बुधवार, 30 नवंबर 2022

धमकी 🎖️ [ दोहा ]

 503/2022

        

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✍️ शब्दकार©

🎖️ डॉ. भगवत स्वरूप। 'शुभम्'

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धमकी  से  डरते  नहीं, भारत के  प्रणवीर।

ले साहस की लेखनी,लिखते वे  तकदीर।।


कायर की पहचान है,धमकी धौंस बबाल।

लड़ते  हैं  वे  शत्रु से,गले न उनकी  दाल।।


एक  पड़ौसी  देश  का,बस धमकी  में लीन।

लिए  कटोरा  हाथ  में,चाहे धरती    छीन।।


धमकी  से  कश्मीर का,छीन न पाए   बाल।

पाक  दृष्टि  नापाक है,वीर हिंद  के   लाल।।


धमकी देकर राम  को,जीता क्या  दसशीश?

सेना वानर  वीर  की,ले  चढ़ लड़े  कपीश।।


शक्ति नहीं भुजबल नहीं,धमकी से कर बात।

करता है भयभीत अरि, प्रतिबल पर आघात


उन्हें कहाँ अवकाश है,साहस शक्ति  अपार।

धमकी  दें  वे  शत्रु को,करते मौन   प्रहार।।


व्यर्थ  बात करते नहीं,धमकी से  नित दूर।

होते  जो  रणबाँकुरे,  साहस से    भरपूर।।


अपनी  धरती  देश  से,हमें सदा  से प्यार।

धमकी से  डरते  नहीं,लाते शीश   उतार।।


धुँआ धौंस धमकी नहीं, हो प्रतिपक्षी वीर।

कायर से लड़ते नहीं,हम भारत के   धीर।।


'शुभम्'शक्ति अर्जित करें,साहस भरें अपार।

चढ़ दुश्मन के शीश पर,धमकी बिना प्रहार।।


🪴शुभमस्तु!


29.11.2022◆9.30 पतनम मार्तण्डस्य।

लौकिक ललक ललाम हो 🪷 [ दोहा ]

 504/2022

 

[ललाम,लावण्य,लौकिक, लतिका,ललक]

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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      🌱 सब में एक 🌱

अंगों  के  उद्यान  में, विकसे सुमन ललाम।

कंचन  वर्णी  कामिनी,क्या दें उनको नाम।।

आनन ओप उषांगिनी,तन कलधौत ललाम

रमणी  के  रँग में रँगा, दृग में दाहक काम।।


रची  विधाता  ने धरा,धरा मध्य  लावण्य।

नारी की कृति मृत्तिका,करती नर को धन्य।।

देख  रूप- लावण्य को,देव हुए  आकृष्ट।

ऋषियों के आसन हिले, नारी से तप भ्रष्ट।।


लौकिक सुख  की चाह में,भूला मानव पंत।

भक्ति न प्रभु की चाहता, आ जाता है अंत।।

नारी,संतति,धाम,धन,लौकिक सुख-आधार

मात्र भक्ति-पथ ईश का,सर्वोत्तम  उपचार।।


लतिका दोनों बाँह की,निज प्रीतम के डाल।

सुघर नवोढ़ा चूमती, प्रियता से  भर  गाल।।

नव लतिका के अंक में,बना  चिरैया नीड़।

दाना - पानी  ला रही, निकट झूमता  चीड़।।


गए  सजन  आए  नहीं,बीत गई  बरसात।

ललक लगी संयोग की, देनी प्रिय सौगात।।

ललक बिना आनंद का,क्यों होता विस्तार।

प्रेम-मिलन  संयोग  में, रहना सदा  उदार।।


    🌱 एक में सब 🌱

लौकिक ललक ललाम हो,

                        दिखता तब लावण्य।

लतिका के  लघु  कुंज में,

                         लगता स्वर्ग अनन्य।।


🪴 शुभमस्तु!

29.11.2022◆11.30

पतनम मार्तण्डस्य।


सोमवार, 28 नवंबर 2022

टालमटोली ⛳ [ चौपाई ]

 502/2022

    

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✍️ शब्दकार ©

⛳ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मीत           न         करना  टालमटोली।

नहीं       भरेगी       सुख     से    झोली।।

काम       समय      पर      ही  निबटाएँ।

सुखद      सफलता     का    सुख    पाएँ।।


टालमटोली              जो     करते         हैं।

 मुख        दिखलाने      में  डरते       हैं।।

वे    न       प्रगति  -  पथ पर चल      पाते।

औरों         को       लख     सदा   लजाते।।


चुरा    रहे    जो     श्रम     से     जी    को।

पछताते           अपनी      करनी       को।।

टालमटोली                 घातक       होती।

बनते        नहीं         सीप    में      मोती।।


तन   -  मन     से   जो   श्रम करता     है।

सुख      का      वह     सागर  भरता   है।।

टालमटोली              पथ      का    काँटा।

लगता           असफलता      का   चाँटा।।


साहस            श्रम     से     जीते   चोटी।

पर्वत         पर         पिपीलिका     छोटी।।

गिर  - उठ ,    गिर - उठ    ऊपर     जाती।

टालमटोली                    नहीं    दिखाती।।


टालमटोली                 सैनिक     करते।

नहीं      विजय  -  ध्वज   कभी   फहरते।।

जो       किसान       श्रम     से  कतराता।

पैदा      अन्न         नहीं       कर    पाता।।


छात्रों          ने             की    टालमटोली।

अंक           मिले       कंचे      की  गोली।।

मन      से        शिक्षक     नहीं     पढ़ाता।

जन     -    समाज      उसको लतियाता।।


'शुभम्'       भक्ति ,   सेवा , सत    शिक्षा।

मिलते            नहीं      माँग कर    भिक्षा।।

छोड़ें            जन    -    जन टालमटोली।

मने          सुखद         दीवाली     होली।।


🪴शुभमस्तु !


28.11.2022◆11.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


लेने में आनंद नहीं है☘️ [ गीतिका ]

 501/2022


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✍️शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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प्रभु    का   वास      सदा कण - कण  में।

रहते       हैं        जड़  - चेतन  तृण   में।।


हर       कर्ता       के      दृष्टा    हैं     प्रभु।

सभी      जानते      हैं      वे    क्षण    में।।


अंतर        में          झाँको     हे      प्राणी !

सब     कुछ     दिखता     उर - दर्पण   में।।


लेने          में        आनंद       नहीं       है।

मिलता     है      सब      कुछ  अर्पण    में।।


पूछें             तो       जाकर     पर्वत    से।

कितनी       तृप्ति     सलिल - प्रसवण में।।


सेवा   ,        भक्ति  -   भाव   पैदा     कर।

नीति     -     रीति       आए   जनगण   में।।


'शुभम्'        दिखा    मत पीठ   शत्रु   को।

सदा       विजय     हो    तेरी  रण      में।।


🪴शुभमस्तु !


28.11.2022◆7.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।


कण-कण में प्रभु- वास🪷 [ सजल ]

 500/2022

 

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●समांत : अण ।

●पदांत : में ।

●मात्राभार : 16.

●मात्रा पतन: शून्य।

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✍️शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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प्रभु    का   वास      सदा कण - कण  में।

रहते       हैं        जड़  - चेतन  तृण   में।।


हर       कर्ता       के      दृष्टा    हैं     प्रभु।

सभी      जानते      हैं      वे    क्षण    में।।


अंतर        में          झाँको     हे      प्राणी !

सब     कुछ     दिखता     उर - दर्पण   में।।


लेने          में        आनंद       नहीं       है।

मिलता     है      सब      कुछ  अर्पण    में।।


पूछें             तो       जाकर     पर्वत    से।

कितनी       तृप्ति     सलिल - प्रसवण में।।


सेवा   ,        भक्ति  -   भाव   पैदा     कर।

नीति     -     रीति       आए   जनगण   में।।


'शुभम्'        दिखा    मत पीठ   शत्रु   को।

सदा       विजय     हो    तेरी  रण      में।।


🪴शुभमस्तु !


28.11.2022◆7.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

रविवार, 27 नवंबर 2022

रहिला का साग [ नवगीत ]

 499/2022


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✍️ शब्दकार ©

🌿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मकई  की  रोटी  है,

रहिला  का  साग।


शरमाता   झाँके   रवि,

गाँवों  की  ओट,

ओस  लदी मोती - सी,

स्वेटर  नहीं कोट,

भैंसों   पर   कम्बल  हैं,

जागे  हैं   भाग।


बोरे    पर   बैठी   माँ,

कड़री  ली  काट,

सिकुड़ी- सी दादी जी,

बिछवाई    खाट,

ताप    रहे   अगियाना,

दादा  जी  आग।


रई    से   मथानी   में,

बिलो रही   छाछ,

मौन   धरे     ठाड़े   हैं,

अमुआ  के  गाछ,

सोई  है   आली  क्यों,

भोर   हुआ जाग।


फूस-सा है छल  रहा,

शीत  भरा  पूस,

सिमटी     तरु    गौरैया,

दुबके बिल मूस,

बोल   रहा    मुँडेर   पे,

काँव  -  काँव काग।

रहिला = चना 

🪴 शुभमस्तु!


