बुधवार, 12 जून 2024

घुमक्कड़ विचार! [ व्यंग्य ]

 267/2024 



 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 जब भी मैंने उसे देखा चलते -फिरते, घूमते-भ्रमते,इधर से उधर और उधर से कहीं और जिधर चल पड़े उस डगर ;पर ही देखा। वह कभी भी शांत और संतोष पूर्वक नहीं बैठा।जैसे विश्राम तो वह जानता ही नहीं।कितना भी सहलाओ ,वह मानता ही नहीं।बस चलना और चलना और चलते ही रहना। लगता है 'चरैवेति चरैवेति' का मंत्र इसी के लिए बना है। वह कितना घुमक्कड़ है, बतलाना कठिन है। विराम तो जैसे जानता ही नहीं। 

 यह मेरा, आपका, सबका विचार है।हर समय यात्रा करने को लाचार है। इसको रोक पाने का भी नहीं कोई उपचार है।प्रतिक्षण अहर्निश इसका संचार है। जागरण, स्वप्न और सुसुप्ति में भी वह नहीं निर्विचार है। कभी अकेला ही चल पड़ता है।बड़ी - बड़ी ऊंचाइयों की सैर करता है।मानसून के बादलों जैसा उमड़ता है,घुमड़ता है।कभी इधर तो कभी उधर को मुड़ता है। यह विचार ही है ,जो सदैव चढ़ता बढ़ता है।

 कभी - कभी यह अपना जोड़ा भी बना लेता है।अकेले न चलकर बेड़ा सजा लेता है।आपस में बहुत से विचार घुल - मिल जाते हैं।कभी झूमते हैं तो कभी मंजिल को पाते हैं।कैसे कहूं कि विचार बेचारा है।विचार के चलने से ही तो आदमी को मिलता किनारा है।यह आदमी भी विचारों की गंगा-धारा है।विचार अपनी सुदीर्घ यात्रा में न थका है ,न हारा है।ये विचार भी मेरे मन में बड़ा प्यारा है।

 यह भी कम अद्भुत नहीं कि यह विचार ही है ,जो उसे अन्य दोपायों या चौपायों से विलग करता है।वही उसका विकासक है, इसी के पतन से आदमी मरता है।चौपायों के पास खाने और विसर्जन के अतिरिक्त कोई विचार ही नहीं है।इसीलिए मनुष्य सर्वश्रेष्ठ दोपाया है,यह बात सत्य ही कही है।यह अलग बात है कि इस दोपाये मनुष्य के भी कुछ अपवाद हैं। जो देह से तो मानव हैं,किंतु विचार की दृष्टि से पशु निर्विवाद हैं। क्योंकि उनका काम भी केवल आहार और विसर्जन है। विचार का तो उसके लिए पूर्णतः त्यजन है, वर्जन है।

 यह विचार ही है, जो मनुष्य की कोटि का निर्धारक है।विचार ऊँचा भी होता है और नीचा भी।छोटा भी होता है और बड़ा भी।ओछा भी होता है,महान भी। बढ़ाता या घटाता है संबंधित की शान भी। बन जाता है ,मानव का विचार महान भी।यह विचार ही है जो काट लेता है अच्छे अच्छों के कान भी।विचार ही जीवन है, विचार ही उसकी मान त्राण भी। 

 विचार की यह यात्रा यों ही निरर्थक नहीं है।मानव की बुद्धिशीलता का मानक यही है।मानव मानव की श्रेणी का यह विभेदक है।विचार के वितान का जन - जन बंधक है।विचार से ही कवि कवि है, वैज्ञानिक वैज्ञानिक।विचार से ही नेता नेता है, डाकू डाकू। विचार ही सुमन है, विचार ही है चाकू।चलेगा नहीं तो मार्ग में बढ़ेगा कैसे! बढ़ेगा नहीं तो शिखर पर चढ़ेगा कैसे! यह तय है कि कोई विचार बेचारा नहीं है।जो भी यह सुनिश्चित करता है,पात्रातानुसार वह उसके लिए सही है।इतना अवश्य है कि हम अपने विचारों को परिमार्जित करते रहें।विचार की संजीवनी से जीते रहें,आगे बढ़ते रहें। 

 शुभमस्तु !

 12.06.2024●10.30आ०मा०

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समय सबल संबल सदा [दोहा]

 266/2024

       

[सिकंदर,मतलबी,किल्लत,सद्ग्रंथ,राजनीति]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

       

                 सब में एक


समय  सिकंदर  से  सभी,सधते हैं  शुभ साज।

समय सबल  संबल सदा,बिना किसी आवाज।।

हाड़ - माँस    का    आदमी, भरता कोरा  दंभ।

समय सिकन्दर ही सदा,है सशक्त शुभ खम्भ।।


परहित   तो   आता  नहीं,यहाँ मतलबी लोग।

छपते   हैं  अखबार   में, जनसेवी का      रोग।।

हाँडी   मतलब   की  सदा, चढ़े एक ही   बार।

बढ़े  मतलबी  लोग   ही,मतलब का संसार।।


जिल्लत की किल्लत बड़ी,इल्लत बड़ी असाध्य।

मिन्नत में  पटु  लोग  जो, कुछ  भी नहीं अबाध्य।।

अच्छे  - अच्छे    लोग   भी, हो  जाते      बेहोश।

किल्लत   आती  भाग्य में, जिल्लत  का आगोश।।


अनुभव के सद्ग्रंथ  को,   पढ़ना देकर   ध्यान।

कदम - कदम  पर  हैं खड़े,दुश्मन खोले म्यान।।

सीख  अगर   शुभ  चाहिए, जीवन है  सद्ग्रंथ।

लीक   नहीं  सीधी  कभी, चलना है जिस  पंथ।।


राजनीति   में  मित्र का,करना मत   विश्वास।

उचित  यही  जा  खेत  में, चर लेना तुम  घास।।

राजनीति से  प्यार  है, फिर  भी घृणा  अपार।

घुसना   ही  सब  चाहते, बना उसे सब   यार।।


                    एक में सब

राजनीति  किल्लत  बड़ी,नहीं एक सद्ग्रंथ।

सभी सिकंदर मतलबी,खोज रहे शुभ पंथ।।


शुभमस्तु!


12.06.2024●3.15आ०मा०

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हालातों से लड़ना है [ गीत ]

 265/2024

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जीवन इतना

सरल नहीं है

हालातों से लड़ना है।


कदम-कदम पर

जटिल समस्या

स्वयं जिसे सुलझाना है।

रखे हाथ पर

हाथ न बैठें

अश्रु नहीं  बरसाना  है।।


तरसें एक 

बूँद पानी को

भूतल में सिर गड़ना है।


अपने ही पैरों

पर चलकर 

मंजिल  अपनी  पाते हैं।

करते काम

नहीं तन- मन से

मनुज वही पछताते हैं।।


लक्ष्य प्राप्ति के

लिए सदा ही

हर जन-जन को अड़ना है।


नहीं कामचोरी 

से चलता 

काम किसी का जगती में।

चींटी भी

निज श्रम से पाती

भोजन  अपना  धरती  में।।


शव बहते

 प्रवाह में सारे

जिनको जल में सड़ना है।


शुभमस्तु !


11.06.2024●8.15आरोहणं मार्तण्डस्य।

नीचे बिछा दो बोरियाँ [गीतिका ]

 264/2024

          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नीचे    बिछा    दो    बोरियाँ,

माँ     गा   रही   है   लोरियाँ।


तप    पालना   संतति     महा,

सब    जानती    हैं     गोरियाँ।


संतान    का    दायित्व     है,

बोले   न   दारुण    बोलियाँ।


संतान   के   हित   ही   जिएँ,

करतीं    न   जननी   चोरियाँ।


खाली   न   होतीं   एक  पल,

जननी-जनक  की  झोलियाँ।


अनुकरण   से    ही   सीखतीं,

माँ     की      लड़ैती   पुत्रियाँ।


आओ  'शुभम्' नर   हम    बनें,

संतान     की   शुचि  ओलियाँ।


शुभमस्तु !


10.06.2024● 4.15आ० मा०

माँ गा रही है लोरियाँ [सजल]

 263/2024

  

सामांत     : इयाँ

पदांत      :अपदांत

मात्राभार  : 14.

मात्रा पतन : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नीचे    बिछा    दो    बोरियाँ।

माँ     गा   रही   है   लोरियाँ।।


तप    पालना   संतति   महा ।

सब    जानती    हैं   गोरियाँ।।


संतान    का    दायित्व     है।

बोले   न   दारुण    बोलियाँ।।


संतान   के   हित   ही   जिएँ।

करतीं    न   जननी   चोरियाँ।।


खाली   न   होतीं   एक  पल।

जननी-जनक  की  झोलियाँ।।


अनुकरण   से    ही   सीखतीं।

माँ     की      लड़ैती   पुत्रियाँ।।


आओ  'शुभम्' नर   हम    बनें।

संतान     की   शुचि  ओलियाँ।।


शुभमस्तु !


