065/2026
शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट।
नहीं उघाड़ो प्रिय अन्तर्पट।।
उर में वास करे जो प्रति पल,
नाम उसी का ले क्षण- क्षण रट।
निज सतपथ से मत विचलित हो,
एक इंच भी तू न कभी हट।
सब चलते हैं अपने पथ पर ,
चलता रह तू करे न खट-खट ।
छलके नहीं बूँद भर पानी,
सँवर -सँवर कर ले चल ये घट।
अभिनय में सब लगे हुए हैं,
तू भी बना हुआ मंचन-नट।
'शुभम्' दृष्टि-पथ हो न धुँधलका,
आने मत दे दृग पर ये लट।
शुभमस्तु ,
02.02.2026◆6.00आ०मा०
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