मंगलवार, 30 जून 2026

नहीं राम का अब यह घर है [ ग़ज़ल ]

 222/2026

    

 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नहीं   राम   का   अब   यह घर है।

नोट  लूटने     का   शुभ   दर   है।।


डाकू-चोर    नोट     नित     गिनते,

लगे  न    जिन   पर   कोई  कर है।


सभी    बताएँ      धाम    अयोध्या,

रहता   इसमें    छलिया    नर    है।


राम   नाम   की   आड़    सजी  है,

यहाँ  लुटेरों   का     ही    डर     है।


तिलक    लगा     पीतांबर    धारी,

रतन   नोट      सोने    का  सर  है।


चचा-भतीजे             जीजा-साले,

इनकी  जेब  नोट     से    तर    है।


कंगाली     में       आटा      गीला,

उनका    देखो  महल    इधर    है।


'ट्रस्ट'  भ्रष्ट  हो    गया    कलंकित,

बिना  सींग  का उजला   खर    है।


मिली भगत     की     गंगा   मैली,

स्वर्ण भवन        संगेमरमर      है।


मन  में  राम     नहीं   अब    रहते,

नोट    गड्डियों      की    चर-चर है।


रक्षक    शुभम्     हुए   जब  भक्षी,

भक्त    काँपता  अब     थर-थर है।


शुभमस्तु,


30.06.2026◆9.15आ०मा०

                  ◆◆◆

सुखधाम घर अपना [ गीत ]

 221/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


परिवार हो खुशहाल

छोटा

सुखधाम घर अपना।


बहुत की

इच्छा नहीं

संतोष मिल जाए

जिंदगी 

सुख शांति से

कट भीम -सी जाए

देखें वही

जो हो सके

परिपूर्ण हर सपना।


 मन भाव

औरों के लिए

कुत्सित न हों गदले

नेह बाँटें

नेह पाएँ

नेह से उजले

जिंदगी है साधना

ताजिंदगी तपना।


आदमी के

काम आए 

आदमी दिन-रात

सोचे नहीं

उसको मिले

हमसे कभी भी मात

माला जपे

प्रभु राम की

धन-धाम क्या जपना।


एक दम्पति

पुत्र-पुत्री

प्रेम से रहते

आपसी 

हर बात को वे

गेह में   कहते

यों तो

सभी को रात -दिन

हर हाल में खपना।


चालबाजी में 

नहीं

छल छद्म की फँसना

आ जाए

कोई आपदा

फिर भी सदा हँसना

ममता मदद

करुणा भरे

दीपक सदा जलना।


शुभमस्तु,


30.06.2026◆8.30 आ०मा०

दूध-दूध अलग-अलग [गीतिका ]

 216/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूध-दूध अलग-अलग पानी-पानी अलग-अलग।

लूट-लूट अलग-अलग राम-कहानी अलग-अलग।।


धुँआँ   उठा  आग  जली  लपटों में जल उठा देश,

जितने मुँह उतनी बात मुख बयानी अलग-अलग।


चोर   कहे  मैं   चोर  नहीं  शेष   सब  राम   जाने,

राम की कृपा है सब कहता लुभानी अलग -अलग।


राम-दान-दाम    गया   भवन   बने   हैं नए-नए,

पितांबर ओढ़ नव्य  नैया  डुबानी अलग -अलग।


दूध का   धुला  न  एक दाल सभी काली-काली,

झूठी सब बीबियाँ बतियाँ बनानी  अलग-अलग।


पाप-पुण्य       धर्म   नहीं   बोध   अपराध   नहीं,

दुनिया की फ़िक्र नहीं फसलें उगानी अलग-अलग।


'शुभम्'   राम   मंदिर   है  कमाने का स्रोत   एक,

पल रहे डाकू चोर दुनिया दिवानी अलग -अलग।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆10.30 आ०मा०

                     ◆◆◆

सोमवार, 29 जून 2026

चोरी [ चौपाई ]

 220/2026


               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम-रतन    की     बेढब    चोरी।

हुई  अयोध्या    धाम   न   थोरी।।

जिनका  चरित    नहीं   था  गोरा।

लगा  मुखौटा     लगता     भोरा।।


रक्षक  ही    भक्षक    बन   जाएँ।

फिर  किस पर विश्वास  टिकाएँ ।।

जो  धन  दानपात्र      का   गिनते।

नोट जेब    में    वे    ही    चिनते।।


नैतिकता  जब  मर     जाती    है।

मानवत्व  को  छल     पाती    है।।

इष्ट मित्र     थे        साला-जीजा।

नित्य  चोरते        चचा -भतीजा।।


सोना    चाँदी        हीरा       मोती।

चुरा    रहे     थे    सभी     सगोती।।

जिसको  'ट्रस्ट'  कहा    था    सबने।

वही भ्रष्ट   पाया      है      जग  ने।।


ट्रस्ट -  छाँव    में     चोरी    होती।

भक्त  माँगते          राम- मनोती।।

चंपत  जी  सब    जान     रहे   थे।

पर जिद     अपनी     ठान रहे थे।।


भेद     खुले   नाकें     कट    जाएँ।

फिर  कैसे    मुखड़ा    दिखलाएँ।।

दबी  आग    बाहर    आ    जाती।

भारत  भर को    वह   झुलसाती।।


कहते  चोर   राम     नित   जपना।

समझे दान पात्र       धन  अपना।।

'शुभम्'  चोर की  अशुभ   मिताई।

पिटे    संग       पिटवाए     भाई।।


शुभमस्तु,


29.062026◆4.15 प०मा०

                  ◆◆◆

भले खुले मंदिर के द्वार [ गीतिका ]

 219/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भले  खुले    मंदिर      के      द्वार।

नैतिकता      की      छुट्टा     हार।।


सजे     अयोध्या      धाम      खड़े,

किंतु  पाप    का    बड़ा      प्रचार।


मंदिर   धंधे     का      घर      नेक,

धर्म     हुआ        है      तारम तार।


हया    नहीं     आँखों     में     शेष,

चचा-भतेजे       सब      हुशियार।


झोंक     कैमरा-दृग     में       धूल,

टपकाते  थे     मुख     से     लार।


जीजा-साले       सब       सम्बंधी,

सोना-चाँदी           करते      पार।


ऊँचे-ऊँचे         भवन          खड़े,

जिनमें     सुखी     रहें     नर-नार।


चोर  कहे      औरों     को     चोर,

उड़ें       हवाई       काली     थार।


'शुभम्'  पहनते       पीले     वस्त्र,

करते   घर    भर    का     उद्धार।


शुभमस्तु,


29.06.2026◆ 6.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

संत-असंत डकैत लबार [ गीतिका ]

 218/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संत-असंत       डकैत        लबार।

सबको   खुले    राम    के    द्वार।।


राम-नाम    की    हुई     न   लूट,

राम-दाम        लुटते       उपहार।


जीजाजी-साले      का        जोड़,

सबकी   मिली- जुली     सरकार।


चाचा    संग         भतीजा     एक,

लूट     रहा    मंदिर    में     प्यार।


धाम अयोध्या     धन   का   स्रोत,

नहीं      पता     था    होगी   रार।


बाँध       पोटली     गहना     नोट,

महल  बनाए       औध     उजार।


अलग - अलग    हो     पानी- दूध,

कानूनी      पंजा          अनिवार।


देख  पराए     धन      की     भेंट,

टपक     उठी     रसना   से  लार।


'शुभम्'   कहानी     बनी   अनेक,

धर्म    किया    अघियों   ने   छार।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆11.00प०मा०

                   ◆◆◆

सबको खुले राम के द्वार [ सजल ]


217/2026

         

समांत          : आर

पदांत           : अपदान्त

मात्राभार       :15.

