मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

 तुम डाल-डाल हम मालामाल!🐒 

 [ व्यंग्य ]

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 ✍️ व्यंग्यकार ©

 🐒 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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              अब धरती पर रहना अभिजात्य मानव का काम नहीं रह गया है।वह भूल गया है कि इस धरती माँ की गोद में ही उसने ये मानव यौनि धारण की है। वह ऊपर और ऊपर और उससे भी ऊपर उड़ना चाहता है। लगता है कि उसका धरती पर रहना उसकी दृष्टि में मानव का काम नहीं है। ये तो केवल और केवल कीड़े - मकोड़ों, पशु - पक्षियों के रहने की जगह भर है। उसे तो बस हवा में उड़ना और आकाश में रहना है।इसलिए उसे हवाई काम करना ही प्रिय है। 

              आज का 'प्रतियोगी युग ' उसे मानव शरीर मे ही मानव से इतर जीव बनाए दे रहा है। देखने पर तो वह मानव ही प्रतीत होता है ,किन्तु उसकी आंतरिक दृष्टि और भावना उसे कुछ अलग ही प्रकार से सोचने और बनने के लिए प्रेरित करती प्रतीत हो रही है। मानव ,हर अगले मानव का , चाहे वह उसका मित्र हो ,पड़ौसी हो , शत्रु हो ,रिश्तेदार हो ; प्रतिद्वंद्वी ही बनाने को उद्वेलित कर रही है। सात्विक प्रतिस्पर्धा से इतर वह तामसिक प्रतिद्वंद्वी ही बन गया है। उसे नीचा दिखाने के लिए कहीं भी वह कम नहीं रहना चाहता । यदि पड़ौसी का शगुन खराब करना हो ,तो भी वह अपनी नाक कटवाने के लिए सहर्ष तैयार रहता है।अपनी नाक कटती हो तो कट जाय ,पर उसका शगुन तो बिगड़े। यह 'उच्च मानसिकता' उसे कुछ भी करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।उसे हर हाल में अपने को उससे श्रेष्ठतर सिद्ध करके जो रहना है। इस काम के लिए उसे कितने ही कुत्सित साधन अपनाने पड़ें , उसे सहज औऱ सहर्ष स्वीकार्य हैं। उसका एक ही परम लक्ष्य है अपने को उससे हर प्रकार ऊँचा सिद्ध करना। 

               उसे नहीं पता कि बुरे साधनों से पाई गई उपलब्धि बुरी ही होती है। जिसका फल घड़े को पूरी तरह भरने औऱ बीच चौराहे पर फूटने पर ही प्राप्त होता है औऱ उसे नंगी आँखों से सारा जमाना देखता है । फिर तो सब यही सोचते औऱ कहते हुए ही दिखाई देते हैं कि हम तो गुबरैला जी को बहुत बढ़िया औऱ विद्वान व्यक्ति समझते थे ,पर अब हमें अब अपनी समझदानी बदलनी ही पड़ेगी।

            दूसरा चाहे डाल- डाल पर कूदन - क्रिया करे , चाहे पात - पात पर लात खाए, मात खाए, पर हम हर हाल में माल खाएँ,माल बनाएं ,माल खूंदें, माल रौंदें, पर दूसरा डालों के जाल में ही भटकता रहे। माल-माल मेरा ,डाल - डाल तेरा। तेरा डाल पर बसेरा।हर तरह से लाभ हो मेरा। बस यही नीति औऱ नीयत , भले कोई कहे इसे बदनीयत , बस यही तो है उनकी सीरत । यहीं पर है उनका प्रयागराज तीरथ। उड़ने लगा है अब आसमान में अपना रथ। नेता-पुत्र भी टॉल -टैक्स नहीं चुकाता। उलटा - टॉल अधिकारी को धमकाता। उलटा चोर कोतवाल को डाँटता। साहित्य की किताब में एक और कहावत बाँटता।अपनी अभिजात्यता में सभी को कीट-पतंगा समझता।

             दूसरे को हरी -हरी डालों पर भटकाने के 'पवित्र उद्देश्य' से उसे दिग्भ्रमित करने से भी नहीं चूकता । वरन इसे वह अपना परम सौभाग्य समझता है कि यह सुअवसर उसे प्राप्त हुआ । यदि यह सुअवसर उसे न मिलता तो कैसे वह उसे भटकाने का श्रेय ले पाता।अपनी 'उच्च उपलब्धि' की नींव दूसरे के पतन के पटल पर जो रखी हुई है।किसी को उचित सलाह देना भी उसके लिए अपराध है।दूसरे का पतन उसकी प्रसन्नता का विशेष कारण है।जब हाथ की सभी अँगुलियां भी समान नहीं हैं ,तो आदमी आदमी में समानता की बात सोचना एक अज्ञानता पूर्ण बात होगी। सामने वाले को ऊँचा मत उठने दो , तभी तुम्हारे अधरों की स्मिति की लम्बाई चौड़ाई में अभिवृद्धि हो सकती है। यही मानव की प्रगति का सूचक है। यही कारण है कि पड़ौसी पड़ौसी का, मित्र मित्र का , सम्बन्धी सम्बन्धी का , यहाँ तक कि देश देश का प्रत्यक्ष किंवा परोक्ष प्रतिद्वंद्वी बना हुआ है। कभी - कभी खुलकर शत्रु बना हुआ है। 

             आज दुनिया भले बारूद के ढेर पर खर्राटे ले रही हो। पर उस बारूद का भी बाप कोरोना उसे आँखें दिखाता हुआ मानो यही कह रहा है कि 'चुपचाप बैठा रह उस्ताद! तेरे औऱ मेरे काम करने का ढंग भले ही अलग -अलग हो ,पर उद्देश्य तो एक ही है: इस आदमी के अहंकार का भस्मीकरण, सो मैं किये दे रहा हूँ। तू आराम से बैठ।देख इसकी करनी की सजा मैं किस तरह से दे रहा हूँ कि आज सारे धरती लोक में त्राहि माम! त्राहि माम!! मची हुई है। जब तक आदमी अपने गरूर के महल से नीचे नहीं उतरेगा , मुझे ऐसा करना ही होगा। देखा न ! कैसे इसका ज्ञान, विज्ञान, धर्म , अध्यात्म, ज्योतिष, शास्त्र :- सब एक कौने में उठाकर धर दिए हैं मैंने । वह अब किसी अनहौनी की प्रत्याशा में हाथ पर हाथ रखे बैठा है कि अब कोई अवतार पुरुष आएगा, और मुझे छूमंतर कर देगा। तभी तो मैं कहता हूँ कि तुम डाल-डाल हम मालामाल।' 

  🪴 शुभमस्तु ! 

 २०.०४.२०२१◆१.५०पतनम मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🌴


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बहर:  2122  1212   22

काफ़िया: अर।

रदीफ़:  नहीं देखा।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आग     देखी       कहर    नहीं   देखा।

नाग     देखा      ज़हर      नहीं  देखा।।


बोल   ही   बोल    में   लुभाता     जो,

ख़्वाब  में    वह     बशर  नहीं  देखा।


एक    नेता      कभी    मसीहा  क्या ?   

झाम      बोता      इधर  नहीं  देखा?


घोष      गूँजा      उसे     सभी  मानें,

लोग     सुनते    असर    नहीं   देखा।


दोष      देना        भला    नहीं   होता,

पापियों    को    अमर      नहीं    देखा।


आ      चुके      जो     चले    गए  सारे,

आप     अपना      चँवर   नहीं   देखा।


झूठ       आता      कभी     बना   नेता ,

भीत      ऐसा      कहर     नहीं    देखा।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०४.२०२१◆४.३० पतनम मार्तण्डस्य।


यही कहती माँ धरती🌏 [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

🌎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                       -1-

धरती के  बदहाल    का, कैसे करें    बखान।

त्राहि-त्राहि मानव करे,पीड़ित सकल जहान।

पीड़ित सकल जहान,उड़ी हर बदन   हवाई।

कोरोना  का  रोग,  नहीं  कुछ बनी   दवाई।।

'शुभम' बढ़  रहा  पाप,पाप से जनता मरती।

कैसे  मिले  निजात ,बोझ से मरती  धरती।।


                       -2-

धरती  पर  निज कर्म का, भोक्ता है इंसान।

दोष अन्य पर मढ़ रहा, चढ़ा नित्य परवान।।

चढ़ा  नित्य  परवान,बीज शूलों के     बोता।

है  फूलों  की आस,नहीं मिलने पर     रोता।।

अहंकार   में  चूर ,  बुद्धि  घूरे पर    चरती।

गढ़ा   खोदता रोज़,मौन मरती  माँ  धरती।।


                       -3-

धरती से दोहन किया, जल जीवन का प्राण।

मूढ़  बुद्धि  जाना नहीं,माँ करती   है त्राण।।

माँ  करती  है  त्राण, उसी में विष  बोता है।

अधिक उपज के लोभ,सुखी निद्रा सोता है।

'शुभम'सत्य है बात,तोंद नर की कब भरती?