27.11.2022◆7.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

आँगन में धूप [ नवगीत ]

 498/2022


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✍️ शब्दकार ©

🌅 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मुँडेर से झाँक रही,

आँगन में धूप।


पूस का महीना है,

ठिठुराया शीत,

सूरज दा'  हारे हैं,

कुहरे की जीत,

कंबल  में  लेटे हैं,

गाँवों के कूप।


उछल रही खरहे की,

झबरी - सी पूँछ,

तनी लाल  नथुने  पे,

गोरी द्वय  मूँछ,

बैठे हैं  शावक  दो,

उछले बिन चूप।


आलू की  फसलों पर,

चादर है सेत,

कदमों  की   ठंडी  है,

मटमैली रेत,

खिली है अपराजिता,

सुंदर स्वरूप।


गेहूँ  जौ   चकिया  से,

करते  कुछ बात,

अभी तो नव सुबह थी,

आई झट रात,

सोते  हैं  सूरज  दा',

ओढ़े हैं सूप।


🪴 शुभमस्तु!


26.11.2022◆8.45 

पतनम मार्तण्डस्य।

शनिवार, 26 नवंबर 2022

ध्वन्यता में धन्यता 🔔 [ व्यंग्य ]

 497/2022

 

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✍️ व्यंग्यकार ©

🔊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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          साधु,संतों और विरक्तों की बात को छोड़ दें तो हम सभी आम और खास जनों को शांति पसंद नहीं है।साधु- सन्तों को यदि शांति पसंद नहीं होती तो वे भला घर छोड़कर, परिवार से नाता तोड़कर और परमात्मा से आत्मा को जोड़कर समाज के पास रहकर भी दूर क्यों जाते ?  जंगलों, पर्वतों औऱ एकांत में जाकर शांति की तलाश क्यों करते? वह तो केवल हम और आप ही हैं ,जिन्हें शांति से परहेज़ है।हम सभी आम और खास को शोर - शराबा, धमा -चौकड़ी, धूम -धड़ाका,बच्चों और नर नारियों की चिल्ल - पों , हों- हों, झों - झों, टेंटें , मैं -मैं थोड़ा नहीं ; बहुत ज्यादा ही पसंद है। इतनी अधिक पसंद है कि हमारा कोई भी पर्व, त्यौहार, शादी - विवाह,बरात,  बिना बैंड - बाजों, कानफोड़ू डीजे वादन,अतिशबाजी, पटाखों,गाजे - बाजे आदि के बिना हो ही नहीं सकता।सर्वथा असंभव ही है।

       हमारे आदर्श मात्र दूसरों में अपना रॉब दिखाने औऱ प्रदर्शन भर के लिए हैं। उनका प्रयोगात्मक रूप हमें कदापि स्वीकार्य नहीं है। हाथी के दाँत खाने के और ,औऱ दिखाने के और।हमें दिखाए जाने वाले दाँतों पर अधिक आस्था है।यही कारण है कि शांति के स्थान कहे जाने वाले हमारे तीर्थ स्थल ,मंदिर,चर्च, मस्जिद आदि भी ध्वनि विस्तारक यंत्रों से मुक्त नहीं हैं। ध्वनि - प्रदूषण के गीत गानों के बिना दूल्हा- दुल्हन की  सात भँवरियाँ भी नहीं पड़ सकतीं।डीजे तो मुहूर्त से भी ज्यादा अनिवार्य रस्म के रूप में उभरा है। रात भर आतिशबाजी, रात भर नहीं तो बारात चढ़ाए जाते समय बम,पटाखे, धूल धड़ाका भला कौन रोक पाया है? प्रदूषण की ऐसी- तैसी ,अरे शादी  -विवाह की खुशी ज्यादा जरूरी है या प्रदूषण को देखें? होता है तो होता रहे! जब दीवाली पर नहीं रुके तो अब क्यों रुकें? वे चलेंगे और चल के रहेंगे! क्या शादी विवाह भी कोई रोज- रोज होते हैं भला? अब चाहे पर्यावरण प्रदूषित हो या किसी के कान फूटें,हमें क्या! हम तो वही करेंगे जो हमें अच्छा लगेगा। देश दुनिया को देखें या अपने बाल- बच्चों की खुशी को पलीता लगा दें?  दो लोग एक फुट की दूरी से बात भी न कर सकें ऐसा शोर होना निहायत जरूरी है।हजारों लाखों रुपये में जो आग लगाई है ,क्या इसीलिए  लगाई है कि चहल -पहल न हो ?

       आम और खास आदमी को श्मशानी शांति से विशेष प्यार है।कभी- कभी तो बुजुर्गों की आत्मा को परमात्मा के पास भेजने के लिए बैंड बाजों की  नसैनी लगाई जाती है। श्मशान में भी वह शांत कहाँ रहने वाले हैं? वहाँ भी अन्य विषयक वार्ता के साथ खैनी, चुनही,  कपूरी, मैनपुरी अनिवार्य है।

       शोर  - शराबा और हो हुल्लड़ से हमारे स्तर  का मूल्यांकन होता है। जितना अधिक शांति विहीनता उतना ही उनका स्तर भी बड़ा मूल्यांकित किया जाता है।कोई किसी से कमतर नहीं दिखाना चाहता ,इसलिए ये सब भी अनिवार्य हो ही जाता है।भले ही कर्ज लेकर कंगाल हो जाए ,लेकिन किसी से कम हुल्लड़ न हो। हुल्लड़ बाजी मानवीय सभ्यता का अनिवार्य अंग है।वह हर खास-ओ-आम  की आंतरिक अशांति को दबाने के लिए प्रयुक्त की जानी वाली अस्थाई जुगाड़ है।

            जुगाड़ के नाम से एक बात यह भी निकल कर आती है कि हम भारतीय जुगाड़बाजी के लिए प्रख्यात हैं। जहाँ सही विधि विधान भी असफ़ल हो जाएं ,वहाँ जुगाड़ ही कारगर सिद्ध होती है।यहाँ पर कुछ लोग तो केवल जुगाड़बाजी की ही रोटी खाते हैं।अब वह जुगाड़ भौतिक भी हो सकती है और अभौतिक भी। जैसे कोर्ट कचहरी में अनेक कार्य केवल जुगाड़ के बलबूते पर सिद्ध कर लिए जाते हैं ,औऱ थोड़े  नहीं ; बहुत अच्छी तरह से निबटा लिए भी जाते हैं।जुगाड़बाजी के लिए कोई डिग्री लेना या मानद उपाधि प्राप्त करना भी आवश्यक नहीं है। बस जुगाड़- अक्ल होना जरूरी है। जो किसी में और कहीं भी पाई जा सकती है ;जंगल में स्वतः उगे हुए जिमीकंद की तरह।

              आदमी बाजा ,ढोल, नगाड़ा,हारमोनियम आदि की तरह गाल बजाकर भी क्या- क्या  नहीं कर लेता? कवियों को जैसे श्रोताओं की तालियों से प्यार है , वैसे ही तृतीय लिंगियों को भी अपनी ताली से दुलार है। मतलब बस ध्वनि होने से है। मैंने पहले ही कहा है कि चाहे आम हो या ख़ास हो , जोर -  जोर की ध्वनि सबको पसंद है। इसलिए प्रकृति ने भी आदमी की भावना को समझकर आगे -पीछे और ऊपर- नीचे से ध्वनि प्रसारण की सुविधा प्रदान कर दी है। बोलना, गाना, रोना, (कभी- कभी हँसना भी) , चिल्लाना, चीखना, पुकारना  : सबमें एक विशेष लय भर दी है;जो उसके जैविक कार्य का अनिवार्य अंग बन गई है। ध्वनि की कोई न कोई गतिविधि होती रहने में ही उसे संतोष है।इसीलिए उसके सुख और कभी- कभी दुःख के कार्यों में ध्वन्यता में ही उसकी समग्र धन्यता है।अन्यथा उसे लगता है कि वह नागरिक नहीं , सर्वाधिक वन्यता है। वह कोई विरक्त संत थोड़े है कि मौन रहकर कानों को बंद करके प्राणायाम योग में तल्लीन हो जाए! मानव को 'शांतिप्रिय' के ख़िताब से संम्मानित किया जाता है। परंतु वह भीतर से नितांत विपरीत ही है। बिना आवाज किए जिसकी दुल्हन भी विदा नहीं होती।(नई सभ्यता में  चुप- चुप विदा होने लगी है। अब मानक जो बदल  गए हैं।खुशी में रुदन कैसा ? औऱ क्यों? जब विवाह ड्रामा नहीं ,तो रुदन क्यों ड्रामा बने?)वरना उसके बिना आदमी को आनंद नहीं आता। यहाँ शांति के लिए थोड़े नआए हैं? शांति तो वहीं मिलती है ,जहाँ से यहाँ भेजा गया है। इसलिए वहीं जाकर लेने में ही भलाई है, यहाँ तो बस जो करना है ,कर लें। झूठे ही प्रसन्न भी हो लें।तभी तो आत्मा के परमात्मा में मिल जाने पर नीचे वाले शांति की कामना करते हैं: 'ॐ शांति' कहते हैं।

🪴शुभमस्तु!

26.11.2022◆5.00 पतनम मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 24 नवंबर 2022

नारी क्या केवल 'श्रद्धा' है ? [अतुकान्तिका ]

 496/2022


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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नारी अब तुम

केवल 'श्रद्धा' नहीं हो!

क्योंकि अब 'श्रद्धा' 

श्रद्धांजलि की पात्रा है,

उसकी बची-खुची

जो मात्रा है;

वह दुनिया के तंत्र की

रवयात्रा है।


ये समाज!

यौवन का विलास!

वासना का खेल!

चरित्र का नया झोल!

