बुधवार, 20 अक्तूबर 2021

शरद -चंद्रिका शृंगार 🌝 [ दोहा ]

 

[ चाँदनी,शरद,पूर्णिमा,मास, शीतल]

            

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✍️ शब्दकार ©

🌝 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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खिली   चाँदनी  रात है,  रचा  रहे  हैं  रास।

कृष्ण संग हैं राधिका,विमल क्वार का मास।


चाँद- चाँदनी नेह का,शोभित दृश्य ललाम।

निर्मल'शुभं'प्रकाश से,जगमग निशि का धाम


शरद-आगमन हो गया,पूनम की शुभ रात।

अमिय बरसता व्योम से,मोद भरा उर-गात।


ऋतुरानी  वर्षा   विदा,आया शरद   प्रभात।

शीतलता  भाने  लगी,सम होते  दिन - रात।


क्वार कुमारी पूर्णिमा चाँद निकटतम आज।

पास आ गया अवनि के,शरदागम सह साज


शरद- पूर्णिमा चंद्रिका, तारों  की  बारात।

निशिपति हैं दूल्हा बने,तम को   देते  मात।


शरद- पूर्णिमा चंद्रिका,चंचल चारु चकोर।

रजनी भर देखा करे,होने तक शुभ भोर।


मास सातवाँ क्वार का, विदा पूर्णिमा रात।

टेसू - झाँझी  भी चले, दीपावलि   सौगात।


मास शरद के ओसकण,बरसाते जलबिंदु।

शीतलता बढ़ने लगी,नभगत उज्ज्वल इंदु।।


ऋतु निदाघ पावस विदा,शीतल शरद तुषार

तुहिन बिंदु बरसे विमल,मानो अंबर -  सार।


शरद -पूर्णिमा क्वार की,

                  शीतल शोभन मास।

खिलती निर्मल चाँदनी,

                       दीपमालिका आस।


🪴 शुभमस्तु !


२०.१०.२०२१◆९.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

     (शरद - पूर्णिमा )

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

  तब और अब ! 💃🏻

 [ व्यंग्य ] 

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✍️ व्यंग्यकार ©

 💃🏻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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        आप अपनी जानें ,हम तो अपनी बात कहते हैं।कहें भी क्यों नहीं ,आज के जमाने के जुल्म जो सहते हैं।अब आप ये समझ लें कि मुर्दे ही प्रवाह में बहते हैं। हम तो हैं ही वे बंदे ,जो नदी की धार को चीर कर प्रवाह के विपरीत बढ़ते हैं। नए जमाने की हवा अभी इतनी नहीं लगी ,कि हवा का छोटा - सा झकोरा ही हमें अपने साथ बहा ले जाए! और सींग- मुंडित बछड़ों में हमारा नाम लिखवा पाए ! 

      बड़ा ही प्यारा था हमारा अतीत।हर जगह ही हम हुआ करते थे सतीत (सतीत अर्थात आर्द्रता से युक्त।) पर आज के जमाने का ये चकमक रूखापन कुछ रास नहीं आता। कोरा दिखावटी प्रदर्शन मन को नहीं भाता। बात शादियों की करें तो पीछे मुड़कर झाँकना होगा। बताएंगे वही, जो हमने और हमारे संगतियों ने भोगा। 

     बारात आती थी ,तो घर-पड़ौस की ताइयां,भाभियाँ, चाचियाँ,बहनें,मामियां सभी विवाह की तैयारियों में जुट जाती थीं। कहीं कोई कमी न रह जाए। कोई हल्दी पीस रही हैं , कोई दुल्हन के हल्दी लगा रही हैं।कोई आटा छानने में अपने हाथ ,मुँह, कपड़े आटे से साने हुए जुटी हुई हैं।कोई बेसन की उबटन तैयार कर रही है। नाइन उबटन लगा रही है।भाभी काजल लगा रहीं हैं औऱ नेग की माँग कर रही हैं।बारात आने पर सबकी सब पूड़ियाँ बेलने में लग जातीं। बाराती घरातियों को नर्म - गर्म,गोल - मटोल पूड़ियाँ खिलवातीं। रस भरे गीत औऱ गालियाँ भी सुनातीं। ढोलक की थाप पर नाच संगीत में मस्त हो हो जातीं।मानों शादी का पूरा कार्य भार अपने सिर पर खुशी -खुशी उठातीं । 

           पर अब कहाँ ? अब तो सभी भाभी , बहनों , मौसियों , फूफियों,पर एक ही काम बचा हुआ है।वह है अपना शृंगार । जितने काम काज की लिस्ट ऊपर बताई गई है, उसे उनके ऊपर मत छोड़ दीजिए। अन्यथा कोई काम नहीं होने वाला है।अब तो उनका अपना शृंगार ही प्रमुख है। पूड़ियों जैसी मोटी-मोटी पूड़ियाँ बेलने के लिए चार -छः मज़दूरिनें रख ली जाती हैं। इन पूड़ियों को तोड़ने के लिए किसी - किसी को चाकू - कैंची की जरूरत पड़ जाए, तो ये विश्व के नवमे आश्चर्य से कम नहीं होगा ।

      सब्जी ,रायता ,मिठाइयां, गोल गप्पे , चाऊमिन, दही बड़ा, फ्रूट चाट, रस मलाई, मीसी  रोटी, तंदूरी रोटी आदि - आदि तो हलवाई ही तैयार कर देता है।पर पूड़ियाँ खाने की तो बात ही क्या! देखकर ही पेट भर जाता है। उनमें भावज,मामी,ताई, चाची के हाथ का रस जो नहीं होता।उन बेचारियों का मुख्य कार्य ' आत्म शृंगार' जो होता है। घर के शीशे कम पड़ जाते हैं। ब्यूटी पार्लर वाले तो इनके इंतज़ार में सूख रहे होते हैं, उनका उद्धार करने के लिए वे तैयार जो बैठी हैं। पहुँच जाती हैं। और ज्यादा नहीं दो - चार हजार तो ठंडे कर ही आती हैं।यदि स्वयं कामगार हैं तो किसी के बाप की भी सुनना उन्हें गवारा नहीं।कमाती जो हैं! तो गँवाएँ क्यों नहीं? वे कोई नौकर - दासियाँ थोड़े हैं, जो आटा गूँथें या पूड़ी बेलें? वे तो यहाँ एन्जॉय करने के लिए ही पधारी हैं न ! तो अपने एन्जॉयमेंट में कोर कसर क्यों रखें! उन्हें पूरा का पूरा एन्जॉय जो करना है!

