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गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

प्यार में खोई युवा जोड़ी [ गीत ]

 653/2025


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्यार में खोई 

युवा जोड़ी

एकांत पल है।


फूल झरते 

पेड़ से 

अद्भुत समा है

घास में यों

प्यार का

आसन जमा है

एक दूजे 

के बिना 

पड़ती न कल है।


बेखबर 

जग से

स्वयं से हो गए हैं

पलक 

चारों बन्द हैं

ज्यों सो गए हैं

जिंदगी के

रूप का

ये भी अमल है।


साथ जीने

साथ मरने 

की कसम ले

बढ़ चले

उस राह पर

प्रण की रसम ले

बसता

हृदय में प्यार 

निर्मल गंग जल है।


शुभमस्तु !


28.10.2025●5.30 आ०मा०

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बुधवार, 18 सितंबर 2024

हम हैं रसोईया [ गीत ]

 398/2024

            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कवि नहीं

हम हैं रसोईया 

जानते क्या  परोसें।


चुन रहे हम

बीज शब्दों के

सुघर साबुत सुनहरे।

व्यंजन पकें

सुस्वादु मधुरिम

दृश्यता में सुष्ठु निखरे।।


जो लगाते

भोग ले चाव 

हमको यों न  कोसें।


छाँटना पड़ता

लगी हैं ढेरियाँ

क्या कुछ उचित होगा!

गलित रूखे

भी न हों वे 

पहनवाएँ सुघर चोगा।।


समझनी हैं

चाहतें सबकी 

हमें कण भर न रोसें।


कविता कहें

या थाल व्यंजन 

जो  परोसा आपको।

कठिन कोमल

तुहिनवत या

सह सकें इस ताप को।।


है 'शुभम्'

चातुर्य कौशल शब्द 

नहीं आलू समोसे।


शुभमस्तु !


13.09.2024●11.45आ०मा०

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शनिवार, 26 अगस्त 2023

देखा नियरे जाकर● [गीत ]

 372/2023

 

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●© शब्दकार

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अब न तुम्हें हम

चाँद कहेंगे

देखा नियरे जाकर।


अब तक धोखा

खाया हमने 

कहा चाँद-सा मुखड़ा।

जाकर ऊपर

चाँद निहारा

बढ़ा हृदय का दुखड़ा।।


 नहीं लुनाई

गालों जैसी 

भ्रम टूटा अब आकर।


पाए हमने

गहरे गड्ढे 

दो सौ डिग्री नीचे।

शीतलता ही

मिली बर्फ की

अगणित बंद दरीचे।।


चिकनाहट की

राम कहानी 

गिरी पड़ी झुठलाकर।


होती यदि तुम

मौन चाँद -सी

नहीं ब्याह कर पाते।

पत्थर की तुम

होती प्रतिमा

ठगे हुए रह जाते।।


कैसे करते

हम परिरंभण

रह जाते पछताकर।


विक्रम ने ये

हमें बताया 

मामा लगे न वैसा।

कविता में जो

कविगण बोलें

नहीं लेश भर ऐसा।।


कवियों की ये

झूठ कल्पना 

गिरी पड़ी गश खाकर।


बाबा दादी

झूठे हैं सब

चंदा मामा ऐसा?

पूनम का जो

चाँद निहारे

मन को खींचे कैसा!!


असली रंगत

रूप जानकर

चंदा हुआ उजागर।


●शुभमस्तु !


24.08.2023◆3.45आरोहणम मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 13 जुलाई 2023

दिया ● [ गीत ]

 303/2023

             

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● ©शब्दकार 

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सीखा है बस

देना जग को

कहता जगत दिया।


कैसा होता

रंग तमस का

क्षणिक  नहीं  जाना।

खोजा दिन भर

रवि ने तम को

झूठ   कथन   माना।।


आहट पाकर

भाग गया तम

मुड़कर रुख न किया।


गुरु दिखलाते

दीप शिष्य को

तम   को   दूर   हटा।

हुआ उजाला

उर-भ्रम नासा

कुहरा -  धूम   फटा।।


अंतर में बहु

किरणें फैलीं

अमृत  ज्ञान  पिया।


मात -पिता हैं

सम्मुख अपने

दिया   उन्हें    माने।

मिलती उसको

सकल संपदा

लगे  न    इठलाने।।


'शुभम्'  सफल हो

जीवन सुत का

ईश्वर  मान  जिया।।


●शुभमस्तु !


