सोमवार, 27 अप्रैल 2026

स्वाद आम का अतिशय खट्टा [ गीतिका ]

 146/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



स्वाद  आम   का   अतिशय  खट्टा।

कीर       ढूँढ़ता          छट्टा-छट्टा।।


अमराई     में        आई        गोरी,

भर     आमों   से   लिया   दुपट्टा।


चला   प्रभंजन     रूख     उखाड़े,

लगा     आम का    ऊँचा     चट्टा।


पत्थर   मार     तोड़ते      अमियाँ,

बालक    गँवई       फेंकें      गट्टा।


करो  न  ओछे     काम    बालको,

लगे  शान    को     किंचित  बट्टा।


सोच समझ   कर   खेल  खेलना,

नहीं समझना     जीवन     ठट्टा।


'शुभम्'   दाँव   पर  लगे न जीवन,

नहीं  मानना     इसको        सट्टा।


शुभमस्तु,


27.04.2026◆9.00आ०मा०

                     ◆◆◆

कीर ढूँढ़ता छट्टा-छट्टा [ सजल ]

 145/2026


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समांत             : अट्टा

पदांत              :अपदांत

मात्राभार          :16

मात्रा पतन        : शून्य


स्वाद  आम   का   अतिशय  खट्टा।

कीर       ढूँढ़ता          छट्टा-छट्टा।।


अमराई     में        आई        गोरी।

भर     आमों   से   लिया   दुपट्टा।।


चला   प्रभंजन     रूख     उखाड़े।

लगा     आम का    ऊँचा     चट्टा।।


पत्थर   मार     तोड़ते      अमियाँ।

बालक    गँवई       फेंकें      गट्टा।।


करो  न  ओछे     काम    बालको।

लगे  शान    को     किंचित  बट्टा।।


सोच समझ   कर   खेल  खेलना।

नहीं समझना     जीवन     ठट्टा।।


'शुभम्'   दाँव   पर  लगे न जीवन।

नहीं  मानना     इसको        सट्टा।।


शुभमस्तु,


27.04.2026◆9.00आ०मा०

                     ◆◆◆

क्यों भूलता वे पुस्तकें [ अतुकांतिका ]

 144/2026


        

©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पुस्तकों को पढ़ा

आगे बढ़ा

ऊपर चढ़ा

जीवन गढ़ा,

क्यों भूलता वे पुस्तकें।


छोड़ दीं अब पुस्तकें

स्वाध्याय तेरा शून्य है,

आज तेरा 'कल'  में घुसा

अंतर्जाल में ऐसा फंसा

बन गया नर घरघुसा।


ज्ञान की वे देवियाँ

अध्यात्म की वे वेदियाँ

जो पुस्तकें तुमने पढ़ीं

जिंदगी की सीढ़ियां

ऊँची चढ़ीं,

पर आज तू भूला उन्हें।


पुस्तकों से दूरियाँ

कहना नहीं मजबूरियाँ

थीं  जिंदगी की लोरियाँ

सुख चैन की निदिया मिली।


हम पूजते थे पुस्तकें

हम पूजते हैं पुस्तकें

वे मौन माँ की बोलियाँ

रस की भरी वे गोलियाँ

हर समय की साथी वही

जब हाथ में पुस्तक गही।


ज्ञान की बहती नदी

रुकती नहीं सदियों सदी

मत पुस्तकों को छोड़ तू

मत पुस्तकों से मोड़ मू।


शुभमस्तु,


23.04.2026◆7.00प०मा०

                     ◆◆◆

रोटी की धरती पर [ नवगीत ]

