बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

नहीं उघाड़ो प्रिय अन्तर्पट [ सजल ]

 064/2026




समांत          :अट

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल।

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।।


निज सतपथ से  मत विचलित हो।

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ।

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी।

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं।

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका।

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆◆◆

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