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शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

वह निश्छल महामना देवी! [संस्मरण]

 109/2025

     

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

यह बात सन 1982-83 की है। उस समय मैं रुहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली का परीक्षक होने के साथ -साथ उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद,  इलाहाबाद का परीक्षक भी नियुक्त हो गया था। बीसलपुर में माताजी स्व.श्रीमती श्यामादेवी जी के मकान में रहते हुए उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि पीलीभीत से रोज बस से आने- जाने की जरूरत नहीं है;वहीं पर उनकी सहेली श्रीमती रोहिणी देवी जी का मकान है ;वहीं पर रुक कर कॉपियाँ जाँचने का काम कर लेना। मैंने कहा ठीक है।

मई या जून का महीना था। तेज गर्मी का वातावरण था। पहले दिन मैं बहन जी रोहिणी देवी के यहाँ न रुककर बीसलपुर के ही एक अन्य अध्यापक के यहाँ रात्रि विश्राम के लिए चला गया। किंतु पहले ही दिन उस घर और परिवार का दूषित वातावरण देखा तो एक रात में ही मेरा मन भर गया।मुझे उनसे वितृष्णा हो गई। मुझे प्रतीत हुआ कि जैसे उन लोगों पर बोझ हूँ। आँखों देखी गई वास्तविक स्थिति का उल्लेख करना उचित नहीं समझते हुए उसे विलुप्त ही रखता हूँ। किंतु जो वातावरण उस परिवार के लोगों के बीच देखा ,वह मुझे सर्वथा नागवार गुजरा। जिस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती वही सब कुछ जब देखने को मिला तो उन सबसे मुझे घृणा हो गई और दूसरे दिन भोजन की बात तो दूर बिना नाश्ता किए हुए ही मैं अपने मूल्यांकन कार्य के लिए चला गया।

उसी दिन अपना काम निबटाने के बाद बहन जी रोहिणी देवी जी के घर का रुख किया। माताजी श्यामा देवी जी द्वारा बताए गए पते पर जा पहुँचा। उस समय शाम के लगभग 4-5 बजे का समय रहा होगा।घर तो मुझे मिल गया था ,किन्तु बहन जी रोहिणी देवी मुझे नहीं मिलीं। दूसरी मंजिल पर पहुँचा तो कुछ तसल्ली मिली। वहां पर उन्हीं की एक विवाहिता पुत्री ,जिसकी उम्र लगभग 24-25 वर्ष की रही होगी;मिली। उसने मुझे बताया कि अभी मम्मी तो आई नहीं हैं ,थोड़ी बहुत देर में आ जायेगीं। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया और आने का उद्देश्य भी स्पष्ट किया । उन्होंने  अपनी आत्मीयता से बहन जी के अभाव का कोई अहसास नहीं होने दिया। औपचारिक आवभगत के बाद उनकी पुत्री ने मुझे भोजन कराया और बाहर पोर्च में एक चारपाई पर बिस्तर लगा दिया ,ताकि मैं उस पर आराम कर सकूँ।

माता जी रोहिणी देवी  की बेटी ने मेरे बिस्तर के पास एक टेबिल फैन भी चला दिया ,ताकि मुझे गर्मी का अहसास न हो।थका हुआ होने के कारण थोड़ी ही देर में मुझे नींद आ गई और मैं सो गया। फिर मुझे नहीं पता कि माता जी कब आईं। उनसे भेंट सुबह ही हो सकी।पता नहीं कब पंखें की शीतल हवा में ठंडाते हुए महसूस करके उस देवी ने मुझे एक चादर  भी ओढ़ा दी। कुछ देर बाद मेरे ऊपर चादर देखकर मुझे आभास हुआ कि मैं कुछ ओढ़े हुए हूँ,तो इस अहसास से मैं अभिभूत हो उठा कि उस लड़की को मेरा कितना खयाल है कि उसने मेरी आवश्यकता महसूस की और चादर

ओढ़ाई। मैं उस बेचारी का कोई भी तो नहीं लगता  था, न पिता,न भाई,न पति न और कोई सगा सम्बन्धी ही।मानवता का ऐसा आदर्श और सुघर  निदर्शन मुझे पहले ऐसा कभी भी देखने को नहीं मिला। उस निश्छल उदार महामना नारी ने मेरे नन्हे- से हृदय के एक कोने में ऐसा स्थान बना लिया कि आज तक क्या, जीवन पर्यन्त भुला नहीं सकूँगा।  मैं उसके इस निश्चल और निश्छल स्नेह का आजीवन ऋणी रहूँगा। यद्यपि मुझे उसकी कोई छवि आज 40 वर्ष व्यतीत होने के बाद भी स्मृति में नहीं है,किंतु उसके उस पवित्र कर्म ने जो मुझे ऋणी बनाया है,वह चिर स्मरणीय है। माता रोहिणी देवी जी तो आज इस असार संसार में नहीं हैं, किन्तु उनकी वह महान बेटी मुझे कभी भुलाए नहीं भूलेगी। ईश्वर उसे स्वस्थ रहते हुए दीर्घायु करें,यही 

मेरी हार्दिक शुभ मनोकामना है। मैं उसका नाम नहीं जानता, रूप नहीं पहचानता ;किन्तु उसका काम जानता  हूँ,जिसके कारण वह मेरे पावन हृदय में विराजमान देवी है।

शुभमस्तु !

