सोमवार, 28 सितंबर 2026

ऐसा नहीं है [ गीतिका ]

 315/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तेल    में   ही  आग हो,  ऐसा  नहीं  है।

नाग में   ही नाग   हो,  ऐसा   नहीं    है।।


आदमी    में   आदमी  को, खोजता   हूँ,

फाग   में   ही फाग हो, ऐसा   नहीं   है।


भक्त   है  वह  देश  का, कहता  जुबाँ   से,

उर में बसा अनुराग  हो,   ऐसा  नहीं  है।


खाक   से उठकर  बना   है ,लाख का जो,

बाकी न   कोई दाग हो,   ऐसा   नहीं   है।


चाल   हंसों  की    सदा से, चल   रहा  है,

बैठा न   दिल में  काग हो, ऐसा   नहीं है।


त्याग   दी   सहधर्मिणी,  तो   बात  क्या है,

तन में   नहीं बैराज   हो,  ऐसा   नहीं  है।


वेश  में   ही    गीध   चीलें,   चिलचिलाएँ,

सिर पर न   कोई बाज   हो, ऐसा नहीं है।


शुभमस्तु,


28.09.2026◆4.00 प०मा०

                  ◆●◆

कोई मुर्गा फँस जाए! [ गीतिका ]

 314/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऊपर  की  इनकम आए,कोई मुर्गा फँस जाए।

जब ड्यूटी पर हम जाएं,कोई मुर्गा फँस जाए।।


सड़क हमारे बप्पा  की, जाएगा  क्यों कोई यों,

डंडे से वह  थम  जाए,  कोई   मुर्गा फँस जाए।


नज़र    हमारी   तेज बड़ी, कैसे  कोई बचना   है,

कभी अधिक धन कम लाए,कोई मुर्गा फँस जाए।


साँप बनाना  रस्सी का, रोज हमारा  काम यही,

कदम ताल छम- छम गाए,कोई मुर्गा फँस जाए।


यार   बुरे   हम   दुश्मन   भी,  दूर-दूर ही रहना बे!

ज़रा न  जोखम ले  पाए,  कोई  मुर्गा फँस   जाए।


ऐब   न  कोई शेष यहाँ,सदाचरण की बात न कर,

ढोल बजा ढमढम  गाए, कोई  मुर्गा फँस  जाए।


'शुभम्' उठा  हम लाशों को, टुकड़े-टुकड़े भरते हैं,

शेष   रहम   क्यों  रह जाए, कोई मुर्गा फँस जाए।


शुभमस्तु,


28.09.2026 ◆3.00 प०मा०

                    ◆●◆

ये ख़्वाब मेरा [ गीतिका ]

 313/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देश   की  सेवा  करूँ, ये  ख्वाव   मेरा।

मुफ़्त की   मेवा चरूँ,ये   ख्वाव    मेरा।।


वेश  की  पूजा  यहाँ   होती   बड़ी   ही,

नाव  को  खेवा  करूँ, ये  ख्वाव    मेरा।


धर्म की चादर तले   कुछ   भी करूँ  मैं ,

मालिका  फेरा  करूँ,  ये   ख्वाव   मेरा।


जाकर सियासत की सड़क चौड़ी अनोखी,

नाम   निज  पैदा  करूँ, ये  ख्वाव  मेरा।


नारी   बिना होती  सफलता  भी न कोई,

सहभतृका   बेवा  करूँ, ये  ख्वाव   मेरा।


बगुला  भगत की भक्ति  का  डंका बजाऊँ,

रस   भरी    शेवा   करूँ, ये  ख्वाव   मेरा।


ऐ  'शुभम्'  कुछ  और  ही  है  सोच अपनी,

वचन का   केवा   करूँ,  ये    ख्वाव  मेरा।


शुभमस्तु,

28.09.2026◆9.30आ०मा०

                ◆●◆

खोल भुजाएँ मिले गले [ गीतिका ]

 312/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोल       भुजाएँ     मिले   गले।

सत्य   यही   जब   उर   पिघले।।


दुनिया  में   छल - छद्म     बढ़ा,

उल्लू     सीधा   किया      चले।


नहीं     समझना     अपना-सा,

सभी   नहीं    नर-नारि     भले।


नजदीकी      में        देवी      वे,

गए    दूर     तो     बड़े     खले।


सोच-समझकर     करनी   कर,

मनुज    अन्यथा   हाथ     मले।


सड़क  नहीं      सीधी    दुनिया,

पता   नहीं   कब   कौन    छले।


'शुभम्'  दूध     से   जल    जाए,

रखे    फूँक   निज   पाँव - तले।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆10.30 प०मा०

                 ◆●◆

सत्य यही जब [ सजल ]

 311/2026


    

समांत          : अले

पदांत            : अपदांत

मात्राभार       :  14.

मात्रा पतन     :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोल       भुजाएँ     मिले   गले।

सत्य   यही   जब   उर   पिघले।।


दुनिया  में   छल - छद्म     बढ़ा।

उल्लू     सीधा   किया      चले।।


नहीं     समझना     अपना-सा।

सभी   नहीं    नर-नारि     भले।।


नजदीकी      में        देवी      वे।

गए    दूर     तो     बड़े     खले।।


सोच-समझकर     करनी   कर।

मनुज    अन्यथा   हाथ     मले।।


सड़क  नहीं      सीधी    दुनिया।

पता   नहीं   कब   कौन    छले।।


'शुभम्'  दूध     से   जल    जाए।

रखे    फूँक   निज   पाँव - तले।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆10.30 प०मा०

                 ◆●◆

श्रद्धा [ चौपाई ]

 310/ 2026


          


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्रद्धा  भाव    हृदय  में   आए।

मात-पिता  गुरुजन को   ध्याए।।

अपने  पितरों  को  जो   ध्याता।

सुख-संपति    आजीवन  पाता।।


आदर  भक्ति   अटल   विश्वासी।

श्रद्धा रहे नित्य   प्रति   खासी।।

भक्त चरण    में    बन  अनुरागी।

सत कर्मों का नित  बड़   भागी।।


श्राद्ध पक्ष   श्रद्धा  का  आया।

क्वार मास प्रभु  ने   महकाया।।

पितरों   को   तर्पण   है   करना।

दुग्ध सलिल तिल उन्हें  अर्पना।।


जीवित  मात-पिता   की   सेवा।

श्रद्धा  से   भर      पाएँ   मेवा।।

जीव-जंतु     से     नेह    बढ़ाएं।

आन-मान   सब   बढ़कर   पाएँ।।


श्रद्धा   भाव      घटाए      दूरी।

उर-इच्छाएं         होतीं      पूरी।।

श्रद्धा का    प्रसाद    है  मिलता।

यश का सुमन बाग  में खिलता।।


श्रद्धा  की    सुगंध   जो   बाँटे।

मिलें न उसको  पथ   में   काँटे।।

श्रद्धा से   नतमस्तक    होता।

खुले कृपा का    झरना   सोता।।


आओ    'शुभम्'   बढ़ाएं  श्रद्धा।

नहीं  बड़ों   के    बनें    विरुद्धा।।

श्रद्धावान    जगत      में   जीता।

लिखे    सत्य   कर्मों  की   गीता।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆9.45प०मा०


