सोमवार, 31 अगस्त 2026

बदल रहा है देश [ छंद: अहीर ]

 279/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बदल       रहा       है    देश।

बढ़ता       नित        विद्वेष।।

पनप     रहे        हैं     साँप।

लिया  जनों     को     चाँप।।


आस्तीन           के        नाग।

लगा     रहे         हैं     आग।।

जनता         सब        बेहाल।

खड़ा    शीश     पर    काल।।


नेताओं          को           वोट।

सदा          चाहिए         ओट।।

झोंक     देश     को      भाड़।

बने      पेड़          वे     ताड़।।


फूट        डालकर        राज।

शीश        सजाते       ताज।।

अगड़ा        पिछड़ा      भेद।

बढ़ा       रहे        वे     छेद।।


थैली          सबकी       एक।

दलदल    में      सब     नेक।।

मत        करना       विश्वास।

नेतागण          से      आश।।


एक      सभी      की     चाह।

अलग     भले     हों      राह।।

कुर्सी          पर        आसीन।

कभी  न     हों      वे     दीन।।


'शुभम्'     वोट     की     चोट।

करते             लूट - खसोट।।

कैसे        मिले         उजास।

अँधियारे       जब      पास।।


शुभमस्तु,


31.08.2026◆10.30आ०मा०

                    ◆●◆

डर [ चौपाई ]

 278/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


डर-डर कर  डर  में  क्या  जीना!

हरित हलाहल हँस-हँस   पीना।।

बिना  डरे   जो  जग   में   जीता।

विदा न   होता  जग   से   रीता।।


डर   से   तव   विवेक मर जाता।

विधिवत  काम  नहीं कर पाता।।

शंकाग्रस्त   अभय    खो    देता।

गलत  पंथ वह    अपना   लेता।।


डर है   निज   मन  की  दुर्बलता।

पछताए  अपने   कर    मलता।।

डर  से   काम    बिगड़ते    सारे।

दिन में    भी    दिख जाते  तारे।।


संतति  को  जो    मातु   डराती।

उसका  पथ  अवरुद्ध   कराती।।

सिंह   शावकों    से   जो   खेला।

वही भरत   था   नाम   अकेला।।


निर्भय  राम     गए  वन    माँही।

नहीं  उन्हें थी डर     की  छांही।।

हनुमत जी  का  मिला    सहारा।

निडर   हुआ  वानर  दल  सारा।।


नहीं  पाक    से   हमको   डरना।

सावधान  स्वच्छन्द     विचरना।।

डरने   से     दुर्बल    हम    होते।

मुख   ढँक   आस्तीन   से  रोते।।


'शुभम्'  निडर रह  जीना   सीखें।

विपदाएँ  फिर एक    न   दीखें।।

ऐसा        भारतवर्ष       बनाएँ।

मन से    हर डर    दूर    भगाएँ।।


शुभमस्तु,


31.08.2026◆5.30 आ०मा०

                   ◆●◆

छिद्र ढूँढ़ता ही रहा [दोहा गीतिका ]

 277/2026


               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब,

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार,

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम,

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार,

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत,

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर,

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

मानव वह किस काम का [सजल]

 276/2026


       

समांत          : आज

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       : 24.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब।

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार।

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम।

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार।

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत।

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर।

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

हम सभी जागें [ अतुकांतिका ]

 275/2026


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संस्कृति पर ही खतरा है

तो संस्कृत बचे कैसे,

दीमक लग गया है जड़ों में

देश खोखला हो रहा है

दिन -रात।


सौगन्ध उठा रखी है जिसने

देश को बरबाद करने की

सभी जानते हैं उसे

कॉकरोचों का सरदार वही।


देश का दुर्भाग्य यही

लोग आँखों पर

पट्टियां बाँधे चल रहे

उसके पीछे-पीछे

अपने हिए की भी मींचे।


कुकुरमुत्ते उग आए हैं

विदेशी यहाँ पेड़ों पर

उन्हें समूचा कुचलना ही है

ऐ भारतीयो ! जाग जाओ

सामर्थ्य वह जटाओ 

कि सपोलों को मिटा पाओ।


आग लगी है चारों ओर

विरोध के लिए

 विरोध करना है,

उनके बाप का 

जाता ही क्या है?

