बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

जो दहका वह निखर गया [ ग़ज़ल]

 062/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप शुभम्'


जो  दहका    वह     निखर   गया।

टूट   गया  जो      बिखर    गया।।


चलता       गया      राह     अपनी,

मंजिल  के    वह     शिखर   गया।


मंजता     रहा     रात -दिन      जो,

बर्तन  घर   का      सँवर        गया।


सहने   की      ताक़त     न     रही,

कमजोरी     में       बिफ़र     गया।


गर्म     रेत    को      छुआ      नहीं,

छुआ  तुरत     ही    सिहर     गया।


आया   था     कुछ     करने    को,

किए  बिना    कब    किधर   गया।


'शुभम्'      गए      कितने    आए,

इधर     दिखा था    उधर     गया।


शुभमस्तु ,


01.02.2026◆11.30 आ०मा०

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