 143/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रोटी  की  धरती  पर

रमते

मूली नमक पियाज।


जले उदर में

आग भूख की

जो मिल जाए खाऊँ

न हो मिठाई

दाल भात भी

सूखे रोट चबाऊँ

अंतड़ियाँ

कुलबुला रही हैं

करतीं तुमुल रियाज।


बड़े चाव से

स्वाद आ रहा

भले जली है रोटी

नौंन प्याज

अमृत से लगते

लगे न रोटी खोटी

भूख न देखे

रूखी-सूखी

चलता यही रिवाज़।


धनिक भले

कंगाल भिखारी

उदर सभी का एक

भरे न सोने 

चाँदी से जो

नहीं चाहिए केक

जिससे मिले तृप्ति

अमृत है

जीवन का यह राज।


शुभमस्तु,


23.04.2026◆ 12.15 प०मा०

                  ◆◆◆

सुकाम्यता [त्रिभंगी छंद]

 142/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रभु जी दुख हरना,देर न करना,भूलें मेरी,क्षमा करें।

मैं शरण तुम्हारी,नित बलिहारी,जपता मन में,पीर हरें।


प्रभु अन्तर्यामी,जीव सकामी,नाम जपूँ मैं,नित्य शिवम्।

जड़-चेतन व्यापी,घोर उपाधी,घिरा हुआ है,नित्य शुभम्।।


सबका हित करना,संकट हरना,कर्मानुसार,फल देते।

अग-जग के दृष्टा,सबके सृष्टा,सब है संभव,चल जेते।।


सरिता नित बहती,कुछ-कुछ कहती,रुकना न कभी,गति जीवन।

रुकना ही मरना,निज पथ चलना, ये स्वप्न भंग,है छीजन।।


जो जिएं देश को,नहीं वेश को,देशभक्त वे,कहलाते।

सीमा के रक्षक,हुए न तक्षक,वे हतभागी,बन जाते।।


शुभमस्तु,


22.04.2026◆10.45 आ०मा०

                     ◆◆◆

चिड़िया पाँच बजे जग जाती [ बालगीत ]

 140/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चिड़िया   पाँच   बजे   जग  जाती।

नित्य    भोर   में    मुझे    उठाती।।


मुख्य    द्वार    पर     लटकीं  बेलें।

जिन पर   चिड़ा- चिड़ी नित खेलें।।

फुदक-फुदक    कर   गाना  गाती।

नित्य भोर     में     मुझे    उठाती।।


कहती   चिड़िया   आलस   छोड़ो।

लगन लगा   प्रभु   से मन   जोड़ो।।

पाठ    कर्म     का    मुझे  पढ़ाती।

नित्य  भोर    में    मुझे     उठाती।।


जिस दिन चिड़िया चोंच न खोले।

मुड़गेरी    पर   बैठ    न    बोले।।

मुझको    उसकी   याद  सताती।

नित्य  भोर   में    मुझे    उठाती।।


चांव - चांव     चूँ      करते    बच्चे।

लगते     कितने     भोले    सच्चे।।

उनको     दाना      चुगने     जाती।

नित्य    भोर     में    मुझे  उठाती।।


एक      घोंसला     उसका   प्यारा।

सघन  पल्लवों    में     है    न्यारा।।

'शुभम्' चिड़ा सँग नित चिचियाती।

नित्य    भोर    में   मुझे   उठाती।।


शुभमस्तु,


21.04.2026◆8.00 आ०मा०

                    ◆◆◆

श्वान युगल मुझको अति भाता [ बालगीत ]

 141/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्वान युगल  मुझको  अति  भाता।

मुख्य   द्वार पर    लोट   लगाता।।


श्वान   साँवला   लता    कुंज   में।

विमुख   सदा वह  काक गुंज में।।

जो भी मिल  जाता    खा   जाता।

श्वान युगल मुझको   अति भाता।।


श्वानी     गौर    वर्ण     चितकबरी।

हर  आहट    की     लेती  खबरी।।

श्वान    साथ    में   तान   मिलाता।

श्वान युगल मुझको    अति भाता।।


नहीं    परिचितों      पर   वे   भूँकें।

नव    आगत पर     सस्वर   दूंकें।।

कभी - कभी    रद   दृश्य दिखाता।

श्वान युगल मुझको   अति  भाता।।


अनायास       शरणागत     आया।

मेरे घर   भर   को   अति    भाया।।

बना   हुआ   घर   भर   का  त्राता।

श्वान युगल  मुझको   अति भाता।।


जीव जगत    के   सब   हैं   प्यारे।

हैं  स्वभाव    भी    उनके    न्यारे।।

अद्भुत    उनमें      क्षमता    पाता।

श्वान  युगल मुझको   अति भाता।।


शुभमस्तु,


21.04.2026◆8.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

पंच चिड़ा की संसद बैठी [ गीत ]