10.06.2024● 4.15आ० मा०

                    ●●●

जनता [कुंडलिया ]

 262/2024

                      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

कहते  जनता को सभी,यहाँ जनार्दन  ईश।

जनादेश   देती   वही, कहलाती जगदीश।।

कहलाती   जगदीश,  दृष्टियाँ उसकी पैनी ।

नेता  सब  उन्नीस, छाँटती छन- छन छैनी।।

'शुभम्' न समझें मेष,बंद कर दृग जो  रहते।

बदलें   जितने  वेष, इसे हम जनता कहते।।


                         -2-

मतमंगे  बन  माँगते,  जनता   से   वे वोट।

झुका शीश वे  चाहते,  देना  ही  बस चोट।।

देना  ही  बस  चोट,   सदा  झूठे आश्वासन।

भरे बहुत से खोट,दिखाते जन को ठनगन।।

'शुभम्' निकलता काम, नहाएँ हर- हर गंगे।

लक्ष्य   कमाना   दाम,सभी का जो मतमंगे।।


                         -3-

इतनी  भी भोली नहीं, जितनी समझें   लोग।

जनता अपने  देश  की, भरा स्वार्थ का    रोग।।

भरा स्वार्थ का रोग,मुफ़्त का सब मिल  जाए।

करना पड़े  न  काम,सुमन उर का खिल पाए।।

'शुभम्'  न  पाता जान,अतल  गहराई कितनी।

नेता    है  अनजान,   चतुर है  जनता इतनी।।


                         -4-

नेता    निकला    घूमने,   रैली  की ले टेक।

जनता से कहता  यही,मुझसे भला न  नेक।।

मुझसे    भला    न   नेक, दूसरा नेता  कोई।

मैं   ईश्वर   का  रूप,भाव भर आँख भिगोई।।

'शुभम्' रखें ये ध्यान,नहीं मैं क्या कुछ लेता।

रखता  सबका  मान,  सभी  हैं कहते नेता।।


                         -5-

जनता  को    कोई  नहीं, दे सकता है चाल।

जाता   जो  दरबार  में,  बदले उसका  हाल।।

बदले   उसका  हाल,  वही इतिहास बनाए।

डाल गले  में  माल,  उच्च आसन पर लाए।।

'शुभम्'  वही  नर  मूढ़, मूढ़ ही नेता बनता।

नेता  पर   आरूढ़,   सदा ही रहती जनता।।


शुभमस्तु !

07.06.2024●11.30आ०मा०

झुरमुट में लोकतंत्र! [अतुकांतिका]

 261/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अनिश्चय के 

झुरमुट में

फंसा लोकतंत्र

चिल्ल्ला रहा

बार -बार

त्राहि माम ! त्राहि माम!!


भेड़ियों की 

झपट ने 

लहूलुहान कर दिया

अपना लोकतंत्र,

बड़ा ही असमंजस

बँटने लगी है

जूतों में दाल!

अति बुरा हाल!


अपने -अपने

उल्लुओं को

सीधा जो करना है,

बेपेंदी के लोटों को

यों ही तो

लुढ़कना है।


बड़ा ही अफ़सोस!

किस मोड़ पर

लाकर कर दिया

खड़ा ये देश,

बदल - बदल वेश,

आ गए महत्वाकांक्षी

जिनका नहीं कोई

चरित्र ,

 न बची नैतिकता,

भुगते अब देश,

बढ़ता हुआ

निरन्तर क्लेश।


ठगे गए हम

ठगा गया

 जनता जनार्दन

उसके ही स्वार्थ ने,

'शुभम्'  किसे दें दोष,

खो दिए होश

बढ़ा अति रोष!

आक्रोश ही आक्रोश।


शुभमस्तु !


07.06.2024●1.30आ०मा०

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जनादेश [ दोहा ]

 260/2024

                   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जनमत ही सबसे प्रमुख,प्रजातंत्र में आज।

जनादेश   देता   वही,  बना देश का साज।।

लालच   देकर  चाहते,जनादेश कुछ लोग।

जनता  ठुकराती  उन्हें,लगा पराजय रोग।।


आश्वासन  झूठे   दिए, भाषण भी पुरजोर।

जनादेश   कैसे  मिले , केवल  करते शोर।।

जनादेश  उसको  मिले,  जो जीते विश्वास।

कुछ तो  होनी  चाहिए, दलबन्दों से आस।।


जातिवाद  के  नाम   पर, जनादेश है व्यर्थ।

करे न राष्ट्र विकास जो,उसका भी क्या अर्थ।।

आडंबर   या  ढोंग  से , जनता  जाती ऊब।

जनादेश  मिलता  नहीं, लफ्फाजों को खूब।।


जनादेश  उसको  मिले, जो दे जन को  काम।

विक्रय  करे न  देश  की,सम्पति नमक हराम।।

करना  ही   तुमको   पड़े,  जनादेश स्वीकार।

काम  न आए  देश के, वह जनमत है   भार।।


बने   नहीं   सरकार   तो, जनादेश  है   व्यर्थ।

निधि खा  पीकर  मौज कर,नहीं देश के अर्थ।।

समझें   जनता   को   नहीं, नेता कोई   मूढ़।

भाषण  से  मिलता  नहीं,जनादेश क्या  रूढ़।।


'शुभम्'   देश  को  चाहिए,दल करता संघर्ष।

जनादेश    उसको   मिले,  करे  देश उत्कर्ष।।


शुभमस्तु !


05.06.2024 ● 9.45आ०मा०

                   ●●●

बैठा वट की छाँव में [ दोहा ]

 259/2060

         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भोर  हुआ  सूरज   उठा, गगनांचल की  ओर।

जड़ - चेतन  जलने  लगे,   छू धरती के  छोर।।

लगता  सूरज  क्रोध  में, तप्त  धरा जल  वायु।

अंबर   उगले आग   ही, घटे जीव की  आयु।।


गौरैया  व्याकुल  बड़ी, मिली न जल की  बूँद।

पड़ी  नीड़  में  दुःख में, चोंच  नयन को  मूँद।।

लटका  अपनी  जीभ को,बाहर अपनी  श्वान।

हाँफ   रहे   हैं   छान   में,करें  कहीं जलपान।।


धरती पर  पड़ता  नहीं,  बिना उपानह   पाँव।

बैठा  वट   की   छाँव में, तप्त समूचा   गाँव।।

चलो   तरावट   के   लिए, खाएँ  हम तरबूज।

महक   रहा   है   खेत में, देखो  वह खरबूज।।


नीर    बिना   प्यासी  धरा, मरे  हजारों  जीव।

कहाँ  छिपे  बादल घने, चातक रटता   पीव।।

सूख  रहे    तालाब  भी,  निकल रहे हैं    प्राण।

व्यकुल  मछली  जीव जल, कौन करेगा त्राण।।


भैंस  गाय  व्याकुल  सभी, हाँफ रहे हैं  ढोर।

शूकर  लोटे   पंक  में,  छिपे  छाँव  में   मोर।।

कोई   शर्बत  पी   रहा,  कोई  लस्सी   छान।

गर्मी  का  परिहार   कर, करे जेठ का   मान।।


षट् ऋतुओं के देश में,तप का एक  प्रतीक।

अपना एक निदाघ है,   उत्तम  पावन  नीक।।


शुभमस्तु !


05.06.2024● 6.30आ०मा०

                   ●●●

कैसी बेढब रीति चली है! [ गीत ]

 258/2024


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रौंदा अपने

अधीनस्थ को

कैसी बेढब रीति चली है।


छोटी मछली 

को खा जातीं

बड़ी मछलियाँ बीन -बीन कर।

कुचले जाते

नित गरीब ही

खा जाते हैं चुगा छीन हर।।


कैसे अपनी

जान बचाएँ

देखो तो जन- जनी छली है।


सास बहू को

नहीं समझती

पुत्रवधू भी बेटी जैसी।

निकल पड़ी

कमियाँ ही खोजे

करती उसकी ऐसी - तैसी।।


मैं गृहस्वामिनि

तू बाहर की

यही सोच घर देश-गली है।


हो विभाग

सरकारी कोई

थाना या कि कोतवाली हो।

बूटों तले

कुचलते छोटे

जैसे मच्छर की नाली हो।।


नाखूनों के 

बीच जुएँ - सी

नियति मानवों की छिछली है।


शुभमस्तु !


04.06.2024●2.45 आ०मा०

चार जून आ गई ! [बालगीत ]

 257/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



चार   जून  आ  गई।

गाँव  नगर  छा  गई।।


ऊँट किधर  सो रहा।

करवटों  में खो रहा।।

अजब गजब ढा गई।

चार   जून   आ  गई।


जाने  कब उठे   यह।

बोझ पीठ पर दुसह।।

शांति  सुख  खा गई।

चार   जून   आ गई।।


कैसा  ये    खुमार   है।

लगे    गया   हार   है।।

मंजिलों को   पा  गई।

चार   जून   आ   गई।।


कितने  डग  पार   है?

जनमत     दुलार   है।।

आम  जन  लुभा गई।

चार  जून   आ    गई।।


नींद   नहीं    रात  को।

समझें कब  बात को।।

खाज -  सी खुजा गई।

चार  जून  आ     गई।।


लगता  नहीं   घाम  है।

जपें    राम  -  राम  है।।

अटकलें    नई -  नई ।।

चार  जून    आ   गई।।


ऊँट     जागने    लगा।

करवटें   लेने    जगा।।

खुशी  नई     छा  गई।

चार  जून    आ    गई।।


'शुभम्' मोबाइल  खोल।

बज   रहे    देख   ढोल।।

बढ़    रही     है    दंगई।

चार  जून     आ   गई।।


शुभमस्तु !


03.06.2024●3.00प०मा०

                    ●●●

छुट्टियाँ [चौपाई]

 256/2024

              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलो    छुट्टियाँ    वहाँ     मनाएँ।

जहाँ  शांति से   हम  रह   पाएँ।।

गर्मी   हुई    तेज    अति   भारी।

यात्रा    की     अपनी    लाचारी।


किसे  छुट्टियाँ   सदा   न  भातीं।

करता श्रम  उसको  ललचातीं।।

पढ़ने   वाले   या   किसान   हों।

सीमा  पर   लड़ते  जवान    हों।।


करें      नौकरी      या    मजदूरी।

मिलें    छुट्टियाँ   उनको      पूरी।।

तन थकता तो  मन   भी थकता।

अनथक  कैसे   मग   में चलता।।


 गर्म    मशीनें     भी    हो   जाती।

श्रम   क्षमता    उनकी   मुरझाती।।

उन्हें  रोक  कर    शीतल   करना।

थकन मशीनी  को  नित    हरना।।


श्रम   क्षमता    छुट्टियाँ   बढ़ातीं।

नई  चेतना    तन    में     लातीं।।

कर्मशील    कोई    भी   कितना।

सभी  थकित हों करता जितना।।


मेले     ब्याह    पर्व    हैं    आते।

किसे नहीं वे     खूब     रिझाते।।

इसी      बहाने     छुट्टी       लेते।

काम  सभी   हम   निबटा   देते।।


'शुभम्'   चलो     छुट्टियाँ   कराएँ।

मात -  पिता   सँग      घूमें  आएँ।।

खेलें -  कूदें      मौज       मनाएँ।

नैनीताल     घूम      कर    आएँ।।


शुभमस्तु !