यहीं का खाना है

यहीं पर पलना है

और यही पर मरना है,

पर तिरंगे के नाम पर

बेड़ा यहीं का गर्क करना है।


हम सभी जागें

सपोलें कुचलें,

वे भागें ,

आस्तीन से निकालें 

नहीं अनुरागें,

चौंसठ घड़ी 

इन्हें त्यागें,

तभी देश बचेगा,

पहले देश 

और सब कुछ बाद में।


शुभमस्तु,


28.08.2026 ◆7.00 आ०मा०

             ◆●◆

माटी के चूल्हे की बात [ गीत ]

 274/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बीते हुए

दिनों की यादें

माटी के चूल्हे की बात।


भुला नहीं पाए

हम अब भी

गर्म -गर्म रोटी का स्वाद

कढ़ी

खरी रोटियाँ सिंकी वे

आती है रह-रहकर याद

लकड़ी सुलग रही

दे लपटें

लाल-लाल चिनगी बरसात।


चूल्हे के ढिंग

बैठ पूस में

हाथ-पाँव हम सेंक रहे

चुपड़ी रोटी

स्वाद ले रहे

घोल अपूपी   फेंट   रहे

बोरी बिछा

पालथी मारे

करते भोजन प्रातः- रात।


गोबर के 

उपले जब सुलगें

चट-चट लकड़ी चटके आँच

नहीं एक-दो

मन से खाते

रोटी सात -सात या पाँच

आलू भून 

बनाएँ भुर्ता

सिंकता जाए शीतल गात।


शुभमस्तु,


25.08.2026◆ 5.30 आ०मा०

                 ◆●◆

सोमवार, 24 अगस्त 2026

प्रश्न [ चौपाई ]

 273/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रश्नों     का    सागर    उमड़ाया।

समाधान    क्या  कोई   पाया??

रिक्त   एक    स्थान     नहीं    है।

प्रश्नों  की   नित बाढ़   बही   है।।


देख  प्रश्न     त्यौरी    चढ़   जाए।

सहज  समझ   कोई कब  पाए।।

टेढ़ी  खीर    प्रश्न    हल   करना।

जीते जी कुछ जन   का  मरना।।


जीवन  जटिल  प्रश्न हल  कर लें।

यथाशक्य निज  घट को भर लें।।

समाधान   जो    उनका   करता।

रिक्त घड़े   को   जल  से भरता।।


देख   प्रश्न    जो   खुश हो  जाए।

वही सहज   हल   उनका  पाए।।

प्रश्न     देश    के    लिए   बड़े हैं।

हल करने   को   सभी  खड़े  हैं।।


प्रश्नों  का     सटीक    हो   उत्तर।

नहीं  तीस का  लिखना   सत्तर।।

जस का  तस   हो  सीधा  उत्तर।

बारह का   मत   करो   बहत्तर।।


प्रतियोगिता     निरंतर    चलती।

वस्तुनिष्ठ   की  छलना  छलती।।

सहज नहीं विकल्प का   चुनना।

टूटी    खाट   पलों    में  बुनना।।


'शुभम्' प्रश्न    से    मत घबराना।

पाहन     से    लहरें    टकराना।।

आओ    अपने     भीतर    पाएँ।

समाधान    प्रश्नों     के     लाएँ।।


शुभमस्तु,


24.08.2026◆10.30 आ०मा०

                ◆●◆

जाति-भेद अलगाव से [ दोहा गीतिका ]

 272/2026


          



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक,

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग,

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद,

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार,

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट,

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल,

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

एक राष्ट्र ध्वज एक ही [ सजल ]

 271/2026


        

समांत           : आन

पदांत            :अपदांत

मात्राभार        :24

मात्रा पतन       : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक।

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग।

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद।

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार।

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट।

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल।

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

यही तपस्या आज हुआ [ गीत ]

 270/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भारी बोझ 

रखा कंधों पर

यही तपस्या आज हुआ।


पढ़ना-लिखना

ज्ञान बढ़ाना

नहीं कभी भी जाना

शिक्षित बन कर

पद पा लेना

कभी  नहीं  पहचाना

उस काँवरिया पर

फूल बरसना

जिनके सिर का ताज हुआ।


पिछड़े दबे-कुचे

यदि ये जन

यदि ऊपर चढ़ जाएँ

शासन करें

हमारे ऊपर

सब ऊपर बढ़ जाएँ

इनका पढ़ना-लिखना

हमको 

आज समस्या, खुदा कुआ।


भुना रहे हैं

नाम धर्म का

अगड़ों की ये बड़ी सियासत

काँवरिया को

प्रेरित करते

किंचित ये ही बने विरासत

बड़े बड़े 

नेता भी खुश हैं

पुत्र लगाओ दाँव जुआ।


पुलिस अधीक्षक

जिलाधिकारी

सब अगड़ों के नाम लिखे

दौड़ रहा हो

यदि पिछड़ा तो

मार टंगड़ी  ,  गिरे दिखे

जिसने 

कूटनीति ये समझी

छोड़ी काँवर लक्ष्य छुआ।


यादव लोधी

पाल बघेले

कुर्मी नाई  काँवरिया

शर्मा गुप्ता

ठाकुर जी क्या

बनते ऐसे बावरिया

वे शासक 

ये शासित सारे

देखो कैसा लाड़ चुआ!


