिखा तो मशीन है

वोट डलवाता है,

बताइए पढ़ाई- लिखाई का गुण

किस काम आता है?


जितनी बार चुने जाओ

हर बार नई पेंशन पाओ

जब स्वयं संसद में बैठ जाओ

तो  नौकरीपेशाओं की

पेंशन को बंद करवाओ,

अपना वेतन बढ़वाने के लिए

गिद्ध कौवे चील और

 गीदड़ एक हो जाओ।


यही लोकतंत्र की

परिभाषा है,

यहाँ कोई हंस नहीं

मानव हंताओं का

मेला है तमाशा है,

जो जितना लूट सके

लूट लो,

इधर रहो या उधर

कभी तुम्हारी तो

कल हमारी है,

यह कुर्सी

 खाली तो नहीं रहनी,

यह तो बेचारी है !


शुभमस्तु !


22.08.2025● 9.30 आ०मा०

                 ●●●

[2:43 pm, 22/8/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

खिलौना [ अतुकांतिका ]

 451/2025


                    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खेल रहे हैं

सभी खेल की तरह

जिंदगी को,

खेल ही खेल में

कब खिलौना 

बन जाओगे

कोई पता नहीं।


तमाशा   देखते- देखते

कब तमाशा बन जाओ

क्या किसी को यह ज्ञात है

कब वसंत की बहारों में

होने लगे बरसात है, 

किसी को नहीं पता !


तू विधाता के हाथों में

एक अनगढ़ मिट्टी का

बोदा - सा   लोंदा  है,

उसे ही बनानी है मूर्ति

क्या कभी ये सोचा है?


कभी गधा तू कभी घोड़ा है

विधि की तूलिका ने 

हाथ किस तरफ मोड़ा है

कभी मच्छर है डांस है

कभी द्विपद आदमी है,

किसी न किसी मूर्ति में ढले

यह हर जीवार्थ लाजमी है।


खिलौना है विधि के हाथ का

फिर भी इतराता है !

ऐंठकर चलता है 

कभी सतराता है!

अपनी नियति का तुझे

कुछ भी नहीं है पता,

इसलिए बेहतर है तेरे लिए

यहाँ कभी किसी को न सता।

कट ही जाना है कभी न कभी

ऐ खिलौने तेरा भी पत्ता।


शुभमस्तु !


22.08.2025● 8.30 आ०मा०

                 ●●●

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

दृष्टि का कोण [अतुकांतिका]

 446/2025


              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अनुभूत है ये

कि दृष्टि में कभी

ऋजुता नहीं होती,

वह सदा 

कोण से ही

जागती सोती।


इसीलिए 

दृष्टिकोण होता है,

कोण की 

अनिवार्यता है वहाँ

सरलता का

कोई काम नहीं।


कोई भी कोण

न्यून कोण

अधिकन कोण

सम कोण

विषम कोण

प्रतिवर्ती कोण

हो सकता है,

उसे ऋजु 

करने के लिए

ऋजुता लानी पड़ती है।


प्रत्येक कोण की

अपनी-अपनी डिग्री है,

कोण बदलने से ही

बात बनी है

 बात बिगड़ी भी है।


कोई भी कोण

किसी से होड़

नहीं कर सकता,

क्योंकि हर कोण का

अपना ही मोड़ है

अपना ही मोड है

यही तो कोणों का

जटिल भेद है।


शुभमस्तु !


21.08.2025● 11.45 आ०मा०

                    ●●●

बाबली बनाम बाबरी [अतुकांतिका]

 445/2025


          


©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जब आदमी 

बाबरा हो सकता है

तो वे बाबरी

क्यों सम्भव नहीं हैं !

संभावना थोड़ी नहीं

पूरी-पूरी है।


पहले समय में

किलों  में

जमीन में

बाबलियाँ होती थीं

आज उनका 

इतिहास बता रहा है।


आज घर-घर में

बाबलियाँ न सही,

बाबरियों की भरमार है,

वे सड़क पर

पहाड़ों पर

नदी की धार में

दुस्साहसिक

रीलें बनाती

दिख जाएंगी।


बाबली में 

सीढ़ियों से

नीचे जाना पड़ता था,

बाबरी क्या 

चमत्कार कर दे

कुछ पता नहीं !

