शनिवार, 16 मई 2026

राज नीति [अतुकांतिका ]

 164/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'राज' की 'नीति' है

अथवा

'नीति' का 'राज' है ?

इसी बात को समझ लेना

राज की बात है!

(जहाँ नैतिकता नहीं

वहाँ नीति कैसी?

वह नीति कैसी?)


सबने इसे बुरा कहा

पर मन से खूब चाहा,

काश कहीं मिल जाती

तो बिना कुछ किए ही

करोड़ों करोड़ की

लॉटरी लग जाती।


हर जगह घुसी पड़ी है

तिरछी होकर अड़ी है

बिना मूल की जड़ी है

स्व चरित्र में 

भले ही सड़ी है,

नाकों तक 

बदबू में गड़ी है।


चोरी का गुड़

किसको नहीं भाता

घर बार को महकाता,

थोड़ी तिकड़में चाहिए

तालाब में तैरने के लिए

हाथ-पैर भी चलाने पड़ते हैं।


देश को चरित्र नहीं

राजनीति चलाती है,

कौन पूछता है चरित्र

कुछ भी करो,

कुछ भी कहो,

कौन किसकी

जुबान पकड़ पाता है !


सोना हो कि चाँदी

सब जगह इसकी चाँदी

पैट्रोल या डीजल

रसोईघर या ह्वीकल

सबकी हवा निकाल दी।


ये देश उनकी इच्छा से चलता है

जो स्वकर्म से इसे छलता है,

अपनी बात कहना देशद्रोह है

राजनीति अनचाहे ही

चिपकी हुई गोह है।


 भगवान समझने लगा है नेता

स्वयं विदेश में जा अंडे सेता

स्व घोषित भगवान है,

रहा नहीं वह इंसान है

फिर इंसानित कहाँ से आए!

चील के घोंसले में सेव कहाँ ?

राजनीति में सत्यमेव कहाँ?


शुभमस्तु,


15.05.2026◆7.30 आ०मा०

                    ◆◆◆

चरित्र [अतुकांतिका ]

 163/2026


                    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मुखौटे का पता लगा

मुखौटा उतर जाने के बाद

यथार्थ उजागर हुआ,

होना ही था

अंततः वही हुआ।


अँधेरे की भी

अपनी एक सीमा है

उसे हटना ही पड़ता है

दूध का दूध 

पानी का पानी 

हो ही जाता है।


कहाँ नहीं हैं बहुरूपिए

छलते हुए इसे उसे

सर्प विष ही उगलता है

उसकी इसी में सफलता है।


शरीर आदमी का है

तो क्या है !

शेर की खाल ओढ़े

भेड़िए अनगिनत यहाँ,

क्या समाज !

क्या धर्म!

क्या राजनीति!

कोई क्षेत्र रिक्त नहीं,

एक ढूंढ़ो हजार 

हाज़िर हैं।


गहरी हैं जड़ें

भ्रष्टाचार की

रक्त की हर बूँद में

भरा हुआ है,

कौन है शेष 

जिसका मुँह

दूध से धुला हुआ है।


शुभमस्तु,


15.05.2026◆7.00आ०मा०

                 ◆◆◆

मुँह बाए प्यासी है धरती [ गीत ]

 162/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मुँह बाए 

प्यासी है धरती

करे मेघ की आस।


तपता सूरज

जेठ मास में

सूख रहे द्रुम-बेल

त्राहि-त्राहि 

मच रही धरा पर

जीव रहे सब झेल

घुटन हो रही

चलतीं लूएँ

कठिन श्वास- प्रश्वास।


सघन हरी थी

घास जहाँ पर

वहाँ उड़ रही रेत

भांय-भांय 

कर रही तप्त लू

तनिक नहीं है चेत

बहता स्वेद

देह से भारी

नेंक न आए रास।


तप का फल

अषाढ़-सावन में

जब मिलता है मित्र

तृप्त धरा होती

सुख पाती

तब बदले हर चित्र

दिखता है 

किसान के घर में

हर दिन नया उजास।


शुभमस्तु,


12.05.2026◆4.30आ०मा०

                    ◆◆◆

बंदरिया के बच्चे नटखट [ बालगीत ]

 161/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बंदरिया     के    बच्चे      नटखट।

करते     ही    रहते   हैं   खटपट।।


धमाचौकड़ी  छत      पर    करते।

नहीं    कभी     गिरने    से  डरते।।

उछलकूद  वे       करते    झटपट।

बंदरिया   के    बच्चे       नटखट।।


नोंच     डालते      फूल     हमारे।

गमलों     में   जो   खिलते  प्यारे।।

ईंट   गिराते      नीचे     भटभट।।

बंदरिया    के     बच्चे     नटखट।।


खुला     रसोईघर    रह    जाता।

बंदर - दल     उतपात   मचाता।।

धूमधड़ाका     करते     फटफट।

बंदरिया  के      बच्चे     नटखट।।


सब्जी  -  एक  न    छोड़ें     केला।

वानर-दल    का    जुटता   मेला।।

खा जाते       फैलाते        चटपट।

बंदरिया    के     बच्चे      नटखट।।


नहीं     सूखने       देते      कपड़े।

कभी  फाड़ते     करते     लफड़े।।

डंडा   देख      भागते      सरपट।

बंदरिया  के      बच्चे     नटखट।।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆11.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

अम्मा रोटी गोल बनाती [ बालगीत ]



160/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अम्मा     रोटी      गोल     बनाती ।

दाल -  भात   के   संग  खिलाती।।


गोबर   के     उपले     जलते    हैं।

साँझ    हुई    सूरज     ढलते   हैं।।

चूल्हे      में    माँ    आग  जलाती।

अम्मा   रोटी      गोल      बनाती।।


कभी     हरी     तरकारी     रांधे।

भैंस    कभी     खूँटे  पर    बाँधे।।

छत   पर  धनिया     हरा  उगाती।

अम्मा  रोटी      गोल      बनाती।।


उठे     भोर     में     पीसे   चाकी।

व्यस्त रात -दिन   काम न  बाकी।।

हर पल    फिर    भी  माँ मुस्काती।

अम्मा  रोटी      गोल       बनाती।।


गाढ़ा-गाढ़ा        दही       जमाए।

दही  मथे     फिर   छाछ  बनाए।।

लवनी      सुघर     श्वेत  उतराती।

अम्मा     रोटी      गोल    बनाती।।


जब  पापा जी    घर    पर   आएँ।

अम्मा   उनको    भोजन     लाएँ।।

पंखा झलती      उन्हें     जिमाती।

अम्मा    रोटी      गोल     बनाती।।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆10.30 आ०मा०

                  ◆◆◆

[11:31 am, 11/5/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

जन चरित्र में हो यदि दृढ़ता [ गीतिका ]

 159/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जन-चरित्र     में    शुभ    दृढ़ता  हो।

मन    में  सबके      नैतिकता      हो।।


राष्ट्रभक्ति    कुछ    सरल   नहीं   है,

जन- जन के  प्रति शुभ   समता हो।


जननायक     से      यही    अपेक्षा,

बिना भेद    ही    तम    हरता हो।


हरा  - भरा    हो       देश     हमारा,

सघन  द्रुमों     के    साथ   लता हो।


नर -नारी     सब     रहें     मेल   से,

सबको  निज     कर्तव्य    पता   हो।


सबका   हो    कल्याण    धरा   पर,

दुष्कर्मों     को    सदा      धता   हो।


'शुभम्' समर्पण   रहे   देश     हित,

नहीं    पड़ोसी    भी    चुभता   हो।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆6.30आ०मा०

                   ◆◆◆

जननायक से यही अपेक्षा [ सजल ]

 158/2026


  

सामांत          : अता

पदांत            : हो

मात्राभार        : 16

मात्रा पतन      : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जन  - चरित्र    में     शुभ  दृढ़ता  हो।

मन    में    सबके       नैतिकता    हो।।


राष्ट्रभक्ति    कुछ    सरल   नहीं   है।

जन- जन के  प्रति शुभ समता हो।।


जननायक    से     सुखद   अपेक्षा।

बिना भेद    ही    तम      हरता हो।।


हरा-भरा       हो       देश      हमारा।

सघन  द्रुमों    के    साथ   लता हो।।


नर -नारी     सब    रहें     मेल   से।

सबको  निज     कर्तव्य    पता हो।।


सबका   हो    कल्याण   धरा   पर।

दुष्कर्मों     को    सदा    धता   हो।।


'शुभम्' समर्पण   रहे   देश     हित।

नहीं      पड़ोसी    भी   चुभता   हो।।


शुभमस्तु,


11.05.2026◆6.30आ०मा०

                   ◆◆◆

माँ [गीतिका]