विष का विष उत्पाद,दिया करती माँ धरती।।


                       -4-

धरती पर अब लौट आ,ए!जड़बुद्धि अजान।

बहुत हवा में उड़ लिया,हुआ न  कोई भान।।

हुआ न  कोई  भान, तामसी जीवन  जीता।

खाता  मूसक कीट,लगाता स्वयं     पलीता।।

'शुभम' न छोड़े साँप,गधे बिल्ली नित मरती।

चमगादड़ का सूप, पिया मरती माँ  धरती।।


                       -5-

धरती  धारण  कर  रही,मानव तेरा    भार।

सता - सता कर मारता,करता नित्य प्रहार।।

करता  नित्य प्रहार,मौन माँ धरती   सहती।

होते भीषण घाव,नहीं मुख से कुछ कहती।।

'शुभम'सुधर जाआज,छोड़ दे उसको परती।

पर मत बो विष शूल,यही कहती माँ धरती।।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०४.२०२१◆११.००आरोहणम मार्तण्डस्य।



सोमवार, 19 अप्रैल 2021

दुःखों में भगवान 🔔 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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दुःखों  में  भगवान   याद तुमको  आते   हैं।

करें नित्य प्रभुभक्ति तुम्हें हम समझाते   हैं।।


सुख में  भूला मनुज आज वह  इतराता है।

अपनी  करनी नहीं देखता बल   खाता  है।।

अहंकार में  फूल  लोग उड़ - उड़ जाते   हैं।

दुःखों  में भगवान  याद तुमको  आते   हैं।।


जिसने  भूला  राम  काम ही उसको   भाता।

रँगता अपना   वेश केश भी खूब   बढ़ाता।।

आडंबर की  भक्ति   मनुज ये दिखलाते   हैं।

दुःखों   में  भगवान याद तुमको  आते   हैं।।


लगा शीश पर तिलक किलकता इठलाता है।

मुँह से कहता राम छिपा छुरियाँ  लाता  है।।

स्वयं   बने  भगवान  भस्म को   बँटवाते  हैं।

दुःखों   में भगवान याद तुमको  आते    हैं।।


बढ़ता  पातक -भार  राम बनते  अवतारी।

कभी कृष्ण, वाराह कभी वामन तन धारी।।

बचा  भक्त  प्रह्लाद  सिंह नर बन  जाते  हैं।

दुःखों  में  भगवान याद तुमको  आते  हैं।।


रे  मानव! मतिअन्ध समझता नहीं   इशारा।

कोरोना का अस्त्र फेंककर प्रभु ने   मारा।।

जब  पड़ती  है मार मनुज तब घबराते   हैं।

दुःखों में  भगवान  याद तुमको आते   हैं ।।


जैसा बोता बीज  वही फल तरु पर आता।

पक जाता फ़ल पूर्ण वपन कर्ता ही खाता।।

भरता   पातक - पिंड  फूटता बिलखाते  हैं।

दुःखों  में  भगवान याद तुमको  आते  हैं।।


किया अगर अपराध सजा तो पानी होगी।

'शुभम' न होगी क्षमा बनेगा इंसाँ   रोगी।

प्रभु से  नहीं  अदृष्ट  कृपा  प्रभु बरसाते हैं।

दुःखों में  भगवान  याद तुमको  आते हैं।।


🪴 शुभमस्तु !


१९.०४.२०२१◆२.३० पतनम मार्तण्डस्य।


कोई तो इसको समझाओ [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कोई  तो   इसको  समझाओ।

अपने घर को वापस जाओ।।


चीन  देश से आ जग  छाया।

तांडव भीषण नित्य मचाया।।

जाए फ़िर  से  चीन  बताओ।

कोई तो  इसको  समझाओ।।


पैर न हाथ  नहीं मुख काना।

करता बुरे काम नित नाना।।

रहो वुहान  वहीं  जा खाओ।

कोई तो  इसको समझाओ।।


रूप  बदलकर  आ जाता है।

छलिया  छ्द्म वेश  पाता है।।

कहें इसे अब  मत  इतराओ।

कोई तो  इसको समझाओ।।


अवसरवादी     हमें   डराता।

आदत से क्यों बाज न आता!

कोरोना झट चीन   सिधाओ।

कोई तो  इसको समझाओ।।


इच्छा शक्ति  बढ़ाएँ    क्षमता।

मानव को हितकारी शुभता।।

अपने को कमतर मत पाओ।

कोई तो इसको  समझाओ।।


🪴 शुभमस्तु !


१९.०४.२०२१◆११.१५आरोहणम मार्तण्डस्य।

रविवार, 18 अप्रैल 2021

लोकतंत्र का मखौल 🚨 [ दोहा -ग़ज़ल ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🚘 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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प्रत्याशी   घर  बैठकर, मँगवाती  हैं   वोट।

पति,देवर नित जा रहे,रख पत्नी को ओट।।


जनता ने देखी नहीं, जिसकी सूरत  आज,

पति,प्रधान के खा रहे,चिलगोजा अखरोट।


ख़ुद प्रधान के नाम के,'दसखत'  करता नाथ,

मनमाने   दरबार   में, छाप  रहे     हैं   नोट।


जनपदअधिकारी करें,जब बैठक निज हाल

सीना  ताने    बैठते,  पति जी पहने   कोट।


पूछ  रहे  पतिदेव से, क्या तुम हो  परधान?

ममता जी तुमसे कहें,मत मुस्काओ होट?


परदे में परधान जी,बाहर 'पति  परधान',

चूल्हे  पर  बैठी  हुईं, बना  रही  हैं  रोट।


लोकतंत्र  का  देख लें , कैसा बना  मखौल,

नोट  कमाने  के लिए ,लगा रहे  हैं  चोट।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०४.२०२१◆७.००पतनम मार्तण्डस्य।


घूँघट में ' परधान ' [ दोहा - ग़ज़ल ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पर धन पर 'पर धान' का, सजता है दरबार।

बालू  से   सड़कें   बना, होती राम   जुहार।।


मतमंगा  मत  माँगता,  छू जनता  के  पैर,

जीत नाचता पी सुरा, डलवा कर  गलहार।


दावत   मुर्गा माँस की,बोतल के   सँग नाच,

नियम  धरे हैं  ताक पर,नहीं शेष  आचार।।


कितने  पति परधान के,समझ न आए बात!

यह 'प्रधानपति 'हैं अगर,क्या हैं वे दो-चार?


धन ऊपर से जो मिले, उसका मालिक एक,

होता  बंदर  - बाँट  जब, बेचारा    लाचार।


पढ़ी  न अक्षर  एक  भी,घूँघट की    सरकार,

छपा  अँगूठा वाम कर,चलता पति - दरबार।


'शुभम'ग्राम-सरकार का,मायापति  परधान,

घूँघट  में  बैठी  सजी, डाल स्वर्ण   का  हार।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०४.२०२१◆४.१५पतनम मार्तण्डस्य।


ग़ज़ल 🌴

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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भूलों  का  पछतावा  कर  ले।

बात सीख की मन में धर ले।।


बोता  कीकर   बीज  रोज़  तू,

खारों से निज  दामन  भर ले।


करनी  का फ़ल  मिले ज़रूरी,

वैतरणी   के    पार   उतर ले।


अहंकार  सिर  पर सवार   है,

इसकी भी तो खोज खबर ले।


अपना   दोष  और  पर  टाले,

ये घर  छोड़   दूसरा   घर  ले।


पानी  में  नित   दूध  मिलाता,

अब पानी से ही पेट न भरले?


छलिया,रिश्वतखोर, चोर  नर,

घूरे पर चल  घास न   चर ले?


🪴 शुभमस्तु !


