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शनिवार, 5 नवंबर 2022

सपनाती आँखें 👁️ [ कहानी ]

 467/2022


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✍️ शब्दकार ©

😌 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                एक रात की बात है।आँखें लगी हुई थीं कि यकायक उन्होंने एक सपना देखा। यों तो उन्हें नित्य ही लग जाने पर सपने देखने की आदत ही थी।किन्तु आज जैसा सपना उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। इसलिए उनका चौंकना भी स्वाभाविक था।सपने में जो उन्होंने देखा तो वे चौंक पड़ीं।पर सपना तो देखना ही था।आँखें क्या देखती हैं कि कान देव पधारे हैं और बड़े ही विनम्र भाव से अपनी वेदना निवेदित कर रहे हैं। "बहन जी आपसे कुछ निवेदन करना था।" कान देव बोले।

    "कहिए !कान देव ।आइए पधारिए। इससे पहले कभी आपसे वार्तालाप का सुअवसर प्राप्त  नहीं हुआ ,इसलिए हमारा चौंकना स्वाभाविक था।"आँखों ने अपने को सामान्य बनाते हुए कान देव का सहज स्वागत करते हुए कहा।

    कान देव कहने लगे: " यों तो सबकी अपनी -अपनी बहुत सी समस्याएँ होती हैं। किंतु हमारी समस्याएँ ही कुछ इस तरह की हैं कि कुछ कहते नहीं बनता।फिर भी कहने से जी हलका होता है ,इसलिए आपको कष्ट देने के लिए चले आए।"

     "अरे कान देव भैया !आप तो हमारे बड़े भाई हैं।हम तो यहाँ पलकों के बीच किसी नवोढ़ा दुल्हन की तरह लुकी छिपी बैठी रहती हैं। आप ही तो हमारे पास खड़े हुए एक सजग प्रहरी की तरह रात- दिन खड़े-खड़े हमारी देखभाल करते हैं। आप हमारे पड़ौसी भी हैं। वह भी  मात्र चार अंगुल की दूरी पर । चार अंगुल की भी कोई दूरी होती है भला। कहिए हम आपकी क्या सेवा कर सकती हैं।" बड़े ही विनम्र भाव से  आँखों ने कान देव का पलक पाँवड़े बिछाते हुए स्वागत किया।

     सीधे -सीधे अपनी बात पर आते हुए कान देव कहने लगे: " क्या बताएँ आपको।हमें तो बस इस आदमी ने लद्दू खच्चर ही बना दिया है।हमारा काम सिर्फ़ सुनने का है। बोझा ढोने का नहीं।कभी हमें छेदन करके उनमें बालियाँ, कुंडल,झुमके, लोंगें और न जाने क्या - क्या लटका दिए जाते हैं। कोई मिस्त्री हुआ तो उसमें घिसी हुई सड़ी- गली पेंसिल ही अटका देता है। गुटका - तम्बाकू के दीवानों ने तो हमें अपना स्टोर रूम ही समझ लिया है ,जो बची -खुची तम्बाकू या गुटके की पुड़िया हमारे अंदर ठूँस देते हैं। उसकी बुरी गंध से तो हमारा दम ही घुटने लगता है।"

        बात का समर्थन करते हुए आँखें बोलीं और कहने लगीं: " आप ठीक ही कहते हैं भैया जी। कभी - कभी हमारी मजबूरी भी आपको परेशान करती होगी । जब हम कमजोर हो जाती हैं और नर- नारी अपने चश्मे की डंडियाँ तुम्हारे ऊपर तान देते हैं और अनावश्यक बोझ डाल देते हैं। पर क्या करें हमें भी अपने स्वार्थ में आपको कष्ट देना ही पड़ता है।"

           "चलो इतना तो चलता है। अगर हम लोग आपस में संवाद नहीं करते तो क्या! एक दूसरे के काम तो आते हैं। एक पड़ौसी भी यदि अपने पड़ौसी के काम न आए तो ऐसा पड़ौसी होना ही बेकार ! पर कभी -कभी   जब चश्मा लगातार लगा रहे तो कष्ट तो होता ही है। पर हम सब सहन कर लेते हैं।क्या हम आपके लिए इतना भी नहीं कर सकते! " कान देव सहानुभति पूर्वक बोले।

" आपका कष्ट देख - देख कर हमारे भीतर से भी पानी बहने लगता है। पर क्या करें ,हम स्वार्थी जो हुईं।" आँखों ने कहा। कान देव थोड़ा - सा फड़फड़ाये ,मानो हँस रहे हों।