 157/2026


               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्रम   से   नहीं     उबरती  माँ।

हर पल    उद्यम     करती  माँ।।


निज   संतति   की   ईश्वर   जो,

नहीं  किसी     से   डरती   माँ।


पुत्री-पुत्र         प्रसविनी       है,

उदर -  कुक्षि     में   धरती   माँ।


माँ  ममता       की     सुरसरिता,

पाप- ताप    सब    हरती     माँ।


आँचल  माँ  का    वट  की छाँव,

दुःख - दारिद   को   छरती   माँ।


उसे   न   कुछ   भी    दुर्लभ   है,

धन -धान्यों    से    भरती     माँ।


'शुभम्'  उऋण  होगा  न   कभी,

उर    में    सदा    विचरती    माँ।


शुभमस्तु,


10.05.2026◆12.45 प०मा०

                    ◆◆◆

मरीचिका [ अतुकांतिका ]

 156/2026


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ममता मोह की मरीचिका

इतनी भी अच्छी नहीं 

कि सत्य का गला घोंट दें

नैतिकता को तिलांजलि देकर

सदाचरण को छोड़ दें।


न पंचों की मानूँगी

बस रार ही ठानूँगी

अपने विगत किए धरे पर

हार नहीं मानूँगी

कुर्सी मेरी बपौती है

शांति तहस-नहस कर डालूँगी।


खूँटा वहीं पर गड़ेगा

करूँगी वही जो 

मेरा मन जिद करेगा

आखिर तो एक

जिद्दी  नारी हूँ

सचल बीमारी हूँ।


सब गलत हैं

सही तो बस एक मैं

करती रहूँगी

इसी तरह चिल्ल पों

खों खों खों खों खों

झों झों झों झों झों।


हारी नहीं हूँ मैं

हराया गया है

शक्ति के अंचल में

डराया गया है

हार नहीं मानूँगी।


नारी हठ

राज हठ

दोनों ही हैं मेरे पास

लड़कर ले लूँगी

इसका है विश्वास,

फैलता है तो फैलता रहे

रायता इस देश में,

करेला 

फिर नीम चढ़ा।


शुभमस्तु,


08.05.2026◆ 5.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

मन में स्रोत अकूत [ कुंडलिया ]

 155/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

खिलता-मुंदता   आदमी,मुख -दर्पण में रूप।

दिखता है पल  एक  में, यद्यपि  हो नर भूप।।

यद्यपि  हो  नर  भूप,  खिलाए   या मुरझाए।

मन का ही यह काम,हर्ष की कली खिलाए।।

'शुभम्' न  होता  दृष्ट,दृष्टि में हर पल मिलता।

तन के   हर्ष-विषाद, सभी  में मन ही खिलता।।


                         -2-

करता  मन   मनमानियाँ,  गहे  हाथ  में रास।

इच्छा से उसकी  चले,  जीव- जंतु की श्वास।।

जीव-जंतु की  श्वास, अटल साम्राज्य बसाया।

चले न मुख में ग्रास,जदपि   तन  भूखा पाया।।

'शुभम्' अश्व की रास,थाम निज पंथ विचरता।

मन के ही  नर  दास,वही  सब  करनी करता।।


                         -3-

लगती लौ जिस काम में, मन में  लगन   अपार।

गति   में   सबसे  तेज  है, वाहन  भले   हजार।।

वाहन     भले    हजार,  न   उड़ता  इतना कोई।

यद्यपि   बड़े  विमान,   सभी   ने  समता   खोई।।

'शुभम्' सकल जंजाल,त्याग कर प्रभु की भगती।

मन   की  दिशा   संभाल,चेतना  शुभ में  लगती।।


                           -4-

कविता  की  उद्भावना,  मन  से उपजी  पौध।

छाई   है   साहित्य   में,   बने   हुए  बहु सौध।।

बने   हुए     बहु    सौध, ग्रंथ   रामायण भारी।

महाकाव्य  न्यग्रोध ,खिले कवि की उजियारी।।

'शुभम्'   वहाँ पर   दौड़, नहीं जाए जहं सविता।

किसलय कवि के दिव्य,उग रही मन से कविता।।


                          -5-

मानव   के  विज्ञान  का, मन में स्रोत अकूत।

पंच तत्त्व  के  बीच में, उगे   सूक्ष्मतम सूत।।

उगे  सूक्ष्मतम  सूत,चंद्र  की   यात्रा करता।

मन   से    ही   उद्भूत,नहीं  मरने  से डरता।।

'शुभम्' जानता कौन,कभी बन जाए दानव।

मन का ही   सब खेल, मनुजता देती मानव।।


शुभमस्तु,


07.05.2026◆8.30 प०मा०

                    ◆◆◆

लाज करें सब जेठ की [ दोहा ]

 154/2026



        [ जेठ,गर्मी,भीषण,पारा ,लू ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

    

              सब में एक

लाज करें सब जेठ की,चलें राह कच खोल।

अवगुंठित हैं  नारियाँ, बढ़ती  तपन अतोल।।

लुएँ  चलें  जब  जेठ में,टपक  रहें  हैं आम।

अमराई  आबाद   है,  ग्रीष्म  हुआ  बदनाम।।


शीतकाल  मधुमास   के,  चार   मास उपरांत।

तपती  गर्मी  आ  गई, जीव   जगत आक्रांत।।

फालसेव   तरबूज   की, ऋतु गर्मी  की व्यग्र।

महक  रहे  खरबूज   भी,  चहके  आम समग्र।।


ताप   बढ़ा  जब भानु का, भीषण धूप प्रकोप।

ताल-तलैया      सूखते,   धरणी    पर आरोप।।

भीषण भय  भवितव्यता,जान सका है  कौन।

निज  कर्मों  में   लीन  हैं,जीभ  सभी  की मौन।।


ज्यों-ज्यों  चढ़ता  ताप है,  पारा चढ़े  अपार।

जेठ मास  की  उग्रता,  किंचित  नहीं   उदार।।

उचित   नहीं  पारा  चढ़े, ऊपर- ऊपर नित्य।

स्वस्थ  नहीं  मानव रहे,  अस्वीकृत औचित्य।।


बालक घर  रुकते नहीं, लू  का बढ़ा प्रकोप।

गलियों में  दौड़ें  सभी,झुलस गई मुख ओप।।

पना  आम  का  पीजिए,लू का यह उपचार।

कपड़ा बाँधें शीश पर,तन का ताप निवार।।


             एक में सब

गर्मी भीषण जेठ की,लू का अति संचार।

दिन प्रति दिन पारा चढ़े,एक नहीं उपचार।।


शुभमस्तु,


06.05.2026◆12.15प०मा०

                 ◆◆◆

स्वेद श्रमिक का जब-जब बहता [ गीत ]

 153/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


स्वेद श्रमिक का

जब -जब बहता

बहे श्रमज सुरसरिता।


ऊँचे-ऊँचे

भवन अटारी

श्रम से निशिदिन बनते

बहे किसी का

स्वेद देह से

सबके सपने सजते

मोल मिले

श्रमिकों को अपना

जीवन हो शुभ चरिता।


श्रमिक 

विश्वकर्मा धरती पर

करते हर निर्माण

करता कौन

बिना श्रमिकों के

मानवता का त्राण

दो रोटी के लिए

खट रहे

बने हुए दुख हरिता।


सृजनों का संसार

इन्हीं के 

हाथों से गढ़ पाया

महलों का सुख

उस निर्धन के

सपनों से नियराया

जब सुगंध

स्वेदों से निकले

रहे न उर में अरिता।


शुभमस्तु,


05.05.2026◆6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

छाँव ढूँढ़ती छाँव [ दोहा गीतिका ]

 152/2026


            


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भानु  -  ताप  बढ़ने  लगा,करता जेठ धमाल।

लुएँ    चलें  तपती  हुईं,  सर   में   उठे उबाल।।


छाँव  ढूँढ़ती  छाँव  को, पाँव  कहें चल तेज 

अंबर  में जलने  लगीं,रवि  की   तेज मशाल।


प्यासे-प्यासे    गाँव   हैं,  नगर गली  हैं सन्न,

विदा हुआ    मधुमास भी,रज का उड़े गुलाल।


चलती   थीं  सिर   खोलकर,हैं  घूँघट  के बीच,

वे      अधनंगी  नारियाँ,  चलें   दुल्हनी चाल।


वट   पीपल   के  लाल हैं,  पतले-पतले होंठ,

मुरझाए   हैं     धूप   में,  बालाओं   के  गाल।


खरबूजे     को    देखकर,   खरबूजा   भी   रंग,

बदल  रहा  है   देख लो, करता    हुआ कमाल।


टपका  टपके  टप्प  से,   अमराई    के बीच,

बालक  उनको  बीनते,हिला- हिला कर डाल।


अमराई   के   बीच  में, कूक  रही पिक नित्य,

गौरैया   प्यासी    फिरे,   भरती   नहीं उछाल।


'शुभम्' दशहरी  आम को, जेठ मास  अनुकूल,

तरबूजे  के  स्वाद  का,  शेष   न  एक जमाल।


शुभमस्तु,


04.05.2026◆ 6.15 आ०मा०

करता जेठ धमाल [ सजल ]

 151/2026


       


समांत            : आल

पदांत             : अपदांत

मात्राभार         : 24.