                   ◆●◆

रविवार, 27 सितंबर 2026

मालूम है ये [ गीतिका ]

 309/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खोजने में  वे लगे हैं छेद,  मालूम   है ये।

जानना इस राज का भी भेद,मालूम है ये।।


ख़ुद गिरें   वे   कूप    में,   या    आग  में,

दिल में  न उनके क्लेद,  मालूम    है  ये।


चैन    से   रहना    नहीं,    भाता    उन्हें,

खून में खड़िया घुली सफेद, मालूम है ये।


प्रेम  का   दुर्भिक्ष    ही,  लिखवा   लिया,

आठों    फहर     निर्वेद,   मालूम  है   ये।


क्या    कहा   कैसे  कहा , अज्ञात   सब,

सिर में   भरा    बस  मेद, मालूम  है   ये।


जो बना    जिसके   लिए,  करता   वही,

उनको नहीं कुछ  खेद, मालूम   है    ये।


नाव    डूबे      देश     की   चाहे  'शुभम्',

उनसे  नहीं      उम्मेद,   मालूम   है   ये।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆4.15 प०मा०

                  ◆●◆

मैंने छान मारा [ गीतिका ]

 308/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तुझ-सा  नहीं  गुस्ताख़, मैंने छान मारा।

देखे   करोड़ों  लाख , मैंने   छान मारा।।  


खा रहा   जिस  थाल  में, आहार अपना,

करता   वहीं   सूराख, मैंने  छान मारा।


साँप बिच्छू   से    नहीं,  उम्मीद   कोई,

है  वत्स तू   वैशाख, मैंने  छान    मारा।


झोंपड़ी  की   छाँव  में,  नाटक  दिखाए,

खाता गपागप  दाख, मैंने    छान  मारा।


पंडित कभी मुल्ला कभी,क्रिस्तान भी तू,

तेरी  नहीं कुछ   साख, मैंने छान   मारा।


सबसे   बड़ी   कुर्सी तुझे, मिलनी नहीं है,

उम्मीद    तेरी    राख,   मैंने   छान मारा।


दुर्भाग्य   होगा    देश  का,पी एम हो तू,

देता 'शुभम्'  ये भाख, मैंने  छान   मारा।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆2.00प०मा०

               ◆●●

तू मत समझना [ गीतिका ]

 307/2026



           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बुद्ध   की   संतान  है, तू   मत समझना।

इस देश  का तू  मान है,तू मत समझना।।


संस्कृति नहीं है  सभ्यता,  तेरी यहाँ की,

तेरा न हमको ध्यान है, तू  मत समझना।


उगतीं  कँटीली  झाड़ियाँ  भी, जंगलों में,

हमको नहीं संज्ञान  है, तू मत समझना।


जोड़ता  जिस देश  को,  टूटा  नहीं   है,

योजक नहीं विषखान है,तू मत समझना।


आते  मिटाने  के लिए,  संतान   कुछ तो,

वंश  की   पहचान  है,  तू  मत समझना।


मूढ़ता    के   ढेर   में,    है     कूढ़ता  ही,

चलना  न तेरा प्लान है,तू  मत समझना।


देश की नजरें 'शुभम्' , तुझ पर टिकी हैं,

सठिया गया तू  ज्वान है,तू मत समझना।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆12.30 प०मा०

                     ◆●◆

वे चाहते हैं [ गीतिका ]

 306/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हिंदोसितां   बरबाद   हो, वे  चाहते हैं।

दुश्मन कुटिल आज़ाद हो,वे चाहते हैं।।


लूटने   की     दास्तानें  ,  सब    पुरानी,

सुननी नहीं फरियाद हो,  वे  चाहते  हैं।


है   हलाहल  देह में , फन  भी  विषैला,

हर ओर केवल   गाद   हो, वे चाहते  हैं।


भाषणों   में   गालियाँ,  केवल उगलना,

जीभ   में   सुस्वाद  हो ,वे   चाहते   हैं।


रोना  कलपना  चीखना, उनको लुभाए,

आतंक  का आच्छाद  हो, वे चाहते हैं।


कर्म   खोटे   हैं,   रखा   क्या  नाम  तेरे,

बुद्धि   में    जल्लाद   हो, वे  चाहते  हैं।


समझें  नहीं केवल सपोले, साँप  हैं जो,

बढ़ता रहे    अवसाद  हो ,   वे चाहते हैं।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆11.45 आ०मा०

                ◆●◆

परम पिता परमात्मा [ दोहा ]

 305/2026


      

[भगवान,ईश्वर,प्रभु,विधाता,

परमात्मा ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


              सब में एक

             

लीलाएँ प्रतिपल करें,अखिल सृष्टि भगवान।

मानव   यह  जाने  नहीं,व्यापक ईश महान।।

माया    ने भगवान  की, लुभा लिया संसार।

उनकी   इच्छा    से  चले,  सबका कारोबार।।



ईश्वर -महिमा   जानते, नहीं मनुज खग ढोर।

जलजीवी  जो  जंतु  हैं,उन्हें न मिलता छोर।।

ईश्वर   स्वामी   सृष्टि  के, वही नियंता आप।

उन्हें   नहीं   हैं    व्यापते,  शीतलता या ताप।।


प्रभु जी   से   विनती  यही,रखें  कृपा का हाथ।

जीव जिएं जीवन सभी, सुख से मिलजुल साथ।।

प्रभु की   व्यापक   दृष्टि से, बचा न  कोई  एक।

'शुभम्' यही नित सीख से,मत खो जीव विवेक।।


दिया   विधाता  ने   यहाँ,  कर्मों    के अनुसार।

जीव   सभी  नित भोगते, जीवन  बिना विचार।।

बिना   विधाता   के यहाँ, चले न कोई काम।

कर्ता सबका  एक     है,  मात्र   जगत  में राम।।


परम  पिता   परमात्मा, प्रणत  प्रणव सौ   बार।

मनुज   योनि   दी   धन्य मैं, कर्मों   के अनुसार।।

पूर्ण      मात्र  परमात्मा,  अन्य    अधूरे जीव।

वह   विराट  निस्सीम है,  बंधित  सभी जरीव।।


               एक में सब


ईश्वर प्रभु    भगवान के, ब्रह्म विधाता  नाम।

सभी     कहें   परमात्मा,  जगत नियंता  राम।।


शुभमस्तु,


27.09.2026◆7.00 आ०मा०

                   ◆●◆

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026

वंदन [ कुंडलिया ]

