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रविवार, 7 दिसंबर 2025

मानवता [ कुंडलिया ]

 712/2025


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                        -1-

मानवता में   ईश का,   बसता अतिशय अंश।

करता  वह   सत्कर्म ही, बनता  जन- अवतंश।।

बनता   जन-अवतंश, सदा मानव हित करता।

जब तक जीता व्यक्ति,विपिन में बाग बगरता।।

'शुभम्'    यही    सद्धर्म,विनाशें  उर -दानवता।

तज   दें  क्रूर स्वभाव,   कर्म   में भर मानवता।।


                         -2-

बढ़ते     ही   अब  जा  रहे,धरती पर वे  भार।

दानव    मानव-शत्रु   ये,  करते    नित्य प्रहार।।

करते    नित्य   प्रहार,  कहाँ   है अब मानवता।

करते   जन- संहार ,बढ़  रही    तम पामरता।।

'शुभम्'   कहाँ   हैं   ईश, दुष्ट   दानव हैं लड़ते।

दस के   होते    बीस,   क्रूर  दानव  दल बढ़ते।।


                          -3-

बचना     है   संसार    ये,    मानवता  से मित्र।

सबसे   पहला   धर्म है,   सुधरे  मनुज चरित्र।।

सुधरे   मनुज   चरित्र, कर्म  सात्विक  हों सारे।

प्रसरित  हो  शुभ   इत्र,नहीं हों सरि-सर खारे।।

'शुभम्' ईश ने सोच ,समझ कर की जग रचना।

करे  कर्म   जो   पोच, नहीं   दानव वह बचना।।


                         -4-

शुभता  सब  पहचानते, नर-नारी खग ढोर।

किंतु   नहीं  सर्वत्र   है,  मानवता    की भोर।।

मानवता  की   भोर,  भरोसे  अपने-अपने।

नर तन  में जो चोर, हिंस्र पशु दानव जितने।।

'शुभम्' न मानव नेक,कभी दिखलाए लघुता।

बसता   वहाँ  विवेक, नहीं त्यागे वह शुभता।।


                         -5-

बोया     जिसने   बीज  है,  संतति  में समुदार।

मानवता     त्यागे    नहीं,लेता    जगत उबार।।

लेता   जगत   उबार,   वही   हर   पीढ़ी जाए।

शुभता का वह   बीज, सदा  फलवान  कहाए।।

'शुभम्'   करे     दुष्कर्म,   अंततः नर वह रोया।

यही   कथ्य   का  मर्म, बीज जिसने शुभ बोया।।


शुभमस्तु !


05.12.2025●9.00 आ0मा0

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गुरुवार, 18 सितंबर 2025

संतान [ कुण्डलिया ]

 568/2025

    

                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करते  विनती  ईश  से,  मिले  शुभद  संतान।

वंश   वृद्धि    होती   रहे,  देना  प्रभु वरदान।।

देना   प्रभु   वरदान,ख्याति दुनिया में   छाए।

कुल का हो शुभ नाम, पिता का मान  बढ़ाए।।

'शुभम्'  जननि  का  दूध, लजाने से वे   डरते।

संतति  रहे    प्रबुद्ध, वंदना   प्रभु  से   करते।।


                         -2-

जैसा   जिसका  कर्म  हो,फल उसका  संतान।

मात-पिता    के    मर्म  से, उपजे पुत्र महान।।

उपजे     पुत्र     महान,    सुताएँ   रमा दुलारी।

खेलें   आँगन   बीच, भरें नित ही किलकारी।।

'शुभम्' न करना  काम,कभी कुछ ऐसा-वैसा।

फले   आम से   आम,  मधुर रसपूरित जैसा।।


                         -3-

चाहत    शुभ  संतान  की, देना  नहीं कपूत।

सूरज - सा  जगवंद्य  हो,यद्यपि एक प्रभूत।।

यद्यपि एक   प्रभूत, ज्योति जग में चमकाए।

मात -पिता कुल  नाम, ध्वजा ऊँची फहराए।।

'शुभम्'  पिता  का मान,सदा ही देता  राहत।

राम  भरत  या  श्याम,तभी पूरित हो  चाहत।।


                         -4-

मानव   या  खग  ढोर  सब, जन्माते संतान।

हो गुणज्ञ  यह  तत्त्व  की,ऊँची बात महान।।

ऊँची   बात   महान, न   संख्या जैसे मछली।

चन्द्र  सूर्य - सा  मान,नहीं मेघों की बिजली।।

'शुभम्'   करे  कल्याण,वंश का बने न दानव।

संतति   शुभद  प्रमाण, सदा ही रहती मानव।।


                            -5-

माता      को  जो   पूजती,  श्रेष्ठ वही  संतान।

आजीवन  निज  पितृ का,करे नहीं अपमान।।

करे   नहीं   अपमान,  वंश   में  नाम   कमाए।

खोले  प्रगति    वितान, समय को नहीं  गँवाए।।

'शुभम्' वही  है   धन्य,पिता संतति जो   पाता।

जननी     वही   अनन्य,पूज्य कहलाए    माता।।


शुभमस्तु !


18.09.2025●5.30 प०मा०

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शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

शिक्षक [ कुंडलिया ]