मात्रा पतन       : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भानु  -  ताप  बढ़ने  लगा,करता जेठ धमाल।

लुएँ    चलें  तपती  हुईं,  सर   में   उठे उबाल।।


छाँव  ढूँढ़ती  छाँव  को, पाँव  कहें चल तेज ।

अंबर  में जलने  लगीं,रवि  की   तेज मशाल।।


प्यासे-प्यासे    गाँव   हैं,  नगर गली  हैं सन्न।

विदा हुआ    मधुमास भी,रज का उड़े गुलाल।।


चलती   थीं  सिर   खोलकर,हैं  घूँघट  के बीच।

वे      अधनंगी  नारियाँ,  चलें   दुल्हनी चाल।।


वट   पीपल   के  लाल हैं,  पतले-पतले होंठ। 

मुरझाए   हैं     धूप   में,  बालाओं   के  गाल।।


खरबूजे     को    देखकर,   खरबूजा   भी   रंग।

बदल  रहा  है   देख लो, करता    हुआ कमाल।।


टपका  टपके  टप्प  से,   अमराई    के बीच।

बालक  उनको  बीनते,हिला- हिला कर डाल।।


अमराई   के   बीच  में, कूक  रही पिक नित्य।

गौरैया   प्यासी    फिरे,   भरती   नहीं उछाल।।


'शुभम्' दशहरी  आम को, जेठ मास  अनुकूल।

तरबूजे  के  स्वाद  का,  शेष   न  एक जमाल।।


शुभमस्तु,


04.05.2026◆ 6.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

मेरी खुशी [ अतुकांतिका ]

 150/2026


              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मेरी अपनी खुशी

तुम्हारी या किसी की

'हाँ' में नहीं है,

वह नित्य और निरंतर

मेरे ही पास है।


तुम अपने-अपने

पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो

तुम्हारी सोच 

सीमित है वहीं तक,

परंतु मुझे इससे क्या!

मैं आज भी 

अपने स्थान पर अविचल हूँ

अटल हूँ,

और उसी पर 

करता भी अमल हूँ।


मुझे नहीं चाहिए

तुम्हारे 'लाइक'

हजारों लाखों करोड़ों

तुम सभी भी तो

परिस्थितियों के दास हो,

मैं जैसा भी हूँ

अपनी जगह पर दुरुस्त हूँ,

मस्त हूँ,

संतुष्ट हूँ।


क्यों मरे जाते हो

इन चुटकुलों की हँसी पर

कोरी वाहवाही 

किसी काम की नहीं है,

ये वादों में बँधे हुए लोग हैं,

जातिवाद,क्षेत्रवाद,

शहरवाद, प्रांतवाद,

मज़हब वाद

गाद ही गाद।


नहीं हूँ मैं किसी और की

इच्छाओं  और  

प्रशस्तियों का दास,

मेरे अपने मन में 

बसता है शारदा माँ  का उजास

उन्हीं के आदेश का 

अनुपालक हूँ

शब्दकार हूँ,

मैं अपने कर्म से प्रसन्न हूँ

संतुष्ट हूँ,

सद्भावों से परिपुष्ट हूँ।


शुभमस्तु,


30.04.2026◆5.00प०मा०

                ◆◆◆

आओ हम दर्शन करें [ कुंडलिया ]

 149/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

दर्पण  में   मन  के  करें,  प्रभु-दर्शन दिन-रात।

इष्ट  रहें  नित  ध्यान  में,मिले  दुखों  को घात।।

मिले  दुखों  को  घात,  न  विपदा  कोई आए।

सुखी    रहे   मनुजात,   हृदय   में   हर्ष उगाए।।

'शुभम्' कर्म कर मीत,सभी प्रभु जी को अर्पण।

पड़े न किंचित धूल,स्वच्छ रख मन का दर्पण।।


                         -2-

जीवन   क्या है सत्य क्या,और जगत क्या  मीत।

दर्शन    सभी  बखानता, क्या    यथार्थ सम्प्रीत।।

क्या  यथार्थ   सम्प्रीत,  विषादों   में  नर खोया।

मिले   न   साँची   प्रीत,कभी  हँसता  तू रोया।।

'शुभम् ' सदा  ही रहे,   उधड़ती    तेरी सीवन।

दर्शन  में   जा   देख, जीव  का   कैसा जीवन।।


                         -3-

जाता   दर्शन  के  लिए,जनगण तीर्थ  प्रयाग।

वह्नि   जले  अघओघ  की,माया  से अनुराग।।

माया  से  अनुराग, नहीं   परहित  को जाना।

लगा  तिलक  निज  भाल,भूप  अंधों में काना।।

'शुभम्'  ढोंग  आरूढ़, हृदय  में   हिंसा लाता।

मथुरा    काशी    घूम,  लौट   वैसा   ही जाता।।


                         -4-

अपना मन  यदि शुद्ध हो, जनक- जननि में भक्ति।

दर्शन    सबसे   श्रेष्ठ   हैं,   करे   सुदृढ़ अनुरक्ति।।

करे   सुदृढ़   अनुरक्ति,  तीर्थ   क्या  जाना   तेरा।

यमुना- गंग     नहान,   वृथा     सब   तेरा-मेरा।।

'शुभम्'   इष्ट  वे  पूज्य,  अन्य  सब मिथ्या   सपना।

रख    उनकी  उर  भक्ति,  वही  हैं   ईश्वर अपना।।


                         -5-

आओ    हम   दर्शन  करें,   अपने  उर के बीच।

देखें   कितना   शुद्ध   है,उर   में   कितनी कीच।।

उर  में  कितनी  कीच,  मनुजता कितनी बाकी।

चले   निरंतर   क्रूर,  कर्म    की   हिंसक चाकी।।

'शुभम्'   जीव   को  जान,स्वयं   जैसा समझाओ।

मन-वाणी   रख   शुद्ध,  कर्म  कर  पावन आओ।।


शुभमस्तु,

30.04.2026◆4.30 प०मा०

                   ◆◆◆

सागर है प्रतिमान [ सोरठा ]

 148/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सरिताओं का नीर, सागर की महिमा बड़ी।

किंचित  नहीं अधीर,निशिदिन भरता गात में।।

रूप बड़ा  गंभीर,    सागर-जल खारी बड़ा।

पावस   बनी   अमीर,निर्मल  जल दे मेघ को।।


सागर   सलिल  अथाह,  पर्वत में है उच्चता।

दृढ़ता   भरा उछाह,शिक्षक  प्रेरक रात-दिन।।

बसते जलचर   जीव,  रत्नाकर   सागर बड़ा।

सोना   शंख  अतीव,मोती  मछली भेक भी।।


करती    कलकल  नाद, सरिता से सागर मिले।

और नहीं कुछ याद,लगन  लगी पिय मिलन की।।

खारी    हुआ   स्वभाव, सागर से सरिता मिली।

निर्मल     है   बर्ताव,  बरसी    वर्षा  की झड़ी।।


सागर  है   प्रतिमान,   मर्यादा की सीख का।

सरसी सरिस सुजान,छिछलापन   करना नहीं।।

सागर     गुण-आगार,    मौन  धैर्य गंभीरता।

जीवन  में     साभार,मूढ़   मनुज तू  सीख   ले।।


मधुर मिलन संयोग,सगर -धरती का सदा।

रत      रहते   नीरोग,  मर्यादा  तजते नहीं।।

नदियाँ     मिलें   हजार,   इतराता  सागर नहीं।

किंतु   लुटाता   प्यार,है   स्वभाव   खारा भले।।


 मोती    मिलें   हजार, सागर  में  जो पैठता।

मिलतीं  सीप अपार, पड़ा  रहे  जो तीर पर।।


शुभमस्तु,

30.04.2026 ◆ 10.15 आ०मा०

               ◆◆◆

सागर की महिमा बड़ी [ दोहा ]