03.06.2024●10.45आ०मा०

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सोमवार, 3 जून 2024

पाँच वर्ष के बाद में [दोहा गीतिका]

 255/2024

       


नेताजी   करते    नहीं, जन जनता से  प्यार।

आता  समय  चुनाव  का,बाँटें  प्यार उधार।।


नेतागण    चाहें   नहीं,  करना  पूर्ण विकास,

कौन   उन्हें  पूछे  भला ,खोल घरों के  द्वार।


पाँच    वर्ष   के  बाद   में, आता   है मतदान,

सत्ता    पाने    के   लिए, टपके सबकी  लार।


राशन  बिजली  तेल  के, आश्वसन  दें   नित्य,

बना   निकम्मा   देश  को,वांछित है गलहार।


जनता   को  सुविधा  नहीं, भोगे कष्ट  अनेक,

नेतागण     परितृप्त   हैं,  छाया  रहे खुमार।


चमचे    गुर्गे  मौज  में, खाते  मक्खन   क्रीम,

चूसे   जाते   आम  ही, डाल  करों  के   भार।


'शुभम्' देश  की  भक्ति का,अंश नहीं  लवलेश,

प्रजातंत्र   में    ही   प्रजा,  का   नित बंटाढार।


   शुभमस्तु!

03.06.2024●5.15आ०मा०

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आया समय चुनाव का [ सजल ]

 254/2024

        

समांत :  आर

पदांत  :  अपदांत

मात्राभार : 24.

मात्रा पतन: शून्य


नेताजी   करते    नहीं, जन जनता से  प्यार।

आता  समय  चुनाव  का,बाँटें  प्यार उधार।।


नेतागण    चाहें   नहीं,  करना  पूर्ण विकास।

कौन   उन्हें  पूछे  भला ,खोल घरों के  द्वार।।


पाँच    वर्ष   के  बाद   में, आता   है मतदान।

सत्ता    पाने    के   लिए, टपके सबकी  लार।।


राशन  बिजली  तेल  के, आश्वसन  दें   नित्य।

बना   निकम्मा   देश  को,वांछित है गलहार।।


जनता   को  सुविधा  नहीं, भोगे कष्ट  अनेक।

नेतागण     परितृप्त   हैं,  छाया  रहे खुमार।।


चमचे    गुर्गे  मौज  में, खाते  मक्खन   क्रीम।

चूसे   जाते   आम  ही, डाल  करों  के   भार।।


'शुभम्' देश  की  भक्ति का,अंश नहीं  लवलेश।

प्रजातंत्र   में    ही   प्रजा,  का   नित बंटाढार।।


शुभमस्तु!

03.06.2024●5.15आ०मा०

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रविवार, 2 जून 2024

मौनव्रत का संलयन [व्यंग्य]

 253/2024 



 ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 आप अपनी जानें।मैं तो अपनी जानता भी हूँ और पहचानता भी हूँ।वैसे अपनी - अपनी करनी सबको जाननी चाहिए। अब आप नहीं जानते तो कोई क्या करे? अपनी जानने के बाद ही मैं यह कहने का साहस कर पाया हूँ कि मैं एक प्राचीन मौनव्रती हूँ।यह मौन व्रत कोई बनावटी या अखबारी मौन व्रत नहीं है कि ध्वनि प्रसारक यंत्र लगाकर इसका विज्ञापन किया जाए! यह मौन व्रत तो मेरे जन्म काल से ही मेरे साथ आया है और जीवन के अंत के साथ स्थाई मौनव्रत में बदल जाना है।आप में भला कौन -कौन पहचाना है?कि यह मौनव्रत बहुत पुराना है। 

  जब मैं पहली -पहली बार इस धरा धाम में धरती माँ की गोद में आया तो प्रकृति ने मेरा नौ मास का अंतः मौन व्रत तुड़वाया।जननी की कुक्षि में मैं नौ माह से मौन ही तो प्रभु भक्ति में लीन था। वह दीर्घकालिक मौन व्रत तभी तो टूटा,जब 'हुआ -हुआ' के मेरे क्रंदन ने बाहर आने का सुख लूटा। जन्म के बाद भी मैं प्रायः मौन ही रहता, जब लगती भूख प्यास तो रुदन की वाणी में अपनी बात कहता।वरना मौन पड़ा-पड़ा अड़ा रहता। अधिकांश समय शयन में मौन ही तो रहना। कभी किसी से यह नहीं कहना कि मैं बहुत बड़ी तपस्या कर रहा हूँ।खबर अख़बार में छपवा दो अथवा टी वी पर फोटो वीडियो प्रसारित करा दो। 

  तब से आज तक मौन रहकर मौन व्रत साधना ही तो कर रहा हूँ।यह मौन तो जैसे जीवन की श्वास है।इसके बिना भी क्या जीवन है,जीवन का प्रकाश है? तब से आज तक मैंने अपने मौन के प्रचार- प्रसार के लिए न कैमरे लगवाए और नहीं देश - दुनिया में घोड़े दौड़ाए कि जाओ कि एक अकिंचन भी मौन व्रत कर रहा है। लोग जानें कि यह क्या विलक्षण हो रहा है,जो आज तक किसी ने नहीं किया।पर वास्तविकता यही है कि आप सब भी तो यही कर रहे हैं।पर अपने मौन व्रत का डंका बजाने से डर रहे हैं। क्यों ?क्यों?क्यों ?वह इसलिए कि यह तो जीव और जीवन की प्रकृति है। जीवन का अनिवार्य अंग।इसके बिना तो है जीवन का रंग में भंग। जब जब भी रात या दिन में निद्रा देवी की गोद में सोया, मौन व्रत से ही अपना मुख और तन धोया।कम से कम नित्य प्रति दस- दस घण्टे।जब की गई साहित्य- साधना या एकांत- साधना तब भी समय के वे क्षण मौन में ही बंटे।एक-एक महीने में तीन सौ घण्टे की मौन साधना। इस प्रकार प्रति वर्ष 3600 घण्टे की निराहार मौन- साधना।365 दिन में 150 दिन की व्रत- साधना।

      इस मौन व्रत साधना के लिए कोई आडम्बर नहीं करना। चाहे आप दिगम्बर हों या सांबर साधना तो हो रही है और बकायदे हो रही है।जब तक जीव और जीवन का अंतिम क्षण नहीं आ जाता,तभी तक इस आनन पर बोल हैं।फिर तो मौन ही मौन है। स्थाई मौन है।सूक्ष्म शरीर कुछ भी करे,कौन जानता है? चिल्लाए कोई प्रेत या रहे मौन ,सुने भी कौन ?  आज के नए जमाने के आदमी को देखिए। मौन का भी प्रचार है, जोर शोर से प्रसार है।जैसे इनके ही मौन की दुनिया में बहार है।मौन तो शक्ति अर्जन का स्रोत है। अनिवार्य स्रोत है। सबके लिए खुल्लमखुल्ला उपांत है।हर एक जीव ही इस विषय में शांत है। परन्तु विज्ञापन जीवी ही कुछ उद्भ्रांत है।जो खबर बनने के लिए विकल - प्रांत है। 

   आइए ! हम सब भी अपने मौन को पहचानें। मौन को मौन से अधिक कुछ नहीं मानें।जितनी रह सके सीमा में ,उतनी ही तानें।सहजता में ढोंग क्या !आडम्बर क्या !दिखावा भी क्या ?तोल- तोल कर बोलना है। झूठ का जहर नहीं घोलना है। शेष समय मौन ही मौन की आराधना है।इसीलिए तो शयन की अनिवार्य साधना है। जितना जागरण उतना ही शयन।बन्द करें वाणी और दोनों नयन।जीवन में प्राकृतिक है मौनव्रत का चयन,संलयन। 

शुभमस्तु !

 02.06.2024●4.00आ०मा० 


 ●●●ा

मेरा मौनव्रत [ दोहा ]

 252/2024

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मौनव्रती  विख्यात मैं,  करता  व्रत प्रति  मास।

तीन शतक  बनते  सदा, मत समझें उपहास।।

नहीं   कैमरों   को सजा,  करता   मैं व्रत    मौन।

टीबी   या  अखबार  में,  जान सका है   कौन??


बारह   मासी   मौन  व्रत, का  है पावन   भाव।

घर   वाले  भी  जानते,  मुझे  मौन का    चाव।।

नहीं    हिमालय    चाहिए, या    कोई  एकांत।

दिनचर्या   मम   मौनव्रत,   मानें  मत अरिहंत ।।


नौ  से  प्रातः  पांच  तक, रहता  मैं नित  मौन।

दिन  में  घण्टे  चार  - छः, मौन रहूँ निज भौन।।

दिनचर्या    का  अंग  है,  मेरा  यह व्रत   मौन।। 

अब  ज्ञापित  करना  वृथा,मधुर या कि हो लौन।।


मुझे    न   कोई   होड़  है,करता  नहीं  प्रचार।

मौन   वाक   का  मौन  व्रत, कहने से  बेकार।।

वीणावादिनि   का   हुआ, मुझे  सूक्ष्म  आदेश।

पुत्र   मौनव्रत  व्यक्त   कर, धरे  बिना  नव वेश।।


तथाकथित की  बात  क्या,छींकें खाँसें  नित्य।

अखबारों   में   जा    छपे, बतलायें औचित्य।।

जैसे  लेते    साँस    नित, वैसे   ही व्रत   मौन।

शक्ति  बढ़ाता भक्ति की, चले श्वास का पौन।।


'शुभम्' शयन  में  मौन  रह,करता कवि  संधान।

बात  नहीं  करता  कभी,कविता हित  अनुपान।।


शुभमस्तु !