 503/2025


                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

दाता    हैं  वे    ज्ञान  के, शिक्षक जिनका  नाम।

नित प्रति उठकर कीजिए, उनको नमन प्रणाम।।

उनको   नमन   प्रणाम, ज्योति से तुम्हें   जगाए।

करते   तम  का  नाश, उजाला भर- भर   जाए।।

'शुभम्' प्रथम   गुरु एक,जिसे कहता जग माता।

दूजे     जनक    महान, ज्ञान  के शिक्षक   दाता।।


                          -2-

अपने   जो  भी   ग्रंथ   हैं, उनको शिक्षक मान।

कभी    नहीं   वे  रूठते ,सदा  ज्ञान की  खान।।

सदा    ज्ञान   की  खान, सदा  वे तत्पर  रहते।

उनमें    नहीं   गुमान, नहीं  कुछ उलटा  कहते।।

'शुभम्'   करें    संकल्प,   पूर्ण  हों सारे  सपने।

शिक्षक   हैं    साकार,  ग्रंथ सब पढ़ना अपने।।


                         -3-

अपने    इस   संसार  में,जिनसे मिलता   ज्ञान।

शिक्षक   हैं   सारे    यहाँ, करना उनका   मान।।

करना    उनका   मान, चाँद   सूरज या    तारे।

लघु   पिपीलिका  एक,विटप  खग जंतु  हमारे।।

'शुभम्'  पात्र  की  बात,पात्रता  के शुभ  सपने।

करते   हैं  वे  पूर्ण, जगत  के  साधन    अपने।।


                         -4-

पहले     पहचानें   सदा, कौन यहाँ सत   पात्र।

शिक्षक  या  गुरु  मान लें,  एक वही हो   मात्र।।

एक   वही   हो  मात्र, पतन  से  सदा    बचाए।

लक्ष्य  प्राप्ति  हो  सिद्ध, ज्ञान  का मान बढ़ाए।।

'शुभम्'  शिष्य  तू   सीख,ज्ञान  को ऐसे  गह ले।

जैसे   चुम्बक    लौह ,  पकड़ता सबसे   पहले।।


                          -5-

जितने  इस  संसार   में,  नर  या नारि   महान।

शिक्षक ही   की   देन हैं, उनके कौन   समान।।

उनके  कौन   समान,   गगन  में सूरज   जैसे।

तम   का   करता  नाश,सभी शिक्षक  हैं  वैसे।।

'शुभम्'   ज्ञान  के  दीप, सभी  गुरु होते इतने।

होते   वही   महान,  चमकते   सूरज   जितने।।


शुभमस्तु !


04.09.2025●10.00प०मा०

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बुधवार, 3 सितंबर 2025

श्रीगणेश [ कुण्डलिया ]

 489/2025


                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

श्रीगणेश   कविता   करूँ, कुंडलिया  का छंद।

वंदहुँ   प्रथम   गणेश  को,  छाए छवि आनंद।।

छाए    छवि    आनंद,  शारदा  माता   आएँ।

सुमधुर    वीणा   राग, बजाकर  तान  सुनाएँ।।

'शुभम्' सुनें नव गान,कमलासन  विष्णु महेश।

कुंडलिया   का   छंद, काव्य  मधुरा  श्रीगणेश।।


                         -2-

गौरी    सुत    हेरंब    की,  महिमा अपरंपार।

शुभम   सुमुख  संकट  हरें,विघ्नेश्वर दें   तार।।

विघ्नेश्वर   दें   तार, महाबल शिवसुत   भारी।

लेते     शीघ्र    उबार,  पिता जिनके त्रिपुरारी।।

'शुभम्'  गणाधिप   धीर,पधारें घर की   पौरी।

द्वैमातुर      विघ्नेश,  प्रतीक्षा  करतीं     गौरी।।


                            -3-

करके   धरा-परिक्रमा, जनक जननि  के पास।

आए   पुत्र    गणेश जी,  मन   में   है  उल्लास।।

मन  में    है   उल्लास, प्रथम  हो उनकी   पूजा।

कपिल    बुद्धि   के  नाथ,नहीं  कोई  है  दूजा।।

'शुभम्' मिला आशीष,पिता-माँ का भर-भर के।

एकदंत    गजवक्र, मुदित जननी को     करके।।


                          -4-

आओ     हम    आराधना, करते  हैं सुविचार।

श्रीगणेश   भगवान    की,   महिमा अपरंपार।।

महिमा  अपरंपार,  विनायक  विकट  गदाधर।

मंगलमूर्ति     उदार,  सुमुख गजवक्र  समादर।।

'शुभम्' जगा अनुराग, प्रमुख चरणों  को पाओ।

करें   नमन  हम आज,सभी मिल पूजें आओ।।


                         -5-

दाता   हो    सदबुद्धि    के, भालचंद्र  भगवान।

मात -पिता  की  भक्ति  के,एक निदर्श   महान।।

एक    निदर्श   महान, प्रमुख विघ्नेश  विधाता।

एकाक्षर      हेरंब,   युगल   पद शीश   नवाता।।

'शुभम्'  उमा-शिव  पुत्र, नेह  की प्रतिमा  माता।

विघ्न  हरो  प्रभु  शीघ्र,चतुर्भुज सुख के    दाता।।


शुभमस्तु !


02.09.2025● 9.45 प०मा०

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शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

महिमा [ कुण्डलिया ]

 450/2025


                


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

महिमा    होती    कर्म   की, करे कर्म जो   व्यक्ति।

ज्योति  न  छिपती भानु की,प्रसरित जग में शक्ति।।

प्रसरित  जग  में शक्ति, तमस मिट जाए    सारा।

रहें      न   शेष   उलूक, न  जुगनू चमके    तारा।।

'शुभम्'   सिद्धियाँ  आठ, मिलेंगी अणिमा गरिमा।

मिले    सभी   का   साथ, बढ़ेगी जग  में महिमा।।


                         -2-

महिमा      भारतवर्ष    की, फैली  है  चहुँ   ओर।

गुरु   है   सारे   विश्व  का,  सुखद सुहाना  भोर।।

सुखद   सुहाना  भोर, कनक की चिड़िया  जैसा।

समझ    नहीं   कमजोर, नहीं कुछ ऐसा    वैसा।।

'शुभम्' राम - आदर्श, श्याम की श्यामल प्रतिमा।

बढ़ा    रही   उत्कर्ष, देश   की उज्ज्वल  महिमा।।


                           -3-

महिमा   कम  करना नहीं, मात-पिता  की  लेश।

धर्म  कर्म  में    श्रेष्ठ    हो, करना  ज्ञान   निवेश।।

करना   ज्ञान  निवेश,  उच्च  शिक्षा कर   धारण।

पाप  नहीं   हों  शेष,  करें  अघ ओघ   निवारण।।

'शुभम्' उच्च रख नाक,सबल संतति की तनिमा।

बना   रहे   विश्वास, अमर  माँ पितु की महिमा।।


                         -4-

महिमा    पाँचों  तत्त्व  की, जगती  में   विख्यात।

शुल्क   बिना  मिलते  सभी,अनल वायु  हे तात।।

अनल वायु  हे  तात, धरणि  जल  ये  नभ नीला।

करें     नहीं   बरबाद,  आप  या   गेह   क़बीला।।

'शुभम्'   सदा   उपयोग,घटे  क्यों इनकी   गरिमा।

सकल   सृष्टि  का  मूल, पंच तत्त्वों की  महिमा।।


                         -5-

महिमा   शिक्षा  ज्ञान  की, सदा  रही  अव्यक्त।

जिसने  जाना  प्रगति का, ये सोपान   सशक्त।।

ये      सोपान   सशक्त,  बने  वे  महा    धुरंधर।

पाया    आसन    उच्च,  शोभते  बनें     पुरंदर।।

'शुभम्' न  करना  नष्ट, बनाए रखना     गरिमा।

शिक्षा   करे  विकास,  बढ़ाए जन की   महिमा।।


शुभमस्तु !