 139/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पंच चिड़ा की

संसद बैठी

करने नेक विचार।


आया है मधुमास

खिले हैं 

किसलय हरे हजार

बूढ़े तरुवर 

हरियाए हैं

उमड़ रहा है प्यार

जिजीविषा हो

तो ऐसी हो

देख रहा संसार।


जब तक

प्राण रहें किंचित भी

मरे न आशा मित्र

सूखे द्रुमवत

रहो हरे नित

रखना चारु चरित्र

इसी बात का

करने बैठी

संसद आज निवार।


सुख बाँटो

सुख तुम्हें मिलेगा

देना शीतल छाँव

हरियाली से

हरा भरा हो

नगर खेत हर गाँव

जब तक रहे

प्राण इस तन में

कभी न मानें हार।


शुभमस्तु,


21.04.2026◆6.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

जिसने जग में नाम किया है [ गीतिका ]

 138/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिसने  जग   में   नाम   किया है ।

कर्मठ   जीवन   सदा   जिया  है।।


करता  है  नर   नष्ट    समय  को,

विष का  ही  वह   घूँट  पिया   है।


विपदा  झेल   भटकता   वन - वन,

युगल ख्यात  वह   राम - सिया है।


निशिदिन जल-अभिसिंचन करती,

कहलाती   जग    में    नदिया  है।


घरनी  घर    को    रहे    समर्पित,

घर-घर   में  विख्यात   तिया   है।


फल  लगते   ही   झुकते   तरुवर,

विनय भाव सिर    धार   लिया है।


'शुभम्'  कर्म  है  बीज   योनि का,

जन्म-जन्म   महके    बगिया   है।


शुभमस्तु,


20.04.2026◆6.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

कर्मठ जीवन सदा जिया [ सजल ]

 137/2026


  

समांत           : इया

पदांत            : है

मात्राभार        :16.

मात्रा पतन      :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जिसने  जग   में   नाम   किया है ।

कर्मठ   जीवन   सदा   जिया  है।।


करता  है  नर   नष्ट    समय  को।

विष का  ही  वह   घूँट  पिया   है।।


विपदा  झेल   भटकता   वन - वन।

युगल ख्यात  वह   राम - सिया है।।


निशिदिन जल-अभिसिंचन करती।

कहलाती   जग    में    नदिया  है।।


घरनी  घर    को    रहे    समर्पित।

घर-घर   में  विख्यात   तिया   है।।


फल  लगते   ही   झुकते   तरुवर।

विनय भाव सिर    धार   लिया है।।


'शुभम्'  कर्म  है  बीज   योनि का।

जन्म-जन्म   महके    बगिया   है।।


शुभमस्तु,


20.04.2026◆6.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

लोहा और सोना चाँदी [ अतुकांतिका ]

 136/2026



    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इन्होंने लोहा दिया

उन्होंने लोहा लिया

सोना उछल कर 

जाग उठा,

चाँदी चमक उठी

चहक उठी।


लोहा लेने वालों का

लोहा देने वालों से

परस्पर भौंकनीय 

सम्बंध है,

कहीं न कहीं

सोने - चाँदी का

इनसे अनुबंध है।


लोहे से पिटता रहा

सोना

पिटती है चाँदी भी,

लोहे से विलग होकर

बेचारे 

जाएँगे भी कहाँ!


लोहे से लोहे की

टकराहट

बढ़ती गई खटपट

जन हानि

धन हानि

राष्ट्रों की संपदा की हानि

और उधर सोना

जाग गया

चाँदी भी क्यों पीछे रहे।


लोहे से लोहे की

टकराहट

बढ़ाती है अशांति

दुनिया में अकुलाहट,

पता नहीं क्या हो !