शुभमस्तु,


23.08.2026◆7.00आ०मा०

                    ◆●◆

स्त्री थीं,मिस्त्री हो गईं! [ अतुकांतिका ]

 269/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऐसे-ऐसे कारीगर

देख लीजिए हर घर-घर

जो बिना ईंट पत्थर

दीवारें खड़ी करें

सुख चैन भी हरें

दिलों के बीच में।


ब्याह जब नहीं हुआ

वे भाई- भाई थे

रक्षक थे सिपाही थे,

हो गया जब ब्याह

तो मिट गई प्रेम की चाह

रात -दिन बस आह!

कारीगर जो आ गई

बँटवारे की

दीवार खड़ी करने,

सुख - शांति को हरने।


बिखर गया ठाठ-बाट

मिट गई टूटी खाट

कारीगर पलंगासीन है

बेलदार बेचारा पति

बड़ा ही दीन है,

ये व्यवस्था आधुनिक है

नवीन है।


सोहनी की सींक-सींक 

बिखर गई,

तो घर को बुहारे कौन,

सभी पड़े  विवश  मौन,

पत्तों से भर गया लॉन।


पूजनीया देवियाँ

दीवार खड़ी करने के लिए

स्त्री थीं,  मिस्त्री हो गईं,

घर की एकता अखंडता

खण्ड- खण्ड  रो रही।


संगठन बिखर गया

जिंदा जन मर गया

घर आँगन अखाड़ा है

गर्मी या जाड़ा है

हर ओर वैमनस्य ने

लाल ध्वज गाड़ा है।


21.08.2026◆8.15आ०मा०

                 ◆●◆

सब चूल्हे कच्ची माटी के [ अतुकांतिका ]

 267/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शादी से पहले

राखी बंधन त्योहार

भाई -बहन का प्यार,

बरसता हुआ लाड़,

खड़ा प्रेम का पहाड़।


शादी के बाद

सास-ससुरे से रार

देवर से जेठ पर प्रहार

आँगन के बीच खड़ी

ऊँची लंबी दीवार।


नव रात्रि की देवियाँ

विदा देवित्व हुआ,

ससुरालय में 

बँटवारे का

 खुदवा दिया कुँआ।


मानो या न मानो

कारण केवल एक,

अतीत की देवी हुई

बंटाढार की चुड़ैल।


अब नहीं रहा 

भाई भाई में प्रेम,

बो रहीं पत्नियाँ

कानों में वहम,

भाड़ में जाएँ 

सास-ससुर

देवर ननद जेठ,

वैमनस्य का बीज-वपन

नारी कर्म श्रेष्ठ।


गार्हस्थ के महाभारत का

मूल विवाहिता नारी,

प्रेम की दुश्मन 

पैनी छुरी आरी,

न मानो तो

घर-घर में देख लो,

सभी चूल्हे 

द्रव पेट्रोलियम गैस पर

दिखते हैं स्टील के,

पर कच्ची माटी के 

बने हैं।


शुभमस्तु,


20.08.2026◆6.15 प०मा०

                  ◆●◆

जलधर [ कुंडलिया ]

