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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

तिलचट्टों की भारी खटपट [ सजल ]

 246/2026



समांत          : अट

पदांत           :अपदांत

मात्रा भार     :16.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जंतर   मंतर   पर   है    खटपट।

तिलचट्टों   की   भारी  खटखट।।


कहते  तुम्हें    न  आता   शासन।

दौड़  रहे  सड़कों  पर  छट-छट।।


लक्ष्य     भूल    बैठे   वे    सारा।

नर्तित    मद    में   फैलाए लट।।


अभिनय  मजा मौज  मस्ती का।

भरे    जा    रहे    पापों का घट।।


छात्र      न्यून       बहुतेरे    गुंडे।

बस   हल्ले   की   लगी हुई रट।।


संसद    रोड   हो   गया   दूषित।

बने  हुए   कोरे    अभिनय-नट।।


बढ़ता है जब    दूषण   घर    में।

कॉकरोच  तब   जाते   हैं   डट।।


बिना  बहाए     स्वेद   देह    का।

जाते  हैं   तब  मुफ्तखोर    अट।।


'शुभम्' कहे क्या   हाल देश का।

खटमल मसक फिरें यमुना तट।।


शुभमस्तु,


27.07.2026◆6.45 आ०मा०

                    ◆●◆

सोमवार, 29 जून 2026

सबको खुले राम के द्वार [ सजल ]


217/2026

         

समांत          : आर

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार       :15.

मात्रा पतन     :शून्य

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संत-असंत       डकैत        लबार।

सबको   खुले    राम    के    द्वार।।


राम-नाम    की    हुई     न    लूट।

राम-दाम        लुटते       उपहार।।


जीजाजी-साले      का        जोड़।

सबकी   मिली- जुली     सरकार।।


चाचा    संग         भतीजा     एक।

लूट     रहा    मंदिर    में     प्यार।।


धाम अयोध्या     धन   का   स्रोत।

नहीं      पता     था    होगी   रार।।


बाँध       पोटली     गहना     नोट।

महल  बनाए       औध     उजार।।


अलग - अलग    हो     पानी- दूध।

कानूनी      पंजा          अनिवार।।


देख  पराए     धन      की     भेंट।

टपक     उठी     रसना   से  लार।।


'शुभम्'   कहानी     बनी   अनेक।

धर्म    किया    अघियों   ने   छार।।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆11.00प०मा०

                   ◆◆◆


शनिवार, 16 मई 2026

जननायक से यही अपेक्षा [ सजल ]

 158/2026


  

सामांत          : अता

पदांत            : हो

मात्राभार        : 16

मात्रा पतन      : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जन  - चरित्र    में     शुभ  दृढ़ता  हो।

मन    में    सबके       नैतिकता    हो।।


राष्ट्रभक्ति    कुछ    सरल   नहीं   है।

जन- जन के  प्रति शुभ समता हो।।


जननायक    से     सुखद   अपेक्षा।

बिना भेद    ही    तम      हरता हो।।


हरा-भरा       हो       देश      हमारा।

सघन  द्रुमों    के    साथ   लता हो।।


नर -नारी     सब    रहें     मेल   से।

सबको  निज     कर्तव्य    पता हो।।


सबका   हो    कल्याण   धरा   पर।

दुष्कर्मों     को    सदा    धता   हो।।


'शुभम्' समर्पण   रहे   देश     हित।

नहीं      पड़ोसी    भी   चुभता   हो।।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆6.30आ०मा०

                   ◆◆◆

सोमवार, 19 जनवरी 2026

सर-सर सरके शीत [ सजल ]

 035/2026


           035/2026


          

समांत          : ईत

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष-माघ में ऋतु  शिशिर,जीव जंतु भयभीत।