न रही मानवता

न दया ही।


किस मोड़ पर 

आकर खड़ी है दुनिया

क्या यही विनाश का

संकेत है,

नहीं जानता

कोई भी झुकना

इंसान  ही  

इंसान का

आखेट है।


शुभमस्तु,


17.04.2026◆9.00 आ०मा०

                      ◆◆◆

लोहा लेना [ अतुकांतिका ]

 135/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबके वश का नहीं होता

ले लेना लोहा

लोहा लेने के लिए

सामर्थ्य भी तो चाहिए

शक्ति भी होनी चाहिए।


रावण ने श्रीराम से 

लोहा लिया

कंस ने श्रीकृष्ण से

लोहा लिया

आज श्रीराम के साथ

रावण का

श्रीकृष्ण के साथ

कंस का नाम भी

लिया जाता है।


महिषासुर ने

माँ दुर्गा से लोहा लिया

शुम्भ निशुम्भ ने

लोहा लिया,

चण्डमुण्ड 

धूम्रलोचन और

 रक्तबीज ने भी

लोहा लिया,

दुर्गा सप्तशती इसका

बखान करती है,

लोहा लेने वालों की

महिमा का भी

परोक्ष बयान करती है।


आज भी पुतिन से 

जेलेन्सकी

अमेरिका और इसराइल से

ईरान

लोहा ले ही रहे हैं,

जो हो रहा है

सब देख रहे हैं,

इतिहास की 

पुनरावृत्ति होती है,

हो ही रही है।


लोहा लेने

और देने का काम

कभी बंद नहीं हुआ,

सबके मूल में

एक ही तत्त्व अनुस्यूत है

वह है अहंकार, 

जो कभी मरता नहीं है,

बस देश काल और 

स्थान के अनुसार

रूप और पात्र बदलता है।


शुभमस्तु,


17.04.2026◆1.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

क्या- क्या वरणीय है! [ अतुकांतिका ]

 134/2026



    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


टेढ़ीमेढ़ी चाल

खुरदरा आचरण

भड़कीला आवरण

विद्रूप चरित्र

रूपसी अपवित्र

सर्वत्र 'वंदनीय'  हैं।


समझे सर्वजेता

हम-आप नहीं,नेता

प्रत्यक्ष नहीं लेता

शनैः शनैः अंड सेता

हर आम को

'नमनीय'   है।


ठीक समझे हैं आप

वक्र चले सदा साँप

सभी रहे यहाँ काँप

पिलाते हैं  दुग्ध

होते देख-देख मुग्ध

नित्य 'जपनीय'  है।


सीधा सरल या सपाट

हर कोई देता  डांट

सिल्क पहने या टाट

सदा खड़ी उसकी खाट

इनको 'निंदनीय' है।


खोई श्रेष्ठ की पहचान

पूज्य दुष्ट ही इंसान

वही काव्य भी महान

जहाँ  वक्रता का वितान

नहीं होता 'कमनीय' है।


शुभमस्तु,


16.04.2026◆1.15 प०मा०

                 ◆◆◆

दो वक्त की भरपेट रोटी [ गीत ]

 133/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दो वक्त की

भरपेट रोटी

सबको सुलभ होतीं नहीं।


रात -दिन

जी तोड़ श्रमरत

तन से पसीना बह रहा

रोटी मिलें 

ईमान की नर-

देह का

कण-कण दहा

नारियाँ

तपती दुपहरी

ईंट सिर ढोती रहीं।


बैठ ए सी 

कक्ष में क्या

रोटियाँ अर्जित करें ?

ईंट ढालें

स्वर्ण की जो

दीन को वर्जित करें

किंतु रोटी 

है जरूरी

उदर में लपटें दहीं।


घूमता 

संसार सारा

गोल रोटी के लिए

परिक्रमा

दिन-रात होती

कौन भूखा यों  जिए

नित्य खाए

कौन रबड़ी

अन्न बिन जीवन कहीं?


