गुरुवार, 23 सितंबर 2021

बेटी के प्रति 🪅

  

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अपने   पिता   के   बाग  की,

बेटी   तू   नन्हीं    पौध     है।

रोपूँ   वहाँ   शुभ    बाग़    में,

कर्ता   लिखी   जो  औध है।।


फूले -  फले    हे   आत्मजे!

मेरा   सजल   आशीष    है।

उस वंश की   विकसे  लता,

जिस पर कृपामय   ईश है।।


कर्तव्य   अपना   कर   रहा,

जो    है   यथासम्भव   मुझे।

मत  भूलना माँ - जनक को,

हम भी   न   भूलेंगे    तुझे।।


दो कुलों    की  ज्योति बेटी,

दो   कुलों  का    मान    तू।

वह ज्योति  नित जलती रहे,

आँगन की   मेरे   आन  तू।।


आशीष  के   शुभ  शब्द   दो,

तुझ  पर  निछावर  कर रहा।

तेरा    पिता    नेहिल   सुता!

क्यों अश्रु झर-झर झर बहा।।


 🪴शुभमस्तु  !

२३सितम्बर २०२१◆५.१५पतनम मार्तण्डस्य।

गूँगे बोल नहीं पाते हैं!🙉 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गूँगे    बोल   नहीं    पाते    हैं,

बहरे  भी   कब   सुनते     हैं!

जिनके  दोनों   नयन  नहीं  हैं,

एक    सहारा     चुनते    हैं ।।


अपनी धुन में मस्त  सभी  हैं,

कौन  किसी   की  मान रहा।

जो   मेरा   संदेश   पढ़   रहा,

अज्ञानी    वह   गया  कहा।।

तंतुवाय - से  वे   सब  चादर,

खोए -    खोए     बुनते    हैं।

गूँगे  बोल  नहीं     पाते     हैं,

बहरे  भी   कब   सुनते   हैं!!


उपदेशक,पंडित,  ज्ञानी  भी,

शिक्षक, वैद्य , हक़ीम   खड़े।

नेता ,  दानी , चमचे  भी   हैं,

भरे    भगौने   लिए    अड़े।।

कवियों में दूल्हा वे किसको,

मिलकर    सारे   चुनते   हैं?

गूँगे   बोल   नहीं   पाते    हैं,

बहरे  भी  कब    सुनते   हैं!!


मंचों   पर    चौपालें   लगतीं,

मीन -  मेख      वाहा - वाही!

सीख समीक्षक की भी भारी,

आपस  में     चाहा -  चाही।।

नौसिखिया शरमाते   मन  में,

अपना  ही   सिर   धुनते   हैं।

गूँगे  बोल    नहीं     पाते   हैं,

बहरे  भी  कब    सुनते   हैं!!


कोई   जोकर   जोक  सुनाता,

कोई    ज्ञान    बघार      रहा।

कोई बना चिकित्सक अनपढ़,

साधू    देश    सुधार    नहा।।

रक्त , दाम की माँग  चल रही,

मन ही  मन   जन   घुनते  हैं।

गूँगे    बोल     नहीं   पाते   हैं,

बहरे  भी   कब    सुनते   हैं!!


अपनी -  अपनी   बजा रहे हैं,

ढपली सब स्वर  साज बिना।

नहीं  दूसरे  की   कुछ  सुनते,

रहते   सबसे   सदा    घिना।।

मौन  साधकर  पढ़  तो  लेते,

धागा  एक   न    बुनते     हैं।

गूँगे  बोल     नहीं   पाते   हैं,

बहरे  भी   कब    सुनते  हैं!!


मिलता पानी नहीं अतिथि को

लिए   मोबाइल   घायल - से।

पड़े हुए  सब   यहाँ   वहाँ  वे,

झनक  न  आती   पायल से।।

संक्रामक बीमारी   घर -  घर,

नहीं  किसी  से     रलते    हैं।

गूँगे   बोल   नहीं    पाते    हैं,

बहरे  भी  कब    सुनते    हैं!!


मोबाइल  की  इस डिबिया ने,

ऐसा   जाल     बिछाया    है।

बच्चे  से   लेकर    बूढ़े   तक,

सबको  ही    भरमाया     है।।

चहल -पहल लूटी हर घर की,

सन्नाटे   ही      पलते      हैं।।

गूँगे   बोल   नहीं     पाते   हैं,

बहरे  भी   कब   सुनते    हैं!!


🪴 शुभमस्तु !


२३सितम्बर२०२१◆१२.१५पतनम मार्तण्डस्य।

वैदेही 🧡🧡 [ अतुकांतिका ]


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✍️ शब्दकार  ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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विदेह हो तुम

अदृष्ट निराकार,

चर्म-चक्षुओं के उस पार,

पूरित तुम में 

तत्त्व भरित  सार,

महिमा अपार।


मेरे अंतर्मन में

नित नए -नए  रूपों में

बदल-बदल कर

अदृश्य वसन,

बिना किसी यत्न,

अवतरित होती हो,

भावों के राग में

डुबोती हो।


लगता नहीं

मुझे तुम कभी सोती हो?

सोती है मेरी देह,

निस्संदेह,

अनवरत अनथक 

जागती होती हो।

सोच भी नहीं पाता मैं

कि तुम मेरी हो,

हाँ ,हाँ तुम मेरी हो।


तुम्हीं ने दी हैं

मुझे कितनी कविताएँ,

कितने लेख 

कितनी नव रचनाएँ,

कितने ग्रंथ, खंड काव्य

महाकाव्य ,

जितना भी था मुझसे संभाव्य,

बन गया है आज 

वही मेरा सौभाग्य,

किन्तु सदा मौलिक ही,

कभी कोई बासीपन नहीं,

पुनरावृति नहीं,

सदवृत्ति ही बही,

जो भी बात तुमने  कही।


मैं भी क्या हूँ!

एक खोखला ढोल ही तो!

तुम्हारा ही नृत्य साज बाज,

ध्वनि संयोजन का राज,

रस, अलंकार, छंद,

गीतों के बोल 

नव बंध,

मात्रा स्वर व्यंजन,

जैसे उछलते हुए खंजन,

लय गति प्रवाह

 तुम्हारी ही शुभ वाह !वाह!!

सब तुम्हारा ही तो है।


कहते हैं सब

रचना मेरी है,

परन्तु यथार्थ है यही

कि तुम्हारे बिना

सब अँधेरी ही अँधेरी है,

मेरी ये छोटी सी बुद्धि

तुम्हारी चिर चेरी है।


तुम हो यों तो 

सबके ही पास,

पर वे सब हैं बड़े उदास,

उन्हें नहीं है तव आभास।।

 पूज्या माँ वीणावादिनी ने

सबको नहीं दी वह कला,

कि उनका एक भी वाक्य

रचना में  नहीं ढला,

सभी हो जाते यदि 

मानव कवि,

नहीं बना सकता

हर व्यक्ति स्वयं को हवि।


वैज्ञानिकों ने खोज डालीं

रहस्य की खोज,

भूगोल खगोल में 

हर रोज़,

नहीं होती कहीं

वैज्ञानिकों की फौज,

कवियों का भी

 वही हाल है,

उनमें से अकिंचन 'शुभम' भी

एक नन्हीं दाल है।


शत - शत नमन करता है

तुम्हारा ये 'शुभम',

प्रार्थना है यही 

न हो तुम्हारी कृपा

कभी भी कम,

जन्म जन्मांतर तक

तुम्हारी साधना आराधना

करता  रहूँ,

जीव मात्र की 

हित साधना में रत रहूँ,

ऐ ! मेरी उरवासिनी,

वैदेही कल्पने!


🪴 शुभमस्तु !


