शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

येन केन प्रकारेण [ अतुकांतिका ]

 249/2026


              

©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


येन केन प्रकारेण

अपना उल्लू सीधा हो,

दुनिया जाए भाड़ में

अपना काम बने

हमेशा रहो तने।


न कोई नीति

न बचा धर्म,

खोटे होने लगे कर्म,

पाषाण का बना मर्म,

न रहा आँखों में पानी

यही है कहानी।


जितना भी सम्भव हो

हल्ला मचाओ,

किसी न सुनो

बच्चों को बर्गलाओ,

पथ भ्रमित कराओ,

स्वतंत्रता की निशानी।


पहले हम बाद में कुछ और

हमारे सिवाय भला

कौन होगा सिरमौर

ऐसा ही है आज का दौर

न माँ-बाप न पति

प्रेमी से ही

पत्नियों की 'सद्गति',

संस्कार शून्यता

पतन की पराकाष्ठा

मानव की मूढ़ता।


संसद में 

सांसदों की असंसदीय भाषा

क्या इनके लिए

किसी दंड का प्राविधान नहीं?

चल रहा है देश और समाज

येन केन प्रकारेण।


सिर चढ़कर

बोलता है विनाश

चिंता नहीं 

यद्यपि होता रहे उपहास,

आम आदमी और

पढ़े-लिखे गँवारों में

क्या कोई भेद शेष है ?

जंतर मंतर पर

मेष ही मेष है।


शुभमस्तु,


30.07.2026◆ 9.45 प०मा०

                    ◆●◆

क्या खूब किसानी!चली गई [ नवगीत ]

 248/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दो -दो बैलों की

 जोड़ी की

क्या खूब किसानी!  चली गई।



वेला थी ब्रह्म मुहूर्त

कृषक भारत का

तज  अपनी शैया 

लेकर बैलों की

जोड़ी को 

धर जुआ कन्ध खेता नैया

अब दौड़ रहे हैं

खेतों में ये ट्रैक्टर

वह अमर निशानी ,छली गई।


तारों से चमकी 

रातों में

खेतों में 'तिक-तिक'  सुनते थे

तब कृषक वीर

हल सीत खुभा

बिटिया के सपने बुनते थे

अब थरथर-टरटर

फोड़ती कान

गोवत्स कहानी ,दली गई।


अब बैल कहाँ

कल-युग आया

चरसा न रहट गाड़ी न रहीं

रथ रब्बे विदा हुए सारे

बछड़े न रहे 

बछड़ी न कहीं

धरती माता की

वह पीढ़ी

व्यवसाय बनिज की गली गई।


शुभमस्तु,


28.07.2026◆ 1.30 आ०मा० (रात्रि)

                     ◆●◆

जंतर मंतर पर है खटखट [ गीतिका ]

 247/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जंतर   मंतर   पर   है    खटपट।

तिलचट्टों   की   भारी  खटखट।।


कहते  तुम्हें    न  आता   शासन,

दौड़  रहे  सड़कों  पर  छट-छट।


लक्ष्य     भूल    बैठे   वे    सारा,

नर्तित    मद    में   फैलाए लट।


अभिनय  मजा मौज  मस्ती का,

भरे    जा    रहे    पापों का घट।


छात्र      न्यून       बहुतेरे    गुंडे,

बस   हल्ले   की   लगी हुई रट।


संसद    रोड   हो   गया   दूषित,

बने  हुए   कोरे    अभिनय-नट।


बढ़ता है जब    दूषण   घर    में,

कॉकरोच  तब   जाते   हैं   डट।


बिना  बहाए     स्वेद   देह    का,

जाते  हैं   तब  मुफ्तखोर    अट।


'शुभम्' कहे क्या   हाल देश का,

खटमल मसक फिरें यमुना तट।


शुभमस्तु,


27.07.2026◆6.45 आ०मा०

                    ◆●◆

तिलचट्टों की भारी खटपट [ सजल ]

 246/2026



समांत          : अट

पदांत           :अपदांत

मात्रा भार     :16.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जंतर   मंतर   पर   है    खटपट।