शुभमस्तु,


कलयुग का नित वास [ दोहा गीतिका]

 132/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव की मन बुद्धि में,कलयुग का नित वास।

दूषित   उसके   कर्म   हैं,  दुश्चिंतन  का दास।।


धनिक  अहं  में  चूर हैं,  करते   सदा अनीति,

करते   घृणा   गरीब   से,  रसना   में परिहास।


फूटी   आँख न   भा रहे, अमरीका को  अन्य,

विश्व-शांति   भाती   नहीं,चाह   रहा ठकुरास।


बिना   धैर्य  सब  व्यर्थ  है, वैभव शक्ति अकूत,

जन-जन के  हित  के  लिए, फैले नया उजास।


चिंतन  में  कल्याण  का, चमक  रहा हो भानु,

चलता है तब प्रेम का, पल-पल   प्रमन प्रभास।


घोड़ों   को   दाना    नहीं,रहे   हिनहिना नित्य,

गदहों  को   अखरोट   हैं, अब  न सुहाती घास।


'शुभम्'    फटे   में  डालना, नहीं  मित्रवर पैर,

अगर   पड़ौसी   लड़  रहे,कभी  न  जाना पास।


शुभमस्तु,


13.04.2026◆7.00आ०मा०

                 ◆◆◆

धनिक अहं में चूर हैं [ सजल ]

 131/2026


           

समांत          : आस

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :24.

मात्रा पतन     : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव की मन बुद्धि में,कलयुग का नित वास।

दूषित   उसके   कर्म   हैं,  दुश्चिंतन  का दास।।


धनिक  अहं  में  चूर हैं,  करते   सदा अनीति।

करते   घृणा   गरीब   से,  रसना   में परिहास।।


फूटी   आँख न   भा रहे, अमरीका को  अन्य।

विश्व-शांति   भाती   नहीं,चाह   रहा ठकुरास।।


बिना   धैर्य  सब  व्यर्थ  है, वैभव शक्ति अकूत।

जन-जन के  हित  के  लिए, फैले नया उजास।।


चिंतन  में  कल्याण  का, चमक  रहा हो भानु।

चलता है तब प्रेम का, पल-पल   प्रमन प्रभास।।


घोड़ों   को   दाना    नहीं,रहे   हिनहिना नित्य।

गदहों  को   अखरोट   हैं, अब  न सुहाती घास।।


'शुभम्'    फटे   में  डालना, नहीं  मित्रवर पैर।

अगर   पड़ौसी   लड़  रहे,कभी  न  जाना पास।।


शुभमस्तु,


13.04.2026◆7.00आ०मा०

                 ◆◆◆

'उलूक' [ अतुकांतिका ]

 130/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मान न मान

मैं सबका मेहमान,

मैं सबसे महान

मैंने लिया है ठान

मेरा सबसे ऊंचा वितान।


मैं खम्भे पर चढ़ जाऊँगा

करिश्मा दिखाऊँगा

विश्वशांति का दूत हूँ

अवार्ड मुझे चाहिए,

प्रत्यक्ष हूँ सुबूत हूँ

वैसे शक्ल से उलूक हूँ।


कोई मुझे मियां मिट्ठू कहे

कोई निखट्टू कहे

जिसे जो कहना है

कहता रहे,

पर मैं सबसे मलूक हूँ,

ऊत हूँ।


मेरा मन

मेरी मनमानी

किसी की नहीं मानी

अपनी ही तानी

बनती हुई बात उलझानी।


देख रहे हैं सब

देखते रहो,

मुझे क्या ?