 268/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

सागर से लेकर चले,जलधर जल-आगार।

सुख देने जल-वृष्टि से,विपुल लुटाने प्यार।।

विपुल लुटाने प्यार,प्यास जीवों की हरते।

मानव जलचर जंतु,विटप की सेवा करते।।

'शुभम्' महत् उपकार,सृष्टि में करें उजागर।

अभिसिंचन के हेतु, नीर के उड़ते सागर।।


                         -2-

महिमा जलधर की सदा,सत्य कहें कवि लोग।

खुले    गगन  में   घूमते, करें    रात-दिन योग।।

करें रात-दिन  योग,  कहें   हम  उनको योगी।

पर उपकारी   मेघ,  नहीं   विचरण   के रोगी।।

'शुभम्'   देव  पर्जन्य,  नहीं   है   इनकी उपमा।

वे   जगती  के  प्राण,करे  जग जलधर महिमा।।


                         -3-

विरही   यक्ष  कुबेर   का,  हुआ प्रिया से दूर।

त्यागी   निज अलकापुरी, दुखी हृदय मजबूर।।

दुखी   हृदय मजबूर,एक दिन जलधर आए।

दिया   विरह-संदेश,  गगन   में   जो मँडराए।।

'शुभम्'  किया स्वीकार, मेघ ने प्रेम बतकही।

सुनी   यक्ष   की   बात,दंड   का भागी विरही।।


                         -4-

बरसे  जलधर   व्योम से,  धारासार अपार।

नदियाँ उमड़ी   वेग   से,करतीं जग उपकार।।

करतीं जग  उपकार,  कहीं हैं बाढ़ भयंकर।

काँवरधारी  लोग,चढ़ाते  जल शिव शंकर।।

'शुभम्'  बहे कुछ  गाँव,नगरवासी सब हरसे।

जलधर के  उपकार, विविध  रूपों  में बरसे।।


                           -5-

गरजे   जलधर   व्योम   में,तड़पी तड़ित अधीर।

रजनी   में     भर     दिव्यता,   बरसाते सन्नीर।।

बरसाते       सन्नीर,     ताल     में   दादुर बोले।

टर्र-टर्र     का   साज,  सजा  अपना  मुख  खोले।।

'शुभम्' मत्स्य साम्राज्य,किसी को क्योंकर बरजे।

श्रावण का   शुभ   मास, गगन  में जलधर गरजे।।


शुभमस्तु,


21.08.2026◆ 6.30आ०मा०

                     ◆●◆

राह रपटीली है [ नवगीत ]


266/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह की गैल से

दिल का सफर 

राह रपटीली हैं।


आँख से

आँख की 

मौन बतियाँ हुईं

गिर गए

नेत्र- अंचल

कहानियाँ नई

गुलाबी 

कपोलों की

रंगत सजीली है।


पहली  ही नजर

ढह गया है कहर

क्या करें क्या कहें

चैन आए नहीं

कोई भाए नहीं

कष्ट   कैसे   सहें

दर्द दिल में बसा

देख जग ये हँसा

अँखियाँ पनीली हैं।


अनजाना सफर

चल पड़ा इस कदर

ज्ञात मंजिल नहीं

हाथ में हाथ है

अजनबी साथ है

पहुँचेंगे कहीं

डूबती नाव को

एक तिनका मिला

नीम चीनी है।


शुभमस्तु,


20.08.2026◆ 12.15 प०मा०

                 ◆●◆


कीचड़ में सनते युगल पाँव [ गीत ]

 265/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पढ़ने जातीं

गणवेश पहन

कीचड़ में सनते युगल पाँव।


भारत का 

देखो नव विकास

सड़कें टूटी

झेलते नित्य

जो सर्वनाश

किस्मत फूटी

जा रहे समेटे विद्यालय

निज वस्त्र

लगाए भाग्य दाँव।


भारी भरकम

लादे बस्ते

है नील वेश

स्कर्ट बचाएँ

वे कैसे

है यही देश

नेता कहते

विकसित

भारत के सभी गाँव।


चलने भर को भी

नहीं गैल

जिनको  कोई

पग-पग पर

पिछड़ी मानवता

हर क्षण रोई

झूठे वादों की

लगी 

वोट की काँव-काँव।


शुभमस्तु,


18.08.2026 ◆6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

बख़्सवानी थीं नमाजें [ गीतिका ]

 264/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बख्शवानी  थीं   नमाजें ,पड़  गए  रोज़े गले।

रात-दिन बढ़तीं न खाजें,जदपि हैं जिंदा भले।।


आदमी को चैन कब है, कोसता   है   गैर को,

झेलता संकट हजारों , शाम   का  सूरज ढले।


उठ रहीं अँगुली   हजारों, तर्जनी सविरोध  की,

जदपि  दुःखों में तड़पता, आदमी खुद को छले।


आदमी   को देश की, चिंता   नहीं  पल एक  भी,

दूसरे  की  हर तरक्की, आँख   में  उसकी खले।


खुदगर्ज़गी  का देख आलम, जान का खतरा बढ़ा,

साथ  में   कोई   किसी  के, हाथ  क्यों थामे   चले।


जीभ   से  पानी  टपकता,माल औरों का हड़प,

पाँव से नीचे  भले  निज,आदमी  जन को दले।


जुगुनुओं   की   ले  मशालें,आदमी  मैं  खोजता,

पर 'शुभम्'  पाया  न कोई,हवन में कर भी जले।


शुभमस्तु,


17.08.2026◆5.00आ०मा०

                  ◆●◆

रात-दिन बढ़तीं न खाजें [ सजल ]

 263/2026



समांत           : अले

पदांत            :अपदांत

मात्राभार        :26.

मात्रा पतन      :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बख्शवानी  थीं   नमाजें ,पड़  गए  रोज़े गले।

रात-दिन बढ़तीं न खाजें,जदपि हैं जिंदा भले।।


आदमी को चैन कब है, कोसता   है   गैर को।

झेलता संकट हजारों , शाम   का  सूरज ढले।।


उठ रहीं अँगुली   हजारों, तर्जनी सविरोध  की।

जदपि  दुःखों में तड़पता, आदमी खुद को छले।।


आदमी   को देश की, चिंता   नहीं  पल एक  भी।

दूसरे  की  हर तरक्की, आँख   में  उसकी खले।।


खुदगर्ज़गी  का देख आलम, जान का खतरा बढ़ा।

साथ  में   कोई   किसी  के, हाथ  क्यों थामे   चले।।


जीभ   से  पानी  टपकता,माल औरों का हड़प।

पाँव से नीचे  भले  निज,आदमी  जन को दले।।


जुगुनुओं   की   ले  मशालें,आदमी  मैं  खोजता।

पर 'शुभम्'  पाया  न कोई,हवन में कर भी जले।।


शुभमस्तु,


17.08.2026◆5.00आ०मा०

                  ◆●◆

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

रिफाइंडी पीढ़ी [मुक्तक]

