शुक्रवार, 24 जून 2022

हम ही हैं इतिहास-विधाता 💎 [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

💎 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हम          अपने       इतिहास - विधाता।

भले    न       अक्षर    लिखना    आता।।


वर्तमान           आँखों         के      आगे,

भावी        का         है      वह    निर्माता।


जीवन             में      पगडंडी   अनगिन ,

जो       भटका    फ़िर    राह  न    पाता।


पर       उपदेश     कुशल     जग    सारा,

स्वयं      न       करता       राह    बताता।


गली     -    गली      में    पंडित     ज्ञानी,

धन      का      लोभी      ज्ञान     जताता।


ढोंग     पुण्य      का     आम   यहाँ    पर,

छिपा     -   आवरण        पाप   कमाता।


'शुभम्'       अग्निपथमय   जीवन       है,

चलें       सँभल   कर      क्यों   पछताता।


🪴 शुभमस्तु !


२४ जून २०२२◆८.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।

जीवन की किताब को खोलो 📙 [ गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

📙 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जीवन          की      किताब    को   खोलो।

उचित       और      अनुचित   तब   बोलो।।


ग्रंथ          नहीं         कोई      पढ़ना      है,

सच       को        सुलभ      तराजू    तोलो।


उपदेशक            कहते      सब      अपनी,

स्वयं         विचारो    विष    मत      घोलो।


उचित      नहीं      भटकाव भँवर         में,

राजमार्ग      तज      वृथा      न     डोलो।


सदा        कुसंगति      से     है        बचना,

उचित     खेत     उपवन       में     हो   लो।


पछताना          क्यों      पड़े   बाद        में,

जा    तम     भरे     कक्ष     में        रो लो।


'शुभम्'       समझ     कर   कदम   बढ़ाओ,

स्वेद   -     सलिल       से   आनन    धो लो।


🪴शुभमस्तु !


२४ जून २०२२◆८.००

पतनम मार्तण्डस्य।

वेश अनमोल तुम्हारा 🙊 [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पहला      हित        अपना    ही    होता।

फसल      काटता       जो    नर   बोता।।


पर       -      उपकारी     कितने    जन्मे,

नेता           घड़ियाली        दृग      रोता।


राम    -    राम        जपता    माला     से,

नित्य       माल       के      मनके     पोता।


वंश       जाति       है     पहले       सबसे,

कनक         कामिनी        सबल   सँजोता।


मंदिर            में         घंटा     भी    बजता,

तीर्थराज          में            लेता        गोता।


देशभक्ति          की     खाल  ओढ़       ली,

यद्यपि               भीतर       बैठा     खोता।


'शुभम्'           वेश       अनमोल    तुम्हारा,

पर        हमाम        में      नंगा       होता।


🪴 शुभमस्तु !


२४ जून २०२२◆१.००पतनम मार्तण्डस्य।


अपनी - अपनी नाव 🚣🏻‍♀️ [गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🚣🏻‍♀️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अपनी      -    अपनी      नाव  हमारी।

चलें          चलाएँ          कर  तैयारी।।


कभी       भँवर       पड़ते    सरिता  में,

नैया          ले          हिचकोले     भारी।


नहीं           दीखता          कहाँ  किनारा,

फिर       भी        बढ़ती     रहे    सवारी।


पतवारों             का         रहे   भरोसा,

केवट      हैं         सारे       नर -  नारी।


सबकी          अपनी      अलग   कहानी,

पति     -    पत्नी       पितुवर महतारी।


दो  -  दो      हाथ     पैर      दो    सबके,

दो   -  दो    कान    आँख    दो    न्यारी।


'शुभम्'         जोंकवत     रक्त  न     पीना,

महका      निज       उपवन   की   क्यारी।


🪴 शुभमस्तु !


२४ जून २०२२ ◆९.०० आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शोध नाम है जीवन का 🦚 [ गीतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सागर           की        गहराई       जाना।

मुक्ता       तभी        खोजकर     लाना।।


बैठा         रहा         किनारे    पर    नर,

सीप       न       घोंघे      उसको     पाना।


शोध       नाम      है       इस   जीवन  का,

उन्नति       के       हित     स्वेद    बहाना।


उपला        स्वयं         खाक      हो  पहले,

राख       स्वयं       हो     आग     बुझाना।


अपना      लक्ष्य          आप     ही    देखें,

अवरोधक        बन      पास   न     आना।


जितनी        हिना       घिसी  पाहन   पर,

घर्षक         हाथों             को   रँगवाना।


'शुभम्'      देख       अपने    ही   पथ  को,

उचित      न       बिल्ली    का खिसियाना।


🪴 शुभमस्तु !


२४ जून २०२२◆ ८.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


गहराई 🎖️ [ अतुकांतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🎖️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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गहराई में उतरा जो

क्या कभी

 रिक्त हस्त लौटा?

मिले हैं उसे सदा

शंख, सीप, घोंघा,

यदि रहा उसका

 प्रयास और भी गहन

तो उसे मिले हैं मुक्ता।


सागर के किनारे पर

पड़े रहने वाले 

बहाने में मस्त बहने वाले

चाहते रहे 

बिना परिश्रम के ही

गरम मसाले,

समय के साँचे में

जिसने भी

अपने तन मन

कदम ढाले,

मिले हैं उन्हें

परिणाम भी निराले।


जो चलता है

वही गंतव्य पर भी

जा पहुँचता है,

चलते रहने का नाम

जीवन है,

उन्हीं के लिए

ये जिंदगी उपवन है,

अन्यथा बेतरतीब 

बिखरा हुआ वन है।


स्वयं स्वत:

 निर्माण के लिए है,

प्रकृति प्रदत्त ये देह,

बरसाएं इसकी धरा पर

अपने ही स्वेद का मेह,

बना पाएंगे तभी

मानव जीवन को

निस्संदेह सु -गेह,

परिजन औऱ पुरजन

करने लगेंगे 

स्वतः तुम्हें नेह।


वैशाखियों से कौन

कब तक चला है,

बना है जो परजीवी

उसने अपने को

निरंतर छला है,

निज स्वेद का मूल्य

पहचानें,

तभी अपने भावी को

वर्तमान को 

'शुभम्' मानें।


🪴 शुभमस्तु !


२४ जून २०२२ ◆५.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 23 जून 2022

प्रशंसा' की झील में मेरा उतरना! 🌌 [ व्यंग्य ]


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✍️ व्यंग्यकार © 

🌌 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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     महात्मा कबीरदास की एक प्रसिद्ध साखी है :'जिनु खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। हों बौरी ढूंढ़न गई,रही किनारे बैठ।।' समुद्र की गहराई में अनेक तैराक लोग डुबकी लगाते हैं ;किंतु किसी के हाथ में मोती आते हैं तो किसी को केवल शंख,सीप, घोंघा के पाने भर से ही संतुष्ट होना पड़ता है।आध्यात्मिक भाव से इस दोहे का भाव ग्रहण करने पर मोती, मुक्ता अर्थात मुक्ति (मोक्ष) हो जाता है औऱ शंख ,सीप औऱ घोंघा संसार की अन्य सामान्य वस्तुओं के रूप में मान्य किया जाता है। यह तो हुईं सागर और भव- सागर की बातें । अब अपने मंतव्य की असली बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

          किसी सागर विशेष में तो नहीं ;एक छोटी - सी झील की गहराई में अवगाहन करने का प्रयास इस अकिंचन ने भी किया। उसने जो कुछ भी प्राप्त किया ,उन्हें सुनकर आप चौंक अवश्य जाएँगे।प्रशंसा एक ऐसी गहरी औऱ विलक्षण झील है कि इसमें जितना नीचे जाएंगे ,उतने ही मोती भी भरझोली ले आएंगे ।मुझे भी मिले।जिन्हें आपको दिखाना चाहता हूँ। जब मैंने देखे हैं तो आप भी दर्शन- लाभ करें। 

        ये संसार सच से अधिक झूठ से संतुष्ट रहता है। यदि झूठ और सच दोनों में से एक को चुनना हो ,तो उसके चयन की प्रथम वरीयता झूठ की होती है। भले ही उसके कारण उसे कष्ट उठाना पड़े, संकट में पड़ना पड़े, जेल भी जाना पड़े; किन्तु पहले वह सच को नहीं ;झूठ को ही चुनेगा।कोई भी किसी की प्रशंसा कर रहा हो ;उसमें आधे से अधिक झूठ की पॉलिश, चमक- दमक, गमक,महक, लहक,चहक होती ही है। और अनिवार्य रूप से होती है। अब चाहे वह क्रीम ,पाउडर, साबुन ,मंजन ,लिपस्टिक, मंजन, टूथ पेस्ट, कॉस्मेटिक्स आभूषण, वस्त्र आदि का विज्ञापन हो अथवा किन्हीं नेताजी के गुणों का गायन। चाहे किसी वर की तलाश में मध्यस्थ द्वारा किसी लड़के को लड़की वालों द्वारा दिखवाया जा रहा हो अथवा किसी लड़की को विवाह हेतु उसका गुणगान किया जा रहा हो।

