मंगलवार, 4 अक्तूबर 2022

उनका शगुन बिगाड़ें !अपनी नाक कटवाएँ !🔥 [ व्यंग्य ]

 395/2022 

 ■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■ 

 ✍️ व्यंग्यकार© 

 🙊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 ■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■ 

 दूसरों को देखकर ,जी हाँ, मात्र देखकर जलने लगना ,मानव स्वभाव है।'स्व' अर्थात अपना भाव है।अर्थात यह भाव किसी अन्य का चोरित या अपहृत भाव नहीं ; अपना ही भाव है।इसे दूसरे शब्दों में 'अंतर डाह' की संज्ञा से सुशोभित किया जा सकता है। शब्द के उदर में प्रवेश करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि मानव का यह एक ऐसा 'प्रिय भाव' है ;जिसके बिना उसका 'सुख?' पूर्वक जीना प्रायः दूभर ही हो जाता है।इसलिए यह भाव अर्थात 'अंतर डाह'(अंतर दाह) उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता। सदा उसके साथ ही रहता है। 

      अब आप कहेंगे /कहेंगीं कि भला यह 'अंतर डाह' कहाँ- कहाँ पाया जाता है? तो प्रत्युत्तर में यही कहूँगा कि कहाँ नहीं पाया जाता? 'जहाँ जहाँ पैर पड़े संतन के तहँ - तँह बंटाढार' के अनुसार जहाँ- जहाँ आदमी (औरत भी) तहाँ - तहाँ महाशय 'बंटाढार' अर्थात 'अंतर डाह' अर्थात 'परस्पर जलन' भी मिलना अनिवार्य ही नहीं स्वाभाविक है। अब आपको इसकी विशद व्याख्या करना भी आवश्यक हो गया है कि यह कहाँ-कहाँ,क्यों औऱ कैसे-कैसे पाया जाता है।

     घर से लेकर बाहर,नारी से लेकर नर,गाँव से लेकर नगर -नगर,डगर- डगर, अपने अड़ोस-पड़ोस, परिवार,समाज, देश -देश, सास- बहू,नर -नारी , नारी- नारी (नारि न मोह नारि के रूपा), बहन - बहन, अधिकारी - अधिकारी,नेता नेता, नेत्री - नेत्री, अभिनेता -अभिनेता (उत्तरी ध्रुव का उत्तरी ध्रुव से विकर्षण के कारण),अभिनेत्री -अभीनेत्री (दक्षिणी ध्रुव का दक्षिणी ध्रुव से विकर्षण के कारण),कवि,लेखक ,पत्रकार,कर्मचारी -कर्मचारी, वकील -वकील ,डॉक्टर - डॉक्टर, इंजीनियर - इंजीनियर, ठेकेदार -ठेकेदार, छात्र - छात्र ,शिक्षक -शिक्षक, धनी-निर्धन, महल-झोंपड़ी आदि -आदि ;बल्कि यों कहें कि इस 'अंतर डाह' का कहाँ निवास नहीं है? जहाँ दिल वहीं दिलदार, दिलों की बहार, जो नहीं मानती कभी भी हार। 

   'अन्तर डाह' के व्यापक क्षेत्र को जानने के बाद भी प्रथम दृष्टया यह जिज्ञासा भी स्वाभाविक है कि यह होती ही क्यों है? औऱ यदि नहीं होती तो क्या होता? विचार करने पर ज्ञात होता है कि 'अंतर डाह' किसी सामने वाले को देखकर इसलिए पैदा होती है कि जितनी ऊँचाई इसकी है ,मेरी क्यों नहीं? अब वह प्रयास करके भी उसके समान या उससे बढ़कर नहीं बन सकता ,इसलिए चुपचाप भीतर ही भीतर किसी उपले की तरह सुलगता हुआ अपना धुँआ आप ही ग्रहण करता हुआ जीता रहता है।जिस प्रकार एक अंगारा किसी अन्य वस्तु को जलाने से पूर्व जब तक स्वयं पूरी तरह जलकर खाक नहीं हो जाता ,तब तक किसी को जला नहीं पाता।इस प्रकार नर और नारी भीतर ही भीतर सुलगते रहते हैं।सामने वाले के समान हो नहीं पाते और सुलगकर तसल्ली का सुख लेते हुए जीने को विवश होते हैं। 

   कोई यदि यह कहे कि क्या यह अदृश्य आग दिखाई भी देती है?जी हाँ, कुछ लोगों की वार्ता, कृत्य और कुछ लोगों की आँखों में स्पष्ट दिखाई भी देती है। जिनकी आँखों में दिखाई नहीं देती ,वह बहुत भयंकर ईर्ष्यालु होता है औऱ कभी भी ईर्ष्या वश कुछ ऐसा कर बैठता है कि वह सामने वाले का अहित करने पर उतारू हो जाता है।बाँझ स्त्री किसी के बच्चे को जहर दे देती है, मरवा देती है या उसी स्त्री के साथ ऐसा टोना- टोटका भी करवाती है कि उसका किसी न किसी प्रकार से अहित हो ही जाए। अपना कूड़ा - कचरा दूसरे के घर के पास फेंकना भी 'अंतर डाह' का एक प्रतिफल है। 

    ज्यों-ज्यों मानव विकास की सीढ़ियों पर चढ़ता जा रहा है,उसी क्रम में यह 'अंतर डाह'(ईर्ष्या ) ,की वृत्ति भी बढ़ती चली जा रही है। जिसका कहीं भी कोई अंत नहीं है।यदि यह नहीं होती तो स्वर्ग की खोज के लिए अन्यत्र नहीं जाना पड़ता। इस 'अंतर डाह' ने धरती पर साक्षात नरक का निर्माण कर दिया है।यूक्रेन से रूस 'अंतर डाह'रखता है ,जिसका परिणाम सामने है। चीन ,पाकिस्तान और भारत के अंतर संबंध जग जाहिर हैं,कि यहाँ कभी भी अमन चैन की वंशी कृष्ण कन्हैया का देश होने के बावजूद नहीं बज सकती।जब वंशी बजते -बजते हुए भी महाभारत का युद्ध भी होकर रहा ,तो अब तो मात्र वंशी ही रह गई है। वह वंशीधारी कृष्ण का वंश ही नहीं रहा। 

    हर व्यक्ति की 'अंतर डाह' के अलग -अलग कारण हो सकते हैं,जो किसी सूक्ष्मदर्शी यंत्र के बिना देखे नहीं जा सकते। ये पृथक शोध का विषय है कि किसी की किसी से 'अंतर डाह' है ही क्यों? वह अवश्य ही किसी न किसी रूप में उसके मन को शांति ही देती होगी।

     यदि सामने वाले का शगुन बिगड़ जाए तो आदमी अपनी नाक को भी सहर्ष कटवाने को तैयार बैठा रहता है।सोचिए ऐसे समाज सेवी, 'देशभक्त?' मानव भक्त, आदि से क्या कोई सकारात्मक आशा की जा सकती है? मुखौटे लगाकर ये सभी केवल कोरा स्वांग दिखाते हैं।ये जनहित , समाजहित औऱ देशहित कदापि नहीं कर सकते।ओट में अपने लिए कुछ अर्जन करना ही इनका लक्ष्य होता है।

     प्रसंगवश एक रोचक जानकारी से अवगत कराना भी व्यंग्यकार अपना धर्म समझता है।वह यह है कि स्व- शोध के अनुसार निष्कर्ष यह है कि पुरुषों की अपेक्षा नारियों में इस 'महाभाव ?' की मात्रा,भार,संख्या,लंबाई , चौड़ाई और ऊँचाई बहुत अधिक होती है।हो सकता है कि कुछ 'महानारियाँ' यह बात पढ़कर मुझे भी अपनी 'अन्तरडाह' का पात्र मान लें। कोई बात नहीं, किंतु यह व्यंग्यकार सचाई कहने में किसी से भी डरता नहीं है ,तो आपसे ही भला क्यों डरे!आप तो किसी की सुंदर साड़ी देखकर ही सुलग उठती हैं,और पति को येन- केन -प्रकारेण वैसी ही नहीं ,उससे भी बेहतर साड़ी क्रय करने को बाध्य कर देती हैं।पड़ोसिन के गले में स्वर्ण हार देखकर आपके भीतर का ज्वालामुखी अब फटा कि  तब फटा की स्थिति में होने लगता है।खाना-पीना,खाना, बनाना ,देना ;सब बंद करते हुए 'गृह - हड़ताल' में पतिदेव का तबला नहीं, तसला बजा डालती हैं। करवा चौथ तभी मनेगी ,जब वैसी साड़ी आएगी। अन्यथा मैं खाना खा लूँगी औऱ ! फिर मेरी ओर से आपकी कोई  गारंटी  - वारंटी  नहीं। 

       हृदय -हृदय में निवास करने वाली 'अंतर डाह' से बड़े -बड़े ज्ञानी, प्रकांड पंडित, साधु- संत,ज्ञान के सागर भी नहीं बच पाए।यह हर एक आम और खास में समान रूप से पाई जाती है। देवी- देवताओं में होती है अथवा नहीं, इसका अनुभव मानव होने के नाते अभी कर नहीं पाया।यदि मानव से देवता हो जाता तो संभवतः इसकी अनुभूति अवश्य हो जाती। क्योंकि आप सबकी तरह कुछ न कुछ मात्रा में मैं व्यंग्यकार भी तो 'अंतरडाह' का कृपा पात्र हो सकता हूँ। कभी न कभी मेरे अंतर में भी जागती होगी।इस बार जब जागेगी तो अवश्य उसे पकड़ कर झकझोर दूँगा औऱ पूछूंगा कि यहाँ भी   तू आकर अपना आसन जमाने लगी? चल दूर हट, बाहर निकल जा मेरे भीतर से। मैं तुझे दुत्कारता हूँ। धिक्कारता हूँ। 

 🪴 शुभमस्तु !

 04.10.2022◆11.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य। 


 

सोमवार, 3 अक्तूबर 2022

परहित से जीवन बगिया है! 🪴 [ गीतिका ]

 394/2022

  परहित से जीवन बगिया है! 🪴

             [ गीतिका  ]

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

जिसने     जग   -   विष  सदा पिया     है।

मानव        बन  कर       वही  जिया   है।।


अपना        उदर       श्वान     भी      भरते,

दाता    जन       का      वृहत   हिया     है।


दिया       अहर्निश       उसने  जल     को,

फिर        भी        कहलाती   नदिया     है।


परछिद्रों           में         अँगुली         डालें,

किंतु       साधु       ने     फटा  सिया     है।


इधर      -       उधर    ताकाझाँकी     क्यों,

सत्कर्मी          ने          कर्म   किया      है।


बुरा          देखता          है     औरों     का,

जीवन    भर    वह      नर       दुखिया   है।


'शुभम्'       सुगंधों       से सुरभित     कर,

परहित       से          जीवन   बगिया     है।


🪴शुभमस्तु !