२३ सितम्बर २०२१ ◆९.५५आरोहणं मार्तण्डस्य।

बुधवार, 22 सितंबर 2021

पत्थर के प्रभु 🛕 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🛕 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पत्थर के प्रभु अगर न होते।

तुमसे हम   बतियाते  होते।।


मंदिर में  जब   हम  जाते हैं।

बात  न अपनी कह  पाते हैं।।

दिखे  न हमको  हँसते- रोते।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


भोग  नहीं   तुम  थोड़ा खाते।

फिर भी तुम प्रसाद खिलवाते।

पता नहीं  कब जगते - सोते।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


मूर्तिकार   ने   तुम्हें   बनाया।

लोगों ने फिर   खूब सजाया।।

स्नान   कराते   दे - दे    गोते।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


वसन रजत- भूषण  पहनाते।

इत्र  लगाकर  भी   महकाते।।

बजते घंटे    ले -  ले    झोंटे।

पत्थर के प्रभु अगर न होते।।


धूप दीप की ज्योति जलाकर।

करते हम  आरती   उजागर।।

'शुभं' न खुश फिर भी तुम होते।

पत्थर के प्रभु  अगर न होते।।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०९.२०२१◆६.१५पतनम मार्तण्डस्य।


शहीद भगत सिंह 🤺 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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भगत सिंह की अमर शहादत,

करते     भारतवासी    वंदन।

चूम  लिया  फाँसी  का फंदा,

बनी देश की   माटी   चंदन।।


बंगा   ग्राम  जिला  लायलपुर,

में  जन्मा   वह  पूत  देश का।

प्रांत धरा   पंजाब   जन्म  की,

साक्षी थी वह सिक्ख वेश था।

क्रांति  प्रणेता  देशभक्त   वह,

करता है जन- जन अभिनंदन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


धनी कलम का चिंतक लेखक

पत्रकार   वह   महामना  था।

देशप्रेम   का   लावा   उसकी,

रग-रग में सरि सा उफना था।

नहीं चैन  से   सोता  था  वह,

नहीं फ़िरंगी  लगते  प्रियजन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


किया  कठिन   विद्रोह  देश में,

 काकोरी   में   लूट   खज़ाना।

नाम  उज़ागर   किया भगत ने, 

निर्भय  वीर सिंह  जग जाना।।

जलियाँवाला    बाग  कांड से,

जलने लगा  देह का कन-कन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते   भारतवासी     वंदन।।


बिस्मिल  राजगुरू   का साथी, 

भगत सिंह रसगुल्ला प्रिय था।

बड़ा  शौक  फिल्मों  का उसको,

देशप्रेम  रत उसका हिय था।।

उड़ा  दिया   सांडर्स  फेंक बम,

धीर   वीर   भारत  का   है धन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


स्वर्ण अक्षरों     में   अंकित वह,

 भगत   सिंह का नाम अमर है।

अंतिम  साँसों   तक   जो  जूझा, 

अग्निशिखावत किया समर है।।

साथ  दिया   आज़ाद   वीर ने,

नहीं जानता  है  यह जन- जन।

भगत सिंह की अमर शहादत,

करते    भारतवासी    वंदन।।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०९.२०२१◆११.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।


शब्द आधारित सृजन 🌸 [ दोहा ]


(चंपा, परिमल,मकरंद,कली,प्रभात)

             

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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चंपा  खिलती  बाग  में,लेकर रूप  सुगंध।

मोहक पीले पुष्प पर,अलि को है प्रतिबंध।।


चंपा राधा  रूपिणी, भ्रमर कृष्ण का भक्त।

इस  मर्यादा  हेतु ही,भ्रमर न हो अनुरक्त।।


परिमल तेरे रूप का, मादक विमल अपार।

 हम भँवरे  आए  हुए, पीने रस   की  धार।।


परिमल में विद्वान सब,चर्चा कर सुविचार।

श्रोता जन  को  मोहते,  करते  ज्ञान प्रसार।।


बेला की कलिका खिली,मीठा नव मकरंद।

परिमल से आकृष्ट हो,अलि झूमे स्वच्छंद।।


लोभी   मैं  मकरंद का,आया   तेरे  पास।

भौंरा  बोला  पुष्प से,सत्य, नहीं  परिहास।।


कली-कली खिलने लगी,हुई सुनहरी भोर।

पादप  पर   करने  लगे,सारे पक्षी    शोर।।


अभी कली  फूली नहीं, आकर्षण -आगार।

जब  बन  जाए  फूल तू,हमें हनेगा   मार।।


रूपसि  तेरे रूप का,मधु लावण्य  प्रभात।

फूले रूप - तड़ाग में,'शुभम'रूप जलजात।।


नव प्रभात कर भानु से,लिखता है शुभवार।

कहता नहीं उदास हो,'शुभम' न होगी हार।।


चंपा परिमल ले खड़ी, किंतु नहीं मकरंद।

ये प्रभात भी सोचता,कली खिली स्वच्छंद।


🪴शुभमस्तु !


२२.०९.२०२१◆७.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


मंगलवार, 21 सितंबर 2021

  झूठा पुराण बनाम जैसी बहे बयार ⛵

 [ व्यंग्य ] 

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 ✍️ व्यंग्यकार ©

 ⛵ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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        अथ  'झूठा पुराणम' प्रारभ्यते ।

          हमारी हिंदी में एक प्रसिद्ध कहावत है :'जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी दीजै'।इस छोटी - सी कहावत में बड़े - बड़े सत्य छिपे हुए हैं। आज के युग में इसकी प्रासंगिकता में कई गुणा वृद्धि हुई है और निरंतर गुणात्मक रूप से अनवरत वृद्धि का स्तर ऊपर चढ़ता जा रहा है।हम जमाने के साथ कदम से कदम मिलाते हुए अग्रसर होने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रहे हैं।छोड़नी भी नहीं चाहिए। 

          सच को कभी भी बिना सोचे समझे मत बोलिए।यदि आपके दुर्भाग्यवश आपने ऐसा कर दिया तो आपको पछताने के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।इसलिए सच को इस प्रकार डर- डर कर बोलिए, जैसे आप कोई पाप कर्म करने जा रहे हैं। यदि किसी ने आपको सच बोलते हुए देख लिया अथवा पकड़ लिया तो कितने भी झूठ बोलकर भी आप बच नहीं सकेंगे।इसलिए धोखे से भी सच को अनायास जुबां पर मत लाइए ।

              अरे!क्या आप ही अकेले सत्य हरिश्चंद्र की औलाद हैं कि आपने सच बोलने का ठेका ले रखा है? सच को तो स्वप्न के लिए भी बचा कर अपनी तिजोरी में मत रखिए। आपको यह भी अच्छी तरह से मालूम है कि राजा हरिश्चन्द्र ने ऋषि विश्वामित्र को अपना सम्पूर्ण राजपाट दान में दे दिया था। उनका वह स्वप्न भी स्वप्न नहीं रहा । सुबह होते ही वह सच साबित हो गया! औऱ राजपाट लेने के लिए सच में ऋषि विश्वामित्र जी राजदरबार के सामने उसे ग्रहण करने के लिए उपस्थित हो ही गए न? फिर क्या ! स्वप्न में किया गया वादा राजा हरिश्चन्द्र को पूरा करना पड़ा। कहाँ लोग कहते हैं कि सपने तो टूट जाने के लिए ही होते हैं। वे कभी सच नहीं होते।देखा!सपना भी सच हो गया और सच का नतीजा भी देख लिया। राजा, राजा नहीं रहे, सत्य के कारण भिखारी बन गए।क्या आप ऐसे सत्य का साथ देकर भिखारी बन जाने के लिए तैयार हैं?

                 इसलिए सच से सदा सावधान रहें।सच बोलना,सच को धारण करना, सचाई की सीख देना ,सचाई का अनुगमन करना : ये सब कुछ छोड़ ही दीजिए।ये सब इतिहास की बातें किताबों में पढ़ने में ही अच्छी लगती हैं। इन्हें तो इतिहास के साथ ही दफना दीजिए । पूर्व में ही कही गई कहावत को मन - मस्तिष्क में धारण कर लीजिए : 'जैसी बहे बयार.....' 

             आप देख,सुन और समझ रहे हैं कि झूठ का बोलबाला है। सच का मुँह काला है। अतः मित्रो ! झूठ को ही जीवन में सर्वांगीण रूप से धारण करें। उसी के सपने देखें।झूठ बोलने के लिए कुछ भी सोचने-समझने की आवश्यकता नहीं है।इसलिए धड़ल्ले से झूठ की मूठ में समा जाइए।झूठे लोगों का अनुसरण ,अनुगमन करने में ही (आपकी अपनी कल्याण की परिभाषा के अनुसार) आपका कल्याण है। जब सच रहा ही नहीं ,तो उसकी परिभाषा भी बदल गईं ।इसलिए जैसी जमाने की हवा चल रही है, उसी के साथ उड़ते रहना, चलते रहना,अनुगमन करना यही सर्वाधिक श्रेयस्कर है। 