१८.०४.२०२१◆११.३०आरोहणम मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🌳🌳

  

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आदमी की छाँव से बचने लगा  है आदमी।

आदमी को देखकर छिपने लगा है आदमी।।


आँख से दिखता नहीं महसूस भी होता नहीं,

क्या बला यों आग से तपने लगा है आदमी


मूँ दिखा पाने केलायक रह न पाया शख्स ये

चश्म दो अपने झुका झिपने लगा है आदमी।


हाथ धो पीछे पड़ा आतंक का डंडा लिए,

हाथनिज धोता हुआ कंपने लगा है आदमी।


झील सागर पर्वतों की लेश भी बाधा नहीं,

हहर  हाहाकार  में खपने लगा है  आदमी।


 यों कभी नज़रें झुकाए निज गरेबाँ झाँक ले,

आसन्न अपनी मौत से डरने लगा है आदमी।


'शुभं'अपनी गलतियाँ वह मानता तौहीन है,

सबक वह लेता नहीं मरने लगा है आदमी।


🪴 शुभमस्तु 


१८.०४.२०२१◆११.१५

आरोहणम मार्तण्डस्य।

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

न देश - भाव में पगे 🇮🇳 [ अनंग शेखर ]

 

विधान:१.चार चरण।

          २.दो चरण समतुकांत।

                ३.लघु गुरु की १६ आवृत्ति

 ४.१२ पर यति।

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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चलो चलें बढ़े चलें, सु -काज ही सदा फलें,

रुकें नहीं झुकें नहीं,निराश भाव क्यों जगें।

न राह ही कुराह हो,अमेल की न  चाह  हो,

कहें  सही सुनें सही,सभी कहीं  शुभं  लगे।।


पिता सदा सुपूज्य हों,सुमात भी सुसेव्य हों,

न मान भूमि पै  कहीं,यही यहाँ  शिवं सगे।

सुवेश  देह    धारते,  सुवेश मान      मारते।

विभा न प्यार  सी बही, न देश भाव में पगे।।


🪴 शुभमस्तु !


१७.०४.२०२१◆१२.१५पतनम मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

 लोटा - पुराण ' 🍃

 [ व्यंग्य ] 

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 ✍️ लेखक © 

 🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                    हम सभी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि लोटा तो लोटा ही है।यदि लोटे को परिभाषित किया जाए तो 'लोटा वही है जिसे हर दिशा में लोटने की सुविधा प्राप्त हो।' लोटा अपने रंग ,रूप ,आकार और प्रकार में अन्य भाण्डों से कुछ इतर और भिन्न ही होता है।परंतु एक समानता सभी लोटों में समान रूप से पाई जाती है,वह है उसके हर एक दिशा में लोट पाने और पुनः उसी रूप में जम जाने का गुण। 


          लोटे की विविध रूपिणी विशेषताओं का यदि सूक्ष्म अध्ययन किया जाए तो वह बहु आयामीय होता है।वह प्रायः गोल मटोल औऱ सदैव सुडौल ही होता है। उसका ऊपर का मुँह सदा खुला रहता है। उसमें नीचे कोई मुँह नहीं होता। क्योंकि यदि ऐसा होगा तो वह अपने भीतर जिस अपार क्षमता का धारक और वाहक होता है ,वह समाप्त ही हो जाएगी। इसलिए यह सिद्धांत सर्वमान्य औऱ सर्व स्वीकार्य है कि लोटे का मुँह सदा खुला रहता है। जब उसका मुँह सदैव खुला रहेगा तो यह भी स्वयं सिद्ध है कि उसमें कोई भी चीज कभी भी डाली जा सकती है। अर्थात वह रात -दिन,सुबह-शाम ,अँधेरे-उजाले कभी भी कुछ भी ग्रहण कर लेने की असीम क्षमता से युक्त होता है। 

    

          इस ढक्कन रहित लोटे की देह सदैव चिकनी रहती है।कब कहाँ फिसल जाए यह प्राकृतिक सुविधा उसे जन्म से ही प्राप्त है।वह अपने को इस प्रकार सजा - संवार कर रखता है कि कोई भी उस पर फिसले तो उसे कभी भी कोई आपत्ति नहीं है ,इंकार नहीं है।लोटे पर फिसलने वाला सदैव उसके मुँह के अंदर होता हुआ उसके असीम गहराई से युक्त उदर में समा जाता है। जब उदर की बात चली है ,तो यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना भी उचित प्रतीत होता है कि लोटे का उदर अनंत गहराइयों से युक्त एक अँधेरी गुफ़ा की तरह है ,जिसके समस्त रहस्यों का अभिज्ञान स्वयं लोटे को भी नहीं है।


           पहले ही कहा जा चुका है कि लोटा किसी भी दिशा में लुढ़क -पुढक सकता है ,इसीलिए वह 'लोटा'है। इस विशेष गुणवत्ता के लिए उसका बेपेंदी का होना ही चमत्कारिक गुण है। इसी चमत्कार के कारण वह 'लोटा ' नामधारी विशेष संज्ञा से अभिहित किया जाता है। लोटे की इसी गुण से प्रेरणा लेकर जो कुर्सियाँ चार -चार पाँव धारण करती थीं ,वे एक ही स्थान पर जमी किसी भी दिशा में घूमने लगीं।वे अपने चारों पाँवों को खो बैठीं। जीव विज्ञान का यह एक विशेष सिद्धांत है कि हम अपने जिस अंग का प्रयोग नहीं करते , शनैः शनैः विलुप्त हो जाता है। कहा गया है मानव पहले एक पशु है ,बाद में मनुष्य।उसके भी पशुवत एक पूंछ कमर के नीचे गाय, भैंस, बंदर ,गधा ,घोड़ा की तरह लटकती रहती थी।उसने आलस्यवश अथवा अप्रयोग वश काम में नहीं लिया,इसलिए कालांतर में वह विलुप्त ही हो गई। 


         आपकी जानकारी के लिए यहाँ पर यह बता देना भी आवश्यक प्रतीत होता है कि पहले जमाने के लोटे पेंदी वाले ही हुआ करते थे। लेकिन जब लोटे ने देखा कि इस पेंदी की कोई विशेष उपयोगिता नहीं है , इसलिए उसने उसका प्रयोग करना ही बन्द कर दिया। पहले के पेंदी वाले लोटों की अपनी एक अलग ही मान मर्यादा थी,जिसका अनुपालन करते हुए वे जब मनचाहा ,लुढ़कते पुढक़ते नहीं थे। एक जगह जमकर अपने कार्य का निष्पादन करते थे।पर अब क्या ? अब तो रातों रात वे कायाकल्प कर लेते हैं। शाम को उनमें पीला - पीला बेसन भरा था ,पर सुबह होते- होते उनमें देशी घी , मक्खन, रबड़ी और इसी प्रकार के मधुर सुस्वाद व्यंजन भरे दिखाई देते हैं।उनके इस रहस्य को थालियां ,कटोरियाँ क्या समझें ? हाँ , उनके समीपस्थ सेवक चमचे ,चमच्चियाँ अवश्य जान समझ लेते हैं। क्योंकि इस उलट -पुलट में उनका अहं योगदान भी रहता है। 


           जब 'लोटा - पुराण ' का पारायण किया ही जा रहा है ,तो यह स्पष्ट कर देना भी आवश्यक है कि इन लोटों की अनेक श्रेणियाँ और प्रकार हैं। यद्यपि यह पृथक रूप से शोध का विषय है ,तथापि एल्युमिनियम ,लोहा , स्टील, पीतल ,ताँबा, चाँदी ,सोना आदि अनेक प्रकार के लोटे पाए जाते हैं।आज के युग में एल्युमिनियम और लोहे के लोटे का प्रचलन क्षीण हो गया है, इसलिए चमक -दमक वाले उच्च गुणवत्ताधारी लोटे ही प्रचलन में हैं। स्टील से कम तो शायद कोई लोटा मिलना ही दुर्लभ है। अपनी लोटा -यात्रा में ये स्टील, पीतल और ताँबे के लोटे चाँदी के लोटों में बदल जाते हैं। ये विज्ञान का नहीं ,ज्ञान का चमत्कार है।अन्यथा पीतल ,लोहा ,ताँबा को चाँदी में बदलते हुए नहीं देखा सुना गया। जब लोटा चाँदी के महिमावान स्तर को प्राप्त कर लेता है , तो उसका दर्जा सामान्य लोटे से असामान्य लोटे में आगणित किया जाता है।अब दचके-पिचके ,छेद दार लोटों का युग नहीं है।


            लोटों की निःशुल्क यात्रा पूरे देश में अनवरत चलती रहती है। लोटा जितना चलता है ,उतना ही बजता है। बजता अर्थात बोलता है, मुँह तो उसका पहले से ही खुला हुआ है ,इसलिए बिना ढक्कन ,बिना धक्का धकापेल बोलता है। जो वह बोलता है ,उसे वह ब्रह्मवाक्य मानता है। वस्तुतः लोटे की महिमा अपार है। भले ही यह संसार असार है , पर लोटे के लिए संसार ही सार है, क्योंकि संसार से ही उसका उद्धार है। इसलिए वह लोटे से थाली ,परात नहीं बनना चाहता । वह सदा जन्म जन्मांतर तक लोटे की ही योनि में जन्म धारण कर अपने जीवन को धन्य करना चाहता है। इस लोटा योनि में जो स्वर्गिक सुख है ,वह कटोरा , चमचा ,चम्मच ,थाली , परात की योनि में नहीं है।इससे वह स्व-उदर की सेवा सर्वाधिक कर पाने का सौभाग्य बटोर पाता है। 

      धन्य है ये 'लोटा- योनि' , जिससे लोटा  कभी उऋण नहीं होना चाहता। 

      इति 'लोटा - पुराणम' समाप्यते। 


 🪴 शुभमस्तु !