03.10.2022◆7.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

नदिया देती नीर अहर्निश 🏞️ [ सजल ]

 393/2022

  

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

समांत : इया।

पदांत : है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन : शून्य।

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

जिसने     जग   -   विष  सदा पिया     है।

मानव        बन  कर       वही  जिया   है।।


अपना        उदर       श्वान     भी      भरते,

दाता    जन       का      वृहत   हिया     है।


दिया       अहर्निश       उसने  जल     को,

फिर        भी        कहलाती   नदिया     है।


परछिद्रों           में         अँगुली         डालें,

किंतु       साधु       ने     फटा  सिया     है।


इधर      -       उधर    ताकाझाँकी     क्यों,

सत्कर्मी          ने          कर्म   किया      है।


बुरा          देखता          है     औरों     का,

जीवन    भर    वह      नर       दुखिया   है।


'शुभम्'       सुगंधों       से सुरभित     कर,

परहित       से          जीवन   बगिया     है।


🪴शुभमस्तु !


03.10.2022◆7.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शनिवार, 1 अक्तूबर 2022

शारदा - स्तुति 🪷 [ गीतिका ]

 392/2022

    

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम् '

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

मातु         शारदे  !     उर   बस   जाओ।

कवि  - भावों    में   शुचि   रस     लाओ।।


शब्द   -  शब्द      हो      जन   हितकारी,

मंगलकारी                  जस    बरसाओ।


'शुभम्'           तुम्हारा     नन्हा    साधक,

वीणा          उसको        सरस   सुनाओ।


सबका            हो        कल्याण    निरंतर,

स्मिति      से        जन  -  जन   हँसवाओ।


हों         नीरोग      जगत      के      प्राणी,

शांति  -  सुधा    माँ  बन   अस      आओ।


विश्वा,             महाबला ,      माँ     वसुधा,

रमा,           परा,         वरप्रदा    सजाओ।


शिवा ,          वैष्णवी,         हे  ब्रह्माणी !

शुभदा             'शुभम्'     सु-पद     बैठाओ।


🪴शुभमस्तु!


01.10.2022◆5.15 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 29 सितंबर 2022

हम महान! हमारा देश महान!🙉 [ व्यंग्य ]

 391/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ व्यंग्यकार ©

⛳ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

अपनी पीठ आप ही थपथपाना हमारा स्वभाव है।जिसे मुहावरेदार भाषा में कहें तो कहा जायेगा तो मियाँ मिट्ठू बनना ही कहेंगे।हम अपने समाज, देश और राष्ट्र की परंपराओं और मनमानियों को महान मानने के आदी हैं।इसीलिए हम महान देश के महान नागरिक हैं।अब जब हमारा देश महान है ,तो हम भी इसी देश के वासी होने के नाते महान ही हुए।हमारी हजारों लाखों महानताओं  के हजारों लाखों निदर्शन परोसे जा सकते हैं ,जो हमारी बहुमुखी गौरव वृद्धि में चार नहीं चौवन चाँदों की चाँदनियों का चमत्कार चमका सकते हैं।

धरती से आसमान तक और सागर से पर्वत तक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है ,जहाँ हमारी 'महानता' न बरसती हो!अब ज्यादा पीछे औऱ दूर जाने की आवश्यकता नहीं है कि अभी कुल जमा डेढ़ महीने पहले की ही बात है कि सरकार नेतेरह से पंद्रह अगस्त तक देश की  स्वाधीनता की स्वर्ण जयंती के शुभ अवसर पर प्रत्येक भारतीय को अपने घर,वाहन आदि पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए अनुमत किया था।किंतु इसका परिणाम क्या निकला?वह हम सबके सामने है।वे तिरंगे झंडे आज तक ससम्मान उतारे नहीं गए हैं। झंडा फहराना एक पावन पर्व नहीं, शौक बनकर कर आदमी की मनमानी का प्रतीक बन गया है।लोगों की छतों, पानी की टंकियों, ट्रैक्टरों,मेटाडोरों, ऑटो रिक्शाओं, ट्रकों आदि पर आज तक लहरा फहरा रहे हैं। जिस देश के नागरिकों को अपने कर्तव्यों का भान तक नहीं ,वहाँ ज्ञान का  भानु   भला कैसे उदित हो सकता है? देश के 'महान'वासियों की 'महानता' का इससे अच्छा नमूना भला मिलेगा भी कहाँ? झंडा फैशन होकर रह गया है। 

इस महान देश में बिना कुर्सी के  न तो समाज सेवा हो सकती है और न ही देश सेवा। इसलिए कुर्सी पाने के लिए कितने भी नीचे उतर जाने में सेवार्थीयों को कोई हिचक नहीं होती।सेवा से मेवा मिलती है, यह भला कौन नहीं जानता! लेकिन दिखाया यही जाता है कि हम तो तन, मन और स्व- धन से भी देश ,धर्म और समाज की सेवा करने को अहर्निश तत्पर हैं। यही समाज और देश सेवक कुछ ही अवधि में खाक से लाख करोड़ में गिल्ली - डंडा खेलने लगते हैं।

धोती कुर्ता ,साड़ी ब्लाउज के युग से लेकर हमने आज 'कपड़े-फाड़ -फैशन'  के युग में धड़ल्लेदार एंट्री कर ली है।अब शील,सादगी और सदाचार पिछड़ेपन की निशानी मानी जाने लगी है।इसलिए  'देह दिखाऊँ' प्रदर्शन की होड़ में हमने पश्चिम को भी पीछे छोड़ दिया है। नंगापन हमारी अत्याधुनिकता औऱ फेशनीय   प्रतियोगिता का मानदंड है। जो जितना देह से नंगा है ,उतना ही प्रगतिशील और महान है।अपनी परम्परागत संस्कृति औऱ सभ्यता को पीछे छोड़कर 'घुटना छू' सभ्यता हमारे गौरव गान का    महाचरण है।अपनी भाषा और  मातृभाषा को छोड़कर अंग्रेज़ी बोलना या दो चार शब्दों के  अधकचरे ज्ञान के बल पर काला अंग्रेज बनने   में हमें शर्म नहीं आती।वह गिटपिट ही हमारी योग्यता का मानक है। 

मुझे  स्वदेश में ऐसा कोई क्षेत्र दिखाई नहीं देता है ,जहाँ हमारी 'महानता' के डंके बजते हुए सुनाई न दे रहे हों। शाकाहारी से मांसाहारी होना, मधुशाला की शोभा बढ़ाना या घर को ही मधुशाला बना देना भी हमारी महानता के महत्त्व को  बढ़ाता है।निरन्तर बढ़ते हुए वृद्धाश्रम  देश की 'महान' 'आज्ञाकारी संतानों? और उनकी 'देवी? स्वरूपा' पत्नियों के 'महान' चरित्र की दुंदुभी बजाता हुआ विश्व विख्यात है।विवाह होते ही देश की  ये महान 'देवियां?' अपने सास- ससुर को बर्दाश्त नहीं कर पातीं। इसलिए वे उन्हें बाहर का रास्ता दिखाते हुए अपना विलासिता पूर्ण जीवन निर्विघ्न रूप से बिताती हैं।देश के नागरिको की 'महानता' के जितने भी गीत गाए जाएँ, कम ही हैं।

हमारी 'धर्म भीरुता' में हमसे कुछ भी करवाया जा सकता है। यहाँ तक कि रोग,भूत ,प्रेत, जिन्न,सबका समाधान यहाँ टोने-टोटके और ताबीजों के बीजों में अंकुरित होता है।ये क्या कुछ कम 'महानता' की बात है,जहाँ मेडिकल साइंस भी असफल हो जाए, वहाँ हमारे तांत्रिक ,यांत्रिक ,मांत्रिक ही रोगों को छूमंतर कर दें।लाखों का काम चुटकी भर भस्मी भभूत से हो जाए औऱ भूत का पूत तो क्या दादा परददा भी हमेशा के लिए विदा हो जाएँ,इससे महान उपलब्धि और क्या होगी? धर्म की अफ़ीम ने जनता जनार्दन को क्या कुछ नहीं दिया। ये वह सिंहासन है जहाँ बड़े -बड़े राजे - महाराजे आई.ए. एस. ;पी .सी.एस. भी  नतमस्तक हैं।दंडवत प्रणाम करते हैं और चुनाव जीतने के लिए उनके पाँव धो -धो कर पीते हुए देखे नहीं जाते ,छिप-छिपाकर पी आते हैं। 

इस महान देश की उर्वरा भूमि में नेता सदैव से 'महान' ही पैदा हुए, हो रहे हैं और यही हाल रहा तो होंगे भी।विधान नियामक होकर भी विधान भंग उनका नित्य का नियमित नियम है।पहले स्वयं, उनका परिवार,  इष्ट मित्र ,जाति  और बाद में कुछ और।पहले अपनी सत्रह पीढ़ियों का पूर्ण प्रबंध प्राथमिकता में होना ही है। वे भी तो देश के आदर्श नागरिक हैं , यदि वे स्व-उदर पोषण ,शोषण ,चूषण के लिए कुछ 'इधर - उधर' कर लेते हैं ,तो बुरा ही क्या है!यह भी तो देश सेवा ही है। 

देश की जनता शिक्षित हो या न हो ,इसकी चिंता वे क्यों करें। उन्हें तो अपनी संतति को विदेश में पढ़ने- लिखने का पूरा इंतजाम करना है।तथ्य तो यही है कि जनता जितनी पिछड़ी , निरक्षर ,रूढ़िवादी हो उतना ही अच्छा।इससे देश में नेतागिरी चमकाने का सुअवसर मिलता है औऱ पिछलग्गू जनता गड्ढे खोदने, बल्लियाँ गाड़ने ,बैनर लटकाने ,दरियां बिछाने,टेंट लगाने, प्रचार करने जैसे महान कार्यों में लगी रहती है।जब नारों से   ही बहारों का प्रबन्ध हो जाए , फिर और कुछ करने की आवश्यकता भी क्या है ? राजनीति वह मीठी मादक माधुरी है कि हर व्यक्ति इसे बुरा बताकर भी इससे गलबहियाँ करने को सुमत्सुक दिखाई देता है। यह राजनीति की 'महानता ' का 'महान' प्रमाण है।

सारांशत: यही कहा जा सकता है कि  ',महानता' हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है;जिसे हमसे कोई भी नहीं छीन सकता। हर क्षेत्र में हमने अपनी प्रचंड 'महानता' के अखंड झंडे गाड़े हैं, भले ही गाड़कर उन्हें गलने ,सड़ने, उड़ने और उधड़ने के लिए उनके अपने ही डंडे के सहारे छोड़ दिया हो।हमें उन्हें पुनः उन्हें मुड़कर देखने की फुर्सत ही कहाँ है ? हम तो वहीं हैं ,जहाँ हमारे भारतवर्ष की आत्मा है। अब आत्मा तो अदृश्य,अविनाशी, सूक्ष्म औऱ सारे देश - गात में व्याप्त है।उसे खोजने की कोशिश भी मत करना।हम सब महान हैं, तो हमारा देश हमारे ही बलबूते पर  महान है।

🪴 शुभमस्तु !