02.06.2024●2.00आ०मा०

                     ●●●

शुक्रवार, 31 मई 2024

नेता [कुंडलिया]

 251/2024

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

नेता  अलग  प्रजाति है, मनुज जाति से भिन्न।

नहीं  चाहती  एकता, जन-जन करती   छिन्न।।

जन - जन  करती   छिन्न, रंग में भंग कराना।

नेताओं  का  काम,   कथा  में  गधा चलाना।।

'शुभम्' चरित बदरंग,नहीं कुछ जन को देता।

मानव - दानव   बीच,विकसता सच्चा   नेता।।


                         -2-

कहता   पूरब    जा  रहा, जाता पश्चिम   ओर।

नेता    की   पहचान   ये, साँझ बताए   भोर।।

साँझ    बताए  भोर,  हृदय  का राज अजाना।

मरा आँख का  नीर, समय पर कभी न आना।।

'शुभम्' अलग ही  धार,नदी के साथ न  बहता।

मुख से  साँचे बोल,भूल  वह कभी न  कहता।।


                         -3-

आशा    नेता   से    नहीं, करना  कोई    मीत।

झूठे  उसके   बोल  हैं,  चले   चाल विपरीत।।

चले  चाल  विपरीत, दिलाए  बस आश्वासन।

ठगता    सारा   देश,  बाँटकर  चीनी राशन।।

'शुभम्'  न  देना  काम,देश सब इससे  नाशा।

रहो   भरोसे     राम,  झूठ   ही   देता  आशा।।


                          -4-

नेता     ऐसा    चाहिए,  कथनी  करनी   एक।

सत चरित्र  से  युक्त  हो, जिसमें भरा विवेक।।

जिसमें   भरा    विवेक, देश  आगे ले   जाए।

लफ़्फ़ाजी   से    दूर,   नहीं  ऑंखें दिखलाए।।

'शुभम्'    बने  आदर्श,  कीर ज्यों अंडे   सेता।

जन  में  न  हो अमर्ष, देश  सेवक  हो    नेता।।


                         -5-

कोई   नेता  क्यों बना, अलग - अलग है लक्ष्य।

धन  अर्जन  कोई  करे, खाता  भक्ष्य-अभक्ष्य।।

खाता   भक्ष्य -अभक्ष्य,  चरित   का कोई  हेटा।

सात   पीढ़ियाँ    धन्य,   दीखते  बेटी   - बेटा।।

'शुभम्'  स्वप्न  साकार,  हुए जब फसलें  बोई।

लादे    धन   की   खेप,  बना  यों नेता    कोई।।


शुभमस्तु !


31.05.2024●7.00आ०मा०

                   ●●●

करवट ऊँट की [अतुकांतिका]

 250/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इधर आग है

उधर आग है

बाहर भीतर

 आग लगी,

चरम आग का

क्या होना है ?

सोच रहे हैं

मनुज सभी।


चित भी इनकी

पट भी उनकी

अंटा उनके बाप का,

नहीं जानते

ऊंट किधर ले

करवट मत के ताप का।


न्याय नीति

सब रखे ताक पर

हथकंडे के ही फंडे,

बाजी निकल 

न पाए कर से

घूम रहे हैं मुस्टंडे।


भीतर खोट

मिले बस सत्ता

चाहे जैसे 

हम भगवान,

दाँत अलग कुछ

दिखलाने के

खाने को बनते शैतान।


रक्षक है

बलवान समय ही

हो न सकेगा 

अब अन्याय,

मानव को 

मानव जो समझे

'शुभम्' उसी को 

मिलता न्याय।



●शुभमस्तु !

30.05.2024●3.45प०मा०

                 ●●●

गुरुवार, 30 मई 2024

तपें नौतपा खूब [ भुजंगप्रयात ]

 249/2024

           

छंद विधान:

1.मापनी :122  122  122  122

2.चार चरण का वर्णिक छंद।

3.दो -दो चरण समतुकांत।

4.कुल वर्ण संख्या :12.


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तपें   नौतपा   में   धरा   जीव  सारे।

सभी  चाहते  हैं  नदी   के  किनारे।।

तवा-सी  तपी   भूमि  धूनी  लगी है।

नमी  नीर   की पूर्ण जाती  भगी है।।


नहीं  पाँव  नंगे    पड़ें  यों   धरा में।

कहें   कीर  सारे जला   मैं मरा मैं।।

सभी  ढोर  भैंसें व  गायें  दुखी   हैं।

हमें एक  ही जीव  दीखे   सुखी है।।


सुखी  है  हरा  है  सुफूला  जवासा।

वहीं पास में है अकौवा स- आसा।।

पके आम  मीठे   हमें   हैं    रिझाते।

सभी  प्रौढ़  बूढ़े  युवा  खूब   खाते।।


तपें  चादरें    चारु    शैया    हमारी।

खड़ी  है  रँभाती  सु  गैया  बिचारी।।

चलें  नौतपा  में  स -धूली  तपाती।

हवा आग  की  ये भभूती   उड़ाती।।


तपें   नौतपा   खूब    गंगा  नहाएँ।

जपें  शंभु  का नाम  गीता  सुनाएँ।।

यही जेठ   का मास ज्ञानी  विज्ञानी।

करें कृष्ण का नाम   नामी सुमानी।।


शुभमस्तु !


29.05.2024●12.15प०मा०

तपे नौतपा ग्रीष्म [ दोहा ]

 248/2024

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लाज करें तिय जेठ की,मुख अवगुंठन ढाँप।

लगे    नौतपा  आग  के,बरस  रहे  हैं साँप।।

लगें  थपेड़े   आग    के , मुरझाए  दो गाल।

आँख  मिलाए कौन अब, सूरज से तत्काल।।


धरती  पर  पड़ते  नहीं, बिना उपानह  पाँव।

नीम  तले  की छाँव भी,  माँग रही है छाँव।।

चैन   मिले  घर   में   नहीं, ढूँढ़ें  बाहर छाँव।

ढोर  लिए  अपने सभी, वट  तरु नीचे गाँव।।


अवा  सरिस  धरती हुई,तवा  सदृश है रेत।

उठें  बगूले  वात   के,तप करते सब खेत।।

बिस्तर  चादर  सब तपें,तपें आग-सी देह।

दूर - दूर तक  है  नहीं,  बरसे  नभ से मेह।।


क्षिति नभ पावक तत्त्व त्रय,चौथा चटुल समीर।

पंचम  जल भी खौलता, तापित सभी अधीर।।

बिना  तपे   नव ताप में,  होती  धरा न   शुद्ध।

ज्ञान  तभी  मिलता  सही, कहते सत्य प्रबुद्ध।।


षड ऋतुओं में ग्रीष्म ही,शोधक हैं दो मास।

कीट आदि सब नष्ट हों, दृढ़ है यह विश्वास।।

तपसी  ज्ञानी  तप  करें, तप  से ज्ञानी  बुद्ध।

धरती  तपती  मास दो, रविकर से कर युद्ध।।


ऋतु है भीष्म निदाघ की,तप का ही आधार।

'शुभम्' मनुज जितना तपे,आता पूर्ण निखार।।


शुभमस्तु !


29.05.2024●6.30आ०मा०

                   ●●●

ग्रीष्म उत्ताप [ दुर्मिल सवैया ]

 247/2024

         


छंद-विधान:

1.24 वर्ण का वर्णिक छंद।

2.आठ सगण सलगा =(II$ ×8).

3.12,12 वर्ण पर यति।प्रत्येक चरण में 24 वर्ण।

4.अंत में समतुकांत अन्त्यानुप्रास।


© शब्दकार 

 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                      -1-

नभ से बरसे रवि तेज महा,

                        धरती जल अंबर नित्य  तपे।

अकुलाइ रहे जन जीव सभी,

                    कब शीतल ब्यारि बहे भुव पे।।

कत रोष  भरे सतराइ खड़े,

                       जल जीवहु प्राण बचाइ जपे।

तन  स्वेद  भरे  महकाइ  रहे,

                  निज नाथ बिना  तिरिया कलपे।।


                          -2-

वन  बागनु  में पथ गाँवनु में,

                        नित पेड़ कटें जलहीन   धरा।

नभ  में  उमड़ें न  सु मेघ घने,

                        सब चीखत कीर पखेरु   मरा।।

पय सूख  गयौ  थन  ढोरनु से,

                        तिय कौ मुरझाइ गयौ  अँचरा।

नर नारि किसान  दुखी  मन में,

                            घर में घबराइ फिरे   कबरा।।


                          -3-

खरबूज सुगंध   लुभाइ  रही,

                              तरबूज तरावट आइ गई।

लँगड़ा फ़जली  महके  अमुवा,

                         नव नीलम  जामुन छाइ  नई।।

निबुआ रस कौ सुख अम्ल रिसे,

                        बहु स्वाद भरे फल डाल कई।

जब   छाछ   सुशीतल  स्वाद भरे,

                       मन में तन में सुख राशि   भई।।


                         -4-

तचि भूमि  भई  रज आग मई,

                         परसे पद अंग जलाइ रही।

चिनगारि  उड़े  तन  कोमल  पे,

                       जल लूक  सुदेह सुभाइ नहीं।।

तन कौ  जल सूखि  उड़े नभ में,

                      सब रूखनु लूअ चुभाइ बही।

मछली  सर में   घबराइ  घिरी,

                    बस छाछ रुचे अरु खाइ दही।।


                         -5-

इत  प्यास बढ़ी  उत  ताप चढ़ौ,

                         बड़रे दिन की छुटकी रतियाँ।

इत ब्याह भयौ नव   ब्याहुली से,

                      कित जाय करें मन की बतियाँ।।

तन से तन कौ मन से मन कौ,

                       परिचायक जातक की  गतियाँ।

निज द्वार रखौ शुभ चिह्न 'शुभं',

                       शुचि पीत सजें दो- दो सतियाँ।।


शुभमस्तु !


28.05.2024●2.00प०मा०

                   ●●●

रही न तरुवर छाँव [ गीत ]

 246/2024

           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ठूँठ बिलखते

करते क्रंदन

रही न तरुवर छाँव।


अपने पाँव

कुल्हाड़ी मारे

मानव निर्दय जीव।

जिनसे लाभ 

उठाए निशि दिन

बना उन्हीं से क्लीव।।


पत्थर मार

फलों को तोड़े

लगा रहा नित दाँव।


धरती  रोए

बूँद -बूँद को

 निर्मेघी आकाश।

करें तपस्या

जो आजीवन

उन पेड़ों की लाश।।


पौधारोपण 

नहीं हो रहा

लू में तपते पाँव।


जान रहा है

सुख वृक्षों का

फिर भी बन अनजान।

आरे चलते

तरु   पर   उसके

दिखा व्यर्थ की शान।।


कोकिल वाणी

 न दे सुनाई

या कौवे की काँव।




शुभमस्तु !


