बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

नियति यही है [ गीत ]

 067/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इधर अँधेरा

उधर उजाला

नियति यही है।


उगा दिवाकर

जब प्राची में 

मचा जगत में शोर

उषा जगी

कलियाँ मुस्काईं

हुआ सुहाना भोर

नमन प्रणाम

करे जन जीवन

सुगति यही है।


संध्या काल

हुआ तम छाया

खग जाते निज नीड़

घटने लगी

बाजार सड़क पर

नर-नारी की  भीड़

हुआ दिवस-

अवसान शांति से

प्रगति यही है।


उदय हुआ जो

अस्त उसे भी

होना ही यह सत्य

सिंहासन से

पतित हुए नृप

अविचल जीवन तथ्य

पुनः एक 

नव नृप आना है

निरति यही है।


शुभमस्तु ,


03.02.2026◆4.15 आ०मा०

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