२९.०९.२०२२◆ १२.३० पतनम मार्तण्डस्य।

🙊🙈🙊🙈🙊🙈🙊🙈🙊

झंडारोहण -परीक्षा!' 🙉 [अतुकान्तिका]

 390/2022




■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

'झंडारोहण- परीक्षा' 

हुई देशवासियों की,

परिणाम भी

देख लिया सबने,

पचास प्रतिशत से

भी अधिक 

असफल ही रहे,

इनकी देशभक्ति की

'अति' की कौन कहे!


जानते नहीं

ये देश आजाद है !

कोई भी काम

करने की 

क्या कोई मरजाद है?

कानों में तेल

आँखों पर हरी पट्टी,

यही तो गई है

पिलाई इन्हें जन्मघुट्टी!


टाँग दिया!

बस टाँग ही दिया,

तिरंगा घर की छत

ट्रैक्टर, जल टंकी पर,

दृष्टि क्यों जाएगी अब

ध्वज नोंचते हुए

मंकी पर,

झुके,फटे,मैले

तिरंगे ,

वर्षा- जल में नहा रहे

हर - हर गंगे,

बस यहीं पर

हम भारतीय हो लिए

ऊपर से नीचे तक

 पूर्णतःनिर्वस्त्र नंगे!


क्या यही राष्ट्रभक्ति है?

तिरंगे के प्रति

अनुरक्ति है!

परीक्षा भी हो चुकी,

परिणाम है सामने,

खोल देख लें नयन,

क्या किया है आपने!

डेढ़ महीने के बाद

छत, टेम्पो, ट्रेक्टर पर

तिरंगा लहरा रहा है,

हिंदुस्तान का ये

'तथाकथित देशभक्त',

अंधा और बहरा रहा है!

अरे !देख भी ले 

तेरी भी छत पर

सरकार का 'आदेश'

अभी भी गहरा रहा है।


राष्ट्रध्वज का अपमान!

देश का अपमान!

सो रहा भारतीय

लंबी-सी चादर तान,

जानता ही नहीं

राष्ट्रध्वज की 

आचार संहिता,

लगा जो बैठा है

 'स्व-सद्बुद्धि' को पलीता!

यही तो तेरे भविष्य का

दर्पण !

क्या यही  है  तेरा

देश को समर्पण ?

स्वाधीनता का है

अंध -चर्वण !

क्या कर ही दिया

श्राद्ध पक्ष में

स्व- विवेक का तर्पण ?

यह तो  है एक निदर्शन,

अंधेरगर्दी का दर्पण ।


🪴 शुभमस्तु !


२९.०९.२०२२◆६.३०आरोहणम् मार्तण्डस्य।

✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

'झंडारोहण- परीक्षा' 

हुई देशवासियों की,

परिणाम भी

देख लिया सबने,

पचास प्रतिशत से

भी अधिक 

असफल ही रहे,

इनकी देशभक्ति की

'अति' की कौन कहे!


जानते नहीं

ये देश आजाद है !

कोई भी काम

करने की 

क्या कोई मरजाद है?

कानों में तेल

आँखों पर हरी पट्टी,

यही तो गई है

पिलाई इन्हें जन्मघुट्टी!


टाँग दिया!

बस टाँग ही दिया,

तिरंगा घर की छत

ट्रैक्टर, जल टंकी पर,

दृष्टि क्यों जाएगी अब

ध्वज नोंचते हुए

मंकी पर,

झुके,फटे,मैले

तिरंगे ,

वर्षा- जल में नहा रहे

हर - हर गंगे,

बस यहीं पर

हम भारतीय हो लिए

ऊपर से नीचे तक

 पूर्णतःनिर्वस्त्र नंगे!


क्या यही राष्ट्रभक्ति है?

तिरंगे के प्रति

अनुरक्ति है!

परीक्षा भी हो चुकी,

परिणाम है सामने,

खोल देख लें नयन,

क्या किया है आपने!

डेढ़ महीने के बाद

छत, टेम्पो, ट्रेक्टर पर

तिरंगा लहरा रहा है,

हिंदुस्तान का ये

'तथाकथित देशभक्त',

अंधा और बहरा रहा है!

अरे !देख भी ले 

तेरी भी छत पर

सरकार का 'आदेश'

अभी भी गहरा रहा है।


राष्ट्रध्वज का अपमान!

देश का अपमान!

सो रहा भारतीय

लंबी-सी चादर तान,

जानता ही नहीं

राष्ट्रध्वज की 

आचार संहिता,

लगा जो बैठा है

 'स्व-सद्बुद्धि' को पलीता!

यही तो तेरे भविष्य का

दर्पण !

क्या यही  है  तेरा

देश को समर्पण ?

स्वाधीनता का है

अंध -चर्वण !

क्या कर ही दिया

श्राद्ध पक्ष में

स्व- विवेक का तर्पण ?

यह तो  है एक निदर्शन,

अंधेरगर्दी का दर्पण ।


🪴 शुभमस्तु !


२९.०९.२०२२◆६.३०आरोहणम् मार्तण्डस्य।

जनता आज्ञाकारी? 🪷 [ गीत ]

 389/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

छत - छत पर फहराते झंडे,

जनता आज्ञाकारी ?


एक  बार   आदेश  हो  गया,

चादर  तानी  सोया!

लगा राष्ट्र ध्वज छत टंकी पर,

राष्ट्रभक्ति  में खोया,

यही  यहाँ  आजादी,

तानी   रेशम   खादी,

भारत माँ का  भक्त  अनौखा,

लगता विस्मय भारी।


होता हो  अपमान  ध्वजा का,

नहीं   भक्त  ने सोचा,

रुई   ठूँस   ली   है   कानों  में,

रुचिकर लगता लोचा,

पत्रकार सब सोते!

बीज दाह के बोते!!

पट्टी   बँधी   हरी  ऑंखों  पर,

हुई   रतोंधी  तारी।


बीत  गया अब  डेढ़ मास भी,

झंडा -  भक्त अनौखे,

मैले,  फटे,   झुके   हैं    झंडे,

किसको  देते धोखे?

हैं   सब   कोरी बातें,

दिन भी इनको रातें,

बीट   कर  रहे   कौवे   काले,

देशभक्ति   बीमारी !


इनको   क्या   दिखला पाएंगे,

 भारत माँ की झाँकी?

करते नित अपमान ध्वजा का,

उन्हें शपथ है माँ की,

घर में   रखें  तिरंगे,

न हों और  भी नंगे,

'शुभम्' स्वांग भी देख लिया अब,

कैसी भक्ति तुम्हारी।


🪴 शुभमस्तु !


२८.०९.२०२२◆१०.००

पतनम मार्तण्डस्य।

कविता का आशीष🎸 [ दोहा ]

 388/2022


[कृतार्थ,कलकंठी, कुंदन,गुंजार,घनमाला ]

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🎸 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

    ⛳ सब में एक ⛳

वीणावादिनि ने किया,मानव वही  कृतार्थ।

कविता का आशीष दे,'शुभम्' जगत परमार्थ

सुत कृतार्थ  होता  वही,जो  देता  सम्मान।

मात-पिता  वे धन्य हैं, जिनकी शुभ संतान।।


कलकंठी की गूँजती, ध्वनि मीठी चहुँ ओर।

नृत्य करें  वन  बाग में,घन आवाहक  मोर।।

कलकंठी बाला सुघर,कर्षित करती ध्यान।

अनायास  पलकें  उठीं, भूल गया  संधान।।


कुंदन- सी नव देह की,देखी ज्यों ही ओप।

यौवनांग  छू  धन्य  तन,छूमंतर हो  कोप।।

संतति कुंदन-सी बने,जनक जननि की चाह

जो सुनता कहता वही,वाह! वाह! ही वाह!!


भौंरे   की गुंजार- सी, पायल  की  झंकार।

घर में भरती प्यार की,वीणा की  स्वरधार।।

द्रवित कौन होता नहीं,सुन अलि की गुंजार।

घर हो  बगिया  नेह की,बरसे नारी - प्यार।।


घनमाला होती विदा,देख शरद  का  नेह।

ओस  बरसती  शून्य से,बिंदु न बरसे   मेह।।

नीलांबर हँसने लगा,खिली धूप की  कांति।

घनमाला जाती दिखी,निर्मल सुखद सुशांति


             ⛳ एक में सब ⛳


घनमाला को देखकर, कलकंठी - गुंजार।

देती 'शुभम्' कृतार्थ कर,कुंदन-सा उपहार।


🪴 शुभमस्तु!