तिलचट्टों   की   भारी  खटखट।।


कहते  तुम्हें    न  आता   शासन।

दौड़  रहे  सड़कों  पर  छट-छट।।


लक्ष्य     भूल    बैठे   वे    सारा।

नर्तित    मद    में   फैलाए लट।।


अभिनय  मजा मौज  मस्ती का।

भरे    जा    रहे    पापों का घट।।


छात्र      न्यून       बहुतेरे    गुंडे।

बस   हल्ले   की   लगी हुई रट।।


संसद    रोड   हो   गया   दूषित।

बने  हुए   कोरे    अभिनय-नट।।


बढ़ता है जब    दूषण   घर    में।

कॉकरोच  तब   जाते   हैं   डट।।


बिना  बहाए     स्वेद   देह    का।

जाते  हैं   तब  मुफ्तखोर    अट।।


'शुभम्' कहे क्या   हाल देश का।

खटमल मसक फिरें यमुना तट।।


शुभमस्तु,


27.07.2026◆6.45 आ०मा०

                    ◆●◆

पाँच क्षणिकाएँ

 245/2026


      

            

       ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

               -1-

प्राचीन काल में

हम मंदिर बनाते थे

और विदेशी आक्रांता

लूट लेते थे,

आज मंदिर भी

हम बनाते हैं

और लूट भी

हम ही लेते हैं।


        -2-

भगवान को

हम कब

 मान्यता देते हैं?

या तो भगवान में आस्था हो

अथवा डर,

आज हमारी 

भगवान के प्रति

आस्था है न डर,

इसीलिए तो

लूटे जा रहे हैं

हमारे ही द्वारा

भगवान के मंदिर।


            -3-

नियम कानून 

ताक पर हैं,

लज्जा हया

नाक पर हैं,

जब सारे वस्त्र ही

 उतार दिए

नंगों का कोई 

कर भी क्या लेगा ?


                 -4-

जो लक्ष्य विधान से

संविधान से न मिले

नंगई से 

अवश्य मिल जाता है,

इसलिए नंगों का

बहुमत बढ़ रहा है,

और संविधान

ताक पर टंग रहा है।


             -5-

नंगा नाचे देखे कौन?

नज़र पड़े तो

सब हैं मौन,

क्या कर लोगे

हमने अपनी उतार दी

तोड़ दी सारी हदें,

तुम भी चाहो तो

कर लो पूरी हसरतें!


शुभमस्तु,


26.07.2026◆ 5.45 आ०मा०

                   ◆●◆

तेरा क्या वश [ गीत ]

 244/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तेरा क्या वश

देह-तंत्र पर

स्वतः अहर्निश चलता।


धड़-धड़ धड़-धड़

हृदय धड़कता

प्राणवंत कहलाए

शक्त-केंद्र

मस्तिष्क शीर्ष पर

तुझको नित्य चलाए

यकृत वृक्क

श्वास फुफ्फुस भी

कभी न तुझको छलता।


हस्त पाद

दो नयन कान की

अपनी -अपनी माया

जीभ नासिका

शीश केश की

अपनी-अपनी छाया

बतला क्या

ये तेरे वश में

इतरा मनुज मचलता।


पाचन ओज -

ग्रहण में तेरी

नहीं भूमिका कण भी

करें विसर्जन

अंग देह से

रहे अवांछित तृण भी

जन्म मृत्यु

क्या तेरे वश में

सूरज तेरा ढलता।


पाकर देह

ऐंठता क्यों तू

तन पर क्रीम सजाए

श्यामल-श्वेत 

रंग कब तेरे

इत्र सुगंध लगाए

एक दिवस

हो हस्र सभी का

एक समान सँभलता।


इच्छा से

आया न जगत में

निज इच्छा कब जाए

मात-पिता 

जो दाता तन के

उनको ही लतियाये

मौन साध

जाता जगती से

हाथ नहीं तू मलता।


शुभमस्तु,


26.07.2026◆4.30 आ०मा०

                     ◆●◆

गुरुवार, 23 जुलाई 2026

छुछून्दर के सिर में [ नवगीत ]

 243/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छुछूँदर के

सिर में

चमेली का तेल।


बरसाती मेढकों की

टर्र-टर्र 

पोखर को जगाया है

घूरे के  ढेर  पर

कुकुरमुत्ता

उग आया है

कॉकरोच भी

लगा रहे हैं

संसद की सेल।


मुद्दा है एक यही

शांति न रहे

कोई कुछ कहे

हम तो

सदा से भेड़ थे

भेड़ ही रहे

मूँछों को

ऐंठ  कर

फेंकना है ढेल।


साजिश ये

देश को बर्बाद 

करने की है

शांत  शुद्ध 

पानी में

धरना धरने की है

चलती हुई 

गाड़ी को 

करना ही है डिरेल।


शुभमस्तु,


22.07.2026◆3.15 प०मा०

               ◆●◆

पनपने लगे कॉकरोच! [ अतुकांतिका]

 242/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देखकर घोड़े को 

ठुकवाते हुए नाल

मेढकी ने भी सोचा

मैं भी ठुकवा लूँ,

अपनी टाँगों को

और भी मजबूत बना लूँ।


बैठ गई वह भी 

ठुकवाने नाल,

पहली ही चोट में

बिगड़ गया हाल,

क्या करती बेचारी

टाँगें फैलाईं और

चारों खाने चित्त! 