          झूठ की एक विशेषता यह भी है कि एक बोलो ,सौ बोलो ,हज़ार बोलो : वह झूठ नहीं लगता। वह सच का भी परबाबा बन जाता है। वह जीवंत होकर विश्वास का बीजारोपण कर देता है। इसलिए सर्वांश में झूठ को आज भगवान मान लीजिए। इसलिए थोड़ा नहीं , जी भरकर झूठ ही झूठ बोलें। यदि विश्वास नहीं हो तो हाथ कंगन को आरसी क्या! ज्यादा दूर नहीं जाना, अपने चारों ओर खड़े नेताओं ,सियासतदानों औऱ सियासती दलों को देख लीजिए कि वे किस बेशर्मी से वे झूठ का दामन थामकर " देश का कल्याण ?" करने में लगे हुए हैं। वे जितना भी झूठ बोलते हैं ,वह जनता में सैकड़ों गुनी रौशनी फैलाता है। फिर वह मानव नहीं ,देव दूत बनाकर पचास किलो की माला से पूजा जाता है। उसकी हड्डी,माँस, रक्त ,मज्जा,त्वचा आदि के भार के बराबर तराजू में तोला जाता है। ये सब कमाल एक मात्र झूठ का ही तो है।

        आज का आदमी बहुत बुद्धिमान है। वह बिना स्वार्थ के किसी के कटे हुए पर स्व- मूत्र विसर्जन भी नहीं करता। फिर आप उससे क्या आशा बनाए रखकर अपने विश्वास की मंजिल खड़ी कर सकते हैं? वह झूठ का पक्का अनुयायी बन चुका है। सारे खोंमचे, चमचे , भगौने बस झूठ की 'मधुर' खीर की हँड़िया में आकंठ निमग्न हैं। उन्हें पूर्ण विश्वास है कि एक मात्र सहारा अब 'झूठ भगवान' का ही बचा है। इसलिए उनके धर्म, कर्म, व्यक्ति, समाज, उत्सव, दंगल, सर्वत्र झूठ का साम्राज्य है।नौकरी में 'अन्य आय' (इसे आप अन्याय न समझें), उत्कोच, व्यापार में मिलावट, सब कुछ झूठ की आधार -भूमि पर ही तो प्रतिष्ठित है।

             झूठ के बिना हानि ही हानि है। आज झूठ , झूठों, झूठनुयायियों का युग है। सच औऱ सचाई के रास्ते पर चलकर महक दुमहले बनाना तो दूर की टेढ़ी खीर ही समझिए, आपको दो वक्त के निवाले के भी लाले पड़ जाएंगे। इसलिए यह तो मानना ही पड़ेगा : 

  झूठ बिना जीवन नहीं,झूठ आज भगवान।

 झूठ बिना मिट जाएगी, मानव तेरी शान।।    


  खाना पीना पहनना,   रहना सहना झूठ।

 झूठ छोड़ तुमने दिया, जाए किस्मत रूठ।।


 झूठ पाप होता नहीं, झूठ  आज है पुण्य।

 नेता जी से पूछ लें,   कर देंगे अनुमन्य।।


 एक  नहीं   दो  भी  नहीं, बोलें  झूठ हज़ार। 

 मान बढ़े  संसार  में, देखें   नित्य बहार।।


 झूठे नित फल फूलते, चमके जग में नाम। 

 अखबारों में छप रहे,करता जगत प्रनाम।।


 चलिए सबके  साथ ही ,जैसी    बहे    बयार। 

 शेर बने तनकर रहें,मिलता 'शुभम' पियार।। 


 झूठों का  अनुगमन कर ,चलें भेड़ की चाल। 

 देखेगा संसार सब,   जब   हों  मालामाल।। 


 इति झूठा पुराणम समाप्यते। 


 🪴 शुभमस्तु ! 


 २१.०९.२०२१◆६.३० पतनम मार्तण्डस्य।

सियासी दाँव 🎺 [ मुक्तक ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🎺 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                       -1-

घिरे   हैं   मेघ     अंबर   में गरजते,

रँग बदलते गेरुआ  रक्तिम सुलगते,

सभी की चाह  है ढँकना  धरा को,

सियासी दाँव से पल -पल सरकते।


                       -2-

लटकी जलेबी रसभरी मीठी गरम है,

मतमंगताओं  को  लुभाती है नरम है,

करतूत इनकी जानती है ख़ूब जनता,

सियासी दाँव में नेता सभी बेशरम हैं।


                       -3-

सियासी    दाँव   जनता  पर चलाते,

गोलियाँ   मीठी     खिलाकर लुभाते,

पट्टियाँ पहले बँधी जिनके नयन पर,

जिता मतदान से   जन बिलबिलाते।


                        -4-

चाल  को  ही  दाँव  कहता है जमाना,

सियासी   दाँव   का   मत  है  बहाना,

दाँव में क्या  झूठ  क्या  सत 'शुभम' है,

नीर   हो   या   पंक   उनको नहाना।


                       -5-

सियासी  दाँव  है छल- छद्म भारी,

मत  समझना  नीर  में  पद्म क्यारी,

बाद  खाने   के  पता,  धोखा लगा  ,

कौन  कम है पुरुष या सलज नारी।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०९.२०२१◆११.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

स्वेद बहाकर पेट पालता 🌾 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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स्वेद  बहाकर   पेट    पालता,

रिक्शा    भले     चलाता   है।

एक   पैर    से   आगे   बढ़ता,

दंड  -   सहारा     पाता    है।।


चोरी  करता  नहीं  किसी की,

अपने  श्रम का    संबल    है।

दिन भर  सड़क नापता लंबी,

चलती -फिरती वह  कल है।।

यद्यपि पद  के बिना जी रहा,

तनिक    नहीं   घबराता   है।

स्वेद   बहाकर   पेट  पालता,

रिक्शा    भले   चलाता   है।।


भावी  को    देखा   है किसने,

कब  किसके सँग  क्या होना।

वज्र  गिरे यदि मानव तन पर,

पड़ता  जीवन   भर    रोना।।

चोंच -  चोंच  को दाना  देता,

सबका     एक  विधाता   है।

स्वेद  बहाकर   पेट   पालता,

रिक्शा   भले  चलाता    है।।


अपने  इस तन  मन  से मित्रो,

कष्ट   किसी  को    मत  देना।

सदा  गरीबों  का  हित करना,

आह  किसी   की  मत लेना।।

बुरी  आह  से  सार  भस्म हो,

सब   स्वाहा   हो   जाता   है।

स्वेद   बहाकर   पेट  पालता,

रिक्शा   भले    चलाता   है।।


हो  सकती  विकलांग देह तो,

आत्मा   सदा   अखंडित   है।

अजर -अमर अविनाशी होती,

युग -  युग महिमामंडित  है।।

है   अज्ञान  मूढ़    तू   मानव,

तन   को   देख   घिनाता  है?

स्वेद  बहाकर    पेट  पालता,

रिक्शा   भले    चलाता   है।।


आएँ   'शुभम'  बढ़ाएँ  अपने,

दोनों   कर     भर   अलिंगन।

हर गरीब के सत  सहाय बन,

यथाशक्य निज तन मन धन।

अपने  को   मत   माने  कर्ता,

कर्ता   प्रभु    कहलाता    है।

स्वेद  बहाकर   पेट  पालता,

रिक्शा    भले   चलाता   है।।


🪴शुभमस्तु !


२१.०९.२०२१◆९.३०आरोहणं मार्तण्डस्य।

सोमवार, 20 सितंबर 2021

माँ 🧕🏻 [ कुंडलिया ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                       -1-

माँ  की  ममता- मापनी,बनी नहीं  भू  मंच।

संतति का शुभ चाहती,नहीं स्वार्थ हिय रंच

नहीं स्वार्थ हिय रंच,सुलाती शिशु को सुख से

गीले  में सो  आप,भले काटे निशि दुख से।।

'शुभं'न उपमा एक,नहीं माँ सी जग झाँकी।

जनक पिता का त्याग,श्रेष्ठतम ममता माँ की


                       -2-

जननी  माँ प्रभु रूप हैं,धीर नेह  का   धाम।

सदा बचाती शीत से,लगे न अतिशय घाम।।

लगे न अतिशय घाम,सँवारे संतति  अपनी।

सबसे  प्रिय संतान,एक ही माला   जपनी।।

'शुभम'दया संचार,किया करती दुख हरनी।

संस्कार  भांडार, मात  मेरी  माँ     जननी।।


                       -3-

आया  सुत  घर लौटकर, बाहर से  कर देर।

माँ  ने  पूछी   कुशलता,  कैसे हुई    अबेर।।

कैसे   हुई   अबेर,  बहुत  तू भूखा    होगा।

कर ले भोजन पूत,कहाँ भीगा तव    चोगा।।

'शुभम' बदल परिधान,नहीं मैंने कुछ खाया।

मिली मुझे अब शांति, पूत मेरा घर आया।।


                       -4-

देती  जननी  जन्म  जो, पालनहारी  मात।

देता है यदि कष्ट सुत,सँग उसके अपघात।।

सँग उसके अपघात, झेलता सौ-सौ  रौरव।

बनता काला  कीट, नसाता अपना  सौरव।।

'शुभम' सदा ही मात,अंडवत संतति  सेती।

पहुँचाए बिन घात,जननि माँ सुख ही देती।।


                        -5-

माता जननी  धाय का,उऋण नहीं  है नेह।

बिना लिए  प्रतिदान वह,बरसाती नित मेह।।

बरसाती नित मेह,महकती जीवन - क्यारी।

खिलते सुमन अपार, अजब है माता  नारी।।

'शुभम'न बनें कपूत,सदा माँ को जो ध्याता।

हर लेती हर  दाह,पूजता जो निज  माता।।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०९.२०२१◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।