22.02.2025●12.15 प०मा०

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सोमवार, 25 नवंबर 2024

आज तक नहीं भूला वह दिन [संस्मरण]

 533/2024


  

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरू 

  जीवन के कुछ पल ,दिन और छोटी - छोटी घटनाएँ ऐसी भी होती हैं,जो कभी नहीं भूलतीं।बात उन दिनों की है ,जब वर्ष 1975 में मैंने एम०ए० उत्तीर्ण कर लिया था।1976 में मैंने पी-एच०डी० के लिए आगरा विश्वविद्यालय में पंजीकरण करा दिया था।तभी एक दिन साइकिल से आगरा जाते समय मेरा इंटरमीडिएट का सहपाठी हृदयेश कुमार गुप्ता मिला। उसने मुझसे कहा चल मैं तुझे अपनी कंपनी के मालिक से मिलवाता हूँ। शायद तुझे भी जॉब मिल जाये।उस समय मैं बेरोजगार तो था ही,इसलिए मन में एक उम्मीद लिए हुए मैं उसके साथ उस कंपनी के ऑफिस में चला गया। इतना तो अवश्य ही कहूँगा कि वह कंपनी (नाम का उल्लेख नहीं किया जाए तो उत्तम है) आगरा में मेरे घर से चार -पाँच किलोमीटर दूर टेढ़ी बगिया पर स्थित थी।

   कम्पनी के ऑफिस में जाने पर मेरा मित्र तो खड़ा रहा और मुझे बैठ जाने का संकेत किया।एक बड़ी सी मेज के सामने रिवोल्विंग चेयर पर एक तीस वर्षीय युवा व्यक्ति बैठा हुआ था। उसके संकेत पर मैं सामने पड़ी हुई एक कुर्सी पर बैठ गया और अपने दोनों हाथ मेज पर रख लिए। किन्तु यह क्या ? कि सामने बैठे हुए व्यक्ति ने मुझसे कहा ठीक से बैठिए अर्थात उसका इशारा मेरे द्वारा मेज पर हाथ रखना उसे ठीक नहीं लगा।तुरंत ही मैंने अपने हाथ नीचे किए और मेरा चेहरा एकदम फीका पड़ गया। मैं अपमान का कड़वा घूँट पीकर रह गया। मैंने बिना कोई देरी किए वहाँ से बाहर आना ही उचित समझा और मित्र से कहा - अच्छा हृदयेश मैं चलता हूँ। मुझे देर हो रही है।एक पल की भी देरी किए बिना मैंने उस व्यक्ति को यह भी मौका नहीं दिया कि वह मेरे आने का उद्देश्य भी पूछ पाता। वह दिन है कि आज का दिन है इस तरह के अहंकारी धनाढ्यों से एक वितृष्णा हो गई है। 

 शुभमस्तु ! 

23.11.2024●9.15प०मा० ●●●

शनिवार, 11 मई 2024

मेरा बचपन :मेरा सेवासन (संस्मरण )

 223/2024 


 

 ©लेखक

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 बचपन, बचपन होता है।किंतु बचपन के कार्य और रुचियाँ व्यक्ति के आगामी जीवन का दर्पण होते हैं।बड़े -बड़े चोर,डाकू,अपराधी ,धर्मनिष्ठ, समाजसेवी, नेता आदि सभी प्रकार और प्रवृत्तियों के लोगों में उनके भावी जीवन का बीजारोपण बचपन से ही हो जाता है।मैं यह भी नहीं कहता कि किसी महानता का बीजारोपण मेरे बचपन में हो गया था। हाँ,इतना अवश्य है कि मेरी प्रवृत्ति बचपन से ही परिवार,समाज और अपने आसपास व्याप्त किसी प्रकार की कमी को सही करने और उसका उपाय ढूँढने की ही रही।यही कारण है कि जैसे ही मैंने होश सँभाला और दो अक्षर पढ़ना सीखा ,वैसे ही मेरी लेखनी अपना काम करने लगी। 

 कविताएँ लिखना तो मुझे उसी समय से आ गया था ,जब मेरी उम्र मात्र ग्यारह साल की थी।उस समय मैं कक्षा चार का छात्र था।उस जमाने में बच्चे आजकल की तरह ढाई तीन साल के पढ़ने नहीं जाते थे। मैं जब पढ़ने बैठा उस समय मेरी उम्र सात वर्ष की रही होगी।इसलिए चौथी कक्षा में आते -आते ग्यारह साल का होना ही था।लेखनी अपनी यात्रा पर चल पड़ी थी। 

 मेरा गाँव आगरा से उत्तर दिशा में टेढ़ी बगिया से जलेसर मार्ग पर तीन किलोमीटर और रोड से गाँव 1500 मीटर की दूरी पर पूर्व दिशा में स्थित है। उस समय टेढ़ी बगिया से जलेसर को जाने वाली सड़क कच्ची हुआ करती थी।मेरा विचार यह था कि यह सड़क पक्की होनी चाहिए।1975 में मेरे द्वारा एम०ए०करने तक वह कच्ची ही रही।उससे पहले उस समय की बात है जब उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्य मन्त्री श्री हेमवती नंदन बहुगुणा हुआ करते थे।मुझे यह अच्छी तरह याद है कि उस सड़क को पक्का कराने के लिए एक प्रतिवेदन मेरे द्वारा उन्हें रजिस्टर्ड डाक से भेजा था। उस समय मैं किसी कक्षा का विद्यार्थी ही था। कार्बन लगाकर प्रतिवेदन तीन प्रतियों में लिखा गया और गाँव के लगभग सौ लोगों के हस्ताक्षर कराकर एक प्रति भेज दी।इसके साथ ही आगरा शहर ,यमुना नदी ,आगरा से जलेसर जाने वाली सड़क का नक्शा बनाकर भी भेजा। बाद में वह सड़क पक्की कर दी गई। मैं नहीं जानता कि यह सब कैसे हुआ। 

  1996 - 97 में मैं राजकीय महाविद्यालय आँवला (बरेली) में हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफ़ेसर था।तभी आगरा के समीप आँवलखेड़ा में नव स्थापित राजकीय महिला महाविद्यालय खुलने की सूचना मिली।तभी उत्तर प्रदेश सरकार में माननीय मंत्री श्री धर्मपाल सिंह जी के सत्प्रयासों से मैंने अपना स्थानांतरण इसी कालेज में करा लिया। वहाँ मुझे राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम अधिकारी का प्रभार भी प्राप्त हुआ। और उसका प्रथम दस दिवसीय विशेष शिविर अपने गाँव में ही लगा दिया तथा अपने ही निवास पर सभी शिविरार्थिनीयों के ठहरने, खाना बनाने ,खिलाने आदि की सभी व्यवस्थाएँ कर दी गईं। 

 पचास छात्राएं नित्य प्रति गाँव में आतीं और फावड़े तसले लेकर गाँव से सम्बद्ध पक्के मार्ग तक दगरे को कच्ची सड़क में बदलने का कार्य करतीं।सड़क बनाई गई और सड़क पर सड़क से गाँव की दूरी अनुमान से ही 1200 मीटर लिख दी गई।विशेष शिविर के समापन समारोह का संपादन तत्कालीन क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी आगरा डॉ.रामानंद प्रसाद जी के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। 