सभी उत्तरदाई हैं,

गली- गली में फिर रहे,

दुःशासन आतताई हैं,

जिन्होंने द्रौपदियों की

बाँट दी मिठाई है,

अखबारों ,पत्रकारों,

टीवी,सोशल मीडिया ने

आग ही लगाई है।


दूसरे की लुगाई

जग - भौजाई बनाई,

समाज ही करता रहा

नारी की जग- हँसाई,

कभी चटपटी

कभी मिठाई - सी सजाई,

ठिठुरती शीत में

गरमाहट देती रजाई,

कभी पैर की जूती 

बना पहनी पहनाई,

बच्चे बनाने की मशीन

कह बुलाई,

वाह रे!

 हिंदू! मुस्लिम!! ईसाई!!!


हर ओर से

नारी पर ही प्रहार,

पुरुष की वासना की

अंधी शिकार,

हे पुरुष तुझे धिक्कार,

कभी बना दिया

गया जीवंत उपहार,

तो कभी टुकड़े- टुकड़े कर

दिया मार,

थैले और  फ्रिज़ में बंद

चला हथियार।


श्रद्धा, समर्पण और त्याग

सब बेमानी हो गए हैं,

मानवता के उसूल 'शुभम्'

कहीं खो गए हैं,

'अपना उल्लू सीधा कर'

यही मानक हो गए हैं,

मनु औऱ श्रद्धा 

कहीं जा सो गए हैं।


🪴शुभमस्तु!


24.11.2022◆4.15

पतनम मार्तण्डस्य।

उपहार [ सोरठा ]

 495/2022

         

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✍️ शब्दकार ©

🦋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जीवन है उपहार, जाने नर यदि  मोल   तो।

शुभ ही शुभ हर बार,त्याग और उपकार से।


बन जाता उपहार,संयम मानव   के  लिए।

बंद  प्रगति  के  द्वार, ढोर  नहीं  बनना हमें।।


खिलता उर का  फूल, देने से उपहार को।

बोना  नहीं  बबूल, त्याग भरा आनंद  है।।


बनता जीवन धन्य,परिणय के उपहार से।

तुझे  बनाए  वन्य,वरना जीवन  ढोर - सा।।


मिला हमें  उपहार,दीवाली पर  ज्योति का।

कर निर्धन से प्यार, देकर के सुख  लीजिए।।


करके  झूठा  प्यार,सता न नारी  को कभी।

पा सुख का उपहार,स्वर्ग सदृश निज गेह में।


पंचतत्त्व अनमोल,बिना शुल्क मिलते सभी।

गगन  मध्य भूगोल,जीवन के उपहार  ये।।


🪴शुभमस्तु!


24.11.2022◆2.00

पतनम मार्तण्डस्य।

निज गरेबान में झाँकें [ गीत ]

 494/2022


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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अपने - अपने  गरेबान  में,

नर-नारी सब झाँकें।


नंगा  होकर  खड़ा  आदमी,

अति आधुनिक बताए।

स्नानागार  और   के   झाँके,

मौन खड़ा मुस्काए।।

विकट फँसी है नारी।

कहते नर पर भारी।।

गली - गली  में दुःशासन  हैं,

ग्रीवा उचका ताकें।


जोड़  - जोड़ श्रद्धा के टुकड़े,

श्रद्धा   लौट  न पाती।

पूछें उसके   मात  - पिता  से,

फटती जिनकी छाती।।

हुआ हवस का खेला।

वह जाने  जो झेला।।

भूत  आधुनिकता  का  हावी,

सुन-सुन श्रुतियाँ थाकें।


सबके   जीवन   में  चलती हैं,

यौवन - गंध- हवाएँ। 

चलती  हैं  जब  तेज  सुनामी,

टूटें   मन  - वल्गाएँ।।

अंधे     दौड़ें     घोड़े।

सहज रास को तोड़े।।

पत्थर  गिरे अक्ल पर जब से,

छाने फिरते खाकें।


कलयुग में क्या-क्या होना है,

दिखता नित्य नमूना।

नौ   महीने  जो  रखे कोख में,

लगता उसको चूना।।

द्रवित हृदय रोता है।

जब ऐसा होता है।।

'शुभम्' नारि- नर के चरित्र का,

दर्शन कर दृग पाकें।


🪴शुभमस्तु !


23.11.2022◆8.45 पतनम मार्तण्डस्य।


बुधवार, 23 नवंबर 2022

अनदेखी 🌲 [ दोहा ]

 493/2022

           

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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माता   वीणावादिनी,  करतीं कृपा   अपार।

अनदेखी करती कहीं,बहे न कविता-धार।।

पाहन प्रतिमा  ईश की,यद्यपि रहती   मौन।

अनदेखी  करती  नहीं, आया उसके भौन।।


पंचतत्त्व   के   योग   से, बनती  नश्वर  देह।

अनदेखी   यदि  वे करें,बनें धरा  के  खेह।।

यद्यपि  हैं सन्यास  में,है गृहस्थ  नित साथ।

अनदेखी से क्यों मिले, तन हित रोटी हाथ।।


वह्नि वायु का साथ  है, सरें न  उनके  काज।

अनदेखी कैसे करें,  परसों कल  या  आज।।

कैसे  सागर की करे,अनदेखी सरि -  धार।

कल-कल कर मिलने चली,गाती गीत मल्हार


अनदेखी   कर  ट्रेन  में,   बैठे पुरुष   सवार।

बीरबानियाँ   बोलतीं,  आदत से   लाचार।।

गुरु  जब  अनदेखी करें, शिष्य न पाए ज्ञान।

नीचे ज्वलित चिराग के,तम का तना वितान।


संतति जननी जनक का,कर सेवा सम्मान।

आजीवन रहते सुखी,तज अनदेखी बान।।

अनदेखी पति की करे,उचित नहीं यह बात।

दंपति के कैसे कटें,सुखमय दिन  या  रात।।


आओ हम त्यागें सभी,अनदेखी  का रोग।

निष्पादन करते रहें, निज काजों का योग।।


   🪴शुभमस्तु !

23.11.2022◆1.45 पतन्म मार्तण्डस्य।


जीवन साँसों से बना 🦋 [ दोहा ]

 492/2022


[ साँसें,आँखें,रातें,बातें, घातें]

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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    🦢 सब में एक 🦢

जीवन साँसों से बना,साँसों का ही खेल।

साँसें सदा सँभालना,छूट न  जाए  रेल।।

साँसें स्वेद-सुगंध से,सफल सजाएँ मीत।

गई  साँस आती नहीं,गूँजे अनहद  गीत।।


आँखें दर्पण जीव का,अंतर का प्रतिबिंब।

आँखों में दर्शन करें,फल रसाल या निम्ब।।

आँखें दो  से  चार  हो,जुड़ जातीं   बेतार।

अंतर दिव्य  प्रकाश हो,मानी उर  ने  हार।।


बातें अपने   पेट  में, सीख पचाना   मीत।

रस-विष  के संयोग से,मधुर न हो संगीत।।

मितभाषी  रहना 'शुभम्', जो चाहे आनंद।

बातें  करें न राम जी,मुस्काते शुचि मंद।।


रातें ज्यों मधुयामिनी,यौवन  के  दिन चार।

नहीं जोश में होश खो,जीवन ये  उपहार।।

जीवन में आधे  दिवस, आधी रातें   मित्र।

फूँक-फूँक पग जो रखे,महके जीव-चरित्र।।


वाणी  की घातें  न दे,भरें न उर  के  घाव।

व्याकुलता मन की बढ़े,विकृत होते  भाव।।

घातें कपट कुचाल की,करतीं क्रूर कुमार्ग।

पावनता  आती नहीं,दुर्लभ नर को  स्वर्ग।।


🦢 एक में सब  🦢

साँसें   बातें   कर  रहीं,

                          आँखें   दोनों     मौन।

रातें   बीतीं   छिनक  में,

                              देता  घातें     कौन!!


🪴 शुभमस्तु !


22.11.2022◆8.30

पतनम मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

किस तरह लिखते कविता 🖊️ [ बाल कविता ]

 491/2022


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✍️ शब्दकार ©

🖊️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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तात    किस   तरह   लिखते कविता।

हमें     बहुत   प्रिय    लगती कविता।।


बैठे         रहते         लिए    लेखनी,

कैसे     रच     जाती    है    कविता।


शब्दावली               जोड़ते     कैसे,

मिनटों     में     बन    जाती कविता।


कैसे       छंद,     ताल,     लय  आते,

गा  -   गा     उठती      प्यारी कविता।


दोहा ,        गीत,      छंद ,  कुंडलिया,

ग़ज़ल,    गीतिका ,   रोला ,   कविता।


छंदों         को      पिंगल    भी   कहते,

सबके      मन    को    भाती  कविता।


 गिन  -  गिन     मात्रा     वर्ण   सजाते,

सज   बज    तब  उठती   हर कविता।


'शुभम्'       छंद     में    लघु   गुरु   होते,

हो      विधान     सम्मत     जो  कविता।


🪴शुभमस्तु !