 147/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सागर  की  महिमा  बड़ी, सरिताओं का नीर।

निशिदिन भरता गात में, किंचित  नहीं अधीर।।

सागर-जल    खारी   बड़ा,  रूप बड़ा  गंभीर।

निर्मल  जल  दे  मेघ को,  पावस बनी अमीर।।


पर्वत  में   है  उच्चता, सागर सलिल  अथाह।

शिक्षक   प्रेरक   रात-दिन,दृढ़ता   भरा उछाह।।

रत्नाकर   सागर   बड़ा, बसते जलचर   जीव।

मोती  मछली  भेक  भी, सोना   शंख  अतीव।।


सरिता सागर  से  मिले, करती  कलकल  नाद।

लगन लगी पिय मिलन की,और नहीं कुछ याद।।

सागर   से   सरिता  मिली,खारी  हुआ स्वभाव।

बरसी  वर्षा    की    झड़ी,  निर्मल    है बर्ताव।।


मर्यादा  की  सीख    का,   सागर  है प्रतिमान।

छिछलापन करना नहीं,सरसी सरिस सुजान।।

मौन  धैर्य     गंभीरता,   सागर   गुण- आगार।

मूढ़  मनुज  तू   सीख ले, जीवन  में    साभार।।


सागर-धरती   का   सदा,मधुर मिलन संयोग।

मर्यादा    तजते    नहीं,   रत     रहते नीरोग।।

इतराता  सागर    नहीं,  नदियाँ     मिलें हजार।

है    स्वभाव  खारी   भले,  किंतु लुटाता प्यार।।


सागर    में  जो  पैठता,  मोती    मिलें हजार।

पड़ा रहे   जो  तीर   पर, मिलतीं  सीप अपार।।


शुभमस्तु,

30.04.2026 ◆ 10.15 आ०मा०

               ◆◆◆

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

स्वाद आम का अतिशय खट्टा [ गीतिका ]

 146/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



स्वाद  आम   का   अतिशय  खट्टा।

कीर       ढूँढ़ता          छट्टा-छट्टा।।


अमराई     में        आई        गोरी,

भर     आमों   से   लिया   दुपट्टा।


चला   प्रभंजन     रूख     उखाड़े,

लगा     आम का    ऊँचा     चट्टा।


पत्थर   मार     तोड़ते      अमियाँ,

बालक    गँवई       फेंकें      गट्टा।


करो  न  ओछे     काम    बालको,

लगे  शान    को     किंचित  बट्टा।


सोच समझ   कर   खेल  खेलना,

नहीं समझना     जीवन     ठट्टा।


'शुभम्'   दाँव   पर  लगे न जीवन,

नहीं  मानना     इसको        सट्टा।


शुभमस्तु,


27.04.2026◆9.00आ०मा०

                     ◆◆◆

कीर ढूँढ़ता छट्टा-छट्टा [ सजल ]

 145/2026


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समांत             : अट्टा

पदांत              :अपदांत

मात्राभार          :16

मात्रा पतन        : शून्य


स्वाद  आम   का   अतिशय  खट्टा।

कीर       ढूँढ़ता          छट्टा-छट्टा।।


अमराई     में        आई        गोरी।

भर     आमों   से   लिया   दुपट्टा।।


चला   प्रभंजन     रूख     उखाड़े।

लगा     आम का    ऊँचा     चट्टा।।


पत्थर   मार     तोड़ते      अमियाँ।

बालक    गँवई       फेंकें      गट्टा।।


करो  न  ओछे     काम    बालको।

लगे  शान    को     किंचित  बट्टा।।


सोच समझ   कर   खेल  खेलना।

नहीं समझना     जीवन     ठट्टा।।


'शुभम्'   दाँव   पर  लगे न जीवन।

नहीं  मानना     इसको        सट्टा।।


शुभमस्तु,


27.04.2026◆9.00आ०मा०

                     ◆◆◆

क्यों भूलता वे पुस्तकें [ अतुकांतिका ]

 144/2026


        

©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पुस्तकों को पढ़ा

आगे बढ़ा

ऊपर चढ़ा

जीवन गढ़ा,

क्यों भूलता वे पुस्तकें।


छोड़ दीं अब पुस्तकें

स्वाध्याय तेरा शून्य है,

आज तेरा 'कल'  में घुसा

अंतर्जाल में ऐसा फंसा

बन गया नर घरघुसा।


ज्ञान की वे देवियाँ

अध्यात्म की वे वेदियाँ

जो पुस्तकें तुमने पढ़ीं

जिंदगी की सीढ़ियां

ऊँची चढ़ीं,

पर आज तू भूला उन्हें।


पुस्तकों से दूरियाँ

कहना नहीं मजबूरियाँ

थीं  जिंदगी की लोरियाँ

सुख चैन की निदिया मिली।


हम पूजते थे पुस्तकें

हम पूजते हैं पुस्तकें

वे मौन माँ की बोलियाँ

रस की भरी वे गोलियाँ

हर समय की साथी वही

जब हाथ में पुस्तक गही।


ज्ञान की बहती नदी

रुकती नहीं सदियों सदी

मत पुस्तकों को छोड़ तू

मत पुस्तकों से मोड़ मू।


शुभमस्तु,


23.04.2026◆7.00प०मा०

                     ◆◆◆

रोटी की धरती पर [ नवगीत ]

 143/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रोटी  की  धरती  पर

रमते

मूली नमक पियाज।


जले उदर में

आग भूख की

जो मिल जाए खाऊँ

न हो मिठाई

दाल भात भी

सूखे रोट चबाऊँ

अंतड़ियाँ

कुलबुला रही हैं

करतीं तुमुल रियाज।


बड़े चाव से

स्वाद आ रहा

भले जली है रोटी

नौंन प्याज

अमृत से लगते

लगे न रोटी खोटी

भूख न देखे

रूखी-सूखी

चलता यही रिवाज़।


धनिक भले

कंगाल भिखारी

उदर सभी का एक

भरे न सोने 

चाँदी से जो

नहीं चाहिए केक

जिससे मिले तृप्ति

अमृत है

जीवन का यह राज।


शुभमस्तु,


23.04.2026◆ 12.15 प०मा०

                  ◆◆◆

सुकाम्यता [त्रिभंगी छंद]

 142/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रभु जी दुख हरना,देर न करना,भूलें मेरी,क्षमा करें।

मैं शरण तुम्हारी,नित बलिहारी,जपता मन में,पीर हरें।


प्रभु अन्तर्यामी,जीव सकामी,नाम जपूँ मैं,नित्य शिवम्।

जड़-चेतन व्यापी,घोर उपाधी,घिरा हुआ है,नित्य शुभम्।।


सबका हित करना,संकट हरना,कर्मानुसार,फल देते।

अग-जग के दृष्टा,सबके सृष्टा,सब है संभव,चल जेते।।


सरिता नित बहती,कुछ-कुछ कहती,रुकना न कभी,गति जीवन।

रुकना ही मरना,निज पथ चलना, ये स्वप्न भंग,है छीजन।।


जो जिएं देश को,नहीं वेश को,देशभक्त वे,कहलाते।

सीमा के रक्षक,हुए न तक्षक,वे हतभागी,बन जाते।।


शुभमस्तु,


22.04.2026◆10.45 आ०मा०

                     ◆◆◆

चिड़िया पाँच बजे जग जाती [ बालगीत ]

 140/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चिड़िया   पाँच   बजे   जग  जाती।

नित्य    भोर   में    मुझे    उठाती।।


मुख्य    द्वार    पर     लटकीं  बेलें।

जिन पर   चिड़ा- चिड़ी नित खेलें।।

फुदक-फुदक    कर   गाना  गाती।

नित्य भोर     में     मुझे    उठाती।।


कहती   चिड़िया   आलस   छोड़ो।

लगन लगा   प्रभु   से मन   जोड़ो।।

पाठ    कर्म     का    मुझे  पढ़ाती।

नित्य  भोर    में    मुझे     उठाती।।


जिस दिन चिड़िया चोंच न खोले।

मुड़गेरी    पर   बैठ    न    बोले।।

मुझको    उसकी   याद  सताती।

नित्य  भोर   में    मुझे    उठाती।।


चांव - चांव     चूँ      करते    बच्चे।

लगते     कितने     भोले    सच्चे।।

उनको     दाना      चुगने     जाती।

नित्य    भोर     में    मुझे  उठाती।।


एक      घोंसला     उसका   प्यारा।

सघन  पल्लवों    में     है    न्यारा।।

'शुभम्' चिड़ा सँग नित चिचियाती।

नित्य    भोर    में   मुझे   उठाती।।


शुभमस्तु,


21.04.2026◆8.00 आ०मा०

                    ◆◆◆

श्वान युगल मुझको अति भाता [ बालगीत ]