21.08.2025 ● 8.45प०मा०

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शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

भारत देश महान [ कुण्डलिया ]

 434/2025


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

गंगा   यमुना   नित   बहें,संग सरस्वति   धार।

पावन  यह   धरती  करें,सरसाएँ  बहु    प्यार।।

सरसाएँ   बहु  प्यार, हिमाचल  रक्षक   प्रहरी।

लेता   हमें  उबार,  सभ्यता  संस्कृति   गहरी।।

'शुभम्' नमन दिन-रात,रहे हर जन-जन  चंगा।

भारत  देश  महान,  बहें  सुरसरि नित   गंगा।।


                         -2-

आतीं -जातीं     देश   में, षड ऋतुएँ हर    साल।

पावस कभी  वसंत है, शरद  शिशिर की   ताल।।

शरद   शिशिर   की   ताल,ग्रीष्म हेमंत   मनोहर।

नर्तित    मोर   मराल,   देश  की सरित   महीधर।।

'शुभम्' सुखद शुचि प्रात,कली कोमल   मुस्कातीं।

भारत   देश     महान,  सभी   ऋतु आतीं-जातीं।।


                         -3-

धरती   नदियाँ  बेल तरु,गिरि सागर खग  ढोर।

जन-जन  से  अति प्यार है,बरसें घन  पुरजोर।।

बरसें     घन    पुरजोर, करें  कलरव  सरिताएँ।

पंकज    भरे     तड़ाग,   महकती  हैं  शुभताएँ।।

'शुभम्'  देश  की शान,  लहर  झंडे की  भरती।

भारत    देश   महान, स्वर्ग-सी पावन   धरती।।


                         -4-

आजादी    हमको   मिली, भाग  गए  अंग्रेज।

सुख  की   साँसें  ले रहे, सोते सुख की  सेज।।

सोते   सुख  की सेज,  सकल  ये भारतवासी।

करते      स्वेच्छाचार,   इसी  से  हमें  उदासी।।

'शुभम्'    यही   संदेश,  यही  है नेक  मुनादी।

भारत    देश   महान,   बचाएँ   हम आजादी।।


                         -5-

मनमानी    करना    नहीं,  देश  भले  आजाद।

जिनके  तप  बलिदान  से,  हुए करें  भी  याद।

हुए    करें    भी   याद,  फहरता कहे    तिरंगा।

लहराता    शुभ    सिंधु, पावनी बहती   गङ्गा।।

'शुभम्'   त्याग  का पेड़,फला है वही  निशानी।

भारत    देश  महान,   करें  मत हम मनमानी।।

शुभमस्तु !


14.08.2025●10.45 प०मा०

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गुरुवार, 7 अगस्त 2025

त्यौहार [ कुण्डलिया ]

 412/2025

     

               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

जीवन  में  त्यौहार  का, अपना अहं महत्त्व । 

ज्यों  वाहन  में तैल  का, संचारित है  तत्त्व।।

संचारित   है  तत्त्व,   वेग   से चलती  गाड़ी ।

दौड़े  सरपट   तेज, राह  में   रहे   न  ठाड़ी।।

'शुभम्' फ़टी हो जेब,शीघ्र ही सिलते सीवन।

वैसे   हैं  त्यौहार,  सरस  करते  नर जीवन।।


                         -2-

रक्षाबंधन   आ  गया,   भ्रात-भगिनि  त्यौहार।

दर्शन   सोदर  नेह  का, आपस  का व्यौहार।।

आपस  का  व्यौहार, बंधु भगिनी को  लाता।

रक्षा    का   नव  सूत्र,  कलाई  में  बंधवाता।।

'शुभम्' सनातन रीति, प्रीति का शोभित चंदन।

भारत   की   उर-तीत,  आ   गया रक्षाबंधन।।


                         -3-                        

सावन  में  त्यौहार   हैं, एक  नहीं शुचि  पाँच।

हैं    हरियाली   तीज सँग,  नागपंचमी   साँच।

नागपंचमी          साँच,     नेहमय रक्षाबंधन।

पंद्रह   आठ   महान, करें  प्रेमिल अभिनंदन।।

'शुभम्' कृष्ण हरि जन्म, इसी में है मनभावन।

ऋतुरानी   बरसात, मास  लाया शुभ  सावन।।


                         -4-

मानव  सभ्य  समाज   में,  रंग बड़े विपरीत।

भ्रात -भगिनि   त्यौहार  से,लेते हैं उर जीत।

लेते     हैं   उर   जीत,  नहीं   पूजें परनारी।

करते   बहु  दुष्कर्म, चलाते  तन पर  आरी।।

'शुभम्' विडंबन काल,मनुज क्यों ऐसा दानव।

कहता हम  हैं  सभ्य,हीन क्यों इतना मानव।।


                         -5-

आओ   हम  त्यौहार  से,  ले  लें इतनी  सीख।

नहीं   ढोर  खग से  पड़े,  हमें माँगनी   भीख।।

हमें  माँगनी  भीख, सत्त्व गुण हम सब  धारें।

जमा तमस  का  कीट,उसे  मन से धिक्कारें।।

'शुभम्'  नेह   के गीत,परस्पर मिलकर गाओ।

अच्छाबन्धन   भव्य,मनाएँ  मिलकर  आओ।।


शुभमस्तु !


07.08.2025●9.00प०मा०

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शुक्रवार, 25 जुलाई 2025

विचलित [ कुंडलिया ]

 371/2025

      

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करना मत विचलित कभी,मन को धरना धीर।