       सभी रिश्तेदार और घर की महिलाओं को तो अपने ही शृंगार से फुरसत नहीं। क्या करें बेचारी। लगता है दूल्हे ने इन्हीं को पसंद किया है या करने वाला है। बारात भी दुल्हन की नहीं ,इन्हीं की आ रही है।कुछ महत्वाकांक्षी बालाएँ ऐसी भी होती हैं ,कि शायद कोई बाराती लड़का उन्हें भी पसंद कर सकता है। इस प्रकार की धारणा उनके अवचेतन मन में छिपी रहती है। 

       तब की बात तब गई । अब की बात ही और है।क्या आपने इस बात पर किया कभी गौर है ? सच्चे अर्थों में तब गालियों में रस बरसता था। लोग कहते हैं कि आज के प्रगतिवादी युग में लोग सुधर गए हैं। अब अश्लील गालियाँ नहीं गाई जातीं।अंतर मात्र इतना आया है ,कि जो बातें गालियों में गाई औऱ सुनाई जाती थीं, वे अब हूबहू सच होने लगी हैं। उनका प्रेक्टिकल होने लगा है।इसकी अम्मा उसके साथ,.... इनकी बहना उनके साथ,..... इनकी बीबी किसी और के पास ....वगैरह वग़ैरह । ये सब होने ही लगा गया,तो सुनने वालों को मिर्चें लगना सामान्य - सी बात है! संक्षेप में कहा जा सकता है कि आज उन पूर्वदत्त गालियों का 'साधारणीकरण' हो गया है।बस आज की नई सभ्यता में इतना 'सुधार' (?) अवश्य हुआ है। ये 'अब ' की बात है। 'तब 'बात कुछ औऱ थी। अब तो अनायास ही फ़िल्मी गीत की ये पंक्तियां स्वतः 

जुबाँ पर आ ही जाती हैं: 'बीता हुआ जमाना आता नहीं दुबारा।' 

'हाफिज खुदा तुम्हारा।'

 🪴 शुभमस्तु ! 

 १९.१०.२०२१◆पतनम मार्तण्डस्य। 

 🧕🏻💃🏻🧕🏻🪴🧕🏻💃🏻🧕🏻💃🏻🧕🏻 

          

शरद पूर्णिमा 🌝 [ मुक्तक ]


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✍️ शब्दकार ©

🌝 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                        -1-

क्वार - मास   की  पूनम आई,

नर - नारी    के   मन  को भाई,

शरद पूर्णिमा   कला सोलहों,

धारित  शशि  को  लिए सुहाई।


                        -2-

शरद - आगमन   उस  दिन होता,

मुस्काता        चंद्रमा       उदोता,

शरद पूर्णिमा  की निशि मोहक,

लगता   चाँद    ले     रहा गोता।


                        -3-

चाँद    निकटतम  आज  धरा के,

अंबर  से     अमृत    बरसा   के,

शरद    पूर्णिमा    महारास   से-

सम्मोहित    वंशीधर    पा   के।


                         -4-

चंद्र   देव    की     पूजा   कर लें,

शिव -गिरिजा   को  उर में धर लें,

सँग    में   पूजें    पुत्र    षडानन, 

शरद   पूर्णिमा  प्रभा  सुघर  लें।


                         -5-

खीर    बना    प्रसाद   हम  खाते,

अमृत      सोम     देव    बरसाते,

शरद पूर्णिमा       ही कोजागरि,

चंद्र      सुधाकर     भी कहलाते।


🪴 शुभमस्तु !


१९.१०.२०२१◆११.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

सेवा ,पूजा और 'श्रील ' 🏕️ [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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 'सेवा' में हर मनुज का,होता प्रमुख विचार।

दुखी और नर श्रेष्ठ को,सुख देना ही   सार।।


अपने ही  संतोष  हित, 'पूजा' करते    लोग।

अभिरुचि सारी तृप्त हो,भक्ति कला का योग


बँगला में श्री शब्द को,कहते कोविद 'श्रील'।

'श्रील' नहीं,अश्रील वह,रूपांतर  अश्लील।।


'श्री' का जहाँ अभाव है, कहलाता अश्लील।

श्री युत होने के लिए,तृण भर करें न ढील।।


शुचिता, शोभा,तरुणिमा,यौवन सम्पति नाम

उन्नति,कांति, प्रसन्नता,'श्री'के अर्थ ललाम।।


एक  दूसरे  पर  नहीं, हो  निष्ठा  का   भाव।

कामुकता अश्लील वह,विलसित हो उर घाव


मिले जहाँ संस्कार का,होता पूर्ण अभाव।

वह भी है अश्लील ही,जगता लज्जा-चाव।।


रतिक्रीड़ा के  काल में, कामुक  वार्तालाप।

श्लील सदा माना गया,गुण ही मानें आप।।


कभी-कभी अश्लील भी,होता सद्गुण मीत।

प्रणयावधि में प्रेम का,बजता जब   संगीत।।


प्रणय युगल का ही सदा, होता कब अश्लील

क्रिया वचन संवाद शुभ,गहरी रस की झील


सेवा, पूजा,प्रेम का,'शुभम' सत्य   परिणाम।

सबके साधन पृथक हैं, अनुपम पावन धाम।


🪴 शुभमस्तु !


१७.१०.२०२१◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

कलयुग का 'अति रावण' ! 👺 [ अतुकांतिका ]

 

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✍️शब्दकार ©

🛕 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कैसी - कैसी विडंबना!

खिसियानी बिल्ली का

खंभा नोंचना,

सोचने के समय

कदापि नहीं सोचना!

रावण के पुतले

दहन करने की उदघोषणा।


त्रेता के रावण ने

छुआ भी नहीं 

राम की अर्धांगिनी सीता को,

दुर्भाव से कभी,

और पुतलों के दहनकर्ता

आज के ये  रावण ?

(राम तो हैं ही नहीं अब शेष,

 मंदिर की मूर्तियों में नहीं हैं अवधेश। )

छूने से भी 

सैकड़ों मील आगे,

रे मूढ़!मानव अभागे!

सोचा है कभी 

अपनी वासना के आगे!


आज गली - गली

घर -  घर

नगर - नगर 

रावण ही रावण!

'अतिरावण'!!

रुलाते हुए जनता को,

हेलीकॉप्टरों  में

कारों में दहाड़ रहे हैं!

ऊँचे - ऊँचे मंचों पर चढ़े

चिंघाड़ रहे हैं,

रिश्वत, ब्लात्कार, व्यभिचार,

राहजनी, ग़बन, मिलावट,

भ्रष्टाचार,वर्णवाद, जातिवाद,

पत्थरबाज!


रावणों के मात्र ये दस नहीं,

हजारों शीश और 

लाखों भुजाएँ हैं,

इतने सबके बावजूद,

अभी तक नहीं लजाए हैं,

इन रावणों के लिए

अभी तक बनी नहीं

 कोई भी सजाएँ हैं,

ये सब बड़े ही घुटे -घुटाए 

और मजे - मजाए हैं,

ऊपर से नीचे तक

पूरी दाल ही काली है,

अँधेरे में बाग को उजाड़ता,

वही उजाले में माली है।


 कहाँ हैं शेष अब

 राम और लखन?