 141/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्वान युगल  मुझको  अति  भाता।

मुख्य   द्वार पर    लोट   लगाता।।


श्वान   साँवला   लता    कुंज   में।

विमुख   सदा वह  काक गुंज में।।

जो भी मिल  जाता    खा   जाता।

श्वान युगल मुझको   अति भाता।।


श्वानी     गौर    वर्ण     चितकबरी।

हर  आहट    की     लेती  खबरी।।

श्वान    साथ    में   तान   मिलाता।

श्वान युगल मुझको    अति भाता।।


नहीं    परिचितों      पर   वे   भूँकें।

नव    आगत पर     सस्वर   दूंकें।।

कभी - कभी    रद   दृश्य दिखाता।

श्वान युगल मुझको   अति  भाता।।


अनायास       शरणागत     आया।

मेरे घर   भर   को   अति    भाया।।

बना   हुआ   घर   भर   का  त्राता।

श्वान युगल  मुझको   अति भाता।।


जीव जगत    के   सब   हैं   प्यारे।

हैं  स्वभाव    भी    उनके    न्यारे।।

अद्भुत    उनमें      क्षमता    पाता।

श्वान  युगल मुझको   अति भाता।।


शुभमस्तु,


21.04.2026◆8.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

पंच चिड़ा की संसद बैठी [ गीत ]

 139/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पंच चिड़ा की

संसद बैठी

करने नेक विचार।


आया है मधुमास

खिले हैं 

किसलय हरे हजार

बूढ़े तरुवर 

हरियाए हैं

उमड़ रहा है प्यार

जिजीविषा हो

तो ऐसी हो

देख रहा संसार।


जब तक

प्राण रहें किंचित भी

मरे न आशा मित्र

सूखे द्रुमवत

रहो हरे नित

रखना चारु चरित्र

इसी बात का

करने बैठी

संसद आज निवार।


सुख बाँटो

सुख तुम्हें मिलेगा

देना शीतल छाँव

हरियाली से

हरा भरा हो

नगर खेत हर गाँव

जब तक रहे

प्राण इस तन में

कभी न मानें हार।


शुभमस्तु,


21.04.2026◆6.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

जिसने जग में नाम किया है [ गीतिका ]

 138/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिसने  जग   में   नाम   किया है ।

कर्मठ   जीवन   सदा   जिया  है।।


करता  है  नर   नष्ट    समय  को,

विष का  ही  वह   घूँट  पिया   है।


विपदा  झेल   भटकता   वन - वन,

युगल ख्यात  वह   राम - सिया है।


निशिदिन जल-अभिसिंचन करती,

कहलाती   जग    में    नदिया  है।


घरनी  घर    को    रहे    समर्पित,

घर-घर   में  विख्यात   तिया   है।


फल  लगते   ही   झुकते   तरुवर,

विनय भाव सिर    धार   लिया है।


'शुभम्'  कर्म  है  बीज   योनि का,

जन्म-जन्म   महके    बगिया   है।


शुभमस्तु,


20.04.2026◆6.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

कर्मठ जीवन सदा जिया [ सजल ]

 137/2026


  

समांत           : इया

पदांत            : है

मात्राभार        :16.

मात्रा पतन      :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिसने  जग   में   नाम   किया है ।

कर्मठ   जीवन   सदा   जिया  है।।


करता  है  नर   नष्ट    समय  को।

विष का  ही  वह   घूँट  पिया   है।।


विपदा  झेल   भटकता   वन - वन।

युगल ख्यात  वह   राम - सिया है।।


निशिदिन जल-अभिसिंचन करती।

कहलाती   जग    में    नदिया  है।।


घरनी  घर    को    रहे    समर्पित।

घर-घर   में  विख्यात   तिया   है।।


फल  लगते   ही   झुकते   तरुवर।

विनय भाव सिर    धार   लिया है।।


'शुभम्'  कर्म  है  बीज   योनि का।

जन्म-जन्म   महके    बगिया   है।।


शुभमस्तु,


20.04.2026◆6.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

लोहा और सोना चाँदी [ अतुकांतिका ]

 136/2026



    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इन्होंने लोहा दिया

उन्होंने लोहा लिया

सोना उछल कर 

जाग उठा,

चाँदी चमक उठी

चहक उठी।


लोहा लेने वालों का

लोहा देने वालों से

परस्पर भौंकनीय 

सम्बंध है,

कहीं न कहीं

सोने - चाँदी का

इनसे अनुबंध है।


लोहे से पिटता रहा

सोना

पिटती है चाँदी भी,

लोहे से विलग होकर

बेचारे 

जाएँगे भी कहाँ!


लोहे से लोहे की

टकराहट

बढ़ती गई खटपट

जन हानि

धन हानि

राष्ट्रों की संपदा की हानि

और उधर सोना

जाग गया

चाँदी भी क्यों पीछे रहे।


लोहे से लोहे की

टकराहट

बढ़ाती है अशांति

दुनिया में अकुलाहट,

पता नहीं क्या हो !

न रही मानवता

न दया ही।


किस मोड़ पर 

आकर खड़ी है दुनिया

क्या यही विनाश का

संकेत है,

नहीं जानता

कोई भी झुकना

इंसान  ही  

इंसान का

आखेट है।


शुभमस्तु,


17.04.2026◆9.00 आ०मा०

                      ◆◆◆

लोहा लेना [ अतुकांतिका ]

 135/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबके वश का नहीं होता

ले लेना लोहा

लोहा लेने के लिए

सामर्थ्य भी तो चाहिए

शक्ति भी होनी चाहिए।


रावण ने श्रीराम से 

लोहा लिया

कंस ने श्रीकृष्ण से

लोहा लिया

आज श्रीराम के साथ

रावण का

श्रीकृष्ण के साथ

कंस का नाम भी

लिया जाता है।


महिषासुर ने

माँ दुर्गा से लोहा लिया

शुम्भ निशुम्भ ने

लोहा लिया,

चण्डमुण्ड 

धूम्रलोचन और

 रक्तबीज ने भी

लोहा लिया,

दुर्गा सप्तशती इसका

बखान करती है,

लोहा लेने वालों की

महिमा का भी

परोक्ष बयान करती है।


आज भी पुतिन से 

जेलेन्सकी

अमेरिका और इसराइल से

ईरान

लोहा ले ही रहे हैं,

जो हो रहा है

सब देख रहे हैं,

इतिहास की 

पुनरावृत्ति होती है,

हो ही रही है।


लोहा लेने

और देने का काम

कभी बंद नहीं हुआ,

सबके मूल में

एक ही तत्त्व अनुस्यूत है

वह है अहंकार, 

जो कभी मरता नहीं है,

बस देश काल और 

स्थान के अनुसार

रूप और पात्र बदलता है।


शुभमस्तु,


17.04.2026◆1.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

क्या- क्या वरणीय है! [ अतुकांतिका ]

 134/2026



    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


टेढ़ीमेढ़ी चाल

खुरदरा आचरण

भड़कीला आवरण

विद्रूप चरित्र

रूपसी अपवित्र

सर्वत्र 'वंदनीय'  हैं।


समझे सर्वजेता

हम-आप नहीं,नेता

प्रत्यक्ष नहीं लेता

शनैः शनैः अंड सेता

हर आम को

'नमनीय'   है।


ठीक समझे हैं आप

वक्र चले सदा साँप

सभी रहे यहाँ काँप

पिलाते हैं  दुग्ध

होते देख-देख मुग्ध

नित्य 'जपनीय'  है।


सीधा सरल या सपाट

हर कोई देता  डांट

सिल्क पहने या टाट

सदा खड़ी उसकी खाट

इनको 'निंदनीय' है।


खोई श्रेष्ठ की पहचान

पूज्य दुष्ट ही इंसान

वही काव्य भी महान

जहाँ  वक्रता का वितान

नहीं होता 'कमनीय' है।


शुभमस्तु,


16.04.2026◆1.15 प०मा०

                 ◆◆◆

दो वक्त की भरपेट रोटी [ गीत ]

 133/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दो वक्त की

भरपेट रोटी

सबको सुलभ होतीं नहीं।


रात -दिन

जी तोड़ श्रमरत

तन से पसीना बह रहा

रोटी मिलें 

ईमान की नर-

देह का

कण-कण दहा

नारियाँ

तपती दुपहरी

ईंट सिर ढोती रहीं।


बैठ ए सी 

कक्ष में क्या

रोटियाँ अर्जित करें ?