 262/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखने  में  पारदर्शी  है, कहलाता रिफाइंड है,

सूँघने को नहीं देशी घी, यहीं   सैट माइंड   है,

जलेबियाँ       कचौड़ी       समोसा    पूरियाँ,

घेवर  का  ढेर लगा, स्वाद  बड़ा  काइंड है।1।


शौक   से     ज़हर   का,  सेवन करवाते   हैं,

खुद भी   तो  करते हैं,  मरते  हैं मरवाते हैं,

मधुमेह   हृदय  रोग,  मिलते   हैं  तोहफ़े  में,

जी-जान के दुश्मन, कैसे- कैसे इतराते हैं।2।


मिठाइयाँ   पकवान, सब रिफाइंड के जाए,

त्यौहार  ब्याह  शादी,सब  तल-तल पकाए,

खुली हुई आँख,   विष   आहार   करना है,

जन्मदिन   तेरहवीं, रिफाइंड   से   मनाए।3।


कोई   रोक-टोक नहीं, विष- पान कीजिए,

नील हृदय नील वृक्क,नाम निज लीजिए,

सरकार  भी क्यों  भला,  रोकेंगीं  आपको,

सरसों का तेल छोड़,  रिफाइंड   पीजिए।4।


रिफाइंडी आहार  की,  रिफाइंड नई पीढ़ी है,

जलती   है  थोड़ी   देर,  बुझी   हुई  बीड़ी  है,

भूल गए  गोघृत   गोरस,  काल  के हाथों में,        

भूत भविष्य   वर्तमान, पीढ़ी   गई   मीढ़ी है।5।


शुभमस्तु,


14.08.2026◆10.30आ०मा०

                    ◆●◆

तिरंगे का मजा लो [मुक्तक]

 261/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अब      तक   रहा   जो   अत्यंत  खास,

कर दिया   गया  उसका    बड़ा उपहास

सड़क -सड़क गलियों का आम  हो गया,

अवमानना देखकर मन हो गया उदास।।1।।


ऊँचे   आसमान      में  लहराता    है तिरंगा,

कर दिया गया  है उसे  भी आदमजात नंगा,

टपरी   पर        छप्पर      पर   ट्रैक्टर    पर,

दंगाइयों के   हाथ में    हो   रहा   नित्य दंगा।।2।।


आन   बान   शान   का    प्रतीक  था तिरंगा,

बहती    थी   देश   में   नित  प्रेम  की गंगा,

आज  वह   गङ्गा    भी   मैली    हो  गई है,

केरलम्   यूपी   हो  या  जम्मू -कश्मीर बंगा।।3।।


कहाँ   गई    राष्ट्रभक्ति     कोरा   मत   तंत्र है,

तिरंगा हुआ   आम   वस्त्र   फैशन   का मंत्र है,

नेताओं     के    वोट    की  पक्की सड़क एक,

स्वेच्छाचारी  भारत    का   डंडासीन यंत्र है।।4।।


"ब्लैकमेल   करना   हो   तो  तिरंगा उठा लो,

सौगन्ध   दिला   झंडे की  अरमान  सजा लो,

नेताओं   को   ट्रम्प    कार्ड   भुनाना   ही है,

जब   तक   जैसे  लो   तिरंगे   का मजा लो।।5।।


शुभमस्तु,


14.08.2026◆ 9.45 आ०मा०

               ◆●◆

झंडा ऊँचा रहे हमारा [ अतुकांतिका ]

 260/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आया है सुअवसर

देशभक्ति के 

प्रदर्शन का,

छोड़ना नहीं है

बस तिरंगा 

लहरा दो।


छत हो 

कि छप्पर हो

अट्टालिका

या टप्पर हो

गाड़ी हो

बंगला हो

महानगर

या नगला हो,

प्रदर्शन ही तो है।


कितनी है राष्ट्रभक्ति !

स्वदेश के प्रति अनुरक्ति !!