13.07.2023◆8.30 आ०मा०

बुधवार, 17 मई 2023

माँ तो माँ है! ● [ गीत ]

 211/2023


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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पहले ढोया उदर- कोख में,

काँधे पर वह अब ढोती है,

माँ की ममता।


उपालंभ  देती  न किसी को,

स्वयं कष्ट वह  तन पर झेले।

अला-बला   को  दूर  हटाए, 

सिर पर सब अपने माँ ले ले।।

पीड़ा नहीं  व्यक्त  करती माँ,

किसकी समता!


झोली  में   नवजात  लिटाए,

जाती   है   निर्द्वन्द्व   अकेली।

खाली हाथ शाटिका तन पर,

नारी  माँ   कैसी   अलबेली!!

पहुँची में   कंगन  कुछ चूड़ा,

अद्भुत फबता।


काँधे  पर   लाठी   रख  मोटी, 

रज्जु ग्रथित है  लंबी   झोली।

चमकें   दाँत   श्वेत  मोती - से,

लौंग नाक  में  पहने  भोली।।

कानों में   दो   कुंडल  उसके,

दृग में नमता।


माला   गले   अँगूठी   अँगुली,

अरुण वर्ण की   माथे   बिंदी।

मंगलसूत्र    सुशोभित   ग्रीवा,

बोले   गिटपिट   टूटी  हिंदी।।

माँ तो  माँ है    क्या जतलाएँ,

उर की शुभता!


●शुभमस्तु !


16.05.2023◆11.30आ०मा०

सोमवार, 17 अप्रैल 2023

संवेद्य संतति और जननी 🤱🏻 [ गीत ]

 168/2023


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✍️शब्दकार ©

🤱🏻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पोंछ रहा

जननी के

आँसू बेटा भोला।

उठता उर

तपता - सा

भारी -भारी  गोला।।


क्या दुख है

मेरी माँ 

तुझको  कौन  सताए।

तेरा सुत

उरज-अंश

सह क्या तृण भर पाए??


देख -देख 

ये कपोल

उर मेरे विष घोला।


कारण मैं 

तो नहीं न

बता दे मात मेरी।

तन -मन की

वह पीड़ा

भर रही अँधेरी।।


छोटा हूँ

तो क्या है

दहकता हृदय- शोला।


मेरा तन

ही नंगा

विवसन मैं यहाँ खड़ा।

कत पोंछू

 मैं तव अश्रु

हाए ! मैं अवश बड़ा।।


तेरा ही

आँचल है

मेरे हित अनमोला।


घुटनों पर

लगा टेक

बैठी दुःखी जननी।

पिता नहीं

संभवत:

घर पर कोई सजनी।।


यहाँ - वहाँ

यों कोई

क्यों माँ से कटु बोला।


रग - रग में

बहता जो

रक्त जननि का मुझमें।

और कहाँ

उफनेगा

पीड़ा , माँ के दुख में!!


समझ नहीं

भीतर उर

सुत का कब है पोला?


धन्य हृदय

जो धड़के

माँ को  दुख  में  तारे।

अला - बला

हर ले सब

'शुभम्' अपनपा हारे??


आवंटित

जननि -कुक्षि

पीड़ाहर शुचि चोला।


🪴 शुभमस्तु !


17.04.2023◆12.45प०मा०

रविवार, 1 जनवरी 2023

माता सरस्वती शुभकारी 🪷 [ स्तुति -गीत ]

 001/2023

  

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

              [ स्तुति - गीत]

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माता  सरस्वती   शुभकारी।

'शुभम्' वंदना करे  तुम्हारी।।


अक्षर -ज्ञान हमें सिखलाया।

शब्दों में   नवजीवन  आया।।

फूली काव्य-सुमन फुलवारी।

माता   सरस्वती   शुभकारी।।


रसना में भरतीं   रस- वाणी।

वीणावादिनि जग-कल्याणी।

जगती के प्रसन्न  नर  - नारी।

माता   सरस्वती   शुभकारी।।


हंसवाहिनी    हे   वरदायिनि।

रमा, परा,विमला, दुखनाशिनि।।

विश्वा,  वसुधा,हे   हितधारी।

माता   सरस्वती   शुभकारी।।


इला,    ईश्वरी,  कलाधारिणी।

विदुषी, विद्या,  वीणापाणी।।

माही,   मेधा,  श्रीपद , वारी।

माता   सरस्वती  शुभकारी।।


'शुभम्'साधना माँ की करता।

उर में ध्यान सदा ही धरता।।

प्रज्ञा,  पुष्टि,   अक्षरा  न्यारी।

माता  सरस्वती   शुभकारी।।


🪴शुभमस्तु !


