शनिवार, 12 सितंबर 2026

'यतो धर्मस्ततो जय:' [ अतुकांतिका ]

 280/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'यतो धर्मस्ततो जय:'

संदेश देने वाले

देवकी नंदन

लीलावतारी

कृष्णमुरारी

कान्हा का

अवतरण दिवस आया,

दिशा -दिशा में

जड़ -चेतन में

आनंद छाया।


जन्मते नहीं भगवान

किसी माँ की कोख से

वे प्रकट होते हैं

और अपनी लीलाओं से

जन- जन का

 मन मोह लेते हैं।


अज्ञानी हैं वे लोग 

जो भगवान को

जाति के बंधन में ग्रसते हैं,

ऐसे ही मूढ़ जनों पर

कान्हा आज हँसते हैं,

वे परम आत्मा हैं

परमात्मा हैं,

अहीर या ठाकुर नहीं,

मूढ़ों के मगज में

रूढ़ियों की नालियाँ बही।


आदमी पक्षपाती है

स्वार्थी है,

उत्पाती है

सदा घाती है,

मत करना उससे

न्याय की आशा,

सत्य को ढूंढना 

होगी बहुत बड़ी दुराशा।


आईए आज

उन महान संदेशदाता

 श्रीकृष्ण की

अवतरणी मनाएँ,

उनके संदेश को अंगीकृत कर

भटके हुए मन -मष्तिष्क को

सु दिशा प्रदान कराएँ।


शुभमस्तु,


04.09.2026◆5.00आ०मा०

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