                   'प्रशंसा' से खून बढ़ता है।खून का दौरा भी तेज होता है।आदमी फूल कर यों कुप्पा हो जाता है ,जैसे रबर के पिचके हुए ट्यूब में हवा भर दी गई हो।   इस   प्रशंसा   ने  आदमी  के बड़े -बड़े काम  किए हैं।  उन्हें  मूर्ख   से महापंडित,महाज्ञानी सिद्ध किया है। भले ही कुछ ही देर के लिए हो। पर इससे असंभव भी संभव होते हुए देखा गया है।कालिदास और विद्योत्तमा का उदाहरण हम सबके समक्ष है।पंडितों द्वारा की गई झूठी प्रशंसा ने एक मूर्ख औऱ जड़बुद्धि को विद्वान सिद्ध करते हुए विदुषी विद्योत्तमा से परिणय करवा दिया। यह चमत्कार प्रशंसा का ही था।

        दुनिया के किसी भी विज्ञापन में झूठी प्रशंसा के अतिरिक्त होता ही क्या है! बड़े -बड़े साँचाधारी करोड़ों में उन झूठे विज्ञापनों को करके नित्य की अपनी रोटी उपार्जित कर रहे हैं औऱ सब कुछ जानती हुई 'समझदार' जनता को मूर्खता की चाशनी से माधुर्य प्रदान कर रहे हैं।कौन नहीं जानता कि संसार की किसी भी गोरा बनाने वाली क्रीम से कोई गोरा नहीं हो सकता।फिर भी जानबूझकर मूर्ख बनना आदमी की हॉबी है।यदि ऐसा होता तो भारत भूमि समस्त भैंसवर्ण के नारी- नर, युवा प्रौढ़ ; दूध जैसे गोरे चिट्टे हो जाते! अफ्रीका में एक भी हब्शी श्याम तवावर्ण नहीं मिलता ।गोरा बनाने वाली क्रीम जो है न ! विज्ञापन रूपी प्रशंसा की यही खास बात है ,कि वह बुद्धिमानों की बुद्धि पर भी कलई पोत देती है।

            कौन नहीं जानता कि नेता न सच बोलता है औऱ न सच के आसपास भी फटकता है।किंतु आम जनता को ऐसी चटनी चटवाता है कि उसके सफेद झूठ को भी वह गाय, गंगा औऱ गायत्री जैसा पवित्र मानकर उसे वही करने देती है ,जो नहीं करने देना चाहिए। मतमंगे औऱ उनके आगे पीछे चलने वाले भेड़ छाप अनुगामी चमचे अंततः उनके झूठे विज्ञापन ही तो हैं। उनके प्रशंसक ही तो हैं। उनकी प्रशंसा में चार चांद लगाने का उनका महान दायित्व नेता को कहाँ से कहाँ पहुँचा देता है। जगह- जगह चौराहों पर किये जाने वाले उनके भाषण में भला झूठ के अतिरिक्त होता भी क्या है। कहना यह चाहिए कि राजनीति की नींव ही झूठ और झूठी प्रशंसा पर रखी गई है।

              साहित्यिक क्षेत्र में भी झूठी प्रशंसा का बोलबाला है। यदि किसी कवि की झूठी प्रशंसा कर दी जाए तो वह अपने को वाल्मीकि का अवतार समझने लगता है।किसी कवि को गिराने औऱ उठाने में समीक्षक की प्रंशसा की अहम भूमिका होती है।समीक्षक द्वारा किसी रचनाकार को उत्साहित अथवा हतोत्साहित करना उसके नित्य का बाएँ हाथ का खेल है।कोई समीक्षक किसी कवि के भविष्य को चौपट भी कर सकता है औऱ प्रशंसा के तिल का ताड़ बनाकर उसे हिमालय के उच्च शिखर पर भी आसीन करा सकता है। कोई समीक्षक किसी की समीक्षा में एक - दो शब्द की औपचारिक टिप्पणी करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है तो किसी के लिए पूरी स्तुति - गायन करते हुए उसका चरणोदक पान करते हुए धन्य हो जाता है। यदि रचनाकार नारी है ,सुंदर भी है औऱ युवा भी है ,सुभाषिणी भी है ;तब तो कहना ही क्या है ! ताश के पुल पर पुल बनते चले जाते हैं।उसे साक्षात सरस्वती के उच्च आसन पर अधिष्ठित करना अनिवार्य ही हो जाता है।उसे संसार की अनेक दुर्लभ उपमाओं से सुसज्जित किया जाता है।यह सब समीक्षकों की प्रशंसा का ही चमत्कार है ,प्रतिफल है।

          इस देश में जिस व्यक्ति का अपना कोई चरित्र नहीं, ऐसे 'महापुरुष' ही नौकरी, शिक्षण संस्थान में प्रवेश के लिए आचरण औऱ चरित्र की उज्ज्वलता का प्रमाणपत्र देते हुए देखे जाते हैं।यहाँ पर चरित्र का अर्थ मात्र स्त्री पुरुष के जैविक सम्बन्धों की नियम विरुद्धता से ही लिया जाता है। उसके चोरी, गबन, रिश्वत खोरी, भृष्टाचारी आदि पहलुओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। हर पति के लिए उसकी पत्नी और पत्नी के लिए उसका पति सर्वाधिक चरित्रहीन होते हैं। फिर सारे जगत की क्या कहिए कि कौन कितना चरित्रवान है! वह क्या स्पष्टीकरण देगा अपने को चरित्रवान कहलवाने का? 

             वस्तुतः प्रशंसा बहुमुखी ,बहु आयामी, सकारात्मक भी ,नकारात्मक भी, पूरब भी पच्छिम भी ,उत्तर भी ,दक्षिण भी,आज भी ,कल भी अर्थात बहुत कुछ है। प्रशंसा पर संसार का सारा विज्ञापन जगत, विवाह जगत,नेता जगत, नर-नारी जगत और सहस्र फण धारी नाग की तरह सारी पृथ्वी टिकी हुई है। यदि प्रशंसा न होती तो बहुत सारे नर नारी कुँवारे ही रह जाते। विज्ञापन ही जिनकी जान है ,ऐसे धंधे ,उद्योग ,कल,कारखाने बंद नहीं होते ,खुल ही नहीं पाते। अकवि को कवि औऱ कवि को अकवि बनाने में प्रशंसा की अहम भूमिका है। यदि आपको भी उच्च कोटि का कवि बनना है तो कुछ समीक्षकों को मक्खन लगाइए अर्थात .....। 

 🪴 शुभमस्तु ! 

 २३ जून २०२२ ◆ ५.४५ पतनम मार्तण्डस्य। 

तड़पे एक बीजुरी नभ में ⚡ [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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तड़पे   एक   बीजुरी  नभ  में,

सौ -  सौ   बीच     हिए   मेरे।

सावन  भादों  के  घन   उमड़े,

बीती    अवधि  न   पी   हेरे।।


मन  की  बातें   मन   में   मेरे,

किससे  कहूँ    कहाँ    जाऊँ।

अंतरंग   है     कौन    सहेली,

जिससे  मन की  कह  पाऊँ।।

करती हैं  परिहास  पड़ोसिन,

रहतीं    सुबह  - शाम    घेरे।

तड़पे  एक   बीजुरी   नभ  में,

सौ  -  सौ   बीच   हिए   मेरे।।


गरजें   जब  बादल  अंबर  में,

थर - थर  काँपे  हिया  सजन।

सौतन   कौन   बनी   है  मेरी,

मैं  बैठी  क्या   करूँ भजन??