        और कहने लगे: "हमारा मुँह नहीं। हमारी जुबान नहीं ।तो इसका मतलब यह थोड़े ही होता है कि हम सबकी बुरी- भली, गाली-गीत, विस्फोट- संगीत, चुगली -प्रशंसा, थाली -ढोल सब कुछ  चुपचाप सुनते रहें। कुछ भी भर दो हमारे भीतर। क्या हमें कंपोस्ट खाद का गड्ढा समझ रखा है इन्होंने! जो अच्छा -बुरा ,गोबर - कीचड़ सब कुछ भर दो। ठीक है सुनना ही हमारा काम है ,क्योंकि हम कान हैं। पर इसका मतलब ये तो नहीं कि ......" और कहते कहते कान देव रुक गए।

पुनः कहने लगे : " हमारी तो किस्मत ही खराब लगती है।बचपन में जब कोई विद्यार्थी पढ़ने -लिखने में अच्छा नहीं होता तो हमें ही मरोड़ दिया जाता है। दोष दिमाग का और ऐंठा जाए हमें। ये भी कोई न्याय हुआ भला! कुत्ते की चोट बिल्ली पर! मास्टर जी भी लगता है ,अक्ल से कुछ- कुछ पैदल ही होंगे। जो आव देखा न ताव हमें खामखां लाल कर दिया! ये भी कोई बात हुई भला !  क्या  दिमाग का पेच हमारे  अंदर लगा हुआ है ?  हम कोई दिमाग के स्विच बटन हैं कि लिया औऱ बस ढिरिंग.........."

आँखों को हँसी आ गई और खुशी के आँसू बहाते हुए बोलीं:" ठीक कहत हौ दाऊ!"

         कान देव कब रुकने वाले थे। कहने लगे :" उधर देखों उन पंडित जी महाराज को। क्या सारी पंडिताई सूत के तीन धागों में ही भरी पड़ी है ,जो एक और अतिरिक्त अनावश्यक बोझे की तरह  शंका निवारण के समय हम पर जनेऊ लाद लिया!  औऱ तो और उसमें तिजोरी की चाबियों का भारी गुच्छा भी टाँग लिया। पंडिताइन घर पर छूट गई थीं ,उनको भी लटका लाते। हम तो थे ही लद्दू खच्चर ! उन्हें भी ढोते रहते! और क्या !" 

घड़ी ने चार बजे का अलार्म ट्रिंग !ट्रिंग !! ट्रिंग! ट्रिंग !!की ध्वनि के साथ बजाया  कान देव ने सुना और आँखें खुल गईं । सपना अब अपना नहीं था।कान देव विदा हो चुके थे।


🪴 शुभमस्तु !

05.11.2022◆8.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


👁️👂👁️👂👁️👂👁️👂👁️

शनिवार, 29 अक्टूबर 2022

इच्छाधारी नाग और भोला 🪸 [ कहानी ]

 453/2022


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✍️ शब्दकार ©

🪸 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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नाम था उसका भोला।स्वभाव का भी भोला। दीवाली से दो दिन पहले एक दिन वह अपने खेत की मेंड़ की सफाई कर रहा था। तभी उसे पास ही सर्प की एक बाँबी दिखाई पड़ी। वह चोंका और अपनी खुरपी बहुत सावधानी पूर्वक चलाते हुए घास छीलने लगा।बाँबी से लगभग एक मीटर दूर उसकी ओर पीठ किये हुए वह अपने कार्य में  तल्लीन था।अचानक उसने पीठ के पीछे कुछ सरसराहट अनुभव की तो उसने पीछे दृष्टि घुमाकर देखने का प्रयास किया ,किंतु जब उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया तो उसने अपने मन का भ्रम समझकर नजरंदाज कर अपने कार्य में व्यस्त हो गया। पर उसका मन नहीं माना तो खड़ा होकर देखने का प्रयास किया कि उसका अनुमान सही सिद्ध हुआ। एक तेजस्वी   गेरुआ वस्त्रधारी संत सामने विराजमान थे।

"महाराज आप !" भोला ने पूछा।  "अचानक कहाँ से प्रकट हो गए। अभी तो यहाँ कोई भी नहीं था।"

"हाँ, भोले भाई।यही समझ लो कि प्रकट ही हुआ हूँ।"संत महाराज ने उत्तर दिया।"अभी जब तुमने पीछे घूमकर देखा था ,तब भी मैं यहीं पर था। पर तुम देख नहीं सके।"

संत महाराज से अपना नाम लेकर संबोधित करने पर भोला चोंका और पूछ ही लिया : "महाराज !आप तो मेरा नाम भी जानते हैं।महाराज अपना परिचय दें।"

"हाँ, भोला भाई ! मैं तुम्हें लंबे समय से जानता पहचानता हूँ;परंतु तुम मुझे नहीं जानते। खैर !छोड़ो भी। क्या करोगे ज्यादा जानकर।