चाहते हैं प्रायः 

करना  ये सभी 

देश का भक्षण! 

कौन करेगा मर्यादा

संस्कार औऱ 

संस्कृति का    रक्षण?

तक्षक ही तक्षक!

भक्षक ही भक्षक!!

कोई नहीं शेष

 एक संरक्षक!


रावण ही लगाकर मुखौटे

राम बनकर आ गए हैं,

पूर्व से पश्चिम

उत्तर से दक्षिण तक,

ऊपर से नीचे तक,

इस कोण से 

उस कोण तक

छा गए हैं,

कैसी विडंबना है कि

'अतिरावण' कलयुग के

त्रेता के मर्यादित रावण को।

जला रहे हैं?_

अपनी क़मीज़

 जैकेट के बटन,

कसकर लगा रहे हैं! 

कि कहीं कोई

 उनकी पोल न पा ले!

उनके हिस्से की 

कोई और न खा ले?

'शुभम' यह नहीं कोई रामलीला ,

 अपनी रावणलीला

में राम का उपहास 

दिखा रहे हैं।


🪴 शुभमस्तु !


१५.१०.२०२१◆१.३० पतनम

मार्तण्डस्य।


बुधवार, 13 अक्तूबर 2021

नवरात्रि दोहा शृंगार 🚩🚩 [ दोहा ]


{ दशहरा,सत्य, नवरात्रि,शरद, गरबा }

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✍️ शब्दकार ©

🚩 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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बसी  बुराई  दस बड़ी,हुआ हरण     संहार।

वही दशहरा है 'शुभम',मना रहे नर-नार।।


रावण के दस सिर नहीं,मन के थे दस दोष।

बना दशहरा  पर्व ये, जगा राम  का   रोष।।


हुई असत पर सत्य की,जीत राम की मीत।

लंकापति की ढह गई,कंचन निर्मित  भीत।।


सत्य कभी झुकता नहीं, है असत्य की हार।

खुल जाते सौभाग्य   के, बंद पड़े सब द्वार।।


माता  दुर्गा  की  करें,आराधन नर  -  नार।

कहलाती  नवरात्रि   ये, देती  हैं जन तार।।


तन-मन निज पावन रखें,करें न तामस भोग

जब आतीं नवरात्रियाँ, ब्रह्मचर्य  का  योग।।


शरद- चंद्रिका खिल उठी,तारे  करते  खेल।

स्मित-आभा  चंद्र की,करती है  प्रिय  मेल।।


शरदागम ज्यों ही हुआ,खिला प्रकृति का रंग

नहीं उष्ण शीतल बहुत,नील गगन का संग।।


भक्ति- नृत्य गरबा रहा,मचा  माधुरी   धूम।

बजती है ध्वनि ढोल की,रही गगन को चूम।


घट सछिद्र सज्जित किया,पल्लव सुंदर फूल

गरबा करतीं नाचकर,परितः निज को भूल।


शरद दशहरा सत्य की,

                   है असत्य पर जीत।


गरबा करतीं बालिका,

                 शुभ नवरात्रि सगीत।।


🪴 शुभमस्तु !


१३.१०.२०२१◆११.४५

आरोहणं मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 12 अक्तूबर 2021

गोली पर गोली चढ़ी! 💊🟠 [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                        -1-

नीचे   भीषण   गंदगी, ऊपर जन     बीमार।

रोग स्वयं जन पालते,बढ़ता ज्वर का ज्वार।

बढ़ता ज्वर का ज्वार,खा रहे भर-भर झोली।

सुइयाँ  चुभतीं   देह, हजारों कड़वी गोली।।

'शुभम' देश  बदहाल,रहे धन नित्य  उलीचे।

घर -घर पड़तीं खाट, पड़े कुछ भू पर नीचे।।


                        -2-

ऐसा   कोई  घर नहीं,जहाँ न हों    बीमार।

सिर पर बोझा ढो रहे,खुले रोग  के  द्वार।।

खुले  रोग  के  द्वार,प्रकृति  से रखते  दूरी।

लें  गोली   कैप्सूल, पड़ी  ऐसी  मजबूरी।।

'शुभम' देह  विकलांग,चाहते करते   वैसा।

दूषण  से  है  प्यार, क्यों न हो रोगी   ऐसा।।


                        -3-

भोजन जल बेस्वाद है, विष - रस से भरपूर।

कृत्रिम से ही नेह अति,कुदरत से अति दूर।।

कुदरत  से  अति  दूर, तेज  है जीवन  तेरा।

फ़ूड  फ़टाफ़ट  पेट,  रोग   ने डाला    डेरा।।

'शुभम'  दवा का बोझ, रोग ही देता   रोदन।

बौनी  होती देह,खा रहा विष का  भोजन।।


                        -4-

गोली  पर  गोली  चढ़ी,अड़े बीच   कैप्सूल।

नीचे  नारी   पूत  सँग, उसके नीचे    धूल।।

उसके  नीचे  धूल ,  प्रदूषण फैला    भारी।

घुसता तन-मन  बीच, बढ़ी घातक बीमारी।।

'शुभम' आदमी  मूढ़, विषों की खेले  होली।

भोजन    छूटा  दूर, भखे  गोली पर  गोली।।


                        -5-

खाकर कैमीकल मरे,मनुज आज का मीत।

भोजन, सब्जी, दूध में,  देह गई   है   रीत।।

देह  गई  है   रीत,  प्रदूषण पैदा     करता।

कर्महीन  की  सोच, प्राण अपने नर  हरता।।

'शुभम'   घरों  में बंद,देह ए सी  की  पाकर।

क्षार हुआ है गात,विषज भोजन को खाकर।


🪴 शुभमस्तु !


१२.१०.२०२१◆११.४५आरोहणं मार्तण्डस्य।


बुरुष, दंत-पेस्ट सब त्यागें🪥 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बुरुष,  दंत- पेस्ट  सब  त्यागें।

हम  सब   भरतवासी   जागें।


दंत- पेस्ट  हैं  मुख के दुश्मन।

मुख को दूषित करते हर छन।


उपयोगी     जीवाणु   नसाते।

स्वाद नष्ट   कर संकट   लाते।


तोड़ नीम   की   दातुन  लाएँ।

कूँची  बना   दाँत    चमकाएँ।


उत्तम  है  बबूल  की   दातुन।

करें मसूड़ों  का  सशक्त तन।


दातुन अपामार्ग  की जड़ की।

स्मृतिवर्द्धक धी कण-कण की।


दातुन चीर   जीभ  को  माँजें।

स्वाद-कली की सुषमा साजें।


हमने   छोड़े  तुम  भी  छोड़ें।

पेस्ट,बुरुष से  मुख को मोड़ें।


दातुन कर  मुखरोग   भगाएँ।

'शुभम'स्वाद भोजन का पाएँ।


🪴 शुभमस्तु  !