सात  वचन  देकर   हे प्रीतम,

सात     लिए     तुमने    फेरे।

तड़पे   एक  बीजुरी  नभ  में,

सौ -  सौ   बीच    हिए   मेरे।।


'उर  में  सजा  रखूँगा सजनी,'

वादे     किए    हजारों    तुम।

मैंने  क्या   अपराध   किए  हैं,

जिसकी सजा मिली हरदम।।

एकाकी  दिन -  रात  काटती,

धर्म -  संकटों        के     घेरे।

तड़पे   एक   बीजुरी  नभ  में,

सौ - सौ   बीच     हिए   मेरे।।


प्यासी  धरती   तृप्त   हो गई,

हरे  - हरे     अँखुए      आए।

पावस   के   घन बरस रहे हैं,

प्यास  न  सजन बुझा  पाए।।

अमराई    में   झूलें   सखियाँ,

कहतीं     कहाँ    पिया   तेरे।

तड़पे  एक   बीजुरी   नभ में,

सौ -   सौ   बीच  हिए   मेरे।।


भीगी चुनरी- चोली सखि की,

देख    हिए   में   आग    लगे।

बड़भागिनि वे पिय की प्यारी,

सबके   ही   शुभ भाग जगे।।

'शुभम्'अभगिनि  हूँ  मैं कैसी,

कोल्हू     बिना    गए     पेरे।

तड़पे  एक बीजुरी    नभ  में,

सौ -  सौ   बीच   हिए    मेरे।।


🪴 शुभमस्तु !


२३ जून २०२२◆१०.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

बुधवार, 22 जून 2022

संतुलन 🏋🏻‍♀️ [ मुक्तक ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏋🏻‍♀️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

रात दिन के संतुलन से है प्रकृति शुभदा सदा

उदित होते सोम सूरज हैं न विचलित एकदा

बह रही सरिता सजीली सिंधु से मिलना उसे

गूँजती  वीणा  सुरीली,विमल वाणी  शारदा।


                         -2-

शुभ्रतम जीना अगर तो संतुलन अनिवार्य है

अग्रसर  हो  कर्मपथ पर धर्म तेरा  कार्य  है

दूसरों के छिद्र में क्यों डालता है   अँगुलियाँ

राह मेंअपनी चला चल शिष्य या आचार्य है।


                         -3-

पित्त कफ या वात तीनों संतुलन होना सही

विषम भोजन रोगकारी दूध के सँग ज्यों दही

मास दो - दो के लिए आ जा रहीं ऋतुएँ यहाँ

याद रखना बात सच ये जो शुभम् ने है कही


                         -4-

भू गगन जल वायु पावक से जगत साकार है

संतुलन विकृत हुआ तो विश्व ये  बीमार   है

सृष्टिकर्ता की महारत देखिए अद्भुत  अटल

आँधियाँ, भूकंप , बाढ़ें  ले  रहीं आकार   है।


                         -5-

संतुलन परिवार में हो संतुलन हो   देश   में

संतुलन  संसार में  हो  विश्व में  परदेश  में

होड़  भी हथियार  की ये हो नहीं  संसार  में

शांति का साम्राज्य होगा भूमि के हर देश में।


🪴शुभमस्तु !


२२.०६.२०२२ ◆१०.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


दो - दो खरहे पाले 🐇 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🐇 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मैंने   दो  -   दो  खरहे   पाले।

आधे     गोरे    आधे   काले।।


घर  भर में   वे   दौड़  लगाते।

दिखते कभी कभी छिप जाते।

चिकने  बाल  सरकने  वाले।

मैंने   दो - दो   खरहे   पाले।।


सुबह  सैर  को मम्मी जातीं।

घास नोंचकर उनको लातीं।।

मैं  कहता  ले  खरहे  खा ले।

मैंने  दो  -  दो  खरहे  पाले।।


कूकर   बिल्ली  से  वे डरते।

दौड़ भागकर छिपते फिरते।।

बंद   किए   कमरे   के ताले।

मैंने  दो -  दो   खरहे   पाले।।


सब्जी  के  छिलके  तरबूजा।

खा   लेते   हैं  वे   खरबूजा।।

खाते   खीरा  बिना   मसाले।

मैंने   दो  -  दो  खरहे  पाले।।


शश की देखभाल हम करते।

नहीं किसी गृहजन से डरते।।

नाम   रखे   हैं    गोरे   काले।

मैंने   दो  -  दो  खरहे  पाले।।


🪴शुभमस्तु !


२१ जून २०२२◆१.४५

पतनम मार्तण्डस्य।

पावस ऋतु मनभावनी 🌈 [ दोहा ]


[पावस,बरसा,फुहार,खेत,बीज]

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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         🌳 सब में एक 🌳

आसमान नीला नहीं, छाए सित   घन   घोर।

रिमझिम पावस नाचती,गीत लीन पिक मोर।

पावस ऋतु झरझर करे, उधर विरह का नीर

विरहिन के दृग से झरे, टीस रही  उर  पीर।।


बाहर आ सखि देख तो,बरसा निर्मल नीर।

झुक-झुक बादल आ गए,कलरव करते कीर

प्यासी धरती देखकर,द्रवित हुए  घन  मीत।

बरसा जल आषाढ़ में,बढ़ी धरा  की  तीत।।


नन्हीं   बूँद फुहार  का, लेना   हो    आंनद।

चलो मीत  बाहर चलें,बरस रहे    घन  मंद।।

सखि फुहार बढ़ने लगी,चिपकी चोली देह।

बंद  करें अब झूलना,चलतीं हैं निज गेह।।


पावस ऋतु मनभावनी,शेष नहीं  अब  रेत।

बरस  रहे हैं मेघ  दल,भरते सरिता  खेत।।

सावन बरसा देखकर,मन में मुदित किसान।

खेत बने तालाब- से, छोड़ी  खाट  विहान।।


बोए बीज  किसान  ने, उर्वर  धरती  खेत।

हरे -हरे अंकुर खिले,सकल सघन समवेत।।

बीज-वपन की कामना, नारी - हृदय अधीर।

विकल प्रतीक्षा में बड़ी,मिटे गात की  पीर।।


      🌳 एक में सब  🌳

बरसा बादल खेत में,

                         पड़ती सघन   फुहार।

पावस  में   हलवाह   ने, 

                              बोए बीज   अपार।।


🪴शुभमस्तु !


२२.०६.२०२२◆०६.००

आरोहणम् मार्तण्डस्य।

टिप -टिप औलाती ⛈️ [ चौपाई ]

 

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✍️  शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्म'

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बरसे   पावस  के   घन प्यारे।

दिखते  नहीं   गगन  में तारे।।

टपक  रहे  हैं  छप्पर , छानी।

बरस  रहा  है  शीतल पानी।।


औलाती  से टिप -टिप झरता। 

वर्षा-जल भूतल  पर भरता।।

गिरती   धार  हाथ से  छूकर।

छिटक  गई है  गीली  भूपर।।


सस्वर    बूँदें   गीत   सुनातीं।

कानों को वे अतिशय भातीं।।

हैं  प्रसन्न    सारे   नर -  नारी।

जल थलचर खग प्रमुदित भारी।


आओ हम  सब  मोद  मनाएँ।

रवि-आतप अब क्या कर पाएँ

बैठे   हम   छप्पर   के   नीचे।

बिछा  खाट निज आँखें मीचे।


छिटक-छिटक कर बूँदें आतीं।

तन मन वसन भिगोकर जातीं।।

'शुभम्'  सुहाती  नम औलाती।

भूरे     घन    पावस  बरसाती।।


🪴शुभमस्तु !


२१ जून २०२२◆११.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 20 जून 2022

तम के पास उजास 🪷 [ सजल ]


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समांत : आस ।

पदांत:  है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सुर       गण     को    शुभदा  सुवास    है।

आती       उनको      सदा     रास      है।।


तामस        ग्राही      असुर   सदा      से,

सुमनों        में        लगती   कुवास     है।


अस्ताचल        में        रविकर      पहुँचा,

हयदल         खाए      तमस    घास     है।


भले       न      भाए      तम    को   सूरज,

हर     तम        के      पीछे    उजास   है।


एक     ओर      शव     जलें  चिता    पर,

उधर         जन्म      लेता    विकास    है।


साथ      -    साथ     उद्भव - विनाश   भी,

प्रकृति         का        अद्भुत   प्रयास    है।


'शुभम्'       पुतिन   के    संग  देश    कुछ,

जेलेंस्की         की      आस,   पास       है।


🪴 शुभमस्तु ! 


१९जून २०२२ ◆१०.४५पतनम् मार्तण्डस्य।

रविवार, 19 जून 2022

प्राकृतिक न्याय 🪴 [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बिना         भाव         साकार    न     होता।

शब्दों          का        आकार   न    होता।।


जननी          जनक       नहीं   यदि    होते,

संतति       का      आधार    न         होता।


कृत       पुण्यों     के     बीज   न    फलते,

भव   -    सागर      से     पार   न     होता।


सत         करनी       सुमनों  -   सी  महके,

क्या      मानव   -   आचार   न       होता ?


