बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

मनोरथ [ चौपाई ]

 066/2026


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध  मनोरथ  जिसका    कोई।

उसने     लता    सुंगंधित    बोई।।

हरियाली   उर   में     भर    देती।

हर  नकार को   वह    हर  लेती।।


दूषित   मन  से   काम   न   होता।

सफल मनोरथ  पथ  से  खोता।।

तिलक  छाप का  ढोंग  न  करना।

अभिनय  से सत काज  न सरना।।


करें मनोरथ  मन     से    सच्चा।

बने रहें    ज्यों        भोला    बच्चा।।

छल कपटों  से    करे      विमुखता।

करे पलायन       हृदय - विकलता।।


मन   के   रथ   की   करें     सवारी।

भले-बुरे      विकृत        नर-नारी।।

कैसे    सफल    मनोरथ    होते।

वही   अंत      में     मानुष     रोते।।


अश्व   मनोरथ  के    हों    चंचल।

यत्र    तत्र     करवाते        दंगल।।

भग्न  करे   रथ   रथी   न   बचना।

शेष न रहती   तन    की    रचना।।


नर स्वतंत्र     जो   करे   मनोरथ।

रहे  हाथ में   भावी     का   पथ।।

वल्गा   थाम    नियंत्रित    करना।

नहीं  हवा    में     ऊँचा    उड़ना।।


'शुभम्' मनोरथ  सब  सुखदाता।

यदि    मानव    कर्तव्य   निभाता।।

वहीं  सफलता    करतल    होती।

मिलें  गहन  सागर    में     मोती।।


शुभमस्तु !


02.02.2026◆4.00प०मा०

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