22.11.2022◆2.00

पतनम मार्तण्डस्य।

हमने दो खरहे पाले 🐇 [ बालगीत ]

 490/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🐇 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हमने   घर   दो  खरहे   पाले।

दोनों   हैं   वे   गोरे  -  काले।।


नर   खरहा   फुर्तीला   भारी।

खाता  हरी  -  हरी तरकारी।।

धमा  -  चौकड़ी   करने वाले।

हमने  घर  दो   खरहे  पाले।।


मादा  रहती   घर   में   ऊपर।

नर आता झट   नीचे   भूपर।।

करते  करतब   बड़े   निराले।

हमने घर दो   खरहे    पाले।।


जन्माए  मादा     ने   शावक।

गोरे - काले   दोनों    मेलक।।

कोई  उनको  हाथ   उठा  ले।

हमने घर दो    खरहे   पाले।।


एक  दिवस टट्टर  से  गिरकर।

घायल हुआ नाक में   भूपर।।

हे   ईश्वर !  तू   उसे   बचा ले।

हमने   घर   दो  खरहे पाले।।


दूध  रुई  में   भिगो  पिलाया।

लगा वॉलिनी   हाथ उठाया।।

मादा   देती    घास   निवाले।

हमने  घर   दो   खरहे पाले।।


'शुभम्' ईश सुनते हैं विनती।

जोड़ी खरहा की भी जपती।।

चंगे   खेल    उठे    मतवाले।

हमने  घर दो   खरहे  पाले।।


🪴 शुभमस्तु!


22.11.2022◆11.45 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

साहस का प्रतिमान ⛰️ [ दोहा ]

 489/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

⛰️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सदा असंभव शब्द से,जिनका खाली कोष।

साहस  से  वे  जूझते, पाते   उर  में   तोष।।

राहों  में  उसके  पड़ी , दीर्घ विकट  चट्टान।

निज  साहस से ठेलता,बनता वीर   महान।।


बैठ  गया जो हार कर,उसकी कैसी   जीत।

साहस से  पर्वत चढ़ा, गुंजित जय के गीत।।

गिर-गिर चढ़े पिपीलिका,हिमगिरि के भी शृंग

लें सब उससे सीख हम,देख- देख दृग दंग।।


साहस से वश में किए,सिंह आदि बहु वन्य।

विजय-ध्वजा लहरा रहा, मानव साहस धन्य

बहा स्वेद  निज देह का,मानव वही   महान।

परजीवी  असहाय-सा,खोता अपना  मान।।


मानव - साहस  गूँज से, दिग्दिगंत   ब्रह्मांड।

पहुँचा सागर  की  तली,किए शृंग के खंड।।

गूँज  उठी   है  व्योम में,साहस की  गुंजार।

शुक्र सोम  पर जा चढ़ा,मानव ध्येय प्रसार।।


साहस  की  पतवार  से,होती सरिता पार।

दुर्गम  पर्वत शृंग पर,मानव का अधिकार।।

साहस से  ही  सिंह है,दुर्बल हीन   शृगाल।

श्वानों  से साहस बिना, नुचवाता  है खाल।।


साहस का प्रतिमान बन,मानव बने महान।

चढ़ दुश्मन के शीश पर,गाए झंडा - गान।।


🪴शुभमस्तु !


22.11.2022◆6.45

आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 21 नवंबर 2022

वासना 🌹🌹 [ चौपाई ]

 488/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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शुभंकरी   मनु  श्रद्धा  प्यारी।

पावनता   में   दुर्लभ   नारी।।

दो से नयन  चार  जब   होते।

नेह -  नदी   में  लगते   गोते।।


नहीं  आज सतयुग  उतराया।

कलयुग ने निज रंग दिखाया।

पंक-वासना  में जा   लिथड़ी।

श्रद्धा-तन की चिथड़ी टुकड़ी।


आफ़ताब   ऊबा   तब   डूबा।

किया कलंकित दिल्ली सूबा ।

हुई    वासना  उर   से   भारी।

खटकी   अंकशायिनी   नारी।


प्रेम   वासनामय     है   अंधा।

विस्मृत अपना   सुदृढ़ कंधा।।

चूम  देह-दृग  प्यार जिया था।

उसी  देह पर वार किया था।।


नशा वासना  का   जब ठंडा।

क्रोध  द्रोह  का  थामा डंडा।।

हने प्राण की   बोटी  -  बोटी।

पैंतीसों अति  छोटी -  छोटी।।


अंधकार  'सहजीवन'    तेरा।

स्थिर  होता    नहीं   बसेरा।।

कीचड़ तल वासना  सजाए।

दो पल पावन  प्यार न भाए।।


पशुओं से  भी  नीचे   मानव।

नर  देही  में   बनता   दानव।।

मात्र वासना  का नर  कीड़ा।

नहीं नयन उर में  लघु व्रीड़ा।।


'शुभम्' बुद्धि विकृत जो करता।

दहक  वासनानल  में मरता।।

साथ  नहीं विवेक  का छोड़ें।

दुष्य पंक   से नाता    जोड़ें।।


*दुष्य=बुराई नाशक।


🪴शुभमस्तु!


21.11.2022◆ 12.30 पतनम मार्तण्डस्य।



छलकती हैं गगरियाँ क्यों? 🏺 [ गीतिका ]

 487/2022


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✍️ शब्दकार ©

🏺 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बिगड़  जातीं  छोरियाँ  क्यों ?

चरित की कमजोरियाँ क्यों??


वासना      का   भेड़िया   नर,

अज्ञता   वश   नारियाँ   क्यों?


लग    रहे    परिजन     पराए,

बहक   जातीं  गोरियाँ   क्यों?


मानते    हम     नारि     भारी,

छोड़    देतीं    पौरियाँ   क्यों?


कीट    पड़ते    मात्र    छूकर,

सड़ रहीं  ये  मटकियाँ  क्यों?


बात  बस   आचार    की   है,

छलकती  हैं  गगरियाँ   क्यों?


'शुभम्'   कदमों  को सँभालें,

भटकतीं    ये   बारियाँ   क्यों?


🪴शुभमस्तु !


21.11.2022◆6.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सड़ रहीं ये मटकियाँ क्यों? ⚱️ [ सजल ]

 486/2022


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●समांत : इयाँ।

●पदांत  : क्यों ।

●मात्राभार : 14.

●मात्रा पतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🏺 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बिगड़  जातीं  छोरियाँ  क्यों ?

चरित की कमजोरियाँ क्यों??


वासना      का   भेड़िया   नर,

अज्ञता   वश   नारियाँ   क्यों?


लग    रहे    परिजन     पराए,

बहक   जातीं  गोरियाँ   क्यों?


मानते    हम     नारि     भारी,

छोड़    देतीं    पौरियाँ   क्यों?


कीट    पड़ते    मात्र    छूकर,

सड़ रहीं  ये  मटकियाँ  क्यों?


बात  बस   आचार    की   है,

छलकती  हैं  गगरियाँ   क्यों?


'शुभम्'   कदमों  को सँभालें,

भटकतीं    ये   बारियाँ   क्यों?


🪴शुभमस्तु !


21.11.2022◆6.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

भूल न संतति -धर्म को 🏕️ [ दोहा- गीतिका ]

 485/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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समझे संतति कामना,को पितु का आदेश।

अनुपालन  में रत रहे, निष्कलंक  राकेश।।


एक   कान  से  बात   सुन,गई दूसरी    पार,

 पितृ आज्ञा वह शाप है,क्षम्य नहीं लवलेश।


भूला संतति -धर्म को,करता नित अपमान,

नर तन में  वह ढोर है,भले साधु  का  वेश।


रँगा न  मन  को रंग में,तन पर धर   कौशेय,

जनता को ठगता फिरे, बढ़ा सुलम्बित केश।


मात पिता की भक्ति का,पाता शुभ निष्कर्ष,

वही  तीर्थ, जगदीश हैं,शंकर, राम,   ब्रजेश।


लेने  को  प्रतिशोध  जो, आती  अरि  संतान,

परजीवी बनकर रहे,दे तन- मन  को  क्लेश।


'शुभम्' न दे परमात्मा, लेती जो प्रतिशोध,

साधारण   मानव  भले,बनना नहीं   सुरेश।।


🪴शुभमस्तु!


20.11.2022◆8.30 पतनम मार्तण्डस्य।

सबका अपना मोल 🏕️ [ दोहा- गीतिका ]

 484/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पाँचों  अँगुली हाथ  की, होतीं नहीं  समान।

जहाँ काम  आए सुई,वहाँ वृथा   है   बान।।


दिन में सूरज की प्रभा,रजनी में शशि रम्य,

उषा-लालिमा भोर में,ताने सुखद   वितान।


कर्ता ने  सबको दिए,करने को  कुछ   काम,

मूल फूल दल शाख की,सबकी अपनी आन।


सूँड़,  पूँछ  या  पेट   से, बने न   हाथी   पूर्ण,

आँख,दाँत,मुख,देह सँग,रखें अहमियत कान


तिनका भी भू पर पड़ा,आ जाता   है  काम,

जब  पिपीलिका डूबती,वही बचाता   जान।


मत करना  अवहेलना, पड़ी धरा  पर  धूल,

गिर जाती जो आँख में,छिन जाती मुस्कान।


'शुभम्'सृष्टि का एक कण,उपयोगी  है मीत,

मत  छोटा  समझें  उसे,लेना मति  - संज्ञान।


🪴शुभमस्तु!


