दोहा gitika लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दोहा gitika लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 11 सितंबर 2022

हिंदी मम पहचान 📚 [ दोहा गीतिका ]

 368/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

📚 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

बोली, भाषा, लेखनी,जननी का   वरदान।

हिंदी   से ही हम बने, हिंदी मम पहचान।।


लिखना, पढ़ना, बोलना,हिंदी अपनी  एक,

हिंदी  गौरव  देश  की,हिंदी   से  ही   मान।


आ से ज्ञ  तक वर्ण का, वैज्ञानिक   निर्माण,

सुघर कंठ से होठ तक,वर्णों का शुभ ज्ञान।


रंग - रंग होली  सजी,फागुन का  मधुमास,

सावन  कजरी गा रहा,भादों से घन  दान।


विजयादशमी की खुशी, दीवाली  का  पर्व,

हिंदी से  ही   सोहते,  अपने पर्व   महान।


अलग-अलग सम्बंध केअलग अलग ही नाम

अम्मा,चाची ,भाभियाँ, सबके विशद वितान।


उधर सभी  हैं आंटियाँ,अंकल की   भरमार,

दो  ही  शब्दों  में  छिपा, हर रिश्ते का भान।


माला   बावन  वर्ण  की,पहन गले  में  मीत,

हिंदी  भाषा  आपकी,  है साहित्यिक  शान।


'शुभम्' नमन करता तुम्हें, हिंदी  मेरी  मात,

हिंदी कविता ने किया,शोभन स्वर्ण विहान।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०९.२०२२◆४.१५ 

पतनम मार्तण्डस्य।

रविवार, 4 सितंबर 2022

सात बजे के बाद 🕖 [ दोहा गीतिका ]

 357/2022

       

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

समय -  सूचिका घंटिका, शोभा का  शृंगार।

पानी  भरती   कूप  पर,बाँध कलाई   नार।।


शाला  का घंटा  बजा,किया छात्र  प्रस्थान,

कसी  पेंट घर से चले, पड़ी गाल पर  मार।


भीड़   जमा  मैदान  में, हुई बहुत ही  देर,

नेताजी  आए     नहीं,  घंटे  बीते    चार।।


न्यौता  तो था   चार  का ,बीते घंटे  पाँच,

सात   बजे   के  बाद  ही,आते रिश्तेदार।


शुभ मुहूर्त देखा गया,दिया न थोड़ा ध्यान,

वेला  बीती  शुभ घड़ी, ब्याह न  द्वारचार।


भारतीयता  का   बड़ा, गौरव, गर्व,गुमान,

दुलहन  उठी  न भोर  में, सोई पाँव  पसार।


'शुभम्' ढोल की पोल का, डंका रव घनघोर,

समय -चोर आंनद में, दिखलाते   उपकार।


🪴शुभमस्तु !


०३.०९.२०२२◆८.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

अमृत- उत्सव देश का 🇮🇳 [ दोहा गीतिका ]

 316/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

अमृत - उत्सव देश का,भारत माँ   के नाम।

दे  दी  हमें  स्वतंत्रता, उनको नमन प्रणाम।।


वे  बलिदानी   वीर  थे, दिया त्याग  परिवार,

 बलिवेदी  पर  होमते,अपने प्राण    तमाम।


प्रणय छोड़ ममता तजी, मात-पिता का नेह,

होली,  दीवाली नहीं, सुबह  न  देखी   शाम।


आजादी  की  वायु  में,लेते  हैं  हम  साँस,

हमें  नहीं अनुमान  है, अति वीरों  के काम।


अपना  ये  कर्तव्य   है, राखें सदा   सँभाल,

आजादी  हमको  मिली,करें नहीं   विश्राम।


एक  देश  की  एक  ही, ध्वजा  तिरंगा  एक,

लहराए  नित  शान  से,वर्षा हो    या  घाम।


'शुभम्'काव्य-रचना करें, भारत का गुणगान,

गाथाएँ अनगिन कहें, दिव्य ज्योति उर धाम।


🪴शुभमस्तु !


०७.०८.२०२२◆५.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...