 उसी अवधि में कच्ची सड़क बन जाने के बाद मेरे मन में यह विचार कुलबुलाने लगा कि यह कच्ची सड़क यदि पक्की हो जाती तो कितना अच्छा होता। बस मैंने अपने प्रयास शुरू कर दिए और एक प्रार्थना पत्र बनाकर गांव की बी०डी०सी० के माध्यम से माननीय ग्राम्य विकास मंत्री श्री धर्मपाल सिंह जी को भेज दिया। कुछ ही महीने के बात थी कि पक्की सड़क निर्माण के लिए पी०डब्लू०डी० विभाग के पास आवश्यक धनराशि भेज दी गई और शीघ्र ही सड़क निर्माण का कार्य भी प्रारम्भ हो गया और मेरे द्वारा लगाए गए सूचना बोर्ड के अनुसार केवल 1200 मीटर सड़क का ही निर्माण किया गया। गांव से 300 मीटर पहले ही सड़क बनाना बन्द कर दिया गया। पूछने पर बताया गया कि 1200 मीटर के लिए ही अनुदान आया था। मैंने पुनः माननीय मंत्री जी को लिखा पढ़ी की तो गाँव के बाहर जंगल तक दो किलोमीटर तक पक्की सड़क बना दी गई ।इस प्रकार समाज और देश हित की भावना ने गाँव की उस सड़क को सम्बद्ध मार्ग से जोड़कर पूर्णता पाई।

  मेरे जीवन की यही कुछ छोटी - मोटी झलकियाँ हैं ,जो बड़े होने पर भी जीवन में एक सकारात्मक सोच बनकर देश व जनहित के लिए समर्पित रहीं। मुझ अकिंचन में आज भी वही जज्बा,जुनून और जोश कायम है,जिससे निस्वार्थ भाव से पूर्ण करते हुए जीना ही जीवन का लक्ष्य बन चुका है।काव्य और साहित्य लेखन भी मेरी इसी भावना को समर्पित कार्य हैं,जिसे आजीवन करने की यथाशक्य इच्छा पालकर अपने चिंतन को अग्रसर कर रहा हूँ। 

 भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः। 

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुःखभाक भवेत।।

 11.05.2024●11.45आ०मा० 

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रविवार, 26 नवंबर 2023

बच्चा भी नहीं हूँ,किन्तु...● [संस्मरण ]

 506/2023 


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● ©लेखक 

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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आयु में बड़ा होकर भी किसी को अपनी बाल्यावस्था और अतीत को भुला पाना सम्भव नहीं है।इसलिए मेरे बीते हुए सात दशक कल की सी बात लगते हैं।आठवें दशक की दहलीज पर दो सीढ़ियाँ चढ़ जाने पर बचपन के बीते हुए दिन और उसकी खट्टी -मीठी यादें भी आना और उनका चुभलाना भी कम आनन्ददायक नहीं लगता ।वयस बढ़ने पर कोई कुछ भी बन जाए किन्तु बचपन तो बचपन ही होता है। एक कोरा कागज ;जिस पर समय की लेखनी जो कुछ भी लिख डाले, लिख जाता है। लिख ही नहीं जाता , अमिट हो जाता है।ऐसे ही कुछ अमिट लिपि मेरे बाल्य पटल के पन्नों पर भी लिखी हुई है।जो कहीं- कहीं बहुत स्प्ष्ट है, तो कहीं-कहीं धुँधली भी पड़ चुकी है। अब इसमें कोई क्या करे ,समय को जो स्वीकार है ;वही तो रहेगा,बचेगा। 

   उस समय मेरी वयस यही कोई सात-आठ -नौ वर्ष की रही होगी।गाँव के अन्य बच्चों के साथ मैं भी उस समय के प्रचलित खेल खेलने में मग्न रहता था।गेंद बल्ला, गिल्ली डंडा,अपने विशाल गूलर के पेड़ पर हरियल डंडा,कंचा -गोली जैसे बहुत सारे खेल मेरे प्रिय खेल थे।क्वार के महीने में टेसू का खेल भी साथियों के साथ रुचि पूर्वक खेला करता था।सावन में लंबी कूद और ऊँची कूद कूदना कभी नहीं छोड़ा। कबड्डी तो ऐसा प्रिय खेल रहा कि कभी छोड़ा ही नहीं गया, विशेषतः वर्षा के बाद के शरदकाल या ग्रीष्म ऋतु में कबड्डी की धूम मची रहती थी।गाँव और खेतों को जोड़ने वाले वाले दगरों(चकरोडों) में ही कबड्डी और पैंता(लंबी कूद) के लिए सदा खुले रहते थे।रक्षाबंधन और जन्माष्टमी के अवसर पर इनके विशेष प्रतियोगी आयोजन भी होते थे।जिनमें गाँव तथा दूरस्थ गाँवों के खिलाड़ी और शौकीन लोग एकत्रित होकर उसे मेले जैसा रूप प्रदान करते थे।इनाम भी बाँटे जाते थे।

   बचपन की संगति कैसी है?यह अपने ऊपर निर्भर नहीं है। वह अच्छी भी हो सकती है और नहीं भी।इसे एक संयोग ही कहा जा सकता है।मेरे भी अपने यार- दोस्त थे। जिनके साथ -साथ रोज खेलते -कूदते ,लड़ते -झगड़ते ,फिर से एक हो लेते।और लड़ -भिड़कर जाते भी भला कहाँ!एक होना समय की माँग थी। या कहिए कि हमारी विवशता थी। और नए मित्र लाते भी कहाँ से ! इसलिए आज लड़ते तो सुबह फिर एक हो जाते। मानो कल कुछ हुआ ही न हो ! सब कुछ पूर्ववत। 

   कुछ अच्छी या बुरी आदतों का पदार्पण भी प्रायः बचपन में ही हो जाता है। क्योंकि बचपन ही तो हमारे भावी जीवन की कार्यशाला है।वे आदतें जीवन को प्रगति के शिखर पर भी पहुँचा सकती हैं और गहरे खड्ड में भी पतित कर सकती हैं। इसीलिए बचपन की संगति (सुसंगति अथवा कुसंगति) शेष जीवन की आधारशिला है। मेरे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ कि यदि उसी समय सचेत नहीं हुआ होता तो आज जो मेरी अवस्था है,स्वम्भवत: वह कुछ और ही विद्रूप में होती। 

