सोमवार, 24 जनवरी 2022

देश का उत्सव तिरंगा 🇮🇳 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आ   गया   है   शुभ   तिरंगा।

देश  का     उत्सव    तिरंगा।।


बलिदान    का   रँग   केसरी,

शांति का  सित  रँग   तिरंगा।


लहलहाती    फसल     जैसा,

हरित     लहराता      तिरंगा।


शान ध्वज  की  कम  न होवे,

तन खड़ा   भू   पर    तिरंगा।


नोंच लें  वे   आँख  अरि  की,

देखता   जल    कर   तिरंगा।


गणतंत्र   गायन   कर    रहा ,

भा  रहा   नभ  पर    तिरंगा।


सत 'शुभम'  सम्मान  उर  में,

भारती   का   प्रण     तिरंगा।


🪴 शुभमस्तु !


२४.०१.२०२२◆१.४५

पतनम मार्तण्डस्य।


सजल 🇮🇳

  

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समांत: इया।

पदांत :करते हैं।

मात्राभार :24.

मात्रापतन :नहीं है।

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✍️ शब्दकार ©

🇮🇳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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देश की आन को निज प्राण दिया  करते  हैं

वीर बलिदानी  सदा त्राण किया  करते   हैं


देश  की  भक्ति   ये बातों  के बतासे   नहीं

सपूत  देशभक्त   मातार्थ जिया  करते   हैं


सीमांत  धन्य  प्रहरी  सोते न   जागते   ही

साड़ी  फटे  जो  माँ की  गुप्त सिया करते हैं


सैनिक - उर धड़कता संतति है,   वीर  पत्नी

मात - पिता  से  पूछो  अश्रु पिया  करते  हैं


फहरा  ध्वज  तिरंगा  करता  है  शान  ऊँची

धीर  'शुभम'  सारे  परिणाम दिया  करते  हैं


🪴 शुभमस्तु !


२४.०१.२०२२◆९.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

रविवार, 23 जनवरी 2022

सुन साँचों का साँच ⛵ [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

⛵ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                       -1-

साँचे  में  ढल आदमी, हुआ साँच  से   दूर।

जैसे  मेढक  कूप  का,उछले नित   भरपूर।।

उछले   नित  भरपूर,वही  है दुनिया  सारी।

सजी  चार ही  हाथ,  कूप  में चारदिवारी।।

'शुभम'  कूदता  मूढ़,भरे नर नित्य  कुलाँचे।

समझ स्वयं को ईश, बना माटी  के  साँचे।।

                        -2-

रंगा  जी  ने रँग  लिए, साँचे कितने    आज।

लाल,हरे , पीले  चुने,  बनने को    सरताज।।

बनने  को सरताज ,अलग पहचान दिखाए।

गिरगिट   जैसे   रंग, देह पर बदले    पाए।।

'शुभम'  कहाँ  है  साँच, नहाते गदहे   गंगा।

चमके भाल त्रिपुंड, पैर से सिर  तक  रंगा।।

                        -3-

मानवता  के  नाम का,गढ़ा न साँचा   एक।

पक्षपात  की आग  में, झोंकी करनी  नेक।।

झोंकी  करनी  नेक, वाद  की भट्टी जलती।

शेष नहीं है न्याय,मनुजता निज कर मलती।

'शुभम'   झपट्टामार,  सदा से है   दानवता।

साँचों  का संसार ,मर रही नित  मानवता।।

                         -4-

अपने - अपने  मेख  से, बाँध मेखला  एक।

चमकाता निज नाम को,नहीं कर्म की टेक।।

नहीं  कर्म   की टेक,बदलता सिर की टोपी।

दिखा धर्म की आड़,बाड़ उपवन में रोपी।।

'शुभम' झूठ के गान,दिखाते स्वर्णिम सपने।

कुर्सी से यश मान,जाति के सब जन अपने।

                          -5-

माटी साँचों  की नहीं, होती अति  मजबूत।

सीमा  भी उसकी कभी,होती नहीं  अकूत।।

होती नहीं अकूत, सोच  को रोक  लगाती।

स्वच्छ नहींआकाश,घुटन नित बढ़ती जाती।

'शुभम' जानता साँच, धूल धरती  की चाटी।

सीमाओं को त्याग, फाँक मानव की माटी।।


*मेख =खूँटा।

*मेखला= शृंखला,जंजीर।


🪴 शुभमस्तु !


२३.०१.२०२२◆७.३० पतनम मार्तण्डस्य।

साँचे का संसार यह ! 🤿 [ व्यंग्य ]

 

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 ✍️ व्यंग्यकार © 🤿 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम ' 

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 साँचे का संसार यह,नित साँचों की खोज।

 साँचों में बहुजन फँसे,ढूँढ़ रहे निज ओज।

 जिधर भी दृष्टि डालिए ,साँचे ही साँचे दिखाई देते हैं।जो जन पहले से ही साँचों में सटे हुए हैं, वे वहाँ पर अपनी सट-पट कर रहे हैं। किंतु जो अभी साँचों से बाहर हैं, वे साँचों की तलाश में भटक रहे हैं।अपना - अपना सिर पटक रहे हैं। साँचों में सटे हुए कोई-कोई जन मटक रहे हैं ,कुछ अटक रहे हैं औऱ किसी अन्य को खटक रहे हैं। साँचे मानो मानव की शांति की तलाश हैं।साँचों के बिना मानो वे जिंदा लाश हैं।घूरे पर चरने वाले विचरते हुए गधों की घास हैं।बड़े ही निराश हैं। साँचों के बिना तो जैसे कागज़ के ताश हैं। कोई कहीं भी फेंक देता है और अपना उल्लू सीधा कर लेता है। इसलिए उन्हें एक उचित साँचे की तलाश है। 

           कोई समाज सेवा के साँचे में सटा है। तो दूसरा सियासत के साँचे में जुटा है।कोई धर्म की चदरिया रँग रहा है औऱ अपने चर्म - चरणों को पुजवाकर साधु - संगत में सज रहा है। किसी को नशा है धन कमाने का ,किसी औऱ का धन लूटने का।किसी को मोह माया के बंधन से यथाशीघ्र छूटने का।कोई किसी कामिनी की काया में अपने को सिमटाये हुए है। तो उधर कामिनी निज साँचे में अपना तन मन रमाए हुए है। कोई ज्ञानी बनने की राह पर निकल पड़ा है , सब भटक रहे हैं अंधकार में ; इस अहं में गड़ा है।कोई झुकते - झुकते दुहरा हो रहा है।उधर जो तना हुआ है , निज गुरूर में इतरा रहा है। मानो साँचे ही अंतिम गंतव्य हैं।साँचों में घुस बैठना ही उनका वास्तविक मंतव्य है।इसलिए साँचे ही प्रणम्य हैं। उनके लिए वही उनकी श्रेष्ठतम शरण्य हैं। 

           समाज, सियासत, धर्म ,दल, ज्ञान, पांडित्य,व्यवसाय, अमीर, गरीब,स्त्री,पुरुष, कवि ,लेखक, चोर ,डकैत ,डॉक्टर, अभियंता ,अधिवक्ता ,शिक्षक, कर्मचारी ,अधिकारी, नेता , अभिनेता,मंत्री,संतरी,साधु , महात्मा ,पुजारी,महंत,:चेहरे अनंत, साँचे भी अनंत।साँचे से बाहर रहना ; मानो मिट्टी का लोंदा। एकदम बोदा।अस्तित्व विहीन।कहीं भाषा का साँचा, कहीं जाति ,वर्ग ,वर्ण ,सम्प्रदाय का साँचा। सब कुछ है वह ,परंतु यदि नहीं तो कोई मानव नहीं। कहीं मानवता नहीं। मानव नाम का कोई साँचा ही नहीं। कोई भी अस्तित्व नहीं मानवता के साँचे का।

          पशु को एक खूँटे से बाँधा जाता है। पर मानव तो स्वयं खूँटा बंधित है। वह खूँटा प्रिय है। बंधना उसकी प्रकृति है।उसकी मति में यही उसकी सद्गति है। बिना बँधे हुए वह रह नहीं सकता , जी नहीं सकता। इसीलिए न्याय नहीं; सर्वत्र पक्षपात का बोलबाला। जैसे सभी कूओं में भंग का मसाला भर डाला। नाम भर साँचा , पर साँच का नाम नहीं। 

        साँचे में ढल जाने से लाभ ? लाभ ही लाभ। निरंतर लाभ। न साँच की चिंता , न आँच का डर। भेड़ बनकर उनके पीछे -पीछे विचर। बस साँचे का घेरा न टूटे। अपना स्वामी न रूठे। कूप मंडूक बने रहें। चारदीवारी में पड़े - पड़े तने रहें । लकीर के फ़कीर बन मंडल में सजे रहें। हर समय बने - ठने - घने रहें। एक जंजीर से निरन्तर बँधे रहें। जो मिले ,उसी में मजे रहें। 

        जो साँचे में जितना फिट। वह उतना ही रहता है हिट। कैसी खिट-खिट ।कैसा सोचना ,कैसी घिस- पिट।जैसी माटी भरी जाएगी , नाक -नक्स की सूरत वैसी ही बन जाएगी।इसलिए 'सबते भले वे मूढ़ जन, जिन्हें न व्यापे जगत गति।'काहे का सोचना, काहे को लगाए मति।। बिना ही लगाए हर्रा फिटकरी ! मिलते चलें खीर मालपुआ खरी। तो क्यों न किसी साँचे में अपने तन - मन की माटी को जमाए ? नहीं आजमाया है अभी तो क्यों न जाकर के आजमाए? इतना अवश्य देख लेना कि साँचे हों पके -पकाए। वरना ऐसा न हो कि लौट के बुद्धू घर को आए! 

 🪴 शुभमस्तु !