यही हाल है

 कॉकरोचों का,

चौबे जी छब्बे जी

 बनने गए थे

दुब्बे जी बनकर चले आए,

क्या करते बेचारे

बहुत -बहुत पछताए!


बढ़ गया जब

बहुत सारा प्रदूषण,

कॉकरोच पनपने लगे,

संसद की कुर्सी के हित 

लार टपकाने लगे,

गंदगी से उगे कीटों का

यही हस्र होता है,

हुआ भी वही।


होती है जब  बरसात

उगते ही हैं कुकुरमुत्ते,

देखते नहीं रस्ते कुरस्ते

फिर क्या भेड़चाल में

निकल पड़ते हैं,

जंतर मंतर पर

ढूंकने लगते हैं,

सियासत का नया- नया

स्वाद चखने के वास्ते।


देश की समस्याएँ

कीड़े-मकोड़ों का खेल नहीं,

पीं- पीं करती 

बच्चों की रेल नहीं

ठीक है लोकतंत्र 

 बहुमत का 

परिणाम है,

लेकिन इतना भी

सस्ता नहीं की

गीदड़ गङ्गा पार उतर जाए!


शुभमस्तु,


22.07.2026◆2.30प०मा०

                  ◆●◆

कॉकरोच [ दोहा ]

 241/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूषण   का  उत्पाद हैं,  कॉकरोच के झुंड।

रेंगें   शुद्धाहार  में, चमकाते    निज  मुंड।।

कॉकरोच बढ़तेतभी,जब हो रुग्ण समाज।

रहें   उपेक्षित   वे सदा,बनें कोढ़ में खाज।।


नहीं जरूरत देश को , कॉकरोच की आज।

बढ़ते स्वच्छ समाज में, करें अहं पर नाज।।

कॉकरोच   सुनते   नहीं,झूठ   बनाते बात।

कहते बस   उनकी सुनो,करें  अन्यथा घात।।


कब-कब शासन में रहे,कॉकरोच मतिहीन।

दूषण   पर जो पल रहे,सदा -सदा से दीन।।

जंतर -मंतर   रोड    पर,संसद   पर है ढेर।

कॉकरोच   बढ़वार  का,कहते  हैं हम शेर।।


किटकिन्ना    आता   नहीं,संविधान का लेश।

कॉकरोच   चिल्ला   रहे, बढ़ा   शीश के केश।।

बहकावे   में   आ   गए,  कॉकरोच   के झुंड।

अमराई    में     रेंगते,   पालित काकभुशुंड।।


कॉकरोच   शासन    करें, तब   हो बंटाढार।

नियम नीति कानून का, नहीं  जहाँ आधार।।

नाले-नाली   में बना, जिनका   मूल निवास।

कॉकरोच   वे   चाहते, संसद   में लें श्वास।।


कॉकरोच   जन  पार्टी, वर्षा का उत्पाद।

कूकरमुत्ते   उग  रहे, चाहत लेना स्वाद।।


शुभमस्तु,


22.07.2026◆2.00 प०मा०

                    ◆●◆

छरर -छरर छर बरसें [ गीत ]

 240/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छरर-छरर छर

छर-छर बरसें

आसमान से बूँदें।


फैला अपने

हाथ हथेली

भर-भर अँजुरी पीते

जेठ मास के

प्यासे मानव 

थे मुरझाए जीते

गिरतीं बूँदें

जब पलकों पर

नयन सभी हम मूँदें।


आँगन

गली- गली में बालक

क्रीड़ा में हैं लीन

छपर-छपर छप

छप -छप जल की

तैर रहीं  ज्यों मीन

नव किशोर

बालाएँ जल में

नाच-नाच कर कूदें।


तरु पल्लव

हरियाये कोमल

टपर-टपर टप होती

गिरें धरा पर

हरी घास पर

बिखर रहे ज्यों मोती

बिजली- सी

दौड़ती देह में

बूँद मेह की छू दें।


शुभमस्तु,


21.07.2026◆10.30 आ०मा०

                  ◆●◆

मधुकर के मन में बसी [ गीतिका ]