जिसका खाते अन्न जल

उसके कृतज्ञ तो हो लेना,

अन्यथा सब ढोंग ही होगा।


पहले तिरंगे के 

नियम और विधान जानो

गिरे नहीं धरती पर

मत फटा हुआ तानो,

मत बनो लकीर के फ़क़ीर

आदमी हो  नेता हो

पाजामा हो

या वजीर,

सभी तिरंगे के नीचे हैं।


किसे पड़ी है आज देश की

बस दिखावा जरूरी है,

अपना उल्लू होता रहे सीधा

करते रहो जी हुजूरी है,

भीतर जाके चाहे 

चढ़ावा चुराओ

प्लॉट खरीदो

भवन बनवाओ

बीबियों और प्रेयसियों को

खुश करवाओ

बस झंडा ऊँचा रहे हमारा,

वाह रे रामभक्तो !

वाह रे देशभक्तो !!

जब किया  है  कर्मकांड

तो भुगतो ही भुगतो।


शुभमस्तु,


14.08.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆●◆

देखभाल अपने अंडों की [ गीत ]

 259/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखभाल अपने 

अंडों की 

करती चिड़िया एक।


पल्लव-तृण से

स्वयं बनाया 

सुघर डाल पर नीड़

रहती है

निज पिया चिड़ा सँग

जहाँ न कोई भीड़

कुशल चितेरी

चिड़िया भोली

रखती  विमल विवेक।


नहीं हानि हो

सर्प आदि से

रखती इसका ध्यान

भोर हुआ

नित चीं-चीं करती

सूर्य उदय का गान

हानि नहीं

पहुँचाती किंचित

भाव भरे उर नेक।


चारों ओर

घनी हरियाली

शांत सौम्य परिवेश

वर्षा का जल

नहीं टपकता

भय न शेष लवलेश

अपने में

मतवाली गाए

करती नित अभिषेक।


शुभमस्तु,


11.08.2026◆10.30आ०मा०

                  ◆●◆

देख तरक्की देश की [ दोहा गीतिका]

 258/2026

         

     



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देख  तरक्की  देश   की,फन   फैलाए व्याल।

अवसर  देखें   छद्म से,  बने हुए हैं     काल।।


कुटिल दृष्टि है गीध की,कॉकरोच  बहु   कीट,

आग  लगाएँ    देश  में,  दूषित   करते हाल।


छिड़ी हुई   हैं  विश्व में, आधिपत्य     की जंग,

बुझी पड़ीं आचार की,शुभता सृजित मशाल।


अभिभावक    वे  मूढ़     हैं,  संतति आज्ञाहीन,

आग   लगाते  देश में,हँस-हँस  हाथ   कराल।


भ्रमित  हुई     पीढ़ी   नई,  व्यभिचारी  मतिहीन,

नहीं   नियंत्रण  लेश   भी,चलते चाल   कुचाल।


परिणीता   पति   से नहीं,करती  तृण भर  प्रेम,

जारों   में  ही  मन  रमा, चुमा  रही निज गाल।


'शुभम्'  विषम दारुण दशा,विषज हुआ परिवेश,

पति   को  नहीं  परोसती, पत्नी   भोजन थाल।


शुभमस्तु,


10.08.2026◆ 7.30 आ०मा०

                    ◆◆◆

अवसर देखें छद्म से [ सजल ]

 257/2026


समांत          : आल

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देख  तरक्की  देश   की,फन   फैलाए व्याल।

अवसर  देखें   छद्म से,  बने हुए हैं     काल।।


कुटिल दृष्टि है गीध की,कॉकरोच  बहु   कीट।

आग  लगाएँ    देश  में,  दूषित   करते हाल।।


छिड़ी हुई   हैं  विश्व में, आधिपत्य     की जंग।

बुझी पड़ीं आचार की,शुभता सृजित मशाल।।


अभिभावक    वे  मूढ़     हैं,  संतति आज्ञाहीन।

आग   लगाते  देश में,हँस-हँस  हाथ   कराल।।


भ्रमित  हुई     पीढ़ी   नई,  व्यभिचारी  मतिहीन।

नहीं   नियंत्रण  लेश   भी,चलते चाल   कुचाल।।


परिणीता   पति   से नहीं,करती  तृण भर  प्रेम।

जारों   में  ही  मन  रमा, चुमा  रही निज गाल।।


'शुभम्'  विषम दारुण दशा,विषज हुआ परिवेश।

पति   को  नहीं  परोसती, पत्नी   भोजन थाल।।


शुभमस्तु,


10.08.2026◆ 7.30 आ०मा०

                    ◆◆◆

बाज [अतुकांतिका]

 256/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूसरों के हाथ पर सवार

करने लगे हैं बाज क्यों शिकार

स्वजनों का 

अपनी ही जड़ों को काट

कर रहे हैं ठाठ

अपना ही सर्वनाश

करने पर तुले हुए कनाश।


मर गया आँख का पानी

बरबाद करने को 

मिली राजधानी

संसद और संसद पथ

जंतर मंतर  पर चढ़े दुर्मति।


पढ़े -लिखों के लिए

अपढ़ों का हिंसक हंगामा

अमेरिका का दिया हुआ

 फटा पाजामा

नकलियों द्वारा 

असली का बैनामा?