२८.०९.२०२२◆६.००आरोहणम् मार्तण्डस्य। 

सोमवार, 26 सितंबर 2022

माता द्वार हमारे आओ 🪷 [बाल गीतिका]

 387/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

माता           द्वार         हमारे    आओ।

घर      भर     में        उजियारे   लाओ।


हमें          चाहिए     विद्या     का  बल,

कृपा       -      क्षीर       धारे बरसाओ।


अंबर      में        रहते       हैं       जितने ,

वे       सब     शुचि       तारे  चमकाओ।


जग         जननी      महिषासुर   मर्दिनि,

अरिदल         पर         आरे  चलवाओ।


शैलसुता                  माँ   ब्रह्मचारिणी,

हमें     न         दैत्य        प्यारे     आओ।


चंद्रघंटिका           माँ      घंटा   -  ध्वनि,

अंबर         मध्य           उभारे     छाओ।


महाशून्य              में    कुष्मांडा       माँ,

छाए           हैं          अँधियारे       ढाओ।


हे            माते !         स्कंद      चतुर्भुज,

कात्यायनि       न्यारे     गुण       गाओ।


कालरात्रि           माँ   गौरी       शोभन,

सिद्धिदात्रि          माँ    द्वारे        आओ।


'शुभम्'        साधना      करता  माँ     की,

माँ       के       सब      जयकारे    गाओ।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०९.२०२२◆०१.०० पतनम् मार्तण्डस्य।

यदि मैं वानर होता 🐒 [बाल गीतिका]

 386/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🐒 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■


यदि         मैं         कोई      वानर     होता।

पेड़ों        पर        मेरा        घर      होता।।


उछल   -   कूद     मैं    करता  दिन      भर,

भीग    मेह       में         मैं     तर     होता।


खम्भा            पकड़       हिलाता      भारी,

सबल      देह         मेरा      कर       होता।


इस       डाली        से     उस डाली      पर,

खाता       दल      फल     वनचर      होता।


कोई             मुझे         खिलाता       केले,

नर   -  नारी       का      मैं     डर     होता।


मंदिर            में         बेधड़क       घूमता,

मैं       हनुमत      का     अनुचर      होता।


'शुभम्'          न      बंधन  होते      इतने,

मनुज       नहीं       यदि     बंदर      होता।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०९.२०२२◆११.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


ईश रहित क्या कण- कण होता? 🌳 [ गीतिका ]

 385/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

ईश   रहित     क्या      कण - कण  होता?

ऐसा          भी         कोई    क्षण   होता??


सुखद        शांति        नित   सद्भावों   से,

दुर्भावों          से           ही     रण    होता।


मात     -    पिता      गुरुजन    से     कोई,

मुक्त    न    मानव  -   ऋण -  कण   होता।


बाहर         देख        रहा      तू    मुखड़ा,

मन      के         भीतर     दर्पण     होता।


आते           नहीं       बुरे       दिन      तेरे,

प्रभु        को        सहज   समर्पण   होता।


सोच    समझ     जीवन - पथ  पर    चल,

नहीं     दाँव     का       ये    पण     होता।


'शुभम्'    भिन्न        नर  पशु - पक्षी      से,

प्रभु    -   पद   में        उर   अर्पण    होता।


🪴शुभमस्तु !


२६.०९.२०२२◆७.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


मन के भीतर दर्पण होता 🦢 [ सजल ]

 384/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

समांत :  अण ।

पदांत :   होता।

मात्राभार  :16.

मात्रा पतन: शून्य।

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार  ©

🦢  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

ईश    रहित     क्या      कण - कण  होता?

ऐसा           भी         कोई     क्षण   होता??


सुखद         शांति        नित   सद्भावों   से,

दुर्भावों          से           ही     रण    होता।


    मात     -    पिता        गुरु     पूजनीय     नित  ,

मुक्त           न     कोई    ऋण -  कण   होता।


बाहर           देख         रहा       तू    मुखड़ा,

मन      के           भीतर       दर्पण     होता।


आते            नहीं        बुरे       दिन      तेरे,

नहीं     मनुज     का      मुख   फण    होता।


सोच    समझ      जीवन - पथ  पर    चल,

नहीं     दुखों        का    प्रसवण       होता।


'शुभम्'     भिन्न        नर  पशु - पक्षी      से,

प्रभु    -    पद   में        उर   अर्पण    होता।


🪴शुभमस्तु !


२६.०९.२०२२◆७.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शनिवार, 24 सितंबर 2022

हेल सिलासी - नीति 🐗 [दोहा गीतिका ]

 383/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🦋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

हेल सिलासी नीति के, पोषक पालनहार।

कर सकते क्या देश का,सोचें बेड़ा  पार??


कोरे  नारों  से  नहीं, होता कभी  विकास, 

फसल बचाने के लिए ढम -ढम  है बेकार।


दीमक चुन-चुन खा रही,राष्ट्र वृक्ष की मूल,

बिल में जनता -धन भरे,चूहे करें   विचार।


जनता  रहे  गरीब  ही,शिक्षा से     रह   दूर,

बसी  हृदय  में  भावना,  जो थामे  पतवार।


गिद्ध   नोचते  लोथ   को, जिंदा चीरें   माँस,

तिलक ,छाप,माला सजी,धर्मों का  व्यापार।


बिना  चढ़ावे   के चढ़े, देवालय  -   सोपान,

द्वार   पुजारी   रोकते,  भक्त  हुए    लाचार।


जागी यदि जनता कहीं,होगी भीषण  क्रांति,

इसे   सुलाये  ही  रखें, या  कर  दें  बेजार।


सही  लाभ   देना  नहीं,जनता रहे    अपंग,

बस  वैशाखी  बाँट कर,दें दुख को   निस्तार।


इथोपिया  को  हैल  का,  देकर   रूपाकार,

हेल सिलासी भोगता,स्वयं सुखों  का   सार।


नाव  चलाने  के  लिए, सीखो गुर  हे   मीत!

'शुभम्'सभी को खुश नहीं,यों रख पाओ यार


# हेल सिलासी इथोपिया का सम्राट था।जिसकी नीति जनता को गरीब,बीमार,दुखी,अशिक्षित और बेवश रखकर शासन करने की थी।जनता जब जागरूक हुई तो वह एक कैदी की तरह मरा।


🪴शुभमस्तु !


२४.०९.२०२२◆ २.३० पतनम मार्तण्डस्य।

हेल सिलासी 🤴 [ दोहा ]

 381/2022


  

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🤴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

जनता  रहे  गरीब  ही, तानाशाही   सोच।

हेल  सिलासी ने कहा,उचित देश हो पोच।।

भरे  पेट जनता  करे,  ऊँचा अपना  शीश।

हेल सिलासी सूत्र है, मानव हो ज्यों कीश।।


जनता  को  शिक्षा न  हो,रहे हीन   बेकाम।

हेल  सिलासी  चाहता,उसको तब  आराम।।

हेल  सिलासी   हो  गया, वंशज   तानाशाह।

हैल  बनाया  देश  को,भरती जनता  आह।।


शिक्षा, काम,निरोगता,उचित नहीं हैं  आज।

हेल  सिलासी  के  लिए,हो जाएगी   खाज।।

पढ़े - लिखे  नीरोग  जन,  करें बखेड़े  नित्य।

हेल सिलासी  मानता, यह उत्तम  औचित्य।।


जनता का सुख कष्ट दे, सत्तासन  की  चूल।

हिल जाती यदि हेल की,उखड़ पलटती मूल

क्यों चाहे जन क्रांति हो,कोई शासक हेल।

डगमग आसन हो नहीं,चलने दें यह खेल।।


सत्ता के  सब  खेल हैं,अहंकार  के  दास।

हेल सिलासी के लिए,क्यों आए सुख रास।।

जनता का जीवन रहे, अंधकार का  कोष।

हैल  उचित उनके लिए,हेल सिनासी  रोष।।


हेल सिलासी  जो बना,उसका होता  नाश।

जनता  जब  जागे तभी,देती उसे  तराश।।

इथोपिया का  क्रूरतम, हेल सिलासी  नाम।

जनता-अरि  सम्राट ये,बना देश को झाम।।


🪴शुभमस्तु !


२३.०९.२०२२◆९.१५आरोहणम् मार्तण्डस्य।

रोटी🟤 [अतुकांतिका]

 380/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

गोल - गोल रोटी के

चारों ओर

चक्कर लगाता संसार,

सबसे अधिक उसे

रोटी से प्यार,

शेष सब 

रोटी के बाद,

 रोटी की ही

 सर्वाधिक तकरार।


आदमी, आदमी के

खून का प्यासा !

क्या मात्र रोटी के लिए?

महल अट्टालिकाएं

कंचन नोटों के खजाने

क्या मात्र रोटी के लिए?


भरे हुए पेट वाले

कब बैठे हैं 

शांति से?

रोटी के बहाने

भटके हैं

भ्रांति से।


सब जीते हैं

अपने - अपने ढंग से,

पेट का गड्ढा

रट लगाता है

और - औऱ के लिए,

कोई -कोई जीता है

अपनी सात -सात 

पीढ़ी की रोटी के लिए,

क्या पता 

उसकी भावी पीढ़ी

अकर्मण्य तो नहीं,

इसलिए वे

जमाते हैं उनके लिए

गाढ़ा - गाढ़ा दही।


पेट तो

कुत्ते भी भर लेते हैं,

परंतु कुछ निकम्मे

कुत्तों को भी

पीछे छोड़ देते हैं,

उन्हें अपने 

पेट को भी

भरा नहीं जाता,

महाकुत्तेपन में

कोई कुत्ता उन्हें

हरा नहीं पाता!


परजीवी बनना

उनकी पहचान है,

निकम्मापन

उनका निशान है,

छीन कर

 रोटी निगलने पर

उनका पूरा ध्यान है।


गोल- गोल रोटी

क्या कुछ नहीं कराती,

आदमी को आदमी से

हैवान बनाती,

मानव देह में

बैठा जो हुआ है

नरभक्षी भेड़िया,

एक नहीं

हजारों मिलते हैं,

जो अपनी रोटी के लिए

दूसरों को दलते,

 निगलते हैं।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०९.२०२२◆७.४५ प.मा.