सजल 🪦

 

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समांत :  आने ।

पदांत  :    में।

मात्रा भार:20

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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समय     लगता     है   गरिमा बढ़ाने  में।

बात    बिखरती    हुई      को  बनाने में ।।


मात्र   मुखड़ा   नहीं     तुम सजाया करो,

वर्ष   लगते    हैं  चरित    को सजाने   में।


एक     यात्रा     कठिन     है जीवन  तेरा,

सारा       जीवन     लगा    दे  तपाने   में ।


संस्कारों        की     खेती   होती   नहीं,

सहस्त्र    सदियाँ   लगा तू निभाने   में।


सुमन  संग     शूलों     को   दिया   है हमें,

महक    आती    है   तप   के खजाने    में ।


एक -  एक     क्षण    जोड़ क्षणदा   बनी,

मिलता  है सदा   सुख  जाग जाने      में।


मत  'शुभम'   भूल  जाना आचरण कभी,

जिंदगी    बीतती      घर    बसाने     में ।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०९.२०२१◆११.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


शनिवार, 18 सितंबर 2021

प्यास, प्यासा और प्याऊ💦 [ दोहा -गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पानी  पीकर चल दिया,बुझा कंठ की प्यास।

छोड़ी प्याऊ दूर पथ,सत्य, न समझें  हास।।


तृप्ति  हुई अंजलि बँधी,खुले हाथ के बंध,

प्याऊ वाले को मिला,अलग तृप्ति आभास।


शीश हिला संकेत था, अब रोको जलधार,

प्यास बुझी है कंठ की,उर में हुआ उजास।


प्यासे पथिकों को मिले,जब मनचाहा नीर,

जीवन की बँधती  रहे,जीने के हित आस।


यदि प्यासा  पौधा मिले, मुरझाए  हों  पात,

जलसिंचन मत भूलना,जल जीवन की श्वास


जाति न होती प्यास की,याद रखें यह बात,

करनी अपनी भूलकर,करना नहीं  उदास।


'शुभं'स्वाति की आस में,चातक अति बेचैन,

प्यास  बुझाएँ  मेघ  दल,पूरा है   विश्वास।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०९.२०२१◆११.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

चूड़ियों की खनक पावन 🌉 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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चूड़ियों   की  खनक  पावन,

पायलों  की   झनक झाँझन,

छा रही है।

देह     के      वातायनों    से,

चाँदनी   सुरभित   घनों   से,

आ  रही है।।


कमल-दल सज्जित ऋचा सी

भोर   की   पावन    प्रभा सी,

झाँकती  हो।

आगमन   से    पूर्व   सजनी,

पोंछ  कर  से  श्याम  रजनी,

आँकती  हो।।

भंगिमा      कैसी     निराली,

चाँद  से    तुमने      चुरा ली,

भा  रही है।

चूड़ियों  की   खनक   पावन,

पायलों  की   झनक  झाँझन,

छा  रही  है।।


एड़ियों  में   शुभ   अलक्तक,

रजत में नव   जड़ित मुक्तक,

तारकों  से।

कदलि के  तरु- थंभ दो  - दो,

चल   रहे    स्फूर्त    हो -  हो,

सारकों  से।।

आम्र   की  नव   गंध  मादक,

खींचती सी   सोम     धारक,

 भा रही  है।

चूड़ियों   की   खनक   पावन,

पायलों   की  झनक   झाँझन,

छा  रही है।।


क्षीण   कटि   कामायनी  सी,

पृष्ठ   गुरुतर    करधनी   की,

रंगशाला।

नाभि -निधि में क्या छिपा है,

दृष्टि   में   कितना   दिखा है,

गुप्तहाला।।

दृष्टि  पयधर   के  युगल  पर,

छा गई   है   भ्रमर बन   कर,

आ रही है।

चूड़ियों   की   खनक  पावन,

पायलों  की  झनक   झाँझन,

छा रही है।।


रूप   उज्ज्वल   साधना  सा,

मन   करे     आराधना   का ,

क्या  बताएँ।

नयन,मुख ,कच की न समता,

नव   कपोलों    में   सुभगता,

क्या  जताएँ।।

धड़कनें    छिपती   नहीं  हैं,

देह   मेरी    में     कहीं    हैं,

गा  रही  हैं।

चूड़ियों  की  खनक  पावन,

पायलों की  झनक  झाँझन,

छा  रही है।।


परस  की  उर -  कामना है,

रसवती      संभावना     है,

पास   आओ।

उष्ण     आलिंगन    समाएँ,

देह  दो    इक   प्राण   पाएँ,

रुक न जाओ।।

'शुभम' चुम्बक   साधना की,

प्रीतिं   की    आराधना   की,

भा  रही है।।


🪴 शुभमस्तु !


१७.०९.२०२१◆१.००पतनम मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

कवियों का देश 🛋️ [ गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

👑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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यदि    कवियों   का  देश धरा पर   होता।

एक   अकिंचन   ये   भी  उनमें   होता।।


कुछ   कहते  मैं   बड़ा सभी से  कविवर,

दो    पाटों   के    बीच  पिसा   मैं   होता ।


मीन  - मेख    में  लगे   सभी कवि   होते,

कविता    सोती    तान  यही सब   होता।


कवियों   की   भरमार   ग़ज़ब ही    ढाती,

लठामार     होली     का   हुल्लड़   होता।


कौन    समीक्षा    करता किसकी  रचना,

स्वयं   शीश   पर   पगड़ी कसता  होता।


अलंकार ,   रस,   छंद    कौन बतलाता,

करे      वर्तनी      शुद्ध     न कोई    होता।


इसका    झोंटा     उसके   कर  महकाता,

दृश्य     देखने   योग्य   सभा का    होता।


दर्पण   सम्मुख     खड़ा सुनाता   कविता,

बंद   कक्ष    में   गीत    गा  रहा     होता।


खुजली    का   उपचार जीभ की   करता,

एक      अकेले     का   सम्मेलन     होता।


छपवा      पत्र   प्रमाण    टाँगता   घर    में,

लेता     शॉल    ख़रीद   महाकवि    होता।


एकल      हेकड़  -   मंच    सजाए   जाते,

'शुभम' पीठ निज थपक  सुकवि वह होता।


🪴 शुभमस्तु !


१६.०९.२०२१◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

तुम्हें बता तो दूँ 🥀 [ व्यंग्य ]


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 ✍️ व्यंग्यकार © 

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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 मेरे हिंद देश वासियो! 

 हिंदी भाषा भाषियो!! 

 आज मेरा तुम सबसे संवाद बहुत आवश्यक हो गया है।तुम लोग इस भ्रम में कदापि मत रहना कि वर्ष में एक बार 'हिंदी दिवस' अथवा 'हिंदी पखवाड़ा' मना लेते हो ,तो मैं तुम्हारी बहुत बड़ी कृतज्ञ हो जाऊँगी ? बहुत अधिक प्रसन्न हो जाऊँगी ? माना कि इक्कीसवीं सदी चल रही है। तुम भी बीसवीं या इसी सदी में पैदा हुए होगे।लेकिन मेरा जन्म तुमसे कई शताब्दियों पहले हुआ है। मेरे सामने तुम अभी कच्चे हो, बच्चे हो। लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि तुम मनमानी करोगे ! और मुझे भी हास्यास्पद बना डालोगे। अन्य भाषा बहनों के बीच मेरी भद्द करा डालोगे।

              आज तुम अपनी उच्च भारतीय संस्कृति को भी भूलते जा रहे हो। माना कि युग बदल रहा है। युगानुकूल परिवर्तन भी होते हैं , होते रहे हैं और होते भी रहेंगे।लेकिन क्या एक प्रश्न का उत्तर तुम मुझे दे सकते हो? क्या युग और समय बदलने पर तुमने अपने माँ - बाप को भी बदल लिया है ? किसी अन्य को यह मान्यता प्रदान कर दी है? तुम कहोगे कि 'ऐसा कैसे हो सकता है ! भला माँ - बाप भी बदले जाते हैं ? ' जब माँ-बाप नहीं बदले जाते तो क्या तुम्हारी माँ जैसी माँ की बोली , माँ की भाषा ;जिसे तुम मातृभाषा ! मातृभाषा !! कहते हुए ,उसके गीत गाते हुए ,उसकी प्रशंसा में कसीदे काढ़ते हुए नहीं अघाते , उसका पीठ पीछे क्या सामने भी जी भरकर अपमान करते हुए भी नहीं लाज आती ?