१२.१०.२०२१◆६.३०आरोहणं मार्तण्डस्य।


इतिहास अपने को दोहरा रहा है!♦️ [ व्यंग्य ]


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 ✍️ शब्दकार © 

 ❤️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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           बचपन में हम इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा करते थे कि प्रचीन काल में मानव अपने विकसित रूप में नहीं था।उस समय वह वन्य पशुओं और जलवायु गत मौसमी प्रहारों से आत्म रक्षार्थ पेड़ों, गुफाओं आदि में निवास करता था। उसके हथियार,खाने -पीने के बर्तन आदि सभी पत्थरों के बने हुए होते थे ।यहाँ तक कि डाक्टरों के शल्य क्रिया ,प्रसव आदि के यंत्र भी पाषाण निर्मित ही होते थे। इसलिए उसे इतिहासकारों ने 'पाषाण काल' की संज्ञा से अभिहित किया।बाद में क्रमश लौह युग, ताम्र युग आदि मानव के विकास क्रम से आते - जाते गए औऱ इसी क्रम में वर्तमान आधुनिक युग भी आ गया।

         हमारे कथन का मुख्य मंतव्य 'पाषाण युग' से है। उस समय असभ्यता में हम पाषाण युग में जी रहे थे।परंतु आज हम सभ्यता (?) में पाषाण युग में जी रहे हैं। उस समय भी हमारे हथियार पाषाण के बने हुए थे और आज अणु ,परमाणु, हायड्रोजन , जीवाणु , वायरस बम के युग में रहते हुए भी पाषाण को अपना दैनिक जीवन का मुख्य हथियार मान ही रहे ,उसका बखूबी प्रयोग करते हुए प्रवीणता हासिल करने में लगे हुए हैं। माना कि हम और आप न सही ,किन्तु कुछ तथाकथित 'शांतिदूत' (??) उसे अपने जीवन का मुख्य अंग मान रहे हैं। 

   आए दिन टी वी ,समाचार पत्रों और सोशल (शोषक नहीं) मीडिया पर देख ,पढ़ और सुन रहे हैं कि कभी जम्मू -कश्मीर में ,कभी अलीगढ़, फ़िरोज़ाबाद, मुरादाबाद , हाथरस, पश्चिम बंगाल आदि में पाषाण प्रयोग कर कभी पुलिस ,कभी आम जनता ,कभी अपने पड़ौसियों ,कभी बाजारों में पत्थरों की टकराहट और तज्जन्य खून - खराबे के अनचाहे नज़ारे दिखाई दे ही जाते हैं।इस पाषाण प्रयोग के मामले में महिलाएँ भी पुरुषों से कम नहीं है। नई पीढ़ी तो उन सबकी उस्ताद बनकर ही प्रकट हो रही है।अभी कल ही की बात है कि एक शनिदेव मंदिर के बाहर प्रांगण में कुछ पुरुष ,लड़के ,लड़कियाँ और महिलाएं ज़बरन मस्ज़िद बनाने के लिए पत्थर बाजी के लिए तैयार खड़े हुए थे। यह घटना जिला बरेली की बहेड़ी तहसील के एक गाँव की है।

          अब पूरी तरह लगने लगा है कि अति सभ्यता की हदें भी टूटने लगी हैं।पाषाण प्रियता का ऐसा 'महोत्सव (?) यदा कदा नहीं ,आए दिन अखबारों की प्रमुख सुर्खियाँ होता है।वर्तमान कालीन आदमी ,जो अपने को इंसान भी कहता है;की रक्त पिपासा का बखान कहाँ तक किया जा सकता है? 

             यह भी कहा जाता है कि आदमी पहले पशु है, बाद में इंसान। यह बात भी आज सोलहों आने, चालीसों शेर, सही सिद्ध होती प्रतीत नहीं हो रही, सही सिद्ध हो चुकी है।आदमी की देह में कौन सा भेड़िया अँगड़ाई ले रहा है , कहा नहीं जा सकता।पहले शेर ,चीते, बघर्रे, भेड़िये से आदमी डरता था ,पर आज तो बैल की खाल ओढ़े हुए किस खाल में भेड़िया बैठा है, कहा नहीं जा सकता।आज गाँव, नगर ,कस्बा ,महानगर ही जंगल के पर्याय बन गए हैं। अब जंगल ढूँढने की कोई आवश्कता नहीं रह गई है। अब तो वह अपने मोहल्ले, पड़ौस में ही शिकार कर लेता है। उसके हाथ में पत्थर जैसा अचूक हथियार जो लग गया है।भले ही गोली का निशाना चूक जाए ,पर पत्थर का नहीं । पत्थर रखने या फ़ेंकने के लिए किसी लाइसेंस की भी आवश्यकता नहीं है। जितने चाहे इकट्ठे करो, घर की छतों पर ,घरों में ,दरवाजे पर, सड़क पर ;कोई पूछने वाला नहीं। कोई पुलिस आदि के छापे का डर नहीं।कोई साज सँभाल भी नहीं। एक बार खर्च हो जाए, तो फिर नए नहीं खरीदने। जैसे पहले वाले आ गए ,वैसे और भी आ जाएंगे ।उनकी कोई सुरक्षा भी नहीं करनी। वे भी न मिल सकें ,तो अपने जूते चप्पलों से भी काम लिया जा सकता है। 

             आज वही आदमी प्रागैतिहासिक काल से भी पीछे जाकर इतिहास को आन, बान और शान से पत्थर बाजी के हुनर में पारंगत हो गया है।जिसके किसी भी तरह कम होने की आशा नहीं है।एक कहावत कही सुनी जाती थी कि ' क्या तुम्हारे दिमाग़ में गोबर भरा हुआ है?' जो इतनी सी बात भी नहीं समझते! विचारणीय है कि गोबर भरे होने पर उसमें कुछ घुसने की संभावना शेष बची हुई रह सकती है! क्योंकि गोबर का सम्बंध पहले गाय से ही है , बाद में किसी और से होगा। हमारा देश गाय, गोदुग्ध, गोरस और अंत में गोबर प्रधान भी है। गोबर की महिमा पावनता लिए हुए है। जिससे घरों के फर्श और दीवारों की लिपाई -पुताई भी की जाती थी । जहाँ घर के आँगन कच्चे हैं ,वहाँ आज भी यह पावन परम्परा चली आ रही है।इसलिए यदि किसी के मष्तिष्क में गोबर भी भरा हुआ हो तो चलेगा ,किंतु जिस 'गौ-शत्रु' के दिमाग में पत्थर भरे हों ,तब तो उसमें कुछ भी घुस पाने की क्षमता ही कहाँ शेष रह पाती है? वहाँ भरे हुए तो पाषाण ही हैं न ! जो अंदर भरा है ,वही तो बाहर निकल कर आएगा। और वही बरसाएगा भी। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि देश ,दुनिया और समाज का कुछ हिस्सा अभी भी पाषाण युग में जी रहा है औऱ आगे भी अपनी पाषाण -वृत्ति को और भी पाषाण बनाने में लगा हुआ है। 

 🪴 शुभमस्तु ! 