28.05.2024●8.30आ०मा०

सोमवार, 27 मई 2024

कच्छप खरहा दौड़ है! [ दोहा गीतिका ]

 245/2024

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कच्छप  खरहा   दौड़  है,उर में खिलते   फूल।

समय उन्हें परिणाम दे,किसके वह अनुकूल।।


खरहा   दौड़ा  तेज  ही, हाँफ  गया वह  शीघ्र

सोया  तरुवर  छाँव  में,  शर्त  गया वह  भूल।


कच्छप यों चलता  रहा, रुके  बिना अविराम,

लक्ष्य  पार  उसने  किया,सोया शशक बबूल।


करें  न  अति  विश्वास भी,अपने ऊपर  मित्र,

कर्म  शिथिल  होना  नहीं, चुभें न पैने   शूल।


आदि  मध्य शुभ अंत का,करें संतुलन ठीक,

उचित नहीं अति से भरी,मन की तेरी   हूल।


राजनीति  या देश  हो, या समाज का   धर्म,

नीति नियम तजना नहीं,रहकर ऊल जलूल।


'शुभम्' चला  चल  पंथ  में,  करे नहीं  विश्राम,

विजय  सदा ही   हाथ  हो, चमके  केतु  समूल।


शुभमस्तु !


27.05.2024●4.00आ०मा०

                   ●●●

करें न अति विश्वास भी [ सजल ]

 244/2024

       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समांत    : ऊल

पदांत     : अपदांत

मात्राभार  : 24

मात्रा पतन :शून्य।


कच्छप  खरहा   दौड़  है,उर में खिलते   फूल।

समय उन्हें परिणाम दे,किसके वह अनुकूल।।


खरहा   दौड़ा  तेज  ही, हाँफ  गया वह  शीघ्र।

सोया  तरुवर  छाँव  में,  शर्त  गया वह  भूल।।


कच्छप यों चलता  रहा, रुके  बिना अविराम।

लक्ष्य  पार  उसने  किया,सोया शशक बबूल।।


करें  न  अति  विश्वास भी,अपने ऊपर  मित्र।

कर्म  शिथिल  होना  नहीं, चुभें न पैने   शूल।।


आदि  मध्य शुभ अंत का,करें संतुलन ठीक।

उचित नहीं अति से भरी,मन की तेरी   हूल।।


राजनीति  या देश  हो, या समाज का   धर्म।

नीति नियम तजना नहीं,रहकर ऊल जलूल।।


'शुभम्' चला  चल  पंथ  में,  करे नहीं  विश्राम।

विजय  सदा ही   हाथ  हो, चमके  केतु  समूल।।


शुभमस्तु !


27.05.2024●4.00आ०मा०

                   ●●●

फोटो फुटौवल [ व्यंग्य ]

 242/2024

               

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

आज के युग में आदमी से अधिक आदमी के फोटो का महत्त्व है।क्योंकि आदमी का क्या,वह तो कभी भी टाटा  बाय बाय करते हुए निकल लेता है, अमर है तो उसका फोटो ही है,और कुछ भी नहीं।फोटो की अमरता को दृष्टिगत करते हुए आदमी काम से अधिक फोटो को वरीयता प्रदान करता है।काम चाहे हो या न हो उसका फोटो खिंच जाना चाहिए।इस फोटो फुटौवल के हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं।

जीवन के विशद आकाश की यात्रा पर निकलो तो फोटो फुटौवल के नशा में झूमते हुए हजारों लोग मिल जाते हैं।पेड़ एक लगता है फोटो पच्चीस के खींचे जाते हैं। वह भी एक दो नहीं पचासों  फोटो अलग- अलग अदाओं में अलग धजाओं में खिंचते हैं। भला हो मोबाइल कैमरा बनाने वाले का यह सुविधा मुट्ठी-मुट्ठी को प्रदान कर दी।वही फोटो फिर अखबार ,टीवी, मुखपोथी और सोशल मीडिया पर धमाल मचाते हैं।शादी ब्याह की रस्में हों या न हों दूल्हा,दुल्हन, फूफा,जीजा,समधी,समधिन,यार दोस्त सब फोटो फुटौवल में मस्त हैं।

         फोटो का बड़ा भाई वीडियो क्यों पीछे रहने लगा भला?बरात चार कदम आगे बढ़ती है तो फोटुओं की बरात और आगे निकल जाती है।घोड़ी के साथ नाचने का मौका बार -बार हाथ नहीं आने वाला! इसलिए इसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए।फोटो फुटौवल के चक्कर में घनचक्कर बना हुआ आदमी यह भूल जाता है कि विवाह की रस्मों से ज्यादा खास है फोटो फुटौवल।इसलिए सूर्यास्त को पड़ने वाली भाँवरें अगले दिन सुबह या दोपहर तक पड़ पाती हैं। पता ही नहीं लगता कि विवाह के लिए फोटो खींचने हैं या फोटो फुटौवल के लिए विवाह करना पड़ रहा है। विवाह गौड़ हो जाता है।फोटो अपनी टाँगें पहले अड़ा देता है।जैसे सब कोई फोटो फुटौवल के दीवाने हो गए हैं।कभी -कभी तो फोटो फुटौवल में हाड़ फुटौवल और खोपड़ी फुटौवल  बाजी मार ले जाती है।

आग लगी हुई है।आग बुझाने वाले कम वीडियो और फोटो बनाने वाले ज्यादा मिल जाएँगे।आग बुझाने की चिंता और प्रयास भला कितने भाषाणवीरों का रहता है? न के बराबर। जब तक फायर ब्रगेड की गाड़ी आती है, तब तक सब स्वाहा हो चुकता है।

   विचार किया जाए तो आदमी से अधिक बड़ी उम्र फोटो की ही होती है। क्योंकि आदमी तो निकल लेता है , फोटो स्मृति चिह्न बना हुआ अमर हो जाता है।तभी तो पिछली कई -कई पीढ़ियों के फोटो आज की पीढियां देख पा रही हैं।ये हमारे पर बाबा हैं,ये उनके भी बाबा हैं ,ये दादी हैं ,ये परदादी हैं वगैरह वगैरह।

 वर्तमान फोटो फुटौवल का एक अहम पहलू ये भी है कि इसके दीवाने अपना जीवन इसी के लिए दाँव पर लगा बैठते हैं। वे साहसिक दृश्य (एडवेंचर ) के लिए नदी के बीच धार में,फिसलते हुए कगार में, रेल की पटरी पर, बहु मंजिला भवनों की चोटी पर, साँप बिच्छुओं से खेलते हुए फोटो फुटौवल से पीछे नहीं हटते।फोटो पहले ,जीवन बाद में। इसीलिए तो डूबा है आदमी फोटो के स्वाद में।आदमी से ज्यादा बसता है वह उसकी ही याद में।आदमी विदा ,स्मृतियों पर फिदा।

इससे एक बात और निकल कर आती है कि उसे वर्तमान से अधिक इतिहास से प्रेम अधिक है।वह अतीत जीवी है।वर्तमान से घृणा और चिह्नों से प्यार।क्या ही विचित्र है ये आदमी का खुमार।वह छायाप्रेमी है। अतीत जीवी है।इसीलिए नए फैशन के लोग जिंदा माँ बाप के वर्तमान का सम्मान न करके उनके फोटुओं पर माला पहनाते हैं, कौवे और चीलों को भोज कराते हैं।यह भी तो फोटो प्रेम ही है।आदमी के अधः पतन की पराकाष्ठा।फोटो फुटौवल का एक और रूप।बन गया आधुनिक आदमी फोटो - भूप। वर्तमान से अधिक भूतप्रेम, पीछे रह  गए  सब कुशल - क्षेम।शेम! शेम!! कहाँ से कहाँ जा पहुँचा आदमी! आदमी को आदमी होना था लाज़मी।जीवित देह से इम्पोर्टेन्ट हो गई  आदमी की ममी।रही ही कहाँ हैं उन आँखों में नमी ?लगता है ये आदमी नहीं है ,ये है आदमी की डमी।ये अलग बात है कि इसे उसकी अति सभ्यता कहें अथवा बड़ी - सी कमी।


शुभमस्तु !


26.05.2024●7.45आ०मा०

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रोज सुबह होते ही [ व्यंग्य ]

 243/2024

           

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रोज सुबह होते ही वे अपने घर से बाहर निकल जाती हैं।किस -किसके दरवाजे को वे नहीं खटखटाती हैं? कभी इस दर पर कभी उस दर पर।चलती चली जाती हैं वे हर घर - घर।कोई काम हो ,ऐसा कुछ भी नहीं।कुछ माँगना- देना हो ऐसा भी कुछ नहीं।फिर भी बिना माँगे  वे बहुत कुछ दे आती हैं और जो चाहती हैं वह बिना दिए ले आती हैं।वह कोई भिखारिन भी नहीं हैं।पर सौ दो सौ हजार में वे एक यहीं हैं। वस्तुतः उनके लेन-देन की कोई सीमा नहीं है।

आप कहेंगे कि ये क्या पहेली बुझा रहे हैं। ये क्या माजरा है जो इतने घुमा - फिरा कर बता रहे हैं।जी हाँ, वह एक चलती फिरती पहेली ही हैं।ज्यादा तो कुछ नहीं वह चालीस साला नवेली ही हैं।उनका दिन भर यही काम है। लगाने -बुझाने में उनका मोहल्ले में बड़ा नाम है। ऐसा भी नहीं कि उन जैसी कोई हँसी हस्ती नहीं हैं। आप शोध करके के देखें तो वे हर कहीं हैं।ये वे हैं जिन्हें किसी की खुशी,शादी, ब्याह,जन्म,जन्मदिन, नवगृहनिर्माण आदि कुछ भी सहन नहीं हैं।यदि हो जाये कहीं गमी तो सारी  खुशियाँ यहीं हैं।भीतर -भीतर उनका दिल बल्लियों उछलता है।बाहर से दिखावटी आँसू का सैलाब उमड़ता है। उनके चरित्र की महिमा विधाता ब्रह्मा भी नहीं जानते। ऐसी 'महानारियों' की संरचना वे कचरे से मानते। जैसे गुबरैले को गोबर की महक और स्वाद भाता है ,वैसे ही इनको कचरा फैलाना सुहाता है।