01.01.2023◆5.30 

पतनम मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

बँगले ऊँघ रहे हैं! 🏘️ [ गीत ]

 463/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🏘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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झोपड़ियों  में  आग  लगी  है,

बँगले ऊँघ रहे हैं!


तन ढँकने  को  वसन  नहीं है,

 नहीं  उदर  में  रोटी।

धूप   झाँकती   झोपड़ियों  में,

खेल रही  नौ गोटी।।

भीतर  सुलगे   ज्वाला।

जुबाँ - जुबाँ पर भाला।।

करनी   नहीं    देखते  अपनी,

 बीड़ी धूंक  रहे हैं।


हाथी   जाते     अपनी   राहें,

पीछे  कूकर  भूँकें।

अवसर  मिलते   ही टाँगों में,

क्योंकर वे सब चूकें।।

उर  में   समता   चाहें।

उठा  - उठा कर  बाँहें।।

गज - शुंडी  में  घुसने के हित,

चींटे  सूँघ  रहे  हैं।


कारण  बिना   बैर  बँगले  से,

फूस न देखा अपना।

इतराती    झोंपड़ - पट्टी   ये,

महलों का है सपना।।

मनहूसी मुख छाई।

टूटे लोग - लुगाई।।

अंबर   से  हो  धन  की वर्षा,

सरपट घूम रहे हैं।


ककड़ी  का रसाल हो जाना,

सदा असम्भव भारी।

मासी   तो   मासी   ही  होगी,

नहीं जननि महतारी।।

विधि-विधान स्वीकारें।

अपने को  क्यों  मारें!!

कर्मलेख  मिटता  न  मिटाए,

पत्रा बूझ रहे हैं।


🪴शुभमस्तु !


03.11.2022◆1.45

 पतनम मार्तण्डस्य।


बुधवार, 26 अक्टूबर 2022

क्या बतलाएँ ! ☘️ [ गीत ]

 445/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🍃 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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धन, धनिकों की चकाचौंध में,

दीवाली  का  दीप   खो  गया,

क्या बतलाएँ!


फुटपाथों   के   सुस्त   चेहरे

लटके,   दीये   धरे   माटी के,

ठेलों  पर   विदेश   से  आए,

इतराते   नव    परिपाटी   के,

उतर कार  से नीचे,

खोले  चार  दरीचे,

सँग में पत्नी  जैसी  लगती ,

वे   बतियाएँ!


उपहारों   में   काजू  पिस्ते,

भाते खाते  हैं  मदमाते,

मधुमेही  चीनी  क्यों  खाएँ,

मोदक पेड़ा नहीं सुहाते,

चकाचौंध की बत्ती,

तोला   माशा   रत्ती,

अपने हाथ खिलाते उनको,

कटि मटकाएँ !


आम   आदमी  से जुड़ने में,

'लेबल' गिरता  भारी उनका,

मर्सिडीज  पर  जब  होते हैं,

दिखता है पैदल जन तिनका,

चढ़ -बढ़  गई खुमारी,

उतरे    नहीं    उतारी,

आँखें आप  मुँदी जाती हैं,

लख उबकाएँ!


अति आधुनिका वही आज की,

अंग दिखाए तन के गोरे,

फ़टी जींस टी शर्ट धार तन,

जैसे  बने  जूट  के बोरे,

यही धनिकता छाई,

हवा चली पछुआई,

वे क्यों  डूब  मरें  दरिया में,

हया बुताएँ!


🪴 शुभमस्तु !