 २३.०१.२०२२◆ १२.४५ पतनम मार्तण्डस्य। 


शनिवार, 22 जनवरी 2022

  कुर्सी - बाज़ार गर्म है ! 🪑 

[ व्यंग्य ] 

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🪑 डॉ. भगवत स्वरूप  'शुभम ' 

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 सज गई हैं दुकानें ,बाजार गर्म है।बिकेगी उसी की सौदा, जिसका जैसा भी कर्म है।तो देवियो!सज्जनो!बहनो! औऱ भाइयो ! ; डाक्टरो! मरीजो ! दवाघरो ! और दाइयो! बाजार लग चुका है।वह दिन पर दिन गरम भी हो रहा है।दुकानदार अपनी दुकानदारी के लिए बेशरम भी हो रहा है। अपने- अपने सामान की सौ -सौ खूबियाँ गिना रहा है।असलियत पूछने पर किनकिना रहा है।


  जैसा कि अपनी सौदा बेचने के लिए हर उत्पादक कम्पनी विज्ञापन करती है।कमियाँ हों भले हजार ,पर हजारों गुणगान से झोलियाँ भरती है। अब ये ग्राहक की इच्छा कि वह सौदा ले अथवा नहीं ले। बाज़ार का हर दुकानदार भी यही कर रहा है।विज्ञापनों से ग्राहक का मन संभ्रम से भर रहा है।


  पर ये मत समझ लीजिए कि आज का ग्राहक विज्ञापन पर रीझकर सौदा खरीद ले। वह चार दुकान पर जाता है,दाम और वस्तु की तुलना करता है। तब कहीं जाकर सौदेबाजी का मन करता है।जिसका जितना अधिक विज्ञापन ,उतना ही फीका पकवान ।विज्ञापन का क्या भरोसा! सड़े हुए आलू का गोरी मैदा से ढँका हुआ समोसा ! खाने के बाद कोसा, तो क्या कोसा ! लगा ही दिया न खोमचे वाले ने लोचा। यही हाल आज के गरम हो रहे बाज़ार का है। आदमी का विश्वास आज हो रहा तार- तार सा है।


   नए - नए रंग हैं। दुकानदारों की अपनी-अपनी तरंग है। किसी-किसी ग्राहक ने चढ़ा ली भंग है।अपन तो देखकर ही ये हाल दंग हैं। दूल्हे की बारात बने हुए अधिकांशत: मतंग हैं। उन्हें क्या कुछ दिन का गुज़ारा तो होगा।खाने के साथ - साथ पीने का भी जुगाड़ा होगा। पहनने को मिलेगा रंग - बिरंगा चोगा। भेड़ाचार के युग में भी सब भेड़ नहीं हैं।पर अधिकतर तो भेड़ ही हैं। तात्कालिक लाभ के पीछे अपना भविष्य भी दाँव पर लगाने वाले ग्राहकों की कोई कमी नहीं है। वे सस्ते विज्ञापनों पर दाँव लगा देते हैं।लेपटॉप ,मोबाइल , सस्ते बिजली ,पानी पर अपना मत ही नहीं, मति भी गँवा देते हैं।लोक- लुभावन विज्ञापन ;विज्ञापन नहीं , ठगी के तरीके हैं। ग्राहक की जेब काटकर उसे उसी के पैसे से खुश कर देने वाले फार्मूले हैं। ये तेज ग्रीष्म में उड़ने वाले बगूले हैं। 


एक बार खरीदोगे, बार -बार पछताओगे।भेड़ बने हुए किसी कुएँ में पड़े पाओगे।अपनी ही अगली पीढ़ी पर गज़ब ढाओगे। जब कोई चीज गर्म होती है ,तो गर्मी पाकर बढ़ती है, फैलती है। ये बाजार ! ये दुकानदार ! सभी फैल रहे हैं और नगर-गाँव के ग्राहक पिछली दुकानदारी अब तक झेल रहे हैं। हे ग्राहको ! तुम सौदा मत बन जाओ, ऐसा न हो कि बाद में पछताओ।अपना हित-अहित स्वयं पहचानो! मेरी कही बात आज मानो या मत मानो! पर इन विज्ञापनबाजों के हाथ में अपनी सौर इतनी भी मत तानो कि तुम्हारे पैर ही बाहर चले जाएँ ?


  मखमली चादरों में ढँके हुए ये माल ! रंग - बिरंगे बैनरों तले दिखलाते हुए कमाल ! बनने ही वाले हैं भविष्य का बवाल ! यही तो है हर ग्राहक के सामने सवाल। भविष्य में अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे होगी ? कौन कर सकेगा? कौन अपना है ,कौन ठग और लुटेरा है ; ये देखना पहचानना है। आज जब सारी दुनिया बारूद के ढेर पर भौंचक्की - सी बैठी है , तब तो औऱ भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है ,कि कौन ठग है ,कौन लुटेरा। कौन दे सकता है , स्थाई औऱ मजबूत बसेरा। इसलिए बाजार की गरमी पर मत जाएँ।ठंडा करके खाएँ। अन्यथा बाद में पछताएं! 


 ये पोस्टर ! ये झंडियाँ!! ये हैं मात्र काष्ठ की हंडियां ! जलेंगीं और तुम्हें भी जलायेंगीं। दुकानों की रंगत पर मत मर मिटो। ये एक बार गर्माएगीं, तुम्हारी आगामी पीढ़ियाँ तुम्हें हमेशा गरियायेंगीं। गरजने वाले कब बरसते हैं! जो इनसे उम्मीद लगाए बैठे हैं ,वे सदा तरसते हैं। पता नहीं ,ये बाजार कुर्सियों का है।पाँच साल मजा मनाने वाली तुरसियों का है। इनकी तुरसी में तुम्हें कुछ भी नहीं मिलने वाला। क्यों करते हो इन नशेड़ियों के हाथों अपना मुँह काला! इनके एक हाथ में झंडा है ,दूसरे में जाला। यदि अब भी जपते रहे इनकी माला; तो पड़ ही जाने वाला है, तुम्हारे हाथ पैरों में ताला। 

 

 इन्हें तो बस कुर्सी चाहिए। चाहे जैसे भी मिले। साधन उचित हों या अनुचित ;उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है। ये वही हैं ,जो अपने मतलब के लिए गधे को भी अपना बाप बना लेते हैं। औऱ मतलब निकल जाने के बाद मार दुलत्ती ठुकरा भी देते हैं। हे प्यारे ग्राहको! अपना भला आपको स्वयं देखना है ,सोचना है। बात मात्र पाँच साल की नहीं, पाँच युगों की है। हमारी भावी पीढ़ियों की है। इन शवों के सौदागरों से बचके रहना है। इन्हें तो कुर्सी पाकर तुम्हें भूल ही जाना है। ये वे घोड़े नहीं ,जो घास से दोस्ती कर लें! घास तो खाई ही जाने वाली है। तुम्हें घास नहीं बनना है , न इनके ग्रास का चयनप्राश बनना है।


  ये तुम्हारे मालिक नहीं, स्वामी नहीं। ठगियों को ठुकराने में कोई बदनामी नहीं। अपने आत्मज्ञान को जगाना है। तब बाजार से सौदेबाजी करना है। 'कु ' 'रसी ' ने सदा 'कु' 'रस' ही दिया है। इस कु रस में इतने दीवाने मत हो जाओ ,जो इनके कारण अपना अस्तित्व नसाओ ! ये नहीं होंगीं ,तब भी आप होगे। ये बाजार ,ये समाज, ये राष्ट्र , ये देश तुमसे ही है, कुर्सी - बाजारों से नहीं। कुर्सियों से भी नहीं। कुपात्र को दिया गया दान भी पाप है। इसलिए सुपात्र चुनें। तब अपना भरा कटोरा किसी के झोले में डालें। 


 🪴 शुभमस्तु !


 २२.०१.२०२२◆३.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

सघन कोहरा छाया 🌼 [ दोहा गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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  सघन   कोहरा छागया  , दिशा-दिशा  में   शीत।

छिपे  कीर  निज  नीड़ में, जीव-जंतु  भयभीत।


चादर  ओढ़े    दूध - सी, छिपे हुए   हैं   भानु,

निष्प्रभ   चंदा- चाँदनी, नहीं गा   रहे   गीत।


पल्लव-पल्लव ओस के, चमके  मुक्ता चारु,

जेठ  पराजित हो गया,पूस-माघ  की  जीत।


छुआ  न जाए  देह  को,पोर-पोर  हिम  सेत,

कैसे हो  अभिसार अब,रूठ गया  है   मीत।


अवगुंठन   अपना  हटा,नहिं चाहती    नारि,

आलिंगन   कैसे करें, गए दिवस   वे   बीत।


पाटल - दल  भीगे हुए,स्वागत को   तैयार,

उत्कंठा    ऐसी  जगी,  भाव नहीं   विपरीत।


'शुभम'  कामना  आग  - सी,दहकाती है  देह,

झरते उर नव स्रोत के,निर्झर नित नवनीत।।


🪴 शुभमस्तु !


२१.०१.२०२२◆११.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


अतीत 🧡 [अतुकांतिका]

 

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✍️ शब्दकार ©

🧡 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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शेष नहीं हो

जिसकी तीत,

हो गया हो 

जो पूरी तरह रिक्त,

वही तो है 

हे मानव तेरा अतीत।


यह अतीत ही 

कभी था जब

सतीत ,

शुष्कता नहीं थी,

उष्णता भी नहीं थी,

तीत ही तीत थी,

तभी तो उर में

विद्यमान प्रीति थी।


सतीतता में

होता है नव अंकुरण,

स्फुरण ,

संचरण,

क्योंकि वहाँ नमी है,

जो है अपरिहार्य

नहीं उसकी 

कहीं भी तृण भर

कमी है।


फिर भी आज की अपेक्षा

बीता हुआ कल

सुख देता है,

बीत जाने पर

रीत जाने पर

रिक्त पात्र भी

मधुर स्मरण देता है।


यह अतीत ही

कभी वर्तमान था,

मेरी तेरी पहचान था,

कैसे किया

 जा सकता है

विस्मृत,

उसका तो 

प्रत्येक आयाम है

 अति विस्तृत,

उसी ने किया है

सदा ही तुम्हें उपकृत,

वही तो है 

जीवन का ऋत,

उसी का  वरदान है

'शुभम' है जीवन का सत।


*तीत =नमी ,आर्द्रता।


🪴 शुभमस्तु !