नहीं           वासना         होती    अतिशय,

मानव       भू       का      भार    न   होता।


होड़          लगी       आगे     बढ़ने     की,

ग्रीवा      में        शुभ     हार   न      होता।


'शुभम्'      प्रकृति       का   न्याय  बड़ा  है,

देश    -    देश      में     वार   न      होता।


🪴 शुभमस्तु !


१९ जून २०२२◆ ७.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।

स्वर्ग का द्वार :पिता 🪷🪷 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम् '

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प्रथम पता मेरे पिता, पावन मम    पहचान।

उऋण नहीं होना कभी, सागर,शृंग  समान।।

संस्कार शुभतम दिए,जनक 'शुभम्' सुत मूल

भले क्रोध  करते कभी,रहे सदा   अनुकूल।।


कभी न ऊँचे बोल में,बोला पितु के   साथ।

दृष्टि विनत मेरी रही,सदा झुका पद -माथ।।

पितृ- दत्त आदेश का,सदा किया   सम्मान।

वह अनुभव के  ग्रंथ थे,हित मेरे    वरदान।।


अश्रु पिता के नयन से,गिरे न 'शुभम्' समक्ष।

घर भर के आधार वे,गृह- वाहन  के अक्ष।।

जननी के दो चरण में,रहता स्वर्ग - निवास।

पिता द्वार उस स्वर्ग के,मत समझें  ये हास।।


दिया पिता ने प्यार जो, कौन करेगा   और।

नहीं अभावों में जिया,'शुभम्'पिता सिरमौर।

सूरज-से पितु गर्म थे, पर प्रकाश - भंडार।

उनके छिपते ही भरा, जीवन में  अँधियार।।


आज पिता की रश्मियाँ, देतीं सुखद प्रकाश।

ऊर्जा उनके नेह की,भरती'शुभम्' सु-आश।।

पितृ कर्म से कीर्ति का,ध्वज लहरा आकाश।

शक्ति,ज्ञान,सम्मान से,मिला 'शुभम्'मधुप्राश।


जीवन में सब कुछ मिला,मात पिता आशीष

जन्म-जन्म भूलूँ नहीं,'शुभम्'कृतज्ञ मनीष।।


🪴 शुभमस्तु !


१९जून २०२२◆१२.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शुक्रवार, 17 जून 2022

घास में कीड़े 🌿 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हरी  घास    में   कीड़े   पनपे,

हर   पल्लव    छलनी   होता।

सुमन  खिलें  शाखा पर कैसे,

सूखा  है     सुगंध   -  सोता।।


पादप  की सूखी  शाखा  पर,

सुमन नहीं, फल  क्यों  आएँ?

जैसे  बोए    बीज    बाग   में,

वे   बबूल   बस   चुभ  पाएँ।।

घुड़शाला   में   गधे   पले   हैं,

खड़ा  - खड़ा    हाथी  रोता।।

हरी   घास   में   कीड़े   पनपे,

हर   पल्लव   छलनी  होता।।


घुट्टी  में घिस  जहर  पिलाया,

जहर      सपोले       उगलेंगे।

आस्तीन    के  साँप     दोमुँहे,

आजीवन    क्या    सुधरेंगे??

वही  काटता  फसल आदमी,

जो   अतीत   में   वह   बोता।

हरी    घास  में   कीड़े   पनपे,

हर  पल्लव    छलनी  होता।।


दूध    पिला कर  पाल रहे हो,

दोष  किसे   अब    देते   हो?

मिल  जाए   ऊँचा   सत्तासन,

मत   भी   तो   तुम  लेते हो!!

खंड -  खंड   हो  जाए भारत,

भावी   भले      रहे       रोता।

हरी   घास   में   कीड़े   पनपे,

हर  पल्लव   छलनी   होता।।


श्रम के बिना पेट जब भरता,

कौन  काम    करने    जाए?

पैरों   की     जूती   पैरों    से,

निकल  शीश  पर  जा धाए!!

अपनी  करनी का फल देखो,

हाथों   से     उड़ता    तोता।।

हरी  घास    में   कीड़े  पनपे,

हर  पल्लव   छलनी   होता।।


डेंगू  , मसक    चूसते   लोहू,

नाली   में   है   घर  जिनका।

मेवा   मिसरी    चाभ   रहे हैं,

आश्रय थल जिनका तिनका।

'शुभम्' योजना बदलें अपनी,

लगा     रही    जनता   गोता।

हरी   घास  में   कीड़े   पनपे,

हर  पल्लव   छलनी   होता।।


🪴 शुभमस्तु !


१७ जून २०२२◆१०.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सुप्रभात 🌅 [ दोहा ]


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✍️  शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कर्म-वृक्ष की शाख पर,लगते फल अनमोल।

सदभावों   से  सींचिए,मिलते हैं   अनतोल।।


देख   दूसरे   वृक्ष   पर,  फल मीठे     रंगीन।

ललचाओ  मत  मानवो, होना कर्म  प्रवीन।।


परजीवी   बनकर  रहे,चूसे पर   धन   खून।

जीवन में खिलना नहीं,उसका भाग्य प्रसून।।


समय कभी  रुकता नहीं,भोर दुपहरी  शाम।

प्राची में   सूरज  उगे,करता जगत   प्रनाम।।


जगत चाल को देखके,सबक लीजिए सीख।

धोखा मत देना  कभी,सदा तुम्हारी   जीत।।


रात  गई  तम है  विदा,आई मधुरिम  भोर।

नई  आस  ले  जाग  तू, करें पखेरू  शोर।।


सघन अपेक्षा ही बड़ी,दुख का  कारण  एक।

व्यर्थ बोझ सिर ढो रहा, खो तू स्वयं विवेक।।


नाच  रहीं  गोधूम   की, बालीं ले   हिलकोर।

चिड़ियाँ चहकी  पेड़ पर,देख सुनहरी भोर।।


कुहू-कुहू कोकिल कहे,बोल मधुर नित बोल।

भाषा ललित सुहावनी,हृदय- तराजू  तोल।।


बीता  आतप  जेठ  का,छाए घन  घनघोर।

पावस ऋतु सरसा रही, सुखद सुहानी भोर।


प्यासी धरती ने दिया ,आँचल अपना खोल।

बरसो  मेघा  जोर   से, पानी दो अनमोल।।


शीतल मन की चाँदनी, देती सुखद प्रकाश।

सोच समझ कर जो चले,होता नहीं निराश।


अहंकार  के  शीश  पर,बैठा सदा  विनाश।

गिरता पल भर में धरा,महल बना जो ताश।।


पावस के घन शून्य में,घिर आए चहुँ  ओर।

शीतल बही बयार नम,खेलें बाल   किशोर।।


नवल  दोंगरे  ने किए,हर्षित खेत  किसान।

आशाएं  जगने लगीं, होता सुखद विहान।।


🪴शुभमस्तु !


१६ जून २०२२◆११.००आ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


बुधवार, 15 जून 2022

पावस की अनुहार 🌈 [ दोहा ]


[ बदरी,बिजली,मेघ,चौमास, ताल ]

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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           ☘️ सब में एक  ☘️

दूर - दूर    आकाश  में, नीला निर्मल     रंग।

बदरी का टुकड़ा नहीं,नित आतप का  संग।

प्रभु बदरी जग पालते,ज्यों निज संतति मात

आठ प्रहर  चौंसठ घड़ी,दिन हो  चाहे  रात।।


याद तुम्हारी कौंधती,ज्यों बिजली घन बीच

करतीं उर में वास तुम,पंकज खिलता कीच

पावस   का   डंका बजा,है आषाढ़  सु-माह।

कौंध रही बिजली सखी,जल कर्षक की चाह


धरती  प्यासी मौन है, मेघ शून्य  नभ  नील।

व्याकुल  पंछी  नीड़ में,उड़ती ऊँची  चील।।

पावस ऋतु भी आ गई, विरहिन दुखीअपार

प्रिय सावन के मेघ-से, बरसाओ जल धार।।


विरहिन को विश्वास है,आए अब  चौमास।

पिया-आगमन हो तभी,मिटे हृदय की प्यास।

नारी यौवन मत्त है,निशिदिन प्रियतम आस।

अब यौवन चुभने लगा,आया जब चौमास।


पावस  ऋतु  रानी  बड़ी,भरे दोंगरा   ताल।

मेढक  वीर  बहूटियाँ, रेंगीं किए   बहाल।।

तली ताल की तृप्त हो,भरे हुए   सद  नीर।

जलचर  मोद  मना  रहे, गई पिपासा   पीर।।


           ☘️ एक में सब  ☘️

बदली, बिजली,मेघ से,

                         पावस की अनुहार।

ताल भरे  चौमास में,

                  षड  ऋतु का सुख सार।।


🪴 शुभमस्तु !