26.10.2022◆7.45पतनम मार्तण्डस्य।

बुधवार, 12 अक्टूबर 2022

तू भी मूर्ति - पुजारी🛕 [ गीत ]

 409/2022

  

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✍️ शब्दकार ©

🛕 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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तेरी  मूर्ति  गढ़ी  ईश्वर  ने,

तू भी मूर्ति- पुजारी।


तू माटी  का  लौंदा  अनगढ़,

तुझको बना सजाया।

जीवन फूँक  दिया  माटी में,

अनहद नाद बजाया।।

धीरे  -  धीरे   मूर्ति   तुम्हारी,

हुई  मनों  में  भारी।


की कुम्हार  ने  प्रतिमा - पूजा,

तू  भी  वैसा  करता।

आस्था  और  बिना श्रद्धा  ही,

दम सेवक का भरता!!

ऐसी  पूजा    वृथा   मूढ़   नर,

भारत  माँ  की  नारी।


श्रद्धा  से  ही फल  मिलता है,

रामकृष्ण को  देखा!

शिष्य विवेकानंद   लिख  रहे,

अपने  गुरु का लेखा।।

'शुभम्' भक्ति वैसी तू कर ले,

हरें विपद प्रभु सारी।


🪴शुभमस्तु !


12.10.2022◆3.15 प.मा.

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

इठलाती बलखाती सरिता 🌊 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

⛵ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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इठलाती   बलखाती   सरिता,

जाती   है     नित    मदमाती।

हिमगिरि के घर से निकली है,

सिंधु -  सेज   पर रम जाती।।


अनथक चली जा रही अविरत

आती    हैं    नित     बाधाएँ।

अपगा  होकर  चली जा रही,

कितने   भी   संकट   आएँ।।

लक्ष्य एक ही पिया मिलन है,

सबकी  क्षुधा   बुझा   पाती।।

इठलाती   बलखाती  सरिता,

जाती   है    नित   मदमाती।।


पशु, पक्षी, मानव या फसलें,

अभिसिंचन      से      हर्षाते।

साधु, संत, जन को नहलाती,

तटिनी -  खेल   हमें   भाते।।

हरियाली   फैली   खेतों   में,

कांति अधर   में  भर  लाती।

इठलाती  बलखाती   सरिता,

जाती   है   नित    मदमाती।।


गंगा , यमुना ,सरयू   कितनी,

पावन   जल   की   सरिताएँ। 

भारत की जीवन  -   रेखा हैं,

जीव,  जंतु, नर   की   माएँ।।

मीन  करे   क्रीड़ाएँ   सरि में,

आँचल   में    ले    मुस्काती।

इठलाती  बलखाती   सरिता,

जाती   है   नित    मदमाती।।


करे प्रतीक्षा  खोल   हृदय को,

सागर,     आएँ       सरिताएँ।

स्वागत   करने   को आतुर है,

बाँहों     में    भर   अपनाएँ।।

लहरों के   मिस  बुला रहा है,

लगतीं   रवि -  किरणें  ताती।

इठलाती   बलखाती   सरिता,

जाती   है    नित   मदमाती।।


लगता  सागर कभी  क्रोध  में,

तट से   विचि    टकराती   है।

घोंघे , सीप   पटकती   बाहर,

लौटें      शांत   रिझाती    है।।

'शुभम्' सभी  का मान बढ़ाता, 

सरिता   अंग    समा    जाती।

इठलाती   बलखाती   सरिता,

जाती   है   नित    मदमाती।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०७.२०२२◆११.००

आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 14 जुलाई 2022

बाँसुरी की फूँक भर 🪷 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🎸 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बाँसुरी  की फूँक भर,

कविता कहानी,

नाद वीणावादिनी का।


कर रहा हूँ पृष्ठ काले,

बस अकिंचन मैं,

भावना की तुष्टि करने

नीर - सिंचन में,

मैं नहीं सर्जक

 किसी भी शब्द-रचना का,

उजाला चाँदनी का।


समझते हैं मीत मुझको,

काव्य - रचनाकार  हूँ,

मैं स्वयं ही एक लौंदा

मृत्तिका -  अवतार हूँ,

खींचता हूँ कुछ लकीरें

तुष्टि हित अपनी,

पात्र मैं वरदायिनी का।


जब नहीं माँ चाहतीं

कुछ कह नहीं पाता,

स्वप्न में मुझको जगाती

चुपना   नहीं  आता,

जो मिले निर्देश

मेरी लेखनी कहती,

दास विद्यादायिनी का।


साधना कह लें भले

आराधना   मेरी,

लोकहित की साधिनी हो

अभ्यर्थना   तेरी,

आजन्म तेरी वर कृपा का

हाथ हो सिर पर,

सुमधुर भाषिणी का।


🪴शुभमस्तु !