मुखड़ा क्या देखे दर्पण में ! 🪞 [ व्यंग्य ]

 381/2022


 ■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■ 

 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🪞 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 ■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■ 

 मानव शरीर के साथ-साथ मानव - समाज में भी देह से अधिक मुखड़े की महत्ता है।दूसरे शब्दों में कहना ये चहिए कि मुखड़े की सत्ता है।वरना इस तीन हाथ के देह को कौन पूछता है! विवाह के बाद वधू के श्वसुरालय में शुभागमन होने पर इस मुखड़े के दर्शन के लिए ही मूल्य अदा करना पड़ता है। 'मुँह - दिखाई 'भी एक रस्म बनकर चेहरे की चमक में चौदह चाँद चमका देती है।यहाँ तक कि उसके पति महाराज को भी पहली बार 'मुख - दर्शन' के लिए कुछ उपहार से उपकृत होना पड़ता है।जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत मुखड़े की महत्ता बनी ही रहती है। शेष देह को भला पूछता ही कौन है? यही कारण है कि मृत शरीर का मुख देखकर तसल्ली कर ली जाती है कि मरने वाला वही है ,कोई अन्य नहीं है। मुखड़े की तुलना में सारे शरीर की इतनी अवहेलना कहीं नहीं देखी गई। विवाह से पहले अथवा लड़की दिखाने से पहले भी 'सौंदर्य निखार केंद्रों' पर हजारों का चूना लगाकर प्राथमिकता स्वरूप चेहरा ही चमकाया जाता है।शेष शरीर से मैच करे अथवा न करे।मुखड़ा हसीन होना चाहिए।भले ही ऊँट के गले में बकरी लटका दी जाए।

 मानव जाति में विशेषकर नारी वर्ग के लिए मुखड़े का सर्वाधिक महत्त्व है। लगता है कि दर्पण की खोज भी किसी नारी अथवा नारी प्रेमी ने ही की होगी ताकि वे अपना अधिकांश समय दर्पण को समर्पित कर सकें।अतः सजना उनकी प्राथमिकता में है। भले ही बाबा तुलसी दास जी 'नारि न मोह नारि के रूपा' लिख गए हों। परंतु उन्हें पुरुषों के साथ-साथ स्व- सम्मोहित होने से भला कौन रोक सकता है! सो वे होती हैं। कोई भी स्त्री जब दर्पण के समक्ष खड़ी होती है, तो वह इस बात को कदापि नहीं भूलती कि वही 'ब्रह्मांड -सुंदरी' है।उसके रूप - सौंदर्य के समक्ष ब्रह्मांड की सारी नारियाँ पानी भरती हैं। यह है मानवीय मुखड़े की महत्ता।

  आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रायः मुखड़े का अवमूल्यन ही देखने-पढ़ने को मिलता है। एक गीत में स्पष्ट रूप से सचेत किया गया है :'मुखड़ा क्या देखे दर्पण में, तेरे दया धर्म नहिं मन में।'हमारा दर्शन बाहर से अंतर को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। इसलिए उसने दर्पण में मात्र मुखड़ा देखने मात्र से वर्जित किया है कि इस मुखड़े को भला दर्पण में क्या औऱ क्यों देखता है?जब कि तेरे हृदय के भीतर जीव मात्र के प्रति दया भाव नहीं है औऱ तू स्व-धर्म का भी पालन नहीं करता! यदि ऐसा नहीं ,तो तेरे सुंदर मुखड़े का कोई महत्त्व भी नहीं है। 

   ये 'दर्पण' क्या कहता है?कभी सोचा है? कभी विचार किया है? 'दर्पण' =दर्प +न (ण) अर्थात जहाँ कोई दर्प(मद,घमंड,अभिमान) शेष न रहे। वही है दर्पण। यही कहता है 'दर्पण'। परन्तु हे मानव! (नर औऱ नारी दोनों) दर्पण में मुखड़ा देखकर अपने रूप पर इतराते हो? घमंड करते हो ? मद में चूर रहते हो ? जब तेरे अंतरतम में मानव औऱ जीव मात्र के प्रति दया -धर्म का सद्भाव नहीं है! तो दर्पण से क्या सीखा? जिसके समक्ष तेरा अहंकार नष्ट हो जाए ,वही है ये दर्पण। 

  मानव ने अपने से सम्बद्ध बहुत से क्षेत्रों में 'मुखड़े' पर भी 'मुखौटे' सजा लिए हैं।जैसे अभिनय, (जो मुखौटों के लिए सर्वाधिक सुप्रसिद्ध भी है।)धर्म,राजनीति,समाज सेवा औऱ तो और अब शिक्षा के क्षेत्र में भी मुखौटाधारियों की भरमार है। ये 'मुखौटा' औऱ क्या है ?वह स्वयं बोलता है। जिसकी ओट में मुख छिपा हुआ रहे ,वही तो है 'मुखौटा'।इसके पीछे न जाने कितना- कितना धोखा। मुखौटा लगाकर लूटने से किसने रोका ? मुखौटा ही तो देता है कितने -कितने मौका? मुखौटे के भीतर कभी किसी ने नहीं टोका।ओट में शिकार करने का तरीका ये अनौखा। कुछ काम- काज करने के लिए मुख को भी छिपाना पड़ता है।परंतु दर्पण का दीदार तो वहाँ भी आवश्यक जान पड़ता है। कहीं वास्तविक मुखड़े की पहचान न हो जाए! और बच्चू लाल कहीं सेंध पर ही न धर लिए जाएँ। यों मुखड़े का दर्पण से सम्बंध अन्योन्याश्रित प्रतीत होता है। बीच में यदि मुखौटे राम आ जाएँ तो आएँ।मुखड़े का भला क्या ले जाएँ? मुखड़ा तो पूरा का पूरा दर्पण को अर्पण ही है। 

 🪴शुभमस्तु !

 २४.०९.२०२२◆९.००आरोह्मण मार्तण्डस्य .

गुरुवार, 22 सितंबर 2022

देश - देश नित गाता 🦩 [ गीत ]

 379/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

बगुला  भक्त  शृंग  पर  बैठा,

देश - देश नित गाता।


एक टाँग  पर  खड़ा  पंक  में,

एक आँख को मींचे।

दृष्टि   लगाए   हुए  लक्ष्य  पर,

चोंच लार भर मींचे।।

बन तड़ाग का माली!

वार न जाए  खाली!!

मन में  चले  कर्तनी  चिकनी,

करनी पर इतराता।


बगुले   के   पीछे   भी  बगुले,

आगे भी  हैं   बगुले।

नाच   रहे   हैं   बैंड  बजाकर,

फेंक नए नित जुमले।।

श्वान  भौंकते   जैसे!

सभी भक्तगण वैसे!!

टोपी   श्वेत    सजाए   सारे,

सतराता  मदमाता।


मोर   मौन   कोकिल  है गूँगा,

गौरैया  क्या  बोले!

चातक प्यासा  स्वात बूँद को,

चंचु नहीं वह खोले।।

गर्दभ    घूरे   ठाड़े!

सीधे तिरछे आड़े!!

वन थलचर मनमानी में हैं,

बगुला मौज  मनाता।


अंधे     बहरे    उड़ने    वाले,

लगा   रहे  हैं  नारे।

होंठ   सिले      बैठे     बेचारे,

देख  दिवस में तारे।।

मनती सदा दिवाली !

गोरी हो  या  काली!!

'शुभम्'पंख रँग बनता साधक,

सदा गज़ब ही ढाता।


🪴शुभमस्तु!


२२.०९.२०२२◆११.००आ.मा.

पंक - साधना में खोए 🪷 [ गीत ]

 378/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

पंक -  साधना  में  खोए हैं,

कंज -भक्त कहलाएँ।


कीचड़  की  होली  होती  है,

फागुन से फागुन तक।

बगुले  नाच  रहे   कीचड़   में,

दृष्टि लगाए  इकटक।।

कैसे   कोयल  बोले!

अपनी रसना खोले!!

गंगा,   गीता,   गौमाता    के

नामों से बहकाएँ।


वानर उछल -उछल कानन में,

बेच   रहा तरु , झाड़ी।

मत की  चाहत  में नित टपके,

सजी  रँगीली  साड़ी।।

हाथ तराजू ले ले!

फेंक रहा है केले!!

ये   लूट   बिना   पैसे   की  है,

कानन को बहलाएँ।


खुरच-खुरच कर मिटा रहा है,

इतिहासों का लेखा।

परचम ऊँचा   दिखा   सजाए,

सबने सब कुछ देखा।।

है धमकी धौंस धुआँ!

खाई भी उधर कुआँ!!

समझ   नहीं  पाता  है बेवश,

कहाँ किधर अब जाएँ।


सच  कोने  में  सुबक  रहा है,

भाषण करता  झूठा।

मनमानी   का  पकड़ तिरंगा,

फहरा  दिखा अँगूठा।।

छत पर थोड़ा झाँकें!

बुद्धिहीनता   आँकें!!

इससे  तो  जंगल  शुभकारी,

शुद्ध हवा तो पाएँ।


🪴 शुभमस्तु !


२२.०९.२०२२◆१०.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शरद सलोनी 📘 [ गीत ]

 377/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪔 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

धीरे - धीरे चली  आ रही

शरद सलोनी।


सावन भादों की रिमझिम-सी

बदली   छाई,

बरस    रही   है    धीरे  -  धीरे

घर -  अंगनाई ,

लगे   फुरफुरी   सारे   तन  में,

कुछ अनहोनी।


शुभागमन    से  पहले  करते,

सब   अगवानी,

अति  प्रसन्न  कूकर शूकर की,

खींचा- तानी,

बंद   रजाई     कंबल   भरके,

गरम  बिछौनी।


गोभी  फिरती   फूली - फूली,

गोरी   मूली,

आलू   अँखुआये    बोरों   में,

रही  न धूली,

खेतों   में     हलवाह   झूमते,

फ़सलें बोनी।


उतर   रही   अंबर    से  गोरी,

परियाँ   रानी,

सोते   समय   सुनाती    दादी,

 नित्य कहानी,

पर्व   दशहरा    दीवाली   की,

खुशियाँ होनी।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०९.२०२२◆७.१५ प.मा.


मंगलवार, 20 सितंबर 2022

महिषी से क्या नाता है ? 🐃 [ बालगीत ]

 376/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

गाय           हमारी        माता    है।

महिषी    से      क्या      नाता है??


दूध        सभी        पी    पाते    हैं।

भूल    भैंस       को     जाते       हैं।।

गौ  -     पूजा     कर       आता   है।

महिषी      से       क्या    नाता   है??         


पाँच            फीसदी       गायें    हैं।  

वे     ही       बस        माताएँ    हैं!!

दही      भैंस      का       खाता     है।

महिषी      से      क्या     नाता   है??


छाछ,     दूध,      घी,     भैंसों     का!

नहीं         ऊँटनी,        मेषों     का।।

कुछ      बकरी      से     पाता       है।

महिषी      से      क्या      नाता    है??


आभार             मिलावटखोरों    का।

नकली          निर्माता      चोरों    का।।

केमीकल       दूध        बनाता     है।

महिषी       से     क्या      नाता   है??


भैंसों          को      भी     हम   मानें।

उनकी       भी            करनी    जानें।।

पी   -   पी      पय      इतराता     है।

महिषी        से        क्या     नाता  है??


🪴 शुभमस्तु !


२०.०९.२०२२◆४.००प.मा.