२१.०१.२०२२◆८.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

सबके हित का भाव हो 📒 [दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

📒 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सबके हित का भाव हो,कहलाता  साहित्य।

लेखन  के आकाश में,चमके बन  आदित्य।।


शब्द-अर्थ में व्यक्त हो,कविता का हर भाव।

जैसे  तरती  धार में, बनी काष्ठ  की  नाव।।


जनहित में  साहित्य के,लगे हुए   हैं   भाव।

ज्यों पत्नी निज कांत को दिखलाए निजहाव


कविता हो या लेख हो,उसका अमर महत्त्व।

शब्दकार  यह जानते, जन हितकारी तत्त्व।।


अमर वही  साहित्य है,जिसके भाव  महान।

मानव मन को चूमते,बढ़ता कवि का मान।।


रचना ऐसी  चाहिए, खिलें सुमन  के  भाव।

बिखरे विरल  सुगंध ही,भरें उरों  के  घाव।।


कटुता  से  साहित्य  का,नहीं लेश   सम्बंध।

सदगंधों  का  वास  हो,न  हो सूक्ष्म   दुर्गंध।।


दोहा,कुंडलिया लिखें,लिखें सरस शुभ गीत।

रोला, बरवै, गीतिका ,व्यंग्य लेख   हे  मीत!!


मतमंगे साहित्य का,नहीं तनिक  भी  मोल।

सड़क छाप जो लिख रहे,होता उनमें झोल।।


कवि को कविता रच रही,देती 'शुभं'कवित्त्व

मानवता की लिपि वही,वही मनुज का सत्त्व


माँ वाणी की सत कृपा, देती कवि  को  देन।

रचता वह साहित्य को,शब्द अर्थ  की  सेन।।


🪴 शुभमस्तु !


२०.०१.२०२२◆२.००पतनम मार्तण्डस्य।

बुधवार, 19 जनवरी 2022

ओस भीगी नव कली! 🌹 [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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ओस भीगी नव कली के पास आने  दो।

प्यास से व्याकुल भ्रमर मधुप्राश  पाने दो।।


आ रहा  है पास  ज्यों -ज्यों दूर  जाती  हो।

घबरा  रही  स्पर्श  से उन्मन लजाती   हो।।

ज्यों धरा  पर मेघ  छाते  आज  छाने   दो।

ओस भीगी नव कली के पास आने दो।।


कौन कलिका  जो न  चाहे फूल बन महके!

यौवनांगी   क्यों  न चाहे कीर - सी  चहके!!

शुचि कली जो  है  अछूती महक जाने  दो।

ओस भीगी नव कली के पास आने दो।।


राह में  कालीन  अरुणिम  नम बिछाई  है।

सद  सुगंधों  से  सुगंधित  ज्यों मलाई   है।।

स्वप्न  को  साकार कर  लो कसमसाने  दो।

ओस भीगी नम कली के पास आने दो।।


चटुल  पाटल- सी सजी हो ओढ़ ली  चादर।

कब  तक रहे  अवगुंठनी  रूप की   गागर।।

तृप्ति  की  गंगा  बहा  दो  गीत  गाने   दो।

ओस भीगी नव कली के पास आने दो।।


सबलता में   नेह  रस का क्यों झरे   झरना।

विनयवत उत्थान में ही शुभ प्रणय  करना।।

नित 'शुभम' गुंजार  बन अलि गुनगुनाने  दो।

ओस भीगी नत कली के पास आने दो।।


🪴 शुभमस्तु !


१९.०१.२०२२◆५.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

कोरोना का ध्यान रख 🌿 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कोरोना के  काल में, रख नियमों का ध्यान।

बच्चे पढ़ते हैं सभी,छिपी मास्क  मुस्कान।।


 बैठे  दो  गज दूर सब,विद्यालय  के  छात्र।

नियमों  के अनुकूल ही,पढ़ने के सब पात्र।। 


शिक्षक छात्रों ने लगा,लिया वदन पर मास्क

बड़े ध्यान से कर रहे,अपना- अपना टास्क


दरी बिछी है भूमि पर,पढ़ने में सब  व्यस्त।

शिक्षकजी कुछ कह रहे,शिक्षण में अभ्यस्त


जीवन -रक्षा के लिए ,नियम सदा  अनिवार्य।

कोरोना से बच सकें, करें सुनिश्चित   कार्य।।


देश और  परिवार  की, रक्षा की  है  बात।

नियमबद्ध जो चल रहे,दें रोगों को   मात।।


सबके हित में निहित है,अपना हित हे मीत।

'शुभम' नियम पालन करें,होगी तेरी  जीत।।


🪴 शुभमस्तु !


१९.०१.२०२२◆१०.५५ आरोहणं मार्तण्डस्य।


तेरे पग मंजीर -ध्वनि 🏕️ [ दोहा ]


[मंजीर, मेदिनी,बारूद, चीवर,कलिका]

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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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           🧡 सब में एक  🧡

तेरे पग मंजीर-  ध्वनि,रसमय  होते  कान।

उर में लहरें उठ रहीं, लिया तुम्हें  पहचान।।

बाँधूँगी मंजीर से,  कान्हा सुन  लो   बात।

माखन  खाने   दूँ नहीं,बहुत हुई   है  रात।।


धारण  करती मेदिनी,हम सबका यह  भार।

धीरज की प्रतिमा सदा, मानें नित उपकार।।

सकल मेदिनी धर खड़े,हिम आवृत हे मीत!

छाया जल-थल पर बड़ा,भुवन भयंकर शीत


बिछा  ढेर बारूद का,सुप्त सकल  संसार।

प्रभु जग की रक्षा  करें, देना संकट   तार।।

क्यों बाले! बारूद-सी,भड़क  रही हो आज।

मैंने क्या ऐसा  कहा,बतलाओ वह   राज।।


सोई   महलों  में  रही, यशोधरा   वर  नारि।

तन पर चीवर धारकर,गए त्याग सुकुमारि।

चीवर बस कपड़ा नहीं,जगत-मोह का त्याग

नर,नारी,सुत,राज का,है सम्पूर्ण   विराग।।


सुंदर कलिका देखकर,खिलता उर का फूल

विकसित अधरों की कली,हटा रही हर शूल

तन-मन में कलिका खिली,यौवन है साकार

मधुलोभी  भौंरे   चले, पाने रस  -  उपहार।।


   🧡 एक में सब 🧡

जीवन चंचल मेदिनी,

               कलिका भी बारूद ।

चीवर सँग मंजीर की,

                     नहीं नाच या कूद।।


*मंजीर -1.घुँघरू 2. मथानी के डंडे से बाँधने का स्तम्भ।


🪴शुभमस्तु!


१९.०१.२०२१◆७.३०आरोहणं मार्तण्डस्य।

शारदा -स्तवन 🌻🕉️ [विधा :गीत ]

 

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✍️विनयावनत ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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वीणावादिनि     मातु    शारदे!

अघ-ओघों  से त्वरित तार दे।।


वागीश्वरी    जगत   कल्याणी!

देती हो   माँ जग  को  वाणी।।

शब्दों को   नित   नई   धार दे।

वीणावादिनि    मातु   शारदे!!


विमला, गिरा,   ज्ञानदा  माता!

भगवत'शुभम'नित्य ही ध्याता।।

हंसवाहिनी!   हमें     प्यार   दे।

वीणावादिनि    मातु     शारदे!!


रमा,   परा,  श्रीप्रदा,   भारती!

वसुधे! विमले!  करें  आरती।।

महाबला,    विश्वा    उबार   दे!

वीणावादिनी     मातु    शारदे!!


महाफला,  त्रिगुणा,  माँ शुभदा!

कांता ,  वंद्या   मिटा   आपदा।।

शुभ  भावों   का  पुष्प  हार दे।

वीणावादिनि    मातु    शारदे!!


जन्म- जन्म  माँ के  गुण  गाएँ।

तव    चरणों में    शीश झुकाएँ।।

कल्याणी  उर   शुभ  विचार दे।

वीणावादिनि     मातु   शारदे!!


🪴 शुभमस्तु !


१८.०१.२०२२◆६.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।

बथुआ - गीत ☘️ [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गरम   पराँठा   बथुए   वाला।

जाड़े में  दे  स्वाद   निराला।।


गहरा हरा   संग   में  धनिया।

खाती  अम्मा खाती चनिया।।

मिर्च  चटपटी   सेंधा   डाला।

गरम  पराँठा   बथुए  वाला।।


बथुए  में   है   लोहा ,  सोना।

पारा और क्षार  मत  खोना।।

गेहूँ  के   सँग  उगता  आला।

गरम  पराँठा  बथुए  वाला।।


रायता बहुत स्वाद का होता।

नहीं खेत  में   कोई   बोता।।

डालें  इसमें   न्यून   मसाला।

गरम  पराँठा   बथुए  वाला।।


अमाशय   को  ताकत  देता।

कब्ज उदर की वह हर लेता।।

गैस रोग,कृमि,अर्श निकाला।

गरम   पराँठा  बथुए  वाला।।


मूत्र रोग   को   हर   लेता है।

यकृत  निरोगी  कर  देता है।।

दाद,खाज खुजली पर ताला।

गरम पराँठा   बथुए   वाला।।


आँखों की सूजन   या लाली।

बथुए   ने  नीरोग   बना ली।।

'शुभम'साग बथुआ हरियाला।

गरम   पराँठा   बथुए  वाला।।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०१.२०२२◆३.३०पतनम

मार्तण्डस्य।

शबरी की भक्ति 🧕🏻 [ चौपाई ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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श्रमणा  एक   भीलनी  नारी।

रामभक्ति   में   डूबी   सारी।।

जन्मी शबर पिता के आलय।

नहीं उसे वन  में  कोई  भय।।


गुरु  मतंग   से   शिक्षा   पाई।

होने   वाली   बात     बताई।।

राम-लखन कुटिया तव आएँ।

तब  तेरे  संकट   मिट  जाएँ।।


रामभक्ति   में   शबरी   खोई।

कठिन  प्रतीक्षा कर-कर रोई।।

यौवन  गया   बुढ़ापा   छाया।

एक दिवस वह शुभ क्षणआया।


डलिया  में  बेरों  को  रखती।

पहले ही  वह उनको चखती।

आई   घड़ी    कुमार   पधारे।

कष्ट  मिटे  शबरी   के  सारे।।


प्रेम- भाव   से  भीगी  उर में।

बैठी  शबरी  भू- सुरपुर   में।।

जूठे   बेर    खिलाती   जाती।

मन ही मन  भारी  हरषाती।।


नयनों  में   प्रेमाश्रु    भरे   थे।

पाँव पखारे   भाव   खरे  थे।।

'शुभम'भक्ति शबरी-सी कर ले।

भव- सागर के   पार   उतर ले।।


🪴 शुभमस्तु !