मात्रा पतन     :शून्य

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संत-असंत       डकैत        लबार।

सबको   खुले    राम    के    द्वार।।


राम-नाम    की    हुई     न    लूट।

राम-दाम        लुटते       उपहार।।


जीजाजी-साले      का        जोड़।

सबकी   मिली- जुली     सरकार।।


चाचा    संग         भतीजा     एक।

लूट     रहा    मंदिर    में     प्यार।।


धाम अयोध्या     धन   का   स्रोत।

नहीं      पता     था    होगी   रार।।


बाँध       पोटली     गहना     नोट।

महल  बनाए       औध     उजार।।


अलग - अलग    हो     पानी- दूध।

कानूनी      पंजा          अनिवार।।


देख  पराए     धन      की     भेंट।

टपक     उठी     रसना   से  लार।।


'शुभम्'   कहानी     बनी   अनेक।

धर्म    किया    अघियों   ने   छार।।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆11.00प०मा०

                   ◆◆◆


दूध-दूध अलग-अलग [गीतिका ]

 216/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दूध-दूध अलग-अलग पानी-पानी अलग-अलग।

लूट-लूट अलग-अलग राम-कहानी अलग-अलग।।


धुँआँ   उठा  आग  जली  लपटों में जल उठा देश,

जितने मुँह उतनी बात मुख बयानी अलग-अलग।


चोर   कहे  मैं   चोर  नहीं  शेष   सब  राम   जाने,

राम की कृपा है सब कहता लुभानी अलग -अलग।


राम-दान-दाम    गया   भवन   बने   हैं नए-नए,

पितांबर ओढ़ नव्य  नैया  डुबानी अलग -अलग।


दूध का   धुला  न  एक दाल सभी काली-काली,

झूठी सब बीबियाँ बतियाँ बनानी  अलग-अलग।


पाप-पुण्य       धर्म   नहीं   बोध   अपराध   नहीं,

दुनिया की फ़िक्र नहीं फसलें उगानी अलग-अलग।


'शुभम्'   राम   मंदिर   है  कमाने का स्रोत   एक,

पल रहे डाकू चोर दुनिया दिवानी अलग -अलग।


शुभमस्तु,


28.06.2026◆10.30 आ०मा०

                     ◆◆◆

शनिवार, 27 जून 2026

अखंड ज्योति [ संस्मरण ]

 215/2026


                 

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मनुष्य के जीवन में सामाजिक परम्पराओं और रीति रिवाजों का विशेष महत्त्व है। अपने दस शतक पहले के जीवन की कुछ मधुर स्मृतियों को वाणी प्रदान करता हूँ तो लगता है कि अभी कल ही की बात है। उन दिनों होली दीवाली रक्षाबंधन आदि सभी त्योहार बड़े ही उत्साह और हर्षोल्लास पूर्ण ढंग से मनाए जाते थे। मुझे यह अच्छी तरह से याद है कि जिस रात  होलिका दहन होता था,उस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पिताजी होली की आँच एक जलते हुए उपले के रूप में घर पर लाते थे।  मेरी माँ उसी उपले की आँच से घर की होली की अग्नि प्रज्वलित किया करती थीं।गोबर की बनी हुई गुलरियों के ढेर को सजाकर उसकी पूजा करने के बाद उसी होली की आग से उसे जाग्रत किया जाता था।


सुबह होने पर घर के चूल्हे की आग इसी होली की आग से जलाई जाती थी। घर की होली की आग में जौ और गेहूं की बालियाँ भूनकर खाई जाती थीं,जिन्हें आखत डालना कहा जाता था। आखत अर्थात नवान्न का श्रीगणेश। आखत ,जो अक्षत का ही भाव लिए हुए है। सबसे महत्त्वपूर्ण और खास बात यह थी कि यही आग वर्ष भर जिंदा रखी जाती थी। 


होली की आग को अगली होली तक जिंदा रखने की यह अमर परम्परा निरंतर चलती रहती थी। ऐसा नहीं था कि तब घरों में माचिस नहीं होती थी। घर पर माचिस होने के बावजूद यह एक रीति और परम्परा की बात थी। सुबह भोजन बनने के बाद किसी उपले को जलाकर चूल्हे की राख में गाड़  दिया जाता था। शाम होने पर पुनः उसी उपले को निकाल कर आग सुलगा ली जाती और भोजन बनने के बाद अगली सुबह के लिए पुनः गाड़ दी जाती।उस आग की ज्योति को इसी क्रम से वर्ष भर जिंदा रखा जाता था। जब बोरसी में दूध औटाया जाता तो भी इसी आग से काम लिया जाता। यही हमारी सामाजिक परम्परा की एक अखंड ज्योति थी। 


एक वर्ष तक निरंतर आग को इस प्रकार जीवित रखना कोई आसान काम नहीं है। आज भी गाँवों में गैस के साथ साथ लकड़ी उपलों के चूल्हे हैं,किन्तु अब वह बात नहीं है। अब तो खट से लाइटर जलाया और स्टील का चूल्हा जला लिया। यह भी न हुआ तो सर्र से माचिस जलाई और खाना बनाना शुरू। अब न ऐसी कोई परम्परा है और  अखंड ज्योति। वे सब बातें समय के साथ चली गईं।न वे लोग रहे और न वे बातें। सब कुछ बदल गया। अब आदमी का धैर्य चुक गया है। यह बहुत बड़े धैर्य का ही प्रतीक था कि होली की आग की एक ही ज्योति को वर्ष भर जिंदा रखा जाता था।


उस समय मिट्टी के बने हुए चूल्हे प्रायः खुले आँगन अथवा दालानों में हुआ करते थे।ऐसे समय में उस आग को सुरक्षित रखते हुए अगले दिन के लिए बचाये रखना कठिन होता था। बरसात और जाड़े के दिनों में बहुत कठिनाई होती थी।उन दिनों की बरसात आजकल की तरह होने वाली हल्की फुल्की बरसात नहीं थी।एक एक पखवाड़े तक सूरज देवता के दर्शन भी दुर्लभ हो जाते थे। ऐसे में चूल्हे  की राख की रजाई में आग की ज्योति को बचाना किसी तरकीब का काम होता था। बरसते हुए बादलों के नीचे चूल्हे पर परात उढ़का  कर आग को बचाया जाता था।


यही मेरी माँ की अखंड ज्योति थी। जिसकी रोटी खाकर हम बड़े हुए और होश सँभाला। अतीत के दिनों की वे मधुर स्मृतियाँ भुलाए नहीं भुलाई जातीं। ईश्वर ने वही अखंड आग की ज्योति हमारे मन और आत्मा में भर दी है और साहित्य की ज्योति के रूप में निरंतर प्रकाशवान है। यही तो मेरे माता और पिता के वे संस्कार हैं, जो हमारे जीवन का पाथेय हैं। अब न वे दिन रहे और न वे बातें ,पर उनकी अमर स्मृतियाँ तन मन में स्थायी रूप से प्रवाहमान हैं। 


शुभमस्तु,


27.06.2026◆8.00 प०मा०

                ◆◆◆

ऊँट की चोरी निहुरे-निहुरे! [ व्यंग्य ]

 214/2026 


 

 © व्यंग्यकार

 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 बहुत ही प्रसिद्ध कहावत है कि ऊँट की चोरी निहुरे- निहुरे नहीं होती।पर यहाँ तो हो गई।शायद चोरों को इस बात का गुमान भी नहीं था कि वे न जाने कब से ऊँट की चोरी कर रहे हैं,वह ऊँट देश दुनिया और समाज की नज़र से कब तक छिपा रह सकता है ! ऊँट तो ऊँट है, किसी न किसी दिन उसे पहाड़ के नीचे आना ही पड़ेगा। इस बात को ऊँट कभी नहीं सोचता। और यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि कोई ऊँट ही ऊँट को चुराए ! पहले आदमी ऊँटों की चोरी किया करते थे ।अरे अब तो ऊँट ही ऊँटों को चुराने लगे! देश और दुनिया को भरमाने लगे। राम नाम की पीली चदरिया ओढ़कर राम को छकाने लगे। पर क्या किया जाए कि वे अपने को ही सर्वोपरि समझ कर ठगने लगे।भक्तों के दान का पैसा सोना चाँदी हीरे जवाहरात चुराने लगे। घड़ा फूटा तो चौराहे पर टूटा। अब न रहा किसी चोर में अपनी थूथन खोलने का बूता। भगवान के मंदिर में डाका पड़ा। चोरों और डाकुओं की दाढ़ियों में ऐसा अड़ा कि तिनकों का पहाड़ ही हो गया खड़ा!