उसे सीढ़ी नहीं चाहिए

सीधी उड़ान 

जो भरनी है,

आत्म प्रदर्शन की

माँग पूर्ण करनी है,

समय -समय की

बात है।


शुभमस्तु !


21.08.2025● 11.15 आ०मा०

                    ●●●

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

नई स्वतंत्रता! [अतुकांतिका]


432/2025


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सास जमाई ने लुभाई

स्वतंत्र हो गई

युवती मित्र ने उठाई

स्वतंत्र हो गई।


उत्कोच के लिए

स्वतंत्र नेता और अधिकारी

पुलिस और राजस्व में

कम नहीं यह बीमारी

सब स्वतंत्र हैं,

स्वतंत्रता के

यही नए अर्थ हैं।


धनिए में लीद

दूध में पानी

सोने में पीतल

मिलानी ही मिलानी

यही तो है स्वतंत्रता 

की नई कहानी 


बहुएँ बेटे  वृद्ध 

सास ससुर

माँ बाप को

वृद्धाश्रम में

भेजने के लिए

हुए हैं स्वतंत्र,

यही तो है

स्वतंत्रता का

नवल मंत्र!


गबनी गबन के लिए

दमनी दमन के लिए

स्वतंन्त्र ही स्वतंत्र

क्या करेगा लोकतंत्र ?


यहाँ पर कोई

आकर कुछ सोचेगा

या जगत गुरु

यही स्वतंत्रता देखेगा!

वाह रे!

मेरे नए भारत

कर दिया

नई स्वतंत्रता ने गारत !


शुभमस्तु !


14.08.2025●2.30आ० मा०

                   ●●●


गुरुवार, 7 अगस्त 2025

श्रीकलेश [ अतुकांतिका ]

 409/2025


                

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हो गया है

श्रीकलेश 

कुकृतयुग का,

जो हो जाए

कम ही है।


संबंधों  में

अमन्द दुर्गंध ,

कविता ऐसी

कि बचा नहीं छंद,

बंध निर्बंध।


कुछ भी कह दो

वही कविता है,

करेगा भी क्या

वहाँ जाकर 

सविता है ?


यहाँ वहॉं

बस भीड़ ही भीड़

टूट गई

रिश्तों की रीढ़

हाथों हाथ

निवाला छिनता है।


चुपचाप

जिए जा रहा हूँ,

जहर को

सुधा सम

पिए जा रहा हूँ,

हवा में उड़ रहा

एक तिनका है ।


शुभमस्तु !


07.08.2025●12.45प०मा०

                ●●●

शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

सावन के घन [ अतुकांतिका]

 385/2025

  

                 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सावन के घन

रिमझिम बरसे

विरही जन

रजनी भर तरसे

प्रिया मिलन की चाह।


अमराई में 

पीहो- पीहो 

मोर कर रहे

बादल गरजे

शोर भर रहे

रपटीली हर राह।


टर्र -टर्र करते 

करते नर मेढक

कर-कर के आह्वान

याद मेढकी की

आती है।


झूले नहीं बाग में

अब वे नहीं झूलती

ब्रजबाला 

मोबाइल थामे

कुछ और देखती।


हरी घास की

मखमल पर

चलने का सुख 

 वह मानुस क्या जाने 

जो बसता है

कंकरीट के

सघन वनों में।


आओ पावस का

आनंद मनाएँ 

भूल न जाएँ

सावन की वे

झर -झर झरतीं

विरल फुहारें।


शुभमस्तु !


01.08.2025 ● 2.30 आ०मा०

                   ●●●

गुरुवार, 24 जुलाई 2025

राज की नीति [अतुकांतिका]

 367/2025

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

जान गए तो

राजनीति क्या ?

जो कर ले

वह राजा।


नहीं आम का काम

खास ये

जो चुसता वह आम,

चूषण में जो

जितना भूषण

वही राज का राज।


राजनीति चुसने में ?