१८.०१.२०२२◆११.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

सजल 🪴

 

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समांत:आनी।

पदांत : है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: नहीं है।

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हर   जीवन   एक  कहानी  है

सुख-दुख का अपना  मानी है


महलों  में    कोई   करे    ठाठ

कुछ  के सिर पर बस छानी है


औरों  पर  होली   कीचड़  की

अपनी  पहचान  न  जानी   है


झाँकता  न   अपने   अंतर  में 

बतलाता   सबकी   कानी   है 


मेरा - मेरा   की    चाह   जगी 

कहता  जग   बात   पुरानी  है


अपने   सुधार  से  जग   सुधरे

सीखना  यही   सिखलानी   है


निज स्वार्थ लिप्त है मनुज यहाँ

सच 'शुभम' बात  बतलानी   है 


🪴 शुभमस्तु !


१७.०१.२०२१◆९.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

रविवार, 16 जनवरी 2022

बड़ी रसीली, छैल- छबीली 🍻 [ व्यंग्य ]


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 ✍️ व्यंग्यकार ©

 🍺 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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 आज भला मुझे कौन नहीं जानता ,पहचानता।जो जानता वह तो मानता ही मानता और जो नहीं जानता वह तो और भी अधिक मानता। मैं हूँ ही ऐसी गूढ़ पहेली , अपने चहेतों की अंतरंग सहेली।चाहते हुए भी मैं रह नहीं पाती अकेली। मैं तो बड़ी ही रसीली हूँ,छैल - छबीली हूँ।रंग-रँगीली हूँ।एक क्षण के लिए भी नहीं मैं ढीली हूँ।सदा हरी हूँ ,लाल हूँ। बेमिसाल हूँ।मेरे चहेतों के लिए टकसाल हूँ।वे मुझसे औऱ मैं उनसे निहाल हूँ।साँचा धारियों के लिए तो बस काल हूँ। 

  अब तो आप मुझे पहचान गए होंगे।मैं व्यापक सर्वत्र समाना ।मेरे ठौर - ठिकाने नाना।अब तक भी जो मुझे न जाना।मारूँगी उसको मैं ताना।मैं वहाँ भी हूँ, जहाँ दिखलाई भी नहीं देती।कहीं साकार हूँ तो कहीं निराकार भी हूँ।देश,समाज,धर्म, कर्म, शासन, प्रशासन,संस्थाएं, शिक्षालय, कार्यालय, कोर्ट ,कचहरी, ( जहाँ कच का हरण किया जाए) दीवानी, चौक ,चौकी ,चौका: सभी जगह मेरा सम्मानपूर्ण स्थान है।कुछ मनुष्यों के तो मुझमें ही प्राण हैं। मेरे बिना अस्तित्व ही क्या है उनका। मैं वह शक्ति हूँ, ऊर्जा हूँ कि मेरे सहारे के बिना वे उठा भी नहीं सकते तिनका।मैं उनकी सशक्त लाठी हूँ।किसी- किसी के लिए वंश परंपरागत परिपाटी हूँ। एक ऐसी अफ़ीम हूँ उनके लिए , जिसका नशा कभी उतरता ही नहीं। मैं नहीं ,तो वे भी नहीं। कहीं के भी नहीं।

  अनेक रूप हैं मेरे।बोतलों में भरी मदिरा की तरह सब का मूल तत्त्व एक ही है।बस अंतर तो मात्र इतना कि उनके लेबिल अलग - अलग हैं। लेबिल बदलते रहते हैं। मैं वही  की वही रहती हूँ । चूहे खतरा भाँप कर बिल बदल लेते हैं। इसी में उनकी समझदारी है। मैं सबकी शिक्षक हूँ। यदि मैं भी जड़वादी सिद्धांत से एक ही स्थान पर अपनी जड़ें जमा बैठी तो किसी दिन भूचाल आने पर अस्तित्व पर खतरा हो सकता है।इसलिए मैं सदा सचल हूँ।मेरी सचलता ही मेरे अस्तित्व की संजीवनी है।'जैसी बहे बयार तबहिं तैसौ रुख कीजै' के सिद्धांत पर चलने के कारण सारा संसार मुझे सिर पर उठाए फिरता है। 

  सबको सब कुछ तो मिलता नहीं।मेरे साथ रहने वाले में यदि आप चरित्र की सफ़ेदी ढूँढना चाहें ,तो यह मेरे साथ नाइंसाफी ही होगी।मैं किसी दूध धुले इंसाफ़ की कायल नहीं हूँ 'येन केन प्रकारेण' अपना उल्लू सीधा करना ही मेरा लक्ष्य है।मनमोहनी नारी की तरह ही मेरा हर रूप भी लुभावना,सुहावना,दिखावना, रिझावना और अपने साँचे में ढालना है। जिनके लिए मैं खट्टे अंगूर हूँ , मेरे बाहुपाश से वे भी नहीं बच पाते।इसलिए प्रकारांतर से ही सही ,मेरा लोहा मानने के लिए वे भी बाध्य हैं। आप कह सकते हैं कि शर्म -ओ-हया तो मुझे कहीं छू भी नहीं गई है।बिना पूछे ,बिना बुलाए ,बिना ज़रूरत मैं चौकी से सीधे तुम्हारे चौके तक धावा बोलती हूँ ।'आ बैल मुझे मार ' की नीति मेरे लिए कोई नई नहीं है। सही अर्थ में देखा जाए तो मेरी अपनी कोई नीति ही नहीं है।फिर भी मुझे सम्मान से मंच पर आसीन किया जाता है। 

  छः ऋतुओं की तरह मेरी भी ऋतुएँ आती - जाती है। इस समय मेरा वसंत पूर्व पतझड़ चल रहा है। पीले पड़े हुए पत्ते अपना स्थान छोड़ रहे हैं और अपना नया आशियाँ तलाश रहे हैं।कुछ भूमिसात हो रहे हैं,तो  कुछ किसी औऱ की गोदी में दूध ढूँढ़ रहे हैं। मेरे यहाँ पाँच साल में बालक जवान हो जाता है। इसके बाद भी प्रौढ़ता में नए - नए रस - रंग के बिछौने बिछाता है।पतझड़ के बाद वसंत आने को है।रसलोभी भँवरे नए रस की खोज में झूम रहे हैं।कलियों के मुख चूम रहे हैं। फूल अभी खिले ही कहाँ हैं? इसलिए कलियों से ही मन लगाने में जुटे हैं। कुछ तो बेचारे वैसे ही लुटे-पिटे हैं। पाँच साल बाद मुखौटे लगाकर आने के कारण उनकी बोलती जो बंद है! यह दोष उनका है , तो झेलें।इमली के पत्ते पर बैठकर दंड पेलें। अपन तो रोज छैल -छबीली है ,रंग -रँगीली है।

  मेरे यहाँ होली की बारहमासी योजना चलती है।जहाँ अपने - अपने चरित्र के अनुसार अहर्निश होली खेली जाती रहती है।सबकी पिचकारियों में रंग -बिरंगी कीचड़ भरी रहती है ,जिसके छींटे वे समय - समय पर छिटकते रहते हैं।सबसे अच्छी बात ये है कि इसका बुरा कोई भी नहीं मानता। बल्कि भारत पाकिस्तान की तरह और तेज मिसाइल -पिचकारी से अपनी धार को दुधारा बनाने का प्रयास करता है। कोई किसी से कम नहीं है। ये तो हुई होली की बात। किंतु यहाँ बड़ी दीवाली पाँच वर्ष में मात्र एक ही बार आती है। छोटी दिवालियां तो कई - कई बार आतिशबाजियाँ कर जाती हैं। ऐसी ही एक दीवाली की तैयारी में सारा देश लगा हुआ है। यही तो मेरा यौवन काल है, वसंत है।मधुमास है।गधे घोड़े सबके लिए च्यवनप्राश है। 

 🪴 शुभमस्तु ! 

 १६.०१.२०२१◆ १०.४५ आरोहणं मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

 सरपंचजी बनामआदरेय एडमिन जी👳🏻‍♂️

 [ व्यंग्य ] 

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 👳🏻‍♂️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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 ग्राम्यांचल में वहाँ के स्थानीय विवाद निपटाने के लिए किसी मौजे की एक ग्राम -पंचायत होती है।एक मौजे में एक या एकाधिक गाँव होते हैं।ग्राम -पंचायत में पाँच गण्यमान्य व्यक्ति पंच चुने जाते हैं ,जिनका वहाँ विशेष सम्मान भी होता है। वही वहाँ के जज होते हैं।इसी प्रकार कई ग्राम -पंचायतों की एक न्याय पंचायत भी होती है  जिसका एक प्रमुख पंच सरपंच कहलाता है। जिसे वहाँ का उच्च न्यायालय भी कह सकते हैं।ये पंचायतें अपने स्तरसे जो भी फैसला सुनाती हैं ,उसे मानने के लिए वहाँ की प्रजा बाध्य होती है।किसी का हुक्का - पानी बंद कर दिया     जाता है ,तो किसी  को जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है। किसी को जूते खाने की सजा दी जाती है,जिसे  दूसरा पक्ष उसे साकार रूप प्रदान करता है। इसी प्रकार के विचित्र फैसले देखने - सुनने को मिलते हैं।

 विचार करने पर ज्ञात होता है कि इसी 'पंच' से 'पंचर' (छिद्र) शब्द बना है। पंच का एक अर्थ पाँच अँगुलियों के पंच (थप्पड़/मुक्का/घूँसा ) से भी लिया जाना है। 'सरपंच'  शब्द भी कुछ इसी प्रकार बना होगा। जिसके 'सर' में 'पंच' हो अथवा जो किसी के सर में पंच मारने की सामर्थ्य से युक्त हो । कोई आवश्यक नहीं कि सरपंच के फैसले से दोनों पक्ष संतुष्ट हों। 