१३.०७.२०२२◆५.३० पत्नम मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 8 जुलाई 2022

सब अपनी -अपनी ही कहते 🚦 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सब अपनी -अपनी ही कहते।

अपनी   ही   लहरों में बहते।।


नहीं   चाहता   सुनना   कोई।

सबने  अपनी  सरसों  बोई।।

सुर  तालों  में  अपनी  बहते।

सबअपनी-अपनी ही कहते।।


चाल सभी की  बदल रही है।

जो कह दें बस वही सही है।।

मनमानी कर मंजिल  लहते।

सब अपनी-अपनी ही कहते।


जितना स्वार्थ वहीं तकअपना

अपने सुख का देखें सपना।।

कष्ट नहीं  अपने  तन   सहते।

सब अपनी-अपनी ही कहते।


धर्म  पुण्य  के  खेल  निराले।

राजनीति  से   खुलते  ताले।।

तरह तरह के   फूल  महकते।

सब अपनी -अपनी ही कहते।


समता देख नहीं नर  सकता।

छोट-बड़प्पन उसको फबता।

रोते   निर्धन   धनी   चहकते।

सब अपनी -अपनी ही कहते।


🪴शुभमस्तु !


०८.०७.२०२२◆११.४५

आरोहणम् मार्तण्डस्य।


रविवार, 3 जुलाई 2022

रसना - उवाच 🚨 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🚨 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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एक   नहीं    अड़तीस    साथ  हैं,

रक्षक        सदा      सबल    मेरे।

कहते   हैं   सब       कोमल रसना,

दसों    दिशाओं         से      घेरे।।


हर  रस   को   चखती  रस लेती,

नहीं   किसी     से     मैं   डरती।

रुचिकर लगता  यदि  कलियों को,

अपनी     तृप्ति     पूर्ण    करती।।

सीमित   स्वाद   यहीं   तक सारा,

नहीं      उदर      में    है      तेरे।

एक   नहीं   अड़तीस    साथ  हैं,

रक्षक       सदा         सबल   मेरे।।


दो   कपोल       दो    जबड़े  देखो, 

दो        दीवारें         रद     बत्तीस।

बाहर      दो -  दो   अधर  रसीले,

गिनती      है        पूरी    अड़तीस।।

मुख  मंडल    के   बीच   छिपी   हूँ,

उदर     -       अंग      मेरे     चेरे।

एक      नहीं   अड़तीस    साथ   हैं,

रक्षक      सदा        सबल   मेरे।।


होती    हूँ     वाचाल    कभी   तो,

कुछ    भी    मैं     कह   जाती  हूँ।

लगे    किसी   को  बुरा - भला  तो,

सहन    नहीं       कर      पाती    हूँ।

कैकेयी    या   द्रुपद   -   सुता   हो,

सबने         उलट          दिए    भेरे।

एक    नहीं    अड़तीस    साथ   हैं,

रक्षक         सदा         सबल   मेरे।।


मैं      ही      गाती       गीत    रसीले,

मैं     कलहा     बन     कर    आती।

महाभारतों              की     रणचंडी,

रक्त        चाटने            छा   जाती।।

मुझसे     ही    शुचि   सुमन बरसते,

सुनते         कान        बिना     हेरे।

एक     नहीं     अड़तीस    साथ   हैं,

रक्षक        सदा         सबल    मेरे।।


मैं       वाणी      मैं     रसा,  रसज्ञा,

मैं    ही       रसिका ,    वाचा   हूँ।

जिह्वा ,  गिरा      कहो     या रसना,

करती    तिया       न     पाँचा  हूँ।।

'शुभम्'      रंग  -  रस     देती इतने,

इक्षु   - दंड       के       बिन    पेरे।

एक      नहीं       अड़तीस   साथ हैं,

रक्षक         सदा         सबल   मेरे।।


🪴शुभमस्तु !