चुगलखोरी इनका प्रिय व्यसन है।चुगलखोरी के लिए ही तो इनके दिल में मची रहती सन -सन है।यहाँ की वहाँ और वहाँ की यहाँ इनका प्रिय शगल (हॉबी,कामधंधा)है।इसके बिना नहीं कटता एक भी पल है।पड़ती नहीं इनके दिल में एक घड़ी की भी कल है।इनके लिए यह काम बड़ा ही सरल है।भले ही वह भद्र समाज के लिए गरल है।पर क्या कीजिए गिरगिट का भी ! वह कभी स्वेच्छा से रंग नहीं बदलता।वह तो प्रकृति प्रदत्त गुण है कि चाहकर भी नहीं सँभलता।इसी तरह वे 'महादेवी' भी क्या करें,उन्हें विधाता ने भेजा ही इस काम के लिए है:'

जो आया जेहि काज सों तासों और न होय।'

परमात्मा का समाज के ऊपर बड़ा ही उपकार है कि वे पढ़ी हैं न लिखी। पर अच्छे -अच्छे पढ़े लिखों के कान अवश्य काटना चाहती हैं।यह अलग बात है कि यह काम इतना आसान भी नहीं है। कि वे जो कह दें सब सही है ! सोचती तो हैं कि वे किसी के भी कान न छोड़ें ।सबको नकटा बनाकर ही पानी पिएं। पर ऐसा हो नहीं पाता है।उनकी बातों में उनका अधकचरा हसबैंड ही आता है। वह तो उनमें सौ फीसद विश्वास जतलाता है।नहीं यदि कभी आए ,तो कस-कस कर थप्पड़ भी खाए।ऐसा एक बार नहीं, अनेक बार इतिहास बनाया गया है। और कई बार उसे दोहराया भी गया है। उसका यह 'चंडी रूप' कई जोड़ा आँखों से देखा गया है,और कई जोड़ा कानों से सुना भी गया है।

एक विशेष बात यह भी है कि इस प्रकार की 'महानारियाँ' यहीं पर हों,या दो चार हों। ऐसे महान चरित्र तथाकथित  'सुशिक्षिताओं' और कवयित्रियों में भी मिले हैं।जो किसी अन्य कवि की ख्याति से क्षुब्ध ही होती हैं।वे या तो उन्हें उपेक्षित करती हैं अथवा जान बूझकर टाँग घसीटने का काम करने में प्रवीणा हो जाती हैं।पता चला है कि कुछ सहित्यिक मंचों पर वे अपनी रूप शोभा बढ़ा रही हैं और अपने चहेते -चहेतियों को सिर चढ़ा रहीं हैं। अब क्या करिए ,अपवाद कहाँ नहीं हैं ! कभी तुलसी बाबा यह बहुत पहले कह गए हैं :

'नारि न  मोह नारि के रूपा।' 

क्यों मानहिं वे पुरुष अनूपा।।

शुभमस्तु !

26.05.2024● 2.00प०मा०

शनिवार, 25 मई 2024

मियाँ मिट्ठू बनें [ व्यंग्य ]

 241/2024

               


©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मियाँ मिट्ठुओं का जमाना है।यदि आपको अपने को ऊपर उठाना है,तो ये आपका जमाना है।आप जमेंगे ही नहीं,नाकों नाक तक तर माल में गड़ जाएंगे। आपका मुकाबला अच्छे -अच्छे क्या बड़े-बड़े अच्छे नहीं कर पाएँगे।बस आप मियाँ मिट्ठू बने रहिए।कोई कुछ भी कहे आप अपनी पर डटे रहिए। भले ही आपकी बात सोलह आने झूठ हो।भले ही आपकी सम्पत्ति का स्रोत खसोट - लूट हो।पर प्रश्रय देते रहिए आपसी फूट को।बस चमकाए रखिए अपने टाई- सूट को।


जब तक आप मियाँ मिट्ठू नहीं बनेंगे,भला आपको कौन जानेगा।आपकी महिमा को कौन मानेगा।इसलिए कुछ उखाड़-पछाड़, तोड़-फोड़ भी जरूरी है।तभी तो आपकी इच्छा हो सके पूरी है।वैसे आप जमाने से दूरी ही बनाए रखना। तभी तो आपको उसका मधुर लवण स्वाद पड़ेगा चखना।हो सकेगा तभी आपका पूरा हर सपना।अब अपने इतनी दूर बसे हुए सूरज को ही देख लीजिए।वह भी मियाँ मिट्ठू बनने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता।वैशाख जेठ में दिन में दिखा देता है तारे पर दुनिया से मुख नहीं मोड़ता।शिशिर के कड़े शीत में आगमन की प्रतीक्षा करवाता है ; तो सावन भादों में मेघों में दुबक जाता है।सूरज भले ही  वाणी से मौन है ,किंतु मियाँ मिट्ठू उससे बड़ा कौन है?


    बड़ी - बड़ी कंपनियों वाले अपने घटिया माल का बढ़िया विज्ञापन करवाते हैं।जो खूबियाँ उनके माल में नहीं होतीं ,उनको हीरो- हीरोइनों को  मोटा  पैसा दे देकर झूठ कहलवाते हैं।उपभोक्ता भी हैं कैसे मूर्ख और नादान कि उनकी बातों में आ जाते हैं।यदि क्रीम लगाने से चमड़ी गोरी हो गई होती तो देश की सारी भैंसें गोरी चिट्टी गाय बन जातीं।पर आदमी है कि झूठ का दीवाना है। मैंने पहले ही कहा कि ये मिया मिट्ठुओं का जमाना है।


आप मेरी बात मानें। नेताओं की तरह दूसरों पर भरपूर कीचड़ उछालें।चलाते रहें अपनी मियाँ मिट्ठूपन की चालें।इस काम के लिए हो सके तो कुछ गुर्गे और चमचे भी पालें।फिर देखिए आपके कारनामे नहीं रहेंगे काले।अरे कुछ झूठ बोल कर ,झूठ में सच घोलकर, नाप तोलकर मियाँ मिट्ठू बने रहिए। आज के नेताओं से कुछ तो प्रेरणा लीजिए, कुछ सीखिए,मियाँ मिट्ठू अवश्य बने रहिए।


आप कहेंगे कि मियाँ मिट्ठू बनने के लिए हम क्या करें? बस झूठ की नाव में बैठ जाइए और अपनी नैया पार लगाइए।आपने देश और समाज के लिए क्या- क्या किया! इसी के गुण गाते रहिए ,दूसरों को नीचा दिखाइए और अपनी गुण- गाथा गाते रहिए।फिर क्या है नदी के बहाव में भी उल्टे बहिए।कोई क्या जाने कि आप कितने समर्पित हैं,समाज और देश हितार्थ संकल्पित हैं,देश की पीड़ा से आप कितने व्यथित हैं। यही सब कहिए,भले कुछ न किया हो। कुछ करिए भी मत। क्योंकि जिसे करना है ,स्वयं कर लेगा।आपको तो अपने प्रताप का झंडा ऊँचा उठाए रखना है।अखबार की सुर्खियां, सोशल मीडिया, मुखपोथी, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप सब पर छाए रहें।अपने मियाँ  मिठत्व का स्वाद बढ़ाते रहें। ये देश ऐसे मियाँ मिट्ठुओं को ही पसंद करता है। ऐसों पर मरता ही नहीं अपनी जान भी छिड़कता है।


शुभमस्तु !


25.05.2024●7.45आ०मा०

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पानी [कुंडलिया]

 240/2024

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

पानी - पानी  की  पड़ी,परित: प्रबल पुकार।

पानी  आँखों   का  मरा, नर  में नहीं शुमार।।

नर में  नहीं  शुमार,   भैंस   लोटे पोखर   में।

वैसा   ही   व्यवहार, उलीचे  जल  भू भर में।।

'शुभम्'  न  समझे बात,कहें तो मरती नानी।

छोड़ी नर  औकात, नहीं मिलता फिर पानी।।


                          -2-

मानव जीवन  के लिए,  पानी अति अनिवार्य।

बिना  सलिल सब  शून्य है,चले न कोई कार्य।।

चले   न   कोई   कार्य,  देह  में  सौ में   सत्तर।

पानी    ही   है  धार्य,  धरा   में  वह पिचहत्तर।

'शुभम्'    बहाए   खूब, बना  है  नर से  दानव।

मेघ   गए   हैं    ऊब,  बरसते   क्यों  हे  मानव??


                          -3-

पानी    के     पर्याय  हैं,   जीवन  अमृत   नीर।

जीव, जंतु, पादप, लता, सबकी जल तकदीर।।

सबकी   जल   तकदीर,अंबु  बिन हर  संरचना।

बनता   नहीं   शरीर,  ताप  से जलना  तचना।।

'शुभम्' पाँच में एक,तत्त्व जल क्रमिक कहानी।

क्षिति पावक नभ वायु,साथ में शीतल   पानी।।


                         -4-

पानी आँखों  की  हया,नित प्रति जाती सूख।

नर - नारी  कब   के  मरे, मरते पल्लव रूख।।

मरते    पल्लव   रूख, सूखते  सागर   सरिता।

क्या    पोखर  तालाब, शेष  रहने जलभरिता।।

'शुभम्'  दिखाए   आँख,पिता से खींचातानी।

मरा   आँख   का  नीर, पुत्र का सूखा   पानी।।


                          -5-

मोती  मानुस  चून  को,पानी अति अनिवार्य।

पानी बिना न जी सकें, करें न अपना कार्य।।

करें  न  अपना  कार्य,अंकुरित  पादप  होते।

बने  नहीं  आहार, कृषक  कब  दाना  बोते??