 १६.०४.२०२१●६.००पतनम मार्तण्डस्य।

ज़िंदगी की रेत पर 🛖 [ अतुकान्तिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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ज़िंदगी की तप्त रेत,

कहीं धूसर कहीं सेत,

कहीं ऊँची कहीं नीची,

कहीं उभरी कहीं तीख़ी,

न एकतार न एकसार,

ज़िंदगी का व्यापक प्रसार,

कभी चढ़ाव कभी उतार,

विविध प्रकार।


चलना ही है,

इन दो पैरों को 

जलना ही है,

छोड़ते हुए पदचिह्न,

आकार प्रकार भिन्न - भिन्न,

कभी प्रसन्न कभी मन खिन्न,

रुकना भी नहीं,

पीछे मुड़कर देखना भी नहीं,

चलते चले जाना

अनिश्चित भविष्य की ओर,

कब हो दिवस कब रात

कब साँझ कब हो भोर,

सब कुछ अनिश्चय के गर्भ,

बिना जाने कोई संदर्भ,

चलते चले जाना है,

बढ़ते चले जाना है!


क्या पता कब आएगा

हवा का एक झोंका,

मिटा देगा पदचिह्न तेरे,

अतीत बन जाएगा

एक मधुर याद,

आज से बेहतर,

सोचने के लिए  यही कि

आज से कल ही बेहतर था,

पर मैं समय को

पकड़ नहीं सकता,

उसे बाँध कर

 रख नहीं सकता,

उसे तो गुज़र ही जाना है,

हमें उसकी स्मृति में

बार-बार पछताना है,

काश ऐसा होता,

तो मेरा आज सुनहरा होता !


दूर से दिखाई दे रहे हैं

ऊँचे -ऊँचे रेत के टीले,

उनकी ओर बढ़ते हुए

आदमी आशावान हो

कुछ और सुकून से जी ले,

पर कहाँ ,

दिखाई दे गई एक मृगमरीचिका,

पहुँचे जो निकट

तो वहाँ जल ही नहीं था,

वही रेत ही रेत,

कहीं धूसर कहीं सेत,

रह गई प्यासी ज़िंदगी,

किसी ने की वन्दगी,

तो कोई करता रहा दरिंदगी,

नहीं हुआ कहीं कोई तृप्त,

बस रह गई है रेत

तप्त !तप्त!!और तप्त!!!


फिर भी 'शुभम' 

ज़िंदगी के मार्ग पर

बढ़ना निरंतर बढ़ना ही

ज़िंदगी है,

यही तो उस परमात्मा की

सच्ची वन्दगी है,

क्योंकि यह देह मन बुद्धि

उस कर्ता की 

अनमोल कृति है!

उसके प्रति हमें

नतमस्तक होना है,

उसका सदा - सदा

हमें कृतज्ञ रहना है,

कर्मरत रहना है।


🪴 शुभमस्तु !


१६.०४.२०२१◆११.४५आरोहणम मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

बेपेंदी के ये लोटे देखो ! 🥔 [ अतुकान्तिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🪑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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इधर से भी देखा,

उधर से भी देखा,

साकार पाया,

पर समझदानी के

अंदर न आया, 

न आधार कोई

समझ में समाया,

दिखने में इंसान,

न मटका न गागर,

बिना किसी पेंदी का

लुढ़कता उजागर।


डगर से नगर तक,

गाँव  की बस्ती से 

वन - बंजर तक,

उसे मात्र चाहत

एक मात्र वहीं राहत,

जहाँ दिखी कुरसी,

लुढ़कता गया वह ।


कुरसी में लगी है

अदृश्य रहस्य - चुम्बक,

स्वतः खींचती है

उसे अपनी बाहों में,

बसी हुई वह

स्वप्नों में चाहों में,

चल ही पड़ा है

इसलिए उसकी राहों में।


इधर से उधर तक

देख सब रहे  हैं,

लुढ़कते हुए 

बेपेंदी के लोटे,

गाँव से नगर तक,

 पंचायत से पालिका तक,

गिनती की कुर्सियाँ

झपटने के मेले 

सजे हैं,

सबके मज़े हैं।


एक कुर्सी

चार पाये,

खींचने वाले 

चालीस

 इधर - उधर से धाये,

लुढ़कते - पुढक़ते

चहकते  - बहकते,

सब्जबाग दिखलाते,

फुसलाते - मुस्काते,

हथकंडे दिखलाते,

बिना पेंदी के लोटे।


✍️ शुभमस्तु !


१५.०४.२०२१◆७.३० पत नम मार्तण्डस्य।

बेपेंदी का लोटा 🥔 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आलू   जैसा   गोल - मटोला।

बाहर  चिकना भीतर पोला।।


रुकता  नहीं   बूँद भर   पानी।

बोले   कोमल   मीठी  बानी।।

सुमन कभी वह दाहक शोला

आलू जैसा  गोल -  मटोला।।


होता     बेपेंदी     का   लोटा।

नयन चमकते  चमड़ा मोटा।।

पीपल पल्लव सम मन डोला

आलू  जैसा  गोल - मटोला।।


कुर्सी जहाँ   उधर  ही लुढ़का।

ए सी में  सोता  पट  उढ़का।।

राज नहीं मन का वह खोला।

आलू जैसा   गोल - मटोला।।


वसन बगबगे मन का काला।

पड़ा देश का किससे पाला!!

खून  चूसकर   फूला  चोला।

आलू जैसा गोल -  मटोला।।


आज यही  सच्चा अभिनेता।

लेकर नहीं  किसी को देता।।

सदा   झूठ   ही उसने बोला।

आलू  जैसा  गोल -मटोला।।


जनता   उसे    देवता    माने।

कनक  हार  से लगती छाने।।

घृत माखन ज्यों कोकाकोला।

आलू जैसा  गोल -  मटोला।।


जाता इधर  उधर  की कहता।

अपनी रौ  में  उलटा  बहता।।

'शुभं'कौन यह बम का गोला।

आलू जैसा  गोल -  मटोला।।


🪴 शुभमस्तु !


१५.०४.२०२१◆२.१५ पतनम मार्तण्डस्य।


समझदार को क्या समझाना ? 🦢 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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समझदार को क्या समझाना!

भूल गए सब कथन पुराना??


मनमानी  का  आलम  सारा।

लगे  न अपना बालम प्यारा।।

घर -  घर  में  ये सुनें   तराना।

समझदार को क्या समझाना!


मास्क   लगाकर  रहना भाई।

बच  पाएँ तब लोग -  लुगाई।।

सुना इधर निकला उस काना।

समझदार को क्या समझाना!


रखें   परस्पर   दो   गज  दूरी।

भले आ  पड़ी  हो  मज़बूरी।।

पर न आदमी पल भर माना।

समझदार को क्या समझाना!


टीका   लगवाने    जब  जाते।

बोरों  जैसे सट  -  सट  पाते।।

आता है   बस   बात  बनाना।

समझदार को क्या समझाना!


पर   उपदेशक   लोग   घनेरे ।

बड़े -  बड़े   संतों   के    चेरे।।

मति - मूढ़ों   ने ज्ञान न जाना।

समझदार को क्या समझाना!


जब चुनाव का मौसम आता।

मतमंगा   अंधा   हो   जाता।।

कोरोना अब   नहीं  निशाना।

समझदार को क्या समझाना!


जनता  भेड़ - चाल  में  अंधी।

कोरोना से   कर   ली  संधी।।

नियम तोड़कर उसे जिताना।

समझदार को क्या समझाना!


रैली   में    आचार   नहीं   है।

जो कर  पाएँ   वही  सही है।।

नेताजी  को   नहीं   चिताना।

समझदार को क्या समझाना!


वाहन ठूँस - ठूँस   कर  भरते।

चाहे लोग   रुग्ण   हो  मरते!!

लक्ष्य एक  धन  उन्हें कमाना।

समझदार को क्या समझाना!


ग्राहक कब निज हित पहचाना!

दूकानों  में  घुस -  घुस  जाना।।

अपने   ऊपर     वज्र   गिराना।

समझदार को क्या समझाना!


नासमझों की   कमी  नहीं है।

असली मिलते  डमी नहीं है।।

'शुभम'आज मानव मनमाना।

समझदार को क्या समझाना!


🪴 शुभमस्तु !