०३.०७.२०२२◆३.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 23 जून 2022

तड़पे एक बीजुरी नभ में ⚡ [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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तड़पे   एक   बीजुरी  नभ  में,

सौ -  सौ   बीच     हिए   मेरे।

सावन  भादों  के  घन   उमड़े,

बीती    अवधि  न   पी   हेरे।।


मन  की  बातें   मन   में   मेरे,

किससे  कहूँ    कहाँ    जाऊँ।

अंतरंग   है     कौन    सहेली,

जिससे  मन की  कह  पाऊँ।।

करती हैं  परिहास  पड़ोसिन,

रहतीं    सुबह  - शाम    घेरे।

तड़पे  एक   बीजुरी   नभ  में,

सौ  -  सौ   बीच   हिए   मेरे।।


गरजें   जब  बादल  अंबर  में,

थर - थर  काँपे  हिया  सजन।

सौतन   कौन   बनी   है  मेरी,

मैं  बैठी  क्या   करूँ भजन??

सात  वचन  देकर   हे प्रीतम,

सात     लिए     तुमने    फेरे।

तड़पे   एक  बीजुरी  नभ  में,

सौ -  सौ   बीच    हिए   मेरे।।


'उर  में  सजा  रखूँगा सजनी,'

वादे     किए    हजारों    तुम।

मैंने  क्या   अपराध   किए  हैं,

जिसकी सजा मिली हरदम।।

एकाकी  दिन -  रात  काटती,

धर्म -  संकटों        के     घेरे।

तड़पे   एक   बीजुरी  नभ  में,

सौ - सौ   बीच     हिए   मेरे।।


प्यासी  धरती   तृप्त   हो गई,

हरे  - हरे     अँखुए      आए।

पावस   के   घन बरस रहे हैं,

प्यास  न  सजन बुझा  पाए।।

अमराई    में   झूलें   सखियाँ,

कहतीं     कहाँ    पिया   तेरे।

तड़पे  एक   बीजुरी   नभ में,

सौ -   सौ   बीच  हिए   मेरे।।


भीगी चुनरी- चोली सखि की,

देख    हिए   में   आग    लगे।

बड़भागिनि वे पिय की प्यारी,

सबके   ही   शुभ भाग जगे।।

'शुभम्'अभगिनि  हूँ  मैं कैसी,

कोल्हू     बिना    गए     पेरे।

तड़पे  एक बीजुरी    नभ  में,

सौ -  सौ   बीच   हिए    मेरे।।


🪴 शुभमस्तु !


२३ जून २०२२◆१०.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 17 जून 2022

घास में कीड़े 🌿 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हरी  घास    में   कीड़े   पनपे,

हर   पल्लव    छलनी   होता।

सुमन  खिलें  शाखा पर कैसे,

सूखा  है     सुगंध   -  सोता।।


पादप  की सूखी  शाखा  पर,

सुमन नहीं, फल  क्यों  आएँ?

जैसे  बोए    बीज    बाग   में,

वे   बबूल   बस   चुभ  पाएँ।।

घुड़शाला   में   गधे   पले   हैं,

खड़ा  - खड़ा    हाथी  रोता।।

हरी   घास   में   कीड़े   पनपे,

हर   पल्लव   छलनी  होता।।


घुट्टी  में घिस  जहर  पिलाया,

जहर      सपोले       उगलेंगे।

आस्तीन    के  साँप     दोमुँहे,

आजीवन    क्या    सुधरेंगे??

वही  काटता  फसल आदमी,

जो   अतीत   में   वह   बोता।

हरी    घास  में   कीड़े   पनपे,

हर  पल्लव    छलनी  होता।।


दूध    पिला कर  पाल रहे हो,

दोष  किसे   अब    देते   हो?

मिल  जाए   ऊँचा   सत्तासन,

मत   भी   तो   तुम  लेते हो!!

खंड -  खंड   हो  जाए भारत,

भावी   भले      रहे       रोता।

हरी   घास   में   कीड़े   पनपे,

हर  पल्लव   छलनी   होता।।


श्रम के बिना पेट जब भरता,

कौन  काम    करने    जाए?

पैरों   की     जूती   पैरों    से,

निकल  शीश  पर  जा धाए!!

अपनी  करनी का फल देखो,

हाथों   से     उड़ता    तोता।।

हरी  घास    में   कीड़े  पनपे,

हर  पल्लव   छलनी   होता।।


डेंगू  , मसक    चूसते   लोहू,

नाली   में   है   घर  जिनका।

मेवा   मिसरी    चाभ   रहे हैं,

आश्रय थल जिनका तिनका।

'शुभम्' योजना बदलें अपनी,

लगा     रही    जनता   गोता।

हरी   घास  में   कीड़े   पनपे,

हर  पल्लव   छलनी   होता।।


🪴 शुभमस्तु !