  पहले कहा जाता था कि राम नाम की लूट है,लूट सके तो लूट।पल में परलै होइगी प्राण जाएँगे छूट। पर अब ? यह कहावत झूठी पड़ गई है । राम नाम लूटने से भला क्या होगा ! राम दाम ही न लूट लो। राम नाम से घर गृहस्थी थोड़े ही चलती है ,राम दाम से ही चलती है। जब राम जी ने उन्हें खाँड़ खूँदने का 'सुनहरा' 'रूपहरा' और 'नोट हरा' मौका दिया है ,तो क्यों न लूटें!और उन्होंने ने यथासंभव लूटा।सारी दुनिया को बना दिया झूठा। खांड़ खाई और खूब खूब कूटा। राम की भेंट से बन गए सेठ। आ गई ऐंठ। मंदिर के बड़े प्रशासक ! आप अपने ही सर्वनाशक !! भगवत भक्ति के घाती, चलते फुलाए हुए छाती। ये कलयुगी 'राम शंकर' ! बड़े ही प्रलयंकर ।वही पालक , वही ध्वंशक ,विध्वंशक । 'चंपतों को चपत लगना ज़रूरी है।लोग कहते हैं कि पेड़ों की जड़ें होती हैं। यहाँ तो आदमियों की जड़ें निकल आईं , जो मंदिर के कण- कण में ऐसे समाईं कि वे भगवान राम के मंदिर को अपनी बपौती समझ बैठे। और विशाल दरख़्त बनकर कुछ ऐसे ऐंठे कि राम भी न रहे उनसे जेठे। ये छोटे मोटे पेड़ नहीं, वट वृक्ष बन गए। मंदिर ही नहीं अयोध्या पर छा गए।इनके दाँव तले क्या किसी का पत्ता भी हिल सकता था, हाँ ये पत्ता काट तो जरूर सकते थे। शक्ति के अहंकार में रावण जैसे न रहे, इन 'राम शंकरों' की भला क्या बिसात ! जो राम के ऊपर ही करें घात! घाट- घाट का पानी पीने वाले ये!अंततः कब तक बचने वाले थे!

 राम मंदिर चोरों लुटेरों और डकैतों की आजीवन आय का मोटा अजस्र स्रोत बन गया। इससे चोरों का दल ऐसा तन गया ,जैसे देश के राम भक्तों पर साँप का फन ही तन गया। आस्था पर चोर भारी पड़ गए। देश ने जब सुना जब मंदिर का हाल ! धीमी पड़ गई भक्तों की चाल। उन्हें दिखाई देने लगा मंदिर के बीच खड़ा काल। सुनते ही देश हो गया बेहाल।इससे एक अनुमान यह भी लगाया है कि देश के अन्य मंदिरों में क्या सतयुगी देवताओं को दान संग्रह पर बैठाया है ?जी नहीं। दाल में काला नहीं,ये दाल ही काली है। दान चोरों की नित्य होली और दिवाली है। यह जानकर आस्था शंकित है, थकित है,भ्रमित है, व्यथित है। पर क्या करिए , और क्या न्याय का इंतजार करिए। और किया भी क्या जा सकता है।चोरों का बंधने लगा बस्ता है। भक्तों की आस्था का दान , इतना नहीं सस्ता है। देश के सभी मंदिरों के दान का हिसाब होना चाहिए।उनकी जांच होनी चाहिए।जाँच पूरी होने तक मंदिरों में यथास्थिति बनाई रखी जानी चाहिए। 

 राम के मंदिर में भी भाई भतीजावाद ,जीजा सालावाद, जातिवाद,मित्रवाद, असत्यवाद जम कर चला। जिसने भी अपने गले में झाँका ,उसे अपना चोरत्व नज़र नहीं आया।कहना यह चाहिए कि कलयुग में भला कौन है जो अपने गले की पड़ताल करता है! उसे तो इतना आत्म विश्वास है कि वह जो भी करता है, सत्य ही करता है।यहाँ तो लोग दूसरे के हमाम में झाँका करते हैं। मंदिरों में वही लोग गेरुआ और पीतांबर में विचरते हैं और स्वतंत्र रूप से खड़ी फसल चरते हैं। वे नहीं मानते कि राम कोई जीवंत राम हैं। उनके जाने राम मूर्ति भर हैं। इसलिए वे मूक बने खड़े हैं, हमारे लिए उनके गले में हीरे जड़े गलहार हैं , आज मानवीय मूल्य निहायत सड़े हैं। चोरी को अपना अधिकार मानते हैं। और तो और उनकी पत्नियाँ भी उनकी अंधी समर्थक हैं। क्योंकि उन्हें सोने से लादने में उनकी योजना सार्थक है। इस अंध समर्थन में उनका प्रयास भरसक है। क्या आज की 'पतिव्रताओं' पर किसी को कोई शक है? उनकी विलासिता की हर सामग्री हर साधन चकाचक है।इसलिए वे कैमरे के सामने बयान दे रहीं खटाखट है। 

 सिंहों नहीं, सियारों के झुंड में भी रंगा सियार कब तक नजर नहीं आएगा। एक न एक दिन पकड़ा अवश्य जाएगा।फिर उसका जो हाल होगा,क्या उसकी कल्पना कर पाएगा? पर यह चोर नहीं ,सभी चोरों का आत्मविश्वास है कि ऊँट की चोरी भी निहुरे-निहुरे हो सकती है। और हुई भी । उन्होंने कर भी ली। पर दुर्भाग्य उनका कि अंततः पकड़े ही गए। और अब सलाखों के पीछे अपनी किस्मत को कोस रहे हैं कि काश ! आत्म विश्वास हो तो इन राम दाम के चोरों जैसा ! जिसकी हर दुम पर सोना चाँदी हीरा मोती और पैसा ! चोर चोर होते हैं,राम भक्त या देश भक्त नहीं हो सकते। यदि उन्होंने ये सोचा होता कि ये राम हैं ,सच्चे राम हैं,कोई पत्थर की मूर्ति नहीं ,तो दान धन चुराने में हाथ जरूर काँपते। दान पात्र से लेकर बैंक काउंटर तक किंचित न हाँफते। नौकर को स्वयं के मालिक होने का गुमान हो गया। इसलिए वह अपनी मालिकी के जहान में खो गया। पर अब क्या है !दूध का दूध पानी का पानी हो गया ! किसी ने बाबरा बाबर बनकर लूटा और आज के इन रावणों ने पुनः राम की रमा को लूटा। निर्वेद के स्थान पर उगा दिया वैभव का बूटा। विलासिता ऐयासी छाई रही।भक्ति और धर्म की न परछाईं रही।उनके दिल और दिमाग में जमी काई ही रही।जो कुछ भी किया मनभाई ही बही।मुझे कोई दूध का धोया नज़र नहीं आया। पर राम को राम भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। भक्तों और अनुरक्तों के बिना राम भी राम कैसे ? राम राम राम ! हो गया काम !! कैसे लगे राम मंदिर में चोरों पर लगाम! सुबह से शाम ,एक ही काम। दाम दाम और दाम ही दाम। जय जय श्रीराम! जय जय अयोध्या धाम!! 

 शुभमस्तु, 

 27.06.2026◆12.30 प०मा० 


 ◆◆◆

हाथ की सफाई [ अतुकांतिका ]

 213/2026


              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चौंसठ कलाओं में 

बाईसवीं कला

हाथ की सफाई

पड़ी नहीं दिखाई

राम नाम की ओढ़ चदरिया

राम दाम की 

हो गई कमाई।


खाँड़ खूँदी है 

तो खाँड़ ही खाएँगे

वे भी तो राम के ही हैं

तो राम को छोड़

और कहाँ जाएँगे!


डाकुओं की नज़रों में

डाका कोई अपराध नहीं

जितना भी मिल गया

राम का प्रसाद ही सही,

राम-राम जपना

राम का दाम अपना

ये सच है 

नहीं कोई सपना।


एक सच को

 छिपाने के लिए

हजार झूठ,

जब तक मौका मिला

कर ली लूट,

मिल जो रही थी 

पूरी-पूरी छूट।


घड़ा न भरे जब तक

फूटता भी नहीं,

अब भर गया है तो

दुनिया देख रही,

कैसी कही !