 304/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

                       

                         -1-

अपने  दोनों  जोड़  कर, नत  वंदन में भक्त।

सेवा  करता  ईश की,चरण   युगल अनुरक्त।।

चरण युगल अनुरक्त,जनक जननी को ध्याये।

मिलें   सिद्धियाँ  अष्ट,नवों   निधियों को पाये।।

'शुभम्' नमन की रीति,उठाया नर को तप ने।

धन्य -धन्य वह   जीव, करे  वंदन  कर अपने।।


                         -2-

वंदन     का   चंदन   धरे,  रहे   महकता देह।

शुभता के  आशीष   से, मिले   ईश  का नेह।।

मिले   ईश  का  नेह, मिटें   नित   की बाधाएँ।

विपदाएँ     हों    नष्ट, सदा    विश्वास जगाएँ।।

'शुभम्' करें शुभ काज,करे दुनिया अभिनंदन।

विनत   भाव   की   धार, बहाए  निर्मल वंदन।।


                         -3-

वीणा वादिनि   शारदा,  तव   वंदन  में आज।

भक्त विनत अनुरक्त है,सकल सुधारें   काज।।

सकल  सुधारें  काज, काव्य-रथ  रुके न मेरा।

नित  नूतन   हों   भाव, शब्द   का कोष घनेरा।।

'शुभम्'  कृपा  कर  माथ, नहीं  दें कच्चा मीणा।

नत मस्तक दो हाथ,बजा दो  कवि  की वीणा।।


                         -4-

वंदन के  शुभ  भाव  से,  मिले गुणों का कोष।

जागे   विपुल   विनम्रता,मिटें सकल उर- दोष।।

मिटें   सकल   उर-दोष, ओघ-अघ नष्ट कराए।

पावनता    का     कोष, अंग   में नित्य समाए।।

'शुभम्' लगा जब भाल, महकता मह-मह  चंदन।

विपदाएँ   दे   टाल,   भक्त   का   निर्मल वंदन।।


                         -5-

माता   के   शुभ  भाव  से, वंदन करते नित्य।

अपने   भारत   देश को,  शशि   तारे आदित्य।।

शशि  तारे आदित्य,  सिंधु  कलकल  सरिताएँ।

पंच   तत्त्व   के  सत्त्व,  नित्य  गुणगीता गाएँ।।

'शुभम्'   पुत्र जो  नित्य,देश को अपने  ध्याता।

क्यों   न  लड़ावे   लाड़,   पुत्र को भारत माता।।


शुभमस्तु,


25.09.2026◆ 6.30 आ०मा०

                     ◆●◆

आदमी के पंख नहीं [ अतुकांतिका ]

 303 / 2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी के पंख नहीं

फिर भी उड़ता है

धन बल पैसे से

पाँव धरती पर

नहीं पड़ता है।


रह गए बाज पीछे

नोंचने में माँस को

आदमी डकार लिए बिना

निकाल रहा भड़ास को।


मोर हैं न कोयल

गौरैया न हंस है

कृष्ण लीला कर रहा

कंस का अवतंस है।


मुर्गे की कुकड़ कूं

आहार भी कुछ वैसा ही

गंगा में लगा गोते

प्रयागराज आवाजाही।


आदमी की देह में

आदमी भी तो नहीं

ईंट सीमेंट के गेह में

जमा रहा दिमागी दही।


प्रजाति नई जीव की

आदमी नमूना  है

ठग रहा अपनों को

लगा रहा चूना  है।


शुभमस्तु,


24.09.2026 ◆ 8.00 प०मा०

                   ◆●◆

कहना बड़ा मुश्किल [ गीतिका ]

 302/ 2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी में  आदमी   है, कहना  बड़ा मुश्किल।

कथन सच्चा लाजमी है, कहना बड़ा मुश्किल।।


आँख   दो   दो  कान   हैं, हैं  हाथ   दो  दो   पैर ,

दर्द   की हलकी नमी  है, कहना  बड़ा मुश्किल।


आदमी   की  भीड़   में ,  खोया   हुआ इंसान,

इंसानियत की ही कमी है, कहना बड़ा मुश्किल।


होंठ   पर   मुस्कान   है,पर  आग   भीतर   है,

प्यार से  सूखी  जमी  है,कहना बड़ा  मुश्किल।


गैर   हों     अपने   भले,   अपने   नहीं  अपने,

आदमी  ये  आलमी है, कहना   बड़ा मुश्किल।


चढ़   रही    चींटी ,  कभी   ऊपर कभी  नीचे,

असल है या   डमी  है, कहना   बड़ा मुश्किल।


सीख   लेता   है 'शुभम्' ,  उन  चींटियों से  ये,

आदमी यदि   उद्यमी   है, चढ़ना  नहीं मुश्किल।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆3.00 प०मा०

               ◆●◆

कंबल दो रजाई दो [ गीतिका ]

 301/ 2026



       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बढ़ने  लगा  है   शीत, कंबल   दो रजाई  दो।

मन   गा   रहा है गीत, कंबल  दो रजाई दो।।


झरने   लगी है ओस,अंबर   से  नहीं दिखता,

रातें   हुईं   विपरीत, कंबल   दो   रजाई  दो।


बिजली  नहीं बादल  नहीं,  बरसा नहीं  पानी,

है   धूप  ही  मनमीत, कंबल   दो रजाई  दो।


याद  भी  उनकी, भुलाई   ही    नहीं जाती,

तन-मन जगी   है प्रीत, कंबल  दो रजाई दो।


आग  की   लपटें,  बुलातीं   पास में  अपने,

तन की  सुखानी तीत,  कंबल दो रजाई दो।


चिड़िया  सिकुड़ती  नीड़ में, है से रही अंडे,

वर्षा    गई   है   बीत,  कंबल   दो रजाई दो।


चल 'शुभम्'  हम  भी चलें, बढ़ता  अँधेरा है,

होना  नहीं   भयभीत,   कंबल दो रजाई दो।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆ 1.45 प०मा०

                 ◆●◆

अब तो उजाला हो [ गीतिका ]

 300/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


खुल  गए   कॉलेज,  अब  तो  उजाला हो।

बढ़-चढ़ मिले नॉलेज, अब तो  उजाला हो।।


बिल्डिंगें   ऊँची ,   भवन   मरमर   जड़े सारे,

उचित   है   मैसेज, अब    तो   उजाला हो।


दिखते   नहीं   विद्यार्थी,ऑफिस   में   हैं बाबू ,

मालिक  बने   अंग्रेज, अब  तो  उजाला हो।


बैंक   में    अंबार ,  शुल्कों   के    लगे    ऊँचे,

सज   गई   है    सेज, अब   तो  उजाला हो।


बिन  पढ़े     होगी  नहीं , शादी कहीं  से भी,

बढ़   गया   है  क्रेज़,  अब   तो   उजाला हो।


पढ़ते  सभी लड़के,यहाँ पर लड़कियाँ भी हैं,

मोटा  मिले    पैकेज, अब   तो  उजाला  हो।


देखे   सभी   ये  दृश्य,  सारे आँख  से अपनी,

पलटे  नहीं  बस  पेज, अब  तो उजाला हो।


शुभमस्तु,

24.09.2026◆ 12.15 प० मा०

              ◆●◆

गुरुवार, 24 सितंबर 2026

हम क्या करें [गीतिका]