  गाँव में मेरे पूज्य बाबा जी की एक बड़ी -सी कच्ची चौपाल थी। जिसकी दीवालें और फर्श कच्चे थे और छत में रेल पटरी के गर्डरों पर पत्थर की पटिया पड़ी हुई थी। लगभग तीस गुणा बीस फ़ीट के बड़े कक्ष के सामने एक बड़ा सा चबूतरा था। उसके एक कौने पर एक नीम का विशाल पेड़ भी था। चौपाल पर गाँव और परिवार के लोगों की बैठकबाजी होती रहती थी। हम बच्चे भी खेलते कूदते रहते।

   एक दिन की बात है कि कहीं से बीड़ी का एक बंडल हाथ पड़ गया और साथ में एक दियासलाई भी। फिर क्या था हम दो बच्चों ने एक बीड़ी निकाली और सुलगा ली और ज्यों ही एक सुट्टा मारा कि खाँसते -खाँसते वह दिन कि आज का दिन। वह तो अच्छा था कि हमारी इस हरकत को देखने वाला कोई बड़ा व्यक्ति वहाँ मौजूद नहीं था , वरना बहुत डाँट पड़ती।लेकिन सबक मिल चुका था।तब से अब तक बीड़ी देवी के दर्शन करते ही वह दिन याद आ जाता है और देव दर्शन हो जाते हैं। किसी दुर्व्यसन को पढ़ने का यह पहला पाठ था ,जो अंतिम पाठ भी सिद्ध हुआ। ये ही हम बच्चों के बनने -बिगड़ने के दिन थे;जब जिस ओर पेड़ की टहनी मुड़ जाती ,वैसी की वैसी ही बनकर कोई और ही रूप देती।तभी तो कहा जाता है कि बचपन जीवन की वह नींव है ,जिस पर भावी जीवन का विशाल भवन खड़ा होता है।आज मैं बच्चा तो नहीं हूँ, किन्तु बचपन की वे अनेक स्मृतियाँ भी मेरे यह जीर्ण - शीर्ण होते देह और शक्तिवन्त होते जीवन की सुदृढ़ आधारशिलाएँ हैं। 

 ● शुभमस्तु ! 

 26.1.12023●11.00 आरोहणम् मार्तण्डस्य। 

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रविवार, 19 नवंबर 2023

दीवाली के वे दिन ● [ संस्मरण ]

 493/2023


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●© लेखक 

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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यह सत्य है कि बीता हुआ समय कभी लौट कर नहीं आता।यह बात मुझे ही लगती है कि अतीत वर्तमान से अधिक मधुर और प्रिय होता है अथवा हर व्यक्ति के लिए इसका मानक कुछ और है? आज से  साठ - बासठ वर्ष पहले की दीवाली के रस - रंग कुछ और ही थे,जो आज कदापि नहीं हैं।वह समय था जब होली,दीवाली, दशहरा,गाय,मेरा विद्यालय आदि विषयों पर निबंध लिखवाए जाते थे।इन सबमें जो वास्तविकता और आदर्श विद्यमान था,आज मृत प्रायः हो चुका है।जीवन्तता जड़ हो गई है।

बात दीवाली की करें तो पता लगता है कि वह यथार्थ और विशुद्धता से परिपूर्ण प्रकाशोत्सव था।आज की तरह बनावटीपन और प्रदर्शनों की होड़ नहीं थी।दीवाली पर हृदयों के दीप जलते थे। बिजली की झालरों की झड़ी नहीं थी।सब कुछ शुद्ध  देशी और ग्रामत्व से परिपूर्ण। कोई होड़ नहीं, कृत्रिमता नहीं,प्रदर्शन भी नहीं।

साँझ होते ही घर ,दरवाजे, कोने, कुए ,नदी, छतें, मुड़गेरी  आदि माटी के दियों की दिप -दिप से दीपायमान हो उठते थे।मोमबत्तियाँ भी जलाई जाती थीं ,किन्तु कुम्हार के अवा में पके हुए लाल - लाल माटी के दीयों में जो  चमक थी ,वह बेचारी मोमबत्तियों  में कहाँ! उनकी बात ही निराली थी।फुलझड़ियाँ ,बम,पटाखे ,अनार, सुर्र -सुर्र करती फुलझड़ी ,रॉकेट,चक्र सब कुछ था ,किन्तु उस समय की कुछ  अलग ही धजा थी।अलग ही फ़िजा थी। सुबह जागने पर पता लगता था कि रात को पहने हुए कपड़ों में छलनी बन गई हैं।फिर तो अम्मा की डाँट भी खानी ही खानी जरूर थी। बताने की जरूरत नहीं, छिद्रित छलनी हुई कमीज और पाजामे खुद ब खुद बयाँ करने लगते थे कि देखो हमने भी पटाखे चलाए हैं ! और बेतहाशा चलाए हैं। 

दीवाली की रात गाँव की एक परंपरा भी सराहनीय है। मेरी माँ तथा गाँव की अन्य माताएँ- बहनें  एक दूसरे के दरवाजे पर दीपक जलाने जाती थीं।वे सरसों के तेल से भरे हुए दिये बाती तथा एक माचिस अपने सूप में सजाकर ले जातीं और घर- घर जाकर उनके दरवाजे दीप जला आतीं। यह 'आप सबको दीवाली शुभ हो' की सद्भावना का ही एक रूप था।शब्द नहीं ,क्रिया से शुभ दीवाली पर्व मनाने की  भावना का प्रतीक था यह कार्य।आज केवल खोखले शब्द रह गए हैं,क्रिया भाव विलुप्त हो गया है। 'शुभ दीवाली 'की जगह वह 'हैपी दीवाली' जो हो गई है। अब तो केवल अपने ही शुभ - लाभ की भावना है। 'हैप्पी' बोलकर एक औपचारिकता पूरी कर ली जाती है।मन में तो कुछ और ही अदृष्ट है! 