 ११.१०.२०२१◆९.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

रविवार, 10 अक्तूबर 2021

सत नहीं,सुत प्रेय है ! 🦫 [ व्यंग्य ]


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✍️ व्यंग्यकार ©

🙊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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मैं  ऐसी कोई नई बात कहने  नहीं जा रहा हूँ।मैं मात्र वही कहना चाह  रहा हूँ ,जो अब तक  जमाने  में होता चला आ रहा है।यद्यपि यह कोई परंपरा नहीं है कि अपना सुत चाहे कितना बड़ा अपराधी, पापी,

भृष्ट ,हत्यारा, चोर,क्रूर,धूर्त या अज्ञानी हो ,फिर भी उसका पिता या माता उसे बुरा नहीं मानते।और न ही किसी औऱ की दृष्टि में मानने देते हैं।इसके लिए चाहे कितने ही बड़े सत्य (सत) की हत्या करनी पड़े ;वे सहर्ष करेंगे।इसके लिए चाहे कितने ही 

निरपराधों को शूली पर चढ़ाना पड़े,अवश्य चढ़वाएँगे

। पर अपने सुत के बुत पर भी आँच तो क्या !उसकी गर्म गर्म लपट भी नहीं आने देंगे।


अब आप कुछ हजारों वर्ष पहले के अतीत में उतर जाइए।द्वापर और त्रेता युग

की संधि वेला में महाभारत को ही सामने रख लीजिए।जन्मांध धृतराष्ट्र महाराज को

अपने सौ के सौ पुत्र अत्यंत 

प्रिय थे।अपने पिताश्री की

'काली' भावना की रक्षा के लिए पांडवों का अस्तित्व समाप्त करने के उद्देश्य से उन्होंने क्या कुछ नहीं किया?

जब किसी की संतति चाहे वह महाराजा की हो या आम आदमी की; ऐसी संतान किसे प्रिय नहीं होगी। प्रिय ही नहीं ,प्रेय भी।(वासना से प्रफुल्लित होती हो ,वही प्रेय है।)


एक बहुत पुरानी कहावत है:

'बाप पर पूत नस्ल पर घोड़ा,

बहुत नहीं तो थोड़ा - थोड़ा।'

इससे स्पष्ट है कि संतान में पिता के गुण बहुत ज़्यादा नहीं तो थोड़े -थोड़े तो आते ही हैं। यदि न आएँ तो पिता की असली संतान होने में भी खटका।इसलिए वे आ ही जाते हैं। आ ही जाने हैं। इसमें कोई छूट नहीं हैं। अन्यथा बाप को भी अपने औरस की औरसता पर से विश्वास हटने लगता है। पर इस बात का प्रचार भी तो नहीं कर सकता। यदि करे तो जग हँसाई होती है। करे भी तो क्या करे? तब उसे अपनी बनियान , कुर्ता या क़मीज़ के नीचे एक- दो बटन खोलकर झाँक लेना ही पड़ता है।एक बात और ; वह यह है कि अच्छाइयाँ भले अवतरित हों या न हों ; बुराइयाँ तो आना अनिवार्य है। ये काला रंग  (बुराई) ही ऐसा है ,जो सदा सफ़ेद   रंग (अच्छाई) को डॉमिनेट (हावी)करता है। अच्छाइयाँ

दब जाती हैं,और बुराइयाँ अपने रुतबे की बहार बिखेरने लगती हैं।


आज तक के प्रायः सभी बापों ने अपनी औलादों के काले कारनामों के ऊपर कालोंच की पुताई से सफ़ेद बनाने की असफल कोशिश की है।यह बात अलग है कि वे कितने सफल हुए।परन्तु सत्य तो राम का नाम अंकित कराए हुए ऐसा पाषाण है जो ऊपर तैर ही जाता है औऱ सुत का काला पत्थर डूब ही जाता है। सदा सुत से बड़ा सत ही होता रहा है , आज भी है औऱ भविष्य में भी रहेगा।


प्रेय के साथ श्रेय की चर्चा भी कर ली जाए। श्रेय वह है ,जिससे आत्मा प्रफुल्लित होती है। पर यहाँ आत्मा की चिंता करता ही कौन है भला!

सब अपनी वासना को खुश करने में जुटे हुए हैं। भले ही आत्मा की हत्या हो जाए(जो की नहीं जा सकती ; क्योंकि वह अजर ,अमर और अविनाशी है।) वासना को खुश करने का ही परिणाम है कि आदमी अपने सियासती

रसूखों का वास्ता देकर काले झूठ की रक्षा हेतु रात दिन एक कर देता है। चाहे इसके लिए उसे डॉक्टर ,वकील, पुलिस को उत्कोच- दान से संतुष्ट करना पड़े ! आज के युग में भय ,आतंक, ब्लैकमेलिंग जैसे अनेक कितने ही बड़े - बड़े 'अणु बमों' की खोज  हो चुकी है, जिससे बड़े -बड़े सत्यों के गले में पत्थर बाँध कर पतन के खारी समुद्र में डुबाया जा सकता है।इसका भी अपना एक इतिहास बन रहा है।जो

बिना लिखे हुए भी श्याम अक्षरों में अपना अमिट प्रभाव आगामी पीढ़ियों पर 

छोड़ता रहेगा।

  काव्य - शास्त्र के अनुसार 'सत' और 'सुत'  का मात्रा भार बराबर ही है। पर भौतिक दृष्टि से सुत की टाँग

में पासंग जो लटका हुआ है, जो 'सत' पर  भी भारी पड़ जाता है। जो 'सुत' के  'सुतत्व' की महिमा को बहुगुणित कर देता है।आज के इस कलयुग में 'सत' पर 'सुत' भारी है।किसी दूसरे महाभारत की तैयारी है। सत का सत्व निचोड़ा जा चुका है। बचे हुए भूसे को 

खाकर आदमी महामारियों से पिसा जा रहा है, और मजे की बात ये है कि आरोप  कहीं औऱ ढूँढा जा रहा है।'सत' की गति नहीं ,दुर्गति 

किसे नहीं दिख रही है। पर 'सत'  से पहले अपने 'सुत' के 

अस्त होते हुए 'असत' की रक्षा जो करनी है ! समय साक्षी है। पर आदमी तो 

सतभक्षी है।

🪴 शुभमस्तु !

०९.१०.२०२१◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।


शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

विरोध देशद्रोह नहीं है! 🐵 [ अतुकांतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🙉 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सबका सबसे 

विचारों का मेल ,

न आवश्यक है

न अनिवार्य है,

फिर क्यों तुम्हारी हर बात

हमें शिरोधार्य हो ?