20.11.2022◆7.45 पतनम मार्तण्डस्य।

शनिवार, 19 नवंबर 2022

चोर - चोर मौसेरे भाई 🙊 [ व्यंग्य ]

 483/2022 

  

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🙊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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 जहाँ तक मेरी जानकारी की दूरदृष्टि जाती है,चोरी एक सदाबहार कला के रूप में विख्यात रही है। चोरियों के भी तो अनेक प्रकार हैं। केवल धन की चोरी ही चोरी नहीं होती। और भी चोरियों के विविध रूप हैं।धन की चोरी से पहले भी अनेक प्रकार की चोरियाँ होना एक साधारण - सी बात मानी जाती रही है। दिल की चोरी उनमें प्रमुख स्थान रखती है।यदि ऋषि पाराशर नाव से नदी पार कराती हुई निषाद कन्या सत्यवती के दिल की चोरी नहीं करते तो महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना से संसार वंचित हो जाता।संसार मात्र इसी से वंचित नहीं होता, वरन पुराणों के पारायण से भी अनभिज्ञ रह जाता।यह दिल की चोरी का ही सुपरिणाम है कि महर्षि वेद व्यास जी का अवतरण इस धरा- धाम में हो सका। इस प्रकार चोरियों की भी महान उपलब्धियों से संसार लाभान्वित होता रहा है और आज भी वह परम्परा अनवरत रूप से प्रवहमान है।

  निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि किस - किस वस्तु या अवस्तु की चोरी हो सकती है !चोरी - चोरी नजरें मिलती हैं ,तो क्या कुछ नहीं होता? ये सभी चोरियाँ सूक्ष्म प्रकार की हैं। इस प्रकार सामान्य रूप रूप से चोरियों को दो कोटियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:1.सूक्ष्म चोरी 2.स्थूल चोरी। सूक्ष्म चोरी वह है; जिसमें किसी भौतिक वस्तु के स्थान पर कोई अदृष्ट और सूक्ष्म भाव या प्रभाव चोरी हो जाता है। मैंने यह भी पढ़ा है कि कवि लोग भी चोरी करते हैं। लेकिन उनका चौर्य- चातुर्य भी सराहना का सुपात्र हो सम्मानित हो जाता है।यहाँ पर यह उल्लेख करना भी अनिवार्य है कि हमारी सुप्रसिद्ध चौंसठ कलाओं में एक कला चोरी भी है।इसलिए कवियों की विचार और भावों की चोरी को सराहा जाता है। वाह !वाह!! ही की जाती है। हाँ, इतना आवश्यक है कि यदि चोरी पकड़ ली जाती है तो निंदा - उपाहन से पाहन-प्रहार कर चोर की मातमपुर्सी में भी कमी नहीं छोड़ी जाती। भाषा- शैली की चोरी कुछ ज्यादा ही ख़तरनाक है, क्योंकि इससे पकड़े जाने का ख़तरा भी उतना ही अधिक है। कवि -चोर या लेखक - चोर को इस चोरी से सर्वथा बचना ही श्रेयस्कर है। तभी उसके सिर को खल्वाट होने से बचाया जा सकता है।

  आज के युग में कर- चोरी, जी. एस. टी.- चोरी, ए. टी. एम. -चोरी, डाटा- चोरी जैसी अनेक अत्याधुनिक चोरियों की भरमार हो गई है। ज्यों-ज्यों देश , दुनिया और आदमी का विकास हो रहा है ,चोरियों के क्षेत्र का विस्तार भी इतना अधिक ही गया है कि जब तक इस विषय पर मैं एक शोध प्रबंध पूर्ण करूँगा, तब तक नए नए प्रकार की चोरियों का अविष्कार हो जाएगा। परिणाम यह होगा कि चौर्य शोध प्रबंधों का धारावाहिक क्राइम पेट्रोल के धारावाहिकों की तरह अनन्त काल तक चलता रहेगा।

  सामान्यतः संसार में सर्वश्रेष्ठ ,सर्व लोकप्रिय और सर्वत्र व्याप्त चोरी का रूप 'धन की चोरी' है। जो अपने विविध आयामों में अवतरित होकर चोरों की कृपा का पात्र बना रहा है।धन की चोरी गबन,उत्कोच, कमीशन,छूट, अपहरण,सेंध,सुविधा-शुल्क , राहजनी,लूट,डकैती आदि अपने विविध रूपों में देखी औऱ पाई जाती है। अब ककड़ी चोर तो ककड़ी ही चुराएगा न! कोई बैंक में डाका तो नहीं डाल सकता! चोरों और चोरी का भी अपना अपना स्तर है। तथाकथित बड़े लोग यदि ककड़ी चुराते पकड़े गए तो उनका हीन भाव उनकी नाक ही न काट डालेगा ! अब बड़े लोगों की गिनती तो मैं करा नहीं सकता, क्योंकि उनसे सभी डरते हैं। मैं भी डरता हूँ।क्योंकि वे बड़े स्तर के चोर हैं औऱ यदि वे मेरे यहाँ इस कार्य के लिए यदि पधार गए तो मेरे घर में कविताओं के कुछ कागज़ों के ढेर देखकर वापस रिक्त हस्त ही जाना पड़ेगा।

 अखबारों में बड़ी बड़ी चोरियों के चर्चे आम हैं। पर बड़े चोरों की नब्ज पर हाथ भी लगाने की हिम्मत भला किसकी हो सकती है? नस्तर की तो बात ही करना बेकार है।हाँ,इतना अवश्य है कि जब बड़े से बड़े चोरों का बुरा वक्त आ जाता है तो नस्तर तो क्या बिस्तर ही बंध जाता है। पर क्या कीजिए यहाँ तो सारे के सारे चोर मौसेरे 'बहन -भाई' हैं। ये बहन-भाई का पावन रिश्ता क्या- क्या गुल खिलायेगा !देखते जाइए। सब देख रहे हैं। हम भी देख रहे हैं। और देखते रह जाएँगे और 'चोर -चोरनी' अपनी चोरी का पवित्र औचित्य चतुराई से सिद्ध कर ये गए! वो गए!हम सब किसी सुपरिणाम की प्रत्याशा में टापते रह जायेंगे। औऱ चोर - चोर मौसेरे भाई के साथ -साथ एक औऱ पवित्र मुहावरा हमारे हिंदी मुहावरा कोश की अभिवृद्धि कर देगा: "चोर - चोरनी मौसेरे भाई-बहिन"। अब कौन किसकी पूँछ उठाए, जब इधर से उधर को देखा तो सब मादा ही गए पाए! करते रहिए विरोध ! कौन सुनता गए नक्कारखाने में तूती की आवाज ? जब देश दुनिया के सारे कुँओं में ही भाँग के बोरे के बोरे घुले पड़े हों ,तो बेहोश तो होना ही है। आज उसी बेहोशी का दौर चल रहा है औऱ करोड़ों की चोरी खुलेआम हो चुकी है। पर यह कहावत भी कुछ गलत नहीं फ़रमाती कि ऊँट की चोरी निहुरे - निहुरे नहीं होती। 

 🪴 शुभमस्तु! 

 19.11.2022◆ 7.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

बहती रहती रात -दिन 🏞️ [ कुण्डलिया ]

 482/2022


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✍️ शब्दकार ©

🏞️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

गिरती गिरि-गृह त्याग कर,मैदानों  के बीच।

पथरीले  पथ  पार कर,नाली, नाले,  कीच।।

नाली, नाले, कीच, लगन बढ़ते  ही   जाना।

प्रिय सागर-संयोग,दान का प्रण  अपनाना।।

'शुभम्'बनी फिर मेघ,गगन मंडल में फिरती।

बनती जल की वृष्टि,धरा पर सरिता गिरती।


                         -2-

बहती रहती रात-दिन, कहते नदिया  लोग।

देना  ही   उद्देश्य   है,  एकनिष्ठ    हठयोग।।

एकनिष्ठ हठयोग, जनक गिरि का घर छोड़ा।

सिंधु मिलन  की साध,भले हो पथ में रोड़ा।।

'शुभम्'  एक  ही चाल,निरंतर बाधा  सहती।

देकर  ही  संतुष्ट, गान कलरव कर   बहती।।


                         -3-

अपगा है फिर भी चले, सरिता, तटिनी नाम।

लहरी,तरिणी भी कहें,कल्लोलिनी सुधाम।।

कल्लोलिनी  सुधाम, सींचती जीव  चराचर।

कूलंकषा   महान,  पेड़- पौधे रचना  कर।।

'शुभम्' बुझती प्यास,बनी पावन तिरपथगा।

यमुना ,सरयू ख्यात,सिंधु , कावेरी  अपगा।।


                         -4-

लेना    यदि  आनंद   हो , देना सीखें   मीत।

कलरव में नदिया कहे,गा मत अपने गीत।।

गा मत अपने गीत, प्रशंसा मत कर अपनी।

करना हो यदि त्याग,प्रेम की माला जपनी।।

'शुभम्' नदी की सीख,मात्र देना   ही   देना।

करना  पर-उपकार, नहीं बदले  में   लेना।।


                         -5-

नदिया-नदिया क्यों कहे,देती कण-कण बूँद।

गिरि से सागर तक चली,लीं निज आँखें मूँद।

लीं निज आँखें मूँद, लिया जिसने जो चाहा।

मानव,पशु,खग,पेड़,सभी ले करते   आहा।।

'शुभम्, नहाते जीव,तृप्त गौ,बछड़ा,बछिया।

सींचें फसलें बाग,  सदा उपकारी   नदिया।।

🪴 शुभमस्तु !