कहलाता    है  आँधियाँ, चलता  तेज  समीर।।

चलता   तेज   समीर, लुप्त  प्रियता हो  जाती।

क्षुब्ध   बने  सरि  तीर,  सौम्यता  नष्ट  कराती।।

'शुभम्'  धैर्य   की  धार,सदा ही मन  में  भरना।

विचलित मत हो लेश,सोचकर कारज  करना।।


                        -2-

अपना   सुंदर  पथ  कभी, नहीं छोड़ना   मित्र।

उर  विचलित  करना नहीं,रखना उच्च  चरित्र।।

रखना उच्च चरित्र,पतित मत तन- मन करना।

बहा   सुगंधित   इत्र,  सदा खुशबू ही  भरना।।

'शुभम्'  मनुज  की देह,क्षीण होती ज्यों सपना।

बना  प्रेम  का  गेह, नहीं कुछ जग में  अपना।।


                           -3-

जपना  माला   प्रेम  की, सोच जगत- कल्याण।

विचलित मन करना नहीं,यथाशक्य कर  त्राण।।

यथाशक्य  कर  त्राण, धर्म से विमुख  न  होना।

करें    न  ऐसा   काम, बाद  में  पड़ता   रोना।।

'शुभम्'   कमाएँ   नाम, आग में यद्यपि   तपना।

करना  पर  उपकार,  प्रेम  की माला    जपना।।


                         -4-

मानव योनि अमूल्य  है, मत विचलित कर पाथ।

मन   है  एकल  सारथी,  दस  घोड़ों का   साथ।।

दस   घोड़ों   का   साथ,   बाग को थामे   रखना।

 चले  न  पंथ  कुपंथ, स्वाद  मत सबके चखना।।

लेकर    कभी   अभक्ष्य,  उदर में भरता   दानव।

'शुभम्'   बना   निज लक्ष्य,बने रहना ही  मानव।।


                          -5-

वन   में  घर  में  कुंज  में, या  कानन  के   बीच।

विचलित मन करना नहीं,कमल खिलें या कीच।।

कमल  खिलें  या  कीच, मोहिनी  हो   मधुबाला।

वृथा  मोह    मधु प्रीत,  बड़ा है धोखा   आला।।

'शुभम्' न पथ  को भूल, छद्मता है कन - कन में।

विचलित मत कर मीत,सुदृढ़ता रख घर वन में।। 


शुभमस्तु !


25.07.2025●8.45आ०मा०

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शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

सावन [ कुंडलिया ]

 351/2025

            

                   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

सावन  सुखद  सुहावना,सलिला बहे अबाध।

गरज- गरज बरसे जलद, पूर्ण हुई भू- साध।।

पूर्ण   हुई   भू-साध,  हरी  पहनी शुभ   साड़ी।

कृषक  चले  निज  खेत,साथ में बैल अगाड़ी।।

'शुभम्' हर्ष  की  रेख, नयन सबके मनभावन।

ऋतु रानी बरसात, बरसता निशि दिन सावन।।


                         -2-

पावस   ऋतु   मनभावनी,  बरसे सावन   मास।

नर - नारी   खग  ढोर   सब,लगा रहे  थे  आस।।

लगा  रहे  थे   आस,स्वाति  का प्रेमी    चातक।

तजे  न  प्रण को  लेश, नहीं करता तृण पातक।।

'शुभम्' भक्ति की सीख, मनुज को देता थ्यावस।

बीता  मास   अषाढ़,  आगमित सावन   पावस।।


                         -3-

सावन   आया   झूमकर, पड़ा न झूला   एक।

कजरी  और  मल्हार का, गीत न गाया  नेक।।

गीत  न  गाया  नेक,  लीन   हैं अब ब्रजबाला।

मोबाइल    की  टेक,  दिखातीं गरम मशाला।।

'शुभम्'  नारियाँ  गीत,  नहीं गातीं मनभावन।

अमराई    में   देख,  शून्य  में तकता  सावन।।


                         -4-

सावन    में      दिखती    नहीं, वीरबहूटी   नेक।

नहीं    निकलते    केंचुआ, नहीं  गिजाई   एक।

नहीं      गिजाई     एक,   मात्र   दादुर     टर्राते।

जुगनू   लेकर  टॉर्च, कभी   घर में दिख   जाते।।

चींटे       रेलमपेल,   घूमते   घर   या     आँगन।

बीत  गया  वह काल,अलग होते जब   सावन।।


                         -5-

सावन    में    देखो  भरे, सरिता सागर    ताल।

झर-झर- झर बुँदियाँ झरें,प्रमुदित नारी   बाल।।

प्रमुदित   नारी   बाल,  कृषक  खेतों  पर  जाते।

साथ    लिए  हल - बैल, गीत  गाते मन   भाते।।

'शुभम्'    बाग   में   कूक,सुनाई  देती   पावन।

विरहिन   देखे   बाट, सहज सरसाया   सावन।।

शुभमस्तु !


17.07.2025 ●11.00प०मा०

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शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

चातक [कुंडलिया]

 336/2025


                   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

चातक  की हठसाधना,  का न जगत में जोड़।

पीता  केवल   स्वाति जल,कौन करेगा   होड़।।

कौन    करेगा    होड़, न पीता सुरसरि   गंगा।

लेता   है   मुख   मोड़,  प्रतिज्ञा  कर हो   चंगा।।

'शुभम्' मनुज को सीख, यही दे करें न पातक।

लें उससे कुछ ज्ञान, कहा जाता खग   चातक।।


                         -2-

रसना  को  रटना  यही, पिए  स्वाति जल  बूँद।

और नहीं  जल  चाहिए,  रटे   नयन निज मूँद।।

रटे   नयन  निज  मूँद, एकटक ध्यान   लगाए।

देख   रहा  नभ    ओर,  प्रतिज्ञा  पूर्ण   कराए।।

'शुभम्'    वही  है   श्रेष्ठ, करे जो पूरा   सपना।

प्रेरक    चातक   नेक, नियंत्रण  में  है   रसना।।


                         -3-

बादल से  याचन करे,  पिउ-पिउ पुण्य  पुकार।

मानसून   के   बादलो, तुमसे  मुझको   प्यार।।

तुमसे  मुझको  प्यार, एक प्रण सदा निभाऊं।

धरती   का  जल  पान,कभी करने क्यों जाऊँ।।

'शुभम्'  यही विश्वास,आज का मत होना कल।

मैं   चातक खग एक,नेह करता प्रिय   बादल।।


                         -4-

चातक  को  गुरु मानिए, प्रण  की लेना सीख।

फैला   सबके  सामने ,  नहीं   माँगना   भीख।।

नहीं  माँगना    भीख,  पात्र  ही भरता   झोली।

होती  है  पर्याप्त ,  नेह   की अरुणिम    रोली।।

'शुभम्'    प्रतिज्ञा   हेतु,  नहीं करना है  पातक।

प्रेरक   गुरु   सारंग,  जगत  में कहते   चातक।।


                        -5-

शिक्षा  देता  एक  ही, स्वाभिमान रख  मित्र।

नाशवान    नर  देह   है,केवल  अमर  चरित्र।।

केवल अमर चरित्र, सदा  छवि सुघर  बनाना।

करें    पीढ़ियाँ   याद, कर्म का  धर्म निभाना।।

'शुभम्'  श्रेष्ठ  सारंग, माँगता लेश  न  भिक्षा।

देख - देख  हो  दंग,जगत  खग देता  शिक्षा।।


शुभमस्तु !