बना दिया न

दान दाताओं के

दिमाग का दही,

खुल गई पापों की बही।


आओ हम सब

 जुगाली करें

हासिल क्या होगा

जीभ की खुजली ही

कुछ- कुछ दूर करें,

अंततः  होना है क्या

वही ढाक के तीन पात।


शुभमस्तु,


36.06.2026◆7.00आ०मा० 

                  ◆◆◆

सत्कार [ कुंडलिया ]

 212/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप  'शुभम्'


                         -1-

आता  अपने    द्वार   पर, करते  हम सत्कार।

अनाहूत-आहूत   जो,  तजकर   सभी विकार।।

तजकर  सभी विकार,अतिथि को देव मानना।

संस्कार   की  बात,  नहीं  भ्रू   कभी   तानना।।

करें   सभी    सम्मान, नेह    का   रखना नाता।

'शुभम्' न   करना  घात,शरण में जो भी आता।।


                         -2-

सीता  ने   दशशीश    का, किया बड़ा  सत्कार।

भिक्षा   देने  आ  गई, निज  कुटिया  के  द्वार।।

निज   कुटिया   के द्वार, हरण सीता का करके।

हुआ   बड़ा   छल  छद्म, उठाया बिना समर के।।

'शुभम्' गया दशशीश, उठा   रघुपति परिणीता।

त्राहि-त्राहि    की  चीख,कर  रही  माता सीता।।


                          -3-

रहते    जन   जो   गाँव  में, करते  हैं सत्कार।

जो भी   आता    पास   में,करते दुःख निवार।।

करते    दुःख    निवार,  पूछते   पानी- खाना।

कहते   कहाँ   निवास,  बताएँ  किस घर जाना।।

'शुभम्'  नगर  के लोग, न सबसे मतलब रखते।

शोभन  हैं   ग्रामीण,  नेह   रस   में   रत रहते।।


                         -4-

कुटिया   में   शबरी   खड़ी, करने को   सत्कार।

रामचन्द्र   भगवान   का, मन को लिया  सँवार।।

मन को लिया  सँवार, बेर चख- चख कर रखती।

खुला   प्रेम  का   द्वार, नाम   की   माला जपती।।

'शुभम्'  टेकती   एक, बढ़ी   लेकर  वह लठिया।

हुई   आज   आबाद , राम  से  उसकी कुटिया।।


                         -5-

आओ हम स्वागत करें, सुख-दुख का हर हाल।

रहता है सुख भी नहीं, दुख  क्यों करे कमाल।।

दुख क्यों करे कमाल, एक दिन वह टल जाता।

कर   उसका   सत्कार,   बनाएँ  उसका छाता।।

'शुभम्'  सचल  दो भाव,हृदय अपना समझाओ।

पकड़ धैर्य की नाव,निकल दुख निधि से आओ।।


शुभमस्तु,


25.06.2026◆9.30प०मा०

                     ◆◆◆

गुरुवार, 25 जून 2026

सारी दाल हो गई काली [ गीत ]

 211/2026

 

     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नहीं दाल में

 काला

सारी दाल हो गई काली।


राम दान के

सभी लुटेरे

पहने पीत चदरिया

तिलक लगाए

रामचन्द्र का

बसते औध नगरिया

राम पाँव के

तले पड़ा है

डाका जगत सवाली।


खूँदी खांड़

स्वाद भर खाई

गोबर में कुछ गाड़ी

जान गए सब

खेत खा गई

लगी हुई जो बाड़ी

होटल भवन

महल चुनवाये

बजा रहे घर ताली।


आया ऊँट

पहाड़ तले जब

सारी पोल खुली है

जातिवाद 

सम्बंधी मित्रों 

सबकी मिली जुली है

केले की

पर्तें-सी खुलती

लोग बजाएँ ताली।


ऊपर से

नीचे तक सबके

मुख पर लगे मुखौटे

सबकी सब

जानते कहानी

लिए कनक घर लौटे

हीरा मोती

स्वर्ण रजत की

बहती छत परनाली।


बगुला भगत

बड़े ही भोले

कौन चोर कह पाए

भैंस सहित

खोया कर खाते

जगत उन्हें सिर नाए

दर्शक भक्तों पर

रंगियों ने

अजब मोहिनी डाली।


शुभमस्तु,

25.06.2026◆6.30 आ०मा०

                   ◆◆◆

बुधवार, 24 जून 2026

न दे गरीबी कभी विधाता [ गीत ]

 210/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


न दे गरीबी

कभी विधाता

तरस-तरस मन जाए।


नहीं देह पर

वसन ढंकें जो

सुत-माता दुखियारे

नहीं आँत में

भोजन पानी

दिखते दीन बिचारे 

मदद नहीं

करता जन कोई

मन किस पर पतियाये।


देख रहीं

ललचाई आँखें

काश हमें मिल जाता

एक वक्त तो

शुष्क देह में

भोजन उदर समाता

कैसे प्रभु का

भजन करे मुख

गीत राम के गाए।


नहीं माँगना आता

भोजन

मांगे बिना न मिलता

बिना पाँव पर

खड़े हुए तो

फूल खुशी का  खिलता

जितना सोचें

'शुभम्' जिंदगी

उतनी ही उलझाए।


शुभमस्तु,


23.06.2026◆10.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

सोने के जब अंडे पाए [ पद ]

 209/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

राम राशि अपने घर लायौ।

सीता - हरण  करौ  रावण ने नहीं नेंक शरमायौ।

बात   पुरानी  त्रेता युग की अपनों जोर चलायौ।।

चढ़ौ  चढ़ावौ रामलला पै भौत-भौत मन भायौ।

गिनती में करि गड़बड़ सारी अपनी जेब भरायौ।।

कलयुग  की   ये बात नई है बड़ौ - बड़ौ इतरायौ।

बीवी   कहै   सफाई   देती  पति ने सभी कमायौ।।

होटल   भवन  दुकानें सिगरी अपने धन बनवायौ।

'शुभम्' कमाई चोरी करके मुख अपनौ चमकायौ।।


                         -2-

बगुला भगत देह के गोरे।

मर्यादा    पुरुषोत्तम    छोड़े   बने भए अति भोरे।

मर्यादा   अपनी   तजि   सारी  नोट चुराए   कोरे।।

पाँव  तले    भगवान  राम  के  सोना चाँदी   जोरे।

याद न रहौ कर्म फल पल को मन में लेत हिलोरे।।

सात   नहीं   सत्तर  पीढ़ी  को  हार खड़ाऊँ  चोरे।

बने   राम   के  कुशल प्रशासक भरे नोट के   बोरे।

'शुभम्' पाप कौ फूटि घड़ा गयौ गिरे शीश पै ओरे।।


                         -3-

राजनीति मंदिर पर भारी।

नातेदार   जाति   वारे भरि करें प्रशासक   यारी।

सत्रह-सत्रह साल एक ही गणक बनों अपचारी।।

जड़ें जमी भ्रष्टाचारी  की खेलि गयौ निज   पारी।

कोई कहै  बकै   कछु  कैसौ ऐसी लीक   बिगारी।।

दर्शक आए गए भेंट  करि  बाल  वृद्ध नर-नारी।

नाश करौ श्रद्धा कौ सिगरौ भई न चोरनु ख़्वारी।।

राम   कहाँ   बैठे   बनि  दर्शक   मूक चुराई   जारी।

'शुभम्' भेद जब खुलौ पाप कौ भांजि रहे तलवारी।।


                         -4-

सोने के जब अंडे  पाए।

दोनों    हाथ   फोड़ते   लड्डू   शीश कढ़ाई  धाए।

खांड़ खूँदते   जब  पावों से क्यों न प्रेम से  खाए।।

मूढ़   बने   वे   भक्त  राम   के सोना चाँदी  लाए।

बैठे     चोर  लुटेरे     डाकू    सोच-सोच पछताए।।

पीला पहन   दुपट्टा   धोती  भजन राम के     गाए।

चढ़ा प्रसाद नोट गहनों का किसको नहीं रिझाए।।

कृपा   करी   भगवान  राम ने  मंदिर माँहि   बिठाए।

'शुभम्' सफल जीवन चोरनु कौ दान लूटि घर धाए।।


                         -5-

राम राशि की लूट मचाई।

छिपौ भयौ तिनकौ दाढ़ी में नेंक न देत दिखाई।

कहा   जाँच   में करें जचैया उनकी हाथ सफाई।।

साँप   भगे    मोरी   ते बाहर   करते रहो खुदाई।

पीटो   जितनी   आप  लकीरें मिलनी नहीं सचाई।।

इधर   उधर    नेता नगरी   है ऊपर करें   खिंचाई।

साँप    मरै    टूटै  जनि   लाठी ऐसी राम   दुहाई।।

करें राम जी   चमत्कार  कछु मिलिहै दान चुराई।

'शुभम्' सोच मन में कछु ऐसौ दिखे राम प्रभुताई।।


शुभमस्तु,


23.06.2026◆9.15 आ०मा०

                      ◆◆◆

राम दाम की अजब कहानी [ पद ]