 अब युग बदल गया है। 'सरपंच'  का भी हाई डिजिटाइजेशन हो गया है। नई परिभाषा के अनुसार अब वे व्हाट्सएप ग्रुप्स के एडमिन बन गए हैं। जो जब चाहे किसी को अपने ग्रुप/पटल में जोड़कर अपने परिवार का सदस्य बना सकता है। बिना कारण बताए उसे बाहर का रास्ता दिखाने का भी पूरा अधिकार है। जैसे किसी दल के नेता को छः साल के लिए दल से बाहर करके सीधे दस वर्ष के लिए काले पानी की सजा दे दी जाती है। पर आप जानते हैं कि बाहर रहकर वह धोबी के श्वान की तरह न घर का रहता है न घाट का।भूल जाता है पिछला घमंड ठाठ- बाट का। याद आ जाता है भाव आटे -दाल का।

 हाँ, तो एडमिन की बात चल रही थी कि इतने में राजनीति आ घुसी। ये सियासत भी कुछ ऐसी ही चीज है कि जहाँ न चाहो , वहीं चौके तक घुसी चली आती है।चौकी,चौक औऱ चौका ;है कोई ऐसी जगह जहाँ ये नहीं हो ! युग ही राजनीति का है, क्यों नहीं घुसेगी भला? मान न मान मैं तेरी मेहमान।एडमिन के नीचे कभी- कभी तो इडमिंन्स की बारात ही खड़ी हो जाती है, जो चाहे जिसको घुसाए , जिसको चाहे बाहर का रास्ता दिखाए।शेष सब को सदस्य कहें ,अनुगामी कहें या स्व सुविधानुसार कोई और नाम दे लें।सब कुछ मुझसे ही क्यों कहलवाना चाहते हैं। आप भी तो कहीं एडमिन कहीं ,उप एडमिन औऱ कहीं सम्मानित सदस्य हो सकते हैं।होंगे ही। नहीं होंगे ,तो होने वाले होंगे।

 व्हाट्सएप के इन पटलों में भी सियासत का बोलबाला है।जी हुजूरी करते रहो ,मंत्री ,संत्री और तंत्री के पदों पर बैठा दिए जाओगे अन्यथा तो आप जानते ही हैं , अनुशासनहीनता के द्वार से हवा खाते नजर आओगे, छः साल के लिए बाहर निकाले गए नेताजी की तरह। उन्हें राजनीति इतनी रास आ गई है ,कि वे इस धंधे के अतिरिक्त दूसरा धंधा कर ही नहीं सकते।बिना इसके जी भी नहीं सकते। दल से बहिष्कृत करना उनके लिए एक प्रकार की 'अस्थाई- मौत' ही है। दूसरा घर मिलते ही उनका पुनर्जन्म हो जाता है।इस समय नेताओं के पुनर्जन्म का मौसम बहारें ले रहा हैं। बाहर वाले अंदर जा रहे हैं ।अंदर वाले बाहर जा रहे हैं। नए घर तलाश रहे हैं। कुछ किसी कारण वश नया घर तलाश कर मालाओं से लादे जा रहे हैं। मंत्री पद पाने की जुगाड़ लगा रहे हैं।जिसका पलड़ा भारी,उसकी ओर दुनिया सारी।जिस जहाज को डूब ही जाना है ,उसमें बैठने से अपनी मौत स्वयं ही बुलाना है। इसलिए समझदारी इसी में है कि दूसरे जहाज पर सवार हो जाना है और उसके भार को गलहार तक पहचाना है।

 राजनीति में कोई किसी का स्थाई मित्र होता है नहीं शत्रु। ये सब स्वार्थ, स्व- आसन और शीर्षासन का खेल है।कभी सीधे कभी उलटे। एडमिन जी के कान भरने वालों की भी कोई कमी नहीं है।ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है। वे स्वतः मिल जाते हैं।उनके चाहने भर से किसी को भी निष्कासित किया जा सकता है। उसकी हालत ये हो जाती है कि वह अपनी सफ़ाई भी मंच को नहीं दे सकता ,क्योंकि उसके सर के ऊपर सरपंच जी का हस्त- पंच इतना तगड़ा पड़ चुका होता है कि वह किसी काम का नहीं रहता। पुनः पटल पर लौटना सरपंचजी की महती कृपा पर ही निर्भर करता है। यदि वे पुनर्विचार करें तो।

ये काव्य ,अकाव्य, धर्म , वर्ग ,वर्ण ,सवर्ण ,अवर्ण , शिक्षक , सियासत आदि आधारों पर बनी व्हाट्सएप पंचायतें युगीन न्याय -पंचायतें ही हैं।जहाँ आए दिन मर्यादा में रहने की शिक्षा प्रधान एडमिन द्वारा दी जाती रहती है। फिर भी कुछ सदस्य जान बूझकर ,कुछ भूलवश मनमानी करते हुए देखे जाते हैं।कभी वे 'क्षणे रुष्टा क्षणे तुष्टा' के अनुसार आचरण करते हुए पटल छोड़कर स्वतः बाहर हो जाते हैं। पर अंदर आते हैं तो सरपंच जी की इच्छा से।

   हर मंच या पंचायत कहिए ; में कुछ सदस्य मौज मनाने आते हैं। जो गूंगे की तरह गुड़ का रसास्वादन करते हैं।एकदम जड़वत।वे बेचारे किसी के बुरे न किसी के अच्छे ।दूध नहीं दे रही गौ की तरह सीधे। गाय वही लात मारती है ,जो दूध देती है। जो दुधारू न हो ,वह तो खड़े - खड़े चारा खाती है या खड़े खेत चरती है।यही हाल इन अनासक्त सदस्यों का है। वे चुपचाप खड़े -खड़े चारा चाभने के लिए ही पैदा हुए हैं।ठीक वैसे ही जैसे वरयात्रा में न सब नाचते हैं, न सब हल्ला -गुल्ला करते हैं। न सब वैवाहिक कार्य में व्यस्त रहते हैं। बस आनन्द लूटते हैं।दावत खाते नहीं ,लूटते हें ।  बस बैंड वालों के पीछे -पीछे जनवासे की चाल से चलते रहते हैं। ऐसा नहीं कि इन पर सरपंच जी की आँखें नहीं लगीं हैं। कुछ सरपंच जी तो बड़े मंच के गुमान में चुपचाप पड़े रहते हैं औऱ कुछ जागरूक सरपंच जी उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में विलंब नहीं करते। 

 इस प्रकार सरपंच जी या कहिए एडमिन जी की अनन्त कथा है। पटल के सदस्यों के लिए तो कानून को अमली जामा पहनाया ही जा चुका है कि यदि कोई सदस्य मंच पर कोई गड़बड़ करता है अथवा आपत्तिजनक पोस्ट भेजता है ,उसका पूरा उत्तरदसयित्व उसी का होगा,एडमीनों का नहीं ।इन सारे एडमिन्स की आचार - संहिता भी तैयार हो रही है। जो निकट ही किसी 'लोग- सभा' सत्र में संविधान में अपना स्थान बनाएगी।और सरपंच बनाम एडमिंन्स की स्वेच्छाचारिता पर लगाम लगा सकेगी कहीं आप भी कहीं एडमिन तो नहीं हैं? यदि हों, तो सावधान हो लीजिए। क्योंकि एडमिन क़ानून की धारा 840 में उन्हें बाँधा जाने की तैयारी चल रही है।सरपंचो!बनाम एडमिनो! सावधान हो जाओ। 

 🪴 शुभमस्तु ! 

 १३.०१.२०२२◆८.३० पतनम मार्तण्डस्य।

 

मंगलवार, 11 जनवरी 2022

गधा -व्यथा 🦄 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🍁 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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घोड़े   का   कुल वंश हमारा।

फिर भी कहे गधा जग सारा।

रंग- रूप    में  घोड़े    जैसा।

फिर भी मान न पाता  वैसा।


जाकर  घूरे  पर  भी  चरता।

अपना उदर घास से भरता।।

सूखी, हरी  घास  जो  पाऊँ।

खाकर अपनी भूख  पुराऊँ।।


जब अपनी मस्ती में  आता।

ढेंचू - ढेंचू   स्वर  में   गाता।।

सदा विनत  मुद्रा  में   रहता।

दार्शनिकों -सा भाव उभरता।


बहुत निठुर है मालिक  मेरा।

लादे   भार   पीठ  बहुतेरा।।

फिर भी नहीं,नहीं मैं करता।

मालिक के  डंडे  से डरता।।


मंद बुद्धि  के जो  नर  होते।

मानव उनको  कहते  खोते।।

जो गर्दभ -  पदवी  के धारी।

गधा -योनि के नर अवतारी।।


सीधे - साधे    भोले - भाले।

कहलाते  वे   गधे   निराले।।

तोष-शांति  का  मैं हूँ  वाहक।

खाता फिर भी चाबुक घातक।


मालिक की घरनी का गुस्सा।

पड़े पीठ पिटना, हो फुस्सा।।

बाहर   जैसा    भीतर   वैसा।

चाहे  कोई  कह   ले   कैसा।।


मुझको छल-प्रपंच कब आता!

नहीं किसी का पथ भटकाता।

लोक - कहावत  बनी हमारी।

'शुभम' गधे की करते ख्वारी।


🪴 शुभमस्तु!


११.०१.२०२२◆३.००

पतनम मार्तण्डस्य।

बच्चा -बच्ची वीर बनेगा।👮‍♂️ [बाल कविता ]

  

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✍️ शब्दकार ©

👮‍♂️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बच्चा   -   बच्ची       वीर   बनेगी।

दुश्मन     को     शमशीर  तनेगी।।


हम     आगे     बढ़ने     वाले   हैं।

हम  तलवार,    तीर,    भाले   हैं।।


ऊँचा      रहे      तिरंगा     प्यारा।

आन - बान     है    वही  हमारा।।


शान   न      इसकी    जाने  देंगे।

जान  शत्रु    की   हम    ले  लेंगे।।


दृष्टि    अगर    टेढ़ी     जो करता।

करनी  का   फल  ही  वह भरता।


अपना     देश    हमें     है  प्यारा।

देता    है    संबल     नित  न्यारा।।


पहले   हमको    लिखना- पढ़ना।

फिर    हमको    आगे   है   बढ़ना।।


सदा    प्रगति    करनी    है  हमको।

हमें    मिटाना  है  हर   तम को।।


'शुभम'चरित निज उज्ज्वल करना।

यही  ध्येय    निज   उर   में धरना।।


🪴 शुभमस्तु !