 299/2026


         


© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आदमी   मिलता   नहीं,  हम  क्या   करें।

ढूँढ़  मारा   सब    कहीं, हम   क्या   करें।।


आगे    पीछे    आदमी      ही    आदमी,

दूरियाँ  फिर   भी  रहीं, हम   क्या   करें।


अक्ल  का   पुतला   सभी    कहते  उसे,

खून  की   नदियां   बहीं ,हम  क्या  करें।


अपने   पड़ौसी   को    नहीं   पहचानता,

फिर भी कहें उसको जहीं, हम  क्या करें।


गाँव      जंगल    नगर   में    है   छा   गया,

ख्वाव में   भी   है   यहीं,   हम    क्या  करें।


लोक    में    परलोक    में   उसकी    रज़ा,

अनगिनत   उसकी   महीं,   हम  क्या करें।


खोज    करता    है  'शुभम्'     इंसां   मिले,

होती    नहीं   पर   मनचहीं, हम   क्या करें।


शुभमस्तु,


24.09.2026◆6.00 आ०मा०

                 ◆●◆

टन-टन टनाटन [ गीतिका]

 298/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जेब   हो  अपनी  गरम, टन-टन टनाटन।

आदमी  है    बे शरम,   टन-टन टनाटन।।


देश जाए  भाड़ में, मुझको   पड़ी   क्या ,

कर्म   ही   मेरा  धरम,   टन-टन  टनाटन।


असलियत का  भेद,यों  खुलता नहीं है,

जिंदा रहे जन का भरम, टन-टन टनाटन।


छातियों में  अब नहीं, धड़का करें   दिल,

पत्थरों   के हैं   मरम,   टन-टन टनाटन।


अब नहीं  अच्छा- बुरा, कुछ भी यहाँ पर,

कर रहा  है सब  करम, टन-टन टनाटन।


वासना  की     भूख    ने,   ऐसा सताया,

सचल है  उनका   हरम,  टन-टन टनाटन।


दूध   के    सम्बंध   भी,  बदबू   भरे   हैं,

चाहिए नर  को चरम,   टन-टन  टनाटन।


शुभमस्तु,


23.09.2026◆10.45 आ०मा०

                     ◆●◆

बज रहा थोथा चना [ गीतिका ]

 297/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बज   रहा   थोथा  चना, क्या  कीजिए।

कर   रहा   है रव  घना,  क्या  कीजिए।।


प्यार  का  नाटक,   निरंतर  छल    रहा,

घर   हुआ   है   अनमना, क्या कीजिए।


आस्तीनों      में    सपोले ,    डंस    रहे,

खून   पीते   अनछना,   क्या   कीजिए।


मंदिरों    में      रूप   बदले,   चोर   हैं,

भक्त   को  है   झुनझुना, क्या कीजिए।


आदमी     अज्ञान     में,  मदमस्त     है,

अज्ञता  ने   ही     जना,  क्या कीजिए।


चूसते    नेता     सभी,  जनता     यहाँ,

छद्म   का   तंबू    तना,   क्या  कीजिए।


कज्जली    है   कोठरी,  बचना 'शुभम्' ,

करना   नहीं    रे   बचपना, क्या कीजिए।


शुभमस्तु,


23.09.2026◆10.00आ०मा०

                ◆●◆

मिट्टी का ये तन-मन सारा [ गीत ]

 296/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मिट्टी का ये

तन-मन सारा

मिट्टी का ही गेह बनाए।


अबाबील 

धनचिड़ी पखेरू

तिनके और मृत्तिका लेकर

रखती संतति

वहाँ सुरक्षित

है निश्चिंत अंड निज सेकर

लार और

जलकण पंखों से

निज सपनों से  नेह सजाए।


पाँच तत्त्व की

काया तेरी

पाँच तत्त्व का नीड़ निराला

पाँच तत्त्व में

मिल जाना है

रहे न जीवन गीत उजाला

रहे धूप

वर्षा से  निश्चित

जो देखे  संदेह उगाए।


जब तक जीना

तब तक सीना

खेल यही चलते रहना है

तन का नहीं

भरोसा क्षण भर

इस लोंदे का क्या कहना है

खेह विनिर्मित

खेह नीड़ तज

पुनः देह जा खेह समाए।


शुभमस्तु,


22.09.2026◆3.30 आ०मा०

                      ◆●◆

मानवता [ चौपाई ]

 295/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव     देह    धरे    जो  आया।

जीव  वही   मानव    कहलाया।।

मानवता    का    धर्म   यही    है।

तन   अनुरूपी   कर्म   सही  है।।


सेवा     धर्म     निभाता    कोई।

मानवता   पटु वह    नर    होई।।

ममता  दया  प्रेम   करुणा   का।

बहता  है नद नित  वरुणा  का।।


मानवता   नर    जो    खो  देता।

दनुज वृत्ति   उर   में  भर  लेता।।

मानव  तन     में    दानव   होते।

ममता   प्रेम    मृदुलता    खोते।।


क्रूर  कंस     रावण    अतिचारी।

निज कर्मों   से   करते   ख्वारी।।

सत्य  आचरण   जो   झुठलाया।

मानवता  को     दूर     भगाया।।


दुर्व्यसनों    में     रत   हो  जाता।

तज मानवता  सत  को   खाता।।

अहंकार   हर    तप   का  नाशी।

हरिद्वार   क्या     गंगा    काशी।।


बड़े-बड़े       तपसी     सन्यासी।

त्याग   तपस्या    हुए    उदासी।।

तज मानवता  बन   व्यभिचारी।

हुए धरा   पर    सिल   से भारी।।


'शुभम्'  नहीं   तजनी  मानवता।

यद्यपि हो  कितनी   भी लघुता।।

दानव   अंत   बुरा    ही    होता।

शकटासुर - सा   मिटता   रोता।।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆12.00मध्याह्न

                 ◆●◆

त्योहारों का देश ये [ दोहा गीतिका ]