 208/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                        -1-

अरे मन नेंक नहीं पछितायौ।

राम  नाम की पीत चदरिया ओढ़ि अजुध्या   धायौ।

मिलौ नोट गिनिवे को मौकौ देखि- देखि ललचायौ।।

गिनतौ लाख करोड़ों निशिदिन काम बहुत ही भायौ।

सोना - चाँदी  चढ़े  अनेकों लार मुखनि भरि आयौ।।

बढ़तौ   रहौ लोभ मुख टपकौ साहस खूब जुटायौ।

एक   दिना  रखि  हरे नोट की  गड्डी  घर कूं लायौ।।

रोक न टोक मिली काहू की नित कौ नियम बनायौ।

'शुभम्' पतित है गयौ गणक मैं अपनो भवन बनायौ।


                         -2-

जाँच भई मन बहुत डरानौ।

काँपि रहौ मन भीतर-भीतर अब तौ पड़े  निभानौ।

कछु ऐसी तरकीब बताऔ  हे प्रभु राम जु  जानौ।।

राज्य  प्रमुख योगी जी अपने बुलडोजर चलवाते।

बड़े सख्त हैं   अनुशासन  के भवन बने गिरवाते।।

बचे  न डाकू चोर एक भी सबकी हालत पतली।

नाम सुनें जब-जब  अपचारी तन में आवै मितली।।

कैसे  करें  प्राण  कत बचिहें  गाइ   राम कौ गानौ।

'शुभम्'  झूठ  ही  एक सहारौ मान सकें तौ  मानौ।।


                         -3-

राम दान की हुई सफाई।

टूट गए   विश्वास   सभी के  डरते लोग -लुगाई।

लाखों   नहीं   करोड़ों    लूटे पड़ता कान सुनाई।।

शक की सूई कहाँ  रुकेगी  कौन आज यह जाने।

राजनीति   है  रही    देश   में  गिरते चारों  खाने।।

जितने मुँह   उतनी ही  बातें  कहें वही जो  भावै।

बिना करे की मिलै सेंत  में  कौन  नहीं ललचावै।।

बचें   प्राण  कैसे अब  अपने हमें बताओ   भाई।

'शुभम्' शेर  योगी  को गरजै बचें न  ताऊ ताई।।


                         -4-

राम दान कित जाइ सिधारौ।

हलचल मची देश भारत में पड़ौ बहुत ही भारौ।

भयौ   कपूर  उड़ो  अंबर  में बिना लगाए नारौ।।

पकड़ौ जाइ चोर जा दिन कूँ पकड़ि पीठ पै मारौ।।

जाँच करें जितने  अधिकारी सब इनाम पा जाएँ।

टीवी   वारे  और   मीडिया   सिगरे   रार मचाएं।।

लूटि   रहे   हैं मजा  विरोधी दिखे दाल में कारौ।

'शुभम्' लगे उनको सत्तासन आज अभी से हारौ।।


                         -5-

दाढ़ीजार कहाँ ते आए।

राम  नाम   कूँ खूब भुनायौ राम दाम ललचाए।

पहनि पीत अंबर तन ऊपर भक्तन कूँ भरमाए।।

कहते   अपनी  करी  कमाई अपने महल बनाए।

नंगे नहीं फ़क़ीर सहस  चौदह  में साज सजाए।।

गोबर में   दस लाख मिले तो नेंक नहीं शरमाए।

गहने   बेचि ईंट   बनवाईं   लूटि-लूटि धन  खाए।।

कहते   राम कृपा है हम पर जो हम शृंग चढ़ाए।

'शुभम्' पाप के घड़े भरे अब तबहुँ नहीं पछताए।।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆ 4.45 प०मा०

                     ◆◆●

योगी [ चौपाई ]

 207/2026


           


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


योगी   वेश   धरे  बहु    भोगी।

धर्म - कर्म    के   हैं   सब   रोगी।।

नहीं   योग    की    भाषा    जानें।

हठ की    चादर    तन  पर  तानें।।


योगी का  तप   कठिन साधना।

सबके  वश   का   नहीं   नाथना।।

वन   बीहड़    पर्वत   पर   जाते।

बड़ी  गुफा  में      बसे    सुहाते।।


कृषक  देश    का   साधक  भारी।

करे     साधना      स्वेद    सँवारी।।

समझें   कृषक नहीं  है   योगी।

करे  कर्म   कृषि    रहे     निरोगी।।


घूम     रहे     हैं    पहन    गेरुआ।

ज्यों गलियों में     फिरें  फेरुआ।।

नहीं  समझना   योगी  सबको ।

परखें    उनके    दैनिक   ढब को।।


जानें      नहीं      योग-परिभाषा।

सदा  भोग   रंजित    अभिलाषा।।

स्वाद    ढूंढ़ते     भोजन    माँहीं।

कामिनि चले     साथ ज्यों छाँहीं।।


ध्यान   योग    में    रमता योगी।

कर्म योग    में    निरत    निरोगी।।

योगाचरण    जीव     की    शैली।

विषय भोगरत    तन-मन  थैली।।


एक दिवस    में   योग  न  आता।

छद्म नाट्य  कर   नर   पछताता।।

करे   साधना       जो    आजीवन।

योगी की   क्यों उधड़े   सीवन??


शुभमस्तु,


22.06.2026◆12.30 प०मा०

                    ◆◆◆

कहाँ गया वह राम चढ़ावा [ गीतिका ]

 206/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहाँ   गया    वह   राम    चढ़ावा।

आया    नेंक   न   काम   चढ़ावा।।


दान-पात्र     जो        घेरे      बैठे,

चढ़ा  उन्हीं    के    चाम   चढ़ावा।


जादू     हुआ    कि    टोना   कोई,

गया कहाँ    किस    ठाम  चढ़ावा।


कागा     नहीं    चुगें    अब  दाना,

गढ़ा  किन्हीं    के    धाम  चढ़ावा।


मैंने लिया     न     चोर     बकेगा,

किया     वहीं    विश्राम   चढ़ावा।


बिना     मार    के   भूत  न  बोले,

दिखला   देगा   झाम       चढ़ावा।


'शुभम्'  करें मन   की   सब डाकू,

निकले    निश्चय    दाम  चढ़ावा।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆ 8.15 आ०मा

दाना नहीं दान खाया [ गीतिका]

 205/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दाना     नहीं       दान     खाया।

राम    का      सम्मान    खाया।।


चुग    गए    हैं      काग    मोती,

देश     का      संज्ञान      खाया।


आए     नहीं    डाकू    कहीं  से,

धर्म    का       गुणगान    खाया।


हाथ      की       ऐसी    सफाई,

देख    ली         चुपचान खाया।


नाग  हैं     बैठे       बिलों     पर,

सुप्त         अंतर्ध्यान       खाया।


कौन    कहता     चोर    हूँ     मैं ,

आस्था    का     कान     खाया।


मलिन    सरयू     हो    गई    है,

भक्ति    भाविल    भान   खाया।


खेत     खाया      बाड़    ने   ही,

पुण्य      का    बिरबान    खाया।


अब    करें    विश्वास    किसका,

राष्ट्र     का       उपधान    खाया।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆7.00आ०मा०