18.11.2022◆2.00

पतनम मार्तण्डस्य।

सार्थकता ⛳ [अतुकान्तिका ]

 481/2022

            

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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एक बाहर गई,

एक अंदर आई,

परंतु वे दोनों

नहीं थीं एक,

जाने वाली

कोई और थी,

आने वाली कोई और।


वे आती- जाती रहीं,

और चलती रही  जिंदगी,

एक- एक साँस,

अनवरत अनगिनत

स्वतः बिना किसी प्रयास,

फिर भी कहीं न कहीं

अंकित है उनका भी

लेखा - जोखा

आने -जाने का विवरण,

जैसे  वृथा नहीं

धरती पर एक भी तृण।


बरबाद नहीं करना,

उनका आवागमन ही

कहलाता है जीवन,

आवागमन होते ही बंद

शेष नहीं रहता जीवन,

कहलाने लगता है

वह मानव का मरण,

प्रभु की अंतिम शरण,

करना ही होता है

रक न एक दिन

उसका हम सबको वरण।


सुधार लें 

हम सब 

अपने आचरण,

सार्थकता में

बनाएँ साँसों का

आवागमन,

महक उठेगा 

तब जीवन का

 कण- कण,

प्रति क्षण,

लगा मत बैठना

पशुवत अपना पण।


जीना भी क्या जीना

कि आए और विदा हुए,

कुछ अमिट पद चिह्न 

छोड़ते हुए तो जाना है,

भले ही कुछ भी नहीं अमर

फिर भी जीवन को

'शुभम्' बनाना है।


🪴 शुभमस्तु !


18.11.2022◆6.00 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 17 नवंबर 2022

धूप सुहानी 🌅 [ बालगीत ]

 480/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🌅 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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लगती  हमको  धूप   सुहानी।

जाड़े   की  कहलाती   रानी।।


जब  जाड़े का मौसम  आता।

बहुत-बहुत हमको वह भाता।

दादी  कहती   खूब   कहानी।

लगती  हमको  धूप  सुहानी।।


जब  होता  है   विदा   अँधेरा।

तब  होता  है  स्वर्ण - सवेरा।।

सूर्य झाँकता खिड़की- छानी।

लगती  हमको  धूप  सुहानी।।


छोड़    रजाई    बाहर   आते।

दैनिक   चर्या   में  लग जाते।।

करते  याद   धूप   में    मानी।

लगती  हमको धूप   सुहानी।।


बैठ   ओट   में  दादा -  दादी।

पहन ओढ़कर तन पर खादी।

धूप    सेंकते   बात    बतानी।

लगती हमको धूप   सुहानी।।


जब हम विद्यालय को जाते।

कक्षा जहाँ   धूप   लगवाते।।

पढ़ते  हिंदी   गीत   जबानी।

लगती हमको  धूप सुहानी।।


🪴 शुभमस्तु !


17.11.2022◆7.30 पतनम मार्तण्डस्य

धूप अगहन - पूस की🌅 [ गीत ]

 479/2022


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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धूप  अगहन - पूस  की  ये,

झिझकती - सी आ रही है।


कोहरे   की    ओढ़   चादर,

लाल मुख चमका रहा है,

जाग     गोलाकार     सूरज,

ओस में  मानो  नहा  है,

कुकड़कूँ की बाँग आई,

कान में  पड़ती  सुनाई,

फ़ाख्ता   बैठी     विटप   में,

गीत प्रभु के गा रही है।


ओढ़    कर     बैठी   रजाई,

दादियाँ नानी  सिकुड़कर,

पूछतीं      बच्चो     बताओ,

धूप   कब   आए   उतर कर,

माँ बिलोती दधि - मथानी,

शाटिका   धर   देह  धानी,

गूँजती ध्वनि छाछ के  सँग,

लवनि ऊपर ला रही है।


फावड़ा   ले    हाथ   अपने,

कृषक सिंचन में मगन है,

जौ,   मटर ,   गेहूँ    लहरते,

काम  की  उर   में   लगन है,

कुशल घरनी ले  कलेवा,

कर रही  पतिदेव- सेवा,

मेंड़   पर     बैठी   हुई     है,

प्रेम से खिलवा रही है।


ओट   में   बैठे   करब   की,

 टूंगते  हैं   मूँगफलियाँ,

युवा,  बूढ़े  ,   प्रौढ़  बालक,

गा रहे   कुछ  गाँव-गलियाँ,

हैं  रँभातीं  भैंस  गायें,

माँगतीं चारा ख़िलाएँ,

'शुभम्' अम्मा  नाद  में कुछ,

हरित चारा ला रही है।


🪴शुभमस्तु !


17.11.2022◆3.00पतनम मार्तण्डस्य।


कैसा नया जमाना है! 🏺 [ गीत ]

 478/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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समझ न आती चाल समय की,

कैसा नया जमाना है !


शंकित हर  आदमी परस्पर,

संदेहों  के   घेरे  हैं,

थर -थर भय से काँप रहे वे,

ज्यों बेरी  सँग केरे हैं,

जंगल  ही  जंगल है,

कहाँ लोकमंगल है?

रसना  पर  आदर्श थिरकते,

राम राज्य ले आना है।


भूखी मरती गाय सड़क पर,

खाली सब गौशाला हैं,

भूसा   चारा   बेच   खा  रहे,

ओढ़े पीत  दुशाला   हैं,

फ़ोटो    में   मुस्काते,

सत  गोभक्त  कहाते,

कब्जा करने को जमीन पर,

शाला बनी बहाना है।


गाँव   छोड़कर   भाग  रहे हैं,

महानगर के कोने में,

थाली   छोड़   खड़े  हो खाते,

नर नारी अब दोने में,

लड़ामनी में भैंसे,

खाते   हैं वे  ऐसे,

नई  सभ्यता   फटी  जींस  में,

नंगा बदन दिखाना है।


मात-पिता को आँख दिखाती,

संतति नए जमाने की,

माँग  रही  है  रक्त  पिता का,

ताकत उनके ताने की,

सेवा अपनी चाहें,

बढ़ती जाती डाहें,

'शुभम्'  अपेक्षा  शेष नहीं है,

छूना चरण बहाना है।


   🪴शुभमस्तु !

17.11.2022◆1.45

 पतनम मार्तण्डस्य।

जागो!सोए हो कहाँ?🏕️ [ कुण्डलिया]

 477/2022


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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

मूसे  निशिदिन  पेड़  की,जड़ में लगे अनेक।

खोद खोखला कर रहे, शुभद नहीं  है एक।।

शुभद नहीं  है  एक, पेड़ की  सूखें    डाली।

सोया कहाँ  किसान, कहाँ है तरु का माली।।

'शुभम्' न  भावी  नेक,निरंतर रस  को  चूसे।

पीले  पड़ते  पात, लगे  तरु- जड़  में  मूसे।।


                         -2-

जागो  सोए  हो  कहाँ,  करना है  उपचार।

चाटे  दीमक खेत  को,डालें जहर  फुहार।।

डालें  जहर   फुहार, मूल से शीघ्र  मिटाना।

तभी बचे धन धान, कीट नाशक डलवाना।।

'शुभम्'  नहीं  उपहास,शत्रु के पीछे  भागो।

मुड़ें  न  पीछे  देख,  देश  के वासी  जागो।।


                         -3-

बढ़ते  ही  घुन जा रहे,करना नाश   समूल।

हितकारी समझें नहीं,तनिक न  देना तूल।।

तनिक न  देना तूल, बनाते तरु की   माटी।

भीतर -भीतर काट,सकल रसमयता चाटी।।

'शुभम्'न अवसर छोड़,निरंतर ऊपर चढ़ते।

करते  जीवन -नाश,जा रहे घुन  ये  बढ़ते।।


                         -4-

जिनके  हैं  विपरीत  ही, छद्म रूप आकार।

वे  मानव  की देह में,इस धरती   का  भार।।

इस  धरती  का  भार,भार से मरती   धरती।

सहती कष्ट अपार,आह क्या पल को भरती।

'शुभम्'  उड़ाना  धीर, हवा में जैसे   तिनके।

धोखे का जंजाल,काज सब उलटे  जिनके।।


                         -5-

अपनी जननी का कभी, नहीं लजाना दुग्ध।

कर उसकी अवमानना,पर जननी पर लुब्ध।

पर-जननी   पर  लुब्ध, रीति बेढंगी    तेरी।

गाता   उसके   गीत , कहे  तू माता    मेरी।।

'शुभम्' मूढ़ता ओढ़,कूढ़ मगजी यह जितनी।

जीवन से अघ छोड़,जान जननी ये अपनी।।


🪴शुभमस्तु !


16.11.2022◆10.00पतन्म मार्तण्डस्य।

बुधवार, 16 नवंबर 2022

परिमल प्रीति-पराग का 🌹 [ दोहा ]

 476/2022


[परिणय,परिचय,परिमल,पुहुकर,परिरंभ]

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✍️शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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    ☘️ सब में एक ☘️

पावन परिणय-सूत्र में,बँधे सकल नर-नारि।

ज्यों गुलाब सद गंध में,मिले ओसकण वारि।

ज्योति जहाँ परिणय वही,पति पत्नी दो दीप

युग्मित  दो कण  सिंधु में,मुक्ता देती  सीप।।


पत्नी  प्रियतम  के  लिए,जानी  नहीं  अदृष्ट।

विरल सूत्र परिचय नहीं,तदपि हुई आकृष्ट।।

आवश्यक परिचय नहीं,दंपति - बंधन  हेतु।

धन-ऋण शुभ संयोग से,बनते संतति सेतु।।


परिमल प्रीति पराग का,पति-पत्नी के बीच।

एकमेक तन-मन करे,लाता खींच   नगीच।।

उर से उर -संयोग का,परिमल पावन प्यार।

नए जीव की सृष्टि का,बने 'शुभम्' उपहार।।


पुहुकर प्रणय  प्रवास का,दे सुरसरि आनंद।

तन मन के अभिषेक से,विकसे नव अरविंद।

पति पुहुकर की प्रीति में,प्रिया लीन दिन रैन

कल पल को मिलती नहीं,सदा सताए मैन।।


स्वाद  प्रिया- परिरंभ का, वाणी  शब्दातीत।

डाल-डाल अलि जा भ्रमे, क्या जानेगा प्रीत।

प्रिय  परिरंभ प्रगाढ़ता, रही हृदय को साल।

प्रथम सघन अनुभूति से,रग रग भरा गुलाल।


        ☘️ एक में सब  ☘️

परिचय  से  परिणय हुआ,

                   'शुभम्'  सघन परिरंभ।

उर - पुहुकर में  स्नात हो,

                   परिमल नासा   दंभ।।


🪴शुभमस्तु !