११.०१.२०२२◆८.०० आरोहणं मार्तण्डस्य।


सोमवार, 10 जनवरी 2022

सजल 🌾

 विश्व हिंदी दिवस पर🪴

  

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समांत: अना।

पदांत: मेरा।

मात्राभार :24.

मात्रा पतन:नहीं है।

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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हिंदी   का  विस्तार   सुनहरा सपना   मेरा

हिंदी  से  कर   प्यार   यही  है कहना   मेरा


हिंदी  ने   ही  मुझे   बढ़ाया  और   पढ़ाया

माँ का सुरभि दुलार काव्य का गहना मेरा


माँ  के  पहले   बोल  वही हों अंतिम   मेरे

माँ  को   करता  प्यार  वही है अपना  मेरा


आज  विश्व  हिंदी  का दिन है मित्रो  आओ 

बहे   हिंद   में   धार   मंत्र   है जपना  मेरा


वैज्ञानिकता  पूर्ण  'शुभम' की भाषा  हिंदी

जीना - मरना  हिंद  उसी हित खपना मेरा


🪴शुभमस्तु !


१०.०१.२०२२◆७.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल ☘️

 

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✍️ शब्दकार ©

🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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ये    ऊँट    की    करवट।

करती है  बड़ी    खटपट।।


आबाद     हुईं      गलियाँ,

खाली    हैं पड़े    पनघट।


 सब    घोड़े   हार    चुके,

और गधे  चले     सरपट।


जारी    भी   कोसना    है,

भारी      लगे      अटपट।


कीचड़     उछाल    होली ,

चौपाल    सजे    जमघट।


हम भी   तो   चाहें  कुर्सी,

तू जा परे  को  हट  - हट।


किस्सा -ए-  कुर्सी    देखो,

चोरों  को  मिले   झटपट।


🪴शुभमस्तु !


०९.०१.२०२२◆६.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

मेरी बैंक:मेरी गुल्लक 🏮 [बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏮 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गुल्लक  है  धनवान   हमारी।

लाल -लाल माटी की प्यारी।।


बाहर - भीतर    नोट  भरे  हैं।

नीले , पीले  , लाल ,  हरे  हैं।।


सिक्कों से खन-खन बजती है

बचे  हुए  धन से  ठुसती  है।।


गुल्लक घर की  बैंक  हमारी।

होती  जाती  है  नित  भारी।।


सिक्के एक, पाँच या दस के।

घेर   पड़े  हैं  बाहर   उसके।।


जब  भी  आवश्यकता  होती।

खुशियों से मुखअपना धोती।


गुल्लक   एक भरे  जब  मेरी।

ले  लूँगा  मैं   फिर  बहुतेरी।।


मेरी  अपनी    बैंक  निराली।

'शुभम'बजाएँ जी भर ताली।।


🪴 शुभमस्तु !


०८.०१.२०२२◆११.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।


वाणी कवि की गोमुखी 🦚 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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वाणी   में अमृत बसा,वाणी में  विष  जान।

वाणी से  कोयल बने,कागा की   पहचान।।


वाणी  ही  सुखरूप  है , वाणी    परमानंद।

वाणी   ही   रसराज  है, वाणी रचती   छंद।।


खड़ा  कूप - मुंडेर पर,  करता नर   आलाप।

वाणी आती लौट कर,तू, तुम या स्वर आप।


वाणी  वीणाधारिणी, देतीं ध्वनि,स्वर, नाद।

सरस्वती माँ  भाषिका,वाचा, बोली,   वाद।।


कविता की शुचि गोमुखी, रसना के मधु बोल

वाणी ही स्रोतस्विनी, शब्द-शब्द अनमोल।।


वाणी   वार्तालाप   का, एकमात्र   आधार।

'शुभम' शब्द बोलें सदा, रहे न लेश विकार।।


वाणी को मत बाण का, कभी दीजिए   रूप।

'शुभम'सत्य प्रिय बोलिए,ज्यों शरदागम धूप।


वाणी  ही   सुरलोक  है, वाणी  कुंभीपाक।

ऊँची करती  नसिका, कटवाती भी  नाक।।


कोमल बोले कामिनी, नर के भारी  बोल।

वाणी तब ही बोलिए,हृदय- तराजू  तोल।।


विद्याधर  हो या परी, कितना सुंदर   रूप !

वाणी देती मान  नित,वाणी अमृत - कूप।।


वाणी से नर दनुज है,वाणी से वसु   मीत।

'शुभं'सत्य शुचि बोलिए,सदा-सदा हो जीत


🪴 शुभमस्तु !


०७.०१.२०२२◆८.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

आसान है! 🙈 [ अतुकांतिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🙈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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भेड़ बनना 

आसान है,

शेर बनना नहीं,

शेर यों ही 

वनराज नहीं,

इसीलिए

हर एक शेर नहीं।


कुछ भी नहीं विचारना

बस किसी का 

अंधा अनुगमन करना,

रेवड़ में विचरना,

वही है उसका धर्म,

किया जाने वाला कर्म,

भेड़ - धर्म है,

भेड़ाचरण का मर्म है।


भेड़ का क्या है!

न अपना दिमाग़,

न अपनी सोच,

न अपने कान,

आगे चलने वाले की

ऊँची शान,

उसी में बसते हैं प्राण,

रहते हुए म्रियमाण।


आज भेड़ ही 'भक्त' है,

भीड़ का रेवड़ है,

इनकी दृष्टि में 

ये देश नहीं बेहड़ है,

जहाँ जनता नहीं

खेहर  है,

रौंद रहे भेड़ों के रेवड़।


बहुमत की तलाश है,

सत्य की नहीं,

भले ही वह अंधों का हो,

अविवेकी बंदों का हो,

आत्मघाती छल-छंदों का हो,

सत्य की चिंता ही किसे है!


बस आसान है,

भेड़ बन जाना,

हर्रा लगे न फ़िटकरी,

रँग चोखा ही आ जाना!

चलते रहें !चलते रहें!!

चरैवेति ! चरैवेति !!

भले ही भाड़ हो!

कुछ करने के लिए

आड़ का पहाड़ हो।

भेड़ का यही

 'शुभम' पंथ है,

यही आसान है,

मेरा देश महान है।


🪴 शुभमस्तु !


०६.०१.२०२२◆७.००पतनम मार्तण्डस्य।


आँखों का खेल 🌹 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आँखों - आँखों   का ये खेल निराला    है।

निज  अंतर   का मंत्र  तंत्र में डाला    है।।


देखा  पहली  बार  नहीं तुम कुछ  बोली।

फिर भी चमकी युगल कपोलों पर रोली।।

पलकें विनत अधीर चरण युग ताला  है।

आँखों - आँखों का  ये  खेल निराला  है।।


नवल रूप   की  धूप  गुनगुनी प्यारी   है।

चली  हस्तिनी  चाल सभी से न्यारी    है।।

चलती - फिरती कांत -शांत मधुशाला है।

आँखों - आँखों  का ये खेल निराला   है।।


बिना  परस  के  हर्ष  रोम   में जागा  है।

बँधा  हृदय  से हृदय बिना ही तागा   है।।

बिना  पिए  ही पी  ली उर ने हाला    है।

आँखों - आँखों का  ये खेल निराला  है।।


रहा  न  जाए   बिना  तुम्हारे मुझे   शुभे!

पल - पल भारी लगे एक पल नहीं  निभे।।

सजनि  तुम्हारे  रंग - रूप  में ढाला   है।

आँखों - आँखों  का ये  खेल निराला  है।।


सुकृत  रचना  रची    ईश  ने तुम   बाले!

'शुभम ' विरह  के फूट गए उर के  छाले।।

तुम ही मम संसार  अमिय का प्याला  है।

आँखों - आँखों   का  ये  खेल निराला है।।


🪴 शुभमस्तु !


०५.०१.२०२१◆८.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।

बुधवार, 5 जनवरी 2022

धूप कुनकुनी 🌅 [ दोहा ]

 

[अँगीठी,आँच, कुनकुन,धूप,कुहासा]

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✍️ शब्दकार ©

🌅 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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    🖋️ सब में एक🖋️

गया अँगीठी- काल अब,करते  गैस  प्रयोग।

मानव-तन में लग रहे, तरह-तरह के  रोग।।


घर  की  बड़ी  मुँडेर पर,हुई अँगीठी  लाल।

धूम  उड़ाती   वायु में ,करती हुई    धमाल।।


लगी आँच की तन तपन,शीत हुआ कमजोर

दादी  आई   पास   में,  हुई सुनहरी    भोर।।


अगियाने  की  आँच का,उठा   रहे  आनंद।

बालक,  नारी ,नर सभी, गा चौपाई   छंद।।


कुनकुन जल ही पीजिए,भोजन के उपरांत।

पाचन होगा उचित ही,जठरानल हो  शांत।।


कुनकुन तेरी देह का,परस मिला जब मीत।

पोत-पोर गायन करे,काम -छंद  के   गीत।।


देख  कुमारी धूप का, रूप मनोहर   कांत।

पहुँचा  छूने  को 'शुभम', हुई रजाई  क्लांत।।


प्रिये  तुम्हारे रूप की,सुखद कुनकुनी धूप।

आलिंगन में  बाँधती,ढलता तव अनुरूप।।


सघन कुहासा दुग्ध-सा ,प्रसरित चारों ओर।

देखी घर के द्वार पर, शीतल भोली   भोर।।


जमा कुहासा घास पर,पादप -दल मुक्ताभ।

विनत सुमन खिलने लगे,हुआ सचेतन गाभ।


       🖋️ एक में सब 🖋️


दग्ध अँगीठी आँच को,

                 देख भोर की धूप।

श्वेत कुहासा ओढ़कर,

                  आई कुनकुन रूप।।


🪴 शुभमस्तु !