ईंट ढालें

स्वर्ण की जो

दीन को वर्जित करें

किंतु रोटी 

है जरूरी

उदर में लपटें दहीं।


घूमता 

संसार सारा

गोल रोटी के लिए

परिक्रमा

दिन-रात होती

कौन भूखा यों  जिए

नित्य खाए

कौन रबड़ी

अन्न बिन जीवन कहीं?


शुभमस्तु,


कलयुग का नित वास [ दोहा गीतिका]

 132/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव की मन बुद्धि में,कलयुग का नित वास।

दूषित   उसके   कर्म   हैं,  दुश्चिंतन  का दास।।


धनिक  अहं  में  चूर हैं,  करते   सदा अनीति,

करते   घृणा   गरीब   से,  रसना   में परिहास।


फूटी   आँख न   भा रहे, अमरीका को  अन्य,

विश्व-शांति   भाती   नहीं,चाह   रहा ठकुरास।


बिना   धैर्य  सब  व्यर्थ  है, वैभव शक्ति अकूत,

जन-जन के  हित  के  लिए, फैले नया उजास।


चिंतन  में  कल्याण  का, चमक  रहा हो भानु,

चलता है तब प्रेम का, पल-पल   प्रमन प्रभास।


घोड़ों   को   दाना    नहीं,रहे   हिनहिना नित्य,

गदहों  को   अखरोट   हैं, अब  न सुहाती घास।


'शुभम्'    फटे   में  डालना, नहीं  मित्रवर पैर,

अगर   पड़ौसी   लड़  रहे,कभी  न  जाना पास।


शुभमस्तु,


13.04.2026◆7.00आ०मा०

                 ◆◆◆

धनिक अहं में चूर हैं [ सजल ]

 131/2026


           

समांत          : आस

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :24.

मात्रा पतन     : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव की मन बुद्धि में,कलयुग का नित वास।

दूषित   उसके   कर्म   हैं,  दुश्चिंतन  का दास।।


धनिक  अहं  में  चूर हैं,  करते   सदा अनीति।

करते   घृणा   गरीब   से,  रसना   में परिहास।।


फूटी   आँख न   भा रहे, अमरीका को  अन्य।

विश्व-शांति   भाती   नहीं,चाह   रहा ठकुरास।।


बिना   धैर्य  सब  व्यर्थ  है, वैभव शक्ति अकूत।

जन-जन के  हित  के  लिए, फैले नया उजास।।


चिंतन  में  कल्याण  का, चमक  रहा हो भानु।

चलता है तब प्रेम का, पल-पल   प्रमन प्रभास।।


घोड़ों   को   दाना    नहीं,रहे   हिनहिना नित्य।

गदहों  को   अखरोट   हैं, अब  न सुहाती घास।।


'शुभम्'    फटे   में  डालना, नहीं  मित्रवर पैर।

अगर   पड़ौसी   लड़  रहे,कभी  न  जाना पास।।


शुभमस्तु,


13.04.2026◆7.00आ०मा०

                 ◆◆◆

'उलूक' [ अतुकांतिका ]

 130/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मान न मान

मैं सबका मेहमान,

मैं सबसे महान

मैंने लिया है ठान

मेरा सबसे ऊंचा वितान।


मैं खम्भे पर चढ़ जाऊँगा

करिश्मा दिखाऊँगा

विश्वशांति का दूत हूँ

अवार्ड मुझे चाहिए,

प्रत्यक्ष हूँ सुबूत हूँ

वैसे शक्ल से उलूक हूँ।


कोई मुझे मियां मिट्ठू कहे

कोई निखट्टू कहे

जिसे जो कहना है

कहता रहे,

पर मैं सबसे मलूक हूँ,

ऊत हूँ।


मेरा मन

मेरी मनमानी

किसी की नहीं मानी

अपनी ही तानी

बनती हुई बात उलझानी।


देख रहे हैं सब

देखते रहो,

मुझे क्या ?

मैं किसी को नहीं देखता,

'तुरुप' का पत्ता

आत्मघोषित सत्ता

अलबत्ता,

जैसे कोई बिगड़ा हुआ कुत्ता,

हरियाली के बीच कुकुरुमुत्ता।


शुभमस्तु,


10.04.2026◆3.45आ०मा०

                 ◆◆◆

कवियों की कतार के आगे [ गीत ]

 129/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कवियों की

कतार के आगे

दौड़ रहे   सम्मान।


हर कवि को

यह चाह जगी है

पहले मैं पा जाऊँ

भले दबाने 

पड़े पाँव भी

मल-मल तेल लगाऊँ

ले लो चाहे

कितना भी धन

बनूँ काव्य- धनवान।


गौरव बना

काव्य का कोई

कोई कवि आदित्य

कालिदास कोई

कविता का

बिना किसी औचित्य

एक तराजू में

तुलते हैं

बीस पंसेरी धान।


रूप सुंदरी

रूप छटा की 

बिखरा रही सुगंध

गले लगाती

भर आलिंगन

कसे बाँह के बंध

ढूँढ़ रही

एकांत मिले जो

कोना यदि सुनसान।


धन देकर

क्रय किए जा रहे

पटका शॉल प्रमाण

सब चलता

पर्दे के पीछे

पाँव   खूँदते   खांण

छंद ज्ञान 

अनभिज्ञ चितेरे

लुटा रहे निज जान।


अंधों में 

काने राजा की

बढ़ी हुई है साख

बटर लगाना है

अति उत्तम

लिया नाक से चाख

अखबारों 

मुखपोथी पर है

साहित्यिक गुणगान।


शुभमस्तु,


09.04.2026◆ 10.45 आ०मा०

                 ◆◆◆

सुखद यही संदेश है [ सोरठा ]

 128/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 रखें    हृदय  में   धार,सुहृद   सुखद संदेश को।

शुभकर   सत उपहार,जीवन के भवितव्य का।।

 है   उपकारी   भाव,   स्वजनों   के संदेश   में।

  मित्र    तुम्हारी     नाव, पार   उतारें  धार   से।।


 साधु-संत      संदेश  ,युग-युग    से देते     रहे।

रहकर   देश-विदेश,   परहित   में   जीना सभी।।

संतति      को   संदेश,     मात-पिता देते   सदा।

भीत न हो लवलेश ,  चुरा   न  जी श्रम से   कभी।। 


 मानवता      का       सार,   पौराणिक संदेश  में।

 उनमें    जन   उपकार,  छिपा हुआ सर्वत्र     ही।।

सकल    सृष्टि   भंडार,   ग्रहण   करें संदेश    तो।

शुभतम पर उपकार ,सीख  मिले   हर व्यक्ति   को।।


जब   लदते    बहु   बौर,  झुकते हैं तरु भार   से।

 करना    मन   में   गौर,    मानव     हित संदेश है।।

देती     सरि   संदेश,कलकल   से अपनी   यही।

मानव   धरे   सुवेश,    चरैवेति     के   गान     से।।


होता    सुखद    विहान,वन पाखी कलरव करें।

 रहे   न  तम    का    भान, फैलाएं संदेश   वे।

गिरती - चढ़ती    खूब,   चींटी हार न मानती।

नहीं  जानती   ऊब,   देती   श्रम -  संदेश जो।।


वैसा ही   फल लाभ,  जैसा  जिसका कर्म    है।

सन्निविष्ट   उस गाभ,   सुखद  यही संदेश  है।।


शुभमस्तु,


09.04.2026◆5.30आ०मा०

                    ◆◆◆

पकी फसल को काट [ गीत ]

 126/2026


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पकी फसल को काट

मुदित मन

स्वप्न करे साकार।


रंग सुनहरा

बालें झूमी

पछुआ  हवा बहे 

देख फसल को

लड्डू फूटें

मन के ताप दहे

श्रम का फल

मिलने वाला है

भरें गेह आगार।


एक साल को

खाने भर को

होगा घर गोधूम

पीले हाथ करे

बिटिया के

रही सफलता चूम

भूसा  है

पशुओं का भोजन

बोरों में भर सार।


भरी दुपहरी में

किसान ने

सिर पर साफा साध

स्वेद बहाने को

निकला है

किया नहीं अपराध

है वैशाख 

वसंत माह में

मिला  कृषक -उपहार।


शुभमस्तु,


07.04.2026◆5.00 आ०मा०

                  ◆◆◆

सबको अपने लगें दुलारे [ गीतिका ]