१५ जून २०२२◆ ५.०० आरोहणम् मार्तण्डस्य।


आदमी का सरल होना ! 🪢 [ व्यंग्य ]


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✍️ व्यंग्यकार ©

🪢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कभी आपने इस बात पर विचार किया है कि 'क्याआदमी कभी सरल भी हो सकता है?' अपने अध्ययन काल में एक कहावत पढ़ी थी : 'कुत्ते की पूँछ बारह साल तक घूरे में गाड़ कर रखा गया ,किंतु सीधी नहीं हुई।'  चूँकि यह कहावत किसी कुत्ते ,बिल्ली या चूहे ने नहीं बनाई ,इसलिए इसे अन्योक्तिपरक रूप देने का श्रेय आदमी को ही देना चाहूँगा;क्योंकि आदमी अन्योक्तियाँ बुझाने का कुशल मर्मज्ञ  है। वह क्यों अपनी ही प्रशंसा करके मियां मिट्ठू बनना पसंद करेगा? यह आदमी ही कुत्ते की वह हठीली,रपटीली, सर्पीली, बबाली और सवाली  पूँछ है ; जिसमें सीधी सरल  होने का 'दुर्गुण' कभी नहीं आया। हजारों ,लाखों क्या करोड़ों वर्षों से  वह टेढ़ी की टेढ़ी ही है और भविष्य में भी टेढ़ी ही रहेगी ।

आदिम युग का आदमी जितना सरल औऱ सीधा था,उससे इस प्रश्न का उत्तर मिल सकता है। अब यह तो वही बात हो गई न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी।इतने पहले के आदमी को कहाँ से खोजकर लाया जाए? जब ऐसा नहीं हो सकता तो हमें ही यह विचार करना होगा कि  क्या आदमी भी कभी सरल हो सकता है ?

जिसे भी देखते हैं ,वह जो नहीं है , वही बनने के फेर में चकरघिन्नी बना हुआ जीवन बिता देता है। आदमी 'वह' नहीं रहना चाहता ,जो वह वास्तव में है। वह इस प्रकार का मॉडल बनकर बाहर आना चाहता है कि चरण सिंह सरताज सिंह बनकर दिखाना चाहता है।गरीब सिंह ने अपना नाम धन सिंह रख लिया है।लक्ष्मी नाम धारी नारी  भीख माँग रही है।  इस 'महान' कार्य के लिए आजीवन खिट- खिट में खोया रहता है ।कभी कपड़े,कभी आभूषण,शृंगार, भाषा, आचरण , चरित्र आदि के नकली आवरण पहनता ,उतरता, बदलता, धोता ,सुखाता रहता है।कोई उसकी असलियत न जान ले, बस इसी प्रयास में वह नंगा होता है ,तो बंद हमाम में।वह अपनी पत्नी के सामने भी निरावरण नहीं होना चाहता। यही स्थिति नारियों की भी है, बल्कि कुछ ज्यादा भी हो तो शोध करने पर दूध का दूध पानी का पानी सामने आ जायेगा ! सरल होना तो उसने सीखा ही नहीं। इसी को उसने एक चिकना- चुपड़ा नाम दे रखा है : सभ्यता और संस्कार।


किसी अधिकारी, कर्मचारी,अभिनेता, नेता,धर्माधिकारी, रँगीले वेश धारी, कोई भी पुरुष या नारी ; सभी में पाई गई ये पवित्र बीमारी। घर पर लड़के वालों को  लडक़ी दिखाते समय पड़ौस से माँगा गया सोफा सेट, टी सेट, लेमन सेट, डिनर सेट आदि उसके अति विशिष्ट पन दिखाने के बहु रूप ही हैं।इस मामले में प्रकृति ने भी मनुष्य का सहयोग ही किया है।उसके लिए हजारों प्रकार के रंग निर्मित कर उसे सौंप दिए हैं कि लो मैने तो तुम्हें जैसा बनाया था , बनाया ही था,अब तुम जितने टेढ़े बन सको, बन लो। क्योंकि अपना असली रूप दिखाने में तुम्हें शर्म आती है।जैसे जलेबी कभी सीधी सरल नहीं हो सकती ,वैसे तुम इंसान भी  कुत्ते की पूँछ के बाप हो ,जो करोड़ों वर्षों में  टेढ़े ही होते गए। औऱ अभी भी क्रम जारी है। सरलता तुम्हारे लिए नंगापन है। इसलिए असलियत को बाहर नहीं आने देना चाहते।सरलता देखनी हो तो दिगम्बर मुनियों से पूछो।विशिष्टता और अति विशिष्टता प्रदर्शन  का विशिष्ट ढोंग  तुम्हारा विशेष गुण है।

संसार के इतिहास में यदि सरल व्यक्तियों का शोध किया जाए तो बिरले ही मिल सकेंगे। यदि किसी देश औऱ धर्म के आलोक में ऐसे महामानवों की खोज की जाए तो उन्हें अँगुलियों पर भी आसानी से गिना जा सकता है; अन्यथा सारा संसार वक्रता का पर्याय बना हुआ अपने जलेबी पन का प्रतीक बन हुआ है। सर्प अपने बिल में भले सीधा घुसे किन्तु आदमी अपने घर में भी सरल नहीं रह गया। देखने में उसके मुँह में भले एक ही जीभ हो ,परंतु कार्य कुशलता में अनेक जीभों का स्वामी है। उसके पास मन भी एक नहीं ,अनेक मन हैं।जो निरंतर चलायमान और परिवर्तनशील हैं।मनुष्य में सरलता को ढूँढ़ पाना तो इस प्रकार है , जिस प्रकार चील के घोंसले में मांस नहीं ढूँढ़ पाना।

आज के मानव की स्थिति पर यदि विचार किया जाए तो जो जितना असरल, वक्र, चक्राकार और बनावटी है ,वह उतना ही 'महान' है।अब महानता के मानदंड सरलता, बच्चों जैसा भोलापन अथवा ज्ञान नहीं है, उसका प्रबल ढोंगी होना ही उसे देश, समाज और व्यक्ति की दृष्टि में महान बनाता है और वह इससे अपने घमंड में फूला नहीं समाता। वक्रता मानव की महानता का पर्याय बनती जा रही है। आज का मानव अपना काला इतिहास स्वयँ लिख रहा है। सरलता जैसे  पानी भरने विदा हो चुकी है। कलों का प्रतियोगी मानव कलों से भी दस कदम आगे चलने में योजनाबद्ध रूप से संलग्न है।द्वंद्व ,फंद, धोखा, काइयाँपन, पर उत्पीड़न, प्रदर्शन, (फ़ोटो, वीडियो, टीवी ,अखबार आदि माध्यम) आज के सरलता से कोसों दूर मानव के पर्याय हैं। किस विनाश की ओर अग्रसर हो रहा है वह, अनिश्चित भविष्य के गर्भ में है।

🪴शुभमस्तु !

१५ जून २०२२◆ ६.४५ 

 पतनम मार्तण्डस्य।

🪢🥨🪢🥨🪢🥨🪢🥨🪢

कटि तट पर घट रखे 🪷 [ मुक्तक ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                          -1-

कटि  तट   पर  घट  रखे एक वामा     चली,

देख   नवल     सौंदर्य   चुभा काँटा    छली,

थाम  लिया  सद  जल  घट  झुकी पीड़ा से,

पनघट  से   इठलाती   ब्रज गाँव   -   गली।


                        -2-

घट को कटि से तिय अलग रखे भी तो कैसे,

जल  छलक  न  जाए एक बूँद  घट  से  ऐसे,

झुक  स्वयं  वाम  हो  काँटा हेर   रही   वामा,

यों   खड़ी विनत  हो काँटा खींच  रही   ऐसे।


                         -3-

नव  गौर  गात  घट धरे सजल कटि    भारी,

पहनी       शाटिका      सुरंग  पद्मिनी  नारी,

नटखट    काँटा    पगतल  में छेड़ा      ऐसे,

झुक  लगी   हटाने  शूल काम की     क्यारी।


                           -4-

'क्यों   आया    मेरी   राह   चुभा पग काँटे!'

तरुणी   घट को  कटि  दबा मौन  हो   डांटे,

मैं    तो  जाती   थी पनघट से जल   भरके,

अब    जो  आया   तो  मारूँगी   दो  साँटे।


                          -5-

तरुणी   का   देखा    हाव  उठाए  घट   को,

तब    लगा   पाँव में  शूल  बिखेरे  लट  को,

झुक    गई     उठाए     भार  वाम  हो  ऐसे,

घर से निकली वर नारि निकट  पनघट को।


🪴शुभमस्तु !