ठिठुरन बढ़ती  नित्य ही, समय  बड़ा विपरीत।।


दंत-पंक्ति  किट-किट  बजे,थर-थर काँपे देह ।

दिन में चैन  न  रात  को, सर- सर सरके शीत।।


कल्पवास  जो   कर  रहे,भरे  भक्ति  के भाव।

भजन   करें   गोता  लगा, मिला न कोई मीत।।


धर्म  भाव  यदि  हो नहीं,फिर लगता सब ढोंग।

पर  उपदेशी    लोग   ये,  सुना    रहे   हैं गीत।।


जो आता जिस  काज  से,करे  इतर  क्यों काम।

परधन   कोई  लूटता,   समझ  रहा  यह जीत।।


मस्तक   लगा  त्रिपुंड जो,भरें ओघ अघ नित्य।

नर-नारी   उनको   लगें,  बेशक   भूत पलीत।।


'शुभम्'  मनुज   पहचानना,अति दुष्कर है राज।

भीतर   से   कुछ  और  है,  बाहर   संत प्रतीत।।


शुभमस्तु !


19.01.2026◆1.30आ०मा०(रात्रि)

                    ◆◆◆

समांत          : ईत

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पौष-माघ में ऋतु  शिशिर,जीव जंतु भयभीत।

ठिठुरन बढ़ती  नित्य ही, समय  बड़ा विपरीत।।


दंत-पंक्ति  किट-किट  बजे,थर-थर काँपे देह ।

दिन में चैन  न  रात  को, सर- सर सरके शीत।।


कल्पवास  जो   कर  रहे,भरे  भक्ति  के भाव।

भजन   करें   गोता  लगा, मिला न कोई मीत।।


धर्म  भाव  यदि  हो नहीं,फिर लगता सब ढोंग।

पर  उपदेशी    लोग   ये,  सुना    रहे   हैं गीत।।


जो आता जिस  काज  से,करे  इतर  क्यों काम।

परधन   कोई  लूटता,   समझ  रहा  यह जीत।।


मस्तक   लगा  त्रिपुंड जो,भरें ओघ अघ नित्य।

नर-नारी   उनको   लगें,  बेशक   भूत पलीत।।


'शुभम्'  मनुज   पहचानना,अति दुष्कर है राज।

भीतर   से   कुछ  और  है,  बाहर   संत प्रतीत।।


शुभमस्तु !


19.01.2026◆1.30आ०मा०(रात्रि)

                    ◆◆◆

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

जाग उठे खगदल हमजोली [सजल ]

 790/2025



समांत          : ओली

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       : 16

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उषा     जगी     प्राची   में    भोली।

लगा   भाल  पर  अरुणिम   रोली।।


भानु   जगाया   उठो    चलो   अब।

जाग  उठे     खगदल    हमजोली।।


चह- चह  कर    खग   चहक   रहे  हैं।

सुना - सुना   कर   मधुरिम  बोली।।


गोला  लाल    उठा    जब    ऊपर।

लगा   खेलता      अंबर      होली।।


कुकड़ -  कुकड़   कूँ    करते   मुर्गे।

निकल  पड़ी  बतखों  की    टोली।।


उधर  गली  के उस   नुक्कड़   पर।

बालक  खेल    रहे     हैं      गोली।।


'शुभम्'  सुबह  का  दृश्य    मनोहर।

जग कर्ता  ने    निधियाँ      खोली।।


शुभमस्तु !


29.12.2025 ● 5.15 आ०मा०

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मंगलवार, 26 अगस्त 2025

श्याम आओ अवनी पर [ सजल ]

 469/2025


   


समांत         : अण

पदांत          : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दिखते  नहीं   शुभद    अब  लक्षण।

नैतिकता    का  लगा   हुआ  पण।।


हिंसक    हुए     देश    दुनिया  के।।

एक   नहीं   अनगिनती     रावण।।


धन  अर्जन  की     होड़    लगी   है।

नहीं    शेष    है   अब   आकर्षण।।


ट्रम्प     समझता      शहंशाह    मैं।

मैं   पहाड़    भारत है    लघु  तृण।।


कौन  बचाए     किसको    कितना।

परेशान  है    जग    का   जनगण।।


देखें     जिधर   उधर    ही  ज्वाला।

दहक  उठा है  मन  का कण-कण।।


'शुभम्'  श्याम  आओ  अवनी  पर।

आवश्यक है    कृष्ण  - अवतरण।।


शुभमस्तु !


