रविवार, 2 अगस्त 2026

यदि नेता होते नहीं [ दोहा ]

 250/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मान और अपमान ,से सिद्ध सियासत पूर्ण।

स्वीकृत जूता जेल भी,अहंकार सब चूर्ण।।

सहनशीलता   धन्य   है,नेताओं  की खूब।

उगते वे  उस  खेत  में,जहाँ न उगती दूब।।


यदि नेता  होते नहीं, करता   कौन विकास।

देश न   रहता  देश  में,  नहीं  देश  के पास।।

बंजर   ऊसर   खेत  में,उगे   न   कोई घास।

नेता   फलते -फूलते,  महक    सुँघाते खास।।


जिस   घर में   नेता उगे,  खुले  पिता के भाग।

सोना-चाँदी      बरसता,     जगे देश-अनुराग।।

मात-पिता   वे   धन्य   हैं,  जिनके  नेता पुत्र।

रहें   पड़ौसी   काँपते,  कहें    रहें   अब कुत्र।।


ज्यों   गेहूँ   के खेत   में,  उगते   खरपतवार।

त्यों     उगते   नेता  यहाँ, नगर गाँव के भार।।

नियम   नहीं इनके लिए, और न शेष विधान।

पिछड़ा   वही  समाज है, नेताओं की खान।।


राहजनी   चोरी   सदा,  जिनके व्यसन अनेक।

व्यभिचारी  नेता जहाँ, कार्य सफल क्यों नेक।।

दुष्कर्मों    के  बीज   से,  जिनका जन्म महान।

वे   समाज   के बीच  में, मूँछ रहे निज तान।।


गाली   और   गलौज से, चलता जिनका काम।

दुर्भागी    वह    देश   है,  ठगे   जा    रहे राम।।


शुभमस्तु,


02.08.2026◆ 10.45 आ०मा०

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नाल मेढकी ने ठुकवाई [ चौपाई ]

 251/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नाल     मेढकी     ने    ठुकवाई।

बड़े  जोर  से    यह    चिल्लाई।।

'मारेगा    क्या     मुझे    कसाई।

अरे     बचाओ     चाची   ताई।।'


तिलचट्टे     मच्छर     भी   आए।

जंतर मंतर     पर    जा    छाए।।

नाच -कूदकर       शोर    मचाते।

गाली- दान    यहाँ    कर  जाते।।


अमरीका  ने       इन्हें     पठाया।

धन के   लालच   से  उकसाया।।

भेज  रहे    हम     भोजन-पानी।

करें    तुम्हारी    हम  निगरानी।।


भारत    में      बरबादी    लाओ।

मिला  धूल में    चैन  न   पाओ।।

सत्तासन     को    ऐसे     फेंको।

बुरे बोल कह     उनसे      रेंको।।


बको   गालियाँ    नेताओं    को।

नहीं  बख्सना तुम    मांओं को।।

त्राहिमाम     जनता    चिल्लाए।

नहीं  चैन    से     जीने     पाए।।


बनकर जौंक  मसक   तिलचट्टे।

उठा  हाथ   बम     अपने  कट्टे।।

भय का भाव  भरो    हे     भाई।

मारो  पुलिस  करो    कुटिलाई।।


भय    से    भूत  नहीं क्यों भागें।

तोड़ मनुज की दो     दो    टाँगें।।

हाय!- हाय !!  जब  होगी  भारी।

सहज    समर्पण    की  तैयारी।।


करना    ही   निज   उल्लू सीधा।

ऊजड़ हो    यद्यपि    हर   बीघा।।

खंडन  ही    है    लक्ष्य     हमारा।

दिखे  देश   को    दिन   में तारा।।


शुभमस्तु,


02.08.2026◆11.30आ०मा०

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बचा कहाँ अब जीवन-रस है [ गीतिका ]

 252/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



बचा  कहाँ  अब   जीवन-रस है !

शिथिल आदमी की नस -नस है।।


संविधान   अब   नहीं  सदन   में,

रखा   ताक   पर   वह बेबस  है।


ठग  बैठे    हैं   बनकर   शासक,

जिनका भेजा  बिलकुल ठस है।


कहाँ    व्यवस्था   बची    देश  में,

शिक्षा    सारी     तहस-नहस है।


जिनको    कहें  ज्ञान   की  बातें,

करे उलट   वह    बुरी   बहस है।


अत्याचार       भ्रष्टता      बढ़ती,

कॉकरोच   क्या  टस से मस है?


'शुभम्'  मौन  धर   रहा न  जाए,

चले यहाँ   पर   चल   सर्कस  है।


शुभमस्तु,


02.08.2026 12.00 मध्याह्न

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...