मैं वह नहीं हूँ ,जो तुम देख रहे हो।इससे इतर कुछ औऱ ही हूँ। यदि मैंने अपना वास्तविक परिचय  दिया तो हो सकता है तुम डर न जाओ। इसलिए मुझे इस रूप में आना पड़ा है।" संत महाराज ने बताया।

इतना सुनते ही भोला के मन में स्वाभाविक रूप से भय व्याप्त हो गया,जो उसके चेहरे के बदलते हुए रंग से ही स्पष्ट हो रहा था।संत जी ने उसके भय को भाँप कर उसे ढाढ़स बँधाया औऱ कहने लगे।

"देखो भोला भाई ! डरो मत।मैं तुम्हरा ही पूर्वज औऱ तुम्हारे पिता का पिता हूँ औऱ कर्मफल वश इस समय नाग योनि में जीवन- यापन करते हुए इसी बाँबी में निवास कर रहा हूँ। तुम भयभीत न हो जाओ, इसलिए इस रूप में तुम्हारे समक्ष प्रकट हुआ हूँ। तुम मुझसे बिलकुल मत डरो। तुम्हें कोई भी हानि नहीं पहुँचाऊँगा।तुम मेरे प्रिय पौत्र जो हो।कुछ न कुछ भला ही करूँगा वास्तव में मैं एक इच्छाधारी नाग हूँ।" संत रूप धारी नाग ने अपना रहस्य प्रकट किया।

"ठीक है महाराज।" भोला बोला। "अब मुझे आदेश करें कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?"

संत रूप धारी नाग बोला :"अब तुम भला मेरी क्या सेवा करोगे। तुम मिल गए। मुझे बहुत अधिक शांति मिली। जीवन में इतना ध्यान रखना कि कभी भी स्वप्न में भी अपने से बड़ों,माता ,पिता और गुरुजनों का अपमान मत करना।सोचना भी मत। यह बहुत बड़ा पाप है।ऐसी आत्माओं को नरक में स्थान नहीं मिलता औऱ जन्म जन्मांतर तक रौरव नरक में पड़े जलते, सड़ते ,विकलते रहते हैं।इस जघन्य पाप की कोई क्षमा नहीं है।"

" जो आज्ञा महाराज।" भोला बोला।

"नहीं, अब सब जान ही गए हो तो अब मुझे महाराज मत कहो। बाबा कहो।मैं तुम्हारा बाबा हूँ।जब मैंने अपना नश्वर शरीर छोड़ा था ,तब तुम्हारा जन्म भी नहीं हुआ था। आज तुम्हें देखकर मेरी आँखें तृप्त हुई हैं। हमारी आज की मुलाकात की कोई भी चर्चा मत करना।तुम्हें कुछ औऱ पूछना हो तो पूछ लो।"संत रूप संत महाराज ने कहा।

भोला कहने लगा :"बाबा एक जिज्ञासा है कि इस संसार में सर्प अधिक जहरीला है या आदमी?"

बाबा बोले :"इसका तो सीधा सा उत्तर है कि सर्प तो केवल अपने जहर से और दंशन के भय से जान ले लेता है किंतु इस पृथ्वी का सबसे घातक प्राणी मानव ही है। जो अपने अनेक विध अस्त्र- शस्त्रों से प्राण हरण करता है।उसकी जबान में अमृत है तो विष भी है।उसकी दृष्टि में भी विष है औऱ उसका मन तो विष का सागर है।दो विरोधाभासी स्थितियों में वह कभी विष है तो कभी अमृत। इसलिए इस आदमी से सदैव सावधान रहना।वह कब किस रूप में विष वमन करने लगे; कुछ कहा नहीं जा सकता। इस कलयुग में तो अपना बेटा भी अपने पिता के साथ अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकता है।आदमी सर्प देखकर इसलिए डरता है कि वह उसे डंस न ले ! और सर्प इंसान से इसलिए भयभीत है कि वह उसकी हत्या न कर दे! सर्प को जब तक छेड़ा न जाए ,वह हानि नहीं पहुँचाता। किन्तु मनुष्य बिना  कारण भी किसी की जान लेने पर उतारू हो जाता है।"

 अच्छा तो अब ठीक है। और ध्यान से सुनो ।बाँबी से इक्यावन कदम दूरी पर तुम्हारे खेत की मेढ़ में पूर्व दिशा में इक्कीस फीट नीचे सोना गढ़ा हुआ है। कभी भी बड़ी आवश्यकता पड़े तो निकाल लेना। कहीं भी चर्चा मत करना। पता है न कि आदमी ही आदमी के लिए महाविष है।" 

"जी बाबा।"भोला बोला और देखते ही देखते बाबा अंतर्धान हो गए।

🪴 शुभमस्तु !

29.10.2022◆5.00पतनम मार्तण्डस्य।



किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...