मैं किसी को नहीं देखता,

'तुरुप' का पत्ता

आत्मघोषित सत्ता

अलबत्ता,

जैसे कोई बिगड़ा हुआ कुत्ता,

हरियाली के बीच कुकुरुमुत्ता।


शुभमस्तु,


10.04.2026◆3.45आ०मा०

                 ◆◆◆

कवियों की कतार के आगे [ गीत ]

 129/2026


 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कवियों की

कतार के आगे

दौड़ रहे   सम्मान।


हर कवि को

यह चाह जगी है

पहले मैं पा जाऊँ

भले दबाने 

पड़े पाँव भी

मल-मल तेल लगाऊँ

ले लो चाहे

कितना भी धन

बनूँ काव्य- धनवान।


गौरव बना

काव्य का कोई

कोई कवि आदित्य

कालिदास कोई

कविता का

बिना किसी औचित्य

एक तराजू में

तुलते हैं

बीस पंसेरी धान।


रूप सुंदरी

रूप छटा की 

बिखरा रही सुगंध

गले लगाती

भर आलिंगन

कसे बाँह के बंध

ढूँढ़ रही

एकांत मिले जो

कोना यदि सुनसान।


धन देकर

क्रय किए जा रहे

पटका शॉल प्रमाण

सब चलता

पर्दे के पीछे

पाँव   खूँदते   खांण

छंद ज्ञान 

अनभिज्ञ चितेरे

लुटा रहे निज जान।


अंधों में 

काने राजा की

बढ़ी हुई है साख

बटर लगाना है

अति उत्तम

लिया नाक से चाख

अखबारों 

मुखपोथी पर है

साहित्यिक गुणगान।


शुभमस्तु,


09.04.2026◆ 10.45 आ०मा०

                 ◆◆◆

सुखद यही संदेश है [ सोरठा ]

 128/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 रखें    हृदय  में   धार,सुहृद   सुखद संदेश को।

शुभकर   सत उपहार,जीवन के भवितव्य का।।

 है   उपकारी   भाव,   स्वजनों   के संदेश   में।

  मित्र    तुम्हारी     नाव, पार   उतारें  धार   से।।


 साधु-संत      संदेश  ,युग-युग    से देते     रहे।

रहकर   देश-विदेश,   परहित   में   जीना सभी।।

संतति      को   संदेश,     मात-पिता देते   सदा।

भीत न हो लवलेश ,  चुरा   न  जी श्रम से   कभी।। 


 मानवता      का       सार,   पौराणिक संदेश  में।

 उनमें    जन   उपकार,  छिपा हुआ सर्वत्र     ही।।

सकल    सृष्टि   भंडार,   ग्रहण   करें संदेश    तो।

शुभतम पर उपकार ,सीख  मिले   हर व्यक्ति   को।।


जब   लदते    बहु   बौर,  झुकते हैं तरु भार   से।

 करना    मन   में   गौर,    मानव     हित संदेश है।।

देती     सरि   संदेश,कलकल   से अपनी   यही।

मानव   धरे   सुवेश,    चरैवेति     के   गान     से।।


होता    सुखद    विहान,वन पाखी कलरव करें।

 रहे   न  तम    का    भान, फैलाएं संदेश   वे।

गिरती - चढ़ती    खूब,   चींटी हार न मानती।

नहीं  जानती   ऊब,   देती   श्रम -  संदेश जो।।


वैसा ही   फल लाभ,  जैसा  जिसका कर्म    है।

सन्निविष्ट   उस गाभ,   सुखद  यही संदेश  है।।


शुभमस्तु,


09.04.2026◆5.30आ०मा०

                    ◆◆◆

पकी फसल को काट [ गीत ]

 126/2026


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पकी फसल को काट

मुदित मन

स्वप्न करे साकार।


रंग सुनहरा

बालें झूमी

पछुआ  हवा बहे 

देख फसल को

लड्डू फूटें

मन के ताप दहे

श्रम का फल

मिलने वाला है

भरें गेह आगार।


एक साल को

खाने भर को

होगा घर गोधूम

पीले हाथ करे

बिटिया के

रही सफलता चूम

भूसा  है

पशुओं का भोजन

बोरों में भर सार।


भरी दुपहरी में

किसान ने

सिर पर साफा साध

स्वेद बहाने को

निकला है

किया नहीं अपराध

है वैशाख 

वसंत माह में

मिला  कृषक -उपहार।


शुभमस्तु,


07.04.2026◆5.00 आ०मा०

                  ◆◆◆

सबको अपने लगें दुलारे [ गीतिका ]