 125/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबको     अपने      लगें    दुलारे।

माँ    को     एकचक्षु    सुत प्यारे।।


होता   नहीं    बुरा - अच्छा    कुछ,

बस  निजत्व    ने   पाँव    पसारे।


लैला    न     थी      सुंदरी    नारी,

पर मजनू    की  दृग     की   तारे।


इस मन    को    भा  जाए जो भी,

दिखते   उसे    वहीं      उजियारे।


देख    अजनबी   भौंकें     कूकर,

बनें      पालतू      टरें     न   टारे।


अपनेपन    का   मोल    बड़ा   है,

अनभाए   सब      लगते     खारे।


'शुभम्' श्याम  से  प्रीति  लगा  ले,

खुलें  प्रेम   से     बंद       किवारे।


शुभमस्तु,

06.04.2026◆7.15 आ०मा०

                 ◆◆◆

होता नहीं बुरा-अच्छा कुछ [ सजल ]

 124/2026



समांत          : आरे

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      :16.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबको      अपने      लगें    दुलारे।

माँ    को    एकचक्षु    सुत  प्यारे।।


होता   नहीं    बुरा - अच्छा    कुछ।

बस  निजत्व    ने   पाँव    पसारे।।


लैला    न     थी      सुंदरी    नारी।

पर मजनू    की  दृग     की   तारे।।


इस मन    को    भा  जाए जो भी।

दिखते   उसे    वहीं      उजियारे।।


देख    अजनबी   भौंकें     कूकर।

बनें      पालतू      टरें     न   टारे।।


अपनेपन    का   मोल    बड़ा   है।

अनभाए   सब       लगते     खारे।।


'शुभम्' श्याम  से  प्रीति  लगा  ले।

खुलें  प्रेम   से     बंद       किवारे।।


शुभमस्तु,

06.04.2026◆7.15 आ०मा०

                 ◆◆◆

मूर्खता की सुनामी [ अतुकांतिका ]

 123/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मूर्खता एकांगी नहीं होती

बहुमुखी होती है

जो किसी के आचरण

किसी के संचरण

किसी के चेहरे

किसी के क्रिया-कर्मों में 

दिख ही जाती है।


मूर्खता का जिम्मा

किसी आम या खास का नहीं

वह देखी जाती हैं सब कहीं

राजा हो या रंक

अनपढ़ या सुशिक्षित

नेता अथवा अधिकारी

प्राइवेट भी है

वह कभी हो जाती सरकारी

मूर्खता है

विश्वव्यापी बीमारी,

जो लाइलाज है।


पागलखाने में ही नहीं होते मूर्ख

उसके बाहर भी 

बहुतायत से मिलते हैं,

लड़ते हैं लड़वाते हैं

आपस में बैर करवाते हैं

दुनिया में अशांति का 

कहर ढाते हैं,

और अपने को 

दूध से धुला जताते हैं,

रक्तिम क्रांति करवाते हैं

और शांति का अवार्ड 

माँगते हुए देखे जाते हैं।


अपने चारों ओर

 एक नजर तो घुमाइए

आपको एक नहीं

अनेक मूर्ख दिख जाएँगे,

जो अपने को सबसे

बुद्धिमान बताएँगे,

वह सर्वव्यापी जो है,

मूर्खता के अनेक पर्यायों से

भरा हुआ है ये जगत,

कभी- कभी मूर्खों की भी

होती है बड़ी आवभगत।


मूर्खता ने 

मनचाहा डेरा डाला है,

बुद्धिमानों के समक्ष

अपना कदम निकाला है,

कोई तो कभी-कभी

मूर्ख बन जाता है

और कुछ लोग

सदाबहार मूर्खता का मुकुट

शिरोधार्य करते हैं, 

वे मूर्ख बनने में किंचित मात्र भी

नहीं डरते हैं,

आज विश्वव्यापी 

मूर्खता की सुनामी आयी हुई है,

पर क्या कीजिए

सब दिन होत न एक समान।


शुभमस्तु,


03.04.2026◆4.30 आ०मा०

                  ◆◆◆

सुहृद सुखद संदेश [ दोहा ]

 127/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सुहृद    सुखद   संदेश को, रखें  हृदय  में   धार।

जीवन   के   भवितव्य का,शुभकर सत उपहार।।

स्वजनों      के   संदेश  में, है  उपकारी   भाव।

पार     उतारें     धार   से,  मित्र   तुम्हारी नाव।।


युग-युग        से     देते   रहे,  साधु-संत संदेश।

परहित   में  जीना    सभी,  रहकर देश-विदेश।।

मात-पिता      देते   सदा ,   संतति    को संदेश।

चुरा न   जी   श्रम   से कभी,भीत न हो लवलेश।।


पौराणिक      संदेश   में,   मानवता का       सार।

छिपा    हुआ    सर्वत्र    ही, उनमें    जन उपकार।।

ग्रहण       करें    संदेश तो ,  सकल सृष्टि   भंडार।

सीख   मिले   हर व्यक्ति को,शुभतम पर उपकार।।


झुकते      हैं   तरु  भार से,जब लदते बहु   बौर।

मानव       हित   संदेश  है, करना  मन में   गौर।।

कलकल   से   अपनी   यही,देती   सरि संदेश।

चरैवेति     के    गान   से,   मानव   धरे सुवेश।।


वन  पाखी    कलरव  करें,होता सुखद विहान।

फैलाएं     संदेश     वे, रहे   न  तम का भान।।

चींटी    हार न  मानती, गिरती - चढ़ती  खूब।

देती   श्रम - संदेश   जो,  नहीं  जानती   ऊब।।


जैसा   जिसका   कर्म   है,वैसा ही फल लाभ।

शुभद    यही संदेश  है,सन्निविष्ट   उस गाभ।।


शुभमस्तु,


09.04.2026◆5.30आ०मा०

                    ◆◆◆

स्वागत है ऋतुराज का [ दोहा ]

 122/2026



[बसंत,ऋतुराज,कामदेव,अमलतास,कचनार]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'    

     

                 सब में एक

मन  में  वन में  बाग में,बिखरा विरुद बसंत।

सुमन खिले  बहु रंग के,महका  हुआ दिगंत ।।

कुहू-कुहू कोकिल करे,कूक -कूक हर ओर।

ऋतु  बसंत  मनभावनी,चुरा  रही मन मोर।।


स्वागत है ऋतुराज  का,अलि दल है रस लीन।

कलियाँ   खिलतीं   बाग में, मुस्का   रही जमीन।।

स्वागत  में   ऋतुराज के , तितली भँवरे   मस्त।

मधुरस     पीते   प्रेम   से,दिन भर रहते व्यस्त।।


कामदेव ऋतुराज  का, अविलग  नेक सुसंग।

विरहिन   तड़पे    ताप से,  तापित  करे अनंग।।

कामदेव    का   काम है,  करना सृष्टि प्रसार।

मन ही मन मंथित   करे,  अविरल  सघन गुबार।।


पीली     चादर   ओढ़कर , छाया  है  चहुँ ओर।

अमलतास मन  खींचता,मन्मथ को झकझोर।।

अमलतास  छवि  देखकर,हँसने लगा गुलाब।

भ्रमरों   का  दल  छा गया,रहा  फूल  को दाब।।


झूम  उठा  कचनार भी, जब आया ऋतुराज।

कलियाँ बैंगन-सी खिलीं,सजा हुआ नव साज।।

अपनी ही छवि के लिए, ख्यात हुआ कचनार।

लगा   बैंजनी  शीश  पर, मुकुट   सजाए मार।। 


               एक में सब

अमलतास कचनार सँग,महक रहा ऋतुराज।

कामदेव  सोया   जगा, वर बसंत का   साज।।


शुभमस्तु,

01.04.2026 ◆4.30 आ०मा०

                     ◆◆●

मंगलवार, 31 मार्च 2026

बौराए हैं आम [ गीत ]