१५.०४.२०२१◆९.३० आरोहणम मार्तण्डस्य।


बुधवार, 14 अप्रैल 2021

सु - वेद पंथ ही वरो! 📒 [ अनंग शेखर]

 

विधान:१.चार चरण।

        २.दो चरण सम तुकांत।

        ३.लघु गुरु की १६आवृत्ति।

        ४. १२ पर यति।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अखंड  देश  के लिए,जला शुभं  सदा दिये,

पुकारती सु-भारती, विकास देश का करो।

न जाति रंग भेद हो,न हो घृणा न  छेद  हो,

सँवारिए  सुधारिए , सुगंध  ही सदा  धरो।।


सु- पूजनीय   जो सदा, सु आदरेय   संपदा,

नहीं  न  मान  तोड़ना, सनेह मान  से भरो।

महान काम -काज हों,प्रकाशवान  साज हों,

न नेह  पाथ   छोड़ना,सु-वेद पंथ  ही  वरो।।


🪴 शुभमस्तु !


१४.०४.२०२१◆१०.४५पतनम मार्तण्डस्य।

सरोज नाम क्यों रखा! 🌷 [ अनंग शेखर]

 

विधान:१.चार चरण।

        २.दो चरण सम तुकांत।

        ३.लघु गुरु की १६आवृत्ति।

        ४. १२ पर यति।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सरोज नाम क्यों रखा,न स्वाद पंक का चखा

न नाम ही कुनाम  हो,प्रपंच क्यों  पसारिये।

सुभाषिणी  सितार  है,सुगंध का   विचार   है,

सितार को  प्रणाम हो,प्रभात में  सितारिये।।


सुधारना स्वदेश को, विचारना न    वेश  को,

सु-काज की ध्वजा चढ़े,प्रकाश को निहारिये।

जिंदादिली  न पाप  है,सुधार शून्य  शाप   है,

न  तेजवान चाम  हो,नहीं ,नहीं  न   हारिये।।


🪴 शुभमस्तु !


१३.०४.२०२१◆८.००पतनम मार्तण्डस्य।

अबेर पास आइए!🎊 [ अनंग शेखर ]

 

विधान-  १.चार चरण। 

२.दो चरण सम तुकांत।

३. लघु गुरु की 16 आवृत्ति।

४.12 पर यति।कि

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अबीर  है गुलाल है, सु-रंग का  जमाल  है,

सुहासिनी  सुहोलिका,अबाध झूम गाइए।

ब्रजांगना  गली-गली, श्याम पास  में   चली,

न भींगती सु-चोलिका, सुदाम ढूँढ़  लाइए।।


मिले न कान्ह पास में,बुझी रही सु - आस में,

जनी  बनी  प्रहेलिका, विराग क्यों   बुताइए।

बता न दोष क्या किया,जता न रोष यों दिया

सरोष  रोति  राधिका,  अबेर पास आइए।।


🪴 शुभमस्तु !


१३.०४.२०२१◆ २.४५ पतनम मार्तण्डस्य।

अनीति भीति शान है ! 🙈 [ अनंग शेखर ]

 

विधान-  १.चार चरण। 

२.दो चरण सम तुकांत।

३. लघु गुरु की 16 आवृत्ति।

४.12 पर यति।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सुराज  का  सवाल है,कुराज ही   बबाल  है,

न  जानता  न  मानता,तना हुआ  वितान  है।

यहाँ वहाँ सभी दुखी, कहाँ यहाँ सभी  सुखी,

अमीर  पीठ  ठोंकता, पड़ा वही  उतान  है।।


गली - गली कली मली,बचा यहाँ बली छली,

कुभाष बाण भौंकता, बचा नहीं  विधान है।

निरोग  कौन  है  यहाँ, विरोध ही  यहाँ  वहाँ,

ग़ुबार कौन रोकता, अनीति भीति शान  है।।


🪴 शुभमस्तु !


१३.०४.२०२१◆ २.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

रुको नहीं !थको नहीं!! 🏃🏻‍♀️ [ छंद:अनंग शेखर ]

  

विधान-  १.चार चरण। 

२.दो चरण सम तुकांत।

३. लघु गुरु की 16 आवृत्ति।

४.12 पर यति।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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रुको नहीं थको नहीं ,न दोष को मढ़ो कहीं,

अबाध पंथ ही चलें, उदास   हो  न   बाबरे!

सगा न साथ  मीत है,सही  न बंधु   प्रीत   है,

सुकाज  ही सदा  फलें, लगा न घात रावरे !!


चला मही   बढ़ा वही,सुनाम की   धरा  गही,

अहं - नशा   मिटा  चलें,रहें न शेष  घाव  रे।

न तोड़ फूल की कली,न झूम तू गली -गली,

न नारि नारि को छलें, डुबा न बीच नाव रे।।


🪴 शुभमस्तु !


१३.०४.२०२१◆ १२.१५ पतनम मार्तण्डस्य।


सोमवार, 12 अप्रैल 2021

कुमार -सी कुमारियाँ [ अनंग शेखर ]

 

विधान-  १.चार चरण। 

२.दो चरण सम तुकांत।

३. लघु गुरु की 16 आवृत्ति।

४.12 पर यति।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कराल   काल    आ   गया,

नहीं    रही     दया    मया,

विकास    जाल   रूप   है,

प्रणाम   है       मिलावटी।


अनीति     नीति    है   बनी,

कुरीति   रीति -   सी   तनी,

कुबंध     नंग     भूप     है,

सुधार      है       बनावटी।


उगे     यहाँ    बबूल     हैं,

समूल    लोग    शूल    हैं,

न शेष   आज    कूप    हैं,

विराटता     कटी -  मिटी।


सुभाषिणी     न    नारियाँ,

कुमार -    सी    कुमारियाँ,

विकार     ईति     व्यूप   है,

कुधारणा   सटी -    सटी।।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०४.२०२१◆ ६.३० पतनम मार्तण्डस्य।

बैल मुझे आ मार! 🐮 [ दोहा -ग़ज़ल ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कोरोना  से  कम  नहीं, मानव का   आचार।

ख़ुद ही ख़ुद से जूझता,  ख़ुद को लेता मार।।


दिल  से दिल तो दूर है, तन से चिपकी देह,

मानवता  नित  ही  मरे, रिश्वत ही घर द्वार।।


लाल  रक्त  से हाथ धो, रिश्तों में   दे  आग,

जैसे भी पर धन मिले, दूषित जन व्यवहार।।


गबन, डकैती,  चोरियाँ, हुईं आज ये आम,

कोरोना  समझा रहा, कर ले मनुज सुधार।


जाति, वर्ण की छाँव में, जीता मानव  आज, 

नेता  ही   रोगाणु   हैं,  करते विष    संचार।


बिना मिलावट के मिले,चोरों को  क्यों चैन?

पानी में दुहता मनुज,गाय, भैंस पय - धार।।


पर  धन  हरने  के लिए,लड़ते लोग   चुनाव,

जनसेवा  के  नाम  पर, करते निज  उद्धार।


शुद्ध   नहीं  जब  आदमी, कैसे  सुधरे  देश,

भाँग   कुएँ  में  है  पड़ी,  जीना  है   दुश्वार।


ज़हर मिले सब दूध,फल,शाक,अन्न,घी,तेल,

कोरोना  आह्वान  है, बैल  मुझे  आ   मार।


दोषारोपण  और  पर, मानव की  बदनीति,

स्वयं  पैर  में मारता,  लौह कुल्हाड़ी  धार।


'शुभं'सुधर जाआज भी,वरना लिखा विनाश

कोरोना  से भीततम,मानव का    संसार।।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०४.२०२१◆४.४५पतनम मार्तण्डस्य।


कोरोना को दूर भगाएँ 👬🏻 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

👬🏻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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रहें   दूर  ही    मास्क  लगाएँ।

कोरोना  को    दूर    भगाएँ।।


बार - बार  हाथों   को   धोएँ।

नहीं चिपक कर घर में सोएँ।।

हल्दी ,  सौंठ  दूध  में   खाएँ।

कोरोना   को   दूर    भगाएँ।।


सुबह  उठें   नित  करें   गरारे।

करें   गुनगुना   पानी    सारे।।

सब ही घर  के  सेंक  लगाएँ।

कोरोना   को    दूर   भगाएँ।।


बिना काम  बाहर मत जाना।

नहीं किसी को व्यर्थ बुलाना।

नियम बने  उनको  अपनाएँ।

कोरोना   को   दूर   भगाएँ।।


घर में  रखें   स्वच्छता  सारी।

दूर    रहेगी   तब    बीमारी।।

उत्सव  में कम  से कम जाएँ।

कोरोना   को    दूर  भगाएँ।।


लापरवाही    उचित  नहीं  है।

वैक्सीन हर  जगह  यहीं  है।।

टीकाकरण    सभी  करवाएँ।

कोरोना   को    दूर   भगाएँ।।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०४.२०२१◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।