16.11.2022◆4.00 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सोमवार, 14 नवंबर 2022

करना सबकी सदा भलाई 🪷 [ गीतिका ]

 475/2022


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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कण   -  कण     में    प्रभु   की   कविताई।

छंद,     शब्द ,     लय      में     बँध   छाई।।


कर्म         किया       करता    जन     जैसा,

वैसी              उसको        मिले     कमाई।


पंच        तत्त्व         से      जगत    बनाया,

समझ       मूढ़        प्रभु    की      प्रभुताई।


सूरज,           सोम,      सितारे,         सोहें,

सरिता        ने       शुभ     महिमा      गाई।


अंबर            के        मेघों       से     बरसे,

अमृत     -  सा     जल      करे      सिंचाई।


आने    -  जाने       का      क्रम    अविरल,

कहीं           आगमन       कहीं     विदाई।


'शुभम्'        सूत्र       जीवन    जीने     का,

करना           सबकी         सदा     भलाई।


🪴शुभमस्तु !


14.11.2022◆6.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


प्रभु की प्रभुताई 🦚 [ सजल ]

 474/2022

 

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●समांत : आई ।

●पदांत : अपदांत ।

●मात्राभार : 16.

●मात्रा पतन :शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कण   -  कण     में    प्रभु   की   कविताई।

छंद,     शब्द ,     लय      में     बँध   छाई।।


कर्म         किया       करता    जन     जैसा,

वैसी              उसको        मिले     कमाई।


पंच        तत्त्व         से      जगत    बनाया,

समझ       मूढ़        प्रभु    की      प्रभुताई।


सूरज,           सोम,      सितारे,         सोहें,

सरिता        ने       शुभ     महिमा      गाई।


अंबर            के        मेघों       से     बरसे,

अमृत     -  सा     जल      करे      सिंचाई।


आने    -  जाने       का      क्रम    अविरल,

कहीं           आगमन       कहीं     विदाई।


'शुभम्'        सूत्र       जीवन    जीने     का,

करना           सबकी         सदा     भलाई।


🪴शुभमस्तु !


14.11.2022◆6.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

त्रिफला से कायाकल्प 🧋 [ दोहा ]

 473/2022


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✍️ शब्दकार ©

🧋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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चूरन त्रिफला लीजिए,ऋतुओं के   अनुसार।

उदर  रोग  नासें सभी,शेष न रहे   विकार।।

अपना जितना भार हो,कर उसके दस भाग।

मात्रा उतने  ग्राम की, लें प्रातः उठ    जाग।।


भोजन से नित पूर्व ही,या भोजन के  बाद।

आधे  घण्टे  तक नहीं,कुछ भी  लेना स्वाद।।

सावन-भादों मास में,सेंधा लवण मिलाय।

सेवन त्रिफला का करें,चीखे उदर न  हाय।।


क्वार-कार्तिक मास हो,तब लें चीनी डाल।

चूर्ण   त्रिफला  लीजिए,उदर न हो  बेहाल।।

मार्गशीर्ष या पौष में,मिला सौंठ का  चूर्ण।

सेवन त्रिफला का करें,उदर- कामना   पूर्ण।।


चूर्ण पिप्पली का मिला, लें त्रिफला के संग।

आएँ फागुन - माघ जो,रहे न  पीर - तरंग।।

ऋतु हो जब मधुमास की,चैत्र सुहृद वैशाख

मधु के सँग सेवन करें,मात्र चार शुभ पाख।।


गुड़ सँग त्रिफला चूर्ण हो,लेना ज्येष्ठ अषाढ़।

होगा कायाकल्प तव, निद्रा सुखद प्रगाढ़।।

उदर  गेह  हर  रोग   का, घर बैठे   उपचार।

त्रिफला नित सेवन करें,कायाकल्प अपार।


पेशी - पेशी   शीश  की, होती  है   मजबूत।

त्रिफला से हो केश का,रोम- रोम अभिभूत।।

तीन फलों का योग है, त्रिफला  जानें  मीत।

हरड़, बहेड़ा,आँवला,उदर रोग  को  जीत।।


🪴 शुभमस्तु !


13.11.2022◆5.45 पतनम मार्तण्डस्य।


रविवार, 13 नवंबर 2022

चरण - विचरण 🏃🏻‍♂️ [अतुकांतिका ]

 472/2022


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✍️ शब्दकार©

🏃🏻‍♀️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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विचरण करते

आजीवन

ढोते तन का भार,

युगल चरण का

मानव को

सुंदर उपहार।


तत्पर सदा

कहीं भी जाने को,

समतल पर्वत

निधि -गहराई अथवा

धरती पथराई,

चरणों की महिमा

नहीं कहीं 

कवियों ने गाई,

उचित नहीं आचरण

और उनकी निठुराई।


जब तक

 चलते चरण,

करती जीवन को

प्रकृति धारण,

अन्यथा होने

लगता शनैः शनैः

 निस्सारण,

जीवन से निस्तारण,

क्या है कारण?


क्यों करें उपेक्षा

निज चरणों की,

उचित समीक्षा

देह के अंग- प्रत्यंग,

जीवन की उमंग,

हो जदपि सांग 

अथवा अनंग,

भरते हैं रंग

ये चरण युगल।


जाते जन

प्रातः भ्रमण,

कुछ चलें चरण,

करने जीवनी शक्ति का

 ओजस  वरण,

चरण महिमा का गायन,

'शुभम्' वंदनीय आचरण।


🪴 शुभमस्तु!


10.11.2022◆7.30  आरोहणम् मार्तण्डस्य।


पा प्रशस्ति सत्कर्म से 🏕️ [ दोहा ]

                                                              ४७१/२०२२ 

[अवसर,अनुग्रह,आपदा,प्रशस्ति,प्रतिष्ठा]

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✍️ शब्दकार©

🏞️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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    ☘️  सब में एक  ☘️

बार-बार आते नहीं,शुभ अवसर हे मीत!

लाभ  उठा  लेते  वही, पा  लेते हैं  जीत।।

कब ललाट-लिपि खोल दे,शुभ अवसर का द्वार

सदा ध्यान रखना सखे,जीवन का उपहार।।


गुरु जननी पितु का सदा,मिला अनुग्रह नेह।

जीवन  में  उसके  रहे, उत्कर्षों  का    मेह।।

जन्म-जन्म के कर्म से,मिले अनुग्रह नित्य।

मानव  कवि होता तभी,उगता भावादित्य।।


आती हैं जब आपदा,कभी न  त्यागें  धीर।

रहें  लीन  सत्कर्म  में, कहलाएँ   रणवीर।।

कौन आपदा से  नहीं, होता है   दो  चार।

संघर्षों  से  जूझता,  हो  उसका   उद्धार।।


पा प्रशस्ति फूलें नहीं,नहीं भटक सत राह।

तदनुकूलता सिद्ध कर,तभी उचित हो वाह।।

पा प्रशस्ति सत्कर्म से,मानवीय  का  मोल।

झूठा भी होता कभी, जो  न जानता तोल।।


प्राण- प्रतिष्ठा से  बने, पाहन  ईश  समान।

मात-पिता  को   दें  वही,दे सेवा  में  ध्यान।।

मनुज- प्रतिष्ठा जब मिली,लिया अहं ने घेर।

नाश शीघ्र उसका हुआ,लगी न पल की देर।।


    ☘️ एक में सब ☘️

अवसर शुभद प्रशस्ति का,

                          मिले प्रतिष्ठा  - फूल।

शक्य  आपदा   राह   में,

                       देव-  अनुग्रह न   भूल।।


🪴शुभमस्तु !


09.11.2022◆6.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 7 नवंबर 2022

धन -ऋण महिमा वाली नारी! 🪷 [ गीतिका ]

 470/2022


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 ✍️शब्दकार ©

🏵️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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अद्भुत     रचना    है       नित  नारी।

नर    से   सदा      रही     वह  भारी।।


मानवता        का         पाठ  पढ़ाती,

जन  - जन  को   नित     ही हितकारी।


नारी     को    मत       अबला  कहना,

होती         वह        देवी    अवतारी।


नारी       बिना      न       पूरा  कोई,

संतति      की     वह    आभा  सारी।


पर्वत     उष्ण      पुरुष    यदि   होता,

नारी          कोमल       मृदु   आचारी।


नारी        का     हर     चरण सुपावन,

घर         की    सदा     फूलती   बारी।


'शुभम्'        रूप       नारी   के   सारे,

धन -  ऋण    महिमा   की अधिकारी।


🪴शुभमस्तु !


07.11.2022◆6.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


अद्भुत रचना नारी!🧕🏻 [ सजल ]

 469/2022

 

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समांत :आरी।

पदांत :  अपदांत।

मात्राभार  :16.

