283/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
भरा ताल
खेतों में पानी
हरियाये धानों से खेत।
ले कागज की नाव
चलाते
हँस-हँस मगन मृदुल मुख नैन
भरे लबालब
ताल तलैया
मिला बालकों को सुख चैन
कोई झूले
झुकी डाल पर
खिल-खिल करते वे समवेत।
नहीं बालकों को
कुछ चिंता
रंग -बिरंगे धर परिधान
भेदभाव तज
सभी खेलते
जीवन के कल से अनजान
कीचड़ माटी में भी
सनते
कभी तपाती सूखी रेत।
चरें मेड़ पर
गैया बछिया
पास कहीं है उनका गाँव
रौनक से परिवेश
महकता
कहीं पेड़ बरगद की छाँव
नहीं भूत से
वे डरते हैं
नहीं दिखे उनको जिन-प्रेत।
शुभमस्तु,
09.09.2026◆4.15 प०मा०
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