लाल-लाल तरबूज 🍉 [ बालगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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लाल - लाल  तरबूजा आया ।

मैंने जी भर कर  वह खाया।।


गर्मी का  मधु  फल  तरबूजा।

मीठा ऐसा  ज्यों  तर  कूजा।।

माता  और  पिता   को भाया।

लाल - लाल  तरबूजा आया।।


तपन  धूप   गर्मी   की हरता।

तृप्ति प्यास की भी है करता।

जिसने देखा  मन  ललचाया।

लाल - लाल तरबूजा आया।।


लू  - लपटों  से  हमें  बचाता।

भोजन को भी शीघ्र पचाता।।

मोटापा   भी    सदा  घटाया।

लाल - लाल तरबूजा आया।।


रोग पोलियो  यदि हो  जाता।

बालक का  वह रक्त बढ़ाता।।

त्वचा रोग   में लाभ  कराया।

लाल - लाल तरबूजा आया।।


जलन मूत्र   की  सदा घटाता।

खाँसी में अति लाभ कराता।।

ए, बी,सी, का   स्रोत बताया।

लाल - लाल तरबूजा  आया।।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०४.२०२१◆१.००पतनम मार्तण्डस्य।


शनिवार, 10 अप्रैल 2021

ग़ज़ल 🍃🍃


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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फ़िर      वही      लहर      है।

गाँव  -   गाँव       कहर    है।।


हर        गली         धूमधाम,

आठ   -    आठ     पहर    है।


आदमी    ही    आदमी    को,

बन    गया        जहर      है।


शुष्क        कूप        हैंडपम्प,

बह      रही        नहर       है।


शून्य          है     आदमियत,

कैसा  अब         दहर     है।


आदमी      क्या       आदमी,

अगर         बे -  महर      है!


कह    रहा      ग़ज़ल  'शुभम',

किन्तु       बे -  बहर         है।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०४.२०२१◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🕹️

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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फ़िर    चुनाव      आ   गया।

गाँव   -  गाँव     छा   गया।।


दावतों          पर        दावतें,

दारू   मुर्गा      भा       गया।


रंजिशें         बोता        हुआ,

आम   जन   को    खा  गया।


तोड़ने        की       साजिशें,

गज़ब   ऐसा     ढा      गया।


छू      गया     घुटने     कोई,

द्वार   पर     जो   आ  गया।


सबसे   बोला      झूठ      मैं,

उसने      सोचा     पा  गया।


गीत     मेरी         शान    में,

मतमंगा   कोई     गा    गया।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०४.२०२१◆५.०० पतनम मार्तण्डस्य।

कोरोना का रोना! [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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नेताजी   कहने   लगे ,कोरोना है     चाल ।

निज विपक्ष को मारने,बुलवाया है काल।।


सत्ता  का   टीकाकरण, करते अस्वीकार।

नेता  सभी  विपक्ष  के , मान रहे  हैं  वार।।


सत्तासन जिस दिन मिले,उन्हें प्रतीक्षा आज।

बनवाकर  टीका स्वयं, सुधरेंगे सब   साज।।


कोरोना - टीकाकरण, राजनीति का खेल।

पटरी उनकी अलग है,अलग चलाते  रेल।।


जाति, धर्म   को देखकर,नहीं पकड़ता  रोग।

कीड़ा जिनकी बुद्धि में,व्यर्थ उन्हें  सहयोग।।


अपनी  लापरवाहियां,  दोष अन्य पर थोप।

कोरोना  आहूत कर,दिखा रहा   है   कोप।।


पहले  ही  चिपके  हुए,  छद्म मुखौटे चार।

लगा मुसीका क्या करें,मन में छिपे विकार।।


कृषक और ग्रामीण के,सुन लें उच्च विचार।

वे तो अति मज़बूत हैं,क्यों हो रोग विकार।।


बिना मुसीका दौड़ती, पैदल, बाइक,कार।

चिपक परस्पर  हैं खड़े,लंबी लगा कतार।।


बतलाते  कुछ  चोंचले,  झूठ रोग का खेल।

पढ़ते हैं  अख़बार भी ,   देते तथ्य  धकेल।।


लापरवाही  जब  पड़े,भारी घर,परिवार।

दोष मढ़ें  सरकार पर,रहता नहीं उतार।।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०४.२०२१◆१२.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

कोरोना का फैलाव क्यों ? 🐲 [ लेख ]


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 ✍️ लेखक © 

 🥝 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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             देश में कोरोना - वायरस के फैलाव की बात से कौन भिज्ञ नहीं है? इस फ़ैलाव के लिए बहुत कुछ अर्थों में मानव स्वयं उत्तरदायी है।इस प्रश्न पर विचार किया जाना अति आवश्यक हो गया है। कोरोना-फ़ैलाव के कारणों में मेरी दृष्टि में एक प्रमुख कारण है , व्यक्ति की 'अपनी लापरवाही'। रोगाणु के बचाव के लिए मास्क का प्रयोग ,अन्य व्यक्ति से निश्चित दूरी का अनुपालन,कुछ विशेष प्रकार की क्रियाएँ, कुछ विशेष खानपान और आहार -विहार से भी बहुत कुछ बचाव सम्भव है। पर अपने देश का आदमी अपने प्रति ही इतना अधिक गैर जिम्मेदार है कि वह जानते हुए भी इन सब बातों की अनदेखी करता है।

             गाँव के अधिकांश लोगों से यदि मास्क आदि का प्रयोग करने की सलाह दी जाती है ,तो वह अपनी हेकड़ी में दम भरते हुए यही कहता है कि हमें कोरोना कैसे हो सकता है। हम मेहनत करते हैं।पसीना बहाते हैं।  हम मजबूत हैं। शहर के लोगों की तरह कमजोर नहीं हैं हम लोग।हमें क्यों होगा कोरोना ? इसी प्रकार की बे सिर पैर की बातें उन्हें सुझाव दिए जाने पर सुनने को मिलती हैं।यही कारण है कि वे टीकाकरण में भी विश्वास नहीं करते। 

            मूर्खता की हदें तो तब पार हो जाती हैं ,जब देश-प्रदेश के तथाकथित बड़े - बड़े नेता जी नियम कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए देखे जाते हैं।उनका मानना है कि वर्तमान सत्ता दल के टीके को हम क्यों लगवाएँ?जब हमारी सरकार बनेगी ,तब लगवाएंगे।हो सकता है कि इस सरकार की कोई चालबाजी हो ,जो हमें मारने के लिए ईजाद की गई हो।इस प्रकार की सोच के सभी लोगों की बुद्धि पर तरस आता है! इनकी बुद्धि की बलिहारी ही है।ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि प्रदान करे।

            ' डंडे का डर' भी आंशिक समाधान हो सकता है।अभी एक सप्ताह पहले मुझे एक प्राइवेट वाहन से जिला मुख्यालय जाना पड़ा।मुझे छोड़कर उस वाहन में कोई भी मास्क नहीं लगाए हुए था। कुछ देर चलने के बाद मुझसे रहा नहीं गया। मैंने वाहन - चालक से ही कहा  :तुम दिनभर वाहन चलाते हो। हर प्रकार का व्यक्ति इसमें आता - जाता है। तुम्हें अपने बचाव की भी चिंता नहीं है?तुम्हें तो मास्क लगाना ही चाहिए।उसने मौन स्वीकृति दी और हाइवे पर थोड़ा आगे चलने के बाद रास्ते में मिले एक खोखा- दूकान से एक पाँच रुपये का मास्क खरीद कर लगा लिया। यह मास्क मेरे कहने से लगाया हो ,ऐसा भी नहीं है। यह मास्क डंडा के डर से अगले चौराहे पर होने वाले चालान से बचने के लिए लगाया गया था। यह देखकर मेरे पड़ौस में रखे ख़रबूज़े ने भी बैग से मास्क लगाकर अपना मुख -नाक आच्छादन कर लिया।शेष सवारियां निर्विकार भाव से यात्रा करती रहीं। 

           शासन और प्रशासन के बार-बार के निर्देशों औऱ कड़ाइयों के बावजूद सड़क, गली ,बाज़ार ,दुकान ,यात्रा ,मेला, कार्यालयों में बरती जा रही उदासीनता अंततः कहाँ ले जाएगी! जब सरकार ने निःशुल्क टीकाकरण प्रारम्भ कर दिया तो हमें अपने प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों और सरकारों का कृतज्ञ होना चाहिए न कि उसमें मीन - मेख निकालनी चाहिए।

             कुछ ऐसे भी अति बुद्धिमान लोग भी इस देश में निवास करते हैं , जो कोरोना को जाति ,मज़हब औऱ धर्म से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ लोगों की आँखों में परमात्मा सुअर का बाल देकर ही पैदा करता है। जिनका कर्म ही है कि हर अच्छी बात में अपनी "अति -बुद्धिमत्ता "? का प्रमाण दें। सो वे ही रहे हैं।

 'जो आया जेहि काज सों तासे और न होय। 

 बोनों ही है विष जिन्हें वे विष ही नित बोय।' 

         मानव की दूषित सोच औऱ उसका दुष्प्रचार कोरोना प्रसार में विशेष सहायक सिद्ध हो रहा है। शासन नियम बना सकता है ,पर उनका अनुपालन तो हमें ही करना होगा।इस भयंकर रोग का हस्र भी जानते हैं सब, फिर भी इतनी भयंकर उदासीनता औऱ अनदेखी निंदनीय है।ईश्वर ऐसों को सद्बुद्धि प्रदान करे औऱ और मेरे देशवासियों की इस महामारी से रक्षा करे। 

 🪴 शुभमस्तु ! 


शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

मेला : मतमंगों का 🍲 [ दोहा ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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मतमंगे  दर  - दर खड़े, अपनी   माँगें खैर।

नहीं किसी  से मित्रता,  नहीं किसी से बैर।।


कुरसी  की  आदत पड़ी,मरे न  मेरा  मोह।

मतमंगा  कहने  लगा, हुआ फूलकर गोह।।


एक और अवसर मिले,मैं फ़िर आया द्वार।

हाथ  जोड़ वंदन  करे,ये मतमंगा  -  वार।।


आ  जाना  चौपाल पर ,मतमंगे  की  टेर।

मुर्गा, दारू  सब  मिले, चुनना दादा फेर।।


सड़क,  खड़ंजा गाँव में,होना है  इस  बार।

वादा   मतमंगा  करे,  होगा ग्राम -  सुधार।।


जितना  चाहो खा सको,खा लो पूआ खीर।

मतमंगे के भोज से,खुली ग्राम - तक़दीर।।


खूँदेगा  जो  खांड को,खाना है अनिवार्य।

मतमंगा  जेता बना,आवंटित बहु  कार्य।।


दाम  उदर  में जब गये,फूल गए  तन   पेट।

मतमंगे  की  जीत  से,खुले प्रगति के गेट।।


साठा  से  पाठा बना,मतमंगा मत   जीत।

वादा है इस बार भी,भूलो 'शुभम' अतीत।।


मतमंगे   के  साथ  में,चलते चमचे   चार।

पर्चे  चस्पा  कर   रहे, भले संहिता भार।।


मतमंगे   की   भीड़  में,कुछ छूते  हैं   पैर।

मतमंगा तनकर खड़ा,मन में हो ज्यों बैर।।


🪴 शुभमस्तु !


०९.०४.२०२१◆२.३० पतनम मार्तण्डस्य।

स्वदेह सेवा: स्वदेश सेवा 👏 [ सायली ]

 

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✍️ शब्दकार ©


 🫐 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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झड़ी 

लगी है

बरसाती मौसम में

उग आए 

कुकुरमुत्ते।


बजने 

लगे हैं

ढोल गाँव - गाँव

चले मतमंगे

पाँव।


टर्राते

दादुर दल

फोड़ रहे कान

कुरसी है

निशान।


मुर्गा,

मछली ,दारू,

खुला खजाना कारू,

मुफ़्त की 

मारूँ।


आज

चरण दास

हो गए पास,

आता कौन

पास?


मुझे,

मेरे बेटे,

मेरी पत्नी को,

नहीं किसी

को।


लालच

कमाने का,

नहीं सेवा भाव,

तिजोरी सजाने

चला।


चरण 

पहला -पहला,

नेतागिरी चमकाने का,

गाँव की 

सरकार।


खुश 

प्रधान पति,

मिल गई सद्गति,

हज़ार नहीं

करोड़पति।


नीयत 

खोटी है,

चुपड़ी रोटी है,

मतमंगे के

मन।


सेवा

स्वदेह की,

देश सेवा ही,

हम भी

देशवासी।


🪴 शुभमस्तु !


०९.०४.२०२१◆१०.०० आरोहणम मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

पाँच साल में 🍒🫐 [ चौपाई ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पाँच  साल  में  एक  हि बारा।

लोकतंत्र   का   पर्व  पधारा।।

सोते  -  से     जागे   मतमंगे।

बोल  रहे   हैं हर -  हर  गंगे।।


मतदाता    के    द्वार   पधारे।

वंदन   करते जा -  जा सारे।।

चौपालों  पर   दावत   होती।

जग जाए जो  जनता सोती।।


रचि-रचि के  पकवान बनाते।

जो भाता सब  रुचि से पाते।।

मुर्गा,  मछली ,  रोटी ,  दारू।

खुला खज़ाना   जैसे कारू।।


  दाम,   दावतें ,   दारू   देते।

लोग - लुगाई  खुश  हो लेते।।

आश्वासन  की   बँटी मिठाई।

खुश हैं चाचा,  चाची , ताई।।


गाँवों   की    सरकार  बनेगी।

मौजों  की  चदरिया  तनेगी।।

मौसम है    रैली -  थैली का।

राग - रंग की नित वैली का।।


जब चुनाव  का मौसम आता।

कोरोना टिकने   कब पाता??

मुँह पर नहीं  मुसीका रखना।

माल मुफ़्त का खाना चखना।


दूरी   रखने  की    सब  बातें।

कोरी   झूठी   हैं   ये    घातें।।

तान - तान  कर  मारो  वादे।

भले न   मन   में नेक इरादे।।


कहने में अपना  क्या  जाता!

सच से   नहीं  दूर का नाता।।

नेताजी    से    दूर     सचाई।

झूठे  वादों   की    प्रभुताई।।


नीति न कोई   नीयत  खोटी।

मिले कमीशन  चुपड़ी रोटी।।

पूजा ,पाठ ,  हवन  करवाएँ।

मन्नत को देवी -  दर  जाएँ।।


नोट, वोट   की   संगत   ऐसी।

वादों की   फिर ऐसी -तैसी।।

भरें  दाम से   खूब   तिजोरी।

रहें  ठाठ   से छोरा -  छोरी।।


चाँदी      काटेंगे       मतमंगे।

पर  हमाम  में वे   सब  नंगे।।

मिलजुलकर सबको खाना है

कौन नहीं जग   में काना है!!


चोर -  चोर     मौसेरे    भाई।

जान रहे  सब लोग - लुगाई।।

किसे देश  की   चिंता भारी?

बाँटेंगे  क्यों?  सभी तुम्हारी।।


दाता - मगता   एक  समाना।

बिना डकारें    लिए पचाना।।

'शुभम' पर्व की ख़ुशी मनाएँ।

मत देने   को   घर से  जाएँ।।


✍️ शुभमस्तु !


०८.०४.२०२१◆१.४५पतनम मार्तण्डस्य।

मतमंगे 🍷🪑 [अतुकान्तिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हर हर गंगे !

आप सब होंगे भले चंगे,

आ गए आपके द्वार पर

फिर पाँच साल बाद,

वही  वही  'मतमंगे' ।


आपके चरणों के दास हैं हम,

चाहे लीजिए मुर्गा 

साथ में ठर्रा या रम!

हाज़िर हैं आपकी सेवा में

कमी नहीं होगी किसी मेवा में!

चाहे  घोटिये शुद्ध शाकाहारी!

शिवजी की बूटी भाँग रुचिकारी!

ये तो अपनी -अपनी पसंद है,

कोई खुले आम है

तो कोई बोतल बंद है!

हर     आदमी     अपनी   रुचि-

अनुसार स्वच्छन्द है!


आपके चरण हैं

इधर हमारा माथा है,

आपके आशीष के वास्ते

बंदा इधर आता है,

भिखमंगे तो नहीं

हम विशुद्ध 'मतमंगे' हैं!


ये दावत ले लीजिए

अदावत नहीं है आपसे,

हम तो मानते हैं बड़ा

आपको अपने बाप से,

मतलब के लिए

लोग वैशाखनन्दन को

भी बाप बना लेते हैं,

हम तो पाँच बरस में

इधर कदम बढ़ा देते हैं!

 इधर मेरी टोपी है

उधर दो  चरणहैं आपके,

वैसे हम नौकर नहीं हैं

किसी के बाप के।


ये कुरसी ही ऐसी है

कि छोड़ी नहीं जाती है,

पाँच बरस बाद फिर से

नीचे बिछ जाती है,

दाम चीज ही ऐसी है

कि हमें खींच लाती है,

जो कहो सो वादे कर दें,

वादों से आपका उदर भर दें,

जब करेंगे तो निभाना क्या?