 125/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबको     अपने      लगें    दुलारे।

माँ    को     एकचक्षु    सुत प्यारे।।


होता   नहीं    बुरा - अच्छा    कुछ,

बस  निजत्व    ने   पाँव    पसारे।


लैला    न     थी      सुंदरी    नारी,

पर मजनू    की  दृग     की   तारे।


इस मन    को    भा  जाए जो भी,

दिखते   उसे    वहीं      उजियारे।


देख    अजनबी   भौंकें     कूकर,

बनें      पालतू      टरें     न   टारे।


अपनेपन    का   मोल    बड़ा   है,

अनभाए   सब      लगते     खारे।


'शुभम्' श्याम  से  प्रीति  लगा  ले,

खुलें  प्रेम   से     बंद       किवारे।


शुभमस्तु,

06.04.2026◆7.15 आ०मा०

                 ◆◆◆

होता नहीं बुरा-अच्छा कुछ [ सजल ]

 124/2026



समांत          : आरे

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      :16.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबको      अपने      लगें    दुलारे।

माँ    को    एकचक्षु    सुत  प्यारे।।


होता   नहीं    बुरा - अच्छा    कुछ।

बस  निजत्व    ने   पाँव    पसारे।।


लैला    न     थी      सुंदरी    नारी।

पर मजनू    की  दृग     की   तारे।।


इस मन    को    भा  जाए जो भी।

दिखते   उसे    वहीं      उजियारे।।


देख    अजनबी   भौंकें     कूकर।

बनें      पालतू      टरें     न   टारे।।


अपनेपन    का   मोल    बड़ा   है।

अनभाए   सब       लगते     खारे।।


'शुभम्' श्याम  से  प्रीति  लगा  ले।

खुलें  प्रेम   से     बंद       किवारे।।


शुभमस्तु,

06.04.2026◆7.15 आ०मा०

                 ◆◆◆

मूर्खता की सुनामी [ अतुकांतिका ]

 123/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मूर्खता एकांगी नहीं होती

बहुमुखी होती है

जो किसी के आचरण

किसी के संचरण

किसी के चेहरे

किसी के क्रिया-कर्मों में 

दिख ही जाती है।


मूर्खता का जिम्मा

किसी आम या खास का नहीं

वह देखी जाती हैं सब कहीं

राजा हो या रंक

अनपढ़ या सुशिक्षित

नेता अथवा अधिकारी

प्राइवेट भी है

वह कभी हो जाती सरकारी

मूर्खता है

विश्वव्यापी बीमारी,

जो लाइलाज है।


पागलखाने में ही नहीं होते मूर्ख

उसके बाहर भी 

बहुतायत से मिलते हैं,

लड़ते हैं लड़वाते हैं

आपस में बैर करवाते हैं

दुनिया में अशांति का 

कहर ढाते हैं,

और अपने को 

दूध से धुला जताते हैं,

रक्तिम क्रांति करवाते हैं

और शांति का अवार्ड 

माँगते हुए देखे जाते हैं।


अपने चारों ओर

 एक नजर तो घुमाइए

आपको एक नहीं

अनेक मूर्ख दिख जाएँगे,

जो अपने को सबसे

बुद्धिमान बताएँगे,

वह सर्वव्यापी जो है,

मूर्खता के अनेक पर्यायों से

भरा हुआ है ये जगत,

कभी- कभी मूर्खों की भी

होती है बड़ी आवभगत।


मूर्खता ने 

मनचाहा डेरा डाला है,

बुद्धिमानों के समक्ष

अपना कदम निकाला है,

कोई तो कभी-कभी

मूर्ख बन जाता है

और कुछ लोग

सदाबहार मूर्खता का मुकुट

शिरोधार्य करते हैं, 

वे मूर्ख बनने में किंचित मात्र भी

नहीं डरते हैं,

आज विश्वव्यापी 

मूर्खता की सुनामी आयी हुई है,

पर क्या कीजिए

सब दिन होत न एक समान।


शुभमस्तु,


03.04.2026◆4.30 आ०मा०

                  ◆◆◆

सुहृद सुखद संदेश [ दोहा ]