 239/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधुकर के मन में बसी,पाटल मधुर सुवास।

झूम-झूम मँडरा रहे,खिली कली के पास।।


तितली  भँवरे से कहे, चलो चलें उस ओर,

कोयल करती काग से,बगिया में परिहास।


कोयल - कागा   से  नहीं,  लेना-देना   एक,

और नहीं   सम्बंध  भी,उनसे अपना खास।


सब अपनी रुचि से करें,अपने काम अनेक,

टाँग फटे में क्यों अड़ा,हमको करनी आस।


सबके सूरज-चाँद का,अलग-अलग है तेज,

जुगनू निकले रात में,सीमित सफल उजास।


नेताजी  नित   चाभते,  काजू   या अखरोट,

गाय  भैंस  बकरी सभी, चबा  रहे बस घास।


'शुभम्' तुम्हारी   राह हैं,अलग-अलग अभिप्रेत,

अलग -अलग जीते सभी,अलग मिले हैं श्वास।।


शुभमस्तु,


20.07.2026◆6.30 आ०मा०

                     ◆●◆

झूम -झूम मँडरा रहे [ सजल ]

 238/2026


    

समांत           : आस

पदांत            : अपदांत

मात्रभार         :24.

मात्रा पतन      :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधुकर के मन में बसी,पाटल मधुर सुवास।

झूम-झूम मँडरा रहे,खिली कली के पास।।


तितली  भँवरे से कहे, चलो चलें उस ओर।

कोयल करती काग से,बगिया में परिहास।।


कोयल - कागा   से  नहीं,  लेना-देना   एक।

और नहीं   सम्बंध  भी,उनसे अपना खास।।


सब अपनी रुचि से करें,अपने काम अनेक।

टाँग फटे में क्यों अड़ा,हमको करनी आस।।


सबके सूरज-चाँद का,अलग-अलग है तेज।

जुगनू निकले रात में,सीमित सफल उजास।।


नेताजी  नित   चाभते,  काजू   या अखरोट।

गाय  भैंस  बकरी सभी, चबा  रहे बस घास।।


'शुभम्' तुम्हारी   राह हैं,अलग-अलग अभिप्रेत।

अलग -अलग जीते सभी,अलग मिले हैं श्वास।। 


शुभमस्तु,


20.07.2026◆6.30 आ०मा०

                     ◆●◆

रविवार, 19 जुलाई 2026

न ही अयोध्या मैं गया [ दोहा ]

 237/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न   ही  अयोध्या    मैं गया,  और न देखे  राम।

चोर   चढ़ावा ले  उड़े,  मैं  गिर  पड़ा धड़ाम।।

राम न माना   राम  को,  समझा  बस पाषाण।

चोर डाकुओं का करें,राम कवन विधि त्राण।।


चोर   चढ़ावा     चोरते,मौन  खड़े   सब श्वान।

लगता स्वीकृति   मौन   थी,चोरों   से पहचान।।

श्वान-चोर   की   मित्रता, देख अयोध्या धाम।

भौंचक    हैं  श्रीराम  जी,  खबर   हुई  है आम।।


भरता जब घट पाप का,कब तक रखो सँभाल।

देख   दान-धन  चोर  की,टपक उठी मुख  राल।।

पहले   ही   मुख   श्याम था,काला है अब  देख।

ग्रीवा -दर्पण    झाँक  ले,अमिट   काल का लेख।।


श्वानों    के   ही   सामने,  चुरा   रहे  धन चोर।

मौन धरे   सब  श्वान वे,हिली   न  रसना कोर।।

चोरों   के   सरदार   जो,  छुई न उनको आँच।

नोट-गणक  जलते सभी,इने-गिने   दस पाँच।।


चोरों   के   सरदार  का, बहुत बड़ा   आतंक।

शासन    की   चूलें   हिलीं,  मार  रहे वे डंक।।

छाँव   सियासत    की   बुरी,  रामालय  के  बीच।

रक्षक   ही   भक्षक   बने, बिखर   गई   है   कीच।।


लगता   है    अनुमान   ये, बैठे   चोर लबार।

देवालय   के    साँप    हैं, नहीं   पड़ेगी पार।।


शुभमस्तु,


17.07.2026◆ 1.30 प०मा०

                    ◆●◆

'महा संत' [ अतुकांतिका ]