मत समझो अपने को साध्य,

तुम मात्र एक 

मशीन का पुर्जा हो ,

उपयोग के लिए साधन हो।


मत बनो निरंकुश,

हटाओ अपने सब अंकुश,

सुचारु नियंत्रण ही करें,

तुम्हारी थोपी हुई 

बातों से कोई क्यों डरें।


मत भिन्नता हो सकती है

दो मित्रों में भी,

 पति के साथ

 एक छत के नीचे रह रही पत्नी से भी,

फिर क्यों करते हो आशा,

अपने विरोधियों से ,

वे तुम्हारी बातों का

समर्थन करेंगे ?

तुम्हारे अनुयायी बनेंगे?

वे विरोधी ही तो हैं,

पर देशद्रोही नहीं!

विरोध देशद्रोह नहीं होता।


अपने को सभी के ऊपर

थोपने की मानसिकता

निस्संदेह तानाशाही है,

और सुनो ,

जहाँ लोकतंत्र है

वह भी नष्ट हो जाता है,

जो अब बचा भी कहाँ  है !

अपने दायित्व से बचने का

तरीका भी खूब निकाला है,

देश के साथ -साथ 

अपना ज़मीर भी

बेच डाला है।


गए वे दिन जब 

होली खेली जाती थी,

दिवाली मनाई जाती थी,

अब न रंग हैं,

न उजाला है,

देश को बेचकर देश का

निकाला डाला

 खूब दिवाला है।


तुम्हारी अंधी जमात में 

क्या सभी देशभक्त हैं?

चमचे कभी

 देशभक्त नहीं होते,

वे सत्ता के लुढ़कते 

पारे के सँग हैं

बेपेंदे  के लुढ़कते लोटे ।


क्या कभी किसी के

दिल को टटोला है?

न दो वक्त की रोटी है,

न टूटा खटोला है! 

निरंकुशता, उद्दंडता,

बहरापन!

नहीं है तुम्हारे भीतर

कोई गहरापन ,

कोई नहीं है दूध का धुला,

दागों से भरा हुआ 

तुम्हारा गात,

कैसे हो सकता है

हमें या किसी को

आत्मसात।


शेर की खाल ओढ़े हुए

 तुम निकल पड़े हो,

विरोधियों का विनाश

करने को अड़े हो,

देश को बचाने की

चिंता में 'शुभम'

विचारक ,कवि, विश्लेषक

चिंता में गड़े हैं,

धर्म औऱ मज़हबी

आग में सुलग रहा है

मेरा देश!

और उधर ठगा जा रहा है

आम को चूसा जा रहा है,

 और कागों ने धर लिया है

अब हंसों का वेश।


🪴 शुभमस्तु !


०८.१०.२०२१◆२.४५ 

पतनम मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2021

जब है पास मेरे माँ! 🚩 [ अतुकांतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🚩 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जब पास मेरे माँ

भला भय है मुझे किसका!

खड़ा हो शेर भी माँ का,

नहीं वह क्रोध भर ताका,

नयन नत कर के

वह झाँका।


महिषासुर मद - मर्दिनी,

शुम्भ निशुम्भ - संहारिणी,

पाप-ताप तारिणी,

रोग - शोक निवारिणी,

शूल ,पिनाकधारिणी,

चण्डमुण्ड विनाशिनी,

सर्व शास्त्र -शस्त्रधारिणी,

सबका कल्याण कर माँ।


म्लेच्छ- क्लेश है महा,

नहीं जाता  है वह  सहा,

जगत सारा है दहा,

रक्त मानव का बहा,

रख ले मनुज की लाज माँ।


कुछ ही घड़ी का खेल है,

मानव-म्लेच्छ का क्या मेल है?

मनुज में है   अति दया,

वह क्रूरता में हिंस्र- सा,

खड्ग  तेरा है कहाँ, 

तू आ चली आ दुर्गमा।


तीक्ष्ण त्रिशूल चाहिए,

शांति जग में छा सके,

मानव अस्तित्व बचा सके,

पर्वतों से नीचे उतर माँ,

रक्षित हों सज्जन मनुज माँ,

कर दर्प का संहार माँ।


🪴 शुभमस्तु  !


०७.१०.२०२१◆३.३० पत नम मार्तण्डस्य।

बुधवार, 6 अक्तूबर 2021

वर्तमान जन - यथार्थ 🐠 [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

🐠 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                        -1-

भूला निज माँ-बाप को,मिले न उसको राह।

भाग्य  नहीं उसका  भला,रहे अधूरी  चाह।।

रहे  अधूरी  चाह,  कर्म   वह खोटे   करता।

दाने को मुहताज, भूख से व्याकुल  मरता।।

'शुभम' दुखों की सेज,हवा का बने बगूला।

पछताए दिन- रात,पिता- माता निज भूला।।


                        -2-

छोटा-सा  जीवन मिला,करता नहीं  विचार।

भेदभाव  में  लीन है,  उर  में  भरे   विकार।।

उर   में  भरे   विकार, अहं  में भारी   अंधा।

पहुँचा मरघट-धाम,पकड़ औरों का कंधा।।

'शुभम' न  जाती ऐंठ,फूलकर होता  मोटा।

बनता सबसे श्रेष्ठ,किसी से क्यों हो छोटा??


                        -3-

चमड़ी   गोरी  श्रेष्ठ है,  कहता स्वयं   महान।

जो काले वे निम्न हैं, सब मजदूर   किसान।।

सब  मजदूर   किसान,हमारे सेवक    सारे।

हम  उनके   सिरमौर,  चाँद सूरज हम तारे।।

'शुभम' चाटता रोज,पकाई उनकी   रबड़ी।

छुआछूत  की गंध, घिनाती काली  चमड़ी।।


                        -4-

जाती रहती जाति तब,जब लेता  है  खून।

तब मानव,मानव दिखे,नहीं भेड़ की ऊन।।

नहीं  भेड़  की  ऊन,वर्ण  चूल्हे  में   झोंके।

चढ़कर ऊँचे  मंच, जातिगत भाषण  भौंके।।

'शुभम'खून का रंग,लाल,धी तव  मदमाती।

जाति  वर्ण  का  रोग,हटा बीमारी    जाती।।


                        -5-

अपने  भारत  देश का ,गिरता नित्य सुधार।   

चिंता का कारण बना, सकता कौन उबार।।

सकता   कौन  उबार, जाति वाले    संबंधी।

पढ़े -लिखों की सोच,क्षुद्र मति धारी गन्धी।।

'शुभम' धुरंधर  भीम, दिखाते ऊँचे   सपने।

कवि कवयित्री मीत, जाति में खोजें अपने।।


🪴 शुभमस्तु !