रहते घर में जीव हमारे 🦋 [ बालगीत ]

 375/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🦋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

रहते      सँग -  सँग      जीव हमारे।

घर   में   निशि - दिन    लगते प्यारे।।


मच्छर       मक्खी    नित    के  साथी।

रहते    नहीं         घरों       में   हाथी।।

खटमल      कभी  -  कभी मिलता  रे।

रहते       सँग- सँग        जीव हमारे।।


छिपकलियाँ      नित     गश्त लगातीं।

छत      में    रेंग - रेंग     कर  जातीं।।

चूहे       बिल       में      रहते   न्यारे।

रहते       सँग  -  सँग     जीव हमारे।।


छोटी    -     छोटी        चुहियाँ  सारी।

करें       कुतर     कर     हानि हमारी।।

काट      कुतर     कर       ग्रंथ  उजारे।

रहते       सँग - सँग         जीव हमारे।।


चींटी  -    चीटों      को    क्यों  भूलें?

वर्षा      में       मेढक      भी   ऊलें।।

जुगनू          चमक      रहे  उजियारे।

रहते       सँग - सँग      जीव हमारे।।


देख         ठिकाना     नीड़   बनाती।

गौरैया                परिवार   बसाती।।

चिचियाते          खग - शावक   सारे।

रहते        सँग -सँग        जीव  हमारे।


आते     -  जाते  -     कुत्ते,   बिल्ली।

लिपटी    हुईं      देह      से किल्ली।।

पीती          खून,         ढोर     बेचारे।

रहते       सँग -सँग      जीव    हमारे।।


गाय ,   भैंस ,    भेड़ें   या   बकरी।

दूधदायिनी           नगला  -  नगरी।।

पी ले     मट्ठा,   घी,    दधि   प्यारे।

रहते   सँग  -  सँग     जीव हमारे।।


🪴शुभमस्तु !


२०.०९.२०२२◆१०.०० पतनम मार्तण्डस्य।

आओ वृक्ष -मित्र बन जाएँ 🌳 [ बालगीत ]

 374/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️

 शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

आओ       वृक्ष -मित्र      बन   जाएँ।

छाया          देकर         ताप मिटाएँ।।


वृक्ष       सदा    हैं      पर -  उपकारी।

हवा        बहाते        शीतल   न्यारी।।

वृक्षों         जैसी        छाया     लाएँ ।

आओ       वृक्ष  -  मित्र    बन जाएँ।।


देते          वृक्ष      प्रसून    सुगंधित।

तुलसी     माता     है     नित वंदित।।

पीपल,      बरगद,       नीम   लगाएँ।

आओ        वृक्ष - मित्र    बन  जाएँ।।


छायादार       मधुर       फल   वाले।

वृक्ष       एक       से     एक निराले।।

लिपटीं       रहतीं        सघन लताएँ।

आओ      वृक्ष  -मित्र       बन जाएँ।।


जहाँ          वृक्ष      बरसेगा    पानी।

बने   मनुज     की     सुखद कहानी।।

सूखा       और        अकाल   भगाएँ।

आओ        वृक्ष - मित्र     बन   जाएँ ।।


अपने       अंग      दान      वे   करते।

लकड़ी,    मूल,    शाख,  फल   भरते।।

'शुभम्'      वृक्ष       से    शिक्षा    पाएँ।

आओ        वृक्ष -मित्र        बन   जाएँ।।


🪴शुभमस्तु !


२०.०९.२०२२◆९.३० आ.मा. 

तरुवर सदा महान 🌳 [ दोहा ]

 373/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️शब्दकार©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

दलविहीन  एकांत में,खड़ा एक  तरु  दीन।

पथिकों  को छाया नहीं,आशा नहीं  नवीन।।


पादप पर पल्लव नहीं,शून्य शांति की छाँव।

जाओगे  सानिध्य   में, जल जाएंगे   पाँव।।


पंछी  भी  जाते  नहीं,  सूखा  हो यदि  पेड़।

छाया की  आशा कहाँ, पास न आए  भेड़।।


शुष्क  नारि-नर  से नहीं,तृण भर कोई आस।

तरु  देता निज काष्ठ को,नहीं करे  उपहास।।


उड़ते-उड़ते थक गया,हो जब नभचर दीन।

सूखे तरु की शाख पर,पाता शांति नवीन।।


तना, पत्र,शाखा  सहित,देता है  फल, फूल।

तरुवर सदा  महान है, पर- उपकारी मूल।।


वाणी  से  दूषण  नहीं, फैलाता  तरु  नेक।

जीवन उनमें भी बसा,नित परहित की टेक।।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०९.२०२२◆७.३० आ.मा.


सोमवार, 19 सितंबर 2022

शूल नहीं बन 🪔 [ गीतिका]

 372/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

मत       समय      नष्ट    कर  सोने   में।

यह     अटल     सत्य     हर   कोने   में।।


बन    शूल      नहीं     चुभना जग     में,

रहना       प्रसून          ही     बोने     में।


सबको     मिलता       फल करनी   का,

परहित   जल    ले,     कर -  दोने    में।


है ,     हुआ       सदा      होगा   अच्छा,

मत    सोच      मनुज     कुछ होने   में।


ईश्वर     की     शक्ति    असीम   अकथ,

विश्वास      न      करना      टोने      में।


दुख      मानव     को   देना   न   कभी,

लग   जा       मणि - माला    पोने    में।


सुख    देने    में      ही    शांति   'शुभम्',

दूषण     को     तज       रह   धोने    में।


🪴शुभमस्तु !


१९. ०९.२०२२◆७.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सुख देने में शांति है 📚 [ सजल ]

 371/2022

     

समांत: ओने ।

पदांत : में ।

मात्राभार :16.

मात्रा पतन : शून्य ।

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

मत       समय      नष्ट    कर  सोने   में।

यह     अटल     सत्य     हर   कोने   में।।


बन    शूल      नहीं     चुभना जग     में,

रहना       प्रसून          ही     बोने     में।


सबको     मिलता       फल करनी   का,

परहित   जल    ले,     कर -  दोने    में।


है ,     हुआ       सदा      होगा   अच्छा,

मत    सोच      मनुज     कुछ होने   में।


ईश्वर     की     शक्ति    असीम   अकथ,

विश्वास      न      करना      टोने      में।


दुख      मानव     को   देना   न   कभी,

लग   जा       मणि - माला    पोने    में।


सुख    देने    में      ही    शांति   'शुभम्',

दूषण     को     तज       रह   धोने    में।


🪴शुभमस्तु !


१९ ०९.२०२२◆७.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

जीता-जागता प्रेत 😈 [अतुकांतिका ]

 370/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

⛴️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

हृदय की वेदना को

कब तक सँभालें!

कैसे सँभालें!

अंततः छलक ही

पड़ता है 

पिघलकर पाषाण-सा

अंतर्मन मेरा,

बनकर अश्रु 

दृग का,

उदासी बुझे 

सूरज की तरह।


जानकर ज़माने की

फूहड़ रुचि ,

उसे तो बस

हँसना ही है,

किसी के आँसुओं पर,

देखा नहीं क्या?

लड़ाई कोई भी

 कहीं हो,

गलत हो

अथवा सही हो,

देखने सुनने वाले

मजा लेते हैं

हँसकर सदा ही,

जिसके पक्षधर हों,

सही या असत्य से

लेना न देना,

किसी की 

जलती हुई आग में

हथेलियाँ या

रोटियाँ भी सेंकना।


कोई भी नहीं आता

निस्तारण के लिए

सहभागिता करने,

उन्हें मतलब भी क्या है

किसी के जीने 

अथवा मरने से।


किसी का संघर्ष 

उनके लिए

आंनद का

स्रोत है,

जमाना क्या है?

हितैषी नहीं 

किसी का,

सबको दिखने वाला

जीता- जागता

प्रेत है।


किसी से क्या आशा ?

मिलती रही है

सदा ही निराशा,

उचित है यही 'शुभम्'

कि जमाने पर न जाओ

स्वयं अपना पथ 

प्रशस्त करो,

किसी को कुछ भी

क्यों बताओ?

ज़माने को तो 

हँसना ही है

हर हाल में।


🪴शुभमस्तु !


१५.०९.२०२२◆ ६.१५ प.मा.


अक्षर-अक्षर ब्रह्म है 🕉️ [ दोहा ]

 369/2022

 

[अक्षत,अक्षर,अंकुर,अंजन,अधीर]

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

📖 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

        🪔 सब में एक🪔

अक्षत है परब्रह्म नित,सृजित जगत के जीव

शेष सभी क्षत हो रहे,शिखर न जिनके नीव

सोम भानु अक्षत रहें, प्रभु दें शुचि  वरदान।

सृष्टि सदा  चलती रहे, यदि हो कृपा महान।।


अक्षर- अक्षर  ब्रह्म  है,बुरे न  बोलें  बोल।

जो वाणी रसना कहे, शब्द-शब्द को तोल।।

अक्षर तुमने पढ़ लिए,किंतु न  जाना  सार।

ऐसे अक्षर - ज्ञान की,व्यर्थ सदा  भरमार।।


अंकुर उगते घास के,हरा अवनि का अंक।

नयन तृप्त  होते  सभी,दृश्य नहीं   है  पंक।।

अंकुर उगता  प्रेम का,उर के  बदलें  भाव।

धीरे - धीरे  नष्ट   हों,  उभर रहे   जो   घाव।।


अंजन आँखों में सजा, बदला छवि का रूप

बाला  की  लगने लगी,आभा कांति   अनूप

नारी के  शृंगार  में,  अंजन की   चमकार।

ओप बदलती गात में,शोभित विविधाधार।।


मन अधीर हो आपका, निर्णय कभी न ठीक

शांत हृदय  में लीजिए,हो तब ही  सब  नीक

सजन  तुम्हारे   शीघ्र ही, आएँगे   धर   धीर।

विरहिन हो न अधीर तू, जाकर सरिता तीर।


   🪔  एक में सब  🪔

अक्षर  अक्षत   तू   नहीं,

                        यौवन   हो  न  अधीर।

अंकुर   अंजन   के   मिटें,

                          नित्य  न  शेष   लकीर।।


🪴शुभमस्तु !