 236/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भगवानों को

जीवंत भगवान नहीं

पत्थर की मूर्तियाँ

समझते हैं,

इसीलिए तो

उनके चरणों के दास

बैठकर उनके 

चरणों में

भेंट के नोटों को

अपनी जेबों में

अंटियों में उड़सते हैं।


राम आ गए,

उनकी कुटिया के

भाग खुल गए,

वे कुटिया को छोड़

महलों में रम गए,

राम की ही आँखों में

धूल झोंकते रहे

और उधर राम 

मौन बने हुए 

पत्थर  बने खड़े रहे।


दूध का दूध 

पानी का पानी

कैसे हो,

चिंतनीय है

सोचनीय है,

निंदनीय है,

पर क्या और कैसे?

सदियां बीत जाएंगी ऐसे!


चम्पतियों की चपतें

कब तक 

चंपी करेंगीं!

और जलती हुई आग को

राख में दबाती रहेंगीं !


व्यवस्था की

दुरावस्था अंततः

कब तक

भगवानों को

चूना लगाएगी!

भक्तों की भक्ति को

भुनाया जाता रहेगा ।


जब तक सियासत

मंदिरों में घुसी रहेगी,

चोरों की चाँदी

चमकती रहेगी,

सियासत की छाँव तले

मंदिरों के  भगवानों को

यों ही ठगा जाता रहा है,

ठगा  जाता ही रहेगा,

चोर चोर जीजा सालों का

चाचा  भतीजों का

चौर्य कर्म जिंदा रहेगा।


खून ही जिसका 

दूषित हो,

उस आदमी से

भगवान को

उम्मीद करना भी क्या!

लोभ-लालच के हाथों में

भगवानों का 

रहना भी क्या ?


वे नहीं मानते 

कि राम देख रहे हैं,

और वे उनके ही सामने

डाका डाल रहे हैं!

बेशर्मी की पराकाष्ठा की 

सीमा अनन्त है,

पीले कपड़ों में

 तिलक छापधारी आदमी

  यहाँ   'महा संत' है।


शुभमस्तु,


17.07.2026◆1.45 आ०मा०

                 ◆◆◆

बुधवार, 15 जुलाई 2026

हलधर वीर किसान [गीत]

 235/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


स्वेद सिक्त तन

चला खेत पर

हलधर वीर किसान।


कहता जगत

अन्न का दाता

 भरता सबके पेट

भूखा और

नग्न तन रहता

सबका ही आखेट

कंधे पर हल रखे

चला है

कृषता का संधान।


एक हाथ में

पात्र सलिल का

नग्न पाँव भू टेक

जुआ लटकता

उसके आगे

जाग्रत सदा विवेक

धैर्य धरे

वह कृषक तपस्वी

कर भू का गुणगान।


जीता सदा

अभावों में ही

नहीं कुशलता खैर

अपने ही

पैरों पर चलता

नहीं किसी से बैर

आँधी पानी

धूल धूप की

उसे नहीं पहचान।


भूखे प्यासे 

बाल कलपते

फटे तिया के चीर

प्याज नमक से

रोटी खाते

मन में धरते धीर

इज्जत नहीं

आन की खातिर

जिंदा  कृषक महान।


शुभमस्तु,


13.07.2026◆10.30प०मा०

                 ◆●●

चिकने -चुपड़े लाल घड़े हैं [गीतिका ]

 234/2026




चिकने-चुपड़े      लाल    घड़े    हैं।

लिए     पताका    सभी   खड़े हैं।।


डाल     रहे     मंदिर   में     डाका,

हठ   पर  अपनी   अड़े   पड़े   हैं।


बाँट    मुबाइल    प्रेयसियों    को,

ऐयासी     में    कनक    जड़े   हैं।


खा    अकूत   धन  लीं  न  डकारें,

ऊँचे-ऊँचे       भाव     कड़े     हैं।


रामालय     को    बेच      कमाते,

सोना -चाँदी      घूर      गड़े    हैं।


बड़े-बड़ों   की    छाया    छादित,

जिनके  मानस  मगर     सड़े  हैं।


'शुभम्'  धर्म     से    धंधा  करते,

पाप     कमाते     बड़े -बड़े     हैं।


शुभमस्तु,


13.07.2026◆ 5.15 आ०मा०

                     ◆◆◆

लिए पताका सभी खड़े हैं [सजल]

 233/2026


 

समांत           : अड़े

पदांत            : हैं

मात्रभार         :16.

