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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दर्पण किंचित झूठ न बोले।
सच के हित ही निज मुख खोले।।
जो जैसा है वही बताए।
अपना नमक न मिर्च लगाए।।
निज व्यक्तित्व बनाएँ दर्पण।
सत्य पंथ को करें समर्पण।।
तभी जगत में पूजा होगी।
रहे देह मन सदा निरोगी।।
दर्पण वत बालक सब भोले।
देख उन्हें सबका मन डोले।।
छल-छ्द्मों से रहे न नाता।
किसे न निश्छल बालक भाता।।
ज्यों-ज्यों मानव बढ़ता जाता।
दर्पण नहीं शेष रह पाता।।
मन में मैल समाए भारी।
नरक गमन की है तैयारी।।
भंग अगर दर्पण हो जाएँ
मिलें न साबुत टुकड़े पाएँ।।
निर्मल मन शुभ दर्पण होता।
नहीं कभी पछताता रोता।।
निज आनन देखें नर-नारी।
रखते दर्पण घर में भारी।
धूल जमी है मुख पर भारी।
झाड़ रहे दर्पण नर-नारी।।
मन की रेणु हटाएँ आओ।
तभी 'शुभम्' दर्शन कर पाओ।।
दर्पण -सा व्यक्तित्व बनाया।
'शुभम्' तभी कविवर कहलाया।।
शुभमस्तु,
01.11.2026◆ 10.15 प०मा०
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