 294/2026

        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


त्योहारों   का   देश   है,   भारतवर्ष महान।

दीवाली  होली  सदा,  विजयादशमी शान।।


गुजराती   बँगला    कई, भाषाओं की धूम,

सर्वश्रेष्ठ  हिंदी  सदा, करता  जग गुणगान।


राम  कृष्ण  प्रकटे  यहाँ,यही  बुद्ध का देश,

तुलसी  सूर  कबीर  के,अमर  नाम का मान।


सरस्वती   गंगा    यहीं,  सरयू  यमुना   धार,

पावन   करतीं   हैं धरा,भारत  की पहचान।


हिंदू सिख मुस्लिम सभी,रहते मिलकर एक,

भारत  के  रणबाँकुरे,सुगठित सुखद वितान।


धर्म   सनातन   देश में,  सरसाए नित भव्य,

कर्ण वीर   रणधीर   का, सदा अमर है दान।


'शुभम्' बड़ा  सौभाग्य  है, जन्मा मैं इस देश,

कागज पर मसि लेखनी,चलती नित्य विहान।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆7.30 आ०मा०

                      ◆●◆

सर्वश्रेष्ठ हिंदी सदा [ सजल ]

 293/2026

 

समांत          : आन

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


त्योहारों   का   देश   है,   भारतवर्ष महान।

दीवाली  होली  सदा,  विजयादशमी शान।।


गुजराती बँगला    कई, भाषाओं की धूम।

सर्वश्रेष्ठ  हिंदी  सदा, करता  जग गुणगान।।


राम  कृष्ण  प्रकटे  यहाँ,यही  बुद्ध का देश।

तुलसी  सूर  कबीर  के,अमर  नाम का मान।।


सरस्वती   गंगा    यहीं,  सरयू  यमुना   धार।

पावन   करतीं   हैं धरा,भारत  की पहचान।।


हिंदू सिख मुस्लिम सभी,रहते मिलकर एक।

भारत  के  रणबाँकुरे,सुगठित सुखद वितान।।


धर्म   सनातन   देश में,  सरसाए नित भव्य।

कर्ण वीर   रणधीर   का, सदा अमर है दान।।


'शुभम्' बड़ा  सौभाग्य  है, जन्मा मैं इस देश।

कागज पर मसि लेखनी,चलती नित्य विहान।।


शुभमस्तु,


21.09.2026◆7.30 आ०मा०

                      ◆●◆

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

निराशा [ कुंडलिया]

 291/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

आशा   के   ही   साथ में,सदा निराशा वास।

अपनी   टाँग   अड़ा   रही,संग ले रही श्वास।।

संग   ले   रही   श्वास,  एक  पल दूर न जाए।

खंडित कर विश्वास,  उसे   पथ   से भटकाए।।

रहना   'शुभम्'  सचेत,  नहीं हो  उलटा पाशा।

छोड़ निराशा बंधु, थाम   कर   उज्ज्वल आशा।।


                         -2-

झूले   में   नर   झूलता,  आश-निराशा  बीच।

दोलन   ही  होता    रहे,रही    निराशा सींच।।

रही  निराशा   सींच,डिगाती  प्रति पल रहती।

आशा   के कर  खींच,  बात  बेढब ही कहती।।

'शुभम्' न व्यक्ति प्रबुद्ध,कभी निज आशा भूले।

न   दे   निराशा   साथ, नहीं    भटके पथ झूले।।


                          -3-

आशा   को   मत   छोड़िए,चिंतन  रहे सकार।

नहीं निराशा   पास   में, पल  को फटके द्वार।।

पल को   फटके  द्वार, दिशा सुथरी मिल जाएँ।

भटकन   से    रह   दूर,  दिशाएँ   लोरी गाएँ।।

'शुभम्' न मन में देख, एक पल कभी दुराशा।

महक रहा ज्यों फूल, महकती हो वह आशा।।


                         -4-

चढ़ती   चींटी  शृंग   पर,  विजय पताका साथ।

न हो   निराशा   लेश भी,सदा  उच्च रख माथ।।

सदा   उच्च   रख   माथ,  निरंतर बढ़ती जाती।

करती   पंथ     प्रशस्त,    हंसिनी-सी   मुस्काती।।

'शुभम्'  न  कोई दोष, किसी के सिर पर मढ़ती।

तप   में     रहती   लीन,  शृंग के ऊपर  चढ़ती।।


                          -5-

कछुआ   सँग   खरगोश की,दौड़  न भूले लोग।

आशा   में  कछुआ  रहा,   न   था निराशा-रोग।।

न था   निराशा-रोग,शशक  तरुवर तल सोया।

हार    गया   वह   दौड़, अंत    में   भारी रोया।

'शुभम्' न   हुआ निराश,सदा आशा का सतुआ।

पिया करे   रस  घोल, चला ज्यों पथ में कछुआ।।

शुभमस्तु,


18.09.2026◆5.45 आ०मा०

                     ◆●◆

सीख' [ अतुकांतिका ]

 290/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कितनी ही 

दुर्विनीता माताओं ने

अपनी ही 

जायाओं के

अपनी 'सीख'  से

घर बर्बाद किए हैं,

दोष सासों पर

मढ़ा गया

और मूर्खा 

बेटियों ने

अपने ही हाथ

आग में 

झुलसा लिए हैं।


पति और सास से

भिड़वाया

मोबाइल पर

संदेश भिजवाया

कोई काम 

मत करना,

कुछ भी कहे

अगर सास- ननद

तो एक की

चालीस कहना,

पीछे मत रहना।


जलती हुई आग में

एक चिनगी ने

बड़ा काम किया,

पति-गृह को उजाड़ कर

सास-ननद को 

बदनाम किया,

जबकि चाबी 

कहीं और से ही

भरी गई,

नई बनी गृहस्थी

माँ के हाथों

उजाड़ी गई।


एक नहीं

हजारों निदर्शन 

विद्यमान हैं,

जहाँ माताएँ ही

बेटियों की दुश्मन हैं

कमान हैं,

पर मूर्खाओं को

कोई समझा भी 

तो नहीं सकता।


शुभमस्तु,


18.09.2026◆5.15आ०मा०

                   ◆●◆

गुरुवार, 17 सितंबर 2026

पेट की ये आग [ गीत ]

 289/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पेट की ये आग

करा लेती है

करतब  कितने-कितने!


