063/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
चलती उलटे पाँव सियासत।
समझे शहर न गाँव सियासत।।
उसका अपना एक न कोई,
नहीं बनाए ठाँव सियासत।
सुनती नहीं कान से कुछ भी,
अपनी कर - कर काँव सियासत।
गलत सही कुछ भी कब माने,
मस्त चांव ही चांव सियासत।
मरे धूप में सारी जनता,
वोटों की घन छाँव सियासत।
अपना सीधा करती उल्लू,
पर जन को नित खांव सियासत।
पाशा 'शुभम्' पड़े यदि उलटा ,
लेती अपना दाँव सियासत।
शुभमस्तु ,
01.02.2026◆12.00मध्याह्न
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