०५.०१.२०२२◆६.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

श्रम - सीकर 🌾 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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 श्रम-सीकर के नीर का,कौन दे सका मोल।

कितना बह जाता धरनि, कौन रहा है तोल।।


पाहन  काटे श्रमिक ने,लगा रहा दिन - रात।

सुखद नहीं पल एक भी,की न प्रिया से बात।


आँसू श्रमकण में कभी,किया न उसने भेद।

तन से बहता ही रहा, रह-रह कर बहु स्वेद।।


श्रमकण  गंगा  धार है, पावन करती    गेह।

वह वसंत  पावस शरद, वही सावनी   मेह।।


श्रम में ही संतोष है,श्रम में स्वर्ग  निवास।

श्रम ही जीवन ढाल है,श्रम ही है जन आस।


सड़कें विद्यालय भवन,सब श्रमिकों की देन

श्रम से  चूड़ी  हार सब, मोटर गाड़ी   वेन।।


श्रम कर सरिता बढ़ रही,नित सागर की ओर

पर्वत से  झर-झर बहे,कमी न रखती कोर।


सूरज का श्रम देखकर,  क्यों होते  हैरान।

श्रम का एक प्रतीक है,करता ज्योति प्रदान


पंचतत्त्व श्रमरत रहें,अविरत कर्म  प्रधान।

धरती अंबर अग्नि जल, पावन पवन महान।


रखे  हाथ  पर हाथ जो,बैठा है    नर   मूढ़।

तन है उसका मृत्तिका,मन भी उसका कूढ़।।


'शुभं'करे किस शब्द से,श्रम का अब गुणगान

करता है निज हृदय से,कर श्रम सीकर दान।


🪴 शुभमस्तु !


०४.०१.२०२२◆ १.५०

पतनम मार्तण्डस्य।


राम - कहानी 🛕 [ बाल कविता ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बड़ी  पुरानी  राम  -  कहानी।

नगर अयोध्या   सीता  रानी।।


पिता राम के  दशरथ   राजा।

बजता धीर- वीर का बाजा।।


कौशल्या  के  सुत  व्रतधारी।

सुता कौशलाधीश सु  नारी।।


कैकई  औऱ  सुमित्रा  माता।

माता  जैसा   उनसे  नाता।।


पितुराज्ञा प्रिय  सुत ने मानी।

फिर आगे बढ़ चली कहानी।।


सँग  सीता वनवास सिधाए।

वन में संकट   भारी   पाए।।


चुरा ले गया  रावण  सीता।

बुरा समय आपद में बीता।।


रावण मार  राम   घर आए।

घर - घर मंगल मोद मनाए।।


राजा हुए राम,   सिय रानी।

फिर आगे बढ़ चली कहानी।


'शुभम' बताई  राम -  कहानी।

नित्य  नई  है   भले  पुरानी।।


🪴 शुभमस्तु !

०४.०१.२०२२◆१.००

पतनम मार्तण्डस्य।

प्यारा मेरा देश 🌻 [ बालगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप ' शुभम

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मेरा   देश   मुझे  अति प्यारा।

बहती  गंगा - यमुना   धारा।।


उत्तर  में  हिमगिरि  प्रहरी  है।

घाटी  हरी - भरी   गहरी  है।।

दक्षिण  में  सागर   है  न्यारा।

मेरा देश  मुझे   अति प्यारा।।


केसरिया, सित, हरा  तिरंगा।

पहनें जन पट रंग -  बिरंगा।।

बहु भाषाओं का  शुभ गारा।

मेरा देश  मुझे  अति  प्यारा।।


संस्कृति  अपनी है   बहुरंगी।

सब नर -  नारी भी  हैं संगी।।

सूरज चमके  चाँद  सितारा।

मेरा देश मुझे अति  प्यारा।।


है वसंत ऋतुओं  का राजा।

बजा रहा भौंरों का  बाजा।।

महक उठा है  देश   हमारा।

मेरा देश मुझे  अति प्यारा।।


ऋतुओं  की  रानी  है  वर्षा।

बरसें बादल जन -जन हर्षा।।

हरा खेत, वन, उपवन सारा।

मेरा देश मुझे  अति  प्यारा।।


दूध   दे    रहीं   भैंसें,  गायें।

मंदिर में जा प्रभु गुण गाएँ।।

धर्म - कर्म  हो  अपना चारा।

मेरा देश मुझे  अति  प्यारा।।


'शुभम' गीत भारत के गाएँ।

सदाचार के ढँग   अपनाएँ।।

विश्व विजय कर देता नारा।

मेरा देश  मुझे अति प्यारा।।


🪴 शुभमस्तु !


०४.०१.२०२२◆१२.१५ 

पतनम मार्तण्डस्य।

सूरज ,चाँद, चाँदनी, तारे 🌞 [बालगीत]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌞 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सूरज,  चाँद,   चाँदनी ,  तारे।

दिए  ईश  ने  हमको   प्यारे।।


मोल  ईश  ने  नहीं  लिया  है।

जन-जन पर उपकार किया है

हम  हैं   उनकी  देन   सहारे।

सूरज,  चाँद,  चाँदनी,  तारे।।


धरती, हवा, गगन  या  पानी।

अनल - तेज के  जाने मानी।।

नित  शुभकारी    हैं  ये  सारे।

सूरज, चाँद,   चाँदनी ,  तारे।।


सरिता ,पर्वत     देते    पानी।

जड़-चेतन हित बनी कहानी।

बादल ने कृषि, खेत   सुधारे।

सूरज, चाँद,  चाँदनी ,  तारे।।


छः ऋतुओं की शोभा न्यारी।

लगे एकरस   जीवन   भारी।।

प्रभु - रचना से  हैं  हम  हारे।

सूरज,चाँद,   चाँदनी ,  तारे।।


'शुभम'उऋण प्रभु से क्यों होना।

वही   जागरण   उससे  सोना।।

लगा ईश   के  नित   जयकारे।

सूरज,  चाँद,  चाँदनी ,  तारे।।


🪴शुभमस्तु !


०४.०१.२०२२◆११.००आरोहणं मार्तण्डस्य।

मुखौटा 🤡 [ मुक्तक ]


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                        -1-

लगाकर     मुखौटा  चले  हैं      रिझाने,

सभी    साधते    हैं   उरों    पर  निशाने,

गली -   गाँव    में    मतमंगे  चले     हैं,

भोली - सी  जनता  छलों    से   लुभाने।


                        -2-

चेहरे    पर       चेहरा   नकली   चढ़ाए,

कदम   आश्वासनों    के   आगे   बढ़ाए,

सभी    जानते     ये मुखौटे  हैं   सारे,

घूमते    चाम    नेता   तन   पर   मढ़ाए।


                        -3-

भाषा    भी    बदली  बदली है    बोली,

लिए    साथ   घूमें  चमचों  की   टोली,

कपट   का   मुखौटा चढ़ा हर वदन पर,

चंदन    सजाया   चमकती   है   रोली।


                        -4-

वादों , विचारों   में  सच कुछ नहीं   है,

मुखौटों   के  नीचे   कटुता बही    है,

इत्र   की  इन सुगंधों  के नीचे सड़न है,

'शुभम ' ने  सचाई की कहानी कही  है।


                        -5-

मुखौटों   के     मेले   सजने लगे    हैं ,

सलिलहीन   बादल    गरजने लगे   हैं,

झूठ  की ये  झड़ी भिगोती यों 'शुभम',

मतमंगे    अपने     न  होते सगे     हैं।


🪴 शुभमस्तु !


०४.०१.२०२२◆ ८.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

सोमवार, 3 जनवरी 2022

शीत-कुंडली पूस की! ❄️ [ कुंडलिया ]


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✍️ शब्दकार ©

❄️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                        - 1-

कंबल में रुकता नहीं, पूस माघ  का  शीत।

दादी पोते  से कहे,कब हो  ठंड   व्यतीत।।

कब हो ठंड व्यतीत,शीत अब सहा न जाता

काँपे थर - थर  देह, हृदय  मेरा   घबराता।।

'शुभं'ताप कर आग,मिले तन मन को संबल।

बरसे तुहिन अपार,रोक क्या पाता  कंबल।।

                        -2-

छाया चहुँ दिशि  कोहरा,चादर  ओढ़े   सेत।

वन - उपवन को  घेरता,घेर लिए  हैं  खेत।।

घेर लिए  हैं खेत, पेड़  से टप- टप  बरसे।

ठिठुर रहे तरु कीर,कुकड़ कूँ बोले घर से।।

'शुभम'काँपते ढोर,शीत की व्यापक माया।

कभी मंद -सी धूप,कभी बादल की छाया।।

                         -3-

फूले  गेंदा  खेत   में,   महके बाग   गुलाब।

रंग-बिरंगी तितलियाँ,शीतल- शीतल आब।

शीतल-शीतल आब,ओस कण पादप भारी

चमकें  मुक्ता - बिंदु,भ्रमर मकरंद   पुजारी।।

'शुभम'शीत के गीत,गा रहे मद    में   भूले।

कुंजों में  गुंजार, सुमन  उपवन   में   फूले।।

                        -4-

सरसों फूली खेत में,ज्यों नव चादर  पीत।

शिशिर, शीत हेमंत में,हिल-मिल गाती गीत।

हिल -मिल गाती गीत,कृषक मन में  हर्षाये।

नाच रहा गोधूम,नयन को अति मन भाए।।

'शुभम'मटर की बेल,आजकल भी या बरसों

झूमे  मस्त  किसान, संग में नाचे    सरसों।।

                          -5-

पहने ऊनी  आवरण, बचा  रहे  निज  गात।

नर,नारी,बालक,युवा, काँप रहे  ज्यों  पात।।

काँप रहे ज्यों पात,नहाना कठिन  बड़ा  है।

पिछले से इस साल, शीत ये बहुत  कड़ा है।।

'शुभम' सँभल जा मीत, ठंड पहले से दूनी।

अगियाने  के  पास ,बैठ नर पहने   ऊनी।।


🪴 शुभमस्तु !