१४ जून २०२२◆ १.००पतनम मार्तण्डस्य।

उसी थाली में छेद किए? 🥘 [ अतुकांतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🥘 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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जिस थाली में

सदा खाया,

उसी में छेद कर

लतिआया!

तेरा ये फितूर

समझ में नहीं आया !


न देखा वर्तमान

न भविष्य की चिंता,

देश के प्रति द्रोह

विद्रोह भी,

जीने का तरीका

भी शरमाया !


बाहर भी जहर

भीतर भी,

क्रूरता की होती है

कोई हद भी,

तेरे माँ बाप ने

क्या यही सिखलाया ?


कीड़ों की तरह 

ग़ज़बज़ाना,

मच्छरों की तरह 

सिमट खून पी जाना,

शायद यही तो 

तुझे रास आया!


हाथ में  पत्थर

दिल में भी पत्थर ही

पत्थर,

रक्त का संचार

रुका पाया,

कभी सड़कों पर

कभी गलियों में

देखा तो दौड़ता पाया।


🪴शुभमस्तु !


१३ जून २०२२◆  ६.००पतनम मार्तण्डस्य।

सोमवार, 13 जून 2022

कीले जाने साँप हैं! 🎯 [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

🎯 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

कीले   जाने  हैं  सभी, आस्तीन  के   साँप।

इस धरती का खा रहे,लिए परख वे  भाँप।।

लिए  परख वे भाँप, गीत औरों    के  गाते।

डंसते पालक हाथ,गैर का साथ     निभाते।।

'शुभम्' देखना  आज,पड़ेंगे ज्यों  वे   ढीले।

पड़े  मंत्र  की घात, त्वरित जाएँगे    कीले।।


                          -2-

तेरी  काली  चाल  में, मिले सदा    आघात।

खेल खेलता तू रहा,सदा किया  शह- मात।।

सदा किया शह -मात, चित्त भी पट भी तेरी।

 नीति नियम को झोंक,आग में चढ़ा मुँडेरी।।

'शुभम्' उठा पाषाण, मीत की ड्यौढ़ी  घेरी।

तोड़ी घर ,दूकान,यही थी क्या शह    तेरी!!


                        -3-

पाया नहीं चरित्र को,उस पर क्या   विश्वास!

मित्र,बहिन,माता नहीं,ज्यों बकरी को घास।।

ज्यों बकरी कोघास,उसे बस चारण  करना।

शूकरवत   संतान,  देह तापानल    हरना।।

'शुभम्'गमन का खेल,नहीं जो कभी अघाया

भरे सड़क मैदान, मनुज तन पशुवत पाया।।


                         -4-

काया से  कुछ काटकर,नाले में  भर  झोंक।

अलग अन्य से मानता,अलग बोल की पोंक।

अलग बोल की पोंक,अलग ही अपनी टोली।

सामिष  का संचार, सरसता थोथी    पोली।।

'शुभम्' भीड़ संतान, भीड़ लेकर वह  धाया।

हिंसा में  नित लीन, काम- रस डूबी  काया।।


                         -5-

बेहड़  में   भी शेर की, चलती है  सरकार।

पशु, पक्षी सब मानते, अपना ही  सरदार।।

अपना ही सरदार ,एक सम संविधान    है।

सब करते सम्मान, न कोई खींच-तान   है।।

'शुभम्'मनुज में हीन,आज भी है जन-रेवड़

हुर्र - हुर्र  के बोल , गुँजाते मानव  -  बेहड़।।


🪴 शुभमस्तु !


१३ जून २०२२ ◆१०.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।



लात -देव यदि बात न माने 🪷 [ सजल ]


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समांत : इत ।

पदांत:  है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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शठ     से    शठता    सदा  उचित      है।

करनी     रिपु    से    नीति विहित     है।।


काँटे        से       ही      निकले      काँटा।

दुश्मन     होता      पल   में चित        है।।


चपत      पड़ी     है    तव   कपोल    पर।

मारो        अनगिन      इसमें  हित      है।।


घी      न       निकलता    सीधी    अँगुली।

टेढ़ी      करना       ही    समुचित       है।।


लात   -   देव     यदि     बात  न       मानें।

जड़     कर      लात      करें  चिह्नित  है।।


आस्तीन        में         साँप     छिपे    हैं।

करना       ही         उनको   कीलित     है।।


'शुभम्'        शत्रु      हैं आँख    दिखाते।

उसे       फोड़ना      नित    वंदित      है।।


🪴 शुभमस्तु !


१३ जून २०२२ ◆४.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


रविवार, 12 जून 2022

बादल जल बरसाते! 🌧️ [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌧️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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माँ बादल  क्यों जल बरसाते?

धरती  को  गीली  कर जाते।।


पौधे   उगते   हैं   धरती   पर।

अन्न,फूल,फलआते घर- घर।।

मौसम   को   ठंडा कर जाते।

माँ बादल क्यों जल बरसाते?


नल, कूपों   में   पानी  आता।

नदिया ,तालों को भर जाता।।

सब खेत, बाग, वन   हरियाते।

माँ बादल क्यों जल बरसाते? 


पानी    पीकर   पौधे    बढ़ते।

जिन पेड़ों पर हम यों चढ़ते।।

धीरे -  धीरे    उन्हें     बढ़ाते।।

माँ बादल क्यों जल बरसाते?


बिजली  से हम  डर जाते हैं।

बाहर   से   अंदर   आते  हैं।।

गड़-गड़ का स्वर ये कर जाते

माँ बादल क्यों जल बरसाते?


देखो   बरस   रहा   है  पानी।

बादल की है  विकट कहानी।।

सागर से वे   जल   भर लाते।

माँ बादल क्यों जल बरसाते?


🪴 शुभमस्तु !


१२ जून २०२२◆६.३० पतनम मार्तण्डस्य।


बाहर क्यों अँधियारा है? 📪 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🐧 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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माँ  बाहर  क्यों  अँधियारा है?

लगता मुझे  न   ये  प्यारा है।।


आँखों   से   देता   न दिखाई।

भीतर -  बाहर   जैसे   काई।।

बस दिखता  मंडल  तारा  है।

माँ  बाहर क्यों अँधियारा है?


जब  रात  घनी  हो  जाती है।

दीपक माँ  नित्य जलाती है।।

होता   थोड़ा   उजियारा    है।

माँ  बाहर क्यों  अँधियारा है?


सूरज   दादा   छिप  जाते  हैं।

तब हम भी   सोने   पाते  हैं।।

अँधियारा   रवि   से  हारा है।

माँ बाहर क्यों  अँधियारा  है?


जब गोला  लाल  निकलता है।

अँधियारा काला   टलता  है।।

हटता जग  से  तम  सारा  है।

माँ बाहर क्यों  अँधियारा   है?


जब  चंदा   मामा  आ   जाते।

अपना  प्रकाश   वे  फैलाते।।

ज्यों  नई   रश्मि  की धारा है।

माँ बाहर  क्यों  अँधियारा है?


🪴शुभमस्तु !


१२ जून २०२२◆५.४५

 पतनम मार्तण्डस्य।


धर्मो रक्षति रक्षित: ⛳ [ दोहा गीतिका]


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✍️ शब्दकार ©

⛳ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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समय आ गया पार्थ फिर,लो गांडीव  उतार।

अरि अनीति पर आ गया करें न नीति विचार


शठ  से शठता नीति है,कहते कृष्ण   मुरारि,

'धर्मो रक्षति  रक्षितः, सह्य  नहीं  कर   वार।


सबक सिखाना चाहिए,जो म्लेच्छ अरि नीच,

लेना ही  प्रतिशोध है, करके उचित   प्रहार।


कटुता  फैले  धर्म  की,यही लक्ष्य  का  मूल,

कतर  देश  से कर रहा,धन को  भेज प्रचार।


मानव  तन में म्लेच्छ कृमि,रेंग रहे  हर ओर,

नाली  में मच्छर रहें, प्रजनन में   व्यभिचार।


शूल निकलता  शूल  से,खून माँगता   खून,

जो  गाली  दे गाल से, उसको गोली    चार।


आँख   तरेरे   सामने, अरि  तेरा    रणधीर!,

आँख निकालें हे 'शुभम्',रखना नहीं उधार।


🪴 शुभमस्तु !