 हम बच्चों के लिए  दीवाली की रात बीतने के बाद की अगली सुबह भी उतनी ही रोमांचक और आनंददायिनी होती थी ,जितनी दीवाली की रात।जल्दी -जल्दी बिस्तर छोड़कर हम बच्चों का पहला काम होता था कि रात में जलाए गए दियों  और मोमबत्तियों को एकत्र करना तथा बिना चले पटाखों को खोजना और गोबरधन बाबा की पूजा की तैयारी करना। उनमें से अधिकांश दिये माँ के द्वारा  अरहर,उर्द ,मूँग आदि की दालों में बघार देने के काम आते थे। इसलिए वे माँ को सौंप दिए जाते थे। कुछ दिए हमारे खेल -खिलौने बन जाते थे। उनका सदुपयोग हम दियों की तराजू बनाने के लिए करते थे।संग्रह-  कार्य के उपरांत हमारा 'तराजू - निर्माण अभियान'  प्रारम्भ हो जाता। तकली या किसी पैनी वस्तु से दो दियों में समान दूरी पर तीन -तीन छिद्र किए जाते। उनमें तीन बराबर नाप के धागे लेकर किसी लकड़ी के दो छोरों पर बाँधकर और डंडी के बीचोंबीच एक पुछल्ला लगाकर  फ़टाफ़ट तराजू बना ली जाती और दूकान चालू।काम चालू।

दियों की तरह इकट्ठे किए गए मोम या अधजली मोमबत्तियों को पिघलाकर पुनः मोमबत्ती निर्माण की कार्यशाला प्रारम्भ हो जाती थी। लाल, पीले, हरे ,सफ़ेद आदि कई रंगों का मोम एक कटोरे में पिघलाकर एक नया ही रंग बन जाता और उसे पपीते के पत्ते के  डंठल के खोखले भाग में भरकर उसमें एक धागा डालकर नई मोमबत्तियाँ बना ली जातीं।मोम ठंडा होने पर डंठल को फाड़ दिया जाता और सीधी या कुछ वक्राकार मोमबत्ती तैयार।'हवन करते हाथ जले' कहावत के अनुसार इस 'हवन कार्यशाला' को संपादित करने में पिघला हुआ मोम  हमारे  हाथों को भी जला देता।  लेकिन इसकी  कोई भी सूचना माता -  पिता से गुप्त ही रखी जाती।लेकिन 'महान कार्य' करने में कुछ ज़ोखिम भी उठाना पड़े तो फ़िक्र ही क्या !  की भावना हम बच्चों को लेश मात्र भी आहत नहीं करती थी। जिन बच्चों को पपीते के डंठल नहीं मिल पाते वे अंडी के पत्तों के डंठलों से इस अभियान को साकार कर लेते। क्या ही आनंदप्रद अतीत था।जिसकी आज केवल यादें ही शेष हैं।

●शुभमस्तु !

19.11.2023◆1.00 प०मा०


रविवार, 27 अगस्त 2023

ले लल्ला दूध 'खा' ले● [ संस्मरण ]

 379/2023 

 

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● © लेखक 

 ● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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"ले लल्ला दूध खा ले" : मेरी माँ के ये शब्द कभी भुलाए भी नहीं भूलते।अपने सभी भाई - बहनों में सबसे बड़ी संतान होने के कारण मेरे अम्मा -पिताजी ,दादी - बाबा जी का परम स्नेह का पात्र ही नहीं एकमात्र पात्र मैं ही तो था। एक बड़े- से आँगन के साथ - साथ दक्षिण में एक दालान , उत्तर में दुकानी ,उसके पूर्व में एक बैठक/अतिथि कक्ष कम पुस्तकालय (जिसमें चाचाजी प्रोफ़ेसर डॉ. सी .एल .राजपूत की पुस्तकें दीवाल में बनी हुई दो काष्ठ कपाटित अलमारियों में सजी रहती थीं), उसके पीछे औऱ आँगन के पूर्व में नया घर, पश्चिम में मिट्टी की गोंदी से बना एक एक गज मोटी दीवारों वाला कच्चा भूसा - कक्ष, उसके सामने छप्पर आच्छादित एक बड़ा -सा बरामदा,दालान के बराबर एक छोटी-सी बिना खिड़की वाली कोठरी ; यही सब कुछ तो था हमारे गाँव के उस घर में। दुकानी में पीतल की कीलों से जड़ा हुआ लकड़ी के कपाटों से सुरक्षित मुख्य दरवाजा था।जिसके बाहर बड़े -बड़े नीम के दो पेड़ खड़े हुए थे। जिन पर सावन के महीने में हम झूला झूलते थे। 

 मैंने अपनी बात अपनी स्नेहिल माँ के कुछ शब्दों से प्रारम्भ की थी।वे शब्द नित्य रात को सोते समय सुनाई पड़ते औऱ मैं सोते हुए ही अर्द्ध निद्रावस्था में उठकर दूध 'खा 'लेता और पुनः उसी अवस्था में सो जाता। सवेरा होता और जागने के बाद लगभग रोज़ ही अम्मा से यह शिकायत करना नहीं भूलता कि अम्मा रात को मुझे दूध ही नहीं दिया। अम्मा हँसने लगती , मुस्करा कर कहती : दिया तो था। तू सो रहा था।सोते -सोते तू उठा ,दूध पिया और फिर सो गया था। सोते हुए दूध पिएगा तो याद भी कैसे रहेगा!बात भी सही थी।

 उस समय मेरी अवस्था भी कोई बहुत नहीं थी।यही कोई आठ वर्ष का रहा होऊंगा।सात वर्ष का होने के बाद तो जबर्दस्ती पढ़ने बैठ पाया। बचपन में पढ़ने -लिखने में मेरी कोई रुचि नहीं थी। 'स्कूल में खाने को लड्डू मिलते हैं।':इन शब्दों में लालच की जो सुगन्ध भरी हुई है ; ने मुझे मेरी अरुचि का वह काम जिसे पढ़ना -लिखना कहा जाता है , करा ही दिया। अंततः गाँव के साथी अन्य बच्चों की प्रेरणा ने मुझे दूसरे गाँव की प्राईमरी पाठशाला में पढ़ने के लिए भिजवा ही दिया। 