मात्रा पतन      : शून्य


चिकने-चुपड़े      लाल    घड़े    हैं।

लिए     पताका    सभी   खड़े हैं।।


डाल     रहे     मंदिर   में     डाका।

हठ   पर  अपनी   अड़े   पड़े   हैं।।


बाँट    मुबाइल    प्रेयसियों    को।

ऐयासी     में    कनक    जड़े   हैं।।


खा    अकूत   धन  लीं  न  डकारें।

ऊँचे-ऊँचे       भाव     कड़े     हैं।।


रामालय     को    बेच      कमाते।

सोना -चाँदी      घूर      गड़े    हैं।।


बड़े-बड़ों   की    छाया    छादित।

जिनके  मानस  मगर     सड़े  हैं।।


'शुभम्'  धर्म     से    धंधा  करते।

पाप     कमाते     बड़े -बड़े     हैं।।


शुभमस्तु,


13.07.2026◆ 5.15 आ०मा०

                     ◆◆◆

रविवार, 12 जुलाई 2026

चोर-उचक्के ठोक रहे खम [ गीतिका ]

 232/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर-उचक्के      ठोक   रहे   खम।

बोल   रहे   रसना   से   बम-बम।।


बाहर          बैठा      चोर-सरगना,

उसके  ऊपर    भीतर    भी   दम।


राम-धाम    में        चोरी     होती,

चोर   नहीं   होते   लेकिन    कम।


भाल तिलक   तन  पर  पीताम्बर,

मधुशाला     में    वे    पीते    रम।


कहते  यही    कौन   क्या  कर  ले,

सर्वेसर्वा    मंदिर       के       हम।


नाक  अवध  वालों   की   कटती,

चोर    खा   रहे    रबड़ी  चमचम।


'शुभम्' लिखे   कविता   चिल्लाए,

 किंतु  न  होना    चोरों  को   गम।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆10.30 प०मा०

                  ◆◆●

बोल रहे रसना से बम-बम [ सजल ]

 231/2026



समांत          : अम

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर-उचक्के      ठोक   रहे   खम।

बोल   रहे   रसना   से   बम-बम।।


बाहर          बैठा      चोर-सरगना।

उसके  ऊपर    भीतर    भी   दम।।


राम-धाम    में        चोरी     होती।

चोर   नहीं   होते   लेकिन    कम।।


भाल तिलक   तन  पर  पीताम्बर।

मधुशाला     में    वे    पीते    रम।।


कहते  यही    कौन   क्या  कर  ले।

सर्वेसर्वा    मंदिर       के       हम।।


नाक  अवध  वालों   की   कटती।

चोर    खा   रहे    रबड़ी  चमचम।।


'शुभम्' लिखे   कविता   चिल्लाए।

 किंतु  न  होना    चोरों  को   गम।।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆10.30 प०मा०

                  ◆◆●

हुई राम-मन्दिर में चोरी [ गीतिका ]


230/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हुई         राम-मंदिर   में       चोरी।

चोर    ढूँढ़ते         सँकरी      मोरी।।


बचा     नहीं   पानी    आँखों     में,

शक्ल   बनाते     अपनी      भोरी।


गगन    चूमते       महल - दुमहले,

नित्य  बदलतीं      साड़ी     कोरी।


सोने    चाँदी       के      आभूषण,

देह      धारतीं        वामा     गोरी।


मिली  ढोल    में    पोल    सुरीली,

चढ़ा   रहे    आँखों    की    त्योरी।


अवसर  ताक    रहे      कुछ  नेता,

लाभ    मिले   छल    चोर  ठगोरी।


'शुभम्' विकट यह अजब  कहानी,

उठी      जेठ    में       चोरी- होरी।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆5.15 प० मा०

                  ◆◆●


चोर की दाढ़ी में तिनका [ गीतिका ]

 229/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर   की  दाढ़ी में तिनका  हिल रहा है।

झोपड़ी  में  फूल स्वर्णिम  खिल रहा है।।


दान को   दाता   बिना   अपना  बनाया,

मूषकों    का क्या तुम्हारा बिल रहा है ?


चार दिन की    चाँदनी   अब ढल गई है,

इसलिए तो    अब    अँधेरा मिल रहा है।


राम   के   दरबार     का    तू   चोर  बंदे,

सींखचों के  मध्य  मर  तिल-तिल रहा है।


रामजी    की आँख   में    तू    धूल झोंके,

भामिनी अपनी   सजा क्या  सिल रहा है।


कार    बँगलों  प्लॉट  में     हैं   हाथ   काले,

क्या कभी   काला   न   तेरा   दिल रहा है?