'शुभम्'  जेठ  का मास,धरा पानी बिन रोती।

स्वाति   बिंदु  के  बिना,नहीं  बनता  है  मोती।।


शुभमस्तु !


24.05.2024●1.00 प०मा०

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छिपकली -तंत्र [अतुकांतिका ]

 239/2024

            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सत्ता के लिए

छिपकलियों में

छिड़ गई है जंग,

पछाड़ने की लगी होड़

दिखलाने लगीं

नए - नए रंग,

शक्ति- प्रदर्शन के

नए -नए ढंग।


'ए मुषली!

तू बड़ी वैसी है,

मुझे नहीं खाने देती

खा जाती 

सब कीट पतंगे,

इसीलिए तो होते हैं

तेरे मेरे दंगे,

चल मक्खी मच्छरों की

आम सभा करवाते हैं,

चुनाव मतदान से हो

यही संविधान बनाते हैं।'


छिपकलियों के नेतृत्व में

एक आम सभा हुई,

लड़ें वे आपस में

यही बात

 सुनिश्चित की गई,

जो जीतेगी वही

छत - रानी बनेगी,

तीन साल तक

सत्ता उसके

 हाथ में रहेगी।


और क्या है 'शुभम्'

चुनाव हो हो रहा है,

उधर मतदाता मच्छर

तान चादर सो रहा है,

'अरे इस वैशाख जेठ की

लू में कौन वोट देने जाए!

जीतकर भी इन्हें 

हमें ही खाना है,

इसलिए निज हित में

इन्हें अपना 

डंडा पुजवाना है।'


और वे  आम चुनाव

लड़ रही हैं,

पोलिंग बूथ खाली पड़े हैं,

पोलिंग पार्टी 

कुर्सियों पर सो रही है।


शुभमस्तु !


23.05.2024●5.45प० मा०

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छिपकलियों में छिड़ी लड़ाई [बालगीत]

 238/2024

 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिपकलियों    में    छिड़ी  लड़ाई।

मोटी - मोटी         लड़ने      धाई।।


सभी  कह  रहीं    छत     है   मेरी।

बतला  तू     कैसे    छत      तेरी।।

सबने  अपनी      युक्ति     जताई।

छिपकलियों  में     छिड़ी   लड़ाई।


मक्खी     मच्छर  तू    खा    जाती।

मुझे  भयंकर     भूख       सताती।।

सबसे  पहले     मैं       थी    आई।

छिपकलियों  में     छिड़ी   लड़ाई।।


कीट  पतंगों   के     मत ले    लो।

फिर मस्ती से  छत  तर    खेलो।।

जिसने  लड़      कुर्सी   हथियाई।

छिपकलियों  में    छिड़ी  लड़ाई।।


छत   पर     प्रजातंत्र    ही   होगा।

जो   जीते,      पहने   नृप  - चोगा।।

नहीं        चलेगी          तानाशाई।।

छिपकलियों  में     छिड़ी   लड़ाई।।


आगे      पीछे      दौड़    लगाती।

लड़ने लगीं    सभी   बल  खाती।।

'शुभम्'  करें    कनवेसिंग   भाई।

छिपकलियों  में     छिड़ी  लड़ाई।।



शुभमस्तु !


23.05.2024●4.30प०मा०

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देखो छत की ओर [ गीतिका ]

 237/2024

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखो    छत  की  ओर, छिपकलियों की   जंग।

ज्यों  गिरगिट   चितचोर ,  नित्य बदलता   रंग।।


विष    का    तन   भंडार,   देख   जुगुप्सा   देह,

 भोलेपन    की   धार,   छुआ  न जाए     अंग।


छत    पर    करना  राज,   यही   एक   उद्देश्य,

बँधे     शीश    पर    ताज, तभी   नहाएँ   गंग।


चिकने     मुखड़े    पीन,  लगा  मुखौटे     खूब,

साठा     बने     नवीन,   चर्म    चमक   अभ्यंग।


लगी    हुई     है    होड़,   करें  धरा पर     पात,

करे    सियासत    मोड़,  देख- देख जन     दंग।


नीति   नहीं    कानून,   केवल    पंक -  उछाल,

सब    हैं    अफलातून,  बाहर  भीतर       नंग।


'शुभम् '  बढ़ा     उत्पात, राजनीति का    मूल,

छिनते    नारि     दुकूल,बने मनुज अब   संग।


शुभमस्तु !


23.05.2024● 12.45 प०मा०

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गृहगोधा की जंग [ दोहा ]

 236/2024

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिपकलियाँ  पाली  नहीं,जातीं  छत में  मित्र।

पता न कब आतीं सभी,दिखला चटुल चरित्र।।

नर -नारी  घर  में बसें,छिपकलियाँ भी  साथ।

स्वतः कहाँ  से आ गईं,कभी न आतीं  हाथ।।


छिपकलियाँ लड़तीं सभी,छत पर शासन  हेतु।

फहराना  वे    चाहतीं, अपना  काला   केतु।।

लड़-भिड़   पीछा कर  रहीं,दौड़ लगाएँ  नित्य।

छिपकलियाँ छत में बसीं,बतलातीं औचित्य।।


छत  की  रानी  मैं  बनूँ, उनका यही विवाद।

छिपकलियाँ  दुम  खीँचतीं,मच्छर देते  दाद।।

जंग  छिड़ी  घनघोर  ये,छिपकलियों की तेज।

कीड़े   और   पतंग  में ,खबर सनसनीखेज।।


कौन  गिरा  पाए  किसे,बचा स्वयं की लाज।

छिपकलियाँ  निर्भय  लड़ें,देखो ऊपर  आज।।

झींगुर    मच्छर   के लिए,गरम मसाला  खूब।

जंग   छिपकली से मिला,कौन सके अब ऊब।।


सबके  बड़े  कयास  हैं,करवट हो क्या   ऊँट?

कौन  छिपकली  जीतती, निकले बगबग सूट।।

तू   मुषली   गन्दी  बुरी, मैं  ही  निर्मल   साफ।

आ  जाने  दे  जीतकर , तुझे न करना   माफ।।


वाणी करें भविष्य  की,  झींगुर दास अभीत।

छिपकलियों की जंग में,नीति सभी विपरीत।।

गृहगोधा  की  जंग में,  छत की क्षति अपार।

राजनीति  के  युद्ध का,  मत  समझें आधार।।



शुभमस्तु!


23.05.2024●11.45आ०मा०

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गुरुवार, 23 मई 2024

छिपकली - जंग [ व्यंग्य

235/2024 

 

 ] ©व्यंग्यकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

       छिपकलियों की जंग जारी है।जोर- शोर से जारी है। जोश - खरोश के साथ जारी है।जंग के रंग को देख रही दुनिया सारी है।सबके मन में एक जिज्ञासा एक उत्साह तारी है। आप ये भी न समझें कि यह कोई महामारी है।हाँ,इतना अवश्य है कि यह जंग सभी पर भारी है।ये तो बाद में ही पता चलेगा कि इसका परिणाम मीठा है कि खारी है। बस इतना समझ लीजिए कि जंग जारी है।

      कोई छिपकली अकेली जंग नहीं लड़ सकती।इसलिए स्वाभाविक है कि लड़ने वाली छिपकलियाँ एक से अधिक ही होंगीं।निश्चित रूप से ऐसा है भी कि वे एकाधिक ही हैं।अब बात लड़ने के उद्देश्य की आती है कि अंततः कोई लड़ता क्यों है?अपने अस्तित्व की रक्षा भी जंग का एक 'लोकप्रिय' उद्देश्य हो सकता है। इसके अलावा सत्ता हथियाना भी एक विशेष उद्देश्य है।अपने अहंकार की तुष्टि के लिए लहू वृष्टि एक अन्य जंगोद्धेश्य है।अहंकार से अहंकार टकराता है,तो खास तो खास बना रहता है ,आम चुस जाता है। आम तो है ही चुसने चूसे जाने के लिए।

       छिपकलियों का आहार मक्खी, मच्छर , कीट और पतंगे बड़े ही प्रमुदित हैं;छिपकली -जंग में ही उनके भाग्य उदित हैं।जंग जितनी लम्बी चले ,इसी चिंतन में वे खिलखिलाते नित हैं। आप यह भलीभाँति जानते हैं,कि छिपकली कभी नीचे रहना पसंद नहीं करती। उसे हमेशा ऊँचाइयां ही पसंद हैं।ऊंचाइयां भी कोई ऐसी वैसी नहीं।इसीलिए छिपकलियों का छतों से विशेष संबंध है।छतों के ऊपर नहीं, छतों के नीचे की सतह पर ही उनका प्रिय आवास है।ये अलग बात है कि विदेश यात्रा बतौर वे धरती पर भी चरण धर लेती हैं।जरा सी जन- पद आहट पाते ही पुनः छत पर चढ़ लेती हैं। 

     लगता है छिपकली-जंग का उद्देश्य छत की रानी बनने का है।इसीलिए वे एक दूसरी को भूमिसात कर अपने सिर पर ताज पहनना चाहती हैं।जब दो लड़ते -झगड़ते हैं ,तो तीसरा तमाशा देखता है। इस समय भी यही हो रहा है।छिपकलियाँ तमाशा हैं और मक्खी मच्छर तमाशा देख रहे हैं।एक दूसरी की पूँछ पकड़ कर घसीटी -खींची जा रही है।बस उसे नीचा दिखाना है।नीचे गिराना है।अपनी जय जयकार कराना है। कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि दो की लड़ाई में बाजी तीसरा मार ले जाता है।सभी इसी ओर नजर गड़ाए बैठे हैं कि देखें ऊँट किस करवट बैठता है। और वे हैं कि अपने मन की सारी की सारी कीचड़ निकाल कर बाहर किए दे रही हैं।कहीं ऐसा न हो कि आने वाली होली पर सफाई करने के लिए नाले- नालियों में भी कीचड़ न बचे। हाँ, इतना अवश्य है कि सारी छिपकलियाँ निर्मल मन निर्मल तन बगुले जैसे वसन और हम्माम में नगन हो जाएंगी। 

     आइए छिपकली - जंग के ऊँट की ओर नजर गड़ाते हैं कि हमारे बिना जाने वह कोई करवट न ले ले।करवट लेगा तो उठ कर खड़ा भी हो सकता है।यदि बैठा का बैठा ही रह गया तो जंग से लाभ ही क्या हुआ?हालांकि कोई जंग कभी किसी को लाभ देने के लिए नहीं लड़ी जाती। वह तो केवल अपने और मात्र अपने ही लाभ के लिए ,अपने अहं की तुष्टि के लिए, सामने वाले के विनाश के लिए और स्व विकास के लिए लड़ी जाती है।हम तो भैये तमाशबीन हैं, तमाशा देख रहे हैं।बस कोई भी छिपकली जीते, हमें तो तालियाँ ही बजानी है।क्योंकि इन छिपकलियों ने हमें तो बस ताली बजाने वाला ही समझा है।ताली बजाने लायक ही छोड़ा है।क्योंकि इनकी नजर में बाकी सब गधे खच्चर हैं यही एक  'श्वेतवर्ण'  घोड़ा हैं। 

 शुभमस्तु ! 