               अब तुम्हारा उत्तर यही होगा कि 'हमने ऐसा क्या किया है कि आपका इतना अपमान हुआ है?' तो मेरी वेदना भी सुनो। तुमने अपने कपड़े बदले। धोती, कुर्ता, पायजामा, कमीज़, साड़ी, सूट ,सलवार में आ गए। तुम सुविधाभोगी हो न ? जिसमें सुविधा लगी ,वही बिना सोचे - समझे पहन डाला,कर डाला । वाहवाही लूटने को गले में डाल ली माला।भले ही संस्कारों का निकल जाए दिवाला।माँ - बाप चीखते -चिल्लाते रहे। तुम बहरे बने गुल खिलाते रहे।तुम्हें देख - देख कर तुम्हारे ही कुछ माँ-बाप भी तुम्हारे ही रँग में रँग गए।तुम पश्चिम के अंधे अनुकरण में टाइट जींस, टॉप, स्कर्ट , लहँगे की बहन और पायजामे की उतरन पिलाजो, लैगी,फ़टी ,उधड़ी, चिथड़ी जींस और न जाने क्या -क्या ले आए? इसी प्रकार खान -पान और रहन - सहन में भी क्या से क्या बन गए ? पर क्या तुम्हें अपनी माँ समान हिंदी को नग्न करने में भी तुम्हारी आँखें लज्जा से झुक नहीं सकीं? मेरे भी वस्त्र उतार दिए ,औऱ बिना सिर की रोमन भाषा के कपड़े मुझे बलात लाद दिए! जिसके लिए मैं न तैयार थी , न हूँ और न रहूँगी। क्या मैं निर्वसना थी,जो रोमन- वसन से लज्जित कर रहे हो ? मेरी भी अपनी एक वेशभूषा है ।जिसे नहीं जानते हो तो बतला भी दूँ? उसका नाम है देवनागरी । जी हाँ, देवनागरी। 

            जहाँ तक पीछे जाकर विचार करती हूँ तो मुझे प्रतीत होता है कि पर्दे पर नंगा नाच करने वाले अभिनेता , अभिनेत्रियां, उनके निर्देशक , निर्माता, विज्ञापन कर्ता - यही सब लोग दोषी हैं। क्योंकि वे अंग्रेज़ी में अंग्रेज़ी से हिंदी सिखा सकते हैं, पढ़ा सकते हैं।अब उनकी नकल में , क्योंकि वे ही तो तुम्हारे आज के आदर्श पुरुष औऱ महा नारियाँ हैं। उन्हीं से खिलतीं तुम्हारे हृदय की क्यारियाँ हैं! ये तो तुम निश्चित करो कि तुम भेड़ हो अथवा बकरियाँ हो ! 

                  आप में से अधिकांश ने देवनागरी को खूँटी पर टाँगकर रोमन की स्कर्ट पहना दी है।    'लघुकाट' के लालचियो! अब न रही हिंदी औऱ तुम्हारे द्वारा मार डाली गई देवनागरी भी देवलोक को विदा कर दी गई ! अंततः मेरी हत्या क्यों कर रहे हो। हिंदी दिवस पर 'हिंदी डे' मनाते हो, झूठी औऱ खोखली औपचारिकता निभाते हो और माँ को छोड़ फ़िरंगिनि मौसी की देह सहलाते हो! मुझे सरेआम नंगा कर रोमन - वसन पहनाते हो। हिंदी सीखने, पढ़ने, लिखने में नाक कटती है न तुम्हारी! इसलिए हिंदी का सभा- चिंघाड़ू भाषण करने वाला भीषण वक्ता अपने बच्चों को कॉन्वेंट में पढ़वाता है। हिंदी- भाषी पिछड़ा कहलाता है! क्यों न तुम जैसों को भाषाद्रोही कहा जाए? भाषाद्रोह भी देशद्रोह से कम नहीं है। 

          सही अर्थों में देखा जाए तो तुम्हें न हिंदी आती है और न कोई अन्य अंग्रेज़ी ,संस्कृत ,उर्दू आदि ही। खिचड़ी आती है। हिंग्लिश से शान बढ़ जाती है । दिखावा करने में कुशल हो न! बस इसी दिखावे में वाह वाही लूटना ही तुम्हारा उद्देश्य है।न घोड़े बन पाए और न गधे ही ,खच्चर बने रह गए। गंगा में कितना जल निकल चुका ,कितने खच्चर बह भी गए! अधकचरा ज्ञान सदैव घातक ही होता है। अपने पैरों में अपने आप ही कुल्हाड़ी मार रहे हो ,तो शौक से मारो। फिर मत कहना कि बताया नहीं था। मैं हिंदी ,तुम्हारी माँ की वाणी ;तुमसे ,अपनी ही संतति से तनिक भी प्रसन्न नहीं हूँ। मेरा ,अपनी मातृभाषा हिंदी का गला ही घोंटते चले जा रहे हो। कॉन्वेंट के बच्चों के माँ-बाप उस समय कितनी बेशरमी से मुस्कराते हुए गर्व से सीना फुला लेते हैं ,जब उनका बच्चा कहता है , हिंदी गिनती नहीं आती ,अंग्रेज़ी की पूरी आती है। 'आई कैन स्पीक इन इंग्लिश'. अरे बेशर्मों! चुल्लू भर .........में डूब कर मर क्यों नहीं जाते ! अपने को कहते हो हिंदुस्तानी! हिन्दू , हिंदी ! और गुलाम हो फ़िरंगिनि के ! क्या यही सनातन संस्कृति है ? यही तुम्हारा सनातन वैदिक धर्म है? 'ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार' गाने/ रटने वाला बच्चा क्या संस्कार देगा? हे हिंद देश के वासियो ! तुम्हें धिक्कारने के अतिरिक्त मेरे पास कोई दूसरा शब्द नहीं है।

          देश के दुर्भाग्य या उसके अपने सौभाग्य से यदि थोड़ी बहुत फ़िरंगिनि भाषा सीख भी ली ,तो मोबाइल पर संदेश लिखने में हिंदी तो भूल ही जाता है। वह या तो हिंदी कुंजी पटल को कठिन बताकर या अंग्रेज़ी का रॉब मित्रों में मारने के लिए YOU को 'U' ,QUE को 'Q', है को H, हैं को HE, FOR को 4, साथ को '7', तेरह को '13', बारह को '12' लिखने लगता है। ये किस भाषा का जन्म हो रहा है, समय ही बताएगा। 

                इतना अवश्य है कि पतन इसी तरह होता है। ये सब पतन के लक्षण हैं।चाहे वस्तु हो या व्यक्ति ; ऊपर उठने में समय लगता है , गिरने में न्यूनतम समय ही लगता है। जैसे पूत के पाँव पालने से बाहर निकल जाते हैं, वैसे ही पूत - पूतनियों (पूतनाओं न समझें) के पाँव तो पालक औऱ पालने को लतिया - लतिया कर तोड़-फोड़ डालने में ही दिख रहे हैं। भविष्य के गर्भ में क्या छिपा हुआ है , भविष्य ही भविष्य में उसका भविष्य बताएगा । 

 🪴 शुभमस्तु ! 

 १६.०९.२०२१.◆१.४५ पतनम मार्तण्डस्य। 

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डेंगू से है जंग हमारी 🦟 [ बालगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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डेंगू   से   है    जंग    हमारी।

करें   हराने    की     तैयारी।।


स्वच्छ  रखें  अपना  घर पूरा।

रहे पास  में   एक   न   घूरा।।

करें  सुबह  से   सब   तैयारी।

डेंगू    से    है   जंग  हमारी।।


फ़िर भी यदि बुख़ार आ जाएँ

तुलसी दल की चाय  बनाएँ।।

पिएँ  पपीता -  रस  भी भारी।

डेंगू   से   है    जंग   हमारी।।


मत  भूलें  मैंथी   का   काढ़ा।

हल्दी  डाल   दूध  लें  गाढ़ा।।

बीमारी  पर   हम   हों  भारी।

डेंगू    से    है  जंग   हमारी।।


पत्ते  नीम  पेड़  के   पा   लें।

रख  पानी  में ख़ूब  उबालें।।

घर वाले  सब  पिएँ सँभारी।

डेंगू   से   है  जंग   हमारी।।


तेल  नारियल  नित्य  लगाएँ।

खुली देह सब ढँककर जाएँ।।

यह बचाव की   शुभ  तैयारी।

डेंगू   से     है  जंग   हमारी।।


🪴 शुभमस्तु !