 121/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बौराए हैं आम

बाग में

महक रही है अमराई।


ऋतु वसंत का

हुआ आगमन

कुहुक-कुहुक कोकिल कूके

कानों में 

अमृत घुलता है

नहीं एक पल को चूके

कभी हवा

चलती है पछुआ

कभी लहकती पुरवाई।


भौंरे चले

झुंड में  अनगिन

चलो मंजरी को चूमें

मतवाले हों

पीकर मधुरस

ले-ले अँगड़ाई  झूमें

मुस्काती हैं

अरुण कोंपलें

गमक रही नव तरुणाई।


रहें तितलियाँ

क्यों अलि दल से

मधुरस पीने में पीछे

रंगबिरंगी

पहन साड़ियाँ

चहक रहीं ऊपर नीचे

भू पर बिछी

पीत चादर-सी

मंजरियों की उफनाई।


शुभमस्तु,


31.03.2026◆5.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

नील गगन की छटा [ गीतिका ]

 120/2026


   



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नील  गगन  की  विमल   छटा है।

नहीं  तनिक भी   कहीं  घटा   है।।


चैत्र मास   मधु    बाँटे    प्रतिदिन,

अलि   गुंजन   से   बाग  पटा  है।


तपने    लगा   गगन    में     सूरज,

लटकी  वट  की सघन  जटा   है।


ब्रह्म    मुहूरत    में     आ    चहके,

चिड़िया , प्रभु का नाम   रटा  है।


वन   में   गए   भ्रमण   करने  हम,

मिला न  किंचित  एक    गटा   है।


करती है   कल - कल  सुरसरिता,

नहीं  नीर     में     कहीं   भटा  है।


राजा   है     वसंत   ऋतुओं    का,

'शुभम्'   यत्र   सर्वत्र    खटा    है।


शुभमस्तु,


30.03.2026◆ 5.45 आ०मा०

                     ◆◆◆

नहीं घटा है [ सजल ]

 119/2026


           


समांत          : अटा

पदांत           : है

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन     : शून्य.


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नील  गगन  की  विमल   छटा है।

नहीं  तनिक भी   कहीं  घटा   है।।


चैत्र मास   मधु    बाँटे    प्रतिदिन।

अलि   गुंजन   से   बाग  पटा  है।।


तपने    लगा   गगन    में     सूरज।

लटकी  वट  की सघन  जटा   है।।


ब्रह्म    मुहूरत    में     आ    चहके।

चिड़िया , प्रभु का नाम   रटा  है।।


वन   में   गए   भ्रमण   करने  हम।

मिला न  किंचित  एक    गटा   है।।


करती है   कल - कल  सुरसरिता।

नहीं  नीर     में     कहीं   भटा  है।।


राजा   है     वसंत   ऋतुओं    का।

'शुभम्'   यत्र   सर्वत्र    खटा    है।।


शुभमस्तु,


30.03.2026◆ 5.45 आ०मा०

                     ◆◆◆

कविता के दरबार में [ कुंडलिया ]

 118/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

कविता के दरबार में, खड़ा 'शुभम्' कर जोड़।

करे विनय माँ शारदा,न  दें 'शुभम्'  को छोड़।।

न दें  'शुभम्'  को  छोड़,लिखे मनहारी रचना।

गद्य-पद्य   का  साज, पड़े  यद्यपि  नित तपना।।

'शुभम्' चले उस ओर,न जाए दिनकर सविता।

लगे  चरण  में  ध्यान,करे  कवि  ऐसी कविता।।


                         -2-

बचपन   यौवन     प्रौढ़ता, गए  बीत   युग   तीन।

करता है कवि  कल्पना,   नित  ही दिव्य   नवीन।।

नित ही  दिव्य  नवीन,  नहीं  कुछ इसमें  अपना।

कविता   हो   कमनीय,  देखता हर   पल  सपना।।

'शुभम्'   हृदय   हो  लीन,झूमती कविता रुनझुन।

चौथापन     है   पीन,   याद   आता   है बचपन।।


                         -3-

मानव तन  शुभ  कर्म  का, फल  है एक अमोल।

उसमें भी  कवि कर्म से,  कविता   करे अडोल।।

कविता   करे अडोल, अटल सौभाग्य  मिला  है।

ज्ञात   नहीं  यह तथ्य,बना क्यों काव्य- किला है।।

'शुभम्'     शारदा   मातु, करें आजीवन कलरव।

कविता   ही    सौभाग्य, बने  रहना  नित मानव।।


                         -4-

आओ   कविता  से करें,  जन-जन  का कल्याण।

शुभता   के    संदेश   से,  करें जीव   का   त्राण।।

करें जीव   का  त्राण, कर्म  वाणी   या मन   से।

सबको    करें   कृतार्थ,  देह से अपने   तन   से।।

'शुभम्'  कर्म  ही  सत्य, गीत  यह  मन से  गाओ।

कर्म   योनि   का  बीज,   उसे बोएँ जन  आओ।।


                         -5-

दोहा     चौपाई    लिखे,   कुंडलिया   बहु   छंद।

जनहित   में निज व्यंग्य से,  बिखराया मकरंद।।

बिखराया    मकरंद,  लेख लिख किया चितावन।

ग़ज़ल    सवैया  नेक, किया  कविता को पावन।।

'शुभम्'   कहे अतुकांत, काव्य   ने जनमन मोहा।

करें      वाह    ही   वाह,   लिखे   चौपाई   दोहा।।


शुभमस्तु,


29.03.2026◆5.30आ०मा०

                  ◆◆◆

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अहंकार [अतुकांतिका]

 117/2026


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अहंकार 

यों ही हार नहीं मानता

वह मरेगा और मारेगा

क्या वह नहीं जानता?


अनादिकाल से

अहंकार

खेल खेल रहा है,

अविवेक के साथ

उसका तालमेल रहा है।


आत्महंता है अहंकार

नहीं जानता वह दुत्कार

भरता रहता है

क्षण -क्षण वह फुंकार

इसीलिए तो हो रहा है

आज दुनिया में हाहाकार।


अहंकार को 

कैसे और क्यों समझाओगे

उसके मूल में

विनाश अंतर्निहित है,

वह नहीं जानता कि 

यह सब अनुचित है।


पीछे हटना

 उसने सीखा नहीं,

साँप के बिल में

हाथ जो डालेगा

उसे साँप

डसेगा ही डसेगा,

इंतजार कीजिए

और अहंकार की

विनाश लीला को देखिए।


शुभमस्तु,


27.03.2026◆5.00आ.मा.

                    ◆◆◆

भारहीन होती हैं खुशियाँ [ गीत ]

 116/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भारहीन

होती हैं खुशियाँ

शब्दों में जो कही न जाती।


आँचल में भर

पकी फसल की

सोने जैसी बाल सुनहरी

नहीं खुशी से

समा पा रही

स्मिति ये बतलाती गहरी

अधरों से

जो खुशी फूटती

हँसी स्वयं में है शर्माती।


पहनी 

लाल शाटिका तन पर

पीले हरे वसन अँग ढाँके

पाँव नहीं

धरती पर पड़ते

सुख के खुले बंद दृढ़ टाँके

लगता

धवल पंक्ति दाँतों की

गीत अधर के भीतर गाती।


श्रम का फल

होता है मीठा 

स्वेद बहाए वही जानता

जिसके पाँव न

फटी बिवाई

कैसे जग की पीर मानता

चली जा रही

पगडंडी पर

ठुमक -ठुमक अँगना इठलाती।


शुभमस्तु,


24.03.2026◆ 6.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

सबसे पहले देश है [ दोहा गीतिका ]

 115/2026


               


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबसे     पहले    देश    है, रक्षक  धीर प्रवीर।

जाति-संकुचन व्यक्ति का, देता पद  न कबीर।।


हितकर हो  जो  देश को, करना  है वह काम,

ऊँच -नीच   के  भेद   के, नहीं  चलाएँ   तीर।


सार्थक  मानव  योनि   है, जिए  देश   के हेत,

कर्मों   की   सद्गन्ध   का,  उड़ता   रहे  उशीर।


भर   लेते   हैं  श्वान भी,  यों   तो अपना   पेट,

परपीड़ा   जो    जानते,  कहलाते वह   पीर।


पढ़े-लिखे  शिक्षित  सभी, अनपढ़ मूढ़ गँवार,

जातिवाद    के   भक्त  हैं,अंधा   बाँटे खीर।


देश  रसातल  को  गया, जातिवाद  से आज,

सोच    बड़ी  संकीर्ण   है,देश  दिया   है चीर।


'शुभम्' समर्पित  देश को,भारत जिसका नाम,

नित सेवी  साहित्य   का,  तोड़    क्षुद्र जंजीर।


शुभमस्तु,


23.03.2026◆4.30 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...