०६.१०.२०२१◆४.३० पतनम मार्तण्डस्य।

सुरसरि-सी जनमेदिनी 🛕 [दोहा]


[जनमेदिनी,प्रतिदान,वाणी, आह्वान,परिणाम]

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✍️ शब्दकार ©

🛕 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सुरसरि-सी  जनमेदिनी,माँ दुर्गे  के  द्वार।

उमड़ी  जयकारे  लगे,माता  के  दरबार।।


देख सकल जनमेदिनी,उर में अति उल्लास

भक्त  करें मंगल 'शुभम',भरते पावन आस।।


कृष्ण  कहें  राधे सुनो,छोड़ो अपना  मान।

आलिंगन बस  एक दें,मत देना प्रतिदान।।


बिना किसी प्रतिदान के, बरसे बूँद न मेह।

वारिद  बोला  भूमि  से, मात्र चाहिए नेह।।


वाणी में  सुरभोग है ,वाणी विष का गेह।

वाणी  से  दुश्मन  बनें,वाणी से ही  नेह।।


बाण नहीं  संधान कर,बना न  वक्र कमान।

वाणी बोलें  तोलकर,हो सुगंध रस भान।।


आज अमा का है सुदिन ,करें पितर आह्वान

तर्पण अंतिम, वर्ष   का,है बुधवार विहान।।


बिना  किसी आह्वान के, देव न आते द्वार ।

सविनय जोड़ें कर युगल,लें निज उर में धार।


जैसा  बोए   बीज  तू, वैसा  हो परिणाम।

बोया  बीज  बबूल  का, उगें न मीठे  आम।।


करने का अधिकार है, मत माँगे परिणाम।

'शुभम'कर्मरत ही रहें, देखें सुबह न शाम।।


शुभ वाणी प्रतिदान से,

                      मिलता सत परिणाम।

भजती है जनमेदिनी,

                   कर आह्वान  सकाम।।


🪴 शुभमस्तु !


०६.१०.२०२१●११.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।


मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

हे मृगनैनी ! 🚤 [ मुक्तक ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🚤 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हे     मृगनैनी  !   बाले     तेरे;

नयन - तीर  हैं  पैने    कितने!

सरि के  भीतर  लक्ष्य साधतीं;

हम   हैं   हैरां   भारी   इतने!!

अपनी तरनि बिठाकर हमको;

पार लगा दो  'शुभम'  नदी  से, 

मत्स्य - बेध मत करो तीर से,

हमें बेध   डाला   है तुमने!१।


दृष्टि   हुई     एकाग्र   तुम्हारी;

जल के तल पर मादक बाला!

हिंसा करो   नहीं  मछली की;

घायल उर लख चल मधुशाला,

नाव न खो दे चल पथ अपना;

भटक न   जाओ  सोचा मैंने,

एक दृष्टि   जो इधर  घुमाओ;

बरस रही दृग से ही हाला।२।


तुम्हें  देख  हे  रमणी!  बाले!!

वन की   शोभा  लजा रही है,

चली अकेली वन-  प्रान्तर में;

नाव लिए प्रिय फ़िजा बही है,

लक्ष्य किसी मछली पर तेरा;

नहीं  डगमगाए   तव    नैया,

एक पंथ  दो   काज  तुम्हारे;

लगती करनी  हमें  सही  है।३।


पथिक  नहीं  हैं साथ तुम्हारे;

अपने सँग  में हमको   ले लो,

नाव  लिए  आखेट  कर रहीं;

आओ जल में सँग   में खेलो,

काम  नहीं  ये  तीर  चलाना;

हे मधुबाले !     हे रसरंगिनि!

आओ 'शुभम '   किनारे बैठें,

पंथ अकेली तुम क्यों झेलो?४।


रूप  तुम्हारा   देख मत्स्य भी;

हो  जाएँगी    मोहित    सारी,

तुम  बेधड़क   बेध   डालोगी;

कष्ट   रहेगा    हमको   भारी,

पकड़ो  चप्पू 'शुभम' हाथ में;

आओ  सरिता   पार करा दो,

देख प्रकृति भी रूप कामिनी,

वन के   पेड़  लताएँ   हारी।५।


🪴 शुभमस्तु  !


०५.१०.२०२१◆११.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

राधा कृष्ण 🦚 [ मुक्तक ]


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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कृष्ण   रट   रहे  राधा -राधा,

उधर कृष्ण को ध्यातीं  राधा,

बरसाने की शक्ति - स्वरूपा,

राधा कृष्ण कृष्ण की राधा।१।


राधा    बरसाने       से    आईं,

मनमोहन    के  उर   में   छाईं,

बिना  एक   दूजे   क्यों   रहते!

राधा कृष्ण  'शुभम'  सुखदाई।२।


राधा -   माधव     रास   रचाते,

निधिवन की निशि रस बरसाते,

नर्तित    संग      गोपियाँ  सारी,

राधा  कृष्ण    नृत्य    मदमाते।३।


वन    से   धेनु   चरा   कर   आते,

राधा कृष्ण      देख   सुख   पाते,

शरद   -   चंद्रिका    में    गलबाँहीं,

डाले    राधे      श्याम     सुहाते।४।


फ़ागुन    के   रँग   ब्रज   के न्यारे,

निधिवन        राधा कृष्ण    हमारे,

लीला   प्रकृति -   पुरुष की करते,

जीता    जग   श्रीकृष्ण  -  सहारे।५।


🪴 शुभमस्तु !


५.१०.२०२१◆९.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।


सोमवार, 4 अक्तूबर 2021

सजल 🌴

  

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समांत :आरों ।

पदांत  :    में।

मात्रा भार:22

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सुना   गया    है     बने  कान दीवारों  में।

सोच-समझ  कर बोल वचन तू  यारों में।।


शंकित - सा रहता  है उर  का हर कोना,

मिलती नहीं  शांति अब कुंज बहारों में।


धरती  पर  तो   खूब  प्रदूषण फैलाया,

दूषित करने  निकला मनुज सितारों में।


भले न हो उद्धार देश का तृण भर भी,

लगा हुआ तन, मन, धन सारा नारों में।


अपनी - अपनी  पीठ थपथपाते  नेता,

मन है   उनका   भरी  तिजोरी हारों में।


वहीं शेष ईमान न अवसर जिसे मिला,

होगा  कोई   मानव   एक हजारों    में।


'शुभम' चीरता धार  नदी  की विरला  ही,

मृतक  देह  तो नित ही बहतीं धारों   में।


🪴 शुभमस्तु !


