शनिवार, 12 सितंबर 2026

हिंदी गौरव [ गीत ]

 285/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हिंदी गौरव

सौरभ हिंदी

हिंदी है भारत की प्राण।


माँ के पहले बोल

इसी हिंदी से

जुबाँ बोल पाई

रोटी दूध

नीर की वाणी

हिंदी ने ही बुलवाई

हिंदी से ही जीवन मेरा

हिंदी है 

जीवन का त्राण।


सूर कबीर 

संत तुलसी ने 

हिंदी में वह नाम लिखा

अमर हो गई

मीराबाई

बार-बार हरि नाम सिखा

हिंदी के तरकस में

अनगिन 

घुसे हुए हैं सुमधुर बाण।


संस्कृत सुता

सलौनी हिंदी

इसका है अपना विज्ञान

भारत के

कण-कण में व्यापे

तना जीभ पर एक वितान

मिसरी घुली हुई 

रसना में

लगती है ज्यों रिसती खाण।


आओ हम

अपनाएँ हिंदी

रचनाकार गा रहे गीत

लिखते काव्य

कथाएँ अनुपम

बनी हुई है दुनिया मीत

शब्द -शब्द कसकर

तो देखो

हिंदी की है विस्तृत शाण।


शुभमस्तु,


12.09.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆●◆

व्यायाम [ कुंडलिया ]

 284/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता   है  व्यायाम   जो,   रहता  वह नीरोग।

पड़े-पड़े   सोता   रहे,  करे    देह-सुख भोग।।

करे   देह-सुख  भोग,  रुग्ण  वह रहता भारी।

निष्क्रिय होता   गात,देह   की   होती ख्वारी।।

'शुभम्' आयु  हो न्यून,अल्प वय में वह मरता।

करे देह   व्यायाम, सभी  जीवन  सुख करता।।


                          -2-

मानव   के   तन  के   लिए, सुखकारी व्यायाम।

ज्यों   मछली   जल  में   करे,  तैर-तैर विश्राम।

तैर -तैर     विश्राम ,  एक  पल थिर कब होती।

गहराई   में   खोज ,   रही   है   प्रतिपल मोती।।

'शुभम्'  देह की चाल, दिया करती नित आसव।

कर- कर के व्यायाम, बनें सब सुखमय मानव।।


                          -3-

तेरा तन  दुखमुक्त  हो, करना नित व्यायाम।

गाय भैंस बकरी सभी, देखें  सुबह न शाम।।

देखें   सुबह   न   शाम,देह के आसन करते।

चलते   हैं   दिन-रात, पेट  श्रम करके भरते।।

'शुभम्' बनें  गतिशील,बना मत तन का घेरा।

स्वस्थ  रहे यह   गात, सभी सुख होगा  तेरा।।


                         -4-

डाली हिलती आम की,हिल-हिल कर व्यायाम।

टोह   लगाती   देह   की,सुबह  न  देखे शाम।।

सुबह   न   देखे   शाम, मौत  जड़ता  में होती।

हिले   पवन   के   संग, नहीं   रजनी भर सोती।।

'शुभम्'  रहे  गतिवान, नित्य हो धवल दिवाली।

चर-चर की  ध्वनि  तेज,करे   तरुवर की डाली।।


                         -5-

पानी   भी   तालाब का, हो  जाता जब शांत।

करे नहीं व्यायाम तो,बने  थकित तन क्लांत।।

बने थकित   तन क्लांत, सड़न ही पैदा होती।

मानव   की   यह   देह,बिना श्रम रहती रोती।।

'शुभम्' करें  व्यायाम, करें  कुछ खींचा तानी।

तन   हो ऊर्जावान, सड़े   क्यों तन का पानी।।


शुभमस्तु,


11.9.2026◆11.00आ०मा०

                   ◆●◆

हरियाये धानों से खेत [ गीत ]

 283/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भरा ताल

खेतों में पानी

हरियाये धानों से खेत।


ले कागज की नाव

चलाते

हँस-हँस मगन मृदुल मुख नैन

भरे लबालब

ताल तलैया

मिला बालकों को सुख चैन

कोई झूले

झुकी डाल पर

खिल-खिल करते वे समवेत।


नहीं बालकों को

कुछ चिंता

रंग -बिरंगे धर परिधान

भेदभाव तज

सभी खेलते

जीवन के कल से अनजान

कीचड़ माटी में भी

सनते

कभी तपाती सूखी रेत।


चरें मेड़ पर

गैया बछिया

पास कहीं है उनका गाँव

रौनक से परिवेश 

महकता

कहीं पेड़ बरगद की छाँव

नहीं भूत से

वे डरते हैं

नहीं दिखे उनको जिन-प्रेत।


शुभमस्तु,


09.09.2026◆4.15 प०मा०

               ◆●◆

देह रोग से ग्रस्त है [ दोहा गीतिका ]

