सोमवार, 2 नवंबर 2026

राम नाम से रमता कण-कण [ गीतिका ]

 385/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम नाम  से रमता   कण-कण।

हमें  राम   से   शुभ   आकर्षण।।


थिरता    नहीं   लेश   जगती में,

रूप रंग  परिवर्तित   क्षण-क्षण।


क्षीण    हो   रही   है    मानवता,

दानवता  से कंपित   तृण -तृण।


लगे  सताने    लोग    अन्य  को,

नोंच रहे    हैं   वे   रिसते  व्रण।


रावण  ध्वंश    तभी   हो   पाए,

जब  हो   जाए   राम-अवतरण।


राजनीति     का  रावण    देखो,

सता  रहा   है   सारा   जनगण।


'शुभम्'  अमोलक मानव जीवन,

नहीं लगाना    इसको    तू पण।


शुभमस्तु,


01.11.2026◆10.45 प०मा०

                   ◆●◆

हमें राम से शुभ आकर्षण [ सजल ]


384/2026


    


समांत          : अण

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       : 26.

मात्रा पतन    : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


राम नाम  से रमता   कण-कण।

हमें  राम   से   शुभ   आकर्षण।।


थिरता    नहीं   लेश   जगती में।

रूप रंग  परिवर्तित   क्षण-क्षण।।


क्षीण    हो   रही   है    मानवता।

दानवता  से कंपित   तृण -तृण।।


लगे  सताने    लोग    अन्य  को।

नोंच रहे    हैं   वे   रिसते  व्रण।।


रावण  ध्वंश    तभी   हो   पाए।

जब  हो   जाए   राम-अवतरण।।


राजनीति     का  रावण    देखो।

सता  रहा   है   सारा   जनगण।।


'शुभम्'  अमोलक मानव जीवन।

नहीं लगाना    इसको    तू पण।।


शुभमस्तु,


01.11.2026◆10.45 प०मा०

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[11:01 pm, 1/11/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

दर्पण [ चौपाई ]

 383/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दर्पण   किंचित    झूठ      न     बोले।

सच  के  हित  ही    निज  मुख  खोले।।

जो     जैसा      है       वही      बताए।

अपना    नमक    न     मिर्च    लगाए।।


निज    व्यक्तित्व       बनाएँ      दर्पण।

सत्य    पंथ       को     करें     समर्पण।।

तभी      जगत     में       पूजा     होगी।

रहे      देह        मन      सदा    निरोगी।।


दर्पण    वत       बालक    सब    भोले।

देख     उन्हें      सबका       मन  डोले।।

छल-छ्द्मों      से     रहे     न     नाता।

किसे   न   निश्छल      बालक    भाता।।


ज्यों-ज्यों      मानव       बढ़ता      जाता।

दर्पण        नहीं       शेष       रह   पाता।।

मन     में        मैल         समाए     भारी।

नरक       गमन        की      है     तैयारी।।


भंग      अगर       दर्पण     हो    जाएँ

मिलें    न      साबुत       टुकड़े      पाएँ।।

निर्मल    मन       शुभ    दर्पण   होता।

नहीं       कभी        पछताता      रोता।।


निज        आनन       देखें    नर-नारी।

रखते   दर्पण     घर        में      भारी।

धूल  जमी     है    मुख      पर    भारी।

झाड़       रहे       दर्पण        नर-नारी।।


मन    की          रेणु     हटाएँ    आओ।

तभी   'शुभम्'     दर्शन    कर    पाओ।।

दर्पण -सा           व्यक्तित्व     बनाया।

'शुभम्'      तभी     कविवर   कहलाया।।


शुभमस्तु,


01.11.2026◆ 10.15 प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...