यदि 'शुभम्'  तू  सोचता   परलोक  की भी,

सोचदानी    से    सदा  तू    निल   रहा  है।



शुभमस्तु,


05.07.2026◆3.00प०मा०

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लगता है मर जाए रावण! [ गीतिका ]

 228/2026



   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लगता     है       मर       जाए   रावण।

अब  न     सिया     भरमाए     रावण।।


अपने      को        भगवान    समझता,

उठा      नहीं   मुख   पाए        रावण।


अहंकार       का     किला      बनाकर,

गाज  उसी       पर      ढाए      रावण।


नहीं       देखता       कोई      उसको,

लौट-लौट        बल     खाए    रावण।


बंद     जुबाँ       लटकी     है    गर्दन,

जग     को      दोष    लगाए    रावण।


जो  न    जानते      थे    जाने    सब,

 बहुत-बहुत           पछताए     रावण।


'शुभम्'   कर्मघट      फूट     पड़ा   तो,

पानी     सड़क        बहाए      रावण।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆ 1.45 प०मा०

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जब से राम अयोध्या आए [ गीतिका ]

 227/2026


   


©डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जब      से     राम     अयोध्या     आए।

भक्त जनों        ने        मोद      मनाए।।


भाग       खुल    गए     झोपड़ियों    के ,

चोर      लुटेरे      भी         सिर     नाए।


नहीं       स्वप्न         में     सोचा    ऐसा,

सोना         बने          लौह       निर्माए।


दानपात्र         का         पारस     पाकर,

परस     किया          सोना     बन पाए।


मुख   में    राम      तिलक   मस्तक  पर,

चोरी      करें         चोर        के     जाए।


लोहे       की      अब    खुलीं    सलाखें,

ग्रीवा          झुकी       नयन      शरमाए।


'शुभम्'     गर्म       हो     गई    सियासत,

नेता         खड़े -खड़े         डर      खाए।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆1.00 प०मा०

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रावण की तुन्दी में [ गीतिका ]

 226/2026

 

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप


रावण   की तुन्दी में गहरा  बाण लगा है।

कहता देश   ठगों ने सारा   देश  ठगा है।।


मंदिर में  रहने   वालों   ने   सेंध लगाई,

एक-एक शातिर  सोने के साथ पगा है।


नींद नहीं  आती  है उसको  करे रतजगा,

किसको अपना कहे न कोई एक सगा है।


चोर-चोर   मौसेरे    भाई    जीजा-साले,

चाचा संग  भतीजा  करता  संग दगा  है।


थोड़ा  नहीं   करोड़ों  पर  की हाथ सफाई,

ऐयासी   में   जिसका  कुर्ता  पीत रँगा है।


सोना -चाँदी राम-रतन   को जी भर लूटा,

गुबरैला  सोने   का  समझें  मत  भुनगा है।


'शुभम्'  देखना  अभी  शेष है धार तेल की,

हाथी   पूरा बचा   हुआ   है   शुण्ड दिखा है।


शुभमस्तु,


05.07.2026◆12.00मध्याह्न

                    ◆◆◆

गुंडत्त्व [ अतुकांतिका]

 225/2026


            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गुंडत्त्व के गुरुत्व से

गौरवान्वित जन

गुरूर में गुम हैं,

आम चूषण के वास्ते

एटम बम हैं।


कोई मंदिर में

कोई संसद में

गली सड़क बाजारों में

कमी नहीं

वर्चस्व ही है इनका।


परदे की आड़ में

कैमरा जाए भाड़ में

ये कर्म नहीं

कांड करते हैं,

करोड़ों की लूट से

अपना घर भरते हैं।


गुंडत्व से

सबको भय है

इसीलिए यहाँ

छाया अनय है,

मानवता का क्षय है

देश और दुनिया की

आज यही लय है।


महा गुंडत्व के 

वटवृक्ष के तले

दूब भी नहीं उगती,

पर अंततः

सभी चंपतों की

पोल खुलनी है,

खुल ही रही है,

बकरे की अम्मा अंततः

कब तक सिन्नी बाँटेगी!