 282/2026

         

         



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह   रोग   से   ग्रस्त है,बिगड़   गया  है हाल।

लिखना-पढ़ना रुक गया,औषधियाँ हैं ढाल।।


पत्नी   सेवा   में   लगी,व्यस्त रहे दिन -रात,

दूध   कभी   फल  दे रही,बदल रही है चाल।


बुरे   समय   में साथ  हो, अपना   कोई एक,

मन में   तब   धीरज रहे,चमकें अँखियाँ गाल।


पत्नी   ही   देवी   करे,दिन    भर   सेवा खूब,

रुग्ण  देह  ऐसी   हुई,समय  बड़ा विकराल।


प्रभु जी    का   वरदान   ये,पत्नी   मेरी नेक,

उसके ही कारण जले,जीवन-ज्योति मशाल।


जीवन  में   सौभाग्य   है,  रमा   रूप   सन्नारि,

तितली-सी नर्तन करे,  लगती  कभी मृणाल।


'शुभम्' सुलभ होतीं नहीं,पत्नी    सबको श्रेष्ठ,

बड़भागी   वे लोग हैं,जिन   पर   राम कृपाल।

शुभमस्तु,


07.09.2026◆5.30 आ०मा०

                    ◆●◆

लिखना -पढ़ना रुक गया [ सजल ]

 281/2026

         


समांत          : आल

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह   रोग   से   ग्रस्त है,बिगड़   गया  है हाल।

लिखना-पढ़ना रुक गया,औषधियाँ हैं ढाल।।


पत्नी   सेवा   में   लगी,व्यस्त रहे दिन -रात।

दूध   कभी   फल  दे रही,बदल रही है चाल।।


बुरे   समय   में साथ  हो, अपना   कोई एक।

मन में   तब   धीरज रहे,चमकें अँखियाँ गाल।।


पत्नी   ही   देवी   करे,दिन    भर   सेवा खूब।

रुग्ण  देह  ऐसी   हुई,समय  बड़ा विकराल।।


प्रभु जी    का   वरदान   ये,पत्नी   मेरी नेक।

उसके ही कारण जले,जीवन-ज्योति मशाल।।


जीवन  में   सौभाग्य   है,  रमा   रूप   सन्नारि।

तितली-सी नर्तन करे,  लगती  कभी मृणाल।।


'शुभम्' सुलभ होतीं नहीं,पत्नी    सबको श्रेष्ठ।

बड़भागी   वे लोग हैं,जिन   पर   राम कृपाल।।

शुभमस्तु,


07.09.2026◆5.30 आ०मा०

                    ◆●◆

'यतो धर्मस्ततो जय:' [ अतुकांतिका ]

 280/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'यतो धर्मस्ततो जय:'

संदेश देने वाले

देवकी नंदन

लीलावतारी

कृष्णमुरारी

कान्हा का

अवतरण दिवस आया,

दिशा -दिशा में

जड़ -चेतन में

आनंद छाया।


जन्मते नहीं भगवान

किसी माँ की कोख से

वे प्रकट होते हैं

और अपनी लीलाओं से

जन- जन का

 मन मोह लेते हैं।


अज्ञानी हैं वे लोग 

जो भगवान को

जाति के बंधन में ग्रसते हैं,

ऐसे ही मूढ़ जनों पर

कान्हा आज हँसते हैं,

वे परम आत्मा हैं

परमात्मा हैं,

अहीर या ठाकुर नहीं,

मूढ़ों के मगज में

रूढ़ियों की नालियाँ बही।


आदमी पक्षपाती है

स्वार्थी है,

उत्पाती है

सदा घाती है,

मत करना उससे

न्याय की आशा,

सत्य को ढूंढना 

होगी बहुत बड़ी दुराशा।


आईए आज

उन महान संदेशदाता

 श्रीकृष्ण की

अवतरणी मनाएँ,

उनके संदेश को अंगीकृत कर

भटके हुए मन -मष्तिष्क को

सु दिशा प्रदान कराएँ।


शुभमस्तु,


04.09.2026◆5.00आ०मा०

                   ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...