१७ जून २०२२◆१०.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सोमवार, 30 मई 2022

लड़ाई 🏌🏽‍♀️ [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बुरी    बताते    सभी   लड़ाई।

लड़ते  फिर भी बहना -भाई।।


नेता  क्यों आपस  में  भिड़ते।

साँड़ समान सड़क पर अड़ते

शांति रास उनको कब आई?

बुरी    बताते    सभी लड़ाई।।


आपस  में   लड़वाते  जनता।

एक  -  एक  दूजे पर तनता।।

भाती   उनको   खूब  पिटाई।

 बुरी  बताते   सभी   लड़ाई।।


होती   जंग    प्रचंड   चुनावी।

आपस   में होते   वे    हावी।।

खून- खराबा   रंजिश   छाई।

बुरी  बताते    सभी   लड़ाई।।


लड़वाने का अलग  मजा  है।

ऊँची अपनी सदा  ध्वजा है।।

दावत भी मिलती  मनभाई।

बुरी  बताते    सभी  लड़ाई।।


हमला  देश  देश  पर  करता।

नहीं ईश   पापों   से   डरता।।

निर्ममता     छाई      निठुराई।

बुरी   बताते   सभी   लड़ाई।।


🪴 शुभमस्तु !


२९ मई २०२२ ◆२.००पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 24 मई 2022

माँ की छाया 🏔️ [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏔️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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संतति के हित  माँ की छाया।

किसे न माँ का नेह लुभाया!!


माता  है जग   की  कल्याणी।

सीता, रमा,शक्ति ,माँ वाणी।।

सकल सृष्टि पर उनका साया।

संतति के हित माँ की छाया।।


देती जन्म  जननि  कहलाती।

पिला दूध  पोषण  करवाती।।

थपकी  देकर   पूत   सुलाया।

संतति के हित माँ की छाया।।


संतति   की    रक्षा   में  सूखे।

खा लेती भोजन   माँ  रूखे।।

गीले बिस्तर   सो सुख पाया।

संतति के हित माँ की छाया।।


आजीवन हित-चिंतन करती।

संतति के सुख जीती-मरती।।

समता  में  है   कौन  समाया!

संतति के हित माँ की छाया।।


शक्ति  - स्वरूपा  माता होती।

देती है  संतति  हित   मोती।।

निशि दिन कष्ट उठाती काया।

संतति के हित माँ की छाया।।


माता का   उपकार   न  माने।

लगते   रौरव  - ताप  सताने।।

क्यों नर- जन्म जीव ने पाया?

संतति के हित माँ की छाया।।


मानव  -  तन है भाग्य हमारा।

आजीवन है जननि -सहारा।।

'शुभम्' मात ने सुत अपनाया।

संतति के हित माँ की छाया।।


🪴 शुभमस्तु !


२४ मई २०२२◆ ११.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 19 मई 2022

गोबर पर नवनीत 🎏 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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गोबर   पर  नवनीत  सजाना,

मुझे     नहीं      भाता       है।

घड़ियाली    आँसू    से  रोना,

तनिक     नहीं   आता     है।।


नेता  ने   अभिनेता   बनकर,

बदल    लिया  निज    बाना।

लुभा शहद -सी  मधु बातों में,

सीखा        मूर्ख     बनाना।।

बिना   बादलों   के  अंबर से,

नित    वर्षा    करवाता    है।

गोबर  पर   नवनीत  सजाना,

मुझे      नहीं      भाता     है।।


देश - देश   चिल्लाने   भर से,

देश    नहीं     ये      बदलेगा।

शौक  चूसने  का 'आमों'  को,

तहस - नहस  सब कर देगा।।

चरित  नापने    का    पैमाना,

क्यों  न  बनाया   जाता   है।

गोबर  पर  नवनीत   सजाना,

मुझे    नहीं       भाता      है।।


काला  अक्षर    भैंस   बराबर,

बन    मंत्री    करता   शासन।

पढ़ा -  लिखा  डिग्री धारी नर,

चालक   बन   ढोता  राशन।।

एक  प्रशासक   भारत   सेवी,

पीछे -  पीछे       आता     है।

गोबर  पर   नवनीत  सजाना,

मुझे     नहीं      भाता      है।।


अंधे   बाँट      रहे    रेवड़ियाँ,

ढूँढ़  - ढूँढ़      घर   वालों   में।

कलई   भले   धुले  गालों की,

बचते  लगा  सु -  ढालों   में।।

पड़ी  हथकड़ी  जब हाथों में,

कैसा   वह     मुस्काता     है!