10.07.2025● 6.15प०मा०

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शनिवार, 5 जुलाई 2025

बालक [ कुंडलिया ]

 329/2025

           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

       

                        -1-

होते  हैं  सब  एक  दिन,बालक अति  नादान।

अनजाने    भोले     भले,   करते अनुसंधान।।

करते     अनुसंधान,   जानना    चाहें  दुनिया।

मात-पिता के प्राण,अलग ही उनका  गुनिया।।

'शुभम्' अलग ही सोच,अलग ही खाते  गोते।

कठिन कभी हो लोच,विविध रँग बालक होते।।


                         -2-

बालक हैं ये आज के,कल का सफल भविष्य।

समिधा   खोजें   कर्म  की,देंगे नवल हविष्य।।

देंगे  नवल   हविष्य, देश   की प्रगति  कराएँ।

ज्ञान  और  विज्ञान,  देश  का  ध्वज  फहराएं।।

'शुभम्'   हमें   है  आश,बनें भारत के   पालक।

होगा  प्रबल  उजास, करें  अधुनातन  बालक।।


                         -3-

पहले   से  अब हैं  कहाँ, बालक  वे नादान।

उनकी   बुद्धि  कुशाग्र  है,काट रहे हैं  कान।।

काट रहे  हैं  कान, बड़ों के क्या अब  कहना।

बने   हुए  हैं    पुत्र, देश  का अनुपम  गहना।।

'शुभम्'  विश्व  में नाम,उच्च नहले पर   दहले।

समझें    मत   नादान,  नहीं  वे भोले  पहले।।


                         -4-

बनना  है  माँ- बाप  को, संतति  का आदर्श।

बालक  अनुकृतियाँ  बनें, करें गगन संस्पर्श।।

करें  गगन  संस्पर्श, कर्म का ध्वज फहराएं।

करें   जगत   में  नाम, विश्व में नाम कमाएँ।।

'शुभम्'  बनाएँ   लीक, जगाना जाग्रत रहना।

पावन  परम  प्रतीक, नवल मानक है बनना।।


                         -5-

बालक   जिज्ञासा  करें,  करना  नहीं  निराश।

बढ़े   ज्ञान  सीखें  नया, मिले सुखद विश्वास।

मिले सुखद विश्वास, प्रगति  की खुलती राहें।

स्वावलंब     आधार,    खोलता   भावी   बाँहें।।

'शुभम्' खुलें  भंडार, भाग्य के हों संचालक।

उर  में   भरें  उजास, भाग्यशाली  हैं  बालक।।


शुभमस्तु !


04.07.2025●8.00 आ०मा०

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शनिवार, 19 अप्रैल 2025

सबका सम अधिकार [कुंडलिया]

 210/2025

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करते   हैं   उत्पात   वे,  जिनको देश  समाज।

जनहित  भी  भाता  नहीं,विकृत करते साज।।

विकृत  करते   साज, देश  की शांति  मिटाते।

गिरे  किसी  पर   गाज,   खड़े- बैठे पगुराते।।

'शुभम्'    देश   के   कोढ़, नहीं  वे रब से डरते।

बेशर्मी   ली   ओढ़, सभी को व्याकुल करते।।


                         -2-

करना  ही  उत्पात  को,जिनका लक्ष्य  प्रधान।

शांति  सौख्य  सौहार्द  के, सदा काटते कान।।

सदा    काटते   कान, नहीं   समता से    नाता।

जिन्हें मिला  वरदान, नहीं मानव मन   भाता।।

'शुभम्'  काठ   के  कीट, नींद सोते की हरना।

करें   सदा   ही  बीट, उपद्रव नित ही  करना।।


                         -3-

सबका    सम   अधिकार   है, समतावादी  देश।

ऊँचनीच  का  भेद  क्यों,यद्यपि विविध  सुवेश।।

यद्यपि   विविध  सुवेश,  करें  उत्पात   अनाड़ी।

चाहत   निजी   विकास, चले उनकी  ही  गाड़ी।।

'शुभम्' सभी को काम,मिले करुणा कर रब का।

एक   सभी   का  राम,  देश ये भारत   सबका।।


                         -4-

दानव   दल   बढ़ने  लगा, नित्य  करे उत्पात।

दाँव    लगाकर    देश   में,  पहुँचाए आघात।

पहुँचाए आघात,  हानि जन- धन की  करता।

दिवस  न   देखे   रात,   सुधारे  नहीं  सुधरता।।

'शुभम्'   देश  में  नाग,पनपते मिटता  मानव।

नहीं शांति का दूत, शत्रु जन -धन  का  दानव।।


                            -5-

बोया    बीज  बबूल   का, अमराई  के   बीच।

खिलना  फूल   सरोज का,  गाढ़ी-गाढ़ी  कीच।।

गाढ़ी-गाढ़ी    कीच,   शूल   की  बाढ़   सताए।

जन्म-जन्म   का  नीच, कहो कैसे वह   भाए??

'शुभम्' आज भी मूढ़, नहीं जागा क्यों   सोया?

होता     है    उत्पात,  शूल का बिरवा    बोया।।


शुभमस्तु!


18.04.2025 ●12.15प०मा०

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गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

आदर [कुंडलिया]

 201/2025 

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करिए  आदर  अतिथि  का, आ जाए  जो  द्वार।