१२ जून २०२२◆ ८.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

शनिवार, 11 जून 2022

गीदड़ के दिन आ गए! 🐺 [ दोहा गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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देवासुर   संग्राम   का, युग- युग  अत्याचार।

शांति-हनन करता रहा,असुरों का हर वार।।


देवों   ने    छोड़े    नहीं, धर्म, नीति,  सत्कर्म, 

असुर  समझते   देवदल,  है दुर्बल   लाचार।


पत्थर , ईंटें   फेंक   कर, छेड़ रहे    संग्राम,

आगजनी   विध्वंश  का , नहीं टूटता   तार,


नीति, नियम,कानून की,उड़ा धज्जियाँ मूढ़,

चाह  रहे  वर्चस्व जो,उठा हाथ   हथियार।


शांतिदूत   के  नाम का,उड़ा नित्य  उपहास,

मियाँ  मिट्ठुओं  का तना,तंबू बीच  बजार।


सुर-गण की जानी नहीं, शक्ति उड़ा उपहास,

रक्त -पिपासा बढ़ रही,दिखे न तीर, कटार।


मानवता   उर  से  मिटी, दानवता  का शूल,

नित्य सालता  ही रहा, तृण भर  नहीं उदार।


गीदड़  के दिन आ गए,भाग रहा   उस ओर,

महाकाल आगे  खड़ा,करता नहीं   विचार।


🪴 शुभमस्तु !


११ जून २०२२◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।


आगे भी जीवन है! 🚣🏻‍♀️ [नवगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🚣🏻‍♀️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बीत चुका वह भी जीवन था,

आगे भी जीवन है।


एक -एक पल वर्तमान का

बीत रहा क्षण -क्षण में,

ज्यों मुट्ठी से रेत जा रहा

फिसला -सा कण -कण में,

जीवन विशद कहानी,

कहते   आनी - जानी,

मानें  जैसा   मन   है।


शूकरवत नाले में कोई

मतवाला सोया है,

ढोता कोई बोझ शीश पर

कर्मठ नर खोया है,

हार नहीं कुछ मानी,

बड़े -बड़े जन दानी,

जीवन यह कंचन है।


इच्छाओं  के  फूल शाख पर

कभी नहीं मुरझाते,

खिलते जिनके फूल महकते

बनते फल सरसाते,

पथ पर सबको चलना,

दुनिया देख न  जलना,

घंटा घनन -  घनन है।


जड़ को सींच जिंदगी पाए

आएँगे नव पल्लव,

जड़ को ही ठुकरायेगा तो

मिले जगत को बद रव,

बस  चलते  ही   रहना,

सरिता -सा जल बहना,

सी उधड़ी  सीवन  है।


🪴 शुभमस्तु !


११जून २०२२◆१०.०० आरोहणम् मार्तण्डस्य।

अमराई की छाँव [नवगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कोयलिया

फुनगी पर कूके,

शाख बदलती

ऊपर    नीचे,

अमराई की नव छाँव में।


प्यासी कोख माँगती पानी

धरती बड़ी उदास है,

कोयल से  भेजती सँदेशा

उर में जागी  आस है,

घास न धानी-धानी, 

लगती शुष्क पुरानी,

मेरे छोटे -से गाँव में।


सोचा  चलें    घूमने  यों  ही

जूते घर में  छोड़ चले,

उछल -उछल कर पाँव धरे तो

पड़े फफोले जले तले,

अब तो शामत आई,

हँसते लोग -  लुगाई,

दौड़े झट  जामुन -  छाँव में।


चिड़ियों की चह-चह ने खींचा

कलरव में मतवाली वे,

ऊपर   दृष्टि   उठाई   ज्यों  ही

बीट   गिर   गई    डाली    से,

देखा नहीं  किसी ने,

नाया  शीश हँसी ने,

खोए  कागा की काँव में।


बादल के मुखड़े पर उड़ती

फीकी  - सी हवा हवाई,

धुंध भरे अंबर में बिखरे

है   नहीं  शेष  सुघराई,

रवि    की   दादागिरी,

चलती न पवन सीरी,

सब अपने -अपने दाँव में।


🪴 शुभनस्तु !


०९ जून २०२२◆१.००पतनम मार्तण्डस्य।

चिड़िया क्यों उदास है भारी 🐥 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🐥 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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चिड़िया क्यों उदास है  भारी।

लगती थी जो  इतनी  प्यारी।।


सुबह जागती चूँ -   चूँ  करती,

चहल-पहल से घर को भरती,

आज न   चूँ-चूँ   पड़ी  सुनाई,

बैठी अनमन   पड़ी   दिखाई,

आजअलग ही दिखती न्यारी।


साथ न  बैठा  आज  चिरौटा,

गया कहाँ वह अभी न लौटा,

इधर -उधर  बिखरे हैं तिनके,

सजा दिएथे जो गिन-गिन के,

रूठी खग - शावक महतारी।


दोनों    दाना -   पानी    लाते,

दौड़-दौड़ उड़-उड़ खिलवाते,

बच्चे चें -  चें  के  स्वर  करते,

चोंच खोल   दाना  मुँह भरते,

भूखे -  प्यासे    हुए   दुखारी।


घर में निज   घोंसला  बनाया,

सुखी एक   परिवार   बसाया,

क्यों उन पर   विपदा  है आई,

चुहल न अब वह   पड़े सुनाई,

मुरझाई  सुमनों  की   क्यारी।


🪴 शुभमस्तु !


०८ जून २०२२◆२.४५पतनम  मार्तण्डस्य।

बुधवार, 8 जून 2022

पर्यावरण और योग 🧘🏻‍♂️ [ दोहा ]

 

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 ✍️ शब्दकार ©

🧘🏻‍♂️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अपना कचरा औऱ के , दरवाजे  पर  डाल।

पीछे मुड़ मत देखना,हो परिशुद्ध  मुहाल।।


रोपें   पौधा   एक    ही, फोटो खींचें   चार।

सुर्खी   में  हँसते हुए,  छपवाएँ  अखबार।।


क्षमता से ऊपर करें, जल - दोहन  हे  मीत।

कल देखा किसने यहाँ, रहना धरा  अभीत।।


पौधारोपण    के  लिए ,  दें सबको   उपदेश।

देशभक्त  बन   जाइए,पहन  बगबगे   वेश।।


नित्य मिलावट कीजिए, धनिए में  हो  लीद।

पैसा   ही  भगवान  है , दीवाली   या    ईद।।


एक  साल में  एक दिन,करें देह   से   योग।

रहे  निरोगी  देह ये, डटकर भोगें    भोग।।


रहिए  सदा   प्रसन्न  ही, जैसे शूकर    श्वान।

भाषण  भोंकें   नित्य ही, तेरा योग  प्रमान।।


कथनी - करनी में सदा, रखना  ही  है भेद।

जो कहना  करना  नहीं, भले हजारों  छेद।।


रटें  पहाड़ा  योग  का, योगी बना  न  एक।

मालपुआ  के  भोग में,लगता बुद्धि  विवेक।।


उलटासन  मुद्रा  बना, खींचें चित्र   अनेक।

बैठक   में  लटकाईए, परामर्श  यह   नेक।।


योग  और  पर्यावरण ,के ज्ञानी   का   देश।

जगत -गुरू यों ही नहीं, सीखें सीख  सुरेश।।


🪴 शुभमस्तु !


०८ जून २०२२◆९.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।


बरसे स्वेद अबाध ☀️ [ दोहा ]

 

[पसीना,जेठ,अग्नि,ज्वाला,आतप]

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✍️शब्दकार ©

☀️ डॉ भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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       🪸  सब में एक  🪸

बहे पसीना देह से,   आतप   जेठ  अषाढ़।

श्रम-जल के लावण्य में, उर- संतोष प्रगाढ़।।

देतीं    सुख  वे   रोटियाँ, बहे पसीना   देह।

पत्नी  बोले   प्रेम से, परिजन का  हो   नेह।।


जेठ मास  तपने लगा, प्यासी प्यास उदास।

हृदय  धरा का फट  रहा, सूख रही है घास।।

तप्त   हवाएँ   लू बनी, रूखा जेठ   कठोर।

पंछी   प्यासे   मर  रहे, मौन हुए  वन मोर।।


पाँच  तत्त्व में अग्नि का,देव  रूप  है  मीत।

भीतर  - बाहर  देह  के,गाता जीवन -गीत।।

प्रेम - अग्नि में जो तपा, कंचन बना विशुद्ध।

अपने को जो होम दे,त्यागी मनुज   प्रबुद्ध।।


सदा न ज्वाला दीखती, नयनों से अभिराम।

हवन - यज्ञ में सोहती, पावनता  का  काम।।

जठरानल ज्वाला नहीं,दृश्य नयन से मीत।

उदराशय  में  भासती,उष्ण न होती  शीत।।


पूस माघ आतप बड़ा, लगता सुखद अपार।

वही  जेठ   में  ताप  दे ,तपते देह    कपार।।

आतप देखा जेठ का,कर घूँघट - पट ओट।

बाला पथ पर जा रही,देखे बड़ा  न    छोट।।


    🪸  एक में सब  🪸

जेठ अग्नि - ज्वाला बड़ी,

                          आतप   देता   शूल।

बहे पसीना - धार भी,

                         चिपका  देह  दुकूल।।


🪴 शुभमस्तु !