                   ◆◆◆

हीरा-मोती सोना-चाँदी [ गीत ]

 204/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हीरा -मोती

सोना -चाँदी

कागाओं के भोग बने।


रामचन्द्र 

कह गए सिया से

ऐसा कलयुग आएगा

चोरी नहीं

पड़ेगा डाका

कौवा मोती खायेगा

दान चुराएँगे

जो भारी

अकड़ दिखाएं खड़े तने ।


कर्ता धर्ता 

नोट गिनैया

चोर नहीं डाकू सारे

राम मौन

सब देख रहे थे

खेल करें सब बजमारे

डाकू नहीं कहेगा

मैंने

किए सकल अपराध घने।


जिसकी पूँछ उठी

वह निकला

डाकू बड़ा ढीठ पाजी

बना लिए

निज महल अटारी

हार गए प्रभु जी बाजी

काम न आया

बजरंगी का

दाँव कड़े हैं कनक चने।


राम राज की

परिभाषा को

अंगीकार किया जिसने

छोड़ा नहीं

सुबूत एक भी

दान हरण करता उसने

तान मूँछ को

घूम रहे हैं

डाकू सारे बने ठने।


कितना दण्ड

मिलेगा इनको

सौ-सौ जन्म  चुकाएंगे

कलयुग के कूकर

कब तक यों

बचकर बाहर जाएँगे

नख से शिख तक

राम-रक्त से

सारे खटमल आज सने।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆5.45 आ०

कथन सरल ये शुभ समता हो [ गीतिका ]

 203/2026





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कथन  सरल ये  शुभ  समता हो।

यहाँ-वहाँ   नित   समरसता  हो।।


ग्रीवा   नहीं     झाँकता   अपनी,

जिसने कर   दी   बड़ी खता हो।


हमने    चाहा  है   हित   सबका,

दुष्कर्मों   को   कहें   धता    हो।


वैमनस्य    हो   नहीं    धरा    पर,

सबको  निज    कर्तव्य पता हो।


सुमन   खिलें   कलियाँ   मुस्काएँ,

रहे   झूमती     हरित    लता  हो।


पतन चरित का हो न  किसी का,

जीवन में   दृढ़     नैतिकता    हो।


'शुभम्' देश के   लिए  जिएं  हम,

चाल-चलन   में  शुचि शुभता  हो।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆4.30आ०मा०

मंगलवार, 23 जून 2026

यहाँ-वहाँ नित समरसता हो [ सजल ]

 202/2026


सामांत          : अता

पदांत            : हो

मात्राभार        : 16

मात्रा पतन      : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कथन  सरल ये  शुभ  समता हो।

यहाँ- वहाँ   नित  समरसता  हो।।


ग्रीवा   नहीं     झाँकता   अपनी।

जिसने कर   दी   बड़ी खता हो।।


हमने    चाहा  है   हित   सबका।

दुष्कर्मों   को   कहें   धता    हो।।


वैमनस्य    हो   नहीं    धरा  पर।

सबको  निज    कर्तव्य पता हो।।


सुमन   खिलें   कलियाँ   मुस्काएँ।

रहे   झूमती     हरित    लता  हो।।


पतन चरित का हो न  किसी का।

जीवन में   दृढ़     नैतिकता    हो।।


'शुभम्' देश के   लिए  जिएं  हम।

चाल-चलन   में  शुचि शुभता  हो।।


शुभमस्तु,


22.06.2026◆4.30आ०मा०

                   ◆◆◆

राम को लाने वाले [ अतुकांतिका]

 201/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम को लाने वाले ?

राम से बड़े हैं,

इसीलिए  राम पीछे- पीछे हैं

वे राम के आगे खड़े हैं।


राम को लाने वाले ?

राम के भी पहले के हैं

मेरी अगर मानो तो

वे नहले पर दहले हैं।


राम को लाने वाले ?

राम से प्रणाम चाहते हैं

राम के नाम पर 

वोट  माँगते हैं।


राम-दान के गणकों ने

क्या गुल खिला दिया

राम के दाम ने 

क्या- क्या सिला दिया।


राम को लाने वाले ?

क्यों हुए  मौन हैं

डाका डाला है जिन्होंने

बताओ वे कौन हैं।


तुम्हीं  तो राम को लाए थे?

आज राम मंदिर में डाका पड़ा है

हे राम के लाने वाले ?

तू  विस्मित-सा  खड़ा है।


शुभमस्तु,


21.06.2026◆8.00 प०मा०

                  ◆◆◆

अयोध्या ठगी है [ छंद : सोमराजी/शंखनादी]

 200/2026



विधान :यमाता यमाता 

ISS ISS : 06 वर्ण।

दो चरण तुकांत।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हुई        एक    चोरी।

ठगों      की   ठगौरी।।

अयोध्या    ठगी      है।

नहीं     दिल्लगी     है।।


चुराया      गया     है।

न   ये    भी   नया  है।।

नहीं      दान       पेटी।

हुई       रार       हेटी।।


चढ़ा    था    जु  सोना।

हुआ    है   न    होना।।

धरा      में      समाया?

गणों      ने    चबाया??


बताए      न      कोई।

दुनैना          भिगोई।।

कहाँ     दान   खाया?

घरों     में    छिपाया!!


लगा       शीश    टीका।

दिखा     काम    नीका।।

बड़ा        रॉब     झाड़े।

करे        काम    आड़े।।


जपे       राम      सीता।

पढ़े       नित्य    गीता।।

यही       नीति      धर्मी।

बने     वे        कुकर्मी।।


चुरा        स्वर्ण       हीरा।

बने       मूढ़         कीरा।।

मिले       नाग      योनी।

यही      भाग     होनी।।


शुभमस्तु,


21.06.2026◆5.00प०मा०

                  ◆◆◆

राम-दाम की लूट बड़ी ये [ चौपाई ]

 199/2026


       राम-दाम की लूट बड़ी ये

                    [ चौपाई ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम - नाम    की    लूट    नहीं   ये।

राम- दाम    की   लूट   बड़ी    ये।।

समाचार      टीवी     पर     आए।

किसने      सोना    नोट    चुराए।।


भरे     पड़े     अखबार       हमारे।

दान पात्र   लुट      गए     बिचारे।।

चोर  कौन    बाहर    से     आया।

दान मिला  जो     लिया   चुराया।।


राज्य  प्रमुख    ने   जाँच   बिठाई।

किसने की    है     चौर्य    ढिठाई।।

गणकों  पर   सारा  शक    जाता।

हाथ  नहीं    कोई    भी    आता।।


खंगाले          हैं          सीसीटीवी।

मना कर   रही    गणकी    बीवी।।

कर दी     किसने  हाथ    सफाई।

खूँद खांड   खा     रहा     मिठाई।।


बचे    न    चोर       राम-अपराधी।

जिसने      चौर्य  - साधना  साधी।।

बड़ा  जाँच का       मोटा    डंडा।

नाचे     नाच      मौन      मुस्टंडा।।


कब   तक    चंपत     होगा   कोई।

नहीं  दूध      में      चादर     धोई।।

 घड़ा  भर   गया    अब   तो   भाई।

बचे    न     दोषी      लोग-लुगाई।।


टुन्ना       मुन्ना     धन्ना      जो भी।

कट  जाएगा       जैसे      गोभी।।

उच्च  अयोध्या      धाम    हमारा।

केंद्र  आस्था  का अति    प्यारा।।


शुभमस्तु,


21.06.2026◆2.00 प०मा०

                 ◆◆◆

राम-दान की लूट सुनी है [ बालगीत ]

 198/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम-दान     की   लूट    सुनी    है।

मंदिर   में    एक    छूनछुनी    है।।


सुना    चोर     बाहर    से    आया।

कोई      नहीं      देखने      पाया।।

गणकों    के     मन  धुनाधुनी    है।

राम-दान    की    लूट   सुनी    है।।


नहीं  समझ   पाए     कुछ  जाँची।

दान -चोर की       घटना    साँची।।

सीसी टीवी       शीश    धुनी    है।

राम-दान    की    लूट    सुनी   है।।


सोना     गया         पादुका चोरी।

गए    हार    कंगन   किस  मोरी।।

डाके की    क्या   राह   चुनी   है ?