वाह रे मतिमंदो !

पढ़े-लिखे गुंडो ! मुस्टंडो।


इनके माँ-बाप भी क्या हैं !

बची नहीं आँखों में हया है !

अपनी ही औलाद को

झोंक रहे भाड़ में

अमरीका की आड़ में,

भविष्य करवाते बरबाद

तिलचट्टे कभी हुए हैं आबाद?


दुर्बुद्धि एक मिसाल है

आहूत करते अपना ही

काल हैं,

कमाल है !

बेमिसाल है,

आज देश का ये हाल है!

सद्बुद्धि दें प्रभु जी इन्हें।


शुभमस्तु !


07.08.2026◆6.58 आ०मा०

                     ◆●◆

पावस पुण्य प्रसादिका [ दोहा ]

 255/2026


    

[पावस,बरसात,फुहार,रिमझिम,पानी]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


              सब में एक

पावस पुण्य प्रसादिका,पावन प्रबल प्रताप।

हरियाली  आच्छादिका,  हरे धरा के ताप।।

पावस में प्रीतम बिना, विरहिन धरे न धीर।

सेज डसे नागिन बनी,तान खड़ी शमशीर।।


जेठ और आषाढ़ का,सहा न जाए ताप।

हो जाए बरसात जो,करें इंद्र का जाप।।

नाले-नाली नद-नदी, भरे हुई बरसात।

तपन रही किंचित नहीं,मिली विरह को मात।।


रिमझिम पड़ीं फुहार तो,उफने पोखर-ताल।

बूँद-बूँद सागर भरे,नदियाँ हैं वाचाल।।

नभ से  गिरी  फुहार तो, मिला हृदय को चैन।

पशु पंछी तरु घास को,सुखद हुए दिन-रैन।।


रिमझिम- रिमझिम सावनी, घटा घिरीं चहुँ ओर।

पीहो-पीहो कर रहे, नर्तित वन में मोर।।

सावन-भादों में करें,टर्र -टर्र बहु भेक।

बुला रहे निज प्रेयसी,रिमझिम मेघ अनेक।।


पानी पावस में बहे, नभ से  सर-सर  धार।

सरितायें  मदमत्त-सी, करें सिंधु- अभिसार।।

पानी रहा न आँख में,फिर क्या है कुछ शेष।

जी   लेते    वे जिंदगी, करें अनुगमन मेष।।


             एक में सब

पावस में बरसात की, बरसे  विरल फुहार।

रिमझिम पानी मोहता,मेढक करे गुहार।।


शुभमस्तु,


05.08.2026◆9.00 आ०मा०

                   ◆●◆

उफन रहीं सावन में नदियाँ [ गीतिका ]

 254/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उफन  रहीं   सावन   में   नदियाँ।

नदी बनी   गाँवों  की    गलियाँ।।


हाथ-हाथ    चलभाष   अनोखा,

लिखते नहीं पिया अब चिठियाँ।


बरस  रहा    अम्बर    से   पानी,

बान सुनिर्मित तनतीं    खटियाँ।


जब  से    हुए   पिया   परदेशी,

विदा हुईं   पत्नी  की   खुशियाँ।


प्रीतम  बिना सेज नित   डसती,

नहीं प्यार की चलतीं    बतियाँ।


सहनशीलता    धैर्य    नहीं    है,

बात-बात  में  लड़तीं   सखियाँ।


'शुभम्'    मियाँ     मिट्ठू   बहुतेरे,

गिरा  रहे   औरों   की   छवियाँ।


शुभमस्तु,


03.08.2026 ◆4.45 आ०मा०

                        ◆●◆

नदी बनी गाँवों की गलियाँ [ सजल ]

 253/2026


 

समांत           :इयाँ

पदांत            :अपदांत

मात्रभार         :16.

मात्रा पतन      :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उफन  रहीं   सावन   में   नदियाँ।

नदी बनी   गाँवों  की    गलियाँ।।


हाथ-हाथ    चलभाष   अनोखा।

लिखते नहीं पिया अब चिठियाँ।।


बरस  रहा    अम्बर    से   पानी।

बान सुनिर्मित तनतीं    खटियाँ।।


जब  से    हुए   पिया   परदेशी।

विदा हुईं   पत्नी  की   खुशियाँ।।


प्रीतम  बिना सेज नित   डसती।

नहीं प्यार की चलतीं    बतियाँ।।


सहनशीलता    धैर्य    नहीं    है।

बात-बात  में  लड़तीं   सखियाँ।।


'शुभम्'    मियाँ     मिट्ठू   बहुतेरे।

गिरा  रहे   औरों   की   छवियाँ।।


शुभमस्तु,


03.08.2026 ◆4.45 आ०मा०

                        ◆●◆

रविवार, 2 अगस्त 2026

यदि नेता होते नहीं [ दोहा ]