 23.05.2024●10.00आ०मा० 

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छिपकलियों की जंग [ गीत ]

 234/2024

         

©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छत   तल दौड़ी छिपकलियों की जंग  तेज है।

कब धरती  पर  आ टपकें सनसनीखेज  है।।


मैं    ही   तो छत  की  रानी हूँ यह विवाद  है।

गिरना  होगा   तुझको   नीचे  मूक नाद  है।।

ऊँचा   मेरा  सिंहासन  शुभ सजी सेज   है।

छत तल दौड़ी छिपकलियों की जंग तेज  है।।


पूँछ   पकड़कर  खींच   रही  है   जो मोटी  है।

बेचारी   बन   चीख    रही   है  जो छोटी   है।।

खतरा  है  दोनों   गिर   जाएँ   सड़ी लेज   है।

छत  तल दौड़ी  छिपकलियों की जंग  तेज है।।


दोनों   के   झगड़े   को  तीजी  देख  रही    है।

दोनों    ही     गिरने    वाली   अनुमान यही है।।

मौके   की   उसको   तलाश   निश्चय सहेज है।

छत  तल  दौड़ी छिपकलियों   की जंग तेज  है।।


झींगुर  मच्छर    नाच   रहे  क्या  होने    वाला।

छिपकलियों   की   महाजंग  है गरम मसाला।।

लड़ने      वाले   बने  तमाशा   बढ़ा  क्रेज   है।

छत   तल दौड़ी  छिपकलियों की जंग तेज  है।।


शुभमस्तु !


23.05.2024●5.15आ०मा०

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धरती धारक धर्म की [ दोहा ]

233/2024

         

          [नीर,नदी,धरती,बिवाई,ताल]

                       सब में एक

निर्मल   गंगा   में  बहे, अविरल शीतल  नीर।

बुझे  पिपासा जीव की,हो नहान सरि -  तीर।।

मिलन   तुम्हारा  शोभने, उर को शीतल नीर।

महक उठा सद्गन्ध-सा,कण-कण बना  उशीर।।


नदी   नहाई     धूप  में,  निर्मल करती   नीर।

ताप  धरा  का  हर  रही,तृण भर नहीं अधीर।।

नदी-नदी  सब  ही  कहें, देती वह दिन  - रात।

कलकल कर किल्लोल कर,करती है ज्यों बात।।


पाले    अपने    क्रोड़   में,धरती माँ   संसार।

मौन   रहे  सह    कष्ट  भी, देती  दान अपार।।

धरती धारक  धर्म  की, तल में मात्र  सुधर्म।

सबको ही  सुखदायिनी,  करे  नेक  सत्कर्म।।


प्यासी  धरती   रो  रही, फटीं बिवाई पाँव।

जा  खेतों  में  देख  लो,बिलख   रहे हैं  गाँव।

फ़टे बिवाई पाँव  की,  सबको होती   पीर।

नहीं   और  की  जानते,  बड़े -बड़े रणवीर।।


भीषण  तप्त  निदाघ  है,सूख  गए  हैं  ताल ।

जीव - जंतु  प्यासे  सभी,बिगड़ गया है  हाल।।

पड़ीं  दरारें  ताल में,  तड़प मरीं जल - मीन।

दादुर  तल में  जा  घुसे, बजा  चैन की   बीन।।


                 एक में सब

नदी  ताल  धरती सभी,धरें न मन  में  धीर।

फटी  बिवाई  पाँव में, वांछित निर्मल  नीर।।


शुभमस्तु !

22.05.2024● 8.00 आ०मा०

शुभद अल्पना घर में [ गीत ]

 232/2024

         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सुख समृद्धि

धन-धान्य बढ़ाती

शुभद अल्पना घर में।


आता पर्व

दिवाली का जब

लेतीं  बना  रँगोली।

धर्म - कार्य

पूजा व्रत में भी

सजती रही अमोली।।


कमल पुष्प

मोरों से सजती

सुखद अल्पना दर में।


माँ बहनों

ने लिया हाथ में

गृह - सज्जा  अधिकार।

अला-बला से

बचा रहे घर

दोषों  का   प्रतिकार।।


चावल रोली

आटा बालू

से सज भारत भर में।


देवी - देव

ज्यामितिक आकृति

हल्दी   या   सिंदूर।

स्वस्तिक लक्ष्मी -

 चरण सजाते

नया  सृजन  भरपूर।।


कल इसको

धुल जाना ही है

भाव यही नश्वर में।


शुभमस्तु !


21.05.2024●7.15 आ०मा०

                  ●●●

नाग नथैया गिरिवर धारी [ गीतिका ]

 231/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लगें       रंग    के     काले     हैं,

सबके    मुरली       वाले      हैं।।


मातु     देवकी     जननी     के,

नटखट     पुत्र     निराले     हैं।।


कारागृह   में      जन्म     हुआ,

लगे  जहाँ    पर    ताले      हैं।।


चलें  सखाओं के सँग दिन भर,

पड़ें  न    पग     में   छाले    हैं।।


नाग    नथैया     गिरिवर  धारी,

लगते       भोले -  भाले      हैं।।


लूट  -  लूट   दधि माखन  खाते,

माँ      यशुदा    ने    पाले    हैं।।


वन -  वन जाते    गौचारण  को,

विपदाओं      ने      ढाले      हैं।।


'शुभम्' श्याम राधा  के प्रिय वर,

कंस    आदि   के     लाले    हैं।।


शुभमस्तु !


20.05.2024●2.15प०मा०

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सबके मुरली वाले हैं [ सजल ]

 230/2024

            

सामांत    :आले

पदांत      : हैं

मात्राभार  : 14.

मात्रा पतन :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लगें      रंग    के      काले     हैं।

सबके    मुरली      वाले      हैं।।


मातु     देवकी     जननी     के।

नटखट     पुत्र     निराले     हैं।।


कारागृह   में      जन्म     हुआ।

लगे  जहाँ    पर    ताले      हैं।।


चलें  सखाओं के सँग दिन भर।

पड़ें  न    पग     में   छाले    हैं।।


नाग    नथैया     गिरिवर  धारी।

लगते       भोले -  भाले      हैं।।


लूट  -  लूट   दधि माखन खाते।

माँ      यशुदा    ने    पाले    हैं।।


वन -  वन जाते  गौचारण  को।

विपदाओं      ने      ढाले      हैं।।


'शुभम्' श्याम राधा  के प्रिय वर।

कंस    आदि   के     लाले    हैं।।


शुभमस्तु !


20.05.2024●2.15प०मा०

                    ●●●

परहित [ कुंडलिया ]

 229/2024

                     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                    

                              -1-

बातें   परहित  की   करें,  भरते अपने   पेट।

नेता  अपने   देश    के,  बना  देश को   चेट।।

बना   देश   को   चेट, भरी  खुदगर्जी   सारी।

सत   पथ  का  आखेट,  यही उनकी बीमारी।।

'शुभम्' सत्य  यह  तथ्य,अलग हैं दिन से रातें।

मुख में  बसा   असत्य,झूठ सब इनकी  बातें।।


                              -2-

अपना -  अपना   पेट  तो,  भर  लेते हैं     श्वान।

जीता   परहित   के लिए, यही मनुज  पहचान।।

यही   मनुज   पहचान,  परिग्रह  से है    बचना।

सुखमय   हो   संसार,  श्रेष्ठ   हो  भू की   रचना।।

देने  से   शुभ   दान, 'शुभम्'   शुचि देखे  सपना।

सबका   हो  कल्याण,स्वर्ग सम घर हो   अपना।।


                             -3-

करनी    परहित  की भली, मिले शांति   संतोष।

तन -  मन   अपने  वचन से, करें न कोई   रोष।।

करें   न   कोई    रोष,   पेड़    फल लकड़ी   देते।

देकर   शीतल   छाँव,  कष्ट   तन का हर     लेते।।

'शुभम्'  पत्र  दल   मूल, सभी  की महिमा  बरनी।

सब   परहित  के  काज,रखें पावन निज  करनी।।


                           -4-

कहते    सब  नदिया    उसे, आजीवन दे    नीर।

प्यास  बुझाए  जीव की, हरती  तन- मन  पीर।।

हरती   तन - मन  पीर, धरा का सिंचन   करती।

खिलते   तरु  पर  फूल, फलों से झोली  भरती।।

'शुभम्'   नदी  का  दान,सुखों के सागर   बहते।

धरती  परहित  रूप ,   किंतु जन नदिया  कहते।।


                           -5-

मानव  ने  समझा  नहीं,परहित का कुछ  मोल।

स्वार्थलिप्त  जीता  रहा, अशुभ  कर्म  अनतोल।।

अशुभ कर्म  अनतोल,किया करता नर   जीभर।

करे   वचन  में   झोल, नशे   की हाला   पीकर।।

'शुभम्' न  लेता  सीख,बना है निशिदिन दानव।

सूरज  निशिकर नीर, सिखाते  नित  ही  मानव।।


शुभमस्तु !

17.05.2024●7.00आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...