१६.०९.२०२१◆७.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

बुधवार, 15 सितंबर 2021

लघुकाट' हिंदी 🪂 [ अतुकांतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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छोड़कर क़मीज़ शर्ट, 

पहन लिए टॉप-स्कर्ट,

बन गई है स्मार्ट, 

देख- देख हम होते हर्ट,

हिंदी कर रहे नित फ्लर्ट,

चला जाए भले सब गर्त!


प्रेम है उन्हें हिंदी से,

नुक्ता कहें या बिंदी से,

घृणा है किसी अहिंदी से,

तभी भरता है उनका

'विशुद्ध'   'हिंदी मन' ,

जब लिखते हैं विज्ञापन में,

मोबाइल में लिपि रोमन में,

वाह रे! मेरे हिंदी - धन।


हिंदी को पहना दी

फिरंगियों की उतरन,

टॉप -स्कर्ट 'लघुकाट'

बड़ा है बहुत 

'लघुतम'  का ठाठ,

'क्यू'  के लिए  'Q'

'यू'  के   लिए  'U',

अपने ही हाथों

अपनी  ही मात,

कहाँ रह गई 

तुम्हारी हिंदी- मात।


वर्तनी पर चल गई

रोमन की कर्तनी,

लगता है इनको 

हिंदी नहीं बरतनी, 

मौसी के इश्क में

माँ की करी खतनी।


यही तो आज 

हिंदी के लाड़ले हैं,

देशी गुड़ को छोड़

गोरी खांड़ के निवाले हैं,

हिंदी से हिंदी में ही

शरमाते हैं,

फ़िरंगिनी पर रात- दिन

मरे जाते हैं,

आती नहीं मातृभाषा 

अपनी ही हिंदी।


हिंदीभाषी ही बिखेर रहे,

छोटी -छोटी चिंदी,

'शुभम' होगा क्या ?

इन स्वार्थी हिंदियों का,

'लघुकाट' में नग्न

नन्हीं -नन्ही बिंदियों का।


🪴 शुभमस्तु !


१५०९२०२१◆ १.००पतनम

मार्तण्डस्य ।

राष्ट्रभाषा हिंदी 🌳 [ दोहा गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हिंदी  के  हर   शब्द  में,भावों का   संसार।

अवगाहन  निधि में करें,मुक्ता मिलें  अपार।।


रोमन  लिपि के पंक से,होती है जब लिप्त,

हिंदी  भरती आह नित,बंद प्रगति के द्वार।।


माँ की बोली का किया,अगर नहीं सम्मान,

शेष  नहीं  संस्कार तव,हिंदी की हो  हार।


खांड़ खुरखरी लग रही,गुड़ बनिया का नीक,

बोल  फ़िरंगी    खींचते, अँग्रेज़ी   उपहार।


भाषा अपनी छोड़कर, हुआ इतर जो नेह,

माता तेरी है 'ममी', 'डैड' पिता का प्यार।


हिंदी    बहती    रक्त में, हिंदी माता     एक,

हिंदीमय  संसार  यह, यही कथ्य  का  सार।


'शुभम' न  भूला नर वही,लौटे संध्या  -काल,

पट खोलें निज चक्षु के,पा दायित्व सु-भार।


🪴 शुभमस्तु !


१५.०९.२०२१◆१०.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

पंच शब्द -शृंगार 👑 ( दोहा )


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✍️ शब्दकार ©

👑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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भाषा मानव जाति को,एक 'शुभम' वरदान।

करती उर धी में सदा,भाव विचार  विहान।।


भाषा का  आदर  करें,जो  है माँ  के  बोल।

सोच-समझ कर बोलिए, शब्द-शब्द को तोल


हिंदी के   हर  शब्द  में,भावों का    संसार।

अवगाहन निधि में करें, मुक्ता मिलें अपार।।


हिंदी  में हित - साधना,   हिंदी से    उद्धार।

जननी सी वह पूज्य है,नित्य प्रगति का द्वार।


शब्द ब्रह्म है शब्द ही,मानव का   आलोक।

शब्दों  में आंनद निधि, शब्दों से ही  शोक।।


शब्दों का  सागर  बड़ा,मानव करता   शोध।

शब्द सुमन है शूल भी, करें शब्द सत बोध।।


अर्थ बिना  क्या शब्द का,होता कोई   अर्थ।

अर्थ नहीं जाना मनुज,हो जाता सब  व्यर्थ।।


अर्थ - शास्त्र जाने बिना,संग्रह किया अपार।

ज्यों बाँबी का साँप है,मानव अर्थ  असार।।


देवनागरी  में   लिखी,  जाती हिंदी    मीत।

रोमन  से  दूषित  करें, मूढ़ समझते  जीत।।


देवनागरी  लिपि सदा, वैज्ञानिकता  पूर्ण।

अक्षर-अक्षर  में बसा,ज्ञान करे  धी घूर्ण।।


हिंदी  भाषा   ने दिए,लाखों शब्द   अपार।

देवनागरी लिपि करे,जिनका अर्थ विचार।।


🪴 शुभमस्तु !


१५.०९.२०२१◆६.३० आरोहणम मार्तण्डस्य।

चंदन संत स्वभाव है! 🔸 [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                        -1-

चंदन  लेकर  मैं  गया,तिलक लगाने   माथ।

लगा तिलक  उनके सुघर,महके  मेरे  हाथ।।

महके   मेरे   हाथ, किया  मैंने नत    वंदन।

पाया शुभ आशीष,खिला फूलों सा तन मन।

'शुभम'प्रीत संदेश,तभी खिलता है कन-कन।

महकाएँ  निज  देश, महकता जैसे   चंदन।।


                       -2-

चंदन - तरु  के  साथ में,है विचित्र   संयोग।

लिप्त तने से नित रहें, विषधर काले   रोग।।

विषधर काले रोग,नहीं विष तरु को  व्यापे।

देखें  नर   यह  हाल, भूल बैठें निज  आपे।।

'शुभं'यही जगरीति,विषlमृत पाते छन छन

संत न  छोड़ें त्याग, तपस्या का सत  चंदन।।


                        -3-

चंदन  संत  स्वभाव है,विष का नहीं प्रभाव।

शीतलता  सद्गन्ध  का,नित्य निरंतर  चाव।।

नित्य निरंतर चाव,कभी वह नहीं   छोड़ता।

मानव को सुख बाँट, विरत मुख नहीं मोड़ता

'शुभम'देख लें आप,घूमकर दुनिया वन-वन।

सरिता जैसा  रूप, कहा जाता  वह  चंदन।।


                         -4-

चंदन  जैसे  मनुज की,कर ले नर    पहचान।

जीता परहित के लिए,बढ़ता है  शुभ  मान।।

बढ़ता है शुभ  मान,मिटाकर अपनी  काया।

देता  मधुर सुगंध, शक्ति से सदा   सवाया।।

'शुभं'नागवत लोग,पटक मरते हैं निज फन।

देता है निज सीख, महकता शीतल चंदन।।


                        -5-

चंदन  चर्चित  कामिनी, के अंतर  का खेल।

मनुज न जाने देवता,अद्भुत अति  बेमेल।।

अद्भुत अति बेमेल, अजब सी एक  पहेली।

कभी ज़हर की बूँद, कभी है गुड़ की भेली।।

'शुभम' गूढ़ता मंजु, कभी करती है ठनगन।

जीवित यौवन- राग,कामिनी काया  चंदन।।


🪴 शुभमस्तु !

१४.०९.२०२१◆९.००पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 13 सितंबर 2021

ग़ज़ल /सजल 🌳

 

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समांत :  अक्ष।

पदांत  :    है।

मात्रा भार:16.

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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जननी     सुत    का     सबल अक्ष    है।

पालक   -   पोषक      पयज - वक्ष   है।।


एक     बीज          से     उगता  अंकुर,

जनक  फ़लों     का     विशद वृक्ष   है।


कहाँ        शोध        करने     को   जाते,

सबके        सम्मुख      यह  प्रत्यक्ष  है।


ऊपर     से        आया       नर    नीचे,

देख       रहा      अपने     समक्ष    है।


कर्मों    का      फ़ल       मिटा  न  पाया,

कोई      कितना         भले    दक्ष    है!


ईश्वर      सदा       सत्य    के   सँग   है,

मानव  ,  दानव     या     कि   यक्ष  है!