बिलकुल नहीं

नहीं जी, नहीं- नहीं,

सदा चूसना

राजनीति है

यत्र तत्र सर्वत्र कहीं।


जितना बड़ा 

चूसने वाला

उतना ही वह 

सुसफ़ल नेता,

अभिनेता तो 

नाटक करता

असली तो बस 

नेता होता।


सबके वश का

काम नहीं है

पहले तो

मन गदला कर लो,

चले अगर तो

राज -मार्ग पर

राजनीति कुर्ते में

भर लो।


राजफ़ाश

जब हो जाए तो

समय पूर्व

क्या राजनीति है?

मटकी में 

गुड़ फोड़ा जाए

कहते हैं जन

कूटनीति है।


जन के ऊपर

कहलाता है

दबा  रखे जो

जन का नेता,

राजनीति का

मुकुट वही है

नहीं कभी

धेला भर देता।


चढ़ी पेट पर

सदा दबाती

जन- जन को

यह राजनीति ही,

बचना है 

आसान न इससे

रीति पुरानी 

बिना प्रीति की।


शुभमस्तु !


24.07.2025●7.00आ०मा०

                 ●●●

शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

आदमी और गलती [ अतुकांतिका ]

 350/2025

 

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अपनी गलती

सहज ही स्वीकार ले

वह आदमी नहीं,

आदमी की  

परिभाषा से

परे है ,

वह कुछ और ही हो

पर एक स्वाभाविक 

आदमी कदापि नहीं।


स्वीकार लेना

सहज ही

अपराध बोध होगा,

इसलिए तुरंत नकारना

झुठकारना आसान होगा,

आदमी बने रहो 

और अपने दुष्कर्म को

झटकारते रहो,

यही तो तेरी आदमियत है,

वरना देवता बन जाए।


आदमी से गलतियाँ

हो भी जाती है

अनजाने में,

कभी- कभी वह 

करता भी है 

लगता छिपाने में,

पर ये नासूर

एक दिन फूटता ही है,

और दूध का दूध 

पानी का पानी

छँट जाता है,

हाँ,मैंने ही किया है

वह कह पाता है।


आदमी और गलती

गलती और आदमी

दोनों का साथ

चोली  - दामन का,

यदि आदमी देवता होता

तो कोर्ट कचहरियां

 पुलिस नहीं होते,

अब राम राज्य के

अर्थ बदल गए हैं।


शुभमस्तु !


17.07.2025 ●9.00प०मा०

              ●●●

शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

चातक की टेक [अतुकांतिका]

 337/2025

                 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


स्वाभिमान चातक- सा

मिलता है भला कहाँ!

पतित हो जाते जन

कठिन है निभाना टेक।


पीता नहीं गंगा जल

चातक की है टेक एक

पीना है स्वाति जल

त्यागे क्यों निज विवेक?


 धैर्य और प्रतीक्षा का

एक ही निदर्शन है

पिउ -पिउ की रटन लगाए

खग वह पपीहा।


पीना है बिंदु वही

बरसे जो स्वाति से

इसी की पुकार है

मेघों से प्यार है।


प्रेरक है 

गुरु भी वह

सीखना है तो सीख ले

चातक की पुकार से

चरित्र निर्माण कर।


शुभमस्तु !


10.07.2025●6.45प०मा०

                      ●●●

शनिवार, 5 जुलाई 2025

दर्पण और आदमी [ अतुकांतिका ]

 328/2025


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दर्पण देखा

सजे -संवरे 

पर सुधरे नहीं,

साहित्य भी क्या करता

दर्पण बना रहा

सुधरना तो

आदमी को ही था,

दर्पण की अपनी भूमिका है

वह करवा नहीं सकता।


दर्पण निर्जीव,

आदमी सजीव 

बुद्धिमान भी!

पर वाह री बुद्धिमानी

धरी की धरी रह गई।

साहित्य किस काम आया?


दर्पण की किरचें

उतने ही बिंब,

वे किस काम के?

दर्पण भी उसीका

उसी से दर्पण,

पर किसको अर्पण!