राम-दान    की    लूट    सुनी   है।।


गिनती   कर्ता      बैंक      रखैया।

चोर     कहाँ    के   बोलो   भैया??

किसी   करू   ने   राह    बुनी   है।

राम-दान    की    लूट     सुनी   है।।


भवन    करोड़ों      के     बनवाए।

कहता     मैंने     स्वयं      सजाए।।

चालबाज  लग    रहा    गुनी    है।

राम-दान    की    लूट    सुनी    है।।


करामात       हाथों      की    ऐसी।

करे     धर्म     की       ऐसी-तैसी।।

मंदिर   में      ही     नागफ़नी    है।

राम-दान     की     लूट    सुनी है।।


शुभमस्तु,

21.06.2026◆11.30 आ०मा०

                  ◆◆◆

राम-दान की लूट! [अतुकांतिका]

 197/2026


           

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


साझा न किया राम-नाम

राम-दान लूट लिया

धर्म को झूठ किया

सुबह न देखी शाम

बचा नहीं ऐहतराम !


रक्षक बने  भक्षक  सभी

राम-दाम के तक्षक सभी

पूँछ तो उठेगी ही

साँच को उगलेगी ही

इंतज़ार करें अभी।


सोने की पादुकाएं

हीरा जटित स्वर्णहार

नोटों के बड़े ढेर

मच गया अंधेर

धर्म पर ओछा प्रहार।


ये चोर नहीं बाहर के

आज भी हैं अंदर ये

पड़नी है कड़ी मार

निकल पड़ेगा स्वर्णहार

दुनिया कहे छि:! छि:!! छि:!!!


नहीं पड़ी लेश भनक

करते रहे जो गणक

हुई नहीं किंचित खनक

धरी रह गई हनक

आ रही है बू ही बू !


एस आई टी का सोटा

समझें नहीं उसे छोटा

दान-दाम  चोर कौन 

अभी सभी चोर मौन

वक्त का  मात्र  टोटा

कौन सही कौन खोटा?


शुभमस्तु,


21.06.2026◆ 10.30 आ०मा०

                   ◆◆◆

राम-दाम के चोर [ दोहा ]

 196/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिपे   अयोध्या    धाम में,राम-दाम  के चोर।

स्वर्णहार    प्रभु-पादुका,   नहीं ले गए मोर।।

मंदिर   है   प्रभु    राम   का, माल उड़ाएं चोर।

राम-दान   की लूट  का,  खोज  रहे  हैं छोर।।


गिनते-गिनते     नोट वे,  उड़ा  ले   गए दान।

धुले  दूध    के   वे    रहे,   हुई    नहीं पहचान।।

लाखों  लाख  करोड़  की,  खड़ीं कोठियाँ देख।

शंकित   है   मन    देश का, दिखे मीन में मेख।।


देवालय   दूषित    किया,  मूँछ   रहे वे तान।

ऑटो से   अर्जित   सभी,कोठी बंगला शान।।

मित्र   सगे   सम्बंध   के,भरे गणक सुविचार।

पूर्व नियोजित   योजना,  लगती   है साकार।।


जाँचें    भी   जारी  सभी,   मिले न रँगे सियार।

राज्य   प्रमुख   आश्वत   हैं,पकड़ें  चोर अवार।।

राम     क्षमा    करते   नहीं, कर्ता भोगे भोग।

हया न     आई   आँख   में,  मात्र नहीं संयोग।।


पावन     मंदिर राम   का, चुरा चढ़ावा आज।

दूषित है   मन चोर का, किया पाप का काज।।

राम-भक्त     हलकान   हैं,  देख व्यवस्था दंग।

अंधा      बाँटे     रेवड़ी,     चोर   नहाएँ गंग।।


कलयुग में    प्रभु   राम के,दूषित कर आदर्श।

गणक चोर  डाकू  सभी,   झाड़   रहे हैं फर्श।।


शुभमस्तु,


21.06.2026◆9.30 आ०मा०

                 ◆◆◆

राम-दाम की लूट! [ कुंडलिया ]

 195/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                       -1-

सोने     पर     डाका   पड़ा,  देख   रहा   है   देश।

धरे     देह   पर     आवरण,  पीत   सुनहरे   वेश।।

पीत     सुनहरे    वेश, दान     की    करते   चोरी।

किधर  बचेंगे    साँप,   निकल   कर अंधी   मोरी।।

'शुभम्'   अयोध्या   धाम, छिपेंगे   वे किस   कोने।

होना   ही   है    आम,  राम   के   पचें   न   सोने।।


                         -2-

अंदर    मंदिर    के  छिपे,    राम-दान   के  चोर।

खेले     खेल     करोड़   के,  मन   में भरें हिलोर।।

मन     में    भरें   हिलोर,   हुए     चंपत   बहुतेरे।

जीजा -   साले     भेक,   लिए   मंदिर को   घेरे।।

'शुभम्'     बहाना   एक,   ले   गए     होंगे  बंदर।

हैं     डकैत    सिरमौर,   गणक  मंदिर के अंदर।।


                         -3-

राम-दाम      की  लूट  का, नया नहीं  यह  खेल।

जहाँ     व्यवस्था   भंग   हो,   चलती रेलमपेल।।

चलती          रेलमपेल,      मित्र   संबंधी लाकर।

खूँदी    खांड    अतोल,  कढ़ाई   में सिर पाकर।।

'शुभम्'  अयोध्या  धाम, नहीं  यह  लूट राम की।

कालिख़  लगी  अकूत, लूट   यह राम-दाम  की।।


                         -4-

दर्शन     करते     राम   के,  डाकू   चोर   असंत।

साधु     संत  प्रभु  भक्त   भी, चोरी  करें   महंत।।

चोरी      करें      महंत,     नहीं   बाहर  से   आए।

डंसते    बिल     के  साँप, नोट  गिनते जो    पाए।।

'शुभम्'   न   भय  लवलेश,रोक या टोक न वर्जन।

नहीं    एक   भी    चोर,   करें  जो   प्रभु के दर्शन।।


                         -5-

होना     ही    है    एक   दिन,  शुद्ध  दूध का दूध।

अलग-थलग   पानी   रहे,  विमल अयोध्या  सूध।।

विमल     अयोध्या   सूध,  दान-धन  सोना   हीरे।

गणक    बोलते     झूठ ,  खड़े   सरयू   के   तीरे।।

'शुभम्'   एक   दिन   भेद, खुलेगा पड़ना   रोना।

जो   बोया   है  बीज, फसल का जो फल होना।।


शुभमस्तु,


21.06.2026◆ 8.30 आ०मा०

                     ◆◆◆

धरती के शृंगार:वृक्ष [ कुंडलिया ]

 194/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

धरती      के     शृंगार    हैं, घास   लताएँ   वृक्ष।

अनुपम  शोभा    सोहती, तना  मनुज का  वक्ष।।

तना मनुज का वक्ष,विविध फल  लगते उन पर।

पोषक   से   भरपूर,  विटामिन  के हैं  तरु घर।।

'शुभम्'    लगाएँ   आप,अन्यथा  जगती मरती।

वृक्ष   न    काटें   एक,  तभी  हँसती   है धरती।।


                         -2-

करते     हैं    मानव  नहीं,   देखभाल भरपूर।

वृक्ष    नहीं    पनपें   धरा,  रहें  अहं  से चूर।।

रहें    अहं    से   चूर,   लगाते   बाड़  न पानी।

फोटो    में    मदमस्त, बने   नर   राजा- रानी।।

'शुभम्'   सूखते   पेड़,धूप में      जलते-मरते।

स्वार्थलिप्त   मनुजात,  नहीं  तरु-सेवा करते।।


                         -3-

नेता    भाषण   में   कहें,   खूब लगाओ   वृक्ष।

छायाचित्रों     में   लगे,   सब    नेता    हैं दक्ष।।

सब   नेता   हैं   दक्ष, सभी   अखबार भरे   हैं।

नहीं    देखता    एक, लगे    वे   वृक्ष   हरे   हैं??