अतिथि  देव  सम   पूज्य है, रहना सदा    उदार।।

रहना    सदा  उदार, भोज    पानी  सब    देना।

आया  है  किस   काज,  जान  वाणी  से   लेना।। 

'शुभम्' न विष को घोल,कष्ट उसके सब   हरिए।

दे   आदर   सत्कार,अतिथि का स्वागत   करिए।।


                         -2-

जनता    से  नेता  सभी,  चाह  रहे हैं    मान।

कदम-कदम   आदर  मिले, भले न टूटी   छान।।

भले  न  टूटी  छान,  न  जनता किंचित  भाए।

झूठे   करे   बखान,   झूठ  आश्वासन    लाए।।

'शुभम्' जोड़ता   हाथ, दिखाकर आँखें  तनता।

कड़वा  लगता   क्वाथ,चूसता  भूखी    जनता।।


                         -3-

सबका   आदर   कीजिए,  करे  नहीं  अपमान।

मात -पिता गुरुजन सभी,पूज्य अपरिमित शान।।

पूज्य   अपरिमित शान, बड़े - छोटे हों     कोई।

एक  सभी   की   चाह,  भले  चम्मच बटलोई।।

'शुभम्'  गया जब  मान, महाभारत आ  धमका।

इसीलिए   धर  ध्यान,करें हम आदर    सबका।।


                         -4-

करता आदर  अन्य  का, पाता  है वह  मान।

श्वान -पुत्र  पहचानता,  मानुष  प्रेम निधान।।

मानुष  प्रेम  निधान, पाँव को पुनि- पुनि चाटे।

भले  ऐंठ  लो  कान, नहीं कण भर भी  काटे।।

'शुभम्' प्रेम विश्वास,श्वान का कभी न मरता।

आजीवन  रह  पास, गृही का आदर करता।।


                         -5-

भूखे   आदर   के  सभी, निर्धन  और  अमीर।

स्वाभिमान सबका  बड़ा,इससे सभी   अधीर।।

इससे  सभी  अधीर, तनिक अपमान  न  झेलें।

उड़ते  सरिस  समीर,  बड़ी विपदा भी  ले लें।।

'शुभम्' न कर व्यवहार,कभी मानुष से रूखे।

खुले   मान   का   द्वार, सभी   हैं इसके भूखे।।


शुभमस्तु !


10.04.2025●8.00 प०मा०

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गुरुवार, 27 मार्च 2025

अपराध [ कुण्डलिया ]

 182/2025

        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

करता  है  जो जानकर,जीवन में अपराध।

क्षम्य  नहीं  होता कभी,दंड योग्य निर्बाध।।

दंड    योग्य    निर्बाध,  दंड    देते दंडालय।

मिले कर्म का स्वाद,बुरे का यही फलाशय।।

'शुभम्' बुद्धि से सोच,होश में पर धन हरता।

लेता जो उत्कोच, कर्म अनुचित वह करता।।


                         -2-

अपने  जैसा   जानिए,  सबको  ही  हे  मीत।

नहीं  प्रताड़ित  कीजिए, होता गलत प्रतीत।

होता  गलत   प्रतीत,  यही  अपराध बुरा है।

लगता  अपनी   पीठ ,  वेदना  मूल  छुरा  है।।

'शुभम्' बिना शुभ  काम,  न देखे ऊँचे सपने।

सबमें   रहते  राम, समझ सबको ही  अपने।।


                         -3-

मानव दिखते एक से,बाहर  से अति भद्र।

सत्कर्मों  से  ही बनें,दिव्य करे जग कद्र।

दिव्य  करे  जग कद्र,करें अपराध हजारों।

रहते   काराधीन,   दंड   भुगतें युग चारों।।

'शुभम्' मनुज की देह, किंतु वे होते दानव।

कहीं न उनका गेह, सदा अपराधी मानव।।


                           -4-

चोरी करें  छिनैतियाँ , नर-नारी व्यभिचार।

गबन मिलावट नित्य ही,हैं अपराध अपार।।

हैं अपराध  अपार,झूठ भी उचित न होता।

जल में पय की धार,लीद में धनिया रोता।।

'शुभम्' सदा ही ठगी,जा  रही जनता भोरी।

लाखों चोर  लबार, करें चरितों की चोरी।।


                           -5-

नेता    हो    या  संत के , वसनों में यह   रोग।

जगत व्याप्त जन मात्र में,लगें बड़े अभियोग।।

लगें    बड़े   अभियोग,  बनें अपराध  भयंकर।

पुजते   जनता    मध्य,  बने   वे भोले   शंकर।।

'शुभम्'  न्याय के द्वार, खुले सबको जो  लेता।

शोषण   करके  देश, भले  हो रँगिया   नेता।।


शुभमस्तु !


27.03.2025●8.00प०मा०

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शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2025

भोले शंकर भाव के [कुंडलिया]

 127/2025

            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

भोले    शंकर   भाव   के, भूखे  भुव  भगवान।

लिंग  रूप  में  पूज्य हैं,जग  के कृपा  निधान।।

जग  के  कृपा  निधान,भस्म निज देह  लगाते।

मृगछाला    के   वस्त्र,  पहनते   वही  बिछाते।।

'शुभम्'  जपें  शिव   नाम, ध्यान से हौले-हौले।

सेवा  करें  अकाम,  भले   अति शंकर  भोले।।


                          -2-

रहते  हैं  कैलाश  पर,  शिव  शंकर निज  धाम।

संग उमा  सहधर्मिणी, सुत  गणेश शुभ   नाम।।

सुत  गणेश  शुभ  नाम,  षडानन अग्रज  भ्राता।

नंदी  संग   अकाम,  गीत   जग जिनके   गाता।।

'शुभम्'  हिमाचल अंक, कष्ट हिम के सब सहते।

अवढरदानी  शंभु,  शैल    पर निशिदिन   रहते।।


                         -3-

रखते   हाथ  त्रिशूल  जो, शिव शंकर  भगवान।

नीलकंठ  हर   शंभु   हैं,   हर  नटराज   महान।।

हर   नटराज    महान,  भक्ष्य  है आक   धतूरा।

बेल   फलों   का    भोग,  लपेटे   गात   समूरा।।

'शुभम्'   कंठ   है   नील,  भस्म  से  पूरे   सजते।।

हर- हर   जपते   भक्त, कमंडल कर   में   रखते।।


                         -4-

अपने     भारत  देश   में,  आदि  देव  भगवान।

ईश्वर   शंभु   गिरीश  हैं, शंकर  कृपा  निधान।।

शंकर   कृपा  निधान,  त्र्यम्बक  जपता    कोई।

कहें    पिनाकी   रुद्र,  नयन  की कोर   भिगोई।।

'शुभम्'    शुभंकर   ईश, बनाया शंकर  तप  ने।

आक   भाँग  से  तुष्ट, त्रिलोचन शंकर   अपने।।


                         -5-

आई  है  तिथि फाल्गुनी, शिव तेरस  यह  जान।

सभी   शिवालय  में  बजें, घण्टे घन- घन   मान।।

घंटे    घन-घन     मान,   त्र्यम्बक की हो   पूजा।

शिव  शंकर-सा   कौन,   जगत में कोई    दूजा।।

'शुभम्'   करें   जल  दान,और  पूजा  मनभाई।

शिवजी   रहें   प्रसन्न,  पावनी  तिथि   है   आई।।

शुभमस्तु !


