बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट [ गीतिका ]

 065/2026


    शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट

                

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल,

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।


निज सतपथ से  मत विचलित हो,

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ,

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी,

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं,

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका,

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆◆◆

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