25.08.2025●3.00आ०मा०

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सोमवार, 30 दिसंबर 2024

शीत की अद्भुत माया [ सजल ]

 590/2024

        

  समांत         :आते

पदांत            :अपदांत

मात्राभार        : 16.

मात्रा पतन      : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अगहन    पूस      माघ     ठिठुराते।

अग-जग   को   हैं    खूब   सताते।।


हेमंती       चल      रहीं      हवाएँ।

दुग्ध   -   दुशाला     हैं     ओढ़ाते।।


थर - थर   काँप   रहे  नर -   नारी।

ओले   शीतल  जल   घन    लाते।।


किट-किट   बजते    दाँत   हड्डियाँ।

सभी    चाहते     भोजन      ताते।।


ओस  लदी  पल्लव - पल्लव  पर।

खग मृग ढोर  काँप   सब   जाते।।


आलू     सरसों    चना    मटर के।

खेत     खड़े  मन     में     हर्षाते।।


'शुभम्' शीत  की   अद्भुत  माया।

गज़क    शकरकंदी   हम  खाते।।


शुभमस्तु !


30.12.2024●4.00आ०मा०

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बुधवार, 17 मई 2023

सदा कर्तव्य-पंथ चल● [सजल]

 206/2023

 

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●समांत : आस

●पदांत : अपदान्त

●मात्राभार :15.

●मात्रा पतन: शून्य।

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● शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सकल  राष्ट्र   में  भरें उजास।

नहीं   करें  इसका  उपहास।।


खाते-पीते  नित्य अन्न  -जल,

करते   भी  हैं   जिसमें वास।


ढोर   नहीं   बन  मानव  देह,

चरते    नहीं   घूर   पर घास।


कर विश्वास सपोलों का मत,

बने   पड़ौसी    रहते    पास।


गंगा यमुना  का  निर्मल जल,

पीकर  लेता    है    तू  श्वास।


संतति  उऋण नहीं   मातु से,

उसको भी कुछ सुत से आस।


'शुभम्'सदा कर्तव्य-पंथ चल,

मात्र नहीं   खोना   रँग- रास।


●शुभमस्तु !


15.05.2023◆6.15आ०मा०

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2022

आई है दीवाली देखो! [ सजल ]

 438/2022


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●समांत:  आली।

●पदांत:      देखो।

●मात्राभार : 16.

●मात्रा पतन:शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कार्तिक -निशा निराली देखो।

आई    है    दीवाली    देखो।।


तारे  हैं   अनगिन   अंबर   में,

भरी  खील की  थाली  देखो।


नर-नारी मन  मुदित  सभी हैं,

नाचें   बालक    ताली   देखो।


कोई   पड़ा   हुआ   नाले   में,

पीकर   सुरा   बवाली   देखो।


मौसम किंचित शीतल नम है,

झुकी  ओस  से  डाली  देखो।


गर्वोन्नत  कानों   पर    चढ़ती,

ब्रजांगना   की   बाली   देखो।


जीजाजी   से   लजा  रही  है,

भार्या - भगिनी  साली  देखो।


मैंने तो  कुछ  कहा  न  उनसे,

फिर  भी  देती   गाली  देखो।


'शुभम्' न चाहे झगड़ा करना,

सुनी  बात , पर  टाली  देखो।


🪴शुभमस्तु !


23.10 2022◆11.00 पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 19 सितंबर 2022

सुख देने में शांति है 📚 [ सजल ]

 371/2022

     

समांत: ओने ।

पदांत : में ।

मात्राभार :16.