 अपने घर की उस 10'×12' फ़ीट की कोठरी में अपनी अम्मा और पिताजी के साथ सोया करता था। जब तक जागते रहते ,तब तक मिट्टी के तेल की एक कुप्पी (लैंप)से उजाला किया जाता। उसी कुप्पी के प्रकाश में रात को पढ़ाई करता। पढ़ाई भी क्या !यही गिनती ,पहाड़े ,कुछ शब्दों के अर्थ :बस यही कुल पढ़ाई थी। शब्दार्थ(मीनिंग)याद करते- करते ही मैं सो जाता। तभी तो अम्मा को मुझे दूध खा लेने के लिए जगाना पड़ता था। ऐसा शायद ही कोई दिन जाता होगा ,जिस दिन मैंने जागरण अवस्था में दूध पिया हो।मुझे दूध गुड़ घोलकर पीना अच्छा नहीं लगता था। किंतु पिताजी थे कि बिना गुड़ डाले दूध पीने ही नहीं देते थे। नहीं पीने या हठ करने पर मेरे गाल पर उनकी चपत पड़ना आम बात ही थी। थोड़ा -सा रोता औऱ थोड़ी देर में चुप होकर दूध 'खा' ही लेता। क्या करता? कहावत वही : जबरा मारे और रोने भी न दे।मेरे पिताजी के सामने मेरी यही हालत थी। जब वह जोर से चिल्लाते :"चुप"। तो चुप्प होने में ही खैरियत थी, वरना एक दो औऱ भी पड़ने का आशीर्वाद मिलना ही था।कहते -कहते भावुक हो उठा हूँ।स्मृतियां ही ऐसी हैं। दिल जो है , वह बेबस है!

 मैं कह रहा था कि मीनिंग याद करते -करते मैं सो जाता था। एक दिन जब सोने के बाद उठा तो मेरी अम्मा और पिताजी मुझे सुनाते -बताते हुए यह कहते हुए हँस रहे थे कि आज भगवत स्वरूप रात में सोते हुए मीनिंग याद कर रहा था।बार -बार यही रट लगाए हुए था ': "सिंधु माने समुद्र ! सिंधु माने समुद्र!! सिंधु माने समुद्र!!! " बात सही थी। मुझे ध्यान में आया कि रात को राष्ट्र गान ;पुस्तक के अंतिम पृष्ठ पर छपा हुआ होता था ,उसके मीनिंग भी याद कराए जाते थे।कॉपी में भी लिखे जाते थे। मेरी यह याद करने की सवाक़् स्थिति उन्होंने सुनी और सुबह मुझे बतलाई कि कहाँ तो पढ़ने भी नहीं जाना चाहता था और अब सोने में भी मीनिंग रटता है। उस दिन भी संभवतः रात को सोते समय तंद्रावस्था में ही दूध 'खा' कर ही सोया हूँगा। 

 मेरी अम्मा पढ़ने के लिए कभी विद्यालय नहीं गई। कितुं पिताजी ने उन्हें अपने दस्तखत करना अवश्य सिखा दिया था। कभी-कभी अख़बार बांचने का प्रयास भी करती थीं अम्मा। लिखते -लिखते मुझे एक विशेष बात यह भी याद आ रही है कि कभी- कभी हमारी कोठरी में जलती हुई मिट्टी के तेल की कुप्पी जलती हुई ही रह जाती थी।अम्मा और पिताजी भी उसे 'बढ़ाना' भूल जाते होंगे।इसलिए सुबह जागने पर मेरी नाक के दोनों छिद्रों में काला- काला कार्बन भरा हुआ पाया जाता था ;जिसे अपनी तर्जनी अँगुली की अथक मेहनत से दुरुस्त करना होता था। सुबह पूरी कोठरी काले गंधाते हुए धुँए से छत तक भरी हुई दिखाई देती थी।तब अम्मा अफ़सोस करते हुए कहती: 'हाय! आज ये जलती ही रह गई।काऊनें बंदई ना करी।' 

 ●शुभमस्तु ! 

 27.08.2023◆1.00प०मा०

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शुक्रवार, 10 मार्च 2023

उनका अविस्मरणीय व्यवहार!🌻 [ संस्मरण ]

 110/2023

 

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✍️लेखक ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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यह चर्चा वर्ष 1988 की है।उस समय मैं राजकीय महाविद्यालय जलेसर (एटा) में हिंदी विभाग में रीडर के पद पर कार्यरत था।देश में तीसरी नई शिक्षा नीति के अंतर्गत पुस्तकालय के लिए पुस्तकें क्रय की जानी थीं।तत्कालीन प्राचार्य डॉ. जगन्नाथ आर्य जी द्वारा यह कार्य मुझे सौंपा गया औऱ जलेसर से पचास किलो मीटर दूर आगरा शहर से इस कार्य को संपादित करने के लिए भेजा गया। मेरा गाँव भी आगरा के पास ही जलेसर मार्ग पर जलेसर से 37 किलोमीटर की दूरी पर स्थित  है। इसलिए मैं कार्य संपादन हेतु आगरा बस द्वारा जा पहुँचा।

आगरा में भगवान टाकीज से थोड़ा आगे एक बहुत बड़ा और देश -प्रसिद्ध प्रकाशन संस्थान है; सहित्य भवन।वह उस समय देश के लगभग सभी राज्यों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम के अनुसार पुस्तकें प्रकाशित करने औऱ उन्हें वितरित करने का कार्य करते थे;आज भी करते हैं।उस समय उस प्रकाशन संस्थान के स्वामी श्री आर.एस. बंसल जी थे।

सहित्य भवन पहुँचकर मैंने श्री बंसल जी से सम्पर्क किया।उन्होंने उस समय अपना पूरा संस्थान दिखलाया कि कहाँ- कहाँ क्या - क्या कार्य होता है।ऐसा लग रहा था कि पुस्तकों का सागर ही उमड़ रहा हो। जिधर जाएँ वहाँ पुस्तकें ही पुस्तकें।उन्होंने अपना वह कम्प्यूटर कक्ष भी दिखलाया ,जहाँ एक बड़े कक्ष में कई कम्प्यूटर सेट्स  पर कुछ लोग कार्यरत थे।

