068/2026
[फागुन,आहट,अभिसार,बसंत,पतझर]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
रंग भरे मधुमास का,फागुन ही शुभ मास।
फूल -फूल गुंजार है, मधुकर का परिहास।।
अंत भला तो सब भला, फागुन गाए फाग।
वर्ष समापन हो रहा, तोड़ खुमारी जाग।।
कुहू-कुहू कोकिल करे, अमराई के कुंज।
आहट मिली वसंत की,गुंजित अलिदल पुंज।।
आहट पा निज कन्त की, मन में उठी तरंग।
सन्नारी कब सो सकी, देख हुआ प्रिय दंग।।
प्रियतम से अभिसार का, अवसर फागुन मास।
कलियाँ चटकीं बाग में,उड़ती प्रबल सुवास।।
मर्यादा की आड़ में,करे प्रिया अभिसार।
पहने श्यामल शाटिका, नयन सजल रतनार।।
यौवन वयस बसंत है, राग रंग रस रास।
किसलय विकसित शाख में,जागी सुमन सुवास।।
टेसू पाटल रंग में, झूम रहे रतनार।
है बसंत मनभावना, तितली करे दुलार।।
सदा न वेला फूलते, सदा न रहे खुमार।।
पतझर आया बाग में,सेमल सुमन बहार।
संकेतक नित नव्यता, का देता मधुमास।
एक ओर पतझर हुआ,उधर सुमन की वास।।
एक में सब
आहट मिली बसंत की,फागुन का मधुमास।
रमणी रत अभिसार में,पतझर भरे उसास।।
शुभमस्तु,
04.02.2026◆7.15 आ०मा०
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