गोबर  पर  नवनीत   सजाना,

मुझे      नहीं     भाता      है।।


धरती   जब   रोती है  प्यासी,

पौधारोपण        होता      है।

एक   बार   जो   गर्त   खुदे हैं,

बार -  बार  तरु    बोता   है।।

एक   पेड़   को  रख गड्ढे  में,

नेता    घर    भग   जाता   है।

गोबर पर   नवनीत   सजाना,

मुझे       नहीं    भाता      है।।


बिना   गाय   के दूध   हजारों,

टन मन   घृत  - भंडार    भरे।

मधुमक्क्खी के बिना शहद के

पीपे      देखें    खड़े    खरे।।

नकली औषधियाँ खा-खाकर,

रोगी   मर - खप   जाता    है।

गोबर पर   नवनीत   सजाना,

मुझे    नहीं      भाता      है।।


पैसा  ही   आदर्श   यहाँ   पर,

नैतिक   मूल्य   नहीं     चाहें।

मनुज कामिनी  का   सत्संगी,

फैला   खड़ा    सबल   बाँहें।।

'शुभम्' सत्य पथ पर चलने में

मानव  - उर     घबराता    है।

गोबर  पर  नवनीत   सजाना,

मुझे    नहीं       भाता     है।।


🪴 शुभमस्तु !


१९ मई २०२२◆ २.००पतनम मार्तण्डस्य।

आँगन -आँगन में दीवारें 🏕️ [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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आँगन -  आँगन  में     दीवारें,

सड़कों पर     जन- रेला    है।

ठोड़ी  पर टिक  रही   हथेली,

मानव    यहाँ   अकेला    है।।


कहते  थे  कुटुंब   वसुधा  को,

सभी    किताबी    बातें     हैं।

सोदर  बना   शत्रु  सोदर का ,

प्राणघात     की    घातें    हैं।।

नभ   में  घूम   रहे  ज्यों  तारे,

बना     मृत्तिका      ढेला   है।

आँगन   -   आँगन  में  दीवारें,

सड़कों   पर  जन -  रेला है।।


कोरे     आदर्शों    की    बातें,

भाषण   सब    बकवासी  हैं।

नेता  चूस    रहे   जनता  को,

सुघर     लक्ष्मी   दासी    हैं।।

बाँटा    अन्न   बिना   पैसे  के,

डाला     नाक    नकेला    है।

आँगन -   आँगन   में   दीवारें,

सड़कों  पर   जन -  रेला है।।


देशभक्त   का   ढोंग  बनाया ,

रँगे    हुए      कपड़े      पहने।

कनक- कामिनी से चुँधिआए,

भरे      कोठरी     में    गहने।।

लच्छेदार      जलेबी     जैसी,

मधु    बातों   का    भेला   है।

आँगन -  आँगन    में   दीवारें,

सड़कों  पर    जन - रेला है।।


छाया    वाले   पेड़    नहीं  हैं,

सड़कें     सूनी   -   खूनी   हैं।

मानसून     आए    भी   कैसे,

जलीं सड़क   पर   धूनी   हैं।।

नहीं  पथिक को छाया  पानी,

नर  पश्चिम    का    चेला   है।

आँगन -   आँगन   में   दीवारें,

सड़कों  पर   जन - रेला  है।।


दौड़  लगाते   गाँव   शहर की,

शहर    उन्हें    लतियाते    हैं।

दर  -  दर   दूध  बेचते जाकर,

क्रय   सब्जी   कर  लाते  हैं।।

कौड़ी  का  भी मोल   नहीं है,

गूँगों    का    जग    मेला   है।

आँगन -   आँगन   में   दीवारें,

सड़कों  पर   जन -  रेला है।।


🪴 शुभमस्तु !


१८ मई २०२२◆ ७.३० पतनम मार्तण्डस्य।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...