पुस्तकों के क्रय के सम्बंध में बातचीत करने के बाद जब मैं  घर जाने के लिए बाहर आने लगा तो उन्होंने पूछा कि आप कहाँ रहते हैं। मैंने उन्हें बताया कि यहीं से दस- बारह किलोमीटर की दूरी पर मेरा छोटा- सा गाँव है।आज वहीं रुकूँगा। कल कालेज जाऊँगा।मैंने उन्हें बताया कि किसी बस आदि से जाऊँगा।

इस पर वह बहुत प्रसन्न हुए और बोले:' चलिए मैं आपको घर पहुँचाकर आता हूँ।'और तुरंत उन्होंने न तो किसी चालक को आदेश किया और न किसी और को बुलवाया।स्वयं ही गाड़ी निकाली औऱ बोले :'बैठिए। आपके घर चलते हैं।'उनके इस आकस्मिक सद्व्यवहार से मैं अपने अंतर से अभिभूत हो गया और उनका इतना स्नेह पूर्ण व्यवहार देखकर कुछ भी कहते न बना।उस समय श्री बंसल जी की अवस्था लगभग सत्तर वर्ष रही होगी।

वे ड्राइवर सीट पर आसीन हो गए औऱ अपनी ही बराबर मुझे बैठा लिया।बोले:'आप मुझे रास्ता बताते चलिए ;मैं गाड़ी चलाता हूँ।' बहुत मुश्किल से अभी मात्र बीस -पच्चीस मिनट व्यतीत हुए होंगे कि हम लोग अपने गाँव अपने घर पर पहुँच चुके थे।

उस समय अपने बग़ीचे में पपीते के कुछ पेड़ों पर पीले- पीले पपीते पके हुए थे।उन्हीं को काटकर उनकी आवभगत की गई। उस समय गाँव में अतिथियों को चाय आदि  पिलाने का इतना अधिक प्रचलन भी नहीं था।इसलिए दूध ,गुड़ ,मट्ठा आदि  से ही स्वागत किया जाता था।श्री बंसल जी ने  प्रेम से पपीते  खाए ,जो मेरे पिताजी के द्वारा सेवर्पित किए गए थे।जब वे जाने लगे तो कुछ पके हुए फल उनकी गाड़ी में भी रखवा दिये।श्री बंसल जी का वह स्नेह पूर्ण व्यवहार मुझे कभी भी नहीं भूला।आज भी कभी -कभी उनके इस स्नेह का स्मरण हो आता है। बार- बार यही सोचता हूँ कि संसार में ऐसे भी निरभिमानी और  सादगी पूर्ण व्यवहार के धनी महापुरुष भी होते हैं,जो मेरे जैसे एक अकिंचन के उर- स्थल में सदा- सदा के लिए अपना सम्मानपूर्ण स्थान बनाकर अमर हो जाते हैं।ऐसे महापुरुषों को मैं हृदय से नमन करता हूँ।

🪴 शुभमस्तु !

10.03.2023◆7.30 आ.मा.


रविवार, 26 फ़रवरी 2023

हिंसक का हृदय- परिवर्तन 🪷 [ संस्मरण ]

 88/2023


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 ✍️ लेखक

 🪷भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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                       यह घटना अब से लगभग 38-39 वर्ष पहले की है।मैं हिंदी प्रवक्ता पद पर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय बीसलपुर(पीलीभीत)से स्थानांतरित होकर जिला एटा के एक राजकीय महाविद्यालय में कार्यभार ग्रहण कर चुका था।कार्यभार ग्रहण किए हुए एक दो वर्ष हुए होंगे कि जिस मकान में किराए पर रह रहा था,उसी मकान के दूसरे कमरे में रह रहे एक किराएदार से मेरी पत्नी के साथ बच्चों की किसी बात पर कुछ विवाद हो गया। तो वह किराएदार रंजिश मानने लगा।मेरे मन में उसके प्रति कोई दुर्भाव भी नहीं था। बात आई गई हो गई। 

            जुलाई का महीना था।ग्रीष्मावकाश के बाद कालेज खुल चुके थे।छात्र -छात्राओं के प्रवेश चल रहे थे।एक बड़े से शिक्षण कक्ष में प्रवेश साक्षात्कार हो रहे थे। प्रवेशार्थियों और उनके अभिभावकों से घिरा हुआ मैं साक्षात्कार में व्यस्त था। 

           किसी अभिभावक या विद्यार्थी को मैं नहीं जानता पहचानता था। एक 25-30 वर्ष का लड़का कक्ष के द्वार पर खड़ा हुआ बहुत देर से देख रहा था। उसके काले रंग की एक -डेढ़ इंच की दाढ़ी थी। पता नहीं किस रंग की टीशर्ट औऱ जींस पहने हुए था।देखने में उसका रँग -  रूप किसी गुंडे जैसा ही था। मुझे नहीं पता था कि वह कौन है औऱ किस उद्देश्य से वहाँ आया हुआ है।जैसे अन्य अभिभावक आ जा रहे थे ,वैसा ही मुझे वह भी लगा। बहुत देर तक खड़ा रहने के बाद वह मेरे पास आया औऱ ये कहकर मुझे कक्ष के बाहर बरामदे में ले गया कि कुछ जरूरी बात करनी है। मैंने समझा किसी के प्रवेश की सिफारिश की बात होगी। मैं उसके साथ बड़े ही सामान्य ढंग से बाहर चला गया ।

             मुझे इस बात का अनुमान भी नहीं था ,कि उसकी मंशा क्या है? वह कहने लगा :'अमुक व्यक्ति ने ,जो आपके बराबर वाले कमरे में किराए पर रहता है; उसने मुझे आपको मारने के लिए भेजा है।' उसकी बात सुनकर मैं चौंका औऱ पूछा कि ऐसा क्यों?'मुझे पिछली किराएदार से विवाद की बात का कोई ध्यान भी नहीं था।वह आगे बोला:'मैं बहुत देर से आपको देख रहा था।आप तो बहुत अच्छे आदमी हैं। सबका सहयोग कर रहे हैं। सबका काम कर रहे हैं। अब मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा। वही खराब इंसान है ,जिसने गलत काम के लिए मुझे आपके पास भेजा है।' 

            इसके बाद वह अपना परिचय देकर वापस चला गया। मुझे लगा कि मुझसे परिचय औऱ बातचीत से वह प्रभावित हुआ और उसका निर्णय बदल गया। उस हिंसक का हृदय परिवर्तन हो चुका था। वह आया तो था ;मेरी हिंसा करने , मुझसे मिलकर तथा मेरा आचरण और व्यवहार देखकर वह द्रवित हो चुका था। अब उसने मेरी हिंसा का विचार बदल लिया था और उलटे पाँव वापस हो गया था। 

 🪴 शुभमस्तु ! 