देखने वाले

अंगुलियाँ दबा लें 

दाँतों के तले

है नहीं 

कोई घर बार

सब छोड़ चले

बाँध कर नजरें

खड़े हैं

भीड़ में इतने-इतने।


जान की परवाह बिना

पटरे पर चलना

नर्तित होना

सहज नहीं है

ये काम

हँसना -रोना

सोच लेते हैं

ये दर्शकगण

उनके फ़ितने।


आदमी तो आदमी

कम नहीं है

औरत कोई

ज़िंदगी में

कर गुज़रने की

जगी हिम्मत खोई

देह के कमाल

दिखला के

रहते जितने।


शुभमस्तु,


15.09.2026◆3.450 प०मा०

                  ◆●◆

चलता पथ में सँभल-सँभल कर [ गीतिका ]

 288/2026





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलता पथ में सँभल-सँभल कर।

लगता  किंचित नहीं   उसे  डर।।


डूब  गया    है   घट    पानी   में,

क्षण भर  में   वह  जाता है भर।


मेला    लगा    भीड़    है   भारी,

सहस-सहस  मिलते  नारी-नर।


पावस  लगा     भेक   करते  हैं,

दिवस-रात   में   मीठी   टर-टर।


अमराई     में      तेज     हवाएँ,

करती  रहतीं  सर-सर   मर-मर।


रहता  दुखी     सदा   वह  प्राणी,

अन्य जीव   के   रहता     ऊपर।


'शुभम्'  देह    पर  चढ़ा  बुढ़ापा,

अंग-अंग   होता   नित   जर्जर।


शुभमस्तु,


14.09.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆●◆

डूब गया है घट पानी में [ सजल ]

 287/2026



समांत          : अर

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       : 16.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलता पथ में सँभल-सँभल कर।

लगता  किंचित नहीं   उसे  डर।।


डूब  गया    है   घट    पानी   में।

क्षण भर  में   वह  जाता है भर।।


मेला    लगा    भीड़    है   भारी।

सहस-सहस  मिलते  नारी-नर।।


पावस  लगा     भेक   करते  हैं।

दिवस-रात   में   मीठी   टर-टर।।


अमराई     में      तेज     हवाएँ।

करती  रहतीं  सर-सर   मर-मर।।


रहता  दुखी     सदा   वह  प्राणी।

अन्य जीव   के   रहता     ऊपर।।


'शुभम्'  देह    पर  चढ़ा  बुढ़ापा।

अंग-अंग   होता   नित   जर्जर।।


शुभमस्तु,


14.09.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆●◆

कपड़ा एक न पास में [ दोहा ]

 286/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप ' शुभम्'


जिस   पर   जो   होता नहीं, रहे उसी की माँग।

फटी  जींस   में   झाँकती,    रहतीं   दोनों टाँग।।

कपड़ा    एक   न   पास   में,मुझे   नहीं मालूम।

पहनूँ   क्या   तुम   ही  कहो,बनो न बालम सूम।।


भरी हुई  अलमारियाँ,  फिर भी वस्त्र-अभाव।

औरत  को  खलता रहे, डगमग घर की नाव।।

हर अवसर की साड़ियाँ, अलग रहें दस- बीस।

शादी  सोहर   की अलग, महँगी   और नफ़ीस।।


यदि   साड़ी   लाए  नहीं, रूठ गई घर- नार।

खटपाटी   लेकर   पड़ी, बदल गया आचार।।

नव-नव साड़ी में बसे, नित्य नारि की जान।

शांति ग्रहों की  चाहिए, लेना तिय पहचान ।।


सक्षम   भले न आदमी,फिर भी करे खरीद।

भरी   रहें घर  साड़ियाँ, जिद में खोए नींद।।

देख पड़ौसिन के यहाँ,  नवल साड़ियाँ चार।

घर आई बदला हुआ, प्रियतम से व्यवहार।।


एक   पेंट   टी-शर्ट में,   काट  रहा पति साल।

पर   पत्नी   की साड़ियाँ, बनतीं   नई मिसाल।।

हों हज़ार घर साड़ियाँ, फिर भी सदा अभाव।

ले   उधार  ऋण  में दबे,  पति  की डूबे नाव।।


घर-घर की यह बात है,सत्य 'शुभम्' की खोज।

उसे   न   पल   को चूकना,महके  सुमन सरोज।।


शुभमस्तु,


13.09.2026◆4.30 प०मा०

                ◆●◆

शनिवार, 12 सितंबर 2026

हिंदी गौरव [ गीत ]

 285/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हिंदी गौरव

सौरभ हिंदी

हिंदी है भारत की प्राण।


माँ के पहले बोल

इसी हिंदी से

जुबाँ बोल पाई

रोटी दूध

नीर की वाणी

हिंदी ने ही बुलवाई

हिंदी से ही जीवन मेरा

हिंदी है 

जीवन का त्राण।


सूर कबीर 

संत तुलसी ने 

हिंदी में वह नाम लिखा

अमर हो गई

मीराबाई

बार-बार हरि नाम सिखा

हिंदी के तरकस में

अनगिन 

घुसे हुए हैं सुमधुर बाण।


संस्कृत सुता

सलौनी हिंदी

इसका है अपना विज्ञान

भारत के

कण-कण में व्यापे

तना जीभ पर एक वितान

मिसरी घुली हुई 

रसना में

लगती है ज्यों रिसती खाण।


आओ हम

अपनाएँ हिंदी

रचनाकार गा रहे गीत

लिखते काव्य

कथाएँ अनुपम

बनी हुई है दुनिया मीत

शब्द -शब्द कसकर

तो देखो

हिंदी की है विस्तृत शाण।


शुभमस्तु,


12.09.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆●◆

व्यायाम [ कुंडलिया ]

 284/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता   है  व्यायाम   जो,   रहता  वह नीरोग।

पड़े-पड़े   सोता   रहे,  करे    देह-सुख भोग।।

करे   देह-सुख  भोग,  रुग्ण  वह रहता भारी।

निष्क्रिय होता   गात,देह   की   होती ख्वारी।।

'शुभम्' आयु  हो न्यून,अल्प वय में वह मरता।

करे देह   व्यायाम, सभी  जीवन  सुख करता।।


                          -2-

मानव   के   तन  के   लिए, सुखकारी व्यायाम।

ज्यों   मछली   जल  में   करे,  तैर-तैर विश्राम।

तैर -तैर     विश्राम ,  एक  पल थिर कब होती।

गहराई   में   खोज ,   रही   है   प्रतिपल मोती।।

'शुभम्'  देह की चाल, दिया करती नित आसव।

कर- कर के व्यायाम, बनें सब सुखमय मानव।।


                          -3-

तेरा तन  दुखमुक्त  हो, करना नित व्यायाम।

गाय भैंस बकरी सभी, देखें  सुबह न शाम।।

देखें   सुबह   न   शाम,देह के आसन करते।

चलते   हैं   दिन-रात, पेट  श्रम करके भरते।।

'शुभम्' बनें  गतिशील,बना मत तन का घेरा।

स्वस्थ  रहे यह   गात, सभी सुख होगा  तेरा।।


                         -4-

डाली हिलती आम की,हिल-हिल कर व्यायाम।

टोह   लगाती   देह   की,सुबह  न  देखे शाम।।

सुबह   न   देखे   शाम, मौत  जड़ता  में होती।

हिले   पवन   के   संग, नहीं   रजनी भर सोती।।

'शुभम्'  रहे  गतिवान, नित्य हो धवल दिवाली।

चर-चर की  ध्वनि  तेज,करे   तरुवर की डाली।।


                         -5-

पानी   भी   तालाब का, हो  जाता जब शांत।

करे नहीं व्यायाम तो,बने  थकित तन क्लांत।।

बने थकित   तन क्लांत, सड़न ही पैदा होती।

मानव   की   यह   देह,बिना श्रम रहती रोती।।

'शुभम्' करें  व्यायाम, करें  कुछ खींचा तानी।

तन   हो ऊर्जावान, सड़े   क्यों तन का पानी।।


शुभमस्तु,


11.9.2026◆11.00आ०मा०

                   ◆●◆

हरियाये धानों से खेत [ गीत ]