१४ सितंबर २०२२◆४.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

हिंदी मम पहचान 📚 [ दोहा गीतिका ]

 368/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

📚 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

बोली, भाषा, लेखनी,जननी का   वरदान।

हिंदी   से ही हम बने, हिंदी मम पहचान।।


लिखना, पढ़ना, बोलना,हिंदी अपनी  एक,

हिंदी  गौरव  देश  की,हिंदी   से  ही   मान।


आ से ज्ञ  तक वर्ण का, वैज्ञानिक   निर्माण,

सुघर कंठ से होठ तक,वर्णों का शुभ ज्ञान।


रंग - रंग होली  सजी,फागुन का  मधुमास,

सावन  कजरी गा रहा,भादों से घन  दान।


विजयादशमी की खुशी, दीवाली  का  पर्व,

हिंदी से  ही   सोहते,  अपने पर्व   महान।


अलग-अलग सम्बंध केअलग अलग ही नाम

अम्मा,चाची ,भाभियाँ, सबके विशद वितान।


उधर सभी  हैं आंटियाँ,अंकल की   भरमार,

दो  ही  शब्दों  में  छिपा, हर रिश्ते का भान।


माला   बावन  वर्ण  की,पहन गले  में  मीत,

हिंदी  भाषा  आपकी,  है साहित्यिक  शान।


'शुभम्' नमन करता तुम्हें, हिंदी  मेरी  मात,

हिंदी कविता ने किया,शोभन स्वर्ण विहान।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०९.२०२२◆४.१५ 

पतनम मार्तण्डस्य।



मंगलवार, 13 सितंबर 2022

आवेदन पत्र

 सेवा में,

श्रीमान थानाध्यक्ष जी

थाना: खंदौली।

तहसील :एत्मादपुर।

जनपद:आगरा।

विषय: प्रार्थी के पुत्र सत्येंद्र स्वरूप ,उसकी पत्नी नीतू तथा मेरे छोटे भाई श्रवण कुमार द्वारा प्रार्थी को धोखे से आगरा स्थित गाँव पुरा लोधी बुलवाकर उसे जान से मारने के प्रयास औऱ उसके परिवार को खत्म करने की धमकी के संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कराए जाने के सम्बंध में।

         दिनांक:12.09.2022

महोदय,

उपर्युक्त विषयक निवेदन है कि प्रार्थी डॉ. भगवत स्वरूप पुत्र स्व.श्री मौहर सिंह  (उम्र 70 वर्ष)  62,डाल नगर,अरांव रोड सिरसागंज (फ़िरोज़ाबाद) में विगत 24 वर्षों से निवास कर रहा है।प्रार्थी की दिवंगता पत्नी से उत्पन्न उसका एक पुत्र सत्येंद्र स्वरूप (उम्र लगभग 46 वर्ष) ग्राम:पुरा लोधी,थाना:खंदौली तहसील :एत्मादपुर (आगरा)में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता है।उक्त गाँव में प्रार्थी के द्वारा बनवाए हुए दो मकान और 06 बीघा खेतिहर पैतृक भूमि है।गांव की उक्त सम्पूर्ण संपत्ति  की वसीयत दिनांक: 11.08.2020 को मैं सत्येंद्र स्वरूप के नाम कर चुका हूँ।सिरसागंज में मेरे द्वारा प्लाट खरीदकर दो मकान अपने सेवा काल में बनवाये थे।मैं राजकीय महिला स्नातकोत्तर महिला स्नातकोत्तर महा विद्यालय सिरसागंज से दिनांक :30.06.2013 को प्रोफेसर के पद से सेवा निवृत्त हो चुका हूँ तथा पेंशन से प्राप्त राशि से अपनी पत्नी औऱ बच्चों का पालन पोषण कर रहा हूँ।सिरसागंज के मकानों औऱ लगभग 06 बीघा मेरे द्वारा खरीदी जमीन की वसीयत तददिनांक को ही कर चुका हूँ।

ग्राम पुरा लोधी वाले घर में मेरा कुछ सामान (03 अलमारियां, लाखों रुपये की पुस्तकें, बर्तन ,कपड़े तथा  अन्य फुटकर सामग्री रखा हुआ है। जिसे मैं मंगवाने के लिए भाई  श्रवण कुमार की साजिश के तहत सत्येंद्र ने मेरे जलेसर वाले बहनोई श्री राम किशन जी के माध्यम से सूचना भिजवाई कि मैने सामान ले जाने के लिए ट्रैक्टर की व्यवस्था कर दी है। पापा अपना सामान ले जाएँ।दिनांक 11.09.2022 को मैं अपने चालक द्वारा अपनी कार से गाँव पंहुँचा। जैसे ही हम दोनों लोग कमरे में पहुंचे उसकी पत्नी ने मुख्य गेट ,सारे कमरे औऱ झीना के ताले लगा दिए औ बोला कि चाचा श्रवण कुमार की चाल के अनुसार अब आप मेरे बंधक हैं। औऱ जब तक मैं न चाहूँ तब तक सिरसागंज नहीं जा सकते। दोनों पति पत्नी ने मुझसे मेरा मोबाइल औऱ चालक श्री नवीन कुमार से गाड़ी की चाभी जबरन छीन ली और मुझे पीटते हुए धमकाया कि तुम्हें जान मार देंगे। यदि पेंशन में से 25%पैसा नहीं दिया, समर नहीं लगवाई और मेरे बच्चों का इलाज नहीं करवाया तो जिंदा नहीं  लौटोगे।इस प्रकार मुझे सुबह 10.30 बजे से शाम 4.30 बजे (06 घन्टे तक) कमरे में बंद कर मानसिक और शारीरिक रूप से उत्पीड़ित किया। वहाँ पर कोई बाहरी व्यक्ति भी देखने सुनने वाला नहीं था। उसके चाचा ने फोन पर मेरे साले को धमकी दी कि अब बुड्ढा यदि यहाँ आया तो जूतों की माला डालकर गोली से मार दूँगा। मैं किसी प्रकार पेंशन में से कुछ देने का वादा करके ।मुक्त हो सका। इतने पर भी सत्येंद्र औऱ उसकी पत्नी इस बात पर अड़े रहे कि लिखवा ले लो। तभी गाड़ी की चाभी  मिलेगी।

         यहाँ पर यह भी ज्ञातव्य है कि भाई श्रवण कुमार ने  अपने सेवा काल में ही अपना और अपने पूरे परिवार का धर्म परिवर्तन करके ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है। और रवि पास्टर के साथ मिलकर गाँव के पश्चिम दिशा में चर्च  भी बनवा दिया है।तथा गाँव में कई परिवारों का धर्म परिवर्तन करके ईसाई बना दिया है ।इसने सत्येंद्र और उसके परिवार को भी ईसाई बनाने हेतु प्रेरित किया है। ग्राम पुरा लोधी लोधी राजपूत बाहुल्य हिन्दू बाहुल्य गाँव है।

निवेदन है  कि मुझे तथा मेरे परिवार को सत्येंद्र स्वरूप उसकी पत्नी नीतू औऱ श्रवण कुमार से जान माल का भयंकर खतरा है। हमारे साथ कही भी और कभी भी कोई भी खतरा हो सकता है।

अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि  मेरी तथा मेरे परिवार की सुरक्षा करते हुए उनके द्वारा मेरे जान से मारने के प्रयास तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के कारण इन तीनों के विरुद्ध सख्त  से सख्त कानूनी कार्यवाही करने 

तथा प्रार्थी को न्याय दिलाने की कृपा करें।

आपकी अति कृपा होगी।



                                                                                                            प्रार्थी


                                                                                             डॉ.(भगवत स्वरूप)

                                                                                         62,डाल नगर, अरांव रोड,

                                                                                         सिरसागंज(  फ़िरोज़ाबाद)

                                                                                         पिन : 283 151

                                                                                   मोबाइल संख्या:95684 81040


सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित :

1.माननीय मुख्य मंत्री ,उ.प्र.शासन ,लखनऊ।

2.वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, आगरा।

सोमवार, 12 सितंबर 2022

एप्लीकेशन

 सेवा में,

श्रीमान थानाध्यक्ष जी  

थाना: खंदौली।तहसील :एत्मादपुर।  

जनपद:आगरा।

विषय: प्रार्थी के पुत्र सत्येंद्र स्वरूप ,उसकी पत्नी नीतू तथा मेरे छोटे भाई श्रवण कुमार द्वारा प्रार्थी को धोखे से आगरा स्थित गाँव पुरा लोधी बुलवाकर उसे जान से मारने के प्रयास औऱ उसके परिवार को खत्म करने की धमकी के संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कराए जाने के सम्बंध में।

                                                                                                                             दिनांक:12.09.2022

महोदय,

          उपर्युक्त विषयक निवेदन है कि प्रार्थी डॉ. भगवत स्वरूप पुत्र स्व.श्री मौहर सिंह  (उम्र 70 वर्ष)  62,डाल नगर,अरांव रोड सिरसागंज (फ़िरोज़ाबाद) में विगत 24 वर्षों से निवास कर रहा है।प्रार्थी की दिवंगता पत्नी से उत्पन्न उसका एक पुत्र सत्येंद्र स्वरूप (उम्र लगभग 46 वर्ष) ग्राम:पुरा लोधी,थाना:खंदौली. तहसील :एत्मादपुर (आगरा)में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता है।उक्त गाँव में प्रार्थी के द्वारा बनवाए हुए दो मकान और 06 बीघा खेतिहर पैतृक भूमि है।गांव की उक्त सम्पूर्ण संपत्ति  की वसीयत दिनांक: 11.08.2020 को मैं सत्येंद्र स्वरूप के नाम कर चुका हूँ।सिरसागंज में मेरे द्वारा प्लाट खरीदकर दो मकान अपने सेवा काल में बनवाये थे।मैं राजकीय महिला स्नातकोत्तर महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय सिरसागंज से दिनांक :30.06.2013 को प्रोफेसर के पद से सेवा निवृत्त हो चुका हूँ तथा पेंशन से प्राप्त राशि से अपनी पत्नी औऱ बच्चों का पालन पोषण कर रहा हूँ।सिरसागंज के मकानों औऱ लगभग 06 बीघा मेरे द्वारा खरीदी जमीन की वसीयत तददिनांक को ही कर चुका हूँ।