27.02.2025●10.00प०मा०

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शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

वेदना [कुण्डलिया]

 108/2025

              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                         -1-

होती   तुम्हें  न वेदना,  चिंतन की यह   बात।

पीड़ित  करते  जीव को,करो मरण या   घात।।

करो  मरण  या घात,  नयन में लाज न  आए।

बाणों   की  बरसात, किसी  को  तू तड़पाए।।

'शुभम्'  उगे  वह  पौध,बीज जो जैसे   बोती।

बोए   बीज  बबूल,  शूल की  फसलें  होती।।


                         -2-

मानव   का   ब्रह्मांड   में, एक  सुघर  संयोग।

ये नर -तन  सौभाग्य  है, नहीं  मात्र उपभोग।।

नहीं   मात्र  उपभोग,  वेदना   नेह  न  जाना।

बन    जाएगा    रोग,  रहे    नित ऐंचकताना।।

'शुभम्'  चले सह नीति,न हो कर्मों से   दानव।

सहे  वेदना    देह,  बने    रहना     है   मानव।।


                         -3-

योगी  भोगी   हैं   सभी,  मानव  के बहुरूप।

कर्मो का   परिणाम   है,  मिलें शृंग भवकूप।।

मिलें   शृंग   भवकूप,  वेदना  को जो   जाने।

वही जीव को जीव , मनुज  को मानव माने।

'शुभम्' घूमते  श्वान,कहीं  पशु लँगड़े  रोगी।

करते  जो   सत्कर्म,  वही   बनते नर  योगी।।


                         -4-

साधन   की  उपलब्धता,  मानव  का  उपहार।

पशुवत   जीवन  जी  रहा,नहीं वेदना  प्यार।।

नहीं   वेदना  प्यार, मोह  ममता ज्यों   वानर।

सूकर मछली श्वान,कभी  फिरता ज्यों वनचर।।

'शुभम्'  वेदना  मूल, सदा  कर  प्रभु आराधन।

हाथ पाँव  मष्तिष्क,   सभी   हैं   तेरे   साधन।।


                         -5-

समता  का  सद  भाव  हो,  हिंस्र भाव  से दूर।

भाव   हितैषी   हो   सदा,  ममता  से  भरपूर।।

ममता    से    भरपूर,   नहीं    त्यागे मानवता।

बने   न   पशुवत   शूर,   क्रूरता   या दानवता।।

'शुभम्'  वेदना जन्य , मनों   में मारुति  दृढ़ता।

लघुता - गुरुता   छोड़, बसे मन साँची  समता।।

शुभमस्तु !


20.02.2025●8.45प०मा०

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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

सेवा से मेवा मिले [कुंडलिया]

 085/2025

            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                         -1-

सेवा    से    मेवा    मिले,   करके  देखो     आज।

मात-पिता  को   पूजिए, नित्य सजा  कर  साज।।

नित्य  सजाकर   साज, हृदय  की तुष्टि    प्रदाता।

प्रापक के सुख काज,गीत तन- कण- कण गाता।।

'शुभम्'     पूज्यता    पात्र,  सदा  नैया   के   खेवा।

नियमित  समय    निकाल, करें गुरुजन  की सेवा।।


                         -2-

मानव  का यह  धर्म  है, कर  गुरुवर की  भक्ति।

सेवा निज पितु-मात की,जन-जन से अनुरक्ति।।

जन-जन   से  अनुरक्ति, देश-सेवा जो  करता।

मिले  उसे  हर  शक्ति, नहीं  असमय है  मरता।।

'शुभम्'   वहीं  सौभाग्य,नहीं होता नर   दानव।

सेवा   है   शुभ   कर्म, बने   रहना  है    मानव।।


                            -3-

सबसे  बड़ा    समाज   है,   देश और    परिवार।

मात-पिता   इनसे    बड़े, मन में तनिक  विचार।।

मन  में   तनिक  विचार,प्रथम  इनकी  कर  सेवा।

निज   आचरण   सुधार,   नहीं  कोई  भी   मेवा ।।

'शुभम्' यही  सत  तीर्थ,   पिता-माता की मन से।

कर    ले    सेवा   नित्य,   बड़े  हैं ये ही    सबसे।।


                         -4-

सीमा  पर  निशिदिन   खड़े, अपने सीने   तान।

सेवा   करते   देश   की,   नित्य   बढ़ाते   मान।।

नित्य  बढ़ाते  मान, छोड़   परिजन प्रिय  भामा।

मिले  न सुख   के  साज,कमाते कम  ही नामा।

'शुभम्'  बड़ा   है  देश, नाम  ज्यों इनके    बीमा।

सेवक   रक्षक     वीर,  बचाते  अपनी    सीमा।।


                         -5-

करता  जो  सेवा  नहीं,   मात - पिता   की   पुत्र।

उसे  नहीं  है    विश्व में,    ठौर   लेश   भी   कुत्र।।

ठौर   लेश   भी  कुत्र, सदा  शापित वह   रहता।

नरक     भोगता    आप,  सदा वैतरणी   बहता।।

'शुभम्'    मूढ़   संतान,  दुसह दुख सहता मरता।

इसी लोक में स्वर्ग ,धरा  पर   सत सुत   करता।।


शुभमस्तु !


13.02.2025● 8.00प०मा०

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शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2025

हनुमत [कुण्डलिया]