 250/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मान और अपमान ,से सिद्ध सियासत पूर्ण।

स्वीकृत जूता जेल भी,अहंकार सब चूर्ण।।

सहनशीलता   धन्य   है,नेताओं  की खूब।

उगते वे  उस  खेत  में,जहाँ न उगती दूब।।


यदि नेता  होते नहीं, करता   कौन विकास।

देश न   रहता  देश  में,  नहीं  देश  के पास।।

बंजर   ऊसर   खेत  में,उगे   न   कोई घास।

नेता   फलते -फूलते,  महक    सुँघाते खास।।


जिस   घर में   नेता उगे,  खुले  पिता के भाग।

सोना-चाँदी      बरसता,     जगे देश-अनुराग।।

मात-पिता   वे   धन्य   हैं,  जिनके  नेता पुत्र।

रहें   पड़ौसी   काँपते,  कहें    रहें   अब कुत्र।।


ज्यों   गेहूँ   के खेत   में,  उगते   खरपतवार।

त्यों     उगते   नेता  यहाँ, नगर गाँव के भार।।

नियम   नहीं इनके लिए, और न शेष विधान।

पिछड़ा   वही  समाज है, नेताओं की खान।।


राहजनी   चोरी   सदा,  जिनके व्यसन अनेक।

व्यभिचारी  नेता जहाँ, कार्य सफल क्यों नेक।।

दुष्कर्मों    के  बीज   से,  जिनका जन्म महान।

वे   समाज   के बीच  में, मूँछ रहे निज तान।।


गाली   और   गलौज से, चलता जिनका काम।

दुर्भागी    वह    देश   है,  ठगे   जा    रहे राम।।


शुभमस्तु,


02.08.2026◆ 10.45 आ०मा०

                    ◆●◆

नाल मेढकी ने ठुकवाई [ चौपाई ]

 251/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नाल     मेढकी     ने    ठुकवाई।

बड़े  जोर  से    यह    चिल्लाई।।

'मारेगा    क्या     मुझे    कसाई।

अरे     बचाओ     चाची   ताई।।'


तिलचट्टे     मच्छर     भी   आए।

जंतर मंतर     पर    जा    छाए।।

नाच -कूदकर       शोर    मचाते।

गाली- दान    यहाँ    कर  जाते।।


अमरीका  ने       इन्हें     पठाया।

धन के   लालच   से  उकसाया।।

भेज  रहे    हम     भोजन-पानी।

करें    तुम्हारी    हम  निगरानी।।


भारत    में      बरबादी    लाओ।

मिला  धूल में    चैन  न   पाओ।।

सत्तासन     को    ऐसे     फेंको।

बुरे बोल कह     उनसे      रेंको।।


बको   गालियाँ    नेताओं    को।

नहीं  बख्सना तुम    मांओं को।।

त्राहिमाम     जनता    चिल्लाए।

नहीं  चैन    से     जीने     पाए।।


बनकर जौंक  मसक   तिलचट्टे।

उठा  हाथ   बम     अपने  कट्टे।।

भय का भाव  भरो    हे     भाई।

मारो  पुलिस  करो    कुटिलाई।।


भय    से    भूत  नहीं क्यों भागें।

तोड़ मनुज की दो     दो    टाँगें।।

हाय!- हाय !!  जब  होगी  भारी।

सहज    समर्पण    की  तैयारी।।


करना    ही   निज   उल्लू सीधा।

ऊजड़ हो    यद्यपि    हर   बीघा।।

खंडन  ही    है    लक्ष्य     हमारा।

दिखे  देश   को    दिन   में तारा।।


शुभमस्तु,


02.08.2026◆11.30आ०मा०

                  ◆●◆

बचा कहाँ अब जीवन-रस है [ गीतिका ]

 252/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



बचा  कहाँ  अब   जीवन-रस है !

शिथिल आदमी की नस -नस है।।


संविधान   अब   नहीं  सदन   में,

रखा   ताक   पर   वह बेबस  है।


ठग  बैठे    हैं   बनकर   शासक,

जिनका भेजा  बिलकुल ठस है।


कहाँ    व्यवस्था   बची    देश  में,

शिक्षा    सारी     तहस-नहस है।


जिनको    कहें  ज्ञान   की  बातें,

करे उलट   वह    बुरी   बहस है।


अत्याचार       भ्रष्टता      बढ़ती,

कॉकरोच   क्या  टस से मस है?


'शुभम्'  मौन  धर   रहा न  जाए,

चले यहाँ   पर   चल   सर्कस  है।


शुभमस्तु,


02.08.2026 12.00 मध्याह्न

                  ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...