मात्रा पतन : शून्य ।

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मत       समय      नष्ट    कर  सोने   में।

यह     अटल     सत्य     हर   कोने   में।।


बन    शूल      नहीं     चुभना जग     में,

रहना       प्रसून          ही     बोने     में।


सबको     मिलता       फल करनी   का,

परहित   जल    ले,     कर -  दोने    में।


है ,     हुआ       सदा      होगा   अच्छा,

मत    सोच      मनुज     कुछ होने   में।


ईश्वर     की     शक्ति    असीम   अकथ,

विश्वास      न      करना      टोने      में।


दुख      मानव     को   देना   न   कभी,

लग   जा       मणि - माला    पोने    में।


सुख    देने    में      ही    शांति   'शुभम्',

दूषण     को     तज       रह   धोने    में।


🪴शुभमस्तु !


१९ ०९.२०२२◆७.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 1 अगस्त 2022

नीर भर लाए जलवाह ⛈️ [सजल]

 308/2022

 

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समांत:आह।

पदांत:अपदान्त।

मात्राभार :16.

मात्रा पतन:शून्य।

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नीर  को  भर लाए  जलवाह।

खेत को  हैं धाए     हलवाह।।


नहीं  है  शेष  तपन  का नाम।

गगन  में  बगुले  छाए   वाह।।


मगन  हो नाच रहे खग - वृंद।

कीट जी भर-भर खाए चाह।।


खेत, वन, बाग, बरसते   मेघ।

नदी की कलकल भाए लाह।


छिपा झुरमुट में कोकिल एक।

कुहू की  ध्वनि में  गाये गाह।।


नहीं ढम- ढम बाजों का शोर।

हो  रहे  नहीं  न  आए ब्याह।।


'शुभम्' ऋतुरानी  वर्षा   नेक।

मिटाती   ताप  बिछाए दाह।।


लाह=चमक।

गाह=गाथा।


🪴शुभमस्तु!


०१.०८.२०२२◆०७.४५आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गहन हैं चरित मनुज के 🪦 [सजल]

 307/2022

 

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समांत:आह।

पदांत:मनुज को।

मात्राभार :16.

मात्रा पतन:शून्य।

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मिले  वाह  ही  वाह   मनुज को।

खुले  प्रगति  की  राह मनुज को।।


कभी    कुपथ   पर  चले  न कोई।

करते   गुरु   आगाह   मनुज को।।


कर्म - फलों    से  कौन   बचा है!

करे   बुरा   पथ   स्वाह  मनुज को।।


नहीं     सताना    तुम    गरीब को।

बद,  गरीब  की   आह  मनुज को।।


सबकी    करनी   साथ   उसी के।

नहीं   चाहिए     डाह    मनुज को।।


निज   श्रम    की  रोटी    सुख  देती।

पर - धन   की क्यों चाह मनुज  को।।


'शुभम्'     गहन    हैं     चरित तुम्हारे।

खोजे    मिले    न  थाह  मनुज  को।


🪴शुभमस्तु!


३१.०७.२०२२◆११.००पतनम मार्तण्डस्य।


रविवार, 31 जुलाई 2022

सावन की घनघोर घटाएँ 🌈 [ गीतिका ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सावन        की      घनघोर   घटाएँ।

रह - रह   कर  बहु      रोर  मचाएँ।।


तड़ -तड़,  तड़- तड़  तड़के बिजली,

धरती    के      हर      छोर   कँपाएँ।


यौवन     छाया     है     नदियों  पर,

हर - हर     धर - धर    शोर  उठाएँ।


पंख      भीगते     हैं     चिड़ियों   के,

स्वयं        भिगोने      मोर   न  जाएँ।


भीग    गया    तन- मन    भीतर   तक,

अंग   -  पीर        हर      पोर  जगाएँ।


साजन       नहीं     तिया   के  सँग   में,

विरहन         को       कमजोर   बनाएँ।


रात      अँधेरी      में     शापित      हैं,

चकवा   -    चकवी      भोर  मिलाएँ।


🪴 शुभमस्तु !


