बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

सकल मनोरथ शुद्ध हों [ दोहा ]

 060/2026

        


[इच्छा,चाह,अभिलाषा,कामना,

मनोरथ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक


भली-बुरी     इच्छा  करे, मानव इच्छा-दास।

तृप्त  नहीं    होता  कभी, चरता इच्छा-घास।।

इच्छा  सदा   अनंत   हैं,इनका  ओर न   छोर।

सदा  नियंत्रित  ही  करें, मचा   रहीं उर शोर।।



चाह रहे   सब कुछ मिले,किए बिना कुछ काम।

ऐसे    नर   बस   चाहते,  कर्महीन   बन नाम।।

चाह वही   मन  में  करें,निज वश की जो बात।

छुएँ   नहीं   आकाश  को, मिले सुनिश्चित घात।।


करना अभिलाषा वही, जो जनहित  की  हेतु।

भार     उठाए     आपका,   वही   बनाएँ सेतु।।

अभिलाषा  पावन  जगा, करें  ईश की  भक्ति।

सद्भावी   उर  से    रहें, जन-जन से अनुरक्ति।।


सकल कामना हीन   जो,जीवन खेह समान।

बिना  किए  फल  चाहते, तानें जीभ-कमान।।

सबके   प्रति   शुभ  कामना,का  देता संदेश।

उगता  सूरज  नित्य  ही,जग  में देश-विदेश।।


सकल   मनोरथ  शुद्ध हों,  तब होता उद्धार।

मन को   पावन   कीजिए,करके जन उपकार।।

कुटिल मनोरथ से कभी,मिले नहीं सुख चैन।

मन में   जिसके   खोट   है,दुखी   रहे दिन-रैन।।


                एक में सब


अभिलाषा  या कामना, इच्छा हो  या चाह।

वही  मनोरथ कीजिए,मिले  जहाँ शुभ   राह।।


शुभमस्तु!


01.02.2026◆5.30 आ०मा०

                 ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...