०४.१९.२०२१◆११.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

पावन शब्द- शृंगार 🌾 [ दोहा ]

 

[सत्य,अहिंसा,धर्म,सदाचार ]

              

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सत्य-सत्य की रट लगी,सदा झूठ के साथ।

ऐसे  नर  को  देखकर, विधना ठोके  माथ।।


हुआ पलायन सत्य से,राजनीति के धाम।

पूर्व कहें पश्चिम चलें,सत पर लगा विराम।।


सत्य-पथी मानव वही,नर तन में वह देव।

अंश मात्र डिगता नहीं,करता मानव सेव।।


मनसा, वाचा, कर्मणा,नहीं करे आघात।

कहें अहिंसा हम उसे,दिन हो चाहे रात।।


बात अहिंसा की करे,गाली का तालाब।

हिंसा की  दुर्गंध  से, गंधित  है दरियाब।।


धारण हम जिसको करें,वही धर्म है मीत।

परहित  में नित रत रहें,निश्चय होगी जीत।।


आडंबर  से धर्म का,नहीं तनिक   संबंध।

चलता रेवड़ भेड़ का,पीछे बनकर  अंध।।


धर्म- धर्म चिल्ला रहे,  जोड़े पत्थर    ईंट।

कर्मकांड सब बाहरी, मन में कीचड़ छींट।।


सदाचार से  मनुज की,रहे मनुजता   शेष।

सबको जानें आप सम,बनें न अंधी    मेष।।


सदाचार छोड़ा जहाँ,मानव बनता  वन्य।

दुराचार में लीन जो,पशु ही एक  अनन्य।।


सदाचरण में निरत जो,करता जग सम्मान।

ढोंगी को सब जानते, कर में तीर-कमान।।


सत्य,अहिंसा,धर्म के,रखते सँग हथियार।

सदाचार ही सार था,बापू जी  का   प्यार।।


🪴 शुभमस्तु !


०४.१०.२०२१◆१०.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

रविवार, 3 अक्तूबर 2021

ग़ज़ल 🕯️

  

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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राजनीति  गरमाने   के   दिन।

सच को भी शरमाने के दिन।।


जाल   बिछाया   दाने   डाले,

चिड़ियों को भरमाने के दिन।


आसमान   पर   है    मँहगाई,

जनता  को गरमाने  के  दिन।


कर की  मार  सहन करनी है,

वादा किया घुमाने  के दिन।


गाल बज   रहे  धूम - धड़ाका,

अपनी सब  मनमाने  के दिन।


मतमंगे   आ   गए   गली   में,

खाने और   कमाने  के दिन।


चमचे 'शुभम'   लुभाने   आए,

अपने पाँव चुमाने    के  दिन।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०९.२०२१◆१.१५पतनम मार्तण्डस्य।

मदारी 🐒 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🐒 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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देखो   एक    मदारी   आया।

बंदर और  बंदरिया    लाया।।


डम-डम डमरू बजा रहा है।

बंदरी  को वह सजा रहा है।।

लाल घँघरिया  पहना लाया।

देखो  एक   मदारी  आया।।


बंदर    पहने   नेकर  नीली।

है कमीज उसकी जी पीली।।

सिर पर साफा हरा सुहाया।

देखो एक   मदारी   आया।।


नाच    दिखाएँगे  ये   बंदर।

अपनी बड़ी गली के अंदर।।

पैरों में  घुँघरू  अति भाया।

देखो  एक   मदारी  आया।।


दर्शक   चारों  ओर   खड़े हैं।

हम सब के सँग बड़े -बड़े हैं।।

बंदरी के  पीछे   कपि  धाया।

देखो   एक   मदारी  आया।।


नाच देखकर खुश हम भारी।

माँग रहा कुछ  दाम  मदारी।।

दस का नोट 'शुभम' से पाया।

देखो  एक    मदारी  आया।।


🪴 शुभमस्तु !


ये स्व घोषित देशभक्त 👑 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🙉 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अपनी-अपनी  पीठ पर,थपकी  देते रोज।

देशभक्त बनते स्वयं, मिले बिना ही खोज।।


कोरे   झूठे   आँकड़े, दिखलाते   अखबार।

सड़कें कागज़ पर बनी,खड़क रही है कार।।


पंचसितारा    सेज  पर,बीते जिनकी  रात।

देशभक्त   रंगीन   वे, करें धर्म की     बात।।


त्राहि - त्राहि  जनता  करे, मँहगाई की मार।

जातिवाद  से  वोट का,पड़ता है    गलहार।।


गाली गांधी को मिले, जन्मदिवस पर फूल।

मुख से भारत  भक्त हैं, उर में उगते   शूल।।


मतमंगों    को  चाहिए, हर मत  झाड़ूमार।

चुभें  भले  हर  देह में,तीखे विष  के खार।।


पिछड़े अनुसूचित नहीं,रखते कुछ अधिकार

हिंदू पिछड़ी जाति के,चुभते तन में खार।


हिंदू कह   फुसला रहे,पिछड़ा या  अस्पृश्य।

मत पाने  के बाद में, बदले पट  का   दृश्य।।


साठ साल में  कूदकर, चढ़े प्रगति -सोपान।

शून्य विगत  इतिहास था,करें हमारा  मान।।


हमनेअब तक जो किया,कर न सकेगा और।

हम ही तो अभिजात्य हैं,भारत के सिरमौर।।


अमरीका   में  बज   रहे, बड़े सुहाने    ढोल।

लगें  दूर   से  मधुर वे,  उनके प्यारे    बोल।।


पिछड़े   सब पिछड़े  रहें,यही मूल  मन-मंत्र।

कुचलें अगड़े सब उन्हें,सत्य यही जनतंत्र।।


जिस दिन फूटे फूट ये,जन का प्रबल गुबार।

'शुभम' मिटेगा देश ये, जातिवाद  से   हार।।


समझे   बैठे   मूढ़   जो, जाए तरनी    बूड़।

दाल  उपानह  में बँटे,रहें न सिर  के  कूड़।।


जाग गया  है देश ये,किया जाति   ने   हीन।

फिर मत कहना आदमी, धमकाता है चीन।।


🪴 शुभमस्तु !


०२.१०.२०२१◆ ८.०० पतनम मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2021

गिनती 🌸 [बाल कविता]


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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बहन  नई    कक्षा    में  आई।

सबको   गिनती  खूब रटाई।।


सूरज    चंदा      होते    'एक'।

काम करें हम मिल  कर नेक।।


'दो' का    दूना      होता   चार।

सुबह शाम   कर  लें   आहार ।।


ब्रह्मा,   कमलाकांत ,   महेश।

'तीन' देव  मिल   हरें कलेश।।


पूरब,पच्छिम, उत्तर , दक्खिन।

'चार'   दिशाओं   को लो गिन।।


'पाँच' मुखों    के हैं  शिव शंकर।

भूत, प्रेत      हैं   उनके  किंकर।।


'छह'   रस    के   होते  आहार।

मात्र 'सात'   हफ्ते      में  वार।।


'आठ'  पहर   या   कह लो याम।

करें  लगन    से   अपने   काम।।


पढ़े      पहाड़ा     'नौ'  का तोता।

जोड़ें   तो   सब    नौ    ही होता।।


'दस' तक   गिनती  हमको आई।

बंधु   'शुभम'   ने    हमें सिखाई।।


🪴 शुभमस्तु !


०१.१०.२०२१◆१२.४५

पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...