 127/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सुहृद    सुखद   संदेश को, रखें  हृदय  में   धार।

जीवन   के   भवितव्य का,शुभकर सत उपहार।।

स्वजनों      के   संदेश  में, है  उपकारी   भाव।

पार     उतारें     धार   से,  मित्र   तुम्हारी नाव।।


युग-युग        से     देते   रहे,  साधु-संत संदेश।

परहित   में  जीना    सभी,  रहकर देश-विदेश।।

मात-पिता      देते   सदा ,   संतति    को संदेश।

चुरा न   जी   श्रम   से कभी,भीत न हो लवलेश।।


पौराणिक      संदेश   में,   मानवता का       सार।

छिपा    हुआ    सर्वत्र    ही, उनमें    जन उपकार।।

ग्रहण       करें    संदेश तो ,  सकल सृष्टि   भंडार।

सीख   मिले   हर व्यक्ति को,शुभतम पर उपकार।।


झुकते      हैं   तरु  भार से,जब लदते बहु   बौर।

मानव       हित   संदेश  है, करना  मन में   गौर।।

कलकल   से   अपनी   यही,देती   सरि संदेश।

चरैवेति     के    गान   से,   मानव   धरे सुवेश।।


वन  पाखी    कलरव  करें,होता सुखद विहान।

फैलाएं     संदेश     वे, रहे   न  तम का भान।।

चींटी    हार न  मानती, गिरती - चढ़ती  खूब।

देती   श्रम - संदेश   जो,  नहीं  जानती   ऊब।।


जैसा   जिसका   कर्म   है,वैसा ही फल लाभ।

शुभद    यही संदेश  है,सन्निविष्ट   उस गाभ।।


शुभमस्तु,


09.04.2026◆5.30आ०मा०

                    ◆◆◆

स्वागत है ऋतुराज का [ दोहा ]

 122/2026



[बसंत,ऋतुराज,कामदेव,अमलतास,कचनार]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'    

     

                 सब में एक

मन  में  वन में  बाग में,बिखरा विरुद बसंत।

सुमन खिले  बहु रंग के,महका  हुआ दिगंत ।।

कुहू-कुहू कोकिल करे,कूक -कूक हर ओर।

ऋतु  बसंत  मनभावनी,चुरा  रही मन मोर।।


स्वागत है ऋतुराज  का,अलि दल है रस लीन।

कलियाँ   खिलतीं   बाग में, मुस्का   रही जमीन।।

स्वागत  में   ऋतुराज के , तितली भँवरे   मस्त।

मधुरस     पीते   प्रेम   से,दिन भर रहते व्यस्त।।


कामदेव ऋतुराज  का, अविलग  नेक सुसंग।

विरहिन   तड़पे    ताप से,  तापित  करे अनंग।।

कामदेव    का   काम है,  करना सृष्टि प्रसार।

मन ही मन मंथित   करे,  अविरल  सघन गुबार।।


पीली     चादर   ओढ़कर , छाया  है  चहुँ ओर।

अमलतास मन  खींचता,मन्मथ को झकझोर।।

अमलतास  छवि  देखकर,हँसने लगा गुलाब।

भ्रमरों   का  दल  छा गया,रहा  फूल  को दाब।।


झूम  उठा  कचनार भी, जब आया ऋतुराज।

कलियाँ बैंगन-सी खिलीं,सजा हुआ नव साज।।

अपनी ही छवि के लिए, ख्यात हुआ कचनार।

लगा   बैंजनी  शीश  पर, मुकुट   सजाए मार।। 


               एक में सब

अमलतास कचनार सँग,महक रहा ऋतुराज।

कामदेव  सोया   जगा, वर बसंत का   साज।।


शुभमस्तु,

01.04.2026 ◆4.30 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...