  25.02.2023◆11.00प.मा.

 

शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

स्वतंत्रता संग्राम सैनानी मेरे पितामह:स्व.श्री तोताराम राजपूत और तिरंगा 🇮🇳 [ संस्मरण ]

 321/2022 



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 ✍️ लेखक © 

 🇮🇳 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्

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  आगरा - जलेसर मार्ग से पूर्व दिशा में टेढ़ी बगिया से चार किलोमीटर दूर स्थित मेरे छोटे - से गाँव पुरालोधी के छःदेशभक्तों ने अपने परिवार और गृहस्थी से मुँह मोड़कर देशभक्ति की अलख जगाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।उन्होंने महात्मा गांधी जी के आह्वान पर अपनी किशोरावस्था से ही देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में आजीवन अपनी महती भूमिका का निर्वाह किया।ये छः देशभक्त सैनानी थे:1. स्व.श्री प.लालाराम शर्मा जी, 2.स्व.श्री लेखराज जी,3.स्व.श्री पीतम्बर सिंह जी,4.स्व.श्री गुलाब सिंह जी,5. स्व.श्री तुला राम जी और मेरे पूज्य पितामह (बाबा) 6. स्व.श्री तोताराम राजपूत जी। इन सभी ने अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध आंदोलनों में अपनी सक्रिय सहभागिता से अंग्रेज़ी प्रशासन के छक्के छुड़ा दिए थे। कभी टेलीफोन के तार काटना,कभी रेलवे की पटरियां उखाड़ना, कभी हाट बाजारों को लूटना आदि उनके दैनिक कार्यक्रम में सम्मिलित थे।

   मेरे बाबा मुझे समय -समय पर किये जाने वाले अपने कारनामों का हाल मुझे सुनाया करते थे। दादी श्रीमती जानकी देवी भी बहुत कुछ बताती - सुनाती थीं।एक बार की बात है कि मेरे बाबा तथा कुछ अन्य देशभक्त बरहन की हाट की लूट में शामिल हुए ,किन्तु पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं सकी तो पूरे गाँव की जनता पर सामूहिक जुर्माना लगा दिया गया। 

    1942 के आसपास की एक बार गाँव में घटित घटना की चर्चा करते हुए मेरी पूजनीया दादी ने बताया कि एक घुड़सवार अंग्रेज गाँव में देशभक्तों को गिरफ़्तार करने के लिए आया। सभी छः लोग गाँव से बाहर अन्यत्र भूमिगत थे ,इसलिए वह किसी को भी गिरफ्तार नहीं कर सका ।हाँ, वह स्वयं अवश्य गाँव की देश भक्त महिलाओं की गिरफ्त में आ गया। जैसे ही वह हमारी चौपाल पर पहुँचा मेरी दादी के नेतृत्व में स्त्रियों के एक समूह ने उसे पकड़ कर घोड़े से नीचे गिरा लिया औऱ उसे लहँगा ,चुनरी पहनाकर काजल बिंदी से सजा दिया।साथ ही एक दूध की हांडी लाकर उसके सिर पर हेलमेट भी लगा दिया औऱ उसके सामने ही नीम के पेड़ पर तिरंगा फहरा दिया । तब तो अंग्रेज को उलटे पैरों भागते ही बना।

   मेरे पूज्य बाबाबाजी को अंग्रजों के विरुद्ध विद्रोह के कारण 1932 और 1942 में जेल जाना पड़ा। 15 अगस्त 1947 को देश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई। आगरा में उस समय एक अंग्रेज जिला कलेक्टर थे,जिनका नाम था आई.एम.रैना.; जिनके हस्ताक्षर से एक हस्तलिखित पत्र पूज्य बाबाजी को प्रदान किया गया ।जो उन्हें देश की आजादी के बाद पच्चीस रुपये प्रति माह पेंशन दिए जाने संबंधी प्रमाण पत्र है। जो उन्हें श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल तक प्राप्त होती रही। जिसे श्रीमती इंदिरा गांधी ने बढ़ाकर आठ सौ पचास रुपये प्रति माह कर दिया था, जो अब तो उन लोगों को भी मिलने लगी थी ,जिन्हें 1947 के तुरंत बाद नहीं मिलती थी। मेरे गाँव में एक मात्र मेरे बाबाजी को ही उक्त पेंशन प्राप्त हुई थी।

   मेरे पूज्य बाबा जी ने आजीवन सूती कपड़े से बना हुआ धोती,कुर्ता,गमछा, टोपी, अन्य वस्त्र तथा जूते भी कपड़े से बने से हुए ही धारण किए।लहसुन प्याज खाना तो दूर किसी को इन वस्तुओं को ग्रहण करने वाले को न पास में बिठाते थे और नहीं किसी के पास बैठते ही थे।पूर्ण रूप से सात्विकता का आजीवन अनुपालन करने वाले मेरे पूज्य बाबा जी ने लगभग 90 वर्ष की आयु पूर्ण करके 1987 में इस नश्वर देह का त्याग करते हुए देश के स्वाधीनता संग्राम सैनानियों की पंक्ति में अपना नाम उज्ज्वल करते हुए स्वदेश के साथ - साथ मेरे परिवार के नाम को भी उज्ज्वलता प्रदान की। मेरी पूजनीया दादी 1978 में ही अपनी नश्वर देह का परित्याग करके परम पिता परमात्मा की शरण में चली गईं। अपने ऐसे महान पूज्य बाबाजी और पूजनीया दादी जी के ऊपर उनके इस प्रपौत्र को विशेष स्वाभिमान है। उनके असीम स्नेह का मैं सदैव ऋणी रहूँगा।

 🪴शुभमस्तु !

 १२.०८.२०२२◆१२.१५ पतनम मार्तण्डस्य। 

 

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...