मात्रा पतन : शून्य।

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 ✍️शब्दकार ©

🏵️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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अद्भुत     रचना    है       नित  नारी।

नर    से   सदा      रही     वह  भारी।।


मानवता        का         पाठ  पढ़ाती,

जन  - जन  को   नित     ही हितकारी।


नारी     को    मत       अबला  कहना,

होती         वह        देवी    अवतारी।


नारी       बिना      न       पूरा  कोई,

संतति      की     वह    आभा  सारी।


पर्वत     उष्ण      पुरुष    यदि   होता,

नारी          कोमल       मृदु   आचारी।


नारी        का     हर     चरण सुपावन,

घर         की    सदा     फूलती   बारी।


'शुभम्'        रूप       नारी   के   सारे,

धन -  ऋण    महिमा   की अधिकारी।


🪴शुभमस्तु !


07.11.2022◆6.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।

कानों से जा पूछे🏵️ [ गीत ]

 468/2022

 

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सुनना  भी  आसान  नहीं  है,

कानों  से  जा  पूछे।


कान  देव    भगवान    हमारे,

भला- बुरा सब सुनते।

शब्द   एक भी   नहीं   बोलते,

भीतर -भीतर गुनते।।

ज्यों मंदिर की प्रतिमा।

प्रभु का एक करिश्मा।।

कान   देव   भी   लगें  बोलने,

तनें न तेरी मूँछे।


देव   -  देवियाँ   बातें    करते,

एक न  मंदिर  जाता।

करते खूब  शिकायत  अपनी,

जा  कोई  गरियाता।।

भला देव  हैं  बहरे।

गूँगे  बन वे   ठहरे।।

गाली ,  थाली,   ताली  सुनते,

कान  हमारे  कूचे।


सबकी सुनता  बिना कान के,

देखे नयन  बिना ही।

धन्यवाद   है   मेरे   प्रभु   को,

हर पल चलता राही।।

मानव  क्रोध दिखाता।

इठलाता     इतराता।।

उसे न   कोई   अंतर   पड़ता,

समझे प्रभु को छूछे।


आँख कान प्रभु की समता का,

कोई   तोड़   नहीं   है।

तड़ - बड़  करते हैं नर - नारी,

क्षण भर मोड़ कहीं है??

व्यक्त नहीं कुछ करते।

मंजिल सभी विचरते।।

'शुभम्'उपद्रव की जड़ रसना,

नयन,कान,प्रभु सूछे।


🪴 शुभमस्तु !


05.11.2022◆11.45 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


शनिवार, 5 नवंबर 2022

सपनाती आँखें 👁️ [ कहानी ]

 467/2022


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✍️ शब्दकार ©

😌 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                एक रात की बात है।आँखें लगी हुई थीं कि यकायक उन्होंने एक सपना देखा। यों तो उन्हें नित्य ही लग जाने पर सपने देखने की आदत ही थी।किन्तु आज जैसा सपना उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। इसलिए उनका चौंकना भी स्वाभाविक था।सपने में जो उन्होंने देखा तो वे चौंक पड़ीं।पर सपना तो देखना ही था।आँखें क्या देखती हैं कि कान देव पधारे हैं और बड़े ही विनम्र भाव से अपनी वेदना निवेदित कर रहे हैं। "बहन जी आपसे कुछ निवेदन करना था।" कान देव बोले।

    "कहिए !कान देव ।आइए पधारिए। इससे पहले कभी आपसे वार्तालाप का सुअवसर प्राप्त  नहीं हुआ ,इसलिए हमारा चौंकना स्वाभाविक था।"आँखों ने अपने को सामान्य बनाते हुए कान देव का सहज स्वागत करते हुए कहा।

    कान देव कहने लगे: " यों तो सबकी अपनी -अपनी बहुत सी समस्याएँ होती हैं। किंतु हमारी समस्याएँ ही कुछ इस तरह की हैं कि कुछ कहते नहीं बनता।फिर भी कहने से जी हलका होता है ,इसलिए आपको कष्ट देने के लिए चले आए।"

     "अरे कान देव भैया !आप तो हमारे बड़े भाई हैं।हम तो यहाँ पलकों के बीच किसी नवोढ़ा दुल्हन की तरह लुकी छिपी बैठी रहती हैं। आप ही तो हमारे पास खड़े हुए एक सजग प्रहरी की तरह रात- दिन खड़े-खड़े हमारी देखभाल करते हैं। आप हमारे पड़ौसी भी हैं। वह भी  मात्र चार अंगुल की दूरी पर । चार अंगुल की भी कोई दूरी होती है भला। कहिए हम आपकी क्या सेवा कर सकती हैं।" बड़े ही विनम्र भाव से  आँखों ने कान देव का पलक पाँवड़े बिछाते हुए स्वागत किया।

     सीधे -सीधे अपनी बात पर आते हुए कान देव कहने लगे: " क्या बताएँ आपको।हमें तो बस इस आदमी ने लद्दू खच्चर ही बना दिया है।हमारा काम सिर्फ़ सुनने का है। बोझा ढोने का नहीं।कभी हमें छेदन करके उनमें बालियाँ, कुंडल,झुमके, लोंगें और न जाने क्या - क्या लटका दिए जाते हैं। कोई मिस्त्री हुआ तो उसमें घिसी हुई सड़ी- गली पेंसिल ही अटका देता है। गुटका - तम्बाकू के दीवानों ने तो हमें अपना स्टोर रूम ही समझ लिया है ,जो बची -खुची तम्बाकू या गुटके की पुड़िया हमारे अंदर ठूँस देते हैं। उसकी बुरी गंध से तो हमारा दम ही घुटने लगता है।"

        बात का समर्थन करते हुए आँखें बोलीं और कहने लगीं: " आप ठीक ही कहते हैं भैया जी। कभी - कभी हमारी मजबूरी भी आपको परेशान करती होगी । जब हम कमजोर हो जाती हैं और नर- नारी अपने चश्मे की डंडियाँ तुम्हारे ऊपर तान देते हैं और अनावश्यक बोझ डाल देते हैं। पर क्या करें हमें भी अपने स्वार्थ में आपको कष्ट देना ही पड़ता है।"

           "चलो इतना तो चलता है। अगर हम लोग आपस में संवाद नहीं करते तो क्या! एक दूसरे के काम तो आते हैं। एक पड़ौसी भी यदि अपने पड़ौसी के काम न आए तो ऐसा पड़ौसी होना ही बेकार ! पर कभी -कभी   जब चश्मा लगातार लगा रहे तो कष्ट तो होता ही है। पर हम सब सहन कर लेते हैं।क्या हम आपके लिए इतना भी नहीं कर सकते! " कान देव सहानुभति पूर्वक बोले।

" आपका कष्ट देख - देख कर हमारे भीतर से भी पानी बहने लगता है। पर क्या करें ,हम स्वार्थी जो हुईं।" आँखों ने कहा। कान देव थोड़ा - सा फड़फड़ाये ,मानो हँस रहे हों।

        और कहने लगे: "हमारा मुँह नहीं। हमारी जुबान नहीं ।तो इसका मतलब यह थोड़े ही होता है कि हम सबकी बुरी- भली, गाली-गीत, विस्फोट- संगीत, चुगली -प्रशंसा, थाली -ढोल सब कुछ  चुपचाप सुनते रहें। कुछ भी भर दो हमारे भीतर। क्या हमें कंपोस्ट खाद का गड्ढा समझ रखा है इन्होंने! जो अच्छा -बुरा ,गोबर - कीचड़ सब कुछ भर दो। ठीक है सुनना ही हमारा काम है ,क्योंकि हम कान हैं। पर इसका मतलब ये तो नहीं कि ......" और कहते कहते कान देव रुक गए।

पुनः कहने लगे : " हमारी तो किस्मत ही खराब लगती है।बचपन में जब कोई विद्यार्थी पढ़ने -लिखने में अच्छा नहीं होता तो हमें ही मरोड़ दिया जाता है। दोष दिमाग का और ऐंठा जाए हमें। ये भी कोई न्याय हुआ भला! कुत्ते की चोट बिल्ली पर! मास्टर जी भी लगता है ,अक्ल से कुछ- कुछ पैदल ही होंगे। जो आव देखा न ताव हमें खामखां लाल कर दिया! ये भी कोई बात हुई भला !  क्या  दिमाग का पेच हमारे  अंदर लगा हुआ है ?  हम कोई दिमाग के स्विच बटन हैं कि लिया औऱ बस ढिरिंग.........."

आँखों को हँसी आ गई और खुशी के आँसू बहाते हुए बोलीं:" ठीक कहत हौ दाऊ!"

         कान देव कब रुकने वाले थे। कहने लगे :" उधर देखों उन पंडित जी महाराज को। क्या सारी पंडिताई सूत के तीन धागों में ही भरी पड़ी है ,जो एक और अतिरिक्त अनावश्यक बोझे की तरह  शंका निवारण के समय हम पर जनेऊ लाद लिया!  औऱ तो और उसमें तिजोरी की चाबियों का भारी गुच्छा भी टाँग लिया। पंडिताइन घर पर छूट गई थीं ,उनको भी लटका लाते। हम तो थे ही लद्दू खच्चर ! उन्हें भी ढोते रहते! और क्या !" 

घड़ी ने चार बजे का अलार्म ट्रिंग !ट्रिंग !! ट्रिंग! ट्रिंग !!की ध्वनि के साथ बजाया  कान देव ने सुना और आँखें खुल गईं । सपना अब अपना नहीं था।कान देव विदा हो चुके थे।


🪴 शुभमस्तु !

05.11.2022◆8.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...