 068/2025

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                      -1-

सागर   हो    प्रभु   ज्ञान  के,  गुणागार  हनुमान।

अतुलित  बल  के  धाम  हो, सबके कृपानिधान।।

सबके    कृपानिधान,  पवनसुत  नाम   तुम्हारा।

तीन   लोक   में  ख्यात,कपीश्वर  का  उजियारा।।

'शुभम्' आप बजरंग,कुमति को त्वरित मिटाकर।

देते    सुमति   अपार,   ज्ञान  के हनुमत   सागर।।


                          -2-

मेरे     हनुमत  ने  किया,  उड़कर सागर   पार।

सीताजी  की  खोज  का, मन में सुदृढ़  विचार।।

मन  में   सुदृढ़   विचार, राम  के काज   सँवारे।

अतुलित   बल   आगार,बाग वन लंक   उजारे।।

कंचन    वर्ण     सुवेश,  शीश पर केश    घनेरे।

'शुभम्'   कान  के   रंध्र,पड़े  कुंडल   प्रभु  मेरे।।


                          -3-

न्यारे   अद्भुत  रूप  में, शोभित प्रभु हनुमान।

वज्र  विराजे  हाथ  में,  अंबर  ध्वजा  वितान।।

अंबर   ध्वजा   वितान, जनेऊ  काँधे    साजे।

भूत  प्रेत  बैताल, देख  हनुमत  छवि   भाजे।।

'शुभम्'  केसरी   पुत्र,अवतरित शंकर   प्यारे।

वंदित  जग में आप, जगत में अनुपम  न्यारे।।


                         -4-

आतुर   हैं   हनुमान  जी, करें  राम  के   काज।

गुणागार    विद्वान    हैं,  बहु  विद्याधर   साज।।

बहु    विद्याधर   साज, राम की महिमा   सुनते।

रामानुज    के  संग, सिया प्रभु उर में     बसते।।

'शुभम्' दिखा लघु रूप,बुद्धि के अतिशय चातुर।

लंका   जला   अबाध, विकट हैं हनुमत आतुर।।


                           -5-

ऐसे    हैं    हनुमान  जी,  धरे   भयंकर   रूप।

असुरों  का  संहार  कर,   फहराएं ध्वज  यूप।।

फहराएं     ध्वज  यूप,  सँजीवन  बूटी    लाए।

हर्षित   हैं   प्रभु राम, लखन  के प्राण  बचाए।।

'शुभम्' करें   प्रभु  राम, प्रशंसा तुम हो    वैसे।

जैसे   भरत   सुबंधु,  वही   तुम हनुमत   ऐसे।।


शुभमस्तु !


07.02.2025●10.30आ०मा०

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सोमवार, 20 जनवरी 2025

कवि जीवन सौभाग्य [कुंडलिया]

 014/2025

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

चलते  अपनी  चाल से, कविगण ढंग  अनेक।

आम आदमी  से  सदा,  उनका भिन्न  विवेक।।

उनका  भिन्न    विवेक,  भाव   हों  भले पुराने।

बाँध    छंद   के    बंध,   गीत   गाते मनमाने।।

'शुभम्' रहें  जग बीच,नहीं वे जन को   छलते।

कविगण  अपनी चाल,जगत में उलटी  चलते।।


                         -2-

मानव तन  बड़भाग्य  है, कवि तन है  सौभाग्य।

करता  लाखों  पुण्य  जो,बनता कवि बहु  विज्ञ।।

बनता  कवि बहु  विज्ञ,अलग प्रभु की  संरचना।

लगता  वह  सामान्य, नहीं उससे कुछ  बचना।।

'शुभम्' अलग ही सोच,बुझाता सामाजिक दव।

कवि का यह सौभाग्य,आज जो दिखता मानव।।


                         -3-

बातें करता आज की,कल को लिया  समेट।

कवि ऐसा  वह  जीव है,जो न करे आखेट।।

जो  न   करे  आखेट, सभी की सेवा करता।

कविता ही  आधार, मनुज की पीड़ा हरता।।

'शुभम्' न  दिन में  चैन,नहीं सुखमय  हैं रातें।

कागज  कलम  दवात, सदा करतीं हैं  बातें।।


                         -4-

कविता होती आ रही,आया कलयुग आज।

त्रेता  सतयुग  और है,  द्वापर कृष्ण सुराज।।

द्वापर कृष्ण सुराज,आदि कवि जन्मे भूपर।

देख वियोगी क्रोंच, काव्य  जागा भ्रू ऊपर।।

'शुभम्'  वहाँ गंतव्य,जहाँ पहुँचे नभ सविता।

कवि है  ऐसा  जीव, करे जो  भावी कविता।।


                         -5-

बीते   युग  सदियाँ  गईं,  कवियों का  संसार।

एक  अलग  ही  रंग है, अनुपम  रूप  अपार।।

अनुपम   रूप  अपार, पिता माँ गुरु की  सेवा।

करते  शुचि  सम्मान, मिले  उनको नित मेवा।।

'शुभम्' योनि नर धन्य,सभी कवि जीवन जीते।

कहते    नहीं    विशेष,   बिताते  जैसे   बीते।।


शुभमस्तु !


15.01.2025●2.00पतनम मार्तण्डस्य।

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शनिवार, 28 सितंबर 2024

राधा:2 [कुंडलिया]

 446/2024

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

राधा    रसरंजिनि रमा, मनमोहन की     शक्ति।

भक्तों के मन  में  बसी, युग- युग  की अनुरक्ति।।

युग-युग की अनुरक्ति,धान्य धन सुख  की दानी।

संकटहारिणि   शीघ्र,  श्याम  की प्रेम   कहानी।।

'शुभम्'  जपें  जो  नाम,मिटें पल भर   में   बाधा।

रटो    राधिका   श्याम, कृपा  करती हैं     राधा।।


                         -2-

राधा   ने   ब्रज-गाँव   में,लिया  सुघर  अवतार।

रावल  में   माँ   कीर्ति  का, स्वप्न हुआ  साकार।।

स्वप्न     हुआ     साकार, पिता वृषभानु  तुम्हारे।

उदित  हुए     सौभाग्य,  गाय   बहु पालनहारे।।

'शुभम्'   कृष्ण हरि रूप,मिटाते जन की   बाधा।

बने  रमापति   श्याम,  संग   नित उनकी  राधा।।


                         -3-

राधा    मय   मन को करो, मिल जाएंगे   श्याम।

त्रेतायुग    में    राम   थे,  द्वापर  सँग  बलराम।।

द्वापर   सँग     बलराम, शेषशायी प्रभु     न्यारे।

सोलह   कला   प्रधान,  नंद यशुदा के     प्यारे।।

रानी   षोडश    सहस, श्रेष्ठ ऊपर बिन     बाधा।

पटरानी   भी   आठ, 'शुभम्' शोभित  हैं  राधा।।


                         -4-

राधा  धारा   प्रेम  की, ज्यों  जमुना की    धार।

राधा    रस में  जो   रमा,  उसका हो    उद्धार।।

उसका  हो   उद्धार,कृष्ण  -  रँग में  अनुरंजित।

ब्रज की प्रेम फुहार,बाग ज्यों कोकिल गुंजित।।

'शुभम्'  जीव आधार, श्याम का जिसने   साधा।

करतीं   नेह   अपार,   प्रेम   बरसातीं     राधा।।


                         -5-

राधामय    संसार    है,  धन   की  देवी   एक।

नेह   राशि  भंडार  वे,कृष्ण प्रिया शुभ    नेक।।

कृष्ण  प्रिया   शुभ नेक, युगों की नव अवतारी।

नेहशील  शुचि कांति, विघ्न बहु नाश सँहारी।।

'शुभम्' जप  रहे नाम,श्याम नित जाती  बाधा।

हे जन जप  लो  श्याम,  निरंतर राधा - राधा।।


शुभमस्तु !


27.09.2024●8.00आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...