'शुभम्' सभी शुभ श्रेय,  शीश   पर अपने लेता।

जनता    तो    बस   भेड़,  हुर्रते   उसको नेता।।


                         -4-

केला     जामुन     संतरा,   मधुर  रसीले  आम।

खरबूजा    तरबूज   का,  अलग  खेत में काम।।

अलग खेत   में   काम, बाग   में  लटकीं कीवी।

चीकू    करें    कमाल,  खुली   किन्नू  की  नीवी।।

'शुभम्'  फलों   के  वृक्ष,  लगाते   मह-मह मेला।

विविध   स्वाद   के   स्रोत, संतरा  जामुन केला।।


                         -5-

सावन    आया     झूम   के,  अमराई  में  आम।

वृक्ष    सभी    खुशहाल  हैं,   झूले   पड़े ललाम।।

झूले   पड़े    ललाम,   झूलतीं   जिन  पर राधा।

संग   झूलते    श्याम,   न  पड़ती  पल को  बाधा।।

'शुभम्'    गोपियाँ-गोप,    लगाते    झोंटे पावन।

झीनी    पड़ें    फुहार,  बाग   में    सरसे सावन।।


शुभमस्तु,

19.06.2026◆5.30 आ०मा०

                  ◆◆◆

बुधवार, 17 जून 2026

प्यास ढूंढ लेती पानी को [ गीत ]

 193/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप शुभम्'


प्यास ढूँढ़ लेती 

पानी को 

जिजीविषा की बात।


कुँए बाबली

बहुत बनाए

खोजे सरिता सागर

कहाँ-कहाँ

मानव ने ढूँढ़ा

पानी  लेकर गागर

बीहड़ वन के

पत्थर में भी

रुका  नहीं मनुजात।


खेल रही

खतरों से बाला

बीहड़ बीच अधीर

लिए घड़ा 

भरती जल शीतल

नहीं नदी का तीर

भयाक्रांत 

एकांत शून्य में

दिन की करता रात।


नहीं साथ में 

सखी सहेली

फिर भी चल निर्बाध

मंजिल पाई है

बाला ने

कठिन साधना साध

मन में है

संतोष बड़ा ही

शिथिल नहीं मन गात।


शुभमस्तु,


16.06.2026◆2.00 प०मा०

                   ◆◆◆

कहता कौन नहीं अब रावण [ गीतिका ]

 192/2026





©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहता    कौन  नहीं  अब  रावण।

त्रस्त   दुखी   रावण   से जनगण।।


समझ   रहा   मैं    ही   बलशाली,

काँप रहा अवनी  का  कण-कण।


ध्वंश  तभी    होगा    रावण   का,

जब होगा  फिर    राम-अवतरण।


दृष्टि  सभी  की   लगी   उधर   ही,

हत  मानवता    रिसते   हैं    व्रण।


नहीं    अस्मिता    की  कुछ चिंता,

मात्र     चाहता     जग-आकर्षण।


मानवता    का     क्षय   होता    है,

दानवता  से   कंपित    तृण-तृण।


'शुभम्'  मूढ़  नर अभी सँभल जा,

क्षीण    हो  रहा  तेरा    क्षण-क्षण।


शुभमस्तु,


15.06.2026◆7.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

त्रस्त दुखी रावण से जनगण [ सजल ]

 191/2026



समांत          : अण

पदांत           :अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कहता    कौन  नहीं  अब  रावण।

त्रस्त   दुखी   रावण   से जनगण।।


समझ   रहा   मैं    ही   बलशाली।

काँप रहा अवनी  का  कण-कण।।


ध्वंश  तभी    होगा    रावण   का।

जब होगा  फिर    राम-अवतरण।।


दृष्टि  सभी  की   लगी   उधर   ही।

हत  मानवता    रिसते   हैं    व्रण।।


नहीं    अस्मिता    की  कुछ चिंता।

मात्र     चाहता     जग-आकर्षण।।


मानवता    का     क्षय   होता    है।

दानवता  से   कंपित    तृण-तृण।।


'शुभम्'  मूढ़  नर अभी सँभल जा।

क्षीण    हो  रहा  तेरा    क्षण-क्षण।।


शुभमस्तु,


15.06.2026◆7.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

जलजीवालय मछली वाला [ बालगीत ]

 190/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जलजीवालय      मछली     वाला।

लगता   मुझको  बड़ा     निराला।।


उसमें       रंग-बिरंगी        मछली।

तैर  रही    हैं   सब     हैं  असली।।

करते      बिजली-बल्ब    उजाला।

जलजीवालय     मछली    वाला।।


बना-बनाया       भोजन     पातीं।

खूब      तैरतीं       वे     उतरातीं।।

दाना         रंग-बिरंगा        काला।

जलजीवालय    मछली     वाला।।


छोटी-सी  है     उनकी       दुनिया।

प्राण वायु     करती   छुनछुनिया।।

फिल्टर     में     स्पंजी      जाला।

जलजीवालय     मछली   वाला।।


देख मछलियाँ   हम    खुश  होते।

हँसने    लगते     बालक     रोते।।

हरा     पेड़     पापा    ने    डाला।

जलजीवालय     मछली   वाला।।


बना  काँच का     सजल  सरोवर।

मछली    तैर   रहीं   हैं   छर-छर।।

'शुभम्' शीत    में   हीट -दुशाला।

जलजीवालय      मछली   वाला।।


शुभमस्तु,


14.06.2026◆4.30 प०मा०

                     ◆◆◆

कटे -फटे को सीती हूँ [ बालगीत ]

 189/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कटे-फटे        को      सीती      हूँ।

मैं    परहित    में      जीती      हूँ।।


सभी    मुझे     सूई     कहते    हैं।

वस्त्र  नए     सिलते     रहते    हैं।।

धागे  के      बिन      रीती        हूँ।

कटे-फटे         को      सीती    हूँ।।


कच-कच   कैंची    जिसे   काटती।

खण्ड-खण्ड    में   वस्त्र   बाँटती।।

करती      मैं       मनचीती       हूँ।

कटे-फटे       को      सीती      हूँ।।


चुभकर  नहीं      कष्ट     मैं   देती।

करती  मदद     हो    सके   जेती।।

कहती      मैं     अपबीती        हूँ।

कटे-फटे       को      सीती      हूँ।।


चुप -चुप   चलकर  बढ़ती  रहती।

नहीं प्रशंसा     अपनी     कहती।।

कड़वी  मधुर     न    फीकी    हूँ।

कटे-फटे      को     सीती      हूँ।।


सीखा     मैंने      नहीं      बाँटना।

कैंची  जैसा      कभी     काटना।।

अपने      ऑंसू        पीती      हूँ।

कटे-फटे        को     सीती     हूँ।।


शुभमस्तु,


14.06.2026 ◆3,.30 प०मा०

                     ◆◆◆

दुनिया बड़ी निराली आली [ बालगीत ]

 188/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दुनिया    बड़ी    निराली   आली।

कहीं    लाल   पीली या  काली।।


दिन  में   होता      खूब      उजेरा।

रात     अँधेरी     सुखद     सवेरा।।

लदी   हरे    पल्लव    से     डाली।

दुनिया   बड़ी      निराली  आली।।


कलकल कर    बहती  है   सरिता।

लगती है   धरती    की    कविता।।

टपकें    छप्पर      बहें     पनाली।

दुनिया  बड़ी     निराली    आली।।


आसमान     में     उड़ें      कबूतर।

मोर   बाग     में,   करें    भेक  टर।।

 भरी   बतासों     से    नभ - थाली।

दुनिया  बड़ी      निराली   आली।।


ऊँचे     पर्वत      गहरे      सागर।

उथली  पोखर    ताल    सरोवर।।

वर्षा     कभी    प्रभंजन     वाली।

दुनिया  बड़ी      निराली   आली।।


पकी  फसल  के खेत    खड़े   हैं।

तरबूजे    हो     गए    बड़े      हैं।।

'शुभम्'  बजाओ  मिलकर ताली।

दुनिया  बड़ी     निराली   आली।।


शुभमस्तु,


14.06.2026◆10.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...