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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
राम नाम से रमता कण-कण।
हमें राम से शुभ आकर्षण।।
थिरता नहीं लेश जगती में,
रूप रंग परिवर्तित क्षण-क्षण।
क्षीण हो रही है मानवता,
दानवता से कंपित तृण -तृण।
लगे सताने लोग अन्य को,
नोंच रहे हैं वे रिसते व्रण।
रावण ध्वंश तभी हो पाए,
जब हो जाए राम-अवतरण।
राजनीति का रावण देखो,
सता रहा है सारा जनगण।
'शुभम्' अमोलक मानव जीवन,
नहीं लगाना इसको तू पण।
शुभमस्तु,
01.11.2026◆10.45 प०मा०
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