३१.०७.२०२२◆३.३० पतन म मार्तण्डस्य।

सोमवार, 25 जुलाई 2022

झर -झर पानी ⛈️ [ सजल ]

 288/2022

  

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समांत: अर।

पदांत :पानी।

मात्राभार:16.

मात्रा पतन :शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बरस  रहा  है झर - झर पानी।

बादल  लाते भर - भर पानी।।


ताल  - तलैया  भरे   लबालब,

खुशियाँ  देता घर - घर पानी।


मेघ  गरजते  चमके   बिजली,

गिरा  पनारे  धर  - धर  पानी।


स्वाति - बिंदु  की  टेक लगाए,

चातक पीता हर -  हर  पानी।


करे    दादुरी   का   आवाहन,

दादुर  करता  टर - टर  पानी।


धर कंधे  पर  कृषक  फावड़ा,

चला, न जाए  सर-सर पानी।


'शुभम्' सरसती  पावस रानी,

करे अवनि को तर -तर पानी।


🪴 शुभमस्तु !


२४.०७.२०२२◆ १०.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।


सोमवार, 18 जुलाई 2022

सावनी घन जब गरजते 🌈 [ सजल ]

 

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समांत: इयाँ।

पदांत-अपदान्त।

मात्रा भार:26.

मात्रा पतन:शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बूँद  बरसें   बादलों  से भीगती  हैं  छोरियाँ।

झूलतीं  अमराइयों   में  डाल झूला गोरियाँ।।


सावनी वारिद गरजते नाचते शिखि बाग में,

मुग्ध  होकर  देखती हैं नाच प्यारी मोरियाँ।


रोकती  हैं भीगने से जननियाँ अपनी  सुता,

भेद उनका खोलती हैं भीगती वे    चोलियाँ।


हैं लबालब सरित पोखर छत पनारे जोश में,

गूँजती हैं मेढकों की रात भर प्रिय बोलियाँ।


हरहराते  वेग   से  झरने  बहे जाते   कहाँ,

सिंधु धर के मौन सोया सुन रहा हो लोरियाँ।


कृषक कंधे पर रखे हल खेत अपने जा रहे,

भीग जाएँ वे नहीं सिर ओढ़ ली हैं बोरियाँ।


निर्वसन बालक नहाते दौड़कर बरसात  में,

नाचता है मन 'शुभम्'का तज नहाएँ पौरियाँ।


🪴शुभमस्तु !


१८.०७.२०२२◆६.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सोमवार, 11 जुलाई 2022

लगें सुहाने ढोल दूर के 🪘 [ सजल ]

 

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समांत:आस।

पदांत :का।

मात्रा भार:16.

मात्रा पतन :शून्य।

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✍️शब्दकार ©

🪘 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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छा  लेते   घर   मनुज   घास का।

वही  महल है  सुख -निवास का।।


हो  जाते  जब    बंद    सभी पथ,

उचित  वही  जो  दिखे आस का।


भरे   पेट       वालों      को   सूझे,

साधन      कोई    रंग - रास  का।


मरती   नहीं     एक    भी  माखी,

मिला   बहाना   उन्हें    हास का।


लगें    सुहाने      ढोल    दूर   के,

नहीं    सुहाता     ढोल  पास का।


देती    स्वाद       घास     की रोटी,

विपदा  में   सुख   मिले श्वास का।


'शुभम्'  देख   उसकी    वह चुपड़ी,

लालच  मत   कर  तू  विलास का।


🪴शुभमस्तु !