'शुभम'     झूठ     के    पाँव   न    होते,

सदा       सत्य     का   प्रबल पक्ष   है।



🪴 शुभमस्तु !


१३.०९.२०२१◆४.००पतनम मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल /सजल 🌻


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

समांत :  ओध।

पदांत  :    है।

मात्रा भार:16.

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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सदा     न     अच्छा   कभी  क्रोध     है।

क्या    इसका     तुमको  न  बोध    है??


जान -   छान     कर   नेह   करो   तुम,

होता    उचित        न   ही   विरोध   है।


फूँक   -    फूँक    कर    कदम    बढ़ाएँ,

करना     हमको      सफ़ल  शोध      है।


कीकर          नीम       सभी हितकारी,

छायाकारी                 न्यग्रोध      है।


जो     चलते     हैं        सही  राह   पर,

उनके    पथ       में      सदा   रोध  है।


सबका             भला  -    बुरा   पहचानें,

क्या       मानव       इतना   अबोध   है?


'शुभम'      सभी        जीवों   से   मानव,

पीता    वह     भी       मातृ - ओध   है।


मातृ-ओध =माँ का स्तन।


🪴 शुभमस्तु !


१३.०९.२०२१◆१.००पतनम मार्तण्डस्य।


ग़ज़ल /सजल 🌴


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समांत:   अना।

पदांत:     लेंगे।

मात्रा भार: 18

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✍️ शब्दकार ©

⛲ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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रूठ     जाओगे      तो    मना लेंगे।

बिगड़े   हुओं   को  भी    बना लेंगे।।


बजते      हों     अगर     नहीं  घंटे,

पाँव   उचका     के    घनघना लेंगे।


सुन्न  हो  जाएँ  जो  कर - पाँव कभी,

नाच   -     कूदेंगे      छनछना  लेंगे।


हमसे     रूठा      नहीं     रहे   कोई,

दूर     जाओ      नहीं,  अपना  लेंगे।


'शुभम'न मिले अधिकार जो अपना,

वरना    दे -  दे     के    धरना  लेंगे।


🪴 शुभमस्तु !


१३.०९.२०२१◆१०.४५ आरोहणम मार्तण्डस्य।


रविवार, 12 सितंबर 2021

ग़ज़ल 🪄


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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पत्थर  की   मीनार   खड़ी है।

कहती  वह   दीवार  बड़ी है।।


पत्थर  में  दिल नहीं धड़कता,

अपने हित   की   रार पड़ी है।


झोपड़ियों  से   नफ़रत  भारी,

नहीं आँख में प्यार -  घड़ी है।


ऊपर  ही तकती  नित  आँखें,

अंबर में   ही   लार  उड़ी   है।


मानव  लगता कीट - मकोड़ा,

पहन  रहा   संहार -  लड़ी है।


बिना  बहाए   स्वेद  देह   का,

चाहे नर   उपहार - छड़ी    है।


मानवता   मर   रही   निरंतर,

'शुभम' झेलते  मार - तड़ी  है।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०९.२०२१◆ २.००पतनम मार्तण्डस्य।

हिंदी - दिवस मनाएँ 🌷 [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आओ  हिंदी - दिवस  मनाएँ।

लिखें, पढ़ें ,बोलें ,   बुलवाएँ।।


हमें  नहीं    है बैर   किसी  से,

बंद  पड़ी खिड़की  खुलवाएँ।


नए - नए    शब्दों   को खोजें,

शब्दों  की   सरिता   बहवाएँ।


जागें  शब्दकार,   कवि  सारे,

संस्कृति  भूल नहीं हम जाएँ।


टीना,     रिंकू,    सिंटू    भूलें,

विमल,प्रतीक्षा ,यश कहलाएँ।


नाम  निरर्थक  क्यों  रखते हैं,

शुभ नामों  से  सद्गुण  पाएँ।


जननी ,जन्मभूमि,  माँ-बोली,

इनका  नित  सम्मान  बढ़ाएँ।


हिंदी    गौरव    हिंदी   सौरभ,

हिंदी   में   ही   हृदय   रमाएँ।


रक्षासूत्र    बाँध      हिंदी   के,

'शुभम'  हिंद  के  पूत कहाएँ।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०९.२०२१◆१२.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🦚

 

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✍️

 शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हिंदी     अपनी      माता   है।

कहने  में   क्या   जाता   है??


कॉन्वेंट    में      संतति      है,

मात -  पिता   को    भाता है।


विकल   वितृष्णा     हिंदी  से,

अंग्रेज़ी      से       नाता     है!


संस्कार    से     हीन     हुआ,

पश्चिम    में      मदमाता    है।


हिंदी     पिछड़ों    की  भाषा,

पिछड़ा     ही     अपनाता है।


ढोल   दूर    के     मधुर   लगें,

सुनता     है      बजवाता   है।


माँ   की     भाषा   गँवई    है,

कहता    और    सिखाता  है।


सदा   समर्पित    हिंदी    को,

राता,    गाता,     ध्याता    है।


हिंदी  -  माटी     से    जन्मा,

'शुभम'  सहज   कहलाता है।


🪴 शुभमस्तु  !


१२.०९.२०२१◆११.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🍁


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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जिसने   शमा     जलाई    है।

कर  दी   जगत - भलाई   है।।


अंधा         बाँटे       रेवड़ियाँ,

अपनी    ओर    कलाई     है।


माले -  मुफ़्त   न  दिले  रहम,

क्या   रुख़सार    ललाई    है!


मतलब    जो    पूरा   कर  दे,

निज  शुभचिंतक   भाई    है।


आग   लगाना    सरल   यहाँ,

हर    कर    दियासलाई    है ।


पैदल  को      दी    साईकिल,

बोला      चली - चलाई     है।


'शुभम'  न   बहे   पसीना भी,

चाहे     मधुर      मलाई    है।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०९.२०२१◆११.३०आरोहणं मार्तण्डस्य।

बोध - अंजलि 🏺 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जन्मी मध्य तनाव के, मानव की शुभ देह।

प्राण अंतरण हो गया,अनजाने जन-गेह।।


शिशु- वय में स्वच्छन्द हो,पाया  सर्वानंद।

रूप  हुआ भगवान का,लिखे नेह के छंद।।


ज्यों-ज्यों वय बढ़ती गई,बढ़ते रहे  तनाव।

शिक्षालय में जब गया,लगा बदलने  भाव।।


वय किशोर में नारि- नर,खेले- कूदे  ख़ूब।

मीत मिले मुस्कान-से,जमी प्यार की दूब।।


शिक्षा भी   पूरी  हुई, यौवन करता   खेल।

दो तन-मन जब से मिले,बढ़ी वंश की बेल।


धन अर्जित  करने लगा,फैला विस्तृत जाल।

बढ़ते  नित्य  तनाव  भी,होता माला-माल।।


दायित्वों  के  भार से,दबता विविध प्रकार।

कभी जीत दिखती उसे,कभी दीखती हार।।


जिसे न निज दायित्व का,तनिक नहीं है बोध

पशुवत नर विचरण करे, करके देखा शोध।।


मात-पिता गुरु का कभी,किया नहीं सम्मान।

शूकरवत वह मनुज है,कभी न बढ़ती शान।।


मात-पिता गुरु,ईश के,माने जो प्रतिरूप।।

रौरव में गिरता नहीं,'शुभम' उसे भवकूप।।


मात-पिता गुरुमान का,जिसे नहीं है ध्यान।

मिट जाता है अवनि से,उसका नाम निशान।


🪴 शुभमस्तु !