धर्म का मंदिर

दूषित करने वाले

जड़ें जमाए बैठे हैं,

उँगली नहीं 

उठा सकते आप

वे ऐसे तने ऐंठे हैं।


दूध और पानी

छंट रहा है,

दूध देखिए 

दूध की धार देखिए,

अपनी ही आँखों के समक्ष

पापियों का उपसंहार देखिए।


शुभमस्तु,


03.07.2026◆530आ०मा०

उपदेश [ कुंडलिया ]

 224/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

देना   सबको  भावता,  भाँति-भाँति उपदेश।

व्यासासन   पर   बैठता ,बढ़ा शीश के केश।।

बढ़ा    शीश    के   केश, श्वेत पीतांबरधारी।

बाँट रहा  है   ज्ञान, समझता   कृष्ण मुरारी।।

'शुभम्'  दक्षिणा   रूप,दान में  धन ले लेना।

बनती  धजा   अनूप,नहीं कुछ और न देना।।


                         -2-

दाता   हैं   उपदेश   के,  पंडित साधु अनेक।

नियम   नहीं   वे  पालते,और न रखें विवेक।।

और न   रखें  विवेक, आचरण  से अविचारी।

मुख में   रखते   राम, बगल में किंतु कटारी।।

'शुभम्'    कभी  उद्धार,नहीं उनका हो पाता।

देते   पर    उपदेश,  बने  अति   ज्ञानी दाता।।


                            -3-

पहले   खुद     करते   नहीं, पर  देते उपदेश।

 रँगे   गेरुआ   वसन  वे, बदल रहे नित वेश।।

बदल   रहे   नित    वेश, चलें  परदे  में उलटे।

हैं    विलोम   आचार,  चरित   में   पूरे कुलटे।।

मन से 'शुभम्' मलीन,  मार   नहले पर दहले।

परहित के   नासूर,  लूटते    धन  को  पहले।।


                         -4-

जनता तो  बस  भेड़ है,अपना नहीं विवेक।

भेड़  गिरे जब कूप  में,तब  होता अतिरेक।।

तब  होता  अतिरेक,  सुनें   उपदेश सुरीले।

ठग   विद्या   के   खेल,खेलते  चोर हठीले।।

'शुभम्' न सोचे साँच, झूठ ही मानव तनता।

बाँट रहे  हैं  ज्ञान, लुभा कर अनपढ़ जनता।।


                           -5-

मिलती     रोटी    चूपड़ी,  मिले  बहुत ही स्वाद।

बिना   किए     की   रोकड़ी,  बनें  मूढ़ आबाद।।

बनें     मूढ़     आबाद,    बढ़े    उपदेशक ज्ञानी।

देते     नित      उपदेश,  तने    ऊँचे अभिमानी।।

'शुभम्' अयोध्या धाम,चौर्य की कलियाँ खिलती।

बढ़ते     डाकू     चोर, धर्म  की शाख न मिलती।।


शुभमस्तु,

02.07.2026◆11.15 प०मा०

                   ◆◆◆

धरा धन्य प्रभु राम की [ दोहा ]

 223/2026


 

            [धरा,धान,धन,धन्य,धनु]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक

वज्रपात    ऐसा    हुआ, धरा  धँसी पाताल।

अमल अयोध्या धाम में,हुआ चौर्य विकराल।।

आज धरा  पर पाप  का,विकट बढ़ा है भार।

राम-रतन  चोरी  हुआ,गणकों  का अतिचार।।


आया फिर आषाढ़ का,सजल रसीला मास।

धान बुवाई   कर   रहे,कृषक लगाए आस।।

धान रोपतीं   नारियाँ,  बालक वृद्ध अनेक।

हलचल   खेतों  में  बढ़ी,  टर्राते   नर भेक।।


नैतिकता के नाश का, आज काल विकराल।

बिना कमाए चोरते, धन को  बिना धमाल।।

दुनिया  में धन के  बिना,  एक न पूछे बात।

श्वेत श्याम जैसा मिले,यद्यपि जात- कुजात।।


धन्य-धन्य   कैसे   कहें, बने  दान  के चोर।

देख  दृश्य ये पाप  का,काँप उठा नभ छोर।।

भक्त धन्य  हैं  राम  के, करते  सोना  दान।

करते  हैं  क्या कर्म   वे, हमें  नहीं अनुमान।।


धारण कर धनु राम ने,किया असुर संहार।

प्राण  गए  मारीच  के,  गूँज  उठी टंकार।।

राशि चक्र में राशि है,नवमी धनु  का रूप।

मेष वृषादिक अन्य का,अलग एक है यूप।।


                 एक में सब

धरा धन्य प्रभु राम की,लिए  कंध धनु एक।

लहराते   हैं धान के,खेत    धरे  धन   नेक।।


शुभमस्तु,


01.07.2026◆7.15 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...