०७ जून २०२२◆१०.३०पतनम मार्तण्डस्य।


गर्मी आई 🌤️ [ बाल कविता ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🌤️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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क्या -क्या लाई

गर्मी आई।


खीरा ककड़ी है

खरबूजा,

लाल  -  लाल 

मीठा तरबूजा,

लँगड़ा आम 

दशहरी  लाई,

गर्मी  आई।


मथती दधि को

छाछ बनाती,

अम्मा लौनी

हमें खिलाती,

भैया ने 

लस्सी बनवाई,

गर्मी आई।


बहता तन से

नित्य पसीना,

कठिन हो गया

अब तो जीना,

अच्छी ठंडी

लगे मलाई,

गर्मी आई।


फ़ालसेव 

जामुन भी प्यारे,

देती  अम्मा 

दूध छुहारे,

बदली नहीं

अभी तक छाई,

गर्मी आई।


ठेले पर हम

जब भी जाते,

हमें संतरे 

 बहुत लुभाते,

उनकी अब

हो रही विदाई,

गर्मी आई।


🪴 शुभमस्तु !

०८ जून २०२२ ◆ ५.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 7 जून 2022

बूँद बादल से नहीं चली 🌧️ [ नवगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌧️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्

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सूरज ढोया

सिर पर अपने

प्यासी प्यास बढ़ी,

बूँद बादल से नहीं चली।


लगा दिखाने आँखें अपनी

सूरज    दृष्टि   तरेरे,

बादल विदा हुए अंबर से

तनिक न धरती हेरे,

खौल   उठा     है   पानी,

टपके क्यों छप्पर छानी!

नहीं खिल पाती एक कली।


फटती है धरती की छाती

सर सरि तप्त हवाएँ,

छाँव माँगने लगी छाँव को

पादप   मौन  लताएँ,

बस   बात   नहीं  इतनी,

कही है शब्दों ने जितनी,

जली  भूभर में पाँव - तली।


कहाँ गई हरियाली तेरी

ऐ  भारत के  गाँव! 

चौपालें घुस गईं घरों में

है गाँव हांव ही हांव,

गिरते नहीं टिकोरे,

आलू बोरे के बोरे,

आदमी गँवई हुआ छली।


सड़क किनारे पेड़ नहीं हैं

बरसे कैसे पानी,

बैठी  विरहिन आस लगाए

 भीगे कब चुनरी धानी,

कंकरीट   के  जंगल,

कैसे हो जल -मंगल,

रेत उड़ती घर गाँव गली।


🪴 शुभमस्तु !


०७ जून २०२२ ◆ १.३० पतनम मार्तण्डस्य।


श्रम -जल-मुक्ता सिक्त ललाट 🌾 [ नवगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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श्रम -साधिका 

शीश धर ऐंडुर

अधरों में मुस्कान,

श्रम-जल-मुक्ता सिक्त ललाट।


सिर पर घर का

बोझ उठाए,

करने में श्रम

क्यों शरमाए!

गाती  घर  लोरी,

आँचल में छोरी,

लचपच हिलती है खाट।


चेहरा भर -भर 

चू   रहा   पसीना, 

घर के दुख - दर्द 

नित्य    ही  पीना,

जीने  की इच्छा,

ले रही   परीक्षा,

ईंट- भट्ठे में  घर -  घाट।


मन स्वच्छ देह

नित ही श्रम से चूर,

थकती न कभी

मन में प्रसन्न भरपूर,

जाने न ऊब,

ज्यों हरी दूब,

देखी पानी - पूरी कब चाट?


लवणीय स्वेद से

होता    तन - स्नान,

तजकर चलती गेह

देखती बाहर भव्य विहान!

सदा उर में उत्साह,

न    भरती    आह,

स्वेद  ही  निर्धनता  की काट।


🪴 शुभमस्तु !


०७ जून २०२२◆८.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


सोमवार, 6 जून 2022

सच शूल नहीं है! 💎 [ सजल ]

  

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समांत : ऊल ।

पदांत: नहीं है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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समय        सदा      अनुकूल    नहीं    है।

हर     डाली      पर       फूल  नहीं     है।।


माता    -    पिता     मान  गुरु जन     का,

मानव          तेरी          भूल    नहीं     है।


सच        तो        चुभता    कड़वा   होता,

समझें        उसको       शूल   नहीं     है।


कर     में      जो      पल्लव  तुम    थामे,

जानें         विटप        समूल   नहीं     है।


पवन          उड़ाता        है   पराग   कण,

पहचानें         वह        धूल    नहीं       है।


हितचिंतक     हित        की    ही   कहता ,

देना          उसको         तूल    नहीं      है।


'शुभम्'      वक्ष      पर     जो शोभित  है,

केवल         क्षौम       दुकूल   नहीं       है।


🪴 शुभमस्तु !


०६ जून २०२२ ◆५.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


नेता चिकना एक घड़ा है! ⚱️ [ नवगीत ]

 

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✍️ शब्दकार © 

⚱️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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चुपता बकता भाषण करता,

नेता  चिकना  एक  घड़ा है।


बचपन   का    शैतान

जवानी  का  घोड़ा  बिगड़ैला,

उठाधरी    उस्ताद

गली     का    मजनूँ    छैला,

अगणित 'गुण' की खान,

सैकड़ों में होती पहचान,

गलत  या  सही ,अड़ा  है।


मीलों    सच  से   दूर

चाल     विपरीत    अजूबा,

नहीं    इकाई     एक 

स्वयं    को   कहता    सूबा,

कहें  न     उसको     श्वान,

चाहता सर्वाधिक सम्मान,

नेता  सचमुच  बहुत बड़ा है।


कलयुग    का   भगवान

दरस    क्यों   देगा   भाई!

जिस  कुम्हार   ने  गढ़ा

उसी   से   हवा      हवाई,

सभी    माटी   ठुकराई,

कोई हों   लोग - लुगाई,

रुतबा  जो    बढ़ा - चढ़ा  है।


वंश   जाति    को   दूध

छुपा     चुसनी    से    लाए,

झोली  भर - भर   रेवड़ियाँ

भरपूर     लुटाए,

चीखें  चिल्लाएँ  लोग,

चाहिए  उनको   भोग,

उछलता    ज्यों    बछड़ा   है।


🪴शुभमस्तु !


०५ जून २०२२◆ ५.३० पतनम मार्तण्डस्य।

पेड़ों की चर्चा हो जाए! 🌳 [ नवगीत ]

 पर्यावरण दिवस पर :


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✍️ शब्दकार ©

🌱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अपने कूड़े को

दरवाजे डाल

और के आएँ,

पेड़ों  की  चर्चा हो जाए।


पाँच जून की गरम दुपहरी

यहाँ  न   बैठा जाए,

ए सी में चल कर बतियाएँ

लस्सी ही  चल पाए,

गड्ढे   कुछ  खुदवाएँ,

उनमें पौधे लगवाएँ,

पशु भैंस  न  चरने  पाए।


पकड़ किसी का हाथ 

किसी ने किसको रोका भाया?

लाभ अँधेरे का वह लेकर

कचरा फेंका आया,

किसको क्या  समझाए?

अपना घर स्वच्छ बनाए,

करना  जिसको  जो  भाए!


गोबर पर मखमल की चादर

हमें   उढाना   आता,

लगता एक काटते सौ तरु

हर  नेता  समझाता,

होती  बस  रस्म  अदाई,

हँसती फोटो खिंचवाई,

रसगुल्ले खा घर आए।


गरम समोसे - से भाषण से

गर्मी  का  उतरा  पारा,

ए सी लगे बंद कक्षों में

बहती है सरिता - धारा,

सब     समाचार   छपवाए,

अभियान सफल करवाए,

नारे   भी  गए   लगाए।


🪴 शुभमस्तु !


०५ जून २०२२◆२.४५ पतनम मार्तण्डस्य।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...