१२.०९.२०२१◆१०.००आरोहणम मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

गीतोपदेश के हम अनुयायी! 📒 [ व्यंग्य ]

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ ✍️ व्यंग्यकार © 🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' ◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆ श्रीमद्भगवद्गीता में योग योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' (२.४७) के सुसंदेश का सर्वथा अनुपालन हमारे यहाँ तब से किया जा रहा है ,जब भगवान ने इस धराधाम पर अवतरण भी नहीं किया था।फिर भी उन्हें यह पवित्र संदेश पार्थ के बहाने हम देशवासियों को देना पड़ा।बड़ा अच्छा काम किया। लेकिन मुझे विचार करने पर यह पता चला कि भगवान श्रीकृष्णजी का यह कोई नया शोध नहीं था। आप पूँछेंगे कि कैसे नहीं था नया शोध ? तो इस बात का उत्तर देने के लिए ही तो इस तर्जनी को कुंजी पटल पर घिस रहा हूँ। अब आप भी मेरी तरह एक बार विचार की चरखी के चक्र को घुमा कर देखें ,तो ज्ञात होगा कि जब से सृष्टि का श्रीगणेश हुआ ,तब से आज तक हमने ,आपने, उन्होंने ,सबने : ही कर्म के फल की चिंता कब की है?बस कर्म करते रहे ।चाहे पराशर ऋषि ने निषाद कन्या मत्स्यगंधा(सत्यवती)के साथ नाव में ही अपने योगबल को एक कोने में रखते हुए दैहिक संबंध स्थापित किया हो!चाहे जगत को माह की उन्तीस अँधेरी रातों में प्रकाशित करने वाले चंद्रमा ने गौतम ऋषि की पत्नी के साथ छद्म रूप में अनैतिकता की हो। चाहे भरी सभा में दुःशासन ने अपनी भाभी द्रौपदी का वस्त्र हरण किया हो। चाहे 'शठे शाठ्यम समाचरेत' के अनुपालन में भीम ने दुर्योधन के साथ गदायुध्द में श्रीकृष्ण के संकेत पर कमर के नीचे प्रहार कर पराजित किया हो। विश्व के इतिहास, महाभारत, पुराणों, रामायण आदि में ही नहीं सारे संसार में अरबों- खरबों उदाहरण ऐसे कर्मों से भरे पड़े हैं, जहाँ कर्म -फल की चिंता किये बिना ही कर्म कर डाले गए। इस प्रकार विश्व का भूत और वर्तमान काल ऐसे नित्य के अरबों कर्मों से धनाढ्य है। औऱ भविष्य में भी दिन में दूनी औऱ रात में चौगुनी दर से सभी कर्म निर्लिप्त भाव से निरंतर गुणात्मक रूप से होते रहेंगे। मानव ने कर्म के मामले में कभी भी फ़ल की चिंता नहीं की।'जो हो सो हो' - का 'आदर्श - चिन्तन' ही हमारी कर्म - शृंखला का आधार है।जब करना ही है तो सोचना - समझना ही क्या! उस समय विवेक को खूँटी पर टाँग ही देना चाहिए। 'कर्म' करते समय यदि 'विवेक'ने अपनी टाँगें अड़ा दीं , तो आप कर्म- विमुख भी हो सकते हैं। 'कर्म-वैराग्य' हो गया तो औऱ भी मुश्किल की बात होगी।क्योंकि यदि कर्म ही न रहा तो इंसान कैसा? इसलिए निःसंकोच कर्म करते रहें। बिना आगा-पीछा सोचे हुए। कर्म करने के मार्ग में ये 'सोचना - समझना' सबसे बड़ा गतिरोधक (स्पीड ब्रेकर ) है।इस 'सोच-समझ' से मुक्ति पाकर ही आप कोई भी 'कर्म' बेधड़क कर सकते हैं। जैसे चोर, डकैत, राहजन, ग़बनकर्ता, उत्कोच -प्रेमी, देश के लुटेरे (अब मैं ये क्यों बताऊँ कि 'वो' कौन कौन हैं, और कौन दुग्ध -स्नात औऱ दुग्ध-धवल हैं?), अपहर्ता, बलात्कारी , जार, लाचार, व्यभिचारी, मिलावटखोर, कमीशनखोर, आतंकी आदि आदि; ये सभी कर्म फ़ल की तृण मात्र भी चिंता नहीं करते। 'रेलवे आपकी सम्पति है' ,इस सिद्धांत के अनुयायी पूरे देश को ही अपना मानते हैं ।जिसकी गुल्ली जितनी दूर तक जा सकती है , उसे फेंकता है और अपना कर्म करने में तल्लीन रहता है।किसी की सीमा मोहल्ले भर की है ,तो किसी की कस्बे भर की। कोई ट्रेनों ,सड़क , बसों, हवाई जहाजों में दौड़ - दौड़ कर कर्म का उत्तरदायित्व पूरा करता है।तो किसी की सीमा अपनी दुकान, कार्यालय या शोरूम तक ही है। सबके क्षेत्र बँटे हुए हैं। इसलिए कोई टकराव नहीं है। सब मिल- जुल कर अपने-अपने कर्तव्य का भार उठाए हुए हैं। अब आप हैं कि आपने कर्मों का भी अपनी तरह से जाति और वर्ण विभाजन कर दिया है ।कर्म में भला - बुरा क्या ? कर्म को मात्र कर्म ही रहने दीजिए न! कसाई को ये बता दें कि गाय पूर्व दिशा में गई है, यद्यपि वह पश्चिम में गई हो, तो झूठ भी पुण्य है। क्योंकि आपने झुठ बोल कर एक जीव की हत्या होने से बचा लिया। इसके विपरीत बोलने पर आपका सत्य भी पाप की श्रेणी में आ जाता। यहाँ पर पाप पुण्य की परिभाषा भी बदल जाती है। सब कुछ सापेक्षिक हुआ न? युद्ध भूमि में किसी शत्रु को मारना पाप नहीं है ,क्योंकि वहाँ देश की रक्षा की बात है। वहाँ मरने वाला मरता नहीं ,शहीद होता है ,बलिदानी होता है ,जिस पर पूरा देश गर्व करता है। सब कुछ देश ,काल और परिस्थिति की सापेक्षिकता पर निर्भर है। इसलिए बेधड़क कर्म किए जाओ: 'कर्म किए जा फ़ल की इच्छा मत कर ओ इंसान। ये है गीता का ज्ञान, ये है गीता का ज्ञान।' 🪴 शुभमस्तु ! १०.०९.२०२१ १२.४५ पतनम मार्तण्डस्य

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

सच से सच की रार 🌐 [ अतुकांतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

✴️ डॉ. भगवत स्वरूप शुभम

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सच से सच की

रार ठनी है,

युग -युग से ही

तनातनी है,

शूल भयंकर 

नागफनी के,

निर्णय कैसे 

हो पाएगा!

झूठों का दरबार।


कीट, हिंस्र पशु

हुआ आदमी,

 गीता ,वेद ,

रामायण फ़िर भी,

राम नहीं 

न बना कृष्ण ही,

सीता ,सावित्री

नहीं बन पाई कोई नार,

गई मनुजता हार।


गली - गली उपदेशक ज्ञानी,

धारण कर  तलवार ,

काटने को मानव को

बैठे हैं  तैयार, 

कौन शेर है चीता 

फाड़ चीर कर 

खाने में होशियार,

शिकंजे अपने फैलाते,

बंद चेतना के हैं

सारे द्वार।


छद्मता का रँग गहरा,

तानाशाही आतंकों का

जन पर पहरा,

शासक आँखों से अंधा

करता गहन प्रहार,

नहीं आते अब तारण को

कृष्ण मुरारि।


अंधों के पीछे 

अंधों की भीड़,

तोड़ रही नित

लोकतंत्र की रीढ़,

संविधान का नित

हो रहा पूर्ण बहिष्कार,

मनमाने क़ानून ,

ऊन की दून,

बहाते मानव का खून,

सभ्यता संस्कृति 

होती है नित क्षार।


तथाकथित उद्धारक

बन बैठा मानव का संहारक,

स्वयंभू  भगवान!

षड्यंत्रों का योजक

सब कुछ प्रायोजित

नित  - नित ,

अंधों का जन-जन के प्रति

अंधेपन का दत्त उपहार,

 'शुभम'  देश की

 हालत सब बदहाल।


🪴 शुभमस्तु !


०९.०९.२०२१◆१.००

पतनम मार्तण्डस्य।

घर का वैद्य :नीम 🌳 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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घर   का   वैद्य   नीम है  मेरा।

मेरे   आँगन   खड़ा    घनेरा।।


शीतल  छाया  नित  देता  है।

त्वचा- रोग  सब हर लेता है।।


दातुन  इसकी अति उपयोगी।

दाँत   मसूड़े    रहें   निरोगी।।


बदबू   मुख  की  दूर  हटाता।

प्रतिरोधक क्षमता  बढ़वाता।।


रक्त स्वच्छ करता  है तन का।

कैंसर-नाशक होता जन का।।


आँख  नहीं   यह  आने  देता।

जो इसकी पाती   खा  लेता।।


स्वाद जीभ का  नीम बढ़ाता।

देह -  ऊर्जा   सदा   चढ़ाता।।


जो नर  नीम  सदा  अपनाए।

आलस तन  का दूर  भगाए।।


सावन में   हम    झूला  झूलें।

पींग बढ़ाकर  नभ को छू लें।।


कड़वा है पर  अति  गुणकारी। 

मधुमेही  को  है  हित   भारी।।


'शुभम'नीम हरता ज्वर सारा।

 दे  पंचांग  सदा   हित नारा।।


🪴 शुभमस्तु !


०९.०९.२०२१◆१०.००

आरोहणम  मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...