इसमें अपना-बिराना क्या?

अपनी जेब  से  क्या 

हमें लगाना है!

उधर से आना है,

इधर लगा जाना है,

इसी के सहारे तो

हमें भी कुछ राग -  रंग 

जमाना है।

सही बात कहें तो इसमें

बुरा क्या है!

आज तो मित्रों ऐसों का ही

तो जमाना है।


आपकी शिकायत है

कि जीतकर दर्शन भी

 नहीं देते,

छत्ते पर मधुमाखियों - सा

चिपक लेते हैं,

क्या करें नाम और नामा

होता ही ऐसा है,

जो डुबा देता है आकंठ

हमारा रेशा -  रेशा है!

'मतमंगे' से हो जाते

 हम  भले - चंगे हैं,

विजयश्री के बाद 

पौ बारह हैं,

क्या करें मजबूरी में

हम हो लेते 

नौ दो ग्यारह हैं।


🪴 शुभमस्तु !


०८.०४.२०२१◆११.००आरोहणम मार्तण्डस्य।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हर हर गंगे !

आप सब होंगे भले चंगे,

आ गए आपके द्वार पर

फिर पाँच साल बाद,

वही  वही  'मतमंगे' ।


आपके चरणों के दास हैं हम,

चाहे लीजिए मुर्गा 

साथ में ठर्रा या रम!

हाज़िर हैं आपकी सेवा में

कमी नहीं होगी किसी मेवा में!

चाहे  घोटिये शुद्ध शाकाहारी!

शिवजी की बूटी भाँग रुचिकारी!

ये तो अपनी -अपनी पसंद है,

कोई खुले आम है

तो कोई बोतल बंद है!

हर     आदमी     अपनी   रुचि-

अनुसार स्वच्छन्द है!


आपके चरण हैं

इधर हमारा माथा है,

आपके आशीष के वास्ते

बंदा इधर आता है,

भिखमंगे तो नहीं

हम विशुद्ध 'मतमंगे' हैं!


ये दावत ले लीजिए

अदावत नहीं है आपसे,

हम तो मानते हैं बड़ा

आपको अपने बाप से,

मतलब के लिए

लोग वैशाखनन्दन को

भी बाप बना लेते हैं,

हम तो पाँच बरस में

इधर कदम बढ़ा देते हैं!

 इधर मेरी टोपी है

उधर दो  चरणहैं आपके,

वैसे हम नौकर नहीं हैं

किसी के बाप के।


ये कुरसी ही ऐसी है

कि छोड़ी नहीं जाती है,

पाँच बरस बाद फिर से

नीचे बिछ जाती है,

दाम चीज ही ऐसी है

कि हमें खींच लाती है,

जो कहो सो वादे कर दें,

वादों से आपका उदर भर दें,

जब करेंगे तो निभाना क्या?

इसमें अपना-बिराना क्या?

अपनी जेब  से  क्या 

हमें लगाना है!

उधर से आना है,

इधर लगा जाना है,

इसी के सहारे तो

हमें भी कुछ राग -  रंग 

जमाना है।

सही बात कहें तो इसमें

बुरा क्या है!

आज तो मित्रों ऐसों का ही

तो जमाना है।


आपकी शिकायत है

कि जीतकर दर्शन भी

 नहीं देते,

छत्ते पर मधुमाखियों - सा

चिपक लेते हैं,

क्या करें नाम और नामा

होता ही ऐसा है,

जो डुबा देता है आकंठ

हमारा रेशा -  रेशा है!

'मतमंगे' से हो जाते

 हम  भले - चंगे हैं,

विजयश्री के बाद 

पौ बारह हैं,

क्या करें मजबूरी में

हम हो लेते 

नौ दो ग्यारह हैं।


🪴 शुभमस्तु !


०८.०४.२०२१◆११.००आरोहणम मार्तण्डस्य।

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

आज का दम्भी मानव 🍒 [ कुंडलिया ]

 

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✍️ शब्दकार©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                         -1-

बातें जो कहता खरी,काव्य तुला  पर तोल।

सत्य कथ्य जिनमें भरा,बातें सब अनमोल।।

बातें  सब  अनमोल, झूठ ही सबको  भाता।

चिकनी-चुपड़ी बात,घुमाकर जो बहलाता।।

'शुभम'चाहते लोग,आज सब धोखा   घातें।

लगता  सत्य  कुनैन, चाहते झूठी    बातें।।


                         -2-

दोषी  वह  होता  नहीं, जो समर्थ  बलवान।

करता हो अपराध नित,पाता वह सम्मान।।

पाता  वह  सम्मान,काम दानव  के करता।

निशि दिन अत्याचार, प्राण निर्धन के हरता।।

'शुभम' बिगड़ता देश,छा गए कायर   रोषी।

हर हालत में जीत,उसी की जो  है   दोषी।।


                         -3-

साधन को क्या पूछना, विजयश्री का लाभ।

मिलना उनको चाहिए, चमचम करती आभ

चमचम  करती  आभ,न्याय से  दूर पताका।

चमके  सारे  देश, अँधेरा   भले  अमा  का।।

'शुभम' कागज़ी फूल, इत्र से भर   आराधन।

करें  ऊपरी  ढोंग,सत्य  से दूर कु   - साधन।।


                          -4-   

मानव ने दूषित किया,जल भू नभ परिवेश

दोषारोपण और पर,विकृत हैं   जग देश।। 

विकृत  हैं  जग देश, मिली ऐसी आज़ादी।

दूरदर्शिता   शेष, नहीं बेढब का    आदी।।

'शुभम'  धरे  नर देह,बना कर्मों से   दानव।

हाँके  लंबी  डींग,आज का दम्भी  मानव।।


                         -5-

कहता जिसे विकास नर,है वह पतन विनाश

नैतिकता नित मर रही, तम मय है आकाश

तममय  है आकाश, कर्म का उठा  जनाजा।

पापों का तमतोम,बजा सतपथ का बाजा।।

'शुभम' मर रहा धीर,सत्य शुभ ऐसे  दहता।

लगी मनों में आग,झूठ नर मुख से कहता।।


🪴 शुभमस्तु !


०७.०४.२०२१◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।


मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

कोरोना खुद ही खो जाए!👬🏻 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हर   घर  में चुनाव  हो  जाए।

कोरोना  खुद  ही  खो जाए।।


पति - पत्नी  में  जंग करा दो।

प्रत्याशी का  फार्म भरा  दो।।

घर की शांति,मिटे मिट जाए।

कोरोना खुद   ही  खो जाए।।


देखेगा     चुनाव     कोरोना।

नहीं बचेगा   रोना  -  धोना।।

रैली को सब   ही  ललचाए।

कोरोना  ख़ुद ही  खो जाए।।


हो चुनाव  हर गली -गली में।

हो बहार तब कली-कली में।

आपस में सुत-पिता लड़ाए।

कोरोना ख़ुद ही  खो जाए।।


एक साथ   चुनाव  हो भारी।

शेष  न रह   पाए   बीमारी।।

हर घर में   नेता   उग  आए।

कोरोना ख़ुद ही  खो जाए।।


ख़ुद भी पीयें  पिलाएँ सबको।

चिकन शोरबा के सँग रम को

बना पैग   पर   पैग   पिलाएँ।

कोरोना  ख़ुद ही   खो जाए।।


नहीं मास्क  भी  रहे  ज़रूरी।

बढ़  जाए   बीबी   से   दूरी।।

हाथ रगड़ मल-मल पछताए।

कोरोना ख़ुद ही  खो  जाए।।


जो  चुनाव की  जंग  करेगा।

कोरोना    से   नहीं  मरेगा।।

भले अदावत से  मर  जाए।

कोरोना ख़ुद  ही खो जाए।।


नहीं रोड -   शो  करना होगा।

आँगन में   निबटाना   होगा।।

रैली   की    पैट्रोल     बचाए।

कोरोना ख़ुद   ही  खो जाए।।


लड़ें  परस्पर   जीजा - साली।

देवर -भौजी   लिए  दुनाली।।

कोई   नहीं    बचाने     आए।

कोरोना ख़ुद  ही   खो जाए।।


कोरोना   चुनाव    से  डरता।

मेले , शादी    में    फुंकरता।।

विद्यालय    में    पढ़ने  जाए।

कोरोना  ख़ुद   ही खो जाए।।


नेताओं   से   डर   है  भारी।

बजवा  देंगे    बेला ,  थारी।।

उनसे कदम सात भय खाए।

कोरोना ख़ुद   ही खो जाए।।


🪴 शुभमस्तु !

०६.०४.२०२१◆६.३० पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...