आदमी अपनी मति

दर्पण अपनी गति

कोई तालमेल नहीं

विरोधाभास ही लगा

आदमी नहीं  है

किसी का भी सगा,

सर्वत्र दगा ही दगा।


पूरक हैं वे दोनों

दर्पण और आदमी,

पर व्यवहारिकता में

एक पूरब दूसरा पश्चिम,

धूल थी चेहरे पर

दर्पण को तौलियाता रहा।


शुभमस्तु !


03.07.2025●9.00प०मा०

                  ●●●

शुक्रवार, 27 जून 2025

वासना का खेल [अतुकांतिका]

 287/2025


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वासना बलि

माँगती है,

मिल भी रही है,

उसके लिए

कोई जिंदगी

कुछ भी नहीं है।


वासना का खेल

एक सौदेबाजी है,

इस हाथ ले

उस हाथ दे।


वासना का 

बाजार लगा,

दूल्हे नहीं

प्रेमी मिलते हैं।


वासना के 

बाजार में

सब कुछ नकद 

उधार कुछ भी नहीं।


सच को भला 

कौन स्वीकारता 

है यहाँ

प्रेम की चिड़िया

उड़ गई

बहुत पहले।


वासना का खेल

अक्लवन्द खेलते हैं

और मूर्ख ठगे

जाते हैं।


शुभमस्तु !


26.06.2025● 9.15 प०मा०

                 ●●●

मंगलवार, 24 जून 2025

दशमांशिनी भी नहीं [अतुकांतिका ]

 261/2025

          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दशमांशिनी की भी 

नहीं अधिकारिणी

वे अर्धांगिनी संभव नहीं,

भगवान ही बचाए

'ऐसियों' से नए युवाओं को।


झूठी है पंडित की पत्रिका

झूठे हैं हवन पूजा पाठ

अंधी है उनकी दृष्टि

जिन्हें  मार गया काठ।


देह और चमड़ी देखकर

पहचानना चरित्र

सर्वथा बेमानी है,

पति के प्रति भरा है

कितना दुर्भाव

यही बात तो जाननी है।


किसी के मन को

 पढ़ा है  किसने?

चरित्र -मापन का 

मीटर नहीं बना,

हवस की भिखारिनों का

कोई महल नहीं खड़ा।


जिनके नाम से भी 

दुष्कर्म और पाप दुर्गंधाये

उनका नाम कविता में

लिखकर कवि क्यों

लेखनी दूषित कराए!


अरी नारी

हमने तो पहले ही

 मान लिया था

कि नर से भारी नारी

फिर आज क्यों

तू चला रही 

पुरुष वर्ग पर छुरी 

जहर आरी।


भूलवश विधाता ने

तुझे चुड़ैल से

नारी बना दिया,

तू जन्म जन्मांतर 

चुड़ैल ही रहे

कर्म के भोगों का दंड सहे।


शुभमस्तु !


19.06.2025●8.45आ०मा०

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पतिघातिन [अतुकांतिका]

 258/2025

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पतिघातिनों का नाम भी

अब पाप है,

क्या खोज पाओगे कहीं

सावित्रियाँ?

झूठ करवा चौथ का

व्रत आज है!


वासना को प्रेम कहतीं

कुलच्छिनी! पतिहंतिनी !!

छद्मता कब तक छिपेगी

आतंक का बाजार 

अब लगने लगा।


गुल खिलातीं

आधुनिक ये छोरियाँ

विश्वास के क़ाबिल नहीं हैं

लेश भर,

अनृत माया चपलता

दयाहीना

क्या कुछ नहीं 

अविवेक की भंडार 

अशौची भी सदा।


तालाब की ये मछलियाँ

जो ज्यादा उछलतीं

चरित्र को लेकर 

हथेली में 

मचलतीं।


सवधान हो जाओ

विवाहेच्छुक युवाओ!

प्राण अपने खुद बचाओ

चुड़ैलों के चंगुलों से

अन्यथा खा मात जाओ।


शुभमस्तु !


12.06.2025●8.30प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...