०३.०१.२०२२◆४.१५

पतनम मार्तण्डस्य।

सजल 🪦

 

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समांत : अल।

पदांत  :नहीं है।

मात्राभार  :16.

मात्रा पतन: नहीं ।

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✍️ शब्दकार ©

🪦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जीना  इतना   सरल   नहीं  है

टिकता कब जो सबल नहीं है


परिश्रम से मिलता  है  अमृत

यहाँ-  वहाँ  सब गरल नहीं है


चौपाई      आधार     छंद   है

हर   चौपाई   सजल  नहीं   है 


कितना घाघ आज का मानव

पानी  जैसा   तरल   नहीं   है


काम  सभी संभव हैं  जग में

कमी मात्र उर विमल नहीं है


चारों अँगुली  असम  रूप की

हर मानव - उर  धवल नहीं है


'शुभम' पंक से  बाहर  आजा

खिलता घर में कमल नहीं  है


🪴 शुभमस्तु !


०३.०१.२०२२◆६.१५ आरोहणं मार्तण्डस्य।

भेड़ाचार -पुराण 🐑🐑 [ व्यंग्य ]

 

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🐏 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम ' 

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 कौन नहीं जानता की भेड़ की ऊन बड़े काम की चीज है ! आदमी स्वार्थवश उसकी देह की रक्षक और सुरक्षा वरण को भी उसके पास नहीं रहने देता। उसके ऊनी वस्त्र,कोट ,पेंट, स्वेटर,शाल , कमीज, इस्टॉल, चादर और न जाने क्या- क्या बनाकर उसका कायाकल्प ही कर देता है।

    ऊन के साथ-साथ भेड़ एक और काम के लिए विशेष रूप से जानी- पहचानी जाती है ,वह है उसका भोलापन औऱ चाल - आचरण।वह इतनी सरल चित्त ,परिजीवी, मत्यान्धा और 'पर पद चिह्नानुगामी' होती है,कि उसकी जितनी सराहना की जाए ,कम ही है।इसे तथ्य को यदि कम से कम शब्दों में व्यक्त किया जाए तो इसे 'भेड़ाचार' कह सकते हैं। आमतौर से इसे लोग भेड़ चाल कहते हुए देखे जाते हैं। उक्त 'भेड़ाचार' भेड़ों के पास जितना भी हो ,किंतु मानव जाति का विशेष प्रेरक, शिक्षक और प्रतीक है। दूसरे शब्दों में वह मानव की गुरु पद की पदवी को प्राप्त कर चुकी एक विशेष दर्जा प्राप्त जिंस है।

  इस प्रकार भेड़ ने अपनी योनि से मानव समाज का बहुत बड़ा उपकार किया है। यह उपकार इतना महत्त्वपूर्ण है कि उस पर पुराण ही लेखनीबद्ध किया जा सकता है। इस व्यंग्यकार की अँगुली रूपी इस लेखनी से जितना भी शुद्ध औऱ गाढ़ा घृत निकाला जाना संभव है, वह प्रयास कर रहा है। 

  समाज ,धर्म- कर्म,सियासत सभी क्षेत्रों में भेड़ाचरण की विशेष महिमा गाई जाती है। पहले ही कहा जा चुका है कि भेड़ मत्यान्धा प्राणी है। जो जन भेड़ानुगामी हैं ,उन्हें भी अपनी बुद्धि पर पाँच मिलीग्राम भी वजन डालने की आवश्यकता नहीं है।उसे तो बस पीछे -पीछे चलने का अनुगमन मात्र करना है।यहाँ तक कि बुद्धि की आँखें बंद करने के साथ -साथ अपने दोनों चर्म -चक्षु भी बंद कर लेने हैं। सो उन्होंने कर ही लिए हैं। 

  आपको यह भी विदित होगा कि भेड़ का दूध क्या कोई गाय , भैंस जैसा जलवत पतला दूध नहीं है। वह तो मानें वह मक्खन ही देती है। राजस्थानी मुहावरा तो आप जानते ही होंगे कि मक्खन खाने से अधिक लगाना अधिक हितकर होता है।भेड़ाचारी पुरुष या स्त्री में मक्खन लगानेका विशेष हुनर होता है।वह दूसरों को मक्खन लगाकर स्वयं मक्खन - मलाई चाभता है।राज नेताओं के 'भेड़ाचारी' जगत प्रसिद्ध हैं। मक्खन लगाने में डी.लिट्.की उपाधि भी उनके लिए कोई अर्थ नहीं रखती।देशी भाषा में इन्हें चमचा/ चमची (लिंग भेदनुसार) भी कहा जाता है। कहना चाहिए कि भेड़ के बहुत सारे पर्याय बन गए हैं। यथा:चमचा, चमची, मत्यान्ध , मक्खनबाज,परपद चिह्नानुगामी, भेड़ाचारी आदि। जैसे गिरि को उठाया तो कृष्ण हुए गिरधारी,वंशी बजाई तो वंशीवाले, मुर राक्षस को मारा तो मुरारि, गोपियों को चाहा तो गोपिवल्लभ आदि आदि।जैसे कर्म वैसे उनके नाम की ख्याति। 

 नेताओं की पूँछ को लम्बा और छोटा करना 'भेड़ाचारी' की बाईं टाँग का चमत्कार है। उनके पीछे - पीछे जो चलना है। उनके टुकड़ों पर पलना है। इसीलिए उनके बने साँचे में ढलना है।अन्यथा चारों को पड़ेगा मलना है।एक के पीछे लंबी कतार।भीड़ को किराए पर लाने ,लादने का पूरा जिम्मेदार, कभी हेलीकॉप्टर कभी यान कभी कार। कितना बड़ा भार। कभी नहीं मानता हार। बेतार का तार। कभी नहीं बैठा बेकार।मिलता जो है असीम प्यार। यही तो है 'भेड़ाचारी' का उपहार। 'भेड़ाचारी ' का चतुर्दिक बेड़ा पार। समाज का अधिकांश भाग 'भेड़ाचारी' ही है। चाहे वह धर्म का क्षेत्र हो या रीति, रिवाज ,रस्मों का , विवाह ,शादी ,तीज त्यौहार, सामाजिक व्यवहार; कहाँ नहीं है भेड़ाचार ? नब्बे प्रतिशत से अधिक समाज 'भेड़ाचारी' ही तो है ! बिना सोचे -समझे जो आचरण करे ,वह औऱ किस परिभाषा के अंतर्गत समेटा जा सकता है ! 

  राजनीति की फसल को फलने -फूलने ,बढ़ने और फैलने, का सर्वोच्च श्रेय भी 'भेड़ा चारी' को ही जाता है। इनके बिना सब बंटाधार ही समझें। 'भेड़ाचारी' यदि पूँछ है तो नेता उसकी मूँछ है। सारा दारोमदार उसी के ऊपर टिका हुआ है।बड़ी मूँछ धारी की पूँछ भी लंबी होनी चाहिए। वही तो नेता के गले का हार है। नहीं तो नेतागीरी में क्या सार है? आम आदमी की अति महत्वाकांक्षा उसे और कुछ भले नहीं बना सके, 'भेड़ा चारी' अवश्य बना देती है। वह धृतराष्ट्र जी के साले जी की बहन का अनुज जो हुआ! जो जानबूझ कर अपनी बहन का अनुकरण करता हुआ स्वतः आँखों पर पट्टिका बंधन कर लेता है। धन्य हैं आज के युग के सकल ' भेड़ाचारी ' !


 🪴 शुभमस्तु ! ०२.०१.२०२२◆


 ९.४५ पतनम मार्तण्डस्य। 


रविवार, 2 जनवरी 2022

भेड़ाचरण 🐏🐑 [ अतुकांतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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  भेड़ाचरण

रिसता हुआ व्रण

प्रति क्षण - क्षण,

 भविष्य की धूमिल किरण

किया है 

बहु संख्य  ने वरण।


भेड़ में कोई विचार नहीं,

सोच का आचार नहीं,

चरैवेति - चरैवेति  पीछे - पीछे 

न देखें ऊपर नहीं नीचे,

चर्म - चक्षुओं को मींचे,

भले हो पतन

 किसी  कूप  में,

या भाड़ में ही गिरें,

ऊपर उठने की

 सोच  ही गुनाह !

सदैव चाहिए 

किसी चूषक की छाँह,

वट वृक्ष की पनाह! 

वाह रे आत्ममुग्ध इंसान!

तुझे लाभ ही लाभ 

न कोई हानि! 


हर्रा लगे न फिटकरी,

चरण चुम्बन में 

गोटी फिट करी,

जय जय नेताजी!

हरी - हरी !

माल ही माल 

तरी  ही तरी!

उनको मेवा मिसरी

तुम्हें काजू किसमिस गिरी!


रे भ्रमित भेड़ाचारी !

कभी लाल हरी

कभी केसरिया भी सँवारी,

तुम नेता के पीछे !

जनता तुम्हारे पीछे,

हरे - हरे बागीचे!

चमचा - जल से 

बहुविधि सींचे,

तुमसे सब नीचे।


खाने से बेहतर है

मक्खन का लगाना,

नीम को बबूल 

औऱ उनके कहे पर

बबूल को नीम बतलाना,

छल -प्रपंचों से

हर आम को बरगलाना,

 भ्रमित करवाना,

रावणीय अट्टहास

करना करवाना,

एक्ट जाल में 

मछली फँसाना,

तिलक त्रिपुंड लगा

धर्म -आस्था जताना!

नया नहीं

छल प्रपंच है पुराना।


हथकंडे 

रंग - रंग के बिरंगे,

बनी हुईं धन 

स्वर्ण की सुरंगें,

तिजोरी की

 जरूरत ही नहीं,

कक्षों में 

बोरियाँ भरी-भरी!

भैंस समेत खोया 

करने की पूरी छूट!

कहता रहे कोई

जनता और करों की लूट!

'शुभम' तुमसे ,

तुम्हारे  जैसों से,

ये इंडिया महान है,

तुम में  ही तो बसते

नेता जी के प्राण हैं।


🏕️ शुभमस्तु !


०२०१२०२२◆४.३० पतनम

मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...