११.०७.२०२२◆१.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।[रात्रि]


रविवार, 3 जुलाई 2022

कर्मों का वरदान चाहिए 🪷 [ सजल ]

 

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समांत: आन।

पदांत: चाहिए।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हर      मानव        को     मान      चाहिए।

जगती         में           पहचान   चाहिए।।


कर्म      नहीं          करना      नर   चाहे,

फिर      भी      ऊँची      शान     चाहिए।


जीभ           उगलती         है  चिनगारी,

जलवाने   को                  छान  चाहिए।


आग       देख        घी     लेकर     दौड़ें,

अंधे           भक्त          महान    चाहिए।


शब्द        नहीं        निकले    वाणी   से,

सुन    लें     फिर      भी    कान   चाहिए।


पीटें             ढोल         प्रशंसक     सारे,

स्वर       की      ऊँची      तान    चाहिए।


'शुभम्'   न     कोई    अति विशेष     है,

कर्मों            का         वरदान    चाहिए।


🪴 शुभमस्तु!


०३.०७.२०२२◆१०.१५

पतनम मार्तण्डस्य।


सोमवार, 27 जून 2022

आचारवती नारी (सजल ) 🧕🏻

 

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समांत : आरी।

पदांत:  है।

मात्राभार: 16.

मात्रा पतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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दृढ़             आचारवती      नारी   है।

नर     से     सदा      रही   भारी    है।।


देती        सदाचरण      संतति     को,

नारी        हितकर     सुखकारी      है।


कहें    न   अबला    अब   नारी     को,

घर  -   घर     में     वह   अवतारी   है।


पूरक        जग    में       युगल परस्पर,

संतति      की      आभा    सारी       है।


एक      हाथ     से      बजे   न    ताली,

दो    करतल      की   ध्वनि  जारी     है।


मिलन       रात     का    दिन  से    होता,

मधुर        चंद्रिका      प्रतिहारी        है।


'शुभम्'    विनाशक  अहम सभी    का,

युगल         जीव      का    आचारी    है।


🪴 शुभमस्तु !


२७ जून२०२२◆६.३०

आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 20 जून 2022

तम के पास उजास 🪷 [ सजल ]


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समांत : आस ।

पदांत:  है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सुर       गण     को    शुभदा  सुवास    है।

आती       उनको      सदा     रास      है।।


तामस        ग्राही      असुर   सदा      से,

सुमनों        में        लगती   कुवास     है।


अस्ताचल        में        रविकर      पहुँचा,

हयदल         खाए      तमस    घास     है।


भले       न      भाए      तम    को   सूरज,

हर     तम        के      पीछे    उजास   है।


एक     ओर      शव     जलें  चिता    पर,

उधर         जन्म      लेता    विकास    है।


साथ      -    साथ     उद्भव - विनाश   भी,

प्रकृति         का        अद्भुत   प्रयास    है।


'शुभम्'       पुतिन   के    संग  देश    कुछ,

जेलेंस्की         की      आस,   पास       है।


🪴 शुभमस्तु ! 


१९जून २०२२ ◆१०.४५पतनम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 13 जून 2022

लात -देव यदि बात न माने 🪷 [ सजल ]


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समांत : इत ।

पदांत:  है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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शठ     से    शठता    सदा  उचित      है।

करनी     रिपु    से    नीति विहित     है।।


काँटे        से       ही      निकले      काँटा।

दुश्मन     होता      पल   में चित        है।।


चपत      पड़ी     है    तव   कपोल    पर।

मारो        अनगिन      इसमें  हित      है।।


घी      न       निकलता    सीधी    अँगुली।

टेढ़ी      करना       ही    समुचित       है।।


लात   -   देव     यदि     बात  न       मानें।

जड़     कर      लात      करें  चिह्नित  है।।


आस्तीन        में         साँप     छिपे    हैं।

करना       ही         उनको   कीलित     है।।


'शुभम्'        शत्रु      हैं आँख    दिखाते।

उसे       फोड़ना      नित    वंदित      है।।


🪴 शुभमस्तु !


१३ जून २०२२ ◆४.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...