            ग्राम पुरा लोधी वाले घर में मेरा कुछ सामान (03 अलमारियां, लाखों रुपये की पुस्तकें, बर्तन ,कपड़े तथा  अन्य फुटकर सामग्री रखा हुआ है। जिसे मैं मंगवाने के लिए भाई  श्रवण कुमार की साजिश के तहत सत्येंद्र ने मेरे जलेसर वाले बहनोई श्री राम किशन जी के माध्यम से सूचना भिजवाई कि मैने सामान ले जाने के लिए ट्रैक्टर की व्यवस्था कर दी है। पापा अपना सामान ले जाएँ।दिनांक 11.09.2022 को मैं अपने चालक  द्वारा अपनी कार से गाँव पंहुँचा। जैसे ही हम दोनों लोग कमरे में पहुंचे उसकी पत्नी ने मुख्य गेट ,सारे कमरे औऱ झीना के ताले लगा दिए औ बोला कि चाचा श्रवण कुमार की चाल के अनुसार अब आप मेरे बंधक हैं। औऱ जब तक मैं न चाहूँ तब तक सिरसागंज नहीं जा सकते। दोनों पति पत्नी ने मुझसे मेरा मोबाइल औऱ चालक श्री नवीन कुमार से गाड़ी की चाभी जबरन छीन ली और मुझे पीटते हुए धमकाया कि तुम्हें जान मार देंगे। यदि पेंशन में से 25%पैसा नहीं दिया, समर नहीं लगवाई और मेरे बच्चों का इलाज नहीं करवाया तो जिंदा नहीं  लौटोगे।इस प्रकारमुझे सुबह 10.30 बजे से शाम 4.30 बजे (06 घन्टे तक) कमरे में बंद कर मानसिक और शारीरिक रूप से उत्पीड़ित किया। वहाँ पर कोई बाहरी व्यक्ति भी देखने सुनने वाला नहीं था। उसके चाचा ने फोन पर मेरे साले को धमकी दी कि अब बुड्ढा यदि यहाँ आया तो जूतों की माला डालकर गोली से मार दूँगा। मैं किसी प्रकार पेंशन में से कुछ देने का वादा करके ।मुक्त हो सका। इतने पर भी सत्येंद्र औऱ उसकी पत्नी इस बात पर अड़े रहे कि लिखवा ले लो। तभी गाड़ी की चाभी मिलेगी।

         यहाँ पर यह भी ज्ञातव्य है कि भाई श्रवण कुमार ने  अपने सेवा काल में ही अपना और अपने पूरे परिवार का धर्म परिवर्तन करके ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है। और रवि पास्टर के साथ मिलकर गाँव के पश्चिम दिशा में चर्च  भी बनवा दिया है।तथा गाँव में कई परिवारों का धर्म परिवर्तन करके ईसाई बना दिया है ।इसने सत्येंद्र और उसके परिवार को भी ईसाई बनाने हेतु प्रेरित किया है। ग्राम पुरा लोधी लोधी राजपूत बाहुल्य हिन्दू बाहुल्य गाँव है।निवेदन है  कि मुझे तथा मेरे परिवार को सत्येंद्र स्वरूप उसकी पत्नी नीतू औऱ श्रवण कुमार से जान माल का भयंकर खतरा है। हमारे साथ कही भी और कभी भी कोई भी खतरा हो सकता है।


             अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि  मेरी तथा मेरे परिवार की सुरक्षा करते हुए उनके द्वारा मेरे जान से मारने के प्रयास तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के कारण इन तीनों के विरुद्ध सख्त  से सख्त कानूनी कार्यवाही करने तथा प्रार्थी को न्याय दिलाने की कृपा करें।

आपकी अति कृपा होगी।



                                                                                                     प्रार्थी

                                                                                           डॉ.(भगवत स्वरूप)

                                                                                       62,डाल नगर, अरांव रोड,

                                                                                     सिरसागंज(  फ़िरोज़ाबाद)

                                                                                          पिन : 283 151

                                                                               मोबाइल संख्या:95684  81040


सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित :

1.माननीय मुख्य मंत्री ,उ.प्र.शासन ,लखनऊ।

2.वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, आगरा।

रविवार, 11 सितंबर 2022

हिंदी मम पहचान 📚 [ दोहा गीतिका ]

 368/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

📚 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

बोली, भाषा, लेखनी,जननी का   वरदान।

हिंदी   से ही हम बने, हिंदी मम पहचान।।


लिखना, पढ़ना, बोलना,हिंदी अपनी  एक,

हिंदी  गौरव  देश  की,हिंदी   से  ही   मान।


आ से ज्ञ  तक वर्ण का, वैज्ञानिक   निर्माण,

सुघर कंठ से होठ तक,वर्णों का शुभ ज्ञान।


रंग - रंग होली  सजी,फागुन का  मधुमास,

सावन  कजरी गा रहा,भादों से घन  दान।


विजयादशमी की खुशी, दीवाली  का  पर्व,

हिंदी से  ही   सोहते,  अपने पर्व   महान।


अलग-अलग सम्बंध केअलग अलग ही नाम

अम्मा,चाची ,भाभियाँ, सबके विशद वितान।


उधर सभी  हैं आंटियाँ,अंकल की   भरमार,

दो  ही  शब्दों  में  छिपा, हर रिश्ते का भान।


माला   बावन  वर्ण  की,पहन गले  में  मीत,

हिंदी  भाषा  आपकी,  है साहित्यिक  शान।


'शुभम्' नमन करता तुम्हें, हिंदी  मेरी  मात,

हिंदी कविता ने किया,शोभन स्वर्ण विहान।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०९.२०२२◆४.१५ 

पतनम मार्तण्डस्य।

हिंदी की हरियाली 🦚 [ गीत ]

 367/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

शब्दकार 

 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

जन गण मन को  हरा बनाती,

हिंदी  की   हरियाली।


माँ ने  माँ की  भाषा  ने  नित,

हमको पाठ पढ़ाया,

लोरी की मधु  स्वर  लहरी से,

थपकी लगा उढ़ाया,

आजा निंदिया रानी,

माँ ने कही   कहानी,

दे - दे कर  की  ताली।


हिंदी   सावन   हिंदी   फागुन,

होली  रंग  दिवाली,

गौना, ब्याह,  गीत  सोहर  के,

कजरी वह मतवाली,

हिंदी    रोना  गाना,

रूठे सजन मनाना,

दीपक - सी  उजियाली।


अम्मा,  चाची, भाभी, नानी,

जीजी,ताई, दादी,

भैया,पिता, और   ताऊ जी,

बाबा की आजादी,

रिश्ते  बड़े  निराले,

साली, साढू,साले,

अंकल आंट न वाली।


माँ की भाषा का विकल्प क्या

कोई  भाषा  होती ?

चिंतन, मनन स्वप्न  की भाषा,

मुक्ता ही शुभ बोती,

माँ का लाड़ लड़ाती,

वह हिंदी  कहलाती,

मधुर सुधा  की प्याली।


लिखना, पढ़ना और बोलना,

सीखें हम हिंदी में,

वैज्ञानिकता स्वर व्यंजन की,

है अक्षर ,  बिंदी में,

'शुभम्' काव्य ही लिखना,

हिंदी   -       बोधी    दिखना,

बने देश बलशाली।


🪴 शुभमस्तु !


१०.०९.२०२२◆१२.४५प.मा.


जन -जन है घबराया🪸 [ गीत ]

 366/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

तोड़ी जातीं घर दूकानें,

जन -जन है घबराया।


नीयत बिगड़ गई मानव की,

भू सरकारी हड़पी,

खोल लिया व्यापार शान से,

अंतरात्मा  तड़पी,

टूटीं छत दीवारें,

रही नहीं मीनारें,

पर -धन पर ललचाया।


बकरे की अम्मा यों कब तक

बाँट सकेगी सिन्नी,

सरकारी   नोटिस  आते   ही,

होते चक्करघिन्नी,

अब क्या होवे रामा?

लगा वृथा  ही  नामा,

घर  में   मातम  छाया।


दोष  लगाते  सरकारों  को,

जान  बूझकर   सच को,

बहुत बुरी सरकार देश की,

दिया दान  हम  मत  को,

पता न था ये  धोखा,

बना दिया है खोखा,

निकला अब  तक  खाया।


देखा - देखी बढ़ा -  चढ़ाकर,

तोड़ी  हैं  सब  सीमा,

समझ रहे   थे अब तक सारे,

है   आजीवन बीमा,

गुपचुप अश्रु बहाएँ,

कौन हमें समझाएं!

सिमट  रही   है  माया।


🪴 शुभमस्तु !


०९.०९.२०२२◆ १.००प.मा.

सिसक रहा ईमान 🏠 [ गीत ]

 365/2022

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

आलय -आलय रिक्त पड़े हैं,

सिसक रहा ईमान।


दूकानें       बाजार    माँगते,

ला- ला धर जा पैसा,

अधिकारी ऑफिस के बाबू,

कहते समय  न वैसा,

सुविधा - शुल्क  जरूरी,

चले     लेखनी      पूरी,

खिसक रहा ईमान।


तिलक लगाए  माला डाले,

बैठा  सजा  पुजारी,

दर्शन करना भक्त  बाद में,

दे न दक्षिणा  प्यारी?

आशीष तभी दूँगा,

पहले तुझसे लूँगा,

बिखर   रहा   ईमान।


साइकिल पर चलने वाला,

अब   कारों   में  घूमे,

नेता बना अरब का स्वामी,

नित्य  षोडशी   चूमे,

देशभक्त   कहलाता,

बगुला -वेश सुहाता,

छितर   रहा   ईमान।


अवसर मिला न जिसको कोई

वही दूध   का  धोया,

चोरों   की   नगरी    में   बैठा,

कहीं  अकेला सोया,

उसे न ए. सी.कारें,

कैसे घर   को तारें,

पिचक  रहा  ईमान।


🪴शुभमस्तु!


०९.०९.२०२२◆११.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

कौन कहता है ? 🦢 [अतुकान्तिका]

 364/2022


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम् '

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

कौन कहता है कि

दुनिया में 

ईमानदारी नहीं है,

ईमानदार नहीं हैं,

बस बात समझने की है,

उलझने की नहीं है।


मिलता है 

जिसे भी अवसर,

भला वह 

कब चूकता है?

वह अपनी

 करनी की

मिसाइल धूकता है,

जब तक पूँछ 

इज्जत

बचाए रखती है,

वह अपने को 

ऊँट महसूसता है।


आता है जब  ऊँट

किसी पहाड़ के नीचे

दूध  का जला

छाछ भी फूँकता है,

भले ही

उठने पर पूँछ 

जमाना जी भर

उसके ऊपर

थूकता है।



बचा रह जाता है

किसी कोने में

पड़ा हुआ

ईमानदार बेचारा,

क्योंकि उसे 

अवसर नहीं मिला,

इसलिए

 वह फ़तह 

नहीं कर पाया

बेईमानी का किला,

वह अपनी कर्तव्यनिष्ठा से

तिल भर  भी

नहीं हिला,

और रह गया

ईमानदार बना हुआ।


तराजू के पलड़े में

पड़ा हुआ हो

ज्यों पासंग,

वैसे मनुष्यता की

डंडी पर

'शुभम्' ईमानदारी

दोलित हो रही है,

अपने यथार्थ रूप में

संबोधित हो रही है,

माला- रोपित

और  रेशम से शॉलित 

हो रही है।


🪴 शुभमस्तु !


०८.०९.२०२२◆८.३० पतनम मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...