 283/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भरा ताल

खेतों में पानी

हरियाये धानों से खेत।


ले कागज की नाव

चलाते

हँस-हँस मगन मृदुल मुख नैन

भरे लबालब

ताल तलैया

मिला बालकों को सुख चैन

कोई झूले

झुकी डाल पर

खिल-खिल करते वे समवेत।


नहीं बालकों को

कुछ चिंता

रंग -बिरंगे धर परिधान

भेदभाव तज

सभी खेलते

जीवन के कल से अनजान

कीचड़ माटी में भी

सनते

कभी तपाती सूखी रेत।


चरें मेड़ पर

गैया बछिया

पास कहीं है उनका गाँव

रौनक से परिवेश 

महकता

कहीं पेड़ बरगद की छाँव

नहीं भूत से

वे डरते हैं

नहीं दिखे उनको जिन-प्रेत।


शुभमस्तु,


09.09.2026◆4.15 प०मा०

               ◆●◆

देह रोग से ग्रस्त है [ दोहा गीतिका ]

 282/2026

         

         



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह   रोग   से   ग्रस्त है,बिगड़   गया  है हाल।

लिखना-पढ़ना रुक गया,औषधियाँ हैं ढाल।।


पत्नी   सेवा   में   लगी,व्यस्त रहे दिन -रात,

दूध   कभी   फल  दे रही,बदल रही है चाल।


बुरे   समय   में साथ  हो, अपना   कोई एक,

मन में   तब   धीरज रहे,चमकें अँखियाँ गाल।


पत्नी   ही   देवी   करे,दिन    भर   सेवा खूब,

रुग्ण  देह  ऐसी   हुई,समय  बड़ा विकराल।


प्रभु जी    का   वरदान   ये,पत्नी   मेरी नेक,

उसके ही कारण जले,जीवन-ज्योति मशाल।


जीवन  में   सौभाग्य   है,  रमा   रूप   सन्नारि,

तितली-सी नर्तन करे,  लगती  कभी मृणाल।


'शुभम्' सुलभ होतीं नहीं,पत्नी    सबको श्रेष्ठ,

बड़भागी   वे लोग हैं,जिन   पर   राम कृपाल।

शुभमस्तु,


07.09.2026◆5.30 आ०मा०

                    ◆●◆

लिखना -पढ़ना रुक गया [ सजल ]

 281/2026

         


समांत          : आल

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह   रोग   से   ग्रस्त है,बिगड़   गया  है हाल।

लिखना-पढ़ना रुक गया,औषधियाँ हैं ढाल।।


पत्नी   सेवा   में   लगी,व्यस्त रहे दिन -रात।

दूध   कभी   फल  दे रही,बदल रही है चाल।।


बुरे   समय   में साथ  हो, अपना   कोई एक।

मन में   तब   धीरज रहे,चमकें अँखियाँ गाल।।


पत्नी   ही   देवी   करे,दिन    भर   सेवा खूब।

रुग्ण  देह  ऐसी   हुई,समय  बड़ा विकराल।।


प्रभु जी    का   वरदान   ये,पत्नी   मेरी नेक।

उसके ही कारण जले,जीवन-ज्योति मशाल।।


जीवन  में   सौभाग्य   है,  रमा   रूप   सन्नारि।

तितली-सी नर्तन करे,  लगती  कभी मृणाल।।


'शुभम्' सुलभ होतीं नहीं,पत्नी    सबको श्रेष्ठ।

बड़भागी   वे लोग हैं,जिन   पर   राम कृपाल।।

शुभमस्तु,


07.09.2026◆5.30 आ०मा०

                    ◆●◆

'यतो धर्मस्ततो जय:' [ अतुकांतिका ]

 280/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'यतो धर्मस्ततो जय:'

संदेश देने वाले

देवकी नंदन

लीलावतारी

कृष्णमुरारी

कान्हा का

अवतरण दिवस आया,

दिशा -दिशा में

जड़ -चेतन में

आनंद छाया।


जन्मते नहीं भगवान

किसी माँ की कोख से

वे प्रकट होते हैं

और अपनी लीलाओं से

जन- जन का

 मन मोह लेते हैं।


अज्ञानी हैं वे लोग 

जो भगवान को

जाति के बंधन में ग्रसते हैं,

ऐसे ही मूढ़ जनों पर

कान्हा आज हँसते हैं,

वे परम आत्मा हैं

परमात्मा हैं,

अहीर या ठाकुर नहीं,

मूढ़ों के मगज में

रूढ़ियों की नालियाँ बही।


आदमी पक्षपाती है

स्वार्थी है,

उत्पाती है

सदा घाती है,

मत करना उससे

न्याय की आशा,

सत्य को ढूंढना 

होगी बहुत बड़ी दुराशा।


आईए आज

उन महान संदेशदाता

 श्रीकृष्ण की

अवतरणी मनाएँ,

उनके संदेश को अंगीकृत कर

भटके हुए मन -मष्तिष्क को

सु दिशा प्रदान कराएँ।


शुभमस्तु,


04.09.2026◆5.00आ०मा०

                   ◆●◆

सोमवार, 31 अगस्त 2026

बदल रहा है देश [ छंद: अहीर ]

 279/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बदल       रहा       है    देश।

बढ़ता       नित        विद्वेष।।

पनप     रहे        हैं     साँप।

लिया  जनों     को     चाँप।।


आस्तीन           के        नाग।

लगा     रहे         हैं     आग।।

जनता         सब        बेहाल।

खड़ा    शीश     पर    काल।।


नेताओं          को           वोट।

सदा          चाहिए         ओट।।

झोंक     देश     को      भाड़।

बने      पेड़          वे     ताड़।।


फूट        डालकर        राज।

शीश        सजाते       ताज।।

अगड़ा        पिछड़ा      भेद।

बढ़ा       रहे        वे     छेद।।


थैली          सबकी       एक।

दलदल    में      सब     नेक।।

मत        करना       विश्वास।

नेतागण          से      आश।।


एक      सभी      की     चाह।

अलग     भले     हों      राह।।

कुर्सी          पर        आसीन।

कभी  न     हों      वे     दीन।।


'शुभम्'     वोट     की     चोट।

करते             लूट - खसोट।।

कैसे        मिले         उजास।

अँधियारे       जब      पास।।


शुभमस्तु,


31.08.2026◆10.30आ०मा०

                    ◆●◆

डर [ चौपाई ]

 278/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


डर-डर कर  डर  में  क्या  जीना!

हरित हलाहल हँस-हँस   पीना।।

बिना  डरे   जो  जग   में   जीता।

विदा न   होता  जग   से   रीता।।


डर   से   तव   विवेक मर जाता।

विधिवत  काम  नहीं कर पाता।।

शंकाग्रस्त   अभय    खो    देता।

गलत  पंथ वह    अपना   लेता।।


डर है   निज   मन  की  दुर्बलता।

पछताए  अपने   कर    मलता।।

डर  से   काम    बिगड़ते    सारे।

दिन में    भी    दिख जाते  तारे।।


संतति  को  जो    मातु   डराती।

उसका  पथ  अवरुद्ध   कराती।।

सिंह   शावकों    से   जो   खेला।

वही भरत   था   नाम   अकेला।।


निर्भय  राम     गए  वन    माँही।

नहीं  उन्हें थी डर     की  छांही।।

हनुमत जी  का  मिला    सहारा।

निडर   हुआ  वानर  दल  सारा।।


नहीं  पाक    से   हमको   डरना।

सावधान  स्वच्छन्द     विचरना।।

डरने   से     दुर्बल    हम    होते।

मुख   ढँक   आस्तीन   से  रोते।।


'शुभम्'  निडर रह  जीना   सीखें।

विपदाएँ  फिर एक    न   दीखें।।

ऐसा        भारतवर्ष       बनाएँ।

मन से    हर डर    दूर    भगाएँ।।


शुभमस्तु,


31.08.2026◆5.30 आ०मा०

                   ◆●◆

छिद्र ढूँढ़ता ही रहा [दोहा गीतिका ]

 277/2026


               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब,

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार,

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम,

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार,

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत,

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर,

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

मानव वह किस काम का [सजल]

 276/2026


       

समांत          : आज

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       : 24.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब।

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार।

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम।

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार।

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत।

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर।

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

हम सभी जागें [ अतुकांतिका ]

 275/2026


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संस्कृति पर ही खतरा है

तो संस्कृत बचे कैसे,

दीमक लग गया है जड़ों में

देश खोखला हो रहा है

दिन -रात।


सौगन्ध उठा रखी है जिसने

देश को बरबाद करने की

सभी जानते हैं उसे

कॉकरोचों का सरदार वही।


देश का दुर्भाग्य यही

लोग आँखों पर

पट्टियां बाँधे चल रहे

उसके पीछे-पीछे

अपने हिए की भी मींचे।


कुकुरमुत्ते उग आए हैं

विदेशी यहाँ पेड़ों पर

उन्हें समूचा कुचलना ही है

ऐ भारतीयो ! जाग जाओ

सामर्थ्य वह जटाओ 

कि सपोलों को मिटा पाओ।


आग लगी है चारों ओर

विरोध के लिए

 विरोध करना है,

उनके बाप का 

जाता ही क्या है?

यहीं का खाना है

यहीं पर पलना है

और यही पर मरना है,

पर तिरंगे के नाम पर

बेड़ा यहीं का गर्क करना है।


हम सभी जागें

सपोलें कुचलें,

वे भागें ,

आस्तीन से निकालें 

नहीं अनुरागें,

चौंसठ घड़ी 

इन्हें त्यागें,

तभी देश बचेगा,

पहले देश 

और सब कुछ बाद में।


शुभमस्तु,


28.08.2026 ◆7.00 आ०मा०

             ◆●◆

माटी के चूल्हे की बात [ गीत ]

 274/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बीते हुए

दिनों की यादें

माटी के चूल्हे की बात।


भुला नहीं पाए

हम अब भी

गर्म -गर्म रोटी का स्वाद

कढ़ी

खरी रोटियाँ सिंकी वे

आती है रह-रहकर याद

लकड़ी सुलग रही

दे लपटें

लाल-लाल चिनगी बरसात।


चूल्हे के ढिंग

बैठ पूस में

हाथ-पाँव हम सेंक रहे

चुपड़ी रोटी

स्वाद ले रहे

घोल अपूपी   फेंट   रहे

बोरी बिछा

पालथी मारे

करते भोजन प्रातः- रात।


गोबर के 

उपले जब सुलगें

चट-चट लकड़ी चटके आँच

नहीं एक-दो

मन से खाते

रोटी सात -सात या पाँच

आलू भून 

बनाएँ भुर्ता

सिंकता जाए शीतल गात।


शुभमस्तु,


25.08.2026◆ 5.30 आ०मा०

                 ◆●◆

सोमवार, 24 अगस्त 2026

प्रश्न [ चौपाई ]

 273/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रश्नों     का    सागर    उमड़ाया।

समाधान    क्या  कोई   पाया??

रिक्त   एक    स्थान     नहीं    है।

प्रश्नों  की   नित बाढ़   बही   है।।


देख  प्रश्न     त्यौरी    चढ़   जाए।

सहज  समझ   कोई कब  पाए।।

टेढ़ी  खीर    प्रश्न    हल   करना।

जीते जी कुछ जन   का  मरना।।


जीवन  जटिल  प्रश्न हल  कर लें।

यथाशक्य निज  घट को भर लें।।

समाधान   जो    उनका   करता।

रिक्त घड़े   को   जल  से भरता।।


देख   प्रश्न    जो   खुश हो  जाए।

वही सहज   हल   उनका  पाए।।

प्रश्न     देश    के    लिए   बड़े हैं।

हल करने   को   सभी  खड़े  हैं।।


प्रश्नों  का     सटीक    हो   उत्तर।

नहीं  तीस का  लिखना   सत्तर।।

जस का  तस   हो  सीधा  उत्तर।

बारह का   मत   करो   बहत्तर।।


प्रतियोगिता     निरंतर    चलती।

वस्तुनिष्ठ   की  छलना  छलती।।

सहज नहीं विकल्प का   चुनना।

टूटी    खाट   पलों    में  बुनना।।


'शुभम्' प्रश्न    से    मत घबराना।

पाहन     से    लहरें    टकराना।।

आओ    अपने     भीतर    पाएँ।

समाधान    प्रश्नों     के     लाएँ।।


शुभमस्तु,


24.08.2026◆10.30 आ०मा०

                ◆●◆

जाति-भेद अलगाव से [ दोहा गीतिका ]

 272/2026


          



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक,

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग,

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद,

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार,

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट,

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल,

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

एक राष्ट्र ध्वज एक ही [ सजल ]

 271/2026


        

समांत           : आन

पदांत            :अपदांत

मात्राभार        :24

मात्